उत्तरकाण्ड · भाग १
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 1 से 10 तक/पृष्ठ 1
(1)
रामराज्य
( राग सोरठ )
बनतें आइकै राजा राम भए भुआल |
मुदित चौदह भुअन, सब सुख सुखी सब सब काल ||
मिटे कलुष-कलेस-कुलषन, कपट-कुपथ-कुचाल |
गए दारिद, दोष दारुन, दम्भ-दुरित-दुकाल ||
कामधुक महि, कामतरु तरु, उपल मनिगन लाल |
नारि-नर तेहि समय सुकृती, भरे भाग सुभाल ||
बरन-आश्रम-धरमरत, मन बचन बेष मराल |
राम-सिय-सेवक-सनेही, साधु, सुमुख, रसाल ||
राम-राज-समाज बरनत सिद्ध-सुर-दिगपाल |
सुमिरि सो तुलसी अजहुँ हिय हरष होत बिसाल ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 1 से 10 तक/पृष्ठ 2
(2)
रामरूप-वर्णन
(राग ललित )
भोर जानकी-जीवन जागे |
सूत मागध, प्रबीन, बेनु-बीना-धुनि द्वारे, गायक सरस राग रागे ||
स्यामल सलोने गात, आलसबस जँभात प्रिया प्रेमरस पागे |
उनीन्दे लोचन चारु, मुख-सुखमा-सिङ्गार हेरि हारे मार भूरि भागे ||
सहज सुहाई छबि, उपमा न लहैं कबि, मुदित बिलोकन लागे |
तुलसिदास निसिबासर अनूप रूप रहत प्रेम-अनुरागे ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 1 से 10 तक/पृष्ठ 3
( 03 )
( राग कल्याण )
रघुपति राजीवनयन, सोभातनु कोटि मयन,
करुनारस-अयन चयन-रूप भूप, माई |
देखो सखि अतुलित छबि, सन्त-कञ्ज-कानन रबि,
गावत कल कीरति कबि-कोबिद-समुदाई ||
मज्जन करि सरजुतीर ठाढ़े रघुबंसबीर,
सेवत पदकमल धीर निरमल चित लाई |
ब्रह्ममण्डली-मुनीन्द्रबृन्द-मध्य इंदुबदन
राजत सुखसदन लोकलोचन-सुखदाई ||
बिथुरित सिररुह-बरूथ कुञ्चित, बिच सुमन-जूथ,
मनिजुत सिसु-फनि-अनीक ससि समीप आई |
जनु सभीत दै अँकोर राखे जुग रुचिर मोर,
कुण्डल-छबि निरखि चोर सकुचत अधिकाई ||
ललित भ्रुकुटि, तिलक भाल, चिबुक-अधर-द्विज रसाल,
हास चारुतर, कपोल, नासिका सुहाई |
मधुकर जुग पङ्कज बिच, सुक बिलोक नीरजपर
लरत मधुप-अवलि मानो बीच कियो जाई ||
सुन्दर पटपीत बिसद, भ्राजत बनमाल उरसि,
तुलसिका-प्रसून-रचित, बिबिध-बिधि बनाई |
तरु-तमाल अधबिच जनु त्रिबिध कीर-पाँति-रुचिर,
हेमजाल अंतर परि तातें न उड़ाई ||
सङ्कर-हृदि-पुण्डरीक निसि बस हरि-चञ्चरीक,
निर्ब्यलीक-मानस-गृह सन्तत रहे छाई |
अतिसय आनन्दमूल तुलसिदास सानुकूल,
हरन सकल सूल, अवध-मण्डन रघुराई ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 1 से 10 तक/पृष्ठ 4
(4)
राजत रघुबीर धीर, भञ्जन भव-भीर, पीर-
हरन सकल सरजुतीर निरखहु, सखि! सोहैं |
सङ्ग अनुज मनुज-निकर, दनुज-बल-बिभङ्ग-करन;
अंग-अंग छबि अनङ्ग अगनित मन मोहैं ||
