श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
गीतावली · गोस्वामी तुलसीदास

लंकाकाण्ड · भाग १

गीतावली · लंकाकाण्ड · भाग १
पद १

गीतावली लङ्काकाण्ड पद 1 से 5 तक/पृष्ठ 1

(1)

मन्दोदरी-प्रबोध

रागमारु

मानु अजहू सिष परिहरि क्रोधु |

पिय पूरो आयो अब काहि, कहु, करि रघुबीर-बिरोधु ||

जेहि ताड़ुता-सुबाहु मारि, मख राखि जनायो आपु |

कौतुक ही मारीच नीच मिस प्रगट्यौ बिसिष-प्रतापु ||

सकल भूप बल गरब सहित तोर्यो कठोर सिवचापु |

ब्याही जेहि जानकी जीति जग, हर्यौ परसुधर-दापु ||

कपट-काक साँसति-प्रसाद करि बिनु श्रम बध्यो बिराधु |

खर-दूषन-त्रिसिरा-कबन्ध हति कियो सुखी सुर-साधु ||

एकहि बान बालि मार्यो जेहि, जो बल-उदधि अगाधु |

कहु, धौं कन्त कुसल बीती केहि किये राम-अपराधु ||

लाँघि न सके लोक-बिजयी तुम जासु अनुज-कृत-रेषु |

उतरि सिन्धु जार्यो प्रचारि पुर जाको दूत बिसेषु ||

कृपासिन्धु, खल-बन-कृसानु सम, जस गावत श्रुति-सेषु |

सोइ बिरुदैत बीर कोसलपति, नाथ! समुझि जिय देषु ||

मुनि पुलस्त्यके जस-मयङ्क महँ कत कलङ्क हठि होहि |

और प्रकार उबार नहीं कहुँ, मैं देख्यो जग जोहि ||

चलु, मिलु बेगि कुसल सादर सिय सहित अग्र करि मोहि |

तुलसिदास प्रभु सरन-सबद सुनि अभय करैङ्गे तोहि ||

पद २

गीतावली लङ्काकाण्ड पद 1 से 5 तक/पृष्ठ 2

(2)

अंगदका दूतकर्म

रागकान्हरा

तू दसकण्ठ भले कुल जायो |

ता महँ सिव-सेवा, बिरञ्चि-बर, भुजबल बिपुल जगत जस पायो ||

खर-दूषन-त्रिसिरा, कबन्ध रिपु जेहि बाली जमलोक पठायो |

ताको दूत पुनीत चरित हरि सुभ सन्देस कहन हौं आयो ||

श्रीमद नृप-अभिमान मोहबस, जानत अनजानत हरि लायो

तजि ब्यलीक भजु कारुनीक प्रभु, दै जानकिहि सुनहि समुझायो ||

जातें तव हित होइ, कुसल कुल, अचल राज चलिहै न चलायो |

नाहित रामप्रताप-अनलमहँ ह्वै पतङ्ग परिहै सठ धायो ||

जद्यपि अंगद नीति परम हित कह्यो, तथापि न कछु मन भायो |

तुलसिदास सुनि बचन क्रोध अति, पावक जरत मनहु घृत नायो ||

पद ३

गीतावली लङ्काकाण्ड पद 1 से 5 तक/पृष्ठ 3

(3)

तैं मेरो मरम कछू नहिं पायो |

रे कपि कुटिल ढीठ पसु पाँवर! मोहि दास-ज्यों डाटन आयो ||

भ्राता कुम्भकरन रिपुघातक, सुत सुरपतिहि बन्दि करि ल्यायो |

निज भुजबल अति अतुल कहौं क्यों, कन्दुक ज्यों कैलास उठायो ||

सुर, नर, असुर, नाग, खग, किन्नर सकल करत मोरो मन भायो |

निसिचर रुचिर अहार मनुज-तनु, ताको जस खल! मोहि सुनायो ||

कहा भयो, बानर सहाय मिलि, कर उपाय जो सिन्धु बँधायो |

जो तरिहै भुज बीस घोर निधि, ऐसो को त्रिभुवनमें जायो ?||

सुनि दससीस-बचन कपि-कुञ्जर बिहँसि ईस-मायहि सिर नायो |

तुलसिदास लङ्केस कालबस गनत न कोटि जतन समझायो ||

पद ४

गीतावली लङ्काकाण्ड पद 1 से 5 तक/पृष्ठ 4

(4)

