बालकाण्ड · भाग ६
गीतावली पद 81 से 90 तक/पृष्ठ 3
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देखि देखि री! दोउ राजसुवन |
गौर स्याम सलोने लोने लोने, लोयननि,
जिन्हकी सोभा तें सोहै सकल भुवन ||
इन्हहीं ताडका मारी, मग मुनि-तिय तारी,
ऋषिमख राख्यो, रन दले हैं दुवन |
तुलसी प्रभुको अब जनकनगर-नभ,
सुजस-बिमल-बिधु चहत उवन ||
गीतावली पद 81 से 90 तक/पृष्ठ 4
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राजा रङ्गभूमि आज बैठे जाइ जाइकै |
आपने आपने थल, आपने आपने साज,
आपनी आपनी बर बानिक बनाइकै ||
कौसिक सहित राम-लषन ललित नाम,
लरिका ललाम लोने पठए बुलाइकै |
दरसलालसा-बस लोग चले भाय भले,
बिकसित-मुख निकसत धाइ धाइ कै ||
सानुज सानन्द हिये आगे ह्वै जनक लिये,
रचना रुचिर सब सादर देखाइकै |
दिये दिब्य आसन सुपास सावकास अति,
आछे आछे बीछे बीछे बिछौना बिछाइकै ||
भूपतिकिसोर दुहुँ ओर, बीच मुनिराउ
देखिबेको दाउँ, देखौ देखिबो बिहाइकै |
उदय-सैल सोहैं सुन्दर कुँवर, जोहैं,
मानौ भानु भोर भूरि किरनि छिपाइकै ||
कौतुक कोलाहल निसान-गान पुर, नभ
बरषत सुमन बिमान रहे छाइकै |
हित-अनहित, रत-बिरत बिलोकि बाल,
प्रेम-मोद-मगन जनम-फल पाइकै ||
राजाकी रजाइ पाइ सचिव-सहेली धाइ,
सतानन्द ल्याए सिय सिबिका चढ़ाइकै |
रुप-दीपिका निहारि मृग-मृगी नर-नारि,
बिथके बिलोचन-निमेषै बिसराइकै ||
हानि, लाहु, अनख, उछाहु, बाहुबल कहि
बन्दि बोले बिरद अकस उपजाइकै |
दीप दीपके महीप आए सुनि पैज पन,
कीजै पुरुषारथको अवसर भौ आइकै ||
आनाकानी, कण्ठ-हँसी मुँहा-चाही होन लगी,
देखि दसा कहत बिदेह बिलखाइकै |
गीतावली पद 81 से 90 तक/पृष्ठ 5
(85)
भूपति बिदेह कही नीकियै जो भई है।
बड़े ही समाज आजु राजनिकी लाज-पति,
हँाकि आँक एक ही पिनाक छीनि लई है।1।
मेरो अनुचित न कहत लरिकाई-बस,
मन परमिति और भाँति सुनि गई है।
नतरू प्रभु -प्रताप उतरू चढ़ाय चाप,
देतो पै देखाइ बल, फल , पापमई है।2।
भूमिके हरैया उखरैया भूमिधरनिके,
बिधि बिरचे प्रभाउ जाको जग जई है।
बिहँसि हिये हरषि हटके लषन राम,
सोहत सकोच सील नेह नारि नई है।3।
सहमी सभा सकल , जनक भये बिकल,
राम लखि कौसिक असीस-आग्या दई है।
तुलसी सुभाय गुरूपँाय लागि रघुराज,
ऋषिराजकी रजाइ माथे मानि लई है।4।
गीतावली पद 81 से 90 तक/पृष्ठ 6
(86)
सोचत जनक पोच पेच परि गई है।
जेरि कर कमल निहोरि कहैं कौसिकसों,
‘आयसु भौ रामको सो मेरे दुचितई है।1।
बान, जातु-धानपति, भूप दीप सतहूके,
लोकप बिलोकत पिनाक भूमि लई है।
जोतिलिंग कथा सुनि जाको अंत पाये बिनु
आए बिधि हरि हारि सोई हाल भई है।2।
आपुही बिचारिये, निहारिए सभाकी गति,
बेद -मरजाद मानौ हेतुबाद हई है।
इन्हके जितौहैं मन सोभा अधिकानी तन,
मुखनकी सुखमा सुखद सरसई है।3।
रावरो भरोसो बल, कै है कोऊ कियो छल,
कैंधों कुलको प्रभाव, कैंधों लरिकाई है?