सुखमा-सुख-सील-अयन नयन निरखि निरखि नील
कुञ्चित कच, कुण्डल कल, नासिका चित पोहैं |
मनहु इंदुबिम्ब मध्य कञ्ज-मीन-खञ्जन लखि
मधुप-मकर-कीर आए तकि तकि निज गौहैं ||
ललित गण्ड-मण्डल, सुबिसाल भाल तिलक झलक
मञ्जुतर मयङ्क-अंक रुचिर बङ्क भौहैं |
अरुन अधर, मधुर बोल, दसन-दमक दामिनि दुति,
हुलसति हिय हँसनि चारु चितवनि तिरछौहैं ||
कम्बुकण्ठ, भुज बिसाल उरसि तरुन तुलसिमाल,
मञ्जुल मुकतावलि जुत जागति जिय जोहैं |
जनु कलिन्द-नन्दिनि मनि-इंद्रनील-सिखर परसि
धँसति लसति हंससेनि-सङ्कुल अधिकौहैं ||
दिब्यतर दुकूल भब्य, नब्य रुचिर चम्पक चय,
चञ्चला-कलाप, कनक-निकर अलि! किधौं हैं |
सज्जन-चष-झष-निकेत, भूषन-मनिगन समेत,
रूप-जलधि-बपुष लेत मन-गयन्द बोहैं ||
अकनि बचन-चातुरी तुरीय पेखि प्रेम-मगन
पग न परत इत, उत, सब चकित तेहि समौ हैं |
तुलसिदास यह सुधि नहि कौनकी, कहाँतें आई ,
कौन काज, काके ढिग, कौन ठाउँ को हैं ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 1 से 10 तक/पृष्ठ 5
(5)
देखु सखि! आजु रघुनाथ-सोभा बनी |
नील-नीरद-बरन बपुष भुवनाभरन,
पीत-अंबर-धरन हरन दुति-दामिनि ||
सरजु मज्जन किए, सङ्ग सज्जन लिए,
हेतु जनपर हिये, कृपा कोमल घनी |
सजनि आवत भवन मत्त-गजवर, गवन,
लङ्क मृगपति ठवनि कुँवर कोसलधनी ||
सघन चिक्कन कुटिल चिकुर बिलुलित मृदुल,
करनि बिबरत चतुर, सरस सुषमा जनी |
ललित अहि-सिसु-निकर मनहु ससि सन समर
लरत, धरहरि करत रुचिर जनु जुग फनी ||
भाल भ्राजत तिलक, जलज लोचन, पलक,
चारु भ्रू, नासिका सुभग सुक-आननी |
चिबुक सुन्दर, अधर अरुन, द्विज-दुति सुघर,
बचन गम्भीर, मृदुहास भव-भाननी ||
स्रवन कुण्डल बिमल गण्ड मण्डित चपल,
कलित कलकान्ति अति भाँति कछु तिन्ह तनी |
जुगल कञ्चन-मकर मनहु बिधुकर मधुर
पियत पहिचानि करि सिन्धुकीरति भनी ||
उरसि राजत पदिक, ज्योति रचना अधिक,
माल सुबिसाल चहुँ पास बनि गजमनी |
स्याम नव जलदपर निरखि दिनकर-कला
कौतुकी मनहुँ रही घेरि उडुगन-अनी ||
मन्दिरनिपर खरी नारि आनँद-भरी,
निरखि बरषहिं बिपुल कुसुम कुङ्कुम-कनी |
दास तुलसी राम परम करुनाधाम,
काम-सतकोटि-मद हरत छबि आपनी ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 1 से 10 तक/पृष्ठ 6
(6)
आजु रघुबीर-छबि जात नहि कछु कही |
सुभग सिंहासनासीन सीतारवन,
भुवन-अभिराम, बहु काम सोभा सही ||
चारु चामर-व्यजन, छत्र-मनिगन बिपुल
दाम-मुकुतावली-जोति जगमगि रही |
मनहुँ राकेस सँग हंस-उडुगन-बरहि
मिलन आए हृदय जानि निज नाथ ही ||
मुकुट सुन्दर सिरसि, भालबर, तिलक-भ्रू,
