श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
गीतावली · गोस्वामी तुलसीदास

बालकाण्ड · भाग ४

गीतावली · बालकाण्ड · भाग ४
पद ४५

सोहत मग मुनि सँग दोउ भाई

राग कान्हरा

सोहत मग मुनि सँग दोउ भाई |

तरुन तमाल चारु चम्पक-छबि कबि-सुभाय कहि जाई ||

भूषन बसन अनुहरत अंगनि, उमगति सुन्दरताई |

बदन मनोज सरोज लोचननि रही है लुभाइ लुनाई ||

अंसनि धनु, सर कर-कमलनि, कटि कसे हैं निखङ्ग बनाई |

सकल भुवन सोभा सरबस लघु लागति निरखि निकाई ||

महि मृदु पथ, घन छाँह, सुमन सुर बरष, पवन सुखदाई |

जल-थल-रुह फल, फूल, सलिल सब करत प्रेम पहुनाई ||

सकुच सभीत बिनीत साथ गुरु बोलनि-चलनि सुहाई |

खग-मृग-चित्र बिलोकत बिच-बिच, लसति ललित लरिकाई ||

बिद्या दई जानि बिद्यानिधि, बिद्यहु लही बड़ाई |

ख्याल दली ताडुका, देखि ऋषि देत असीस अघाई ||

बूझत प्रभु सुरसरि-प्रसङ्ग कहि निज कुल कथा सुनाई |

गाधिसुवन-सनेह-सुख-सम्पति उर-आश्रम न समाई ||

बनबासी बटु, जती, जोगि-जन साधु-सिद्ध-समुदाई |

पूजत पेखि प्रीति पुलकत तनु नयन लाभ लुटि पाई ||

मख राख्यो खलदल दलि भुजबल, बाजत बिबुध बधाई |

नित पथ-चरित-सहित तुलसी-चित बसत लखन रघुराई ||

पद ४६

मञ्जुल मङ्गलमय नृप-ढोटा

राग कान्हरा

मञ्जुल मङ्गलमय नृप-ढोटा |

मुनि, मुनितिय, मुनिसिसु बिलोकि कहैं मधुर मनोहर जोटा ||

नाम-रुप-अनुरुप बेष बय, राम लखन लाल लोने |

इन्हतें लही है मानो घन-दामिनि दुति मनसिज, मरकत, सोने ||

चरनसरोज, पीतपट, कटितट, तून-तीर-धनुधारी |

केहरिकन्ध काम-करि-करवर बिपुल बाहु, बल भारी ||

दूषन-रहित समय सम भूषन पाइ सुअंगनि सोहैं |

नव-राजीव-नयन, पुरन बिधुबदन मदन मन मोहैं ||

सिरनि सिखण्ड, सुमन-दल-मण्डन बाल सुभाय बनाये |

केलि-अंक तनु-रेनुपङ्क जनु प्रगटत चरित चोराये ||

मख राखिबे लागि दसरथ सों माँगि आश्रमहि आने |

प्रेम पूजि पाहुने प्रानप्रिय गाधिसुवन सनमाने ||

साधन-फल साधक सिद्धनिके, लोचन-फल सबहीके |

सकल सुकृत-फल, मातु-पिताके, जीवन-धन तुलसीके ||

पद ४७

पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 1

57

अहल्योद्धार

.राग सूहो

रामपद-पदुम-पराग परी |

ऋषितिय तुरत त्यागि पाहन-तनु छबिमय देह धरी ||

प्रबल पाप पति-साप दुसह दव दारुन जरनि जरी |

कृपासुधा सिँचि बिबुध-बेलि ज्यौं फिरि सुख-फरनि फरी ||

निगम-अगम मूरति महेस-मति-जुबति बराय बरी |

सोइ मूरति भै जानि नयनपथ इकटकतें न टरी ||

बरनति हृदय सरुप, सील गुन प्रेम-प्रमोद-भरी |

तुलसिदास अस केहि आरतकी आरति प्रभु न हरी? ||

पद ४८

पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 2

58

परत पद-पङ्कज ऋषि-रवनी |

भई है प्रगट अति दिब्य देह धरि मानो त्रिभुवन-छबि-छवनी ||

देखि बड़ो आचरज, पुलकि तनु कहति मुदित मुनि-भवनी |

जो चलिहैं रघुनाथ पयादेहि, सिला न रहिहि अवनी ||

परसि जो पाँय पुनीत सुरसरी सोहै तीनि-गवनी |

तुलसिदास तेहि चरन-रेनुकी महिमा कहै मति कवनी ||

पद ४९

पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 3

59

भूरिभाग-भाजनु भई |

रुपरासि अवलोकि बन्धु दोउ प्रेम-सुरङ्ग रई ||

कहा कहैं, केहि भाँति सराहैं, नहि करतूति नई |

बिनु कारन करुनाकर रघुबर केहि-केहि गति न दई ||

करि बहु बिनय, राखि उर मूरति मङ्गल-मोदिमई |

तुलसी ह्वै बिसोक पति-लोकहि प्रभुगुन गनत गई ||