कन्या, कल कीरति, बिजय बिस्वकी बटोरि,
कैंधों करतार इन्हहीको निर्मई है।4।
पनको न मोह, न बिसेष चिंता सीताहूकी,
लुनिहै पै सोई सोई जोई जेहि बई है।
रहै रघुनाथकी निकाई नीकी नीके नाथ,
हाथ सो तिहारे करतुति जाकी नई है’।5।
कहि ‘साधु साधु’ गाधि-सुवन सराहे राउ,
‘महाराज! जानि जिय ठीक भली दई है’।
हरषै लखन, हरषाने बिलखाने लोग,
तुलसी मुदित जाको राजा राम जई है।6।
गीतावली पद 81 से 90 तक/पृष्ठ 7
(87)
सुजन सराहैं जो जनक बात कही है।
श्रामहि सोहानी जानि, मुनिमनमानी सुनि,
नीच महिपावली दहन बिनु दही है।1।
कहैं गाधिनंदन मुदित रघुनंदनसों,
नृपगति अगह, गिरा न जाति गही है।
देखे-सुने भूपति अनेक झूठे झूठे नाम,
साँचे तिरहुतिनाथ, साखि देति मही है।2।
जोगी जागबलिक प्रसाद सिद्धि लही है।
ताते न तरनितें न सीरे सुधाकरहू तें,
सहज समाधि निरूपाधि निरबही है।3।
ऐसेउ अगाध बोध रावरे सनेह-बस,
बिकल बिलोकति, दुचितई सही है।
कामधेनु-कृपा हुलसानी तुलसीस उर,
पन-सिसु हेरि, मरजाद बाँधी रही है।4।
गीतावली पद 81 से 90 तक/पृष्ठ 8
(88)
ऋषिराज राजा आजु जनक समान को?
आपु यहि भाँति प्रीति सहित सराहित,
भूमि -भोग करत अनुभवत जोग-सुख,
मुनि-हर-पद-नेहु, गेह बसि भौ बिदेह,
अगुन-सगुन-प्रभु-भजन-सयान को?।2।
कहनि रहनि एक, बिरति बिबेक नीति,
बेद-बुध-संमत पथीन निरबानको?
गाँठि बिनु गुनकी कठिन जड़-चेतनकी,
छोरी अनायास, साधु सोधक अपान को।3।
सुनि रघुबीरकी बचन-रचनाकी रीति,
भयो मिथिलेस मानो दीपक बिहानको।
मिट्यो महामोह जीको, छूट्यो पोच सोच सीको,
जान्यो अवतार भयो पुरूष पुरानको।4।
सभा, नृप, गुर, नर-नारि पुर, नभ सुर,
सब चितवन मुख करूनानिधानको।
एकै एक कहत प्रगट एक प्रेम-बस,
तुलसीस तोरिये सरासन इसानको।5।
गीतावली पद 81 से 90 तक/पृष्ठ 9
089.रागमारु
सुनो भैया भूप सकल दै कान |
बज्ररेख गजदसन जनक-पन बेद-बिदित, जग जान ||
घोर कठोर पुरारि-सरासन, नाम प्रसिद्ध पिनाकु |
जो दसकण्ठ दियो बाँवों, जेहि हर-गिरि कियो है मनाकु ||
भूमि-भाल भ्राजत, न चलत सो, ज्यों बिरञ्चिको आँकु |
धनु तोरै सोई बरै जानकी, राउ होइ कि राँकु ||
सुनि आमरषि उठे अवनीपति, लगै बचन जनु तीर |
टरै न चाप, करैं अपनी सी महा महा बलधीर ||
नमित-सीस सोचहिं सलज्ज सब श्रीहत भए सरीर|
बोले जनक बिलोकि सीय तन दुखित सरोष अधीर ||
सप्त दीप नव खण्ड बूमिके भूपतिबृन्द जुरे |
बड़ो लाभ कन्या-कीरतिको, जहँ-तहँ महिप मुरे ||
डग्यौ न धनु, जनु बीर-बिगत महि, किधौं कहुँ सुभट दुरे |
रोषे लखन बिकट भृकुटी करि, भुज अरु अधर फुरे ||
सुनहु भानुकुल-कमल-भानु ! जो तव अनुसासन पावौं |
का बापुरो पिनाकु, मेलि गुन मन्दर मेरु नवावौं ||
