श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
गीतावली · गोस्वामी तुलसीदास

लंकाकाण्ड · भाग २

गीतावली · लंकाकाण्ड · भाग २
पद १३

गीतावली लङ्काकाण्ड पद 11 से 15 तक/पृष्ठ 3

(13)

सुनि रन घायल लषन परे हैं |

स्वामिकाज सङ्ग्राम सुभटसों लोहे ललकारि लरे हैं ||

सुवन-सोक, सन्तोष सुमित्रहि, रघुपति-भगति बरे हैं |

छिन-छिन गात सुखात, छिनहिं छिन हुलसत होत हरे हैं ||

कपिसों कहति सुभाय, अंबके अंबक अंबु भरे हैं |

रघुनन्दन बिनु बन्धु कुअवसर, जद्यपि धनु दुसरे हैं ||

"तात! जाहु कपि सँग, रिपुसूदन उठि कर जोरि खरे हैं |

प्रमुदित पुलकि पैन्त पूरे जनु बिधिबस सुढर ढरे हैं ||

अंब-अनुजगति लखि पवनज-भरतादि गलानि गरे हैं |

तुलसी सब समुझाइ मातु तेहि समय सेचत करे हैं ||

पद १४

गीतावली लङ्काकाण्ड पद 11 से 15 तक/पृष्ठ 4

(14)

बिनय सुनायबी परि पाय |

कहौं कहा, कपीस! तुम्ह सुचि, सुमति, सुहृद सुभाय ||

स्वामि-सङ्कट-हेतु हौं जड़ जननि जनम्यो जाय |

समौ पाइ, कहाइ सेवक घट्यो तौ न सहाय ||

कहत सिथिल सनेह भो, जनु धीर घायल घाय |

भरत-गति लखि मातु सब रहि ज्यौं गुड़ी बिनु बाय ||

भेण्ट कहि कहिबो, कह्यो यों कठिन-मानस माय |

"लाल! लोने लषन-सहित सुललित लागत नाँय ||

देखि बन्धु-सनेह, अंब सुभाउ, लषन-कुठाय |

तपत तुलसी तरनि-त्रासुक एहि नये तिहुँ ताय ||

पद १५

गीतावली लङ्काकाण्ड पद 11 से 15 तक/पृष्ठ 5

(15)

हृदय घाउ मेरे पीर रघुबीरै |

पाइ सजीवन, जागि कहत यों प्रेमपुलकि बिसराय सरीरै ||

मोहि कहा बूझत पुनि पुनि, जैसे पाठ-अरथ-चरचा कीरै |

सोभा-सुख, छति-लाहु भूपकहँ, केवल कान्ति-मोल हीरै ||

तुलसी सुनि सौमित्रि-बचन सब धरि न सकत धीरौ धीरै |

उपमा राम-लषनकी प्रीतिकी क्यों दीजै खीरै-नीरै ||

पद १६

गीतावली लङ्काकाण्ड पद 16 से 20 तक/पृष्ठ 1

(16)

विजयी राम

रागकान्हरा

राजत राम काम-सुत-सुन्दर |

रिपु रन जीति अनुज सँग सोभित, फेरत चाप-बिसिष बनरुह-कर ||

स्याम सरीर रुचिर श्रम-सीकर, सोनित-कन बिच बीच मनोहर |

जनु खद्योत-निकर, हरिहित-गन, भ्राचत मरकत-सैल-सिखरपर ||

घायल बीर बिराजत चहुँ दिसि, हरषित सकल रिच्छ अरु बनचर |

कुसुमित किंसुक-तरु समूह महँ, तरुन तमाल बिमाल बिटप बर ||

राजिव-नयन बिलोकि कृपा करि, किए अभय मुनि-नाग, बिबुध-नर |

तुलसिदास यह रूप अनुपम हिय-सरोज बसि दुसह बिपतिहर ||

पद १७

गीतावली लङ्काकाण्ड पद 16 से 20 तक/पृष्ठ 2

(17)

