बालकाण्ड · भाग ३
बिहरत अवध-बीथिन राम
बिहरत अवध-बीथिन राम |
सङ्ग अनुज अनेक सिसु, नव-नील-नीरद स्याम ||
तरुन अरुन-सरोज-पद बनी कनकमय पदत्रान |
पीत-पट कटि तून बर, कर ललित लघु धनु-बान ||
लोचननिको लहत फल छबि निरखि पुर-नर-नारि |
बसत तुलसीदास उर अवधेसके सुत चारि ||
जैसे राम ललित तैसे लोने लषन लालु
जैसे राम ललित तैसे लोने लषन लालु |
तैसेई भरत सील-सुखमा-सनेह-निधि, तैसेई सुभग सँग सत्रुसालु ||
धरे धनु-सर कर, कसे कटि तरकसी, पीरे पट ओढ़े चले चारु चालु |
अंग-अंग भूषन जरायके जगमगत, हरत जनके जीको तिमिरजालु ||
खेलत चौहट घाट बीथी बाटिकनि प्रभु सिव सुप्रेम-मानस-महालु |
सोभा-दान दै दै सनमानत जाचकजन करत लोक-लोचन निहालु ||
रावन-दुरित-दुख दलैं सुर कहैं आजु "अवध सकल सुखको सुकालु|
तुलसी सराहैं सिद्ध सुकृत कौसल्याजूके, भूरि भाग-भाजन भुवालु ||
ललित-ललित लघु-लघु धनु-सर कर
ललित-ललित लघु-लघु धनु-सर कर,
तैसी तरकसी कटि कसे, पट पियरे |
ललित पनही पाँय पैञ्जनी-किङ्किनि-धुनि,
सुनि सुख लहै मनु, रहै नित नियरे ||
पहुँची अंगद चारु, हृदय पदिक हारु,
कुण्डल-तिलक-छबि गड़ी कबि जियरे |
सिरसि टिपारो लाल, नीरज-नयन बिसाल,
सुन्दर बदन, ठाढ़े सुरतरु सियरे ||
सुभग सकल अंग, अनुज बालक सङ्ग,
देखि नर-नारि रहैं ज्यों कुरङ्ग दियरे |
खेलत अवध-खोरि, गोली भौंरा चक डोरि,
मुरति मधुर बसै तुलसीके हियरे ||
छोटिऐ धनुहियाँ, पनहियाँ पगनि छोटी
छोटिऐ धनुहियाँ, पनहियाँ पगनि छोटी,
छोटिऐ कछौटी कटि, छोटिऐ तरकसी |
लसत झँगूली झीनी, दामिनिकी छबि छीनी,
सुन्दर बदन, सिर पगिया जरकसी ||
बय-अनुहरत बिभूषन बिचित्र अंग,
जोहे जिय आवति सनेह की सरक सी |
मुरतिकी सूरति कही न परै तुलसी पै,
जानै सोई जाके उर कसकै करक सी ||
राम-लषन इक ओर, भरत-रिपुदवन लाल इक ओर भये
राम-लषन इक ओर, भरत-रिपुदवन लाल इक ओर भये |
सरजुतीर सम सुखद भूमि-थल, गनि-गनि गोइयाँ बाँटि लये ||
कन्दुक-केलि-कुसल हय चढ़ि-चढ़ि, मन कसि-कसि ठोङ्कि-ठोङ्कि खये |
कर-कमलनि बिचित्र चौगानैं, खेलन लगे खेल रिझये ||
ब्योम बिमाननि बिबुध बिलोकत खेलक पेखक छाँह छये |
सहित समाज सराहि दसरथहि बरषत निज तरु-कुसुम-चये ||
एक लै बढ़त एक फेरत, सब प्रेम-प्रमोद-बिनोद-मये |
एक कहत भै हार रामजूकी, एक कहत भैया भरत जये ||
प्रभु बकसत गज बाजि, बसन-मनि, जय धुनि गगन निसान हये |
पाइ सखा-सेवक जाचक भरि जनम न दुसरे द्वार गये ||
नभ-पुर परति निछावरि जहँ तहँ, सुर-सिद्धनि बरदान दये |
भूरि-भाग अनुराग उमगि जे गावत-सुनत चरित नित ये ||
हारे हरष होत हिय भरतहि, जिते सकुच सिर नयन नये |
तुलसी सुमिरि सुभाव-सील सुकृती तेइ जे एहि रङ्ग रए ||
खेलि खेल सुखेलनिहारे
खेलि खेल सुखेलनिहारे |
उतरि उतरि, चुचुकारि तुरङ्गनि, सादर जाइ जोहारे ||
बन्धु-सखा-सेवक सराहि, सनमानि सनेह सँभारे |
दिये बसन-गज-बाजि साजि सुभ साज सुभाँति सँवारे ||
मुदित नयन-फल पाइ, गाइ गुन सुर सानन्द सिधारे |
सहित समाज राजमन्दिर कहँ राम राउ पगु धारे ||
भूप-भवन घर-घर घमण्ड कल्यान कोलाहल भारे |
निरखि हरषि आरती-निछावरि करत सरीर बिसारे ||
नित नए मङ्गल-मोद अवध सब, सब बिधि लोग सुखारे |
तुलसी तिन्ह सम तेउ जिन्हके प्रभुतें प्रभु-चरित पियारे ||
चहत महामुनि जाग जयो
चहत महामुनि जाग जयो |
नीच निसाचर देत दुसह दुख, कृस तनु ताप तयो ||
सापे पाप, नये निदरत खल, तब यह मन्त्र ठयो |
बिप्र-साधु-सुर-धेनु-धरनि-हित हरि अवतार लयो ||
सुमिरत श्रीसारङ्गपानि छनमें सब सोच गयो |
चले मुदित कौसिक कोसलपुर, सगुननि साथ दयो ||
करत मनोरथ जात पुलकि, प्रगटत आनन्द नयो |
तुलसी प्रभु-अनुराग उमगि मग मङ्गल मूल भयो ||
आजु सकल सुकृत फलु पाइहौं
आजु सकल सुकृत फलु पाइहौं |
सुखकी सींव, अवधि आनँदकी अवध बिलोकि हौं पाइहौं ||
सुतनि सहित दसरथहि देखिहौं, प्रेम पुलकि उर लाइहौं |
रामचन्द्र-मुखचन्द्र-सुधा-छबि नयन-चकोरनि प्याइहौं ||
सादर समाचार नृप बुझिहैं, हौं सब कथा सुनाइहौं |
तुलसी ह्वै कृतकृत्य आश्रमहिं राम लषन लै आइहौं ||
देखि मुनि! रावरे पद आज
देखि मुनि! रावरे पद आज |
भयो प्रथम गनतीमें अबतें हौं जहँ लौं साधु समाज ||
चरन बन्दि, कर जोरि निहोरत, "कहिय कृपा करि काज |
मेरे कछु न अदेय राम बिनु, देह-गेह सब राज||
भली कही भूपति त्रिभुवनमें को सुकृती-सिरताज? |
तुलसि राम-जनमहितें जनियत सकल सुकृत को साज ||
राजन! राम-लषन जो दीजै
राजन! राम-लषन जो दीजै |
जस रावरो, लाभ ढोटनिहूँ, मुनि सनाथ सब कीजै ||
डरपत हौ साँचे सनेह-बस सुत-प्रभाव बिनु जाने |
बूझिय बामदेव अरु कुलगुरु, तुम पुनि परम सयाने ||
रिपु रन दलि, मख राखि, कुसल अति अलप दिननि घर ऐहैं |
तुलसिदास रघुबंसतिलककी कबिकुल कीरति गैहैं ||
रहे ठगिसे नृपति सुनि मुनिबरके बयन
रहे ठगिसे नृपति सुनि मुनिबरके बयन |
कहि न सकत कछु राम-प्रेमबस, पुलक गात, भरे नीर नयन ||
गुरु बसिष्ठ समुझाय कह्यो तब हिय हरषाने, जाने सेष-सयन |
सौम्पे सुत गहि पानि, पाँय परि, भूसुर उर चले उमँगि चयन ||
तुलसी प्रभु जोहत पोहत चित, सोहत मोहत कोटि मयन |
मधु-माधव-मूरति दोउ सँग मानो दिनमनि गवन कियो उतर अयन ||
ऋषि सँग हरषि चले दोउ भाई
ऋषि सँग हरषि चले दोउ भाई |
पितु-पद बन्दि सीस लियो आयसु, सुनि सिष आसिष पाई ||
नील पीत पाथोज बरन बपु, बय किसोर बनि आई |
सर धनु-पानि, पीत पट कटितट, कसे निखङ्ग बनाई ||
कलित कण्ठ मनि-माल, कलेवर चन्दन खौरि सुहाई |
सुन्दर बदन, सरोरुह-लोचन, मुखछबि बरनि न जाई ||
पल्लव, पङ्ख, सुमन सिर सोहत क्यों कहौं बेष-लुनाई ?
मनु मूरति धरि उभय भाग भै त्रिभुवन सुन्दरताई ||
पैठत सरनि, सिलनि चढ़ि चितवत, खग-मृग-बन रुचराई |
सादर सभय सप्रेम पुलकि मुनि पुनि-पुनि लेत बुलाई ||
एक तीर तकि हती ताडका, बिद्या बिप्र पढ़ाई |
राख्यो जग्य जीति रजनीचर, भै जग-बिदित बड़ाई ||
चरन-कमल-रज-परस अहल्या, निज पति-लोक पठाई |
तुलसिदास प्रभुके बूझे मुनि सुरसरि कथा सुनाई ||
दोउ राजसुवन राजत मुनिके सङ्ग
दोउ राजसुवन राजत मुनिके सङ्ग |
नखसिख लोने, लोने बदन, लोने लोने लोयन,
दामिनि-बारिद-बरबरन अंग ||
सिरनि सिखा सुहाइ, उपबीत पीत पट, धनु-सर कर, कसे कटि निखङ्ग |
मानो मख-रुज निसिचर हरिबेको सुत पावकके साथ पठये पतङ्ग ||
करत छाँह घन, बरषैं सुमन सुर, छबि बरनत अतुलित अनङ्ग |
तुलसी प्रभु बिलोकि मग, लोग, खग-मृग प्रेम मगन रँगे रुप-रङ्ग ||
मुनि के सङ्ग बिराजत बीर
मुनिके सङ्ग बिराजत बीर
काकपच्छ धर, कर कोदण्ड-सर, सुभग
पीतपट कटि तूनीर ||
बदन इंदु, अंभोरुह लोचन, स्याम गौर
सोभा-सदन सरीर |
पुलकत ऋषि अवलोकि अमित छबि, उर न
समाति प्रेमकी भीर ||
खेलत, चलत,करत मग कौतुक, बिलँबत
सरित-सरोबर-तीर |
तोरत लता, सुमन, सरसीरुह, पियत
सुधासम सीतल नीर ||
बैठत बिमल सिलनि बिटपनि तर, पुनि पुनि बरनत छाँह समीर |
देखत नटत केकि, कल गावत मधुप, मराल, कोकिला, कीर ||
नयननिको फल लेत निरखि खग, मृग, सुरभी, ब्रजबधू, अहीर |
तुलसी प्रभुहि देत सब आसन निज निज मन मृदु कमल कुटीर ||