बालकाण्ड · भाग ४
सोहत मग मुनि सँग दोउ भाई
सोहत मग मुनि सँग दोउ भाई |
तरुन तमाल चारु चम्पक-छबि कबि-सुभाय कहि जाई ||
भूषन बसन अनुहरत अंगनि, उमगति सुन्दरताई |
बदन मनोज सरोज लोचननि रही है लुभाइ लुनाई ||
अंसनि धनु, सर कर-कमलनि, कटि कसे हैं निखङ्ग बनाई |
सकल भुवन सोभा सरबस लघु लागति निरखि निकाई ||
महि मृदु पथ, घन छाँह, सुमन सुर बरष, पवन सुखदाई |
जल-थल-रुह फल, फूल, सलिल सब करत प्रेम पहुनाई ||
सकुच सभीत बिनीत साथ गुरु बोलनि-चलनि सुहाई |
खग-मृग-चित्र बिलोकत बिच-बिच, लसति ललित लरिकाई ||
बिद्या दई जानि बिद्यानिधि, बिद्यहु लही बड़ाई |
ख्याल दली ताडुका, देखि ऋषि देत असीस अघाई ||
बूझत प्रभु सुरसरि-प्रसङ्ग कहि निज कुल कथा सुनाई |
गाधिसुवन-सनेह-सुख-सम्पति उर-आश्रम न समाई ||
बनबासी बटु, जती, जोगि-जन साधु-सिद्ध-समुदाई |
पूजत पेखि प्रीति पुलकत तनु नयन लाभ लुटि पाई ||
मख राख्यो खलदल दलि भुजबल, बाजत बिबुध बधाई |
नित पथ-चरित-सहित तुलसी-चित बसत लखन रघुराई ||
मञ्जुल मङ्गलमय नृप-ढोटा
मञ्जुल मङ्गलमय नृप-ढोटा |
मुनि, मुनितिय, मुनिसिसु बिलोकि कहैं मधुर मनोहर जोटा ||
नाम-रुप-अनुरुप बेष बय, राम लखन लाल लोने |
इन्हतें लही है मानो घन-दामिनि दुति मनसिज, मरकत, सोने ||
चरनसरोज, पीतपट, कटितट, तून-तीर-धनुधारी |
केहरिकन्ध काम-करि-करवर बिपुल बाहु, बल भारी ||
दूषन-रहित समय सम भूषन पाइ सुअंगनि सोहैं |
नव-राजीव-नयन, पुरन बिधुबदन मदन मन मोहैं ||
सिरनि सिखण्ड, सुमन-दल-मण्डन बाल सुभाय बनाये |
केलि-अंक तनु-रेनुपङ्क जनु प्रगटत चरित चोराये ||
मख राखिबे लागि दसरथ सों माँगि आश्रमहि आने |
प्रेम पूजि पाहुने प्रानप्रिय गाधिसुवन सनमाने ||
साधन-फल साधक सिद्धनिके, लोचन-फल सबहीके |
सकल सुकृत-फल, मातु-पिताके, जीवन-धन तुलसीके ||
पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 1
57
अहल्योद्धार
.राग सूहो
रामपद-पदुम-पराग परी |
ऋषितिय तुरत त्यागि पाहन-तनु छबिमय देह धरी ||
प्रबल पाप पति-साप दुसह दव दारुन जरनि जरी |
कृपासुधा सिँचि बिबुध-बेलि ज्यौं फिरि सुख-फरनि फरी ||
निगम-अगम मूरति महेस-मति-जुबति बराय बरी |
सोइ मूरति भै जानि नयनपथ इकटकतें न टरी ||
बरनति हृदय सरुप, सील गुन प्रेम-प्रमोद-भरी |
तुलसिदास अस केहि आरतकी आरति प्रभु न हरी? ||
पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 2
58
परत पद-पङ्कज ऋषि-रवनी |
भई है प्रगट अति दिब्य देह धरि मानो त्रिभुवन-छबि-छवनी ||
देखि बड़ो आचरज, पुलकि तनु कहति मुदित मुनि-भवनी |
जो चलिहैं रघुनाथ पयादेहि, सिला न रहिहि अवनी ||
परसि जो पाँय पुनीत सुरसरी सोहै तीनि-गवनी |
तुलसिदास तेहि चरन-रेनुकी महिमा कहै मति कवनी ||
पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 3
59
भूरिभाग-भाजनु भई |
रुपरासि अवलोकि बन्धु दोउ प्रेम-सुरङ्ग रई ||
कहा कहैं, केहि भाँति सराहैं, नहि करतूति नई |
बिनु कारन करुनाकर रघुबर केहि-केहि गति न दई ||
करि बहु बिनय, राखि उर मूरति मङ्गल-मोदिमई |
तुलसी ह्वै बिसोक पति-लोकहि प्रभुगुन गनत गई ||
पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 4
60
.राग कान्हरा