सुनु खल! मैं तोहि बहुत बुझायो |

एतो मान सठ! भयो मोहबस, जानतहू चाहत बिष खायौ ||

जगत-बिदित अति बीर बालि-बल जानत हौ, किधौं अब बिसरायो |

बिनु प्रयास सोउ हत्यो एक सर, सरनागतपर प्रेम देखायो ||

पावहुगे निज करम-जनित फल, भले ठौर हठि बैर बढ़ायो |

बानर-भालु चपेट लपेटनि मारत, तब ह्वैहै पछितायो ||

हौं ही दसन तोरिबे लायक, कहा करौं, जो न आयसु पायो |

अब रघुबीर-बान-बिदलित उर सोवहिगो रनभूमि सुहायो ||

अबिचल राज बिभीषनको सब, जेहि रघुनाथ-चरन चित लायो |

तुलसिदास यहि भाँति बचन कहि गरजत चल्यो बालि-नृप जायो ||

पद ५

गीतावली लङ्काकाण्ड पद 1 से 5 तक/पृष्ठ 5

(5)

लक्ष्मण-मूर्च्छा

'''

रागकेदारा'''

राम-लषन उर लाय लये हैं |

भरे नीर राजीव-नयन सब अँग परिताप तए हैं ||

कहत ससोक बिलोकि बन्धु-मुख बचन प्रीति गुथए हैं |

सेवक-सखा भगति-भायप-गुन चाहत अब अथए हैं ||

निज कीरति-करतूति तात! तुम सुकृती सकल जए हैं |

मैं तुम्ह बिनु तनु राखि लोक अपने अपलोक लए हैं ||

मेरे पनकी लाज इहाँलौं हठि प्रिय प्रान दए हैं |

लागति साँगि बिभीषन ही पर, सीपर आपु भए हैं ||

सुनि प्रभु-बचन भालु-कपि-गन, सुर सोच सुखाइ गए हैं |

तुलसी आइ पवनसुत-बिधि मानो फिरि निरमये नए हैं ||

पद ६

गीतावली लङ्काकाण्ड पद 6 से 10 तक/पृष्ठ 1

(6)

रागसोरठ

मोपै तो न कछू ह्वै आई |

ओर निबाहि भली बिधि भायप चल्यो लखन-सो भाई ||

पुर, पितु-मातु, सकल सुख परिहरि जेहि बन-बिपति बँटाई |

ता सँग हौं सुरलोक सोक तजि सक्यो न प्रान पठाई ||

जानत हौं या उर कठोरतें कुलिस कठिनता पाई |

सुमिरि सनेह सुमित्रा-सुतको दरकि दरार न जाई ||

तात-मरन, तिय-हरन, गीध-बध, भुज दाहिनी गँवाई |

तुलसी मैं सब भाँति आपने कुलहि कालिमा लाई ||

पद ७

गीतावली लङ्काकाण्ड पद 6 से 10 तक/पृष्ठ 2

(7)

मेरो सब पुरुषारथ थाको |

बिपति बँटावन बन्धु-बाहु बिनु करौं भरोसो काको ||

सुनु, सुग्रीव! साँचेहू मोपर फेर्यो बदन बिधाता |

ऐसे समय समर-सङ्कट हौं तज्यो लषन-सो भ्राता ||

गिरि, कानन जैहैं साखा-मृग, हौं पुनि अनुज-सँघाती |

ह्वैहै कहा बिभीषनकी गति रही सोच भरि छाती ||

तुलसी सुनि प्रभु-बचन भालु-कपि सकल बिकल हिय हारे |

जामवन्त हनुमन्त बोलि तब, औसर जानि प्रचारे ||

पद ८

गीतावली लङ्काकाण्ड पद 6 से 10 तक/पृष्ठ 3

(8)

रागमारु

जौ हौं अब अनुसासन पावौं |

तौ चन्द्रमहि निचोरि चैल-ज्यों, आनि सुधा सिर नावौं ||

कै पाताल दलौं ब्यालावलि अमृत-कुण्ड महि लावौं |

भेदि भुवन, करि भानु बाहिरो तुरत राहु दै तावौं ||

बिबुध-बैद बरबस आनौं धरि, तौ प्रभु-अनुग कहावौं |

पटकौं मीच नीच मूषक-ज्यौं, सबहिको पापु बहावौं ||

तुम्हरिहि कृपा, प्रताप तिहारेहि नेकु बिलम्ब न लावौं |

दीजै सोइ आयसु तुलसी-प्रभु, जेहि तुम्हरे मन भावौं ||

पद ९

गीतावली लङ्काकाण्ड पद 6 से 10 तक/पृष्ठ 4

(9)