देखौ निज किङ्करको कौतुक, क्यों कोदण्ड चढ़ावौं |
लै धावौं, भञ्जौं मृनाल, ज्यों, तौ प्रभु-अनुग कहावौं ||
हरषै पुर-नर-नारि, सचिव, नृप कुँवर कहे बर बैन |
मृदु मुसुकाइ राम बरज्यौ प्रिय बन्धु नयनकी सैन ||
कौसिक कह्यो, उठहु रघुनन्दन, जगबन्दन, बलाइन |
तुलसिदास प्रभु चले मृगपति ज्यौं निज भगतनि सुखदैन ||
गीतावली पद 81 से 90 तक/पृष्ठ 10
90
जबहिं सब नृपति निरास भए |
गुरुपद-कमल बन्दि रघुपति तब चाप-समीप गए ||
स्याम-तामरस-दाम-बरन बपु, उर-भुज-नयन बिसाल |
पीत बसन कटि, कलित कण्ठ सुन्दर सिन्धुर-मनिपाल ||
कल कुण्डल, पल्लव प्रसून सिर चारु चौतनी लाल |
कोटि-मदन-छबि-सदन बदन-बिधु, तिलक मनोहर भाल ||
रुप अनूप बिलोकत सादर पुरजन राजसमाज |
लषन कह्यो थिर होहु धरनिधरु, धरनि, धरनिधर आज ||
कमठ, कोल, दिग-दन्ति सकल अँग सजग करहु प्रभु-काज |
चहत चपरि सिव-चाप चढ़ावन दसरथको जुबराज ||
गहि करतल, मुनि-पुलक सहित, कौतुकहि, उठाइ लियो |
नृपगन-मुखनि समेत नमित करि सजि सुख सबहि जियो ||
आकरष्यो सिय-मन समेत हरि, हरष्यो जनक-हियो |
भञ्ज्यो भृगुपति-गरब सहित, तिहुँ लोक-बिमोह कियो ||
भयो कठिन कोदण्ड-कोलाहल प्रलय-पयोद समान |
चौङ्के सिव, बिरञ्चि, दिसिनायक, रहे मूँदि कर कान ||
सावधान ह्वै चढ़े बिमाननि चले बजाइ निसान |
उमगि चल्यौ आनन्द नगर, नभ जयधुनि, मङ्गलगान ||
बिप्र-बचन सुनि सुखी सुआसिनि चलीं जानकिहि ल्याइ |
कुँवर निरखि, जयमाल मेलि उर कुँवरि रही सकुचाइ ||
बरषहिं सुमन, असीसहिं सुर-मुनि, प्रेम न हृदय समाइ |
सीय-रामकी सुन्दरतापर तुलसिदास बलि जाइ ||
गीतावली पद 91 से 100 तक/पृष्ठ 1
091
.रागमलार
जब दोउ दसरथ-कुँवर बिलोके |
जनक नगर नर-नारि मुदित मन निरखि नयन पल रोके ||
बय किसोर, घन-तड़ित-बरन तनु नखसिख अंग लोभारे |
दै चित, कै हित, लै सब छबि-बित बिधि निज हाथ सँवारे ||
सङ्कट नृपहि, सोच अति सीतहि, भूप सकुचि सिर नाए |
उठे राम रघुकुल-कुल-केहरि, गुर-अनुसासन पाए ||
कौतुक ही कोदण्ड खण्डि प्रभु, जय अरु जानकि पाई |
तुलसिदास कीरति रघुपतिकी मुनिन्ह तिहूँ पुर गाई ||
गीतावली पद 91 से 100 तक/पृष्ठ 2
092.रागटोड़ी
मुनि-पदरेनु रघुनाथ माथे धरी है |
रामरुख निरखि लषनकी रजाइ पाइ,
धरा धरा-धरनि सुसावधान करी है ||
सुमिरि गनेस-गुर, गौरि-हर भूमिसुर,
सोचत सकोचत सकोची बानि धरी है |
दीनबन्धु, कृपसिन्धु साहसिक, सीलसिन्धु,
सभाको सकोच कुलहूकी लाज परी है ||
पेखि पुरुषारथ, परखि पन, पेम, नेम,
सिय-हियकी बिसेषि बड़ी खरभरी है |
दाहिनोदियो पिनाकु, सहमि भयो मनाकु,
महाब्याल बिकल बिलोकि जनु जरी है ||
सुर हरषत, बरषत फूल बार बार,