कुटिल कच, कुण्डलनि परम आभा लही |
मनहुँ हर-डर जुगल मारध्वजके मकर
लागि स्रवननि करत मेरुकी बतकही ||
अरुन-राजीव-दल-नयन करुना-अयन,
बदन सुषमासदन, हास त्रय-तापही |
बिबिध कङ्कन हार, उरसि गजमनि-माल,
मनहुँ बग-पाँति जुग मिलि चली जलदही ||
पीत निरमल चैल, मनहुँ मरकत सैल,
पृथुल दामिनि रही छाइ तजि सहजही |
ललित सायक-चाप, पीन भुज बल अतुल
मनुजतनु दनुजबन-दहन, मण्डन-मही ||
जासु गुन-रूप नहि कलित, निरगुन सगुन,
सम्भु, सनकादि, सुक भगति दृढ़ करि गही |
दास तुलसी राम-चरन-पङ्कज सदा
बचन मन करम चहै प्रीति नित निरबही ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 1 से 10 तक/पृष्ठ 7
(7)
राम राजराजमौलि मुनिबर-मन-हरन, सरन-
लायक, सुखदायक रघुनायक देखौ री |
लोक-लोचनाभिराम, नीलमनि-तमाल-स्याम,
रूप-सील-धाम, अंग छबि अनङ्ग को री ?||
भ्राजत सिर मुकुट पुरट-निरमित मनि रचित चारु,
कुञ्चित कच रुचिर परम, सोभा नहि थोरी |
मनहुँ चञ्चरीक-पुञ्ज कञ्जबृन्द प्रीति लागि
गुञ्जत कल गान तान दिनमनि रिझयो री ||
अरुनकञ्ज-दल-बिसाल लोचन, भ्रू-तिलकभाल,
मण्डित स्रुति कुण्डल बर सुन्दरतर जोरी |
मनहुँ सम्बरारि मारि, ललित मकर-जुग बिचारि,
दीन्हें ससिकहँ पुरारि भ्राजत दुहुँ ओरी ||
सुन्दर नासा-कपोल, चिबुक, अधर अरुन, बोल
मधुर, दसन राजत जब चितवत मुख मोरी |
कञ्ज-कोस भीतर जनु कञ्जराज-सिखर-निकर,
रुचिर रचित बिधि बिचित्र तड़ित-रङ्ग-बोरी ||
कम्बुकण्ठ उर बिसाल तुलसिका नवीन माल,
मधुकर बर-बास-बिबस, उपमा सुनु सो री |
जनु कलिन्दजा सुनील सैलतें धसी समीप,
कन्द-बृन्द बरसत छबि मधुर घोरि घोरी ||
निरमल अति पीत चैल, दामिनि जनु जलद नील
राखी निज सोभाहित बिपुल बिधि निहोरी |
नयनन्हिको फल बिसेष ब्रह्म अगुन सगुन बेष,
निरखहु तजि पलक, सफल जीवन लेखौ री ||
सुन्दर सीतासमेत सोभित करुनानिकेत,
सेवक सुख देत, लेत चितवत चित चोरी |
बरनत यह अमित रूप थकित निगम-नागभूप,
तुलसिदास छबि बिलोकि सारद भै भोरी ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 1 से 10 तक/पृष्ठ 8
(8).राग केदारा
सखि! रघुनाथ-रूप निहारु |
सरद-बिधु रबि-सुवन मनसिज-मान भञ्जनिहारु ||
स्याम सुभग सरीर जन-मन-काम-पूरनिहारु |
चारुचन्दन मनहु मरकत-सिखर लसत निहारु ||
रुचिर उर उपबीत राजत पदिक गजमनि-हारु |
मनहु सुरधनु नखतगन बिच तिमिर-भञ्जनिहारु ||
बिमल पीत दुकूल दामिनि-दुति-बिनिन्दनिहारु |
बदन सुषमासदन सोभित मदन-मोहनिहारु ||
सकल अंग अनूप, नहिं कोउ सुकबि बरननिहारु |
दासतुलसी निखतहि सुख लहत निरखनिहारु ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 1 से 10 तक/पृष्ठ 9