सुनि हनुमन्त-बचन रघुबीर |

सत्य, समीर-सुवन! सब लायक, कह्यो राम धरि धीर ||

चहिये बैद, ईस-आयसु धरि सीस कीस बलाइन |

आन्यो सदनसहित सोवत ही, जौलौं पलक परै न ||

जियै कुँवर, निसि मिलै मूलिका, कीन्हीं बिनय सुषेन |

उठ्यो कपीस,सुमिरि सीतापति चल्यो सजीवनि लेन ||

कालनेमि दलि बेगि बिलोक्यौ द्रोनाचल जिय जानि |

देखी दिब्य ओषधी जहँ तहँ जरी, न परि पहिचानि ||

लियो उठाय कुधर कन्दुक-ज्यौं, बेग न जाइ बखानि |

ज्यों धाए गजराज-उधारन सपदि सुदरसनपानि ||

आनि पहार जोहारे प्रभु, कियो बैदराज उपचार |

करुनासिन्धु बन्धु भेण्ट्यो, मिटि गयो सकल दुख-भार ||

मुदित भालु कपि-कटक, लह्यो जनु समर पयोनिधि पार |

बहुरि ठौरही राखि महीधर आयो पवनकुमार ||

सेन सहित सेवकहि सराहत पुनि पुनि राम सुजान |

बरषि सुमन, हिय हरषि प्रसंसत बिबुध बजाइ निसान ||

तुलसिदास सुधि पाइ निसाचर भए मनहु बिनु प्रान |

परी भोरही रोर लङ्कगढ़, दई हाँक हनुमान ||

पद १०

गीतावली लङ्काकाण्ड पद 6 से 10 तक/पृष्ठ 5

(10)

रागकेदारा

कौतुक ही कपि कुधर लियो है |

चल्यो नभ नाइ माथ रघुनाथहि, सरिस न बेग बियो है ||

देख्यो जात जानि निसिचर, बिनु फर सर हयो हियो है |

पर्यो कहि राम, पवन राख्यो गिरि, पुर तेहि तेज पियो है ||

जाइ भरत भरि अंक भेण्टि अंक भेण्टि निज, जीवन-दान दियो है |

दुख लघु लषन मरम-घायल सुनि, सुख बड़ो कीस जियो है ||

आयसु इतहि, स्वामि-सङ्कट उत, परत न कछू कियो है |

तुलसिदास बिदर्यो अकास, सो कैसेकै जात सियो है ||

पद ११

गीतावली लङ्काकाण्ड पद 11 से 15 तक/पृष्ठ 1

(11)

भरत-सत्रुसूदन बिलोकि कपि चकित भयो है |

राम-लषन रन जीति अवध आए, कैधौं मोहि भ्रम,

कैधौं काहू कपट ठयो है ||

प्रेम पुलकि, पहिचानिकै पदपदुम नयो है |

कह्यो न परत जेहि भाँति दुहू भाइन

सनेहसों सो उर लाय लयो है ||

समाचार कहि गहरु भो, तेंहि ताप तयो है |

कुधर सहित चढ़ौ बिसिष, बेगि पठवौं, सुनि

हरि हिय गरब गूढ़ उपयो है ||

तीरतें उतरि जस कह्यो चहै, गुनगननि जयो है |

धनि भरत! धनि भरत! करत भयो,

मगन मौन रह्यो मन अनुराग रयो है ||

यह जलनिधि खन्यो, मथ्यो, लँघ्यो, बाँध्यो, अँचयो है |

तुलसिदास रघुबीर बन्धु-महिमाको सिन्धु

तरि को कबि पार गयो है ?||

पद १२

गीतावली लङ्काकाण्ड पद 11 से 15 तक/पृष्ठ 2

(12)

होतो नहि जौ जग जनम भरतको |

तौ, कपि कहत, कृपान-धार मग चलि आचरत बरत को ?||

धीरज-धरम धरनिधर-धुरहूँतें गुर धुर धरनि धरत को ?|

सब सदगुन सनमानि आनि उर, अघ-औगुन निदरत को ?||

सिवहु न सुगम सनेह रामपद सुजननि सुलभ करत को ?|

सृजि निज जस-सुरतरु तुलसी कहँ, अभिमत फरनि फरत को ?||