श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
गीतावली · गोस्वामी तुलसीदास

बालकाण्ड · भाग ३

गीतावली · बालकाण्ड · भाग ३
पद ३१

बिहरत अवध-बीथिन राम

राग नट

बिहरत अवध-बीथिन राम |

सङ्ग अनुज अनेक सिसु, नव-नील-नीरद स्याम ||

तरुन अरुन-सरोज-पद बनी कनकमय पदत्रान |

पीत-पट कटि तून बर, कर ललित लघु धनु-बान ||

लोचननिको लहत फल छबि निरखि पुर-नर-नारि |

बसत तुलसीदास उर अवधेसके सुत चारि ||

पद ३२

जैसे राम ललित तैसे लोने लषन लालु

राग नट

जैसे राम ललित तैसे लोने लषन लालु |

तैसेई भरत सील-सुखमा-सनेह-निधि, तैसेई सुभग सँग सत्रुसालु ||

धरे धनु-सर कर, कसे कटि तरकसी, पीरे पट ओढ़े चले चारु चालु |

अंग-अंग भूषन जरायके जगमगत, हरत जनके जीको तिमिरजालु ||

खेलत चौहट घाट बीथी बाटिकनि प्रभु सिव सुप्रेम-मानस-महालु |

सोभा-दान दै दै सनमानत जाचकजन करत लोक-लोचन निहालु ||

रावन-दुरित-दुख दलैं सुर कहैं आजु "अवध सकल सुखको सुकालु|

तुलसी सराहैं सिद्ध सुकृत कौसल्याजूके, भूरि भाग-भाजन भुवालु ||

पद ३३

ललित-ललित लघु-लघु धनु-सर कर

राग ललित

ललित-ललित लघु-लघु धनु-सर कर,

तैसी तरकसी कटि कसे, पट पियरे |

ललित पनही पाँय पैञ्जनी-किङ्किनि-धुनि,

सुनि सुख लहै मनु, रहै नित नियरे ||

पहुँची अंगद चारु, हृदय पदिक हारु,

कुण्डल-तिलक-छबि गड़ी कबि जियरे |

सिरसि टिपारो लाल, नीरज-नयन बिसाल,

सुन्दर बदन, ठाढ़े सुरतरु सियरे ||

सुभग सकल अंग, अनुज बालक सङ्ग,

देखि नर-नारि रहैं ज्यों कुरङ्ग दियरे |

खेलत अवध-खोरि, गोली भौंरा चक डोरि,

मुरति मधुर बसै तुलसीके हियरे ||

पद ३४

छोटिऐ धनुहियाँ, पनहियाँ पगनि छोटी

राग ललित

छोटिऐ धनुहियाँ, पनहियाँ पगनि छोटी,

छोटिऐ कछौटी कटि, छोटिऐ तरकसी |

लसत झँगूली झीनी, दामिनिकी छबि छीनी,

सुन्दर बदन, सिर पगिया जरकसी ||

बय-अनुहरत बिभूषन बिचित्र अंग,

जोहे जिय आवति सनेह की सरक सी |

मुरतिकी सूरति कही न परै तुलसी पै,

जानै सोई जाके उर कसकै करक सी ||

पद ३५

राम-लषन इक ओर, भरत-रिपुदवन लाल इक ओर भये

राग टोड़ी

राम-लषन इक ओर, भरत-रिपुदवन लाल इक ओर भये |

सरजुतीर सम सुखद भूमि-थल, गनि-गनि गोइयाँ बाँटि लये ||

कन्दुक-केलि-कुसल हय चढ़ि-चढ़ि, मन कसि-कसि ठोङ्कि-ठोङ्कि खये |

कर-कमलनि बिचित्र चौगानैं, खेलन लगे खेल रिझये ||

ब्योम बिमाननि बिबुध बिलोकत खेलक पेखक छाँह छये |

सहित समाज सराहि दसरथहि बरषत निज तरु-कुसुम-चये ||

एक लै बढ़त एक फेरत, सब प्रेम-प्रमोद-बिनोद-मये |

