श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
गीतावली · गोस्वामी तुलसीदास

सुन्दरकाण्ड · भाग ३

गीतावली · सुन्दरकाण्ड · भाग ३
पद २७

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 21 से 30 तक/पृष्ठ 7

(27)

"भाई को सो करौं, डरौं कठिन कुफेरै |

सुकृत-सङ्कट पर्यो, जात गलानिन्ह गर्यो ,

कृपानिधिको मिलौं पै मिलिकै कुबेरै ||

जाइ गह पाँय, धाइ धनद उठाइ भेट्यो,

समाचार पाइ पोच सोचत सुमेरै |

तहँई मिले महेस, दियो हित उपदेस,

रामकी सरन जाहि "सुदिनु न हेरै ||

जाको नाम कुम्भज कलेस-सिन्धु सोखिबेको,

मेरो कह्यो मानि, तात!बाँधे जिनि बेरै |

तुलसी मुदित चले, पाये हैं सगुन भले,

रङ्क लूटिबेको मानो मनिगन-ढेरै ||

पद २८

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 21 से 30 तक/पृष्ठ 8

(28)

राग केदारा

सङ्कर-सिख आसिष पाइकै |

चले मनहि मन कहत बिभीषन सीस महेसहि नाइकै ||

गये सोच, भए सगुन, सुमङ्गल दस दिसि देत देखाइकै |

सजल नयन, सानन्द हृदय, तनु प्रेम-पुलक अधिकाइकै ||

अंतहु भाव भलो भाईको, कियो अनभलो मनाइकै |

भै कूबरकी लात, बिधाता राखी बात बनाइकै ||

नाहित क्यों कुबेर घर मिलि हर हितु कहते चित लाइकै |

जो सुनि सरन राम ताके मैं निज बामता बिहाइकै ||

अनायास अनुकूल सूलधर मग मुदमूल जनाइकै |

कृपासिन्धु सनमानि, जानि जन दीन लियो अपनाइकै ||

स्वारथ-परमारथ करतलगत, श्रमपथ गयो सिराइकै |

सपने कै सौतुक, सुख-सस सुर सीञ्चत देत निराइकै ||

गुरु गौरीस, साँइ सीतपति, हित हनुमानहि जाइकै |

मिलिहौं, मोहि कहा कीबे अब, अभिमत, अवधि अघाइकै ||

मरतो कहाँ जाइ, को जानै लटि लालची ललाइकै |

तुलसिदास भजिहौं रघुबीरहि अभय-निसान बजाइकै ||

पद २९

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 21 से 30 तक/पृष्ठ 9

(29)

पदपदुम गरीबनिवाजके |

देखिहौं जाइ पाइ लोचन-फल हित सुर-साधु-समाजके ||

गई बहोर, ओर निरबाहक, साजक बिगरे साजके |

सबरी सुखद, गीध-गतिदायक, समन सोक कपिराजके ||

नाहिन मोहि और कतहूँ कछु, जैसे काग जहाजके |

आयो सरन सुखद पदपङ्कज चोन्थे रावन-बाजके ||

आरतिहरन सरन, समरथ सब दिन अपनेकी लाजके |

तुलसी "पाहि कहत नत-पालक मोहुसे निपट निकाजके ||

पद ३०

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 21 से 30 तक/पृष्ठ 10

(30)

महाराज रामपहँ जाउँगो |

सुख-स्वारथ परिहरि करिहौं सोइ, ज्यौं साहिबहि सुहाँउगो ||

सरनागत सुनि बेगि बोलि हैं, हौं निपटहि सकुचाउँगो |

राम गरीबनिवाज निवाजिहैं जानिहैं, ठाकुर-ठाउँगो ||

धरिहैं नाथ हाथ माथे, एहितें केहि लाभ अघाउँगो |

सपनो-सो अपनो न कछू लखि, लघु लालच न लोभाउँगो ||

कहिहौं, बलि, रोटिहा रावरो, बिनु मोलही बिकाउँगो |

तुलसी पट ऊतरे ओढ़िहौं, उबरी जूठनि खाउँगो ||

पद ३१

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 31 से 40 तक/पृष्ठ 1

(31)

आइ सचिव बिभीषनके कही |

कृपासिन्धु !दसकन्धबन्धु लघु चरन-सरन आयो सही ||

बिषम बिषाद-बारिनिधि बूड़त थाह कपीस-कथा लही |

गये दुख-दोष देखि पदपङ्कज, अब न साध एकौ रही ||

सिथिल-सनेह सराहत नख-सिख नीक निकाई निरबही |

तुलसी मुदित दूत भयो, मानहु अमिय-लाहु माँगत मही ||

पद ३२

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 31 से 40 तक/पृष्ठ 2

(32)

बिनती सुनि प्रभु प्रमुदित भए |

रीछराज, कपिराज नील-नल बोलि बालिनन्दन लए ||

बूझिये कहा? रजाइ पाइ नय-धरम सहित ऊतर दए |

बली बन्धु ताको जेहि बिमोह-बस बैर-बीज बरबस बए ||

बाँहपगार द्वार तेरे तैं सभय न कबहूँ फिरि गए |

तुलसी असरन-सरन स्वामिके बिरद बिराजत नित नए ||

पद ३३

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 31 से 40 तक/पृष्ठ 3

(33)

हिय बिहसि कहत हनुमानसों |

सुमति साधु सुचि सुहृद बिभीषन बूझि परत अनुमानसों ||

"हौं बलि जाउँ और को जानै ?कही कपि कृपानिधानसों |

छली न होइ स्वामि सनमुख, ज्यों तिमिर सातहय-जानसों ||

खोटो खरो सभीत पालिये सो, सनेह सनमानसों |

तुलसी प्रभु कीबो जो भलो, सोइ बूझि सरासन-बानसों ||

पद ३४

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 31 से 40 तक/पृष्ठ 4

(34)

साँचेहु बिभीषन आइहै ?

