बालकाण्ड · भाग ५
पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 13
69
जनक बिलोकि बार-बार रघुबरको |
मुनिपद सीस नाय, आयसु-असीस पाय,
एई बातैं कहत गवन कियो घरको ||
नीन्द न परति राति, प्रेम-पन एक भाँति,
सोचत, सकोचत बिरञ्चि-हरि-हरको |
तुम्हते सुगम सब देव! देखिबेको अब
जस हंस किए जोगवत जुग परको ||
ल्याए सङ्ग कौसिक, सुनाए कहि गुनगन,
आए देखि दिनकर कुल-दिनकरको |
तुलसी तेऊ सनेहको सुभाउ बाउ मानो
चलदलको सो पात करै चित चरको ||
पद 57 से 70 तक/पृष्ठ 14
70
रङ्ग-भूमि भोरे ही जाइकै |
राम-लषन लखि लोग लूटिहैं लोचन-लाभ अघाइकै ||
भूप-भवन, घर घर, पुर बाहर, इहै चरचा रही छाइकै |
मगन मनोरथ-मोद नारि-नर, प्रेम-बिबस उठैं गाइकै ||
सोचत बिधि-गति समुझि, परसपर कहत बचन बिलखाइकै |
कुँवर किसोर, कठोर सरासन, असमञ्जस भयो आइकै ||
सुकृत सँभारि, मनाइ पितर-सुर, सीस ईसपद नाइकै |
रघुबर-करधनु-भङ्ग चहत सब अपनो सो हितु चितु लाइकै ||
लेत फिरत कनसुई सगुन सुभ, बूझत गनक बोलाइकै |
सुनि अनुकूल, मुदित मन मानहु धरत धीरजहि धाइकै ||
कौसिक-कथा एक एकनिसों कहत प्रभाउ जनाइकै |
सीय-राम सञ्जोग जानियत, रच्यो बिरञ्चि बनाइकै ||
एक सराहि सुबाहु-मथन बर बाहू, उछाह बढ़ाइकै |
सानुज राज-समाज बिराजिहैं राम पिनाक चढ़ाइकै ||
बड़ी सभा बड़ो लाभ, बड़ो जस, बड़ी बड़ाई पाइकै |
को सोहिहै, और को लायक रघुनायकहि बिहाइकै?||
गवनिहैं गँवहिं गवाँइ गरब गृह नृपकुल बलहि लजाइकै |
भलीभाँति साहब तुलसीके चलिहैं ब्याहि बजाइकै ||
गीतावली पद 71 से 80 तक/पृष्ठ 1
(71)
पुष्पवाटिकामें
भोर फूल बीनबेको गये फुलवाई हैं |
सीसनि टिपारे, उपबीत, पीत पट कटि,
दोना बाम करनि सलोने भे सवाई हैं ||
रुपके अगार, भूपके कुमार, सुकुमार,
गुरके प्रानाधार सङ्ग सेवकाई हैं |
नीच ज्यों टहल करैं, राखैं रुख अनुसरैं,
कौसिक-से कोही बस किये दुहुँ भाई हैं ||
सखिनसहित तेहि औसर बिधिके सँजोग
गिरिजाजू पूजिबेको जानकीजू आई हैं |
निरखि लषन-राम जाने ऋतुपति-काम,
मोहि मानो मदन मोहनी मूड़ नाई हैं ||
राघौजू-श्रीजानकी-लोचन मिलिबेको मोद
कहिबेको जोगु न, मैं बातैं-सी बनाई हैं |
स्वामी, सीय, सखिन्ह, लषन तुलसीको तैसो
तैसो मन भयो जाकी जैसिये सगाई हैं ||
गीतावली पद 71 से 80 तक/पृष्ठ 2
(72)
पूजि पारबती भले भाय पाँय परिकै |
सजल सुलोचन, सिथिल तनु पुलकित,
आवै न बचन, मन रह्यो प्रेम भरिकै ||
अंतरजामिनि भवभामिनि स्वामिनिसों हौं,
कही चाहौं बात, मातु अंत तौ हौं लरिकै |
मूरति कृपालु मञ्जु माल दै बोलत भई,
पूजो मन कामना भावतो बरु बरिकै ||
राम कामतरु पाइ, बेलि ज्यों बौण्ड़ी बनाइ,
माँग-कोषि तोषि-पोषि, फैलि-फूलि-फरिकै |
रहौगी, कहौगी तब, साँची कही अंबा सिय,
गहे पाँय द्वै, उठाय, माथे हाथ धरिकै ||
मुदित असीस सुनि, सीस नाइ पुनि पुनि,