कौसिकके मखके रखवारे |
नाम राम अरु लखन ललित अति, दसरथ-राज-दुलारे ||
मेचक पीत कमल कोमल कल काकपच्छ-धर बारे |
सोभा सकल सकेलि मदन-बिधि सुकर सरोज सँवारे ||
सहस समूह सुबाहु सरिस खल समर सूर भट भारे |
केलि-तून-धनु-बान-पानि रन निदरि निसाचर मारे ||
ऋषितिय तारि स्वयम्बर पेखन जनकनगर पगु धारे |
मग नर-नारि निहारत सादर, कहैं बड़ भाग हमारे ||
तुलसी सुनत एक-एकनि सो चलत बिलोकनिहारे |
मूकनि बचन-लाहु, मानो अंधनि लहे हैं बिलोचन-तारे ||
पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 5
61
जनकपुर-प्रवेश
.राग टोड़ी
आये सुनि कौसिक जनक हरषाने हैं |
बोलि गुर भूसुर, समाज सों मिलन चले,
जानि बड़े भाग अनुराग अकुलाने हैं ||
नाइ सीस पगनि, असीस पाइ प्रमुदित,
पाँवड़े अरघ देत आदर सों आने हैं |
असन, बसन, बासकै सुपास सब बिधि,
पूजि प्रिय पाहुने, सुभाय सनमाने हैं ||
बिनय बड़ाई ऋषि-राजौउ परसपर
करत पुलकि प्रेम आनँद अघाने हैं |
देखे राम-लखन निमेषै बिथकित भईं
प्रानहु ते प्यारे लागे बिनु पहिचाने हैं ||
ब्रह्मानन्द हृदय, दरस-सुख लोयननि
अनभये उभय, सरस राम जाने हैं |
तुलसी बिदेहकी सनेहकी दसा सुमिरि,
मेरे मन माने राउ निपट सयाने हैं ||
पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 6
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कोसलरायके कुअँरोटा |
राजत रुचिर जनक-पुर पैठत स्याम गौर नीके जोटा ||
चौतनि सिरनि, कनककली काननि, कटि पट पीत सोहाये |
उर मनि-माल, बिसाल बिलोचन, सीय-स्वयम्बर आये ||
बरनि न जात, मनहिं मन भावत, सुभग अबहिं बय थोरी |
भई हैं मगन बिधुबदन बिलोकत बनिता चतुर चकोरी ||
कहँ सिवचाप, लरिकवनि बूझत, बिहँसि चितै तिरछौंहैं |
तुलसी गलिन भीर, दरसन लगि लोग अटनि आरोहैं ||
पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 7
63
ये अवधेसके सुत दोऊ |
चढ़ि मन्दिरनि बिलोकत सादर जनकनगर सब कोऊ ||
स्याम गौर सुन्दर किसोर तनु, तून-बान-धनुधारी |
कटि पट पीत, कण्ठ मुकुतामनि, भुज बिसाल, बल भारी ||
मुख मयङ्क, सरसीरुह लोचन, तिलक भाल, टेढ़ी भौंहैं |
कल कुण्डल, चौतनी चारु अति, चलत मत्त-गज-गौंहैं ||
बिस्वामित्र हेतु पठये नृप,इनहि ताडुका मारी |
मख राख्यो रिपु जीति, जान जग, मग मुनिबधू उधारी ||
प्रिय पाहुने जानि नर-नारिन नयननि अयन दये |
तुलसिदास प्रभु देखि लोग सब जनक समान भये ||
पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 8
64
बूझत जनक नाथ, ढोटा दोउ काके हैं ?
तरुन तमाल चारु चम्पक-बरन तनु
कौन बड़े भागीके सुकृत परिपाके हैं ||
सुखके निधान पाये, हियके पिधान लाये,
ठगके-से लाडू खाये, प्रेम-मधु छाके हैं |
स्वारथ-रहित परमारथी कहावत हैं,
भे सनेह-बिबस बिदेहता बिबाके हैं ||
सील-सुधाके अगार, सुखमाके पारावार,
पावत न पैरि पार पैरि पैरि थाके हैं |
लोचन ललकि लागे, मन अति अनुरागे,
एक रसरुप चित सकल सभाके हैं ||
जिय जिय जोरत सगाई राम लखनसों
आपने आपने भाय जैसे भाय जाके हैं |
प्रीतिको, प्रतीतिको, सुमिरिबेको, सेइबेको,
सरनको समरथ तुलसिहु ताके हैं ||
पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 9
65
ए कौन कहाँतें आए ?