(9)
सखि! रघुबीर मुख-छबि देखु |
चित्त-भीति सुप्रिति-रङ्ग सुरूपता अवरेखु ||
नयन-सुषमा निरखि नागरि! सफल जीवन लेखु |
मनहुँ बिधि जुग जलज बिरचे ससि सुपूरन मेखु ||
भ्रकुटि भाल बिसाल राजत रुचिर-कुङ्कुम-रेखु |
भ्रमर द्वै रबिकिरनि ल्याए करन जनु उनमेखु ||
सुमुखि! केस सुदेस सुन्दर सुमन-सञ्जुत पेषु |
मनहुँ उडुगन-निबह आए मिलन तम तजि द्वेषु ||
स्रवन कुण्डल मनहु गुरु-कबि करत बाद बिसेषु |
नासिका, द्विज, अधर जनु रह्यो मदनु करि बहु बेषु ||
रूप बरनि न सकत नारद-सम्भु, सारद-सेषु |
कहै तुलसीदास क्यों मतिमन्द सकल नरेषु ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 1 से 10 तक/पृष्ठ 10
(10)
देखौ, राघव-बदन बिराजत चारु |
जात न बरनि, बिलोकत ही सुख, मुख किधौं छबिबर नारि सिङ्गारु ||
रुचिर चिबुक, रद-ज्योति अनूपम, अधर अरुन सित हास निहारु |
मनो ससिकर बस्यो चहत कमल महँ प्रगटत, दुरत, न बनत बिचारु ||
नासिक सुभग मनहुँ सुक सुन्दर चितवत चकि आचरज अपारु |
कल कपोल, मृदु बोल मनोहर रीझि, चित चतुर अपनपौ वारु ||
नयन सरोज, कुटिल कच, कुण्डल भ्रुकुटु, सुभाल तिलक सोभा-सारु |
मनहुँ केतुके मकर, चाप-सर गयो, बिसारि भयो मोहित मारु ||
निगम-सेष, सारद, सुक, सङ्कर, बरनत रूप न पावत पारु |
तुलसिदास कहै, कहौ, धौं कौन बिधि अति लघुमति जड़ कूर गँवारु ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 11 से 20 तक/पृष्ठ 1
(11)
आज रघुपति-मुख देखत लागत सुख
सेवक सुरुष, सोभा सरद-ससि सिहाई |
दसन-बसन लाल, बिसद हास रसाल
मानो हिमकर-कर राखे राजीव मनाई ||
अरुन नैन बिसाल, ललित भ्रुकुटि, भाल
तिलक, चारु कपोल, चिबुक-नासा सुहाई |
बिथुरे कुटिल कच, मानहु मधु लालच अलि,
नलिन-जुगल उपर रहे लोभाई ||
स्रवन सुन्दर, सम कुण्डल कल जुगम,
तुलसिदास अनूप, उपमा कही न जाई |
मानो मरकत सीप सुन्दर ससि समीप
कनक मकरजुत बिधि बिरची बनाई ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 11 से 20 तक/पृष्ठ 2
(12)
प्रातकाल रघुबीर-बदन-छबि चितै, चतुर चित मेरे |
होहिं बिबेक-बिलोचन निरमल सुफल सुसीतल तेरे ||
भाल बिसाल बिकट भ्रुकुटी बिच तिलक-रेख रुचि राजै |
मनहुँ मदन तम तकि मरकत-धनु जुगुल कनक सर साजै ||
रुचिर पलक लोचन जुग तारक स्याम, अरुन सित कोए |
जनु अलि नलिन-कोस महँ बन्धुक-सुमन सेज सजि सोए ||
बिलुलित ललित कपोलनिपर कच मेचक कुटिल सुहाए |
मनो बिधुमहँ बनरुह बिलोकि अलि बिपुल सकौतुक आए ||
सोभित स्रवन कनक-कुण्डल कल लम्बित बिबि भुजमूले |