बिदा भई देवीसों जननि डर डरिकै |
हरषीं सहेली, भयो भावतो, गावतीं गीत,
गवनी भवन तुलसीस-हियो हरिकै ||
गीतावली पद 71 से 80 तक/पृष्ठ 3
रङ्गभूमिमें
रङ्गभूमि आए, दसरथके किसोर हैं |
पेखनो सो पेखन चले हैं पुर-नर-नारि,
बारे-बूढ़े, अंध-पङ्गु करत निहोर हैं ||
नील पीत नीरज कनक मरकत घन
दामिनी-बरन तनु रुपके निचोर हैं |
सहज सलोने, राम-लषन ललित नाम,
जैसे सुने तैसेई कुँवर सिरमौर हैं ||
चरन-सरोज, चारु जङ्घा जानु ऊरु कटि,
कन्धर बिसाल, बाहु बड़े बरजोर हैं |
नीकेकै निषङ्ग कसे, करकमलनि लसै
बान-बिसिषासन मनोहर कठोर हैं ||
काननि कनकफूल, उपबीत अनुकूल,
पियरे दुकूल बिलसत आछे छोर हैं |
राजिव नयन, बिधुबदन टिपारे सिर,
नख-सिख अंगनि ठगौरी ठौर ठौर हैं ||
सभा-सरवर लोक-कोक-नद-कोकगन
प्रमुदित मन देखि दिनमनि भोर हैं |
अबुध असैले मन-मैले महिपाल भये,
कछुक उलूक कछु कुमुद चकोर हैं ||
भाईसों कहत बात, कौसिकहि सकुचात,
बोल घन घोर-से बोलत थोर-थोर हैं |
सनमुख सबहि, बिलोकत सबहि नीके,
कृपासों हेरत हँसि तुलसीकी ओर हैं ||
गीतावली पद 71 से 80 तक/पृष्ठ 4
(74)
एई राम-लषन जे मुनि-सँग आये हैं |
चौतनी-चोलना काछे, सखि सोहैं आगे-पाछे,
आछेहुते आछे, आछे आछे भाय भाये हैं ||
साँवरे गोरे सरीर, महाबाहु महाबीर,
कटि तून तीर धरे, धनुष सुहाये हैं |
देखत कोमल, कल, अतुल बिपुल बल,
कौसिक कोदण्ड-कला कलित सिखाये हैं ||
इन्हहीं ताडका मारी, गौतमकी तिय तारी,
भारी भारी भूरि भट रन बिचलाये हैं |
ऋषि मख रखवारे, दसरथके दुलारे,
रङ्गभूमि पगु धारे, जनक बुलाये हैं ||
इन्हके बिमल गुन गनत पुलकि तनु
सतनन्द-कौसिक नरेसहि सुनाये हैं |
प्रभु पद मन दिये, सो समाज चित किये
हुलसि हुलसि हिये तुलसिहुँ गाये हैं ||
गीतावली पद 71 से 80 तक/पृष्ठ 5
(75)
सीय स्वयम्बरु, माई दोउ भाई आए देखन |
सुनत चलीं प्रलदा प्रमुदित मन,
प्रेम पुलकि तनु मनहुँ मदन मञ्जुल पेखन ||
निरखि मनोहरताई सुख पाई कहैं एक-एक सों,
भूरिभाग हम धन्य, आलि ! ए दिन, एखन|
तुलसी सहज सनेह सुरँग सब
सो समाज चित-चित्रसार लागी लेखन ||
गीतावली पद 71 से 80 तक/पृष्ठ 6
(76)
राम-लषन जब दृष्टि परे, री |
अवलोकत सब लोग जनकपुर मानो बिधि बिबिध बिदेह करे, री ||
धनुषजग्य कमनीय अलनि-तल कौतुकही भए आय खरे, री |
छबि-सुरसभा मनहु मनसिजके कलित कलपतरु रुप फरे, री ||
सकल काम बरषत मुख निरखत, करषत, चित, हित हरष भरे, री |
तुलसी सबै सराहत भूपहि भलै पैत पासे सुढर ढरे, री ||
गीतावली पद 71 से 80 तक/पृष्ठ 7
(77)
नेकु, सुमुखि, चित लाइ चितौ, री |
राजकुँवर-मूरति रचिबेकी रुचि सुबिरञ्चि श्रम कियो है कितौ, री ||
नख-सिख-सुदंरता अवलोकत कह्यो न परत सुख होत जितौ, री |
साँवर रुप-सुधा भरिबे कहँ नयन-कमल कल कलस रितौ, री ||
मेरे जान इन्हैं बोलिबे कारन चतुर जनक ठयो ठाट इतौ, री |