एक कहत भै हार रामजूकी, एक कहत भैया भरत जये ||

प्रभु बकसत गज बाजि, बसन-मनि, जय धुनि गगन निसान हये |

पाइ सखा-सेवक जाचक भरि जनम न दुसरे द्वार गये ||

नभ-पुर परति निछावरि जहँ तहँ, सुर-सिद्धनि बरदान दये |

भूरि-भाग अनुराग उमगि जे गावत-सुनत चरित नित ये ||

हारे हरष होत हिय भरतहि, जिते सकुच सिर नयन नये |

तुलसी सुमिरि सुभाव-सील सुकृती तेइ जे एहि रङ्ग रए ||

पद ३६

खेलि खेल सुखेलनिहारे

राग टोड़ी

खेलि खेल सुखेलनिहारे |

उतरि उतरि, चुचुकारि तुरङ्गनि, सादर जाइ जोहारे ||

बन्धु-सखा-सेवक सराहि, सनमानि सनेह सँभारे |

दिये बसन-गज-बाजि साजि सुभ साज सुभाँति सँवारे ||

मुदित नयन-फल पाइ, गाइ गुन सुर सानन्द सिधारे |

सहित समाज राजमन्दिर कहँ राम राउ पगु धारे ||

भूप-भवन घर-घर घमण्ड कल्यान कोलाहल भारे |

निरखि हरषि आरती-निछावरि करत सरीर बिसारे ||

नित नए मङ्गल-मोद अवध सब, सब बिधि लोग सुखारे |

तुलसी तिन्ह सम तेउ जिन्हके प्रभुतें प्रभु-चरित पियारे ||

पद ३७

चहत महामुनि जाग जयो

राग सारङ्ग

चहत महामुनि जाग जयो |

नीच निसाचर देत दुसह दुख, कृस तनु ताप तयो ||

सापे पाप, नये निदरत खल, तब यह मन्त्र ठयो |

बिप्र-साधु-सुर-धेनु-धरनि-हित हरि अवतार लयो ||

सुमिरत श्रीसारङ्गपानि छनमें सब सोच गयो |

चले मुदित कौसिक कोसलपुर, सगुननि साथ दयो ||

करत मनोरथ जात पुलकि, प्रगटत आनन्द नयो |

तुलसी प्रभु-अनुराग उमगि मग मङ्गल मूल भयो ||

पद ३८

आजु सकल सुकृत फलु पाइहौं

राग सारङ्ग

आजु सकल सुकृत फलु पाइहौं |

सुखकी सींव, अवधि आनँदकी अवध बिलोकि हौं पाइहौं ||

सुतनि सहित दसरथहि देखिहौं, प्रेम पुलकि उर लाइहौं |

रामचन्द्र-मुखचन्द्र-सुधा-छबि नयन-चकोरनि प्याइहौं ||

सादर समाचार नृप बुझिहैं, हौं सब कथा सुनाइहौं |

तुलसी ह्वै कृतकृत्य आश्रमहिं राम लषन लै आइहौं ||

पद ३९

देखि मुनि! रावरे पद आज

राग नट

देखि मुनि! रावरे पद आज |

भयो प्रथम गनतीमें अबतें हौं जहँ लौं साधु समाज ||

चरन बन्दि, कर जोरि निहोरत, "कहिय कृपा करि काज |

मेरे कछु न अदेय राम बिनु, देह-गेह सब राज||

भली कही भूपति त्रिभुवनमें को सुकृती-सिरताज? |

तुलसि राम-जनमहितें जनियत सकल सुकृत को साज ||

पद ४०

राजन! राम-लषन जो दीजै

राग नट

राजन! राम-लषन जो दीजै |

जस रावरो, लाभ ढोटनिहूँ, मुनि सनाथ सब कीजै ||

डरपत हौ साँचे सनेह-बस सुत-प्रभाव बिनु जाने |

बूझिय बामदेव अरु कुलगुरु, तुम पुनि परम सयाने ||