पद ५०

पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 4

60

.राग कान्हरा

कौसिकके मखके रखवारे |

नाम राम अरु लखन ललित अति, दसरथ-राज-दुलारे ||

मेचक पीत कमल कोमल कल काकपच्छ-धर बारे |

सोभा सकल सकेलि मदन-बिधि सुकर सरोज सँवारे ||

सहस समूह सुबाहु सरिस खल समर सूर भट भारे |

केलि-तून-धनु-बान-पानि रन निदरि निसाचर मारे ||

ऋषितिय तारि स्वयम्बर पेखन जनकनगर पगु धारे |

मग नर-नारि निहारत सादर, कहैं बड़ भाग हमारे ||

तुलसी सुनत एक-एकनि सो चलत बिलोकनिहारे |

मूकनि बचन-लाहु, मानो अंधनि लहे हैं बिलोचन-तारे ||

पद ५१

पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 5

61

जनकपुर-प्रवेश

.राग टोड़ी

आये सुनि कौसिक जनक हरषाने हैं |

बोलि गुर भूसुर, समाज सों मिलन चले,

जानि बड़े भाग अनुराग अकुलाने हैं ||

नाइ सीस पगनि, असीस पाइ प्रमुदित,

पाँवड़े अरघ देत आदर सों आने हैं |

असन, बसन, बासकै सुपास सब बिधि,

पूजि प्रिय पाहुने, सुभाय सनमाने हैं ||

बिनय बड़ाई ऋषि-राजौउ परसपर

करत पुलकि प्रेम आनँद अघाने हैं |

देखे राम-लखन निमेषै बिथकित भईं

प्रानहु ते प्यारे लागे बिनु पहिचाने हैं ||

ब्रह्मानन्द हृदय, दरस-सुख लोयननि

अनभये उभय, सरस राम जाने हैं |

तुलसी बिदेहकी सनेहकी दसा सुमिरि,

मेरे मन माने राउ निपट सयाने हैं ||

पद ५२

पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 6

62

राग मलार

कोसलरायके कुअँरोटा |

राजत रुचिर जनक-पुर पैठत स्याम गौर नीके जोटा ||

चौतनि सिरनि, कनककली काननि, कटि पट पीत सोहाये |

उर मनि-माल, बिसाल बिलोचन, सीय-स्वयम्बर आये ||

बरनि न जात, मनहिं मन भावत, सुभग अबहिं बय थोरी |

भई हैं मगन बिधुबदन बिलोकत बनिता चतुर चकोरी ||

कहँ सिवचाप, लरिकवनि बूझत, बिहँसि चितै तिरछौंहैं |

तुलसी गलिन भीर, दरसन लगि लोग अटनि आरोहैं ||

पद ५३

पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 7

63

ये अवधेसके सुत दोऊ |

चढ़ि मन्दिरनि बिलोकत सादर जनकनगर सब कोऊ ||

स्याम गौर सुन्दर किसोर तनु, तून-बान-धनुधारी |

कटि पट पीत, कण्ठ मुकुतामनि, भुज बिसाल, बल भारी ||

मुख मयङ्क, सरसीरुह लोचन, तिलक भाल, टेढ़ी भौंहैं |

कल कुण्डल, चौतनी चारु अति, चलत मत्त-गज-गौंहैं ||

बिस्वामित्र हेतु पठये नृप,इनहि ताडुका मारी |

मख राख्यो रिपु जीति, जान जग, मग मुनिबधू उधारी ||

प्रिय पाहुने जानि नर-नारिन नयननि अयन दये |

तुलसिदास प्रभु देखि लोग सब जनक समान भये ||

पद ५४

पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 8

64

राग टोड़ी

बूझत जनक नाथ, ढोटा दोउ काके हैं ?

तरुन तमाल चारु चम्पक-बरन तनु

कौन बड़े भागीके सुकृत परिपाके हैं ||

सुखके निधान पाये, हियके पिधान लाये,

ठगके-से लाडू खाये, प्रेम-मधु छाके हैं |

स्वारथ-रहित परमारथी कहावत हैं,

भे सनेह-बिबस बिदेहता बिबाके हैं ||

सील-सुधाके अगार, सुखमाके पारावार,

पावत न पैरि पार पैरि पैरि थाके हैं |

लोचन ललकि लागे, मन अति अनुरागे,

एक रसरुप चित सकल सभाके हैं ||

जिय जिय जोरत सगाई राम लखनसों

आपने आपने भाय जैसे भाय जाके हैं |

प्रीतिको, प्रतीतिको, सुमिरिबेको, सेइबेको,

सरनको समरथ तुलसिहु ताके हैं ||

पद ५५

पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 9

65

ए कौन कहाँतें आए ?

