श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

उपासना ।

भाग 1 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 1 · अध्याय 3 / 4

उपासना ।

युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो। भूयिष्ठान्ते नम उक्तिं विधेम॥ (शु॰ यजु॰ सं॰)

उड़ें टेढ़ी बांकी ये चालाकियां सब। रहे ढाल तलवार इक आप ही अब॥

मन को देव के 'पास बिठाना' उपासना है, अथवा उपासना उस अवस्था का नाम है जहां रोम रोम में राम रच जाय, मन अमृत में भीग जाय, दिल आनन्द में डूब जाय। इसके तीन दर्जे हैं, जैसे पत्थर की शिला का गंगा में शीतल हो जाना, कपड़े की गुड़िया का अन्दर बाहर जल में निचुड़ने लग जाना, और मिसरी की डली का गंगा रूप हो जाना। कभी कभी भजन, ध्यान, आराधना, अनुसन्धान आदि भी इसी को कहते हैं, सीधी सादी चाल चलन में ईश्वर को याद (स्मरण) करना उपासना है।

खबरदार, भूलने न पाय! पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् । प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ॥ (गीता)

अटल नियमः-पाठक! बहुत बातों से क्या लाभ? एक ही लिखते हैं आवरण में लाकर परतालो, ठीक न हो तो लेखक के हाथ काट देना और जिह्वा निकाल डालना। ज़रा कान खोल कर सुन लो और दिल की आंख खोल कर पढ़ लो। प्यारे, कूप में कूद कर नीचे न गिरना तो कदाचित हो.

भी सके, परन्तु जगत के किसी पदार्थ की चाह में पड़ कर क्लेश से बच जाना कभी नहीं हो सकता। सूर्य उदय हो और प्रकाश न फैले यह तो कदाचित् हो भी जाय, परन्तु चित्त में पवित्र भाव और ब्रह्मानन्द होने पर भी शक्ति, श्री आदि मानो हमारी पानी भरने वाली दासी न हो जांय, कभी नहीं हो सकता, कभी नहीं। मीनार पर चढ़ कर नक्कारे की चोट पुकार दोः—

सत्यमेव जयते नानृतम्' ॥ [मुण्ड॰ उप॰] सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ॥ [तैत्ति॰ उप॰]

वह सत्य क्या है?

तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचोविमुञ्चथ ॥ [मुण्ड॰ उप॰]

बस एक आत्मज्ञान है अमृत रस की खान। और वांत एक एक वचन भक भक मरना जान॥

नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥ [श्वेत॰ उप॰] ज्ञात्वा तं मृत्युमत्येति नान्यः पन्था विमुक्तये ॥ मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ [कठ॰ उप॰]

असन्नेव स भवति। असद्ब्रह्मेति वेद चेत् ॥ अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद ॥ सन्तमेनं ततो विदुः ॥ [तैत्ति॰ उप॰]

कभी न छूटे पीड़ दुःख से जिसे ब्रह्म का ज्ञान नहीं॥ जे नर राम नाम लिव नाहीं सो नर खर कुक्कुर सूकर सम। वृथा जियें जग माहीं॥ [तुलसीदास] सूर सुजान सपूत सुलक्षण गणियत गुण गनआहीं। बिन हरि भजन इंदारुण के फल तजत नहीं करुआई॥ सो संगति जल जाय कंथा नहीं राम की।

बिन खेती के वाड़ भला किस काम की॥ जो नयन कि वे नीर हैं वे नूर भले हैं॥ लक्ष।

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥ [कठ॰ उप॰]

शरीर रूपी बग्गी में जीवात्मा ने बैठ कर, बुद्धि रूपी लगाम द्वारा मन की लगाम डोरी से इन्द्रियों के घोड़ों को हांकते २ आखर जाना कहां है? "विष्णोः परमं पदम्"

लक्ष तो ब्रह्म तत्व है, ब्रह्म साक्षात्कार बगैर सरेगी नहीं, अनात्म दृष्टि दुःखरूप है। खुशी खुशी (उत्साहपूर्वक) चित्त में स्नेह मोह आदि रखते हो? भैय्या! काले नाग को गोद में दूध पिला २ कर मत पालो। सत्य स्वरूप एक परमात्मा को छोड़ और कोई विचार मन में रखते हो? बन्दूक की गोली कलेजे में क्यों नहीं मार लेते, मार्ग में कहां तक डेरे डालोगे? रास्ते में कहां तक महमानियां खाओगे? यहां दुनिया सराय में क्या तो नहीं बैठी हुई? आराम अगर भालते हो तो चलो राम के धाम में।

उपासना की आवश्यकता।

यस्तु विज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा। तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः॥ [कठ॰ उप॰]

विज्ञान रहित, अयुक्त मन वाले की इन्द्रियां बेवस विगड़े घोड़ों की तरह मंजल तक पहुंचना तो कहां रथ को और रथ में बैठे को, कुओं और गढ़ों में जा गिराते हैं, जहां रोना और दांत पीसना होता है। यदि इसी जन्म के घोर रौरव से बचना इष्ट हो, तो घोड़ों को सिधाना और सीधी राह पर चलाना रूपी यमनियम की आवश्यकता है। पर लाख यत्न.

कर देखो जब तक तुम्हारा सा‌इस (सारथी) धुंदली आंखों वाला काना सा है तब तक कीचड़ में डूबोगे, और रेत में धँसोगे, गढ़ों में गिरोगे, चोटें खाओगे, चिल्लाओगे। बावा! सांसारिक बुद्धि को सारथी बनाना दुःख ही दुःख पाना है। अब बात सुनो, फतह (जय) इसी में है कि अपनी मन रूपी वागडोरी दे दो, दे दो उस कृष्ण के हाथ, बस फिर कोई ख़तरह नहीं, वह इस संसार रूपी कुरुक्षेत्र से जय के साथ लेही निकलेगा। रथ हांकने में तो वह प्रसिद्ध उस्ताद है। आवश्यकता है हरि को, रथ, घोड़े और वागें सौंप कर पास बिठाने अर्थात् उपासना की।

"सर्वे धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वे पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः"॥ "संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते" [गीता]