बूझत बिहँसि कृपालु, लखन सुनि कहत सकुचि सिर नाइ है ||

ऐहै कहा, नाथ? आयो ह्याँ, क्यों कहि जाति बनाइ है |

रावन-रिपुहि राखि, रघुबर बिनु, को त्रिभुवन पति पाइहै ||

प्रभु प्रसन्न, सब सभा सराहति, दूत-बचन मन भाइहै |

तुलसी, "बोलिये बेगि, लषनसों भै महाराज-रजाइ है ||

पद ३५

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 31 से 40 तक/पृष्ठ 5

(35)

चले लेन लषन-हनुमान हैं |

मिले मुदित बूझि कुसल परसपर-सकुचत करि सनमान हैं ||

भयो रजायसु पाउँ धारिए, बोलत कृपानिधान हैं |

दूरितें दीनबन्धु देखे, जनु देत अभय-बरदान हैं ||

सील सहस हिमभानु, तेज सतकोटि भानुहूके भानु हैं |

भगतनिको हित कोटि मातु-पितु अरिन्हको कोटि कृसानु हैं ||

जनगुन रज गिरि गनि, सकुचत निज गुन गिरि रज परमानु हैं |

बाँह-पगारु, बोलको अबिचल बेद करत गुनगान हैं ||

चारु चाप-तूनीर तामरस-करनि सुधारत बान हैं |

चरचा चलति बिभीषनकी, सोइ सुनत सुचित दै कान हैं ||

हरषत सुर, बरषत प्रसून सुभ सगुन कहत कल्यान हैं |

तुलसी ते कृतकृत्य, जे सुमिरत समय सुहावनो ध्यान हैं ||

पद ३६

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 31 से 40 तक/पृष्ठ 6

(36)

रामहि करत प्रनाम निहारिकै |

उठे उमँगि आनन्द-प्रेम-परिपूरन बिरद बिचारिकै ||

भयो बिदेह बिभीषन उत, इत प्रभु अपनपौ बिसारिकै |

भलीभाँति भावते भरत-ज्यों भेण्ट्यौ भुजा पसारिकै ||

सादर सबहि मिलाइ समाजहि निपट निकट बैठारिकै |

बूझत छेम-कुसल सप्रेम अपनाइ भरोसे भारिकै ||

नाथ! कुसल-कल्यान-सुमङ्गल बिधि सुख सकल सुधारिकै |

देत-लेत जे नाम रावरो, बिनय करत मुख चारिकै ||

जो मूरति सपने न बिलोकत मुनि-महेस मन मारिकै |

तुलसी तेहि हौं लियो अंक भरि, कहत कछू न सँवारिकै ||

पद ३७

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 31 से 40 तक/पृष्ठ 7

(37)

करुनाकरकी करुना भई |

मिटी मीचु, लहि लङ्क सङ्क गै, काहूसो न खुनिस खई ||

दसमुख तज्यो दूध-माखी-ज्यौं, आपु काढ़ि साढ़ी लई |

भव-भूषन सोइ कियो बिभीषन मुद मङ्गल-महिमामई ||

बिधि-हरि-हर, मुनि-सिद्ध सराहत, मुदित देव दुन्दुभी दई |

बारहि बार सुमन बरषत, हिय हरषत कहि जै जै जई ||

कौसिक-सिला-जनक-सङ्कट हरि भृगुपतिकी टारी टई |

खग-मृग सबर-निसाचर, सबकी पूँजी बिनु बाढ़ी सई ||

जुग-जुग कोटि-कोटि करतब, करनी न कछू बरनी नई |

राम-भजन-महिमा हुलसी हिय, तुलसीहूकी बनि गई ||

पद ३८

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 31 से 40 तक/पृष्ठ 8

(38)

मञ्जुल मूरति मङ्गलमई |

भयो बिसोक बिलोकि बिभीषन, नेह देह-सुधि-सींव गई ||

उठि दाहिनी ओरतें सनमुख सुखद माँगि बैठक लई |

नखसिख निरखि-निरखि सुख पावत भावत कछु, कछु और भई ||

बार कोटि सिर काटि, साटि लटि, रावन सङ्करपै लई |

सोइ लङ्का लखि अतिथि अनवसर राम तृनासन-ज्यों दई ||

प्रीति-प्रतीति-रीति-सोभा-सिर, थाहत जहँ जहँ तहँ घई |

बाहु-बली, बानैत बोलको, बीर बिस्वबिजई जई ||

को दयालु दूसरो दुनी, जेहि जरनि दीन-हियकी हई ?

तुलसी काको नाम जपत जग जगती जामति बिनु बई ||

पद ३९

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 31 से 40 तक/पृष्ठ 9

(39)

सब भाँति बिभीषनकी बनी |

कियो कृपालु अभय कालहुतें, गै संसृति-साँसति घनी ||

सखा लषन-हनुमान, सम्भु गुर, धनी राम कोसलधनी |

हिय ही और, और कीन्हीं बिधि, रामकृपा औरै ठनी ||

कलुष-कलङ्क-कलेस-कोस भयो जो पद पाय रावन रनी |

सोइ पद पाय बिभीषन भो भव-भूषन दलि दूषन-अनी ||

रङ्क-निवाज रङ्क राजा किए, गए गरब गरि गरि गनी |

राम-प्रनाम महामहिमा-खनि, सकल सुमङ्गलमनि-जनी ||

होय भलो ऐसे ही अजहुँ गये राम-सरन परिहरि मनी |

भुजा उठाइ, साखि सङ्कर करि, कसम खाइ तुलसी भनी ||