नील-पीत पाथोज-बरन, मन-हरन, सुभाय सुहाए ||
मुनि सुत किधौं भूप-बालक, किधौं ब्रह्म-जीव जग जाए |
रुप जलधिके रतन, सुछबि-तिय-लोचन ललित ललाए ||
किधौं रबि-सुवन, मदन-ऋतुपति, किधौं हरि-हर बेष बनाए |
किधौं आपने सुकृत-सुरतरुके सुफल रावरेहि पाए ||
भए बिदेह बिदेह नेहबस देहदसा बिसराए |
पुलक गात, न समात हरष हिय, सलिल सुलोचन छाए ||
जनक-बचन मृदु मञ्जु मधु-भरे भगति कौसिकहि भाए |
तुलसी अति आनन्द उमगि उर राम लषन गुन गाए ||
पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 10
66
कौसिक कृपालहूको पुलकित तनु भौ |
उमगत अनुराग, सभाके सराहे भाग,
देखि दसा जनककी कहिबेको मनु भौ ||
प्रीतिके न पातकी, दियेहू साप पाप बड़ो,
मख-मिस मेरो तब अवध-गवनु भौ |
प्रानहूते प्यारे सुत माँगे दिये दसरथ,
सत्यसिन्धु सोच सहे, सूनो सो भवनु भौ ||
काकसिखा सिर, कर केलि-तून-धनु-सर,
बालक-बिनोद जातुधाननिसों रनु भौ |
बूझत बिदेह अनुराग-आचरज-बस,
ऋषिराज जाग भयो, महाराज अनु भौ ||
भूमिदेव, नरदेव, सचिव परसपर
कहत, हमहिं सुरतरु सिवधनु भौ |
सुनत राजाकी रीति उपजी प्रतीति-प्रीति,
भाग तुलसीके, भले साहेबको जनु भौ ||
पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 11
67
चार्यो भले बेटा देव दसरथ रायके |
जैसे राम-लषन, भरत-रिपुहन तैसे,
सील-सोभा-सागर, प्रभाकर प्रभायके ||
ताड़का सँहारि मख राखे, नीके पाले ब्रत,
कोटि-कोटि भट किये एक एक घायके |
एक बान बेगही उड़ाने जातुधान-जात,
सूखि गये गात हैं, पतौआ भये बायके ||
सिलाछोर छुवत अहल्या भई दिब्यदेह,
गुन पेखे पारसके पङ्करुह पायके |
रामके प्रसाद गुर गौतम खसम भये,
रावरेहु सतानन्द पूत भये मायके ||
प्रेम-परिहास-पोख बचन परसपर
कहत सुनत सुख सब ही सुभायके |
तुलसी सराहैं भाग कौसिक जनकजूके,
बिधिके सुढर होत सुढर सुदायके ||
पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 12
68
. ये दोऊ दसरथके बारे |
नाम राम घनस्याम, लखन लघु, नखसिख अँग उजियारे ||
निज हित लागि माँगि आने मैं धरमसेतु-रखवारे |
धीर, बीर बिरुदैत, बाँकुरे, महाबाहु, बल भारे ||
एक तीर तकि हती ताडका, किये सुर-साधु सुखारे |
जग्य राखि, जग साखि, तोषि ऋषि, निदरि निसाचर मारे ||
मुनितिय तारि स्वयम्बर पेखन आये सुनि बचन तिहारे |
एउ देखिहैं पिनाकु नेकु, जेहि नृपति लाज-ज्वर जारे ||
सुनि, सानन्द सराहि सपरिजन, बारहि बार निहारे |
पूजि सप्रेम, प्रसंसि कौसिकहि भूपति सदन सिधारे ||
सोचत सत्य-सनेह-बिबस निसि, नृपहि गनत गये तारे |
पठये बोलि भोर, गुरके सँग रङ्गभूमि पगु धारे ||
नगर-लोग सुधि पाइ मुदित, सबही सब काज बिसारे |
मनहु मघा-जल उमगि उदधि-रुख चले नदी-नद-नारे ||
ए किसोर, धनु घोर बहुत, बिलखात बिलोकनिहारे |
टर्यो न चाप तिन्हते, जिन्ह सुभटनि कौतुक कुधर उखारे ||
ए जाने बिनु जनक जानियत करि पन भूप हँकारे |
नतरु सुधसागर परिहरि कत कूप खनावत खारे ||
सुखमा सील-सनेह सानि मनो रुप बिरञ्चि सँवारे |
रोम-रोमपर सोम-काम सत कोटि बारि फेरि डारे ||
कोउ कहै, तेज-प्रताप-पुञ्ज चितये नहिं जात, भिया रे !
छुअत सरासन-सलभ जरैगो ए दिनकर-बंस-दिया रे ||
एक कहै, कछु होउ, सुफल भये जीवन-जनम हमारे |
अवलोके भरि नयन आजु तुलसीके प्रानपियारे ||