पदार्थकामना और विषयवासना से सर्व साधारण पुरुषों की वह गति होती है, जैसे जल में पड़े हुए तुम्बे की, आंधी और अविध के अधीन होगी। ऐसे अनर्थ का हेतु विषयसंग तो हर वक्त ही रहे, और इस रोग की निवारक औपधि (उपासना, अनुसंधान) कभी न की जाय तो ऐसी आत्महत्या के बदले अवश्य,

असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः॥ [ईश॰ उप॰]

में दारुण दुःख सहने ही पड़ेंगे। यदि कांटों पर पड़ जाने से परमेश्वर याद आता हो, तो प्यारे जब देखो कि संसार के कामधधों में उलभ कर राम भूलने लगा है, फट पट अपने तई नुकीले कांटों पर गिरा दो, और कुछ नहीं तो पीड़ के बहाने याद आ ही जायगा, परदे में रोना, दिल को पीटना, छिप कर डाढ़ें मारना भी अवश्य फ़ायदा करेगा।

उपासना दो प्रकार की

प्रसिद्ध हैः-प्रतीक और अहंग्रह।

प्रतीक उपासना में बाहर के पदार्थों में पदार्थदृष्टि हटा कर ब्रह्म को देखना होता है। अहंग्रह उपासना में अपने अन्दर जो अहंता ममता कल्प रक्खी है उससे पहला छुड़ा कर ब्रह्महीब्रह्म देखना होता है। यदि बाहर के प्रतीक को सत्य जान कर ईश्वरकल्पना उसमें की जाय, तो वह ईश्वर उपासना नहीं तिमिरपूजा ('बुतपरस्ती) है। इसी पर व्यास जी के ब्रह्ममीमांसा दर्शन के अध्याय 4 पाद 1 सूत्र 5 में यूं आज्ञा की है।

ब्रह्म दृष्टिरुत्कर्षात् ॥

अर्थात् प्रतीक में ब्रह्मदृष्टि हो, ब्रह्म में प्रतीक भावना मत करो। और अहंग्रह उपासना के सम्बन्ध में यूं लिखा है।

आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राहयन्ति च ॥

ब्रह्ममीमांसा 4. 1. 3.

अर्थात् ब्रह्म को अपना आत्मा (अपना आप) वारंवार चिन्तन करो। वेद का यही मत है और यही उपदेश। इन दोनों प्रकार की उपासना में अभिप्राय और लक्ष्य एक ही है, वह क्या?

सर्वे खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत ॥ [छां॰ उप॰]

ठंडी छाती से अन्दर बाहर ब्रह्महीब्रह्म देखो।

अथ खलु क्रतुमयः पुरुषः ॥ [छां॰ उप॰]

जैसा भी पुरुष का विचार और चिन्तन रहता है वैसा ही वह अवश्य हो जाता है, तो ब्रह्मचिन्तन ही क्यों न दृढ़ किया जाय, अर्थात् अपने आप को ब्रह्मरूप ही क्यों न.

ते रहें। इसी पर श्रुति का वचन है, "ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति" ॥ [मुण्ड॰ उप॰]

अहंग्रह और प्रतीक उपासना दोनों में नामरूप संसार (व्युत) को ढाना इष्ट होता है बनाना नहीं। जल ब्रह्म है, स्थल ब्रह्म है, पवन ब्रह्म है, आकाश ब्रह्म है, गंगा ब्रह्म है इत्यादि प्रतीक उपासना के रूपदर्शक वाक्यों में जल, स्थल, पवन, आदि के साथ ब्रह्म को कहीं जोड़ना (संकलन करना) नहीं है। जैसे यह सर्प काला है, इसमें सर्प भी रहे हैं और काला भी। किन्तु यहां तो बाध समानाधिकरण का है, जैसे किसी भ्रांति वाले को कहें यह सर्प रस्सी है, यहां रस्सी काले रंग की तरह सर्प के साथ समान सत्ता वाली नहीं है, किन्तु रस्सीही है सर्प है नहीं। इसी तरह सच्ची उपासना वह है कि धारारूप जल दृष्टि में न रहे, ब्रह्म चित्त में समा जाय, स्पंदरूप पवन दृष्टि से गिर जाय, ब्रह्मसत्ता मात्र ही भान हो, प्रतिमा में प्रतिमापन उड़ जाय, चैतन्य स्वरूप भगवान् की झांकी हो। जैसे किसी प्रेम के मतवाले घायल ने प्यारे का प्रेमपत्र पढ़ा, उसकी दृष्टि तो प्यारे के स्वरूप से भर गई, अब पत्र किसको दीख पड़े। (गोपियां उद्धव को कहती हैं, यह पाती अब कहां रक्खें, छाती से लगाती हैं तो जल जायगी, आंखों पर धरती हैं तो गल जाँयगी।) उपासना में मग्न के लिये इन्द्रियज्ञान तो एक छेद जैसी रह जायगी। प्यारे ने चुटकी भरी, चुटकी वस्तुतः कोई चीज़ नहीं है, प्यारेही वस्तु रूप है। इसी तरह सब इन्द्रियों का ज्ञान एकही एक प्यारे की छेड़छाड़ रूप प्रतीत होगाः—

आई पवन जप ठुम ठुमक, लाई बुलावा श्याम का॥ भाई, उपासना तो इसी का नाम है जिसमें जवान ने तो.

क्यों हिलना है, शरीर की हड़ी और नाड़ी तक के परमाणु हिल जाँय। यह नहीं तो, आंख मूंदो, नाक मूंदो, कान मूंदो मुख मूंदो, गाओ चाहे चिल्लाओ, तुम्हारी उपासना बस एक चित्ररूप है, जिस में जान नहीं। बड़ा सुन्दर चित्र सही, रविवर्मा का मान लो, पर खाली तसवीर से क्या है?

पदार्थों में इस ब्रह्मदृष्टि को दृढ़ करना और विषय भावना का मिटाना रूपी उपासना, कुछ वैसा अध्यारोप (कल्पना) शक्ति को बढ़ाना और वर्तना न जान लेना, जैसा शतरंज में काठ के टुकड़ो को बादशाह, वज़ीर, हाथी, घोड़ा, प्यादा मान लेते हैं। जल ब्रह्म है, आकाश ब्रह्म है प्राण ब्रह्म है, अग्नि ब्रह्म है, मन ब्रह्म है इत्यादि उपासना के रूप तो अवस्तु को मिटाकर वस्तुभावना जमाते हैं। यदि यह खाली मान लेना और कल्पनामात्र भी हो तो वैसी कल्पना है, जैसे बालक गुरुजी के कहने से गुणा करने और भाग देने की रीति को मान लेता है। भाग देने और गुणा करने की यह विधि क्यों ऐसी है और क्यों नहीं, और इस रीति द्वारा उत्तर के ठीक आजाने में कारण क्या है, यह बातें तो पीछे आयगी जब बीजगणित (अलजबरा) पढ़ेगा। परन्तु उस गुरु (रीति) पर विश्वास करने से उदाहरण सब अभी ठीक निकलने लग पड़ेंगे। पर खवरदार! गुरुजी के बताए हुए गुरु (रीति) को ही और का और समझकर मत याद करो।

प्रतिमा क्या है? जिससे मान निकाला जाय, मापा जाय, तोला जाय, (unit of measurement)। जब तोलने का बट्टा छोटा हो तो तोल का मान बड़ा होता है। जैसे तोलने का बट्टा एक पाव होने पर यदि किसी चीज़ का मान चार हो तो बट्टा एक छटांक होने पर मान सोलह होगा।

अब हिंदूधर्म के यहां प्रतीक और प्रतिमा क्या थे? ईश्वर को तोलने का बट्टा। हिंदूधर्म में अति उच्च सूर्य, चन्द्रमा रूपी प्रतीक भी हैं। इससे उतर कर गुरु ब्राह्मण रूप हैं, गौ गरुड़ रूप भी, अश्वत्थ वृन्दा रूप भी, कैलास गंगा रूप भी और ठिगने से गोलमोल काले पत्थर को भी प्रतिमा (प्रतीक) रूप स्थापित कर दिया है। यह छोटे से छोटा प्रतीक क्या परमेश्वर को तुच्छ बनाने के लिये था? नहीं जी, प्रतीक का छोटा करना इस लिये था, कि ईश्वरभाव और ब्रह्मदृष्टि का समुद्र यह निकले, जब उस नन्हे से पत्थर को भी ब्रह्म देखा, तो बाक़ी अखिल पदार्थ और समस्त जगत् तो अवश्यमेव ब्रह्मरूप भान हुआ चाहिये। परन्तु जिसने मूर्तिपूजा इस समझ से की, कि यह ज़रा सा पत्थर ही ब्रह्म है, वह हो गया "पत्थर का कीड़ा"।

परा पूजा।

पदार्थ के आकार, नाम रूप आदि से उठ कर उसके आनन्द और सत्ता अंश में चित्त जमाना, पद या शब्द से उठ कर, उसके अर्थ में जुड़ने की तरह चर्मचक्षु से दृश्यमान सूरत को भूल कर ब्रह्म में मग्न होना रूपी जो उपासना है, क्या यह किसी न किसी नियत प्रतीक द्वारा ही करना चाहिये? प्रतीक तो बच्चे को पाटि की तरह है, उस पर जब लिखने का हाथ पक गया तो चाहे जहां लिख सके। ब्रह्मदर्शन की रीति आ गई, तो जहां दृष्टि पड़ी ब्रह्मानन्द लूटने लगे। प्रतीक उपासना तब सफल होती है जब वह हमें सर्वत्र ब्रह्म देखने के योग्य बना दे। सारा संसार मन्दिर बन जाय, हर पदार्थ राम की झांकी करादे, और हर किया पूजा हो जाय।

जेता चलूं तेती प्रदखना; जो कुछ करूं सो पूजा।

गृह उद्यान एक सम जान्यो, भाव मटाइयो दूजा॥

सच्ची और जीती उपासना जिनके अन्दर यौवन को प्राप्त होती है, उनकी अवस्था श्रुति (तैत्तिरीय शाखा) यूं प्रतिपादन करती है।

यावद्भ्रियते सा दीक्षा, यदश्नातितद्धविः यत्पिबति तदस्य सोमपानं, यद्रमते तदुपसदः यत्संचरत्युपविशत्युत्तिष्ठते च प्रवर्ग्यो, यन्मुखं तदाहवनीयो, याव्याहृतिराहुतिर्यदस्य विज्ञानं तज्जुहोति [नारा॰ उप॰]

मुक्ति, शांति और सुख चाहो, तो भेदभाव का मिटाना और ब्रह्मदृष्टि का जमाना ही एक मात्र साधन है।

यह दृष्टि क्यों आवश्यक है? क्योंकि वस्तुतः यही वार्ता है, "ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या।"

अगर गर्मी, भाप, बिजली आदि के कानूनों के अनुसार रेल, तार, बैलून आदि यन्त्र बनाओगे तो चल निकलेंगे, और कानून को भुलाकर लाख यत्न करो, अंधेरी कोठरी से कहां निकल सकते हो? अब देखो, यह अध्यात्मक कानून (अभेद भावना) तो तत्वविज्ञान (साईंस) के सब नियमों का नियम है, जो वेद में दिया है। इसे बर्ताव में लाते हुए क्योंकर सिद्धि हो सकती है? अमरीका के महात्मा इमरसन (Emerson) ने अपने निज के प्रतिदिन की अनुभूत परीक्षा (रूहानी तजरबे) को पक्षपात रहित देख देख कर क्या सच कह दिया है "किसी वस्तु को दिल से चाहते रहना, अथवा दांत निकाल कर अधीन भिखारी की तरह दूसरे की प्रीति का भूखा रहना, यह पवित्र प्रेम नहीं है। यह तो अधम नीच मोह है। केवल जब तुम मुझे छोड़ दो, और खोदो और उस उच्च भाव में उड़ जाओ जहां न मैं रहूं न तुम, मुझे खिंच.

कर तुम्हारे पास आना पड़ता है, और तुम मुझे अपने चरणों में पाओगे। जब तुम अपनी आंखें किसी पर लगादो, और प्रीति की इच्छा करो, तो उसका उत्तर तिरस्कार और अनादर बिना कभी और कुछ नहीं मिला, न मिलेगा, याद रक्खो"।

भाई! इसमें पंचायती झगड़ों की क्या आवश्यकता है? हाथ कंगन को आरसी क्या है! अगर क्लेशरूपी मौत मंजूर नहीं तो शांतिपूर्वक अपने चित्त की अवस्था और उसके दुःखसुखरूपी फल पर एकांत में विचार करना आरम्भ करदो, सच झूठ आप निथर ही आयगा। अगर तुममें विचार-शक्ति रोगग्रस्त नहीं है, तो खुदबखुद यह फ़ैसला करोगे कि चित्त में त्याग की अवस्था और ब्रह्मानन्द हुए ऐश्वर्य, सौभाग्य इस तरह हमारे पास दौड़ते आते हैं, जैसे भूखे बालक मां के पासः—

यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते॥ [सामवेद्]

जब हमारे अन्दर सच्चा गुण और शांति रूपी विष्णु होगा, तो लक्ष्मी अपने पति की सेवा हज़ारों में, हमारे दरवाज़े पर अपने आप पड़ी रहेंगी। कई मनुष्य शिकायत करते हैं कि भक्ति और धर्म करते करते भी दुःखदरिद्र उन्हें सताते हैं और अधर्मी लोग उन्नति करते जाते हैं। यह दुःखिया भूलेभाले कार्य-कारण के निर्णय करने में अन्वयव्यतिरेक को नहीं बरतते रहे। इन को यह मालूम ही नहीं कि धर्म क्या है और भक्ति क्या। स्वार्थ और ईर्ष्या (देहाभिमान) को तो उन्होंने छोड़ा ही नहीं जिसका छोड़ना ही धर्म को आचरण में लाना था, अब उनका यह मिला कि धर्म को बरतते बरतते दुःख में डूबे हैं, क्योंकर युक्त वा सत्य हो सकता है? अगर धर्म को बरता होता, तो यह शिकायत जिसमें स्वार्थ और ईर्ष्या दोनों मौजूद हैं कभी न करते। वे दान और भजन भी धर्म में शामिल नहीं हो

सकते, जिनसे अहंकार और अभिमान बढ़ जाय। जहां पापी फलता फूलता पाते हो वहां सुखभोग का कारण ढूंढो तो उस पुरुष का चित्त आत्माकार और एकांत रहा था, जो तुम ने देखा नहीं और उसके पापकर्म का परिणाम खोजो तो महा क्लेश होगा जो अभी तुमने देखा नहीं।

तुम पर किसी ने व्यर्थ अत्याचार किया है, तो अहंकार-रहित हो कर पक्षपात छोड़ कर तुम अपना अगला पिछला हिसाब विचारो। तुमको चाबुक केवल इसलिये लगा कि तुमने कहीं अयुक्त रजोगुण में दिल दे दिया था, आत्मसन्मुख नहीं रहे थे, राम के कानून को तोड़ बैठे थे। मन के ब्रह्माकार न रहने से यह सज़ा मिली, अब उस अनर्थकारी वैरी से जो बदला लेने और लड़ने लगे हो, ज़रा होश में आओ कि अपनी पहली भूल को और भी चौगुणा पांचगुणा कर के बढ़ा रहे हो, और प्रति क्रिया से उस अपराधीरूप जगत् के पदार्थ को सत्य बना रहे हो और ब्रह्म को मिथ्या।

बच्चा! याद रक्खो, पैठो तो सही, उड़द के आटे की तरह मुक्के न खाओ और वार वार पटके न जाओगे तो कहना। प्रायः लोग औरों के क़सूर पर ज़ोर देते हैं और अपने तई बेक़सूर ठहराते हैं। हां प्रत्यगात्मारूप जो तुम हो बिलकुल निष्कलंक ही हो। पर अपने तई शुद्ध आत्मदेव ठाने भी रहो, दुपड़ी और दो-दो क्योंकर बनें? अपने आप की शरीर मन बुद्धि से तादात्मता करनी, और बन कर दिखाना निष्पाप, यही तो घोर पाप है वाक़ी सब पापों की जड़। अब देखो जो रुद्ररूप क़ानून तुमको सत्य स्वरूप आत्मा से विमुख होने पर रुलाए बिना कभी नहीं छोड़ता, वह ईश्वर उस अत्याचारी तुम्हारे वैरी की वारी क्या मर गया है? कोई उस त्र्यम्बक की आंखों में नोन नहीं डाल सकता, पस तुम कौन हो ईश्वर

के क़ानून को अपने हाथ में लेनेवाले? तुम को पराई क्या पड़ी, अपनी निबेड़ तू। बदला लेने का ख़याल विश्वासशून्य नास्तिकपन है।

अरे प्यारे, मेरे अपने आप, हे पामर मूर्ख! जितना औरों को चने चवाए चाहता है, उतना अपने तई ब्रह्मध्यान की खांड खीर खिला। वैरी का वैरीपन एकदम उड़ न जाय तो सही। ब्रह्म है और ब्रह्म को भूल जाना ही दुःख रूप झमेला है। जो तुम्हारे अन्दर है यही सब के अन्दर है।

यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह॥ (कठ॰ उप॰)

जब तुम अन्दरवाले से बिगड़ते हो तो जगत् तुमसे बिगड़ता है, जब तुम अन्दर का अन्तर्यामी रूप बन बैठे तो जगत् रूपी पुतलीघर में फ़साद तो कैसा, किस काठ के टुकड़े से चूं भी हो सकती है?

"यो मनसि तिष्ठन्मनसोऽन्तरो, यं मनो न वेद, यस्य मनः शरीर यो मनोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः"। [बृह॰ उप॰]

जब तुम दिल के मकर छोड़ कर सीधे हो जाओ तो तुम्हारे भूत, भविष्य, वर्तमान, तीनों काल उसी दस सीधे हो जायेंगे।

प्यारे! जैसे कोई मनुष्य मोटा ताज़ा बग्गी में जा रहा हो तो तुम जानते हो कि उसकी मोटाई फ़िटन में के गद्दे तकियों से नहीं आई, उसकी पुष्टाई का कारण हिन्हिनाती दुबली खच्चरें नहीं हैं, बल्कि अन्न को पचाने से शरीर बढ़ा फैला है। इसी तरह जहां कहीं ऐश्वर्य और सौभाग्य देखते हो उसका कारण किसीकी चालाकी, फंदफ़रेब, कभी नहीं हो सकते। क़स्में दिला कर पूछ देखो। जिस हद तक चालाकी फ़न्दफ़रेब बरते गये, उस हद तक ज़रूर हानि (नाकामयाबी)

हुई होगी। आनन्द, सुख का कारण और कुछ नहीं था, सिवाय ज्ञातः अथवा अज्ञातः चित्त में ब्रह्मभाव समाने के। यह अब चाहे तुमने उसको नहीं देखा तो क्या। और वह खुद भी इस बात को भूल गया है तो क्या (बच्चे कई दफ़ा रात को दूध पीते हैं और दिन को भूल जाते हैं) पर भाई, तेल ने तो तिलों ही से आना है। सुख, आनन्द, इनका आना कभी नहीं, कभी नहीं आ सकता बग़ैर आत्माकारवृत्ति रहने के।

यदाचर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः। तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति॥ (श्वेता॰ उप॰)

जब लोग चर्म की तरह आकाश को लपेट सकेंगे तब देव को जाने बिना दुःख का अन्त हो सकेगा।

दृष्टान्त, प्रमाण, दलील अनुमान से तो यह सिद्ध है ही, पर मैं इस समय युक्ति, उक्ति आदि को अपील नहीं करता, मैं तो बहुत नेड़े (समीप) का पता देता हूं। यह तुम हो और यह तुम्हारी दुनिया है। अब देख लो, खूब आंखें खोलो। जब तुम्हारे चित्त में दुनिया के सम्बन्धों की तुलना ईश्वरभाव से अधिक हो जाती है, जब 'मैं, मेरा' भाव चित्त में त्याग और शान्ति को नीचे दबाता है, तो जिस दर्जे तक 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या' रूपी सत्य की आचरण से उपेक्षा करते हो, उसी दर्जे तक दुःख, खेद, क्लेश तुम्हें मिलता है और अन्ध कूप में गिरते हो। वनस्पति (Botany) और रसायणविद्या (Chemistry) की तरह निज के तजरुवा और मुशाहिदा [परीक्षा और विचार (observation and experiment)] से यह सिद्धान्त सिद्ध है।

जगत् में रोग एक ही है और इलाज (औषधि) भी एक ही। चित्त से अथवा क्रिया से ब्रह्म को मिथ्या और जगत् को सत्य जानना, एक यही विपरीत वृत्ति कभी किसी दुःख

में प्रकट होती है, कभी किसी में। और हर विपत्ति की औषधि, शरीर आदि को "है नहीं" समझ कर ब्रह्माग्नि में ज्वाला रूप हो जाना है। लोग शायद डरते हैं कि दुनिया की चीज़ों से प्रेम किया जाय तो प्रेम का जवाब भी पाते हैं, परन्तु परमेश्वर से प्रेम तो हवा को पकड़ने जैसा है, कुछ हाथ नहीं आता। यह धोके का ख़याल है, परमेश्वर के इश्क़ में अगर हमारी छाती ज़रा धड़के, तो उसकी एकदम बंराबर धड़कती है और हमें जवाब मिलता है, बल्कि दुनिया के प्यारों की तरफ़ से मुहब्बत का जवाब तबही मिलता है, जब हम उनकी तरफ़ निराश होकर ईश्वरभाव ही की ओर लेते हैं।

किसी ने कहा लोग तुम्हें यह कहते हैं, कोई बोला लोग तुम्हें वह कहते हैं, कहीं हाकिम बिगड़ गया, कहीं मुकद्दमा आ पड़ा, कहीं रोग आ खड़ा हुआ। अरे भोले महेश! तू इन बातों से अपने तकले में व्यंग न पड़ने दे, भरैं में मत आ, तू एक न मान, ब्रह्म बिना दृश्य कभी हुआ ही नहीं। चित्त में त्याग और ब्रह्मानन्द को भर तो देख, सब बलायें आंख खोलते खोलते सात समुद्रों पार न बह जायँ, तो मुझको समुद्र में डुबा देना।

एक बालक को देखा, दूसरे बालक को धमका रहा था, "आज पिता से तू ऐसा पीटेगा, ऐसा पीटेगा, कि सारी उमर याद पड़ा करे," दूसरे बालक ने शान्ति से उत्तर दिया "अगर वह मुझे मारेंगे तो भले ही को मारेंगे न, तेरे हाथ क्या लगेगा?" इस बालक के बराबर विश्वास तो हम लोगों में होना चाहिये, भयंकर भयानक भावि की भिनक पाकर बगुले की तरह गर्दन उठा कर, घबरा कर, "क्या? क्या?" क्यों करने लगें? आनन्द से बैठ मेरे यार! वहां कोई और नहीं है; तेरा ही परम पिता, बल्कि आत्मदेव है, अगर मारेगा भी

तो भले के लिये। और अगर तुम उसकी मर्ज़ी पर चलना शुरू कर दो तो वह पागल थोड़ा है, कि यूंही पड़ा पीटे।

एकाग्रता में विघ्न।

अपने तई पूरा पूरा और सारे का सारा परमात्मा के हवाले कर देने का मज़ा तब तक तो आ नहीं सकता, जब तक संसार के पदार्थों में कारणत्व-सत्ता का सच्चा भान होता रहेगा, अथवा जब तक ईश्वर हर बात का एक मात्र कारण प्रतीत नहीं होने लगेगा।

[विघ्न 1 — मिथ्या कारण-सत्ता में विश्वास]

अरबी, फ़ारसी, उर्दू में कारण को "सबब" कहते हैं, और अरबी में सबब का पहला अर्थ है "डोरे-रस्सा"। रूम देश का स्वामी ज्वाल (जो उन लोगों की भाषा में 'मौलाना जलाल' नाम से प्रसिद्ध है) लिखता है, "यह कारण-कार्यभाव रूपी रस्सा जो इस जगत् कूप में सब घटों के गले में बँधा पाते हो, यह क्यों फिरता है, इस बेप्राण रज्जु ने तो क्या फिरना था, कूप के सिर पर देव चरखी घुमा रहा है, पर हमें रस्सा ही सब घटियन्त्र को चलाता भान होता है, 'कारणं कारणानां' तो देव ही है।

स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न वाह्यांछब्दांछक्नुयाद् ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः॥ स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य न वाह्यांछब्दांछक्नुयाद् ग्रहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन शङ्खध्मस्य वा शब्दो गृहीतः॥ स यथा वीणायै वाद्यमानायै वाह्यांछब्दांछक्नुयाद् ग्रहणायवीणायै तु ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः॥ [बृह॰उप॰]

जैसे ढोल, मृदंग, शङ्ख, वीणा, हारमोनियम आदि के आवाज़ सब अपने आप ही पकड़े जाते हैं, जब हम इन वाजों वा यन्त्रों को क़ाबू करते हैं इसी प्रकार संसार की 'कार्य-

कारणशक्ति' एकदम हमारे अधीन हो जायगी, जब हम एक परमात्मदेव को पंकी तरह पकड़ लेंगे। किसी बड़े आदमी की सिफ़ारिश, विद्या, बल, धन, माल, मकान आदि को जो अपनी आशापूरण में कारण और हेतु ठान बैठते हो, और आत्मदृष्टि का आश्रय नहीं लेते, धोके में गिरते हो, दुःख पाओगे।

कहते हैं, कृष्ण जब गोपिकाओं का दूध, माखन आदि खाता था तो कुछ दधि आदि घर में बंधे हुए बछड़ों की थोथनी पर लगा देता था। घर वाले लोग अपने ही बछड़ों को चोर समझ कर उन शरीफ़ों को बड़े मारते पीटते और अपनाही नुकसान करते। प्यारे! कारण तो हरज़ात का एक मात्र भगवान् है, वाक़ी कारण तो केवल विट्ठी थोथनीवाले बेचारे बछड़े हैं। बंगले दीवालियों के नाम हज़ारीलाल, लखपतराय, करोड़ीमल आदि रक्खे हुए हैं। क्यों चक्कर में मारे मारे फिरते हो, ऊपर के सांसारिक मिथ्या लिंग हेतु, आदि पर मत भूलो, यह असली कारण नहीं। जब तक लड़की विवाही नहीं जाती तो गुड़ियों से जी बहलाती है। कारणों का कारण रूप परब्रह्म जब मिल सकता है, तो मिथ्या कारणों से जी बहलावा क्यों करना?

भानमती का तमाशा हुआ, पुतलियां नाचती हैं। 'एक ने दूसरी को बुलाया, इस लिये वह आ गई। एक ने दूसरी को पीटा, इसलिये वह मर गई।" इस प्रकार के कार्यकारण भाव पर प्रायः मनुष्य भूल रहे हैं, असली कारण तो एक पुतलीगर (अन्तर्यामी सूत्रधारी) है। गीत या वांशुरी सुनने लगे, एक स्वर के बाद दूसरा स्वर आया, एक शब्द दूसरे शब्द को अवश्य लाया, इन शब्दों और स्वरों का आपस में आवश्यक लगाओ, इस प्रकार के कार्यकारण भाव पर लोग भूल बैठते हैं, असली कारण तो गानेवाला (बंसीधर)

है। एक ऊंचा मक़ान था, "शिखर की मंज़िल का आश्रय क्या है, उससे निचली मंज़िल, और उसका आश्रय उससे नीचे की मंज़िल, फ़र्श की मंज़िल वाक़ी सब का आश्रय और कारण"। इस प्रकार के कार्यकारण सम्बन्ध पर लोग भूल बैठते हैं। असली सजीवित कारण तो इन सब मंज़िलों का मकान बनाने वाला (कर्त्ता हर्त्ता) है।

संसार के कारणों को आशा की आंख से तकना तो खारी समुद्र में डूबते को तिनके का सहारा है। जब गोल चंद्र (कृष्ण) को वहां सुदर्शन तो जुड़ा नहीं, रथ का चक्र उठा करही अपनी प्रतिज्ञा तोड़ ली तो (भीष्म) बुढ़े को भी यह लड़कपन देख बड़ी हँसी आई। अब फिर वही काम न होने पाय। यह चर्मचक्षु से नज़र आने वाले कारण, आश्रय, सहारे, इनको तकना तो अनुचित रथ के चक्र को उठाना है। इनसे क्या बनेगा? तुम अपने असली स्वरूप को तो याद करो, आंखें खोलो, किस चक्कर में पड़े हो, किस भंगड़े में अड़े हो, किस कलकल में फँसे हो। तुम तो वही हो, वही। ज़रा देखो अपने असली सुदर्शन की तरफ़, तुम्हारे भय से सूर्य कांपता है, तुम्हारे डर से पवन चलती है, तुम्हारे खौफ़ से, समुद्र उछलता है, तुम्हारे चाबुक से मौत मारी2 फिरती है।

भीषास्माद्वातः पवते। भीषोदेति सूर्यः। भीषास्मादग्निश्चेन्द्रश्च। मृत्युर्धावति पञ्चमम्॥ (तैत्ति॰उप॰)

यह डर से मेहर* चमका, अहाहाहा अहाहाहा। उधर मह्+ वीम‡ से लपका, अहाहाहा अहाहाहा॥ हवा अटखेलियां करती है मेरे इक इशारे से। है कोड़ा मौत पर मेरा, अहाहाहा अहाहाहा॥ अरे प्यारे! विषयों के वश रहना तो पराधीनता में मरना

*सूर्य। +चन्द्र। ‡पवन।

है, इस बेबसी का जीना तो शरीर को क़बर बना कर मुर्दे की तरह सड़ना है। "निर्ममो निरहंकारः" हुए आत्मज्योति शरीर में से इस प्रकार फैलती है, जैसे फ़ानूस में से प्रकाश। जिस कार्य में ऊपर के लक्षण देख कर अनुमान के आश्रय आशा की फांस में दिल फँसा दिया जाय, वह कार्य कभी नहीं होगा। जिनको अनुमान और लक्षण मान रक्खा है, मनुष्य को मिथ्या संसार में इस प्रकार फँसाते हैं जैसे मछली को मांस की बोटी जाल में (कुंडी में)। जब ऊपरी कारणों को दिल में न जमा कर, स्वार्थांश को त्याग कर, कोई भी कार्य इस भावना से किया जाय, "हे राम! यह तुम्हाराही काम है, तुम्हारा है इस लिये मैं अपना समझता हूं, जो तुम्हारी मर्ज़ी सो मेरी मर्ज़ी, कार्य के होने न होने में मुझे हानि नहीं लाभ नहीं, मेरा आनन्द तो केवल तुम्हारे साथ अभेद रहने में है, काम को यदि सँवार दो तो वाह वाह! बिगाड़ दो तो वाह वाह!" जब सच्चे दिल से यह भावना और यह दृष्टि हो, तो क्या दुनिया और दुनिया के क़ानूनों की शामत आई है कि चाकरों की तरह तत्काल सब काम न करते जांय। भला राम के काम में भी अटकाव हो सकता है? भगवद्गीता के मध्य में जो श्लोक कि गीता को आधा इधर और आधा उधर गुरुत्वकेन्द्र (centre of gravity) की तरह तोल देता है, यह हैः—

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ अ॰9।22

भगवान् का यह तमस्सुक (इक़रारनामा) तबभी झूठ नहीं होगा जब अग्नि की ज्वाला नीचे को बहने लगे, और सूर्य पश्चिम से उदय होना आरंभ करदे और पूर्व में अस्त।

यार! मनुष्य जन्म पाकर भी हैरान और शोकातुर रहना

बंदी उम्रे (हऊज़ा) की बात है। शोक चिन्ता में वे डूबे, जिनके भाई मर जाते हैं, तुम्हारा राम तो सदा जीता है, क्या ग़म! ज़रा तमाशा तो देखो, छोड़ दो शरीर की चिन्ता को, मत रक्खो किसी की आशा, परे फेंको वासना कामना, एक आत्मदृष्टि को दृढ़ रक्खो, तुम्हारी ख़ातिर सब के सब देवता लोहे के खंबे भी घास लेंगे॥

रुद्रं ब्राह्मं जनयन्तो देवा अग्रे तदब्रुवन्। यस्त्वेवं ब्राह्मणो विद्यात्तस्य देवा असन्वशे॥ (शुं॰ यजु॰ अ॰16)

सर्वैरेवं भूतान्यभिचरन्ति॥ (बृह॰ उप॰) सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति॥ (तैत्ति॰ उप॰)

न पश्यो मृत्युं पश्यति, न रोगं, नोत दुःखतां, सर्वं ह पश्यः पश्यति, सर्वमाप्नोति सर्वशः॥ (छां॰ उप॰)

कोई दुर्संगध शब्दों में तो वेद ने कहा ही नहीं "जब सर्वात्म दृष्टि हुई तब रोग, दुःख, और मौत पास नहीं फड़क सकते; आत्मा को जाने क्या नहीं जाना जाता, और हर प्रकार से हर पदार्थ मिल जाता है।

[विघ्न २ — द्वेष दृष्टि]

आनन्दधाम को विघ्न बला तो वैरी विरोधी का ख़याल डाकू रूप होकर विश्व को ले उड़ा। यूरप में एक दिन एक तत्वविज्ञान का लायसेंस डाक्टर (आचार्य) अपने पास आने वालों की कुछ निन्दा सी करने लगा। उससे पूछा कि "आप शिकायत करते हैं?" तो बोला, "नहीं, मैं उनके चित्त की आन्तरात्म दशा पर विचार करता हूं" (I study the psychology of their minds) दुनिया में हम लोग बराबर यही तो करते हैं। द्वेषदृष्टि (और दुष्ट भाव) को कोई श्रेष्ठ सा नाम देकर आंखों पर पट्ट डाल लिया, और इस सर्पिणी को बराबर छाती से लगाय फिरे।

जब कहा गया "प्यारे डाक्टर! सम्बन्धवालों की

अध्यात्म दशा अकेली विचार के योग्य नहीं होती। अपनी आभ्यन्तर दशा भी उसके साथ साथ विचारणीय है। साधी जो बिगड़े चित्तवाले मिले हैं, तो क्या आजकल आप की आभ्यन्तर अवस्था बिलकुल दूषणरहित थी?" डाक्टर आदमी था सच्चा, कुछ देर चुप रहकर विचार करके बोला, "स्वामिन्! कहते तो बिलकुल सच हो" वास्तव में जैसा मेरा चित्त होता है, वैसे चित्र और स्वभाव मेरे पास आकर्पित हो जाते हैं, औरों की अवस्था पर भला बुरा चिन्तवन करते रहने से कभी झगड़ा निपटता भी नहीं, उन लोगों को क्या पकड़ूं, सब मनों का मन मैं हूं, सब चित्तों का चित्त मैं हूं। अन्दर से ऐसी एकता है कि अपने तई शुद्ध करते ही सब शुद्ध ही शुद्ध पाता हूं। समीप का इलाज (अपने तई ब्रह्ममय कर देना) तो हम करते नहीं, दूर के बंदोबस्त (औरों के सुधार) को दौड़ते हैं। न यह होता है न वह। ईश्वरदर्शन तो तब मिलेगा जब सांसारिक दृष्टि से प्रतीयमान वैरी विरोधी निन्दक लोगों को क्षमा करते हम इतनी देर भी न लगांय जितना श्री गंगा जी तिनकों को बहा लेजाने में लगाती है, या जितनी आलोक किरणें अंधकार के उड़ाने में लगाती है।

जब तक सर्व पदार्थों में *सम बुद्धी नहीं होती तब तक समाधि कैसी? विषम दृष्टि रहते, योगसमाधि और ध्यान तो कहां धारणा भी होनी असम्भव है। सम दृष्टि तब होगी जब लोगों में भलाई बुराई की भावना उठ जाय। और यह क्यों कर उठे? जब लोगों में भेदभावना उठ जाय, और पुरुषों को ब्रह्म से भिन्न मान कर जो अच्छा बुरा कल्पना कर रक्खा है, न करें। समुद्र में जैसे तरंगें होती हैं कोई छोटी कोई बड़ी, कोई ऊंची कोई नीची, कोई तिर्छी कोई

*समान बुद्धि अर्थात् सम दृष्टि।

सुखी, उनकी सत्ता समुद्र से अलग नहीं मानी जाती, उनका जीवन भिन्न नहीं जाना जाता। इसी तरह अच्छे बुरे आदमी, और अमीर ग़रीब लोग तो तरंगें हैं, जिनमें एकही ब्रह्म समुद्र ठाढ़ें मार रहा है, अहाहा! अच्छे बुरे पुरुषों में जब हमारी जीवदृष्टि उठ जाय और उनको ब्रह्मरूपी समुद्र की लहरें जान लें; तो रागद्वेष की अग्नि बुझ जायगी और छाती में ठंडक पड़ जायगी। जो लहर ऊंची चढ़ गई है, वह अवश्य नीचे गिरनी है, इसी तरह जिस पुरुष में खोटापन समा गया है, उसे अवश्य दुःख पानाही है। परन्तु लहरों के ऊंच और नींच भाव की प्राप्त होते रहने पर भी समुद्र की पृष्ठ को-क्षितिजधसतल (horizontal) ही माना है। इसी तरह वीचरूप लोगों के कर्म और कर्मफल को प्राप्त होते रहने पर भी ब्रह्मरूपी समुद्र की समता में फ़र्क नहीं पड़ता। लहरों का तमाशा भी क्या सुखदायी और आनन्दवर्द्धक होता है, पर हां जो पुरुष उनसे भीग जाय या डूवने लगे, उसके लिये तो उपद्रवरूप है। समुद्रदृष्टि होने से सम धी और समाधि होगी।

उपासना की जान समर्पण और आत्मदान है, यदि यह नहीं तो उपासना निष्फल और प्राणरहित है। भाई! सच पूछो तो हर कोई लेने का यार है। जब तक तुम अपनी खुदी और अहंकार को परमेश्वर के हवाले न करोगे, तो तुम्हारे पास बैठना तो कैसा, तुमसे कोसों भागता फिरेगा, जैसे कृष्ण भगवान् कालयवन से। उस आंखों वाले प्रज्वलित हृदय सूरदास ने विलविलाते बच्चे की तरह क्या ज़ोर से सच कहा है।

किन तेरो गोविन्द नाम धयौ॥

लेन देन के तुम हितकारी मों ते कछु न सयौ॥

विप्र सुदामा कियो अजाची तंदुल भेंट धयौ॥

द्रुपदसुता की तुम पति राखी अम्बर दान कयौ॥

गज के फंद छुड़ाये आकर पुष्प जो हाथ पख्यो॥

सूर की विरियां निठुर वै बैठे कानन मूंद धयौ॥

यदि चाहो, परीक्षा तो करें भजन (उपासना) से फल मिलता है कि नहीं, तो प्यारे! याद रहे 'परीक्षा का भजन' असंगत है और असंभव है, क्योंकि निष्कपट भजन तो होगा वह, जिसमें फल और फल की इच्छावाले अपने आप को इस तरह परमेश्वर के भेंट कर दें जैसे अग्नि में आहुति। यह चिनती रघुवीर गुसांई

और आश विश्वास भरोसो हरौं जीव जड़ताई। चाहौं न सुगति सुमति सम्पति कछु ऋद्धिसिद्धि विपुल वड़ाई। हेतु रहित अनुराग राम पद बढ़े अनुदिन अधिकाई।

यदि कोई कहे, आहुति हो जाने में क्या स्वाद रहा? तो ऐसा पूछनेवाले को स्वाद (आनन्द) का स्वरूपही विदित नहीं। खुद (अहंभाव) के लीन हो जाने का ही नाम है, स्वाद, आनन्द। बच्चे ने जब अपना नन्हा सा तन, और भोला भाला मन, माता की गोद में डाल दिया, तो सारे जहान में उसके लिये कौन सा आराम शेष रहा और कौन सी चिन्ता बाक़ी रही। आंधी हो, वर्षा हो, भूकम्प हो, कुछ हो, उसका बाल वीका नहीं होगा, कैसा निर्भय है, क्या मीठी नींद सोता है और सलोनी जाग्रत उठता है।

जब तक तुम्हारी शरीर की क्रिया उपासना रूप न हो, तुम्हारी ऊपर से उपासना करना व्यर्थ दिखलावा है। निष्फल मन परचावा है, क्रियारूप उपासना का यह अर्थ है कि खाने, पीने, सोने, व्यायाम आदि में जो प्रकृति के नियम हैं उनको रञ्चक मात्र भी न तोड़ा जाय। विषयविकार, स्वादों

मैं पढ़ा आचरण से ईश्वर की आज्ञा भङ्ग करना है। जिसका दण्ड रोग, व्यथादि अवश्य मिलना है। और जब पीड़ा रूपी कारागार में बंद पड़ रहे हों, उपासना कहां हो सकती है। जिस पुरुष का स्वभाव वैसी ही किया आदि की तरफ ले जाय जैसा ईश्वरीय नियम चाहते हैं, जिस पुरुष की इच्छा वही उठे जो मानो ईश्वर की इच्छा है, जिसकी आदत (nature) प्रकृति की आदत हो, वह आचरण से 'शिवोऽहम्' गा रहा है, उसे दुःख कहां से लग सकता है। "नायमात्मा वलहीनेन लभ्यः।" मुण्डक उपनिषद में यहां बल से तात्पर्य शरीर की आरोग्यता है, और अध्यात्मवल भी है, जिसको अध्यवसाय भी कहते हैं। गीता की *'प्रज्ञा प्रतिष्ठिता' भी वल रूप है।

निद्रा क्यों आवश्यक है:—प्रति दिन काम काज करते मनुष्य प्रायः संसार और शरीर आदि को सत्य मानