श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
गीतावली · गोस्वामी तुलसीदास

सुन्दरकाण्ड · भाग ४

गीतावली · सुन्दरकाण्ड · भाग ४
पद ४०

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 31 से 40 तक/पृष्ठ 10

(40)

कहो, क्यों न बिभीषनकी बनै ?

गयो छाड़ि छल सरन रामकी, जो फल चारि चार्यौं जनै ||

मङ्गलमूल प्रनाम जासु जग, मूल अमङ्गलके खनै |

तेहि रघुनाथ हाथ माथे दियो, को ताकी महिमा भनै ?||

नाम-प्रताप पतितपावन किए, जे न अघाने अघ अनै |

कोउ उलटो, कोउ सुधो जपि भए राजहंस बायस-तनै ||

हुतो ललात कृसगात खात खरि, मोद पाइ कोदो-कनै |

सो तुलसी चातक भयो जाचत राम स्यामसुन्दर घनै ||

पद ४१

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 41 से 51 तक/पृष्ठ 1

(41)

अति भाग बिभीषनके भले |

एक प्रनाम प्रसन्न राम भए, दुरित-दोष-दारिद दले ||

रावन-कुम्भकरन बर माँगत सिव-बिरञ्चि बाचा छले |

राम-दरस पायो अबिचल पद, सुदिन सगुन नीके चले ||

मिलनि बिलोकि स्वामि-सेवककी उकठे तरु फूले-फले |

तुलसी सुनि सनमान बन्धुको दसकन्धर हँसि हिये जले ||

पद ४२

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 41 से 51 तक/पृष्ठ 2

(42)

गये राम सरन सबकौ भलो |

गनी-गरीब, बड़ो-छोटो, बुध-मूढ़, हीनबल-अतिबलो ||

पङ्गु-अंध, निरगुनी-निसम्बल, जो न लहै जाचे जलो |

सो निबह्यो नीके, जो जनमि जग राम-राजमारग चलो ||

नाम-प्रताप-दिवाकर कर खर गरत तुहिन ज्यों कलिमलो |

सुतहित नाम लेत भवनिधि तरि गयो अजामिल-सो खलो ||

प्रभुपद प्रेम प्रनाम-कामतरु सद्य बिभीषनको फलो |

तुलसी सुमिरत नाम सबनिको मङ्गलमय नभ-जल थलो ||

पद ४३

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 41 से 51 तक/पृष्ठ 3

(43)

सुजस सुनि श्रवन हौं नाथ! आयो सरन |

उपल-केवट-गीध-सबरी-संसृति-समन,

सोक-श्रम-सीव सुग्रीव आरतिहरन ||

राम राजीव-लोचन बिमोचन बिपति,

स्याम नव-तामरस-दाम बारिद-बरन |

लसत जटाजूट सिर, चारु मुनिचीर कटि,

धीर रघुबीर तूनीर-सर-धनु-धरन ||

जातुधानेस-भ्राता बिभीषन नाम

बन्धु-अपमान गुरु ग्लानि चाहत गरन |

पतितपावन! प्रनतपाल! करुनासिन्धु!

राखिए मोहि सौमित्रि-सेवित-चरन ||

दीनता-प्रीति-सङ्कलित मृदुबचन सुनि

पुलकि तन प्रेम, जल नयन लागे भरन |

बोलि, "लङ्केस कहि अंक भरि भेण्टि प्रभु,

तिलक दियो दीन-दुख-दोष दारिद-दरन ||

रातिचर-जाति, आराति सब भाँति गत

कियो सो कल्यान-भाजन सुमङ्गलकरन |

दास तुलसी सदयहृदय रघुबंसमनि

"पाहि कहे काहि कीन्हों न तारन-तरन ?||

पद ४४

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 41 से 51 तक/पृष्ठ 4

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दीन-हित बिरद पुराननि गायो |

आरत-बन्धु, कृपालु, मृदुल-चित जानि सरन हौं आयो ||

तुम्हरे रिपुको अनुज बिभीषन, बंस निसाचर जायो |

सुनि गुन-सील-सुभाउ नाथको मैं चरननि चितु लायो ||

जानत प्रभु दुख-सुख दासनिको, तातें कहि न सुनायो |

करु करुना भरि नयन बिलोकहु, तब जानौं अपनायो ||

बचन बिनीत सुनत रघुनायक हँसि करि निकट बुलायो |

भेण्ट्यो हरि भरि अंक भरत-ज्यों, लङ्कापति मन भायो ||

करपङ्कज सिर परसि अभय कियो, जनपर हेतु दिखायो |

तुलसिदास रघुबीर भजन करि को न परमपद पायो ?||

पद ४५

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 41 से 51 तक/पृष्ठ 5

(45)

सत्य कहौं मेरो सहज सुभाउ |

सुनहु सखा कपिपति लङ्कापति, तुम्ह सन कौन दुराउ ||

सब बिधि हीन-दीन, अति जड़मति जाको कतहुँ न ठाउँ |

आयो सरन भजौं, न तजौं तिहि, यह जानत रिषिराउ ||

जिन्हके हौं हित सब प्रकार चित, नाहिन और उपाउ |

तिन्हहिं लागि धरि देह करौं सब, डरौं न सुजस नसाउ ||

पुनि पुनि भुजा उठाइ कहत हौं, सकल सभा पतिआउ |

नहि कोऊ प्रिय मोहि दास सम, कपट-प्रीति बहि जाउ ||

सुनि रघुपतिके बचन बिभीषन प्रेम-मगन, मन चाउ |

तुलसिदास तजि आस-त्रास सब ऐसे प्रभु कहँ गाउ ||

पद ४६

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 41 से 51 तक/पृष्ठ 6

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नाहिन भजिबे जोग बियो |

श्रीरघुबीर समान आन को पूरन-कृपा-हियो ||

कहहु, कौन सुर सिला तारि पुनि केवट मीत कियो ?

कौने गीध अधमको पितु-ज्यों निज कर पिण्ड दियो ?||

कौन देव सबरीके फल करि भोजन सलिल पियो ?

बालित्रास-बारिधि बूड़त कपि केहि गहि बाँह लियो ?||

भजन-प्रभाउ बिभीषन भाष्यौ, सुनि कपि-कटक जियो |

तुलसिदासको प्रभु कोसलपति सब प्रकार बरियो ||

पद ४७

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 41 से 51 तक/पृष्ठ 7

(47)

जानकी-त्रिजटा-संवाद

राग जैतश्री

कब देखौङ्गी नयन वह मधुर मूरति ?

राजिवदल-नयन, कोमल, कृपा-अयन,

मयननि बहु छबि अंगनि दुरति ||

सिरसि जटा-कलाप, पानि सायक,

चाप, उरसि रुचिर बनमाल लूरति |

तुलसिदास रघुबीरकी सोभा सुमिरि,

भई है मगन नहि तनकी सूरति ||

पद ४८

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 41 से 51 तक/पृष्ठ 8

(48)

'''

राग केदारा'''

कहु, कबहुँ देखिहौं आली! आरज-सुवन |

सानुज सुभग-तनु जबतें बिछुरे बन,

तबतें दव-सी लगी तीनिहू भुवन ||

मूरति सूरति किये प्रगट प्रीतम हिये,

मनके करन चाहैं चरन छुवन |

चित चढ़िगो बियोग-दसा न कहिबे जोग,

पुलक गात, लागे लोचन चुवन ||

तुलसी त्रिजटा जानी, सिय अति अकुलानी

मृदु बानी कह्यौ ऐहैं दवन-दुवन |

तमीचर-तम-हारी सुरकञ्ज-सुखकारी

रबिकुल-रबि अब चाहत उवन ||

पद ४९

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 41 से 51 तक/पृष्ठ 9

(49)

अबलौं मैं तोसों न कहे री |

सुन त्रिजटा! प्रिय प्राननाथ बिनु बासर निसि दुख दुसह सहे री ||

बिरह बिषम बिष-बेलि बढ़ी उर, ते सुख सकल सुभाय दहे री |

सोइ सीञ्चिबे लागि मनसिजके रहँट नयन नित रहत नहे री ||

सर-सरीर सूखे प्रान-बारिचर जीवन-आस तजि चलनु चहे री |

तैं प्रभु सुजस-सुधा सीतल करि राखे, तदपि न तृप्ति लहे री ||

रिपु-रिस घोर नदी बिबेक-बल, धीर-सहित हुते जात बहे री |

दै मुद्रिका-टेक तेहि औसर, सुचि समिरसुत पैरि गहे री ||

तुलसिदास सब सोच पोच मृग मन-कानन भरि पूरि रहे री |

अब सखि सिय सँदेह परिहरु हिय, आइ गए दोउ बीर अहेरी ||

पद ५०

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 41 से 51 तक/पृष्ठ 10

(50)

राग बिलावल

सो दिन सोनेको, कहु, कब एहै !

जा दिन बँध्यो सिन्धु त्रिजटा! सुनि तू सम्भ्रम आनि मोहि सुनैहै ||

बिस्व-दवन सुर-साधु-सतावन रावन कियो आपनो पैहै |

कनकपुरी भयो भूप बिभीषन, बिबुध-समाज बिलोकन धैहै ||

दिब्य दुन्दुभी, प्रसंसिहैं मुनिगन, नभतल बिमल बिमाननि छैहै |

बरषिहैं कुसुम भानुकुल-मनिपर, तब मोको पवनपूत लै जैहै ||

अनुज सहित सोभिहैं कपि महँ, तनु-छबि कोटि मनोजहि तैहै |

इन नयनन्हि यही भाँति प्रानपति निरखि हृदय आनँद न समैहै ||

बहुरो सदल सनाथ सलछिमन कुसल कुसल बिधि अवध देखैहै |

गुर, पुरलोग, सास, दोउ देवर, मिलत दुसह उर तपनि बुतैहै ||

मङ्गल-कलस, बधावने घर-घर, पैहैं माँगने जो जैहि भैहै |

बिजय राम राजाधिराजको, तुलसिदास पावन जस गैहै ||

पद ५१

गीतावली सुन्दरकाण्ड पद 41 से 51 तक/पृष्ठ 11

(51)

सिय! धीरज धरिये, राघौ अब ऐहैं |

पवनपूतपै पाइ तिहारी सुधि, सहज कृपालु, बिलम्ब न लैहैं ||

सेन साजि कपि-भालु कालसम कौतुक ही पाथोधि बँधैहैं |

घेरोइपै देखिबो लङ्कगढ़, बिकल जातुधानी पछितैहैं ||

निसिचर-सलभ कृसानु राम सर उड़ि-उड़ि परत जरत जड़ जैहैं |

रावन करि परिवार अगमनो, जमपुर जात बहुत सकुचैहैं ||

तिलक सारि, अपनाय बिभीषन, अभय-बाँह दै अमर बसैहैं |

जय धुनि मुनि, बरसिहैं सुमन सुर, ब्योम बिमान निसान बजैहैं ||

बन्धु समेत प्रानबल्लभ पद परसि सकल परिताप नसैहैं |

राम-बामदिसि देखि तुमहि सब नयनवन्त लोचन-फल पैहैं ||

तुम अति हित चितैहौ नाथ-तनु, बार-बार प्रभु तुमहि चितैहैं |

यह सोभा, सुख-समय बिलोकत काहू तो पलकैं नहिं लैहैं ||

कपिकुल-लखन-सुजस-जय-जानकि सहित कुसल निज नगर सिधैहैं |

प्रेम पुलकि आनन्द मुदित मन तुलसिदास कल कीरति गैहैं ||