तुलसी प्रभु भञ्जिहैं सम्भु-धनु, भूरिभाग सिय मातु-पितौ, री ||
गीतावली पद 71 से 80 तक/पृष्ठ 8
(78)
जबतें राम-लषन चितए, री |
रहे इकटक नर-नारि जनकपुर, लागत पलक कलप बितए, री ||
प्रेम-बिबस माँगत महेस सों, देखत ही रहिये नित ए, री |
कै ए सदा बसहु इन्ह नयनन्हि, कै ए नयन जाहु जित ए, री ||
कौऊ समुझाइ कहै किन भूपहि, बड़े भाग आए इत ए री |
कुलिस-कठोर कहाँ सङ्कर-धनु, मृदुमूरति किसोर कित ए, री ||
बिरचत इन्हहिं बिरञ्चि भुवन सब सुन्दरता खोजत रित ए, री |
तुलसिदास ते धन्य जनम जन, मन-क्रम-बच जिन्हके हित ए, री ||
गीतावली पद 71 से 80 तक/पृष्ठ 9
(79)
सुनु, सखि!भूपति भलोई कियो, री |
जेहि प्रसाद अवधेस-कुवँर दोउ नगर-लोग अवलोकि जियो, री ||
मानि प्रतीति कहे मेरे तैं कत सँदेह-बस करति हियो, री |
तौलौं है यह सम्भु सरासन, श्रीरघुबर जौलौं न लियो, री ||
जेहि बिंरचि रचि सीय सँवारी, औ रामहि एसो रुप दियो, री |
तुलसिदास तेहि चतुर बिधाता निजकर यह सञ्जोग सियो, री ||
गीतावली पद 71 से 80 तक/पृष्ठ 10
(80)
अनुकूल नृपहि सूलपानि हैं |
नीलकण्ठ कारुन्यसिन्धु हर दीनबन्धु दिनदानि हैं |
जो पहिले ही पिनाक जनक कहँ गये सौम्पि जिय जानि हैं |
बहुरि त्रिलोचन लोचनके फल सबहि सुलभ किये आनि हैं
सुनियत भव-भाव ते राम हैं, सिय भावती-भवानि हैं |
परखत प्रीति-प्रतीति, पयज-पनु रहे काज ठटु ठानि हैं ||
भये बिलोकि बिदेह नेहबस बालक बिनु पहिचानि हैं |
होत हरे होने बिरवनि दल सुमति कहति अनुमानि हैं ||
देखियत भूप भोर-के-से उडुगन, गरत गरीब गलानि हैं |
तेज-प्रताप बढ़त कुँवरनको, जदपि सँकोची बानि हैं ||
बय किसोर, बरजोर, बाहुबल-मेरु मेलि गुन तानिहैं |
अवसि राम राजीव-बिलोचन सम्भु-सरासन भानिहैं ||
देखिहैं ब्याह-उछाह नारि-नर, सकल सुमङ्गल-खानि हैं |
भूरिभाग तुलसी तेऊ, जे सुनिहैं, गाइहैं, बखानिहैं ||
गीतावली पद 81 से 90 तक/पृष्ठ 1
(81)
रामहि नीके कै निरखि, सुनैनी !
मनसहुँ अगम समुझि, यह अवसरु कत सकुचति, पिकबैनी ||
बड़े भाग मख-भूमि प्रगट भई सीय सुमङ्गल-ऐनी |
जा कारन लोचन-गोचर भै मूरति सब सुखदैनी ||
कुलगुर-तियके मधुर बचन सुनि जनक-जुबति मति-पैनी |
तुलसी सिथिल देह-सुधि-बुधि करि सहज सनेह-बिषैनी ||
गीतावली पद 81 से 90 तक/पृष्ठ 2
82
मिलो बरु सुन्दर सुन्दरि सीतहि लायकु
साँवरो सुभग, शोभाहूँको परम सिङ्गारु |
मनहूको मन मोहै, उपमाको को है?
सोहै सुखमासागर सङ्ग अनुज राजकुमारु ||
ललित सकल अंग, तनु धरे कै अनङ्ग,
नैननिको फल कैन्धौं, सियको सुकृत-सारु |
सरद-सुधा-सदन-छबिहि निन्दै बदन,
अरुन आयत नवनलिन-लोचन चारु ||
जनक-मनकी रीति जानि बिरहित प्रीति,
ऐसी औ मूरति देखे रह्यो पहिलो बिचारु |
तुलसी नृपहि ऐसो कहि न बुझावै कोउ,
पन औ कुँअर दोऊ प्रेमकी तुला धौं तारु||