अयोध्यामें प्रतीक्षा

रागआसावरी

अवधि आजु किधौं औरो दिन ह्वैहै |

चढ़ि धौरहर बिलोकि दखिन दिसि, बूझ धौं पथिक कहाँते आये वै हैं ||

बहुरि बिचारि हारि हिय सोचति, पुलकि गात लागे लोचन च्वैहैं |

निज बासरनि बरष पुरवैगो बिधि, मेरे तहाँ करम कठिन कृत क्वैहैं ||

बन रघुबीर, मातु गृह जीवति, निलज प्रान सुनि सुनि सुख स्वैहैं |

तुलसिदास मो-सी कठोर-चित कुलिस सालभञ्जनि को ह्वैहैं ||

पद १८

गीतावली लङ्काकाण्ड पद 16 से 20 तक/पृष्ठ 3

(18)

आली, अब राम-लषन कित ह्वै हैं |

चित्रकूट तज्यौ तबतें न लही सुधि, बधू-समेत कुसल सुत द्वै हैं ||

बारि बयारि, बिषम हिम-आतप सहि बिनु बसन भूमितल स्वै हैं |

सन्द-मूल, फल-फूल असन बन, भोजन समय मिलत कैसे वैहैं ||

जिन्हहि बिलकि सोचिहैं लता-द्रुम, खग-मृग-मुनि लोचन जल च्वैहैं |

तुलसिदास तिन्हकी जननि हौं, मो-सी निठुर-चित औरो कहुँ ह्वैहैं ||

पद १९

गीतावली लङ्काकाण्ड पद 16 से 20 तक/पृष्ठ 4

(19)

बैठी सगुन मनावति माता |

कब ऐहैं मेरे बाल कुसल घर, कहहु, काग! फुरि बाता ||

दूध-भातकी दोनी दैहौं, सोने चोञ्च मढ़ैहौं |

जब सिय-सहित बिलोकि नयन भरि राम-लषन उर लैहौं ||

अवधि समीप जानि जननी जिय अति आतुर अकुलानी |

गनक बोलाइ, पाँय परि पूछति प्रेम मगन मृदु बानी ||

तेहि अवसर कोउ भरत निकटतें समाचार लै आयो |

प्रभु-आगमन सुनत तुलसी मनो मीन मरत जल पायो ||

पद २०

गीतावली लङ्काकाण्ड पद 16 से 20 तक/पृष्ठ 5

(20)

छेमकरी! बलि, बोलि सुबानी |

कुसल छेम सिय राम-लषन कब ऐहैं, अंब! अवध रजधानी ||

ससिमुखि, कुङ्कुम-बरनि, सुलोचनि, मोचनि सोचनि बेद बखानी |

देवि! दया करि देहि दरसफल, जोरि पानि बिनवहिं सब रानी ||

सुनि सनेहमय बचन, निकट ह्वै, मञ्जुल मण्डल कै मड़रानी |

सुभ मङ्गल आनन्द गगन-धुनि अकनि-अकनि उर-जरनि जुड़ानी ||

फरकन लगे सुअंग बिदिसि दिसि, मन प्रसन्न, दुख-दसा सिरानी |

करहिं प्रनाम सप्रेम पुलकि तनु, मानि बिबिध बलि सगुन सयानी ||

तेहि अवसर हनुमान भरतसों कही सकल कल्यान-कहानी |

तुलसिदास सोइ चाह सजीवनि बिषम बियोग ब्यथा बड़ि भानी ||

पद २१

गीतावली लङ्काकाण्ड पद 21 से 23 तक/पृष्ठ 1

(21)

अयोध्यामें आनन्द

रागधनाश्री

सुनियत सागर सेतु बँधायो |

कोसलपतिकी कुसल सकल सुधि कोउ इक दुत भरत पहँ ल्यायो ||

बध्यो बिराध, त्रिसिर, खर-दूषन सूर्पनखाको रूप नसायो |

हति कबन्ध, बल-अंध बालि दलि, कृपासिन्धु सुग्रीव बसायो ||

सरनागत अपनाइ बिभीषन, रावन सकुल समूल बहायो |

बिबुध-समाज निवाजि, बाँह दैं बन्दिछोर बर बिरद कहायो ||

एक-एकसों समाचार सुनि नगर लोग जहँ तहँ सब धायो |

घन-धुनि अकनि मुदित मयूर-ज्यों, बूड़त जलधि पार-सो पायो ||

"अवधि आजु यौं कहत परसपर, बेगि बिमान निकट पुर आयो |

उतरि अनुज-अनुगनि समेत प्रभु गुर-द्विजगन सिर नायो ||

जो जेहि जोग राम तेहि बिधि मिलि, सबके मन अति मोद बढ़ायो |

भेण्टी मातु, भरत भरतानुज, क्यों कहौं प्रेम अमित अनमायो ||

तेही दिन मुनिबृन्द अनन्दित तुरत तिलकको साज सजायो |

महाराज रघुबंस-नाथको सादर तुलसिदास गुन गायो ||

पद २२

गीतावली लङ्काकाण्ड पद 21 से 23 तक/पृष्ठ 2

(22)

राज्याभिषेक

रागजैतश्री

रन जीति राम राउ आए |

सानुज सदल ससीय कुसल आजु, अवध आनन्द-बधाए ||

अरिपुर जारि, उजारि, मारि रिपु, बिबुध सुबास बसाए |

धरनि-धेनु, महिदेव-साधु, सबके सब सोच नसाए ||

दई लङ्क, थिर थपे बिभीषन, बचन-पियूष पिआए |

सुधा सीञ्चि कपि, कृपा नगर-नर-नारि निहारि जिआए ||

मिलि गुर, बन्धु, मातु, जन, परिजन, भए सकल मन भाए |

दरस-हरस दसचारि बरसके दुख पलमें बिसराए ||

बोलि सचिव सुचि, सोधि सुदिन, मुनि मङ्गल-साज सजाए |

महाराज-अभिषेक बरषि सुर सुमन निसान बजाए ||

लै लै भेण्ट नृप-अहिप-लोकपति अति सनेह सिर नाए |

पूजि, प्रीति पहिचानि राम आदरे अधिक, अपनाए ||

दान मान सनमानि जानि रुचि, जाचक जन पहिराए |

गए सोक-सर सूखि, मोद-सरिता-समुद्र गहिराए ||

प्रभु-प्रताप-रबि अहित-अमङ्गल-अघ-उलूक-तम ताए |

किये बिसोक हित-कोक-कोकनद लोक सुजस सुभ छाए ||

रामराज कुलकाज सुमङ्गल, सबनि सबै सुख पाए |

देहिं असीस भूमिसुर प्रमुदित, प्रजा प्रमोद बढ़ाए ||

आस्रम-धरम-बिभाग बेदपथ पावन लोग चलाए |

धरम-निरत, सिय-राम-चरन-रत, मनहु राम-सिय-जाए ||

कामधेनु महि, बिटप कामतरु, कोउ बिधि बाम न लाये |

ते तब, अब तुलसी तेउ जिन्ह हित सहित राम-गुन गाये ||

पद २३

गीतावली लङ्काकाण्ड पद 21 से 23 तक/पृष्ठ 3

(23)

रागटोड़ी

आजु अवध आनन्द-बधावन, रिपु रन जीति राम आए |

सजि सुबिमान निसान बजावत मुदित देव देखन धाए ||

घर-घर चारु चौक, चन्दन-मनि, मङ्गल-कलस सबनि साजे |

ध्वज-पताक, तोरन, बितानबर, बिबिध भाँति बाजन बाजे ||

राम-तिलक सुनि दीप दीपके नृप आए उपहार लिये |

सीयसहित आसीन सिंहासन निरखि जोहारत हरष हिये ||

मङ्गलगान, बेदधुनि, जयधुनि, मुनि-असीस-धुनि भुवन भरे |

बरषि सुमन सर-सिद्ध प्रसंसत, सबके सब सन्ताप हरे ||

राम-राज भै कामधेनु महि, सुख सम्पदा लोक छाए |

जनम जनम जानकीनाथके गुनगन तुलसिदास गाये ||