रिपु रन दलि, मख राखि, कुसल अति अलप दिननि घर ऐहैं |

तुलसिदास रघुबंसतिलककी कबिकुल कीरति गैहैं ||

पद ४१

रहे ठगिसे नृपति सुनि मुनिबरके बयन

राग नट

रहे ठगिसे नृपति सुनि मुनिबरके बयन |

कहि न सकत कछु राम-प्रेमबस, पुलक गात, भरे नीर नयन ||

गुरु बसिष्ठ समुझाय कह्यो तब हिय हरषाने, जाने सेष-सयन |

सौम्पे सुत गहि पानि, पाँय परि, भूसुर उर चले उमँगि चयन ||

तुलसी प्रभु जोहत पोहत चित, सोहत मोहत कोटि मयन |

मधु-माधव-मूरति दोउ सँग मानो दिनमनि गवन कियो उतर अयन ||

पद ४२

ऋषि सँग हरषि चले दोउ भाई

राग सारङ्ग

ऋषि सँग हरषि चले दोउ भाई |

पितु-पद बन्दि सीस लियो आयसु, सुनि सिष आसिष पाई ||

नील पीत पाथोज बरन बपु, बय किसोर बनि आई |

सर धनु-पानि, पीत पट कटितट, कसे निखङ्ग बनाई ||

कलित कण्ठ मनि-माल, कलेवर चन्दन खौरि सुहाई |

सुन्दर बदन, सरोरुह-लोचन, मुखछबि बरनि न जाई ||

पल्लव, पङ्ख, सुमन सिर सोहत क्यों कहौं बेष-लुनाई ?

मनु मूरति धरि उभय भाग भै त्रिभुवन सुन्दरताई ||

पैठत सरनि, सिलनि चढ़ि चितवत, खग-मृग-बन रुचराई |

सादर सभय सप्रेम पुलकि मुनि पुनि-पुनि लेत बुलाई ||

एक तीर तकि हती ताडका, बिद्या बिप्र पढ़ाई |

राख्यो जग्य जीति रजनीचर, भै जग-बिदित बड़ाई ||

चरन-कमल-रज-परस अहल्या, निज पति-लोक पठाई |

तुलसिदास प्रभुके बूझे मुनि सुरसरि कथा सुनाई ||

पद ४३

दोउ राजसुवन राजत मुनिके सङ्ग

राग नट

दोउ राजसुवन राजत मुनिके सङ्ग |

नखसिख लोने, लोने बदन, लोने लोने लोयन,

दामिनि-बारिद-बरबरन अंग ||

सिरनि सिखा सुहाइ, उपबीत पीत पट, धनु-सर कर, कसे कटि निखङ्ग |

मानो मख-रुज निसिचर हरिबेको सुत पावकके साथ पठये पतङ्ग ||

करत छाँह घन, बरषैं सुमन सुर, छबि बरनत अतुलित अनङ्ग |

तुलसी प्रभु बिलोकि मग, लोग, खग-मृग प्रेम मगन रँगे रुप-रङ्ग ||

पद ४४

मुनि के सङ्ग बिराजत बीर

राग कल्याण

मुनिके सङ्ग बिराजत बीर

काकपच्छ धर, कर कोदण्ड-सर, सुभग

पीतपट कटि तूनीर ||

बदन इंदु, अंभोरुह लोचन, स्याम गौर

सोभा-सदन सरीर |

पुलकत ऋषि अवलोकि अमित छबि, उर न

समाति प्रेमकी भीर ||

खेलत, चलत,करत मग कौतुक, बिलँबत

सरित-सरोबर-तीर |

तोरत लता, सुमन, सरसीरुह, पियत

सुधासम सीतल नीर ||

बैठत बिमल सिलनि बिटपनि तर, पुनि पुनि बरनत छाँह समीर |

देखत नटत केकि, कल गावत मधुप, मराल, कोकिला, कीर ||

नयननिको फल लेत निरखि खग, मृग, सुरभी, ब्रजबधू, अहीर |

तुलसी प्रभुहि देत सब आसन निज निज मन मृदु कमल कुटीर ||