नील-पीत पाथोज-बरन, मन-हरन, सुभाय सुहाए ||

मुनि सुत किधौं भूप-बालक, किधौं ब्रह्म-जीव जग जाए |

रुप जलधिके रतन, सुछबि-तिय-लोचन ललित ललाए ||

किधौं रबि-सुवन, मदन-ऋतुपति, किधौं हरि-हर बेष बनाए |

किधौं आपने सुकृत-सुरतरुके सुफल रावरेहि पाए ||

भए बिदेह बिदेह नेहबस देहदसा बिसराए |

पुलक गात, न समात हरष हिय, सलिल सुलोचन छाए ||

जनक-बचन मृदु मञ्जु मधु-भरे भगति कौसिकहि भाए |

तुलसी अति आनन्द उमगि उर राम लषन गुन गाए ||

पद ५६

पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 10

66

कौसिक कृपालहूको पुलकित तनु भौ |

उमगत अनुराग, सभाके सराहे भाग,

देखि दसा जनककी कहिबेको मनु भौ ||

प्रीतिके न पातकी, दियेहू साप पाप बड़ो,

मख-मिस मेरो तब अवध-गवनु भौ |

प्रानहूते प्यारे सुत माँगे दिये दसरथ,

सत्यसिन्धु सोच सहे, सूनो सो भवनु भौ ||

काकसिखा सिर, कर केलि-तून-धनु-सर,

बालक-बिनोद जातुधाननिसों रनु भौ |

बूझत बिदेह अनुराग-आचरज-बस,

ऋषिराज जाग भयो, महाराज अनु भौ ||

भूमिदेव, नरदेव, सचिव परसपर

कहत, हमहिं सुरतरु सिवधनु भौ |

सुनत राजाकी रीति उपजी प्रतीति-प्रीति,

भाग तुलसीके, भले साहेबको जनु भौ ||

पद ५७

पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 11

67

चार्यो भले बेटा देव दसरथ रायके |

जैसे राम-लषन, भरत-रिपुहन तैसे,

सील-सोभा-सागर, प्रभाकर प्रभायके ||

ताड़का सँहारि मख राखे, नीके पाले ब्रत,

कोटि-कोटि भट किये एक एक घायके |

एक बान बेगही उड़ाने जातुधान-जात,

सूखि गये गात हैं, पतौआ भये बायके ||

सिलाछोर छुवत अहल्या भई दिब्यदेह,

गुन पेखे पारसके पङ्करुह पायके |

रामके प्रसाद गुर गौतम खसम भये,

रावरेहु सतानन्द पूत भये मायके ||

प्रेम-परिहास-पोख बचन परसपर

कहत सुनत सुख सब ही सुभायके |

तुलसी सराहैं भाग कौसिक जनकजूके,

बिधिके सुढर होत सुढर सुदायके ||

पद ५८

पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 12

68

. ये दोऊ दसरथके बारे |

नाम राम घनस्याम, लखन लघु, नखसिख अँग उजियारे ||

निज हित लागि माँगि आने मैं धरमसेतु-रखवारे |

धीर, बीर बिरुदैत, बाँकुरे, महाबाहु, बल भारे ||

एक तीर तकि हती ताडका, किये सुर-साधु सुखारे |

जग्य राखि, जग साखि, तोषि ऋषि, निदरि निसाचर मारे ||

मुनितिय तारि स्वयम्बर पेखन आये सुनि बचन तिहारे |

एउ देखिहैं पिनाकु नेकु, जेहि नृपति लाज-ज्वर जारे ||

सुनि, सानन्द सराहि सपरिजन, बारहि बार निहारे |

पूजि सप्रेम, प्रसंसि कौसिकहि भूपति सदन सिधारे ||

सोचत सत्य-सनेह-बिबस निसि, नृपहि गनत गये तारे |

पठये बोलि भोर, गुरके सँग रङ्गभूमि पगु धारे ||

नगर-लोग सुधि पाइ मुदित, सबही सब काज बिसारे |

मनहु मघा-जल उमगि उदधि-रुख चले नदी-नद-नारे ||

ए किसोर, धनु घोर बहुत, बिलखात बिलोकनिहारे |

टर्यो न चाप तिन्हते, जिन्ह सुभटनि कौतुक कुधर उखारे ||

ए जाने बिनु जनक जानियत करि पन भूप हँकारे |

नतरु सुधसागर परिहरि कत कूप खनावत खारे ||

सुखमा सील-सनेह सानि मनो रुप बिरञ्चि सँवारे |

रोम-रोमपर सोम-काम सत कोटि बारि फेरि डारे ||

कोउ कहै, तेज-प्रताप-पुञ्ज चितये नहिं जात, भिया रे !

छुअत सरासन-सलभ जरैगो ए दिनकर-बंस-दिया रे ||

एक कहै, कछु होउ, सुफल भये जीवन-जनम हमारे |

अवलोके भरि नयन आजु तुलसीके प्रानपियारे ||