सिद्ध-मुनि कहत, सगुन, सुभ घरी है |
राम बाहु-बिटप बिसाल बौण्ड़ी देखियत,
जनक-मनोरथ कलपबेलि फरी है ||
लख्यो न चढ़ावत, न तानत, न तोरत हू,
घोर धुनि सुनि सिवकी समाधि टरी है |
प्रभुके चरित चारु तुलसी सुनत सुख,
एक ही सुलाभ सबहीकी हानि हरी है ||
गीतावली पद 91 से 100 तक/पृष्ठ 3
093.रागसारङ्ग
राम कामरिपु-चाप चढ़ायो |
मुनिहि पुलक, आनन्द नगर, नभ निरखि निसान बजायो ||
जेहि पिनाक बिनु नाक किए नृप, सबहि बिषाद बढ़ायो |
सोइ प्रभु कर परसत टुट्यो, जनु हुतो पुरारि पढ़ायो ||
पहिराई जयमाल जानकी, जुबतिन्ह मङ्गल गायो |
तुलसी सुमन बरषि हरषे सुर, सुजस तिहू पुर छायो ||
गीतावली पद 91 से 100 तक/पृष्ठ 4
094.रागटोड़ी
जनक मुदित मन टूटत पिनाकके |
बाजे हैं बधावने, सुहावने मङ्गल-गान,
भयो सुख एकरस रानी राजा राँकके ||
दुन्दुभी बजाइ, गाइ हरषि बरषि फूल,
सुरगन नाचैं नाच नायकहू नाकके |
तुलसी महीस देखे दिन रजनीस जैसे,
सूने परे सून-से मनो मोटाए आँकके ||
गीतावली पद 91 से 100 तक/पृष्ठ 5
095
लाज तोरि, साजि साज राजा राढ़ रोषे हैं |
कहा भौ चढ़ाए चाप, ब्याह ह्वै है बड़े खाए,
बोलैं, खोलैं सेल, असि चमकत चोखे हैं ||
जानि पुरजन त्रसे, धीर दै लषन हँसे,
बल इनको पिनाक नीके नापे-जोखे हैं |
कुलहि लजावैं बाल, बालिस बजावैं गाल,
कैधौं कूर कालबस, तमकि त्रिदोषे हैं ||
कुँवर चढ़ाई भौंहैं, अब को बिलोकै सोहैं,
जहँ तहँ भे अचेत, खेतके-से धोखे हैं |
देखे नर-नारि कहैं, साग खाइ जाए माइ,
बाहु पीन पाँवरनि पीना खाइ पोखे हैं ||
प्रमुदित-मन लोक-कोक-नद कोकगन,
रामके प्रताप-रबि सोच-सर सोखे हैं |
तबके देखैया तोषे, तबके लोगनि भले,
अबके सुनैया साधु तुलसिहु तोषे हैं ||
गीतावली पद 91 से 100 तक/पृष्ठ 6
096
जयमाल जानकी जलजकर लई है |
सुमन सुमङ्गल सगुनकी बनाइ मञ्जु,
मानहु मदनमाली आपु निरमई है ||
राज-रुख लखि गुर भूसुर सुआसिनिन्ह,
समय-समाजकी ठवनि भली ठई है |
चलीं गान करत, निसान बाजे गहगहे,
लहलहे लोयन सनेह सरसई है ||
हनि देव दुन्दुभी हरषि बरषत फूल,
सफल मनोरथ भौ, सुख-सुचितई है |
पुरजन-परिजन, रानी-राउ प्रमुदित,
मनसा अनूप राम-रुप-रङ्ग रई है ||
सतानन्द-सिष सुनि पाँय परि पहिराई,
माल सिय पिय-हिय, सोहत सो भई है |
मानसतें निकसि बिसाल सुतमालपर,
मानहुँ मरालपाँति बैठी बनि गई है ||
हितनिके लाहकी, उछाहकी, बिनोद-मोद,
सोभाकी अवधि नहि अब अधिकई है |
याते बिपरीत अनहितनकी जानि लीबी
गति, कहै प्रगट, खुनिस खासी खई है ||
निज निज बेदकी सप्रेम जोग-छेम-मई,
मुदित असीस बिप्र बिदुषनि दई है |
छबि तेहि कालकी कृपालु सीतादूलहकी
हुलसति हिये तुलसीके नित नई है ||