मनहुँ केकि तकि गहन चहत जुग उरग इंदु प्रतिकूले ||
अधर अरुनतर, दसन-पाँति बर, मधुर मनोहर हासा |
मनहुँ सोन सरसिज महँ कुलिसनि तड़ित सहित कृत बासा ||
चारु चिबुक, सुकतुण्ड बिनिन्दक सुभग सून्नत नासा |
तुलसिदास छबिधाम राममुख सुखद, समन भवत्रासा ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 11 से 20 तक/पृष्ठ 3
(13)
सुमिरत श्रीरघुबीरजीकी बाहैं |
रोत सुगम भव-उदधि अगम अति, कोउ लाँघत, कोउ उतरत थाहैं ||
सुन्दर-स्याम-सरीर-सैलतें धँसि जनु जुग जमुना अवगाहैं |
अमित अमल जल-बल परिपूरन, जनु जनमी सिँगार सविता हैं ||
धारैं बान, कूल धनु, भूषन जलचर, भँवर सुभग सब घाहैं |
बिलसति बीचि बिजय-बिरदावलि, कर-सरोज सोहत सुषमा हैं ||
सकल-भुवन-मङ्गल-मन्दिरके द्वार बिसाल सुहाई साहैं |
जे पूजी कौसिक-मख ऋषियनि, जनक-गनप, सङ्कर-गिरिजा हैं ||
भवधनु दलि जानकी बिबाही, भए बिहाल नृपाल त्रपा हैं |
परसुपानि जिन्ह किये महामुनि जे चितए कबहू न कृपा हैं ||
जातुधान-तिय जानि बियोगिनि दुखई सीय सुनाइ कुचाहैं |
जिन्ह रिपु मारि सुरारि-नारि तेइ सीस उघारि दिवाई धाहैं ||
दसमुख-बिबस तिलोक लोकपति बिकल बिनाए नाक चना हैं |
सुबस बसे गावत जिन्हके जस अमर-नाग-नर सुमुखि सना हैं ||
जे भुज बेद-पुरान, सेष-सुक-सारद सहित सनेह सराहैं |
कलपलताहुकी कलपलता बर, कामदुहहुकी कामदुहा हैं ||
सरनागत-आरत-प्रनतनिको दै दै अभयपद ओर निबाहैं |
करि आईं, करिहैं, करती हैं तुलसिदास दासनिपर छाहैं ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 11 से 20 तक/पृष्ठ 4
(14)
रामचन्द्र-करकञ्ज कामतरु बामदेव-हितकारी |
सियसनेह-बर बेलि-बलित बर-प्रेम बन्धु बर बारी ||
मञ्जुल मङ्गल-मूल मूल तनु, करज मनोहर साखा |
रोम परन, नख सुमन, सुफल सब काल सुजन-अभिलाषा ||
अबिचल, अमल, अनामय, अबिरल ललित, रहित छल छाया |
समन सकल सन्ताप-पाप-रुज-मोह-मान-मद-माया ||
सेवहिं सुचि मुनि भृङ्ग-बिहग मन-मुदित मनोरथ पाए |
सुमिरत हिय हुलसत तुलसी अनुराग उमगि गुन गाए ||
गीतावली उत्तरकाण्ड पद 11 से 20 तक/पृष्ठ 5
(15)
रामचरन अभिराम कामप्रद तीरथ-राज बिराजै |
सङ्कर-हृदय-भगति-भूतलपर प्रेम-अछयबट भ्राजै ||
स्यामबरन पद-पीठ, अरुन तल, लसति बिसद नखस्रेनी |
जनु रबि-सुता सारदा-सुरसरि मिलि चलीं ललित त्रिबेनी ||
अंकुस-कुलिस-कमल-धुज सुन्दर भँवर तरङ्ग-बिलासा |
मज्जहिं सुर-सज्जन, मुनिजन-मन मुदित मनोहर बासा ||
बिनु बिराग-जप-जाग-जोग-ब्रत, बिनु तप, बिनु तनु त्यागे |
सब सुख सुलभ सद्य तुलसी प्रभु-पद-प्रयाग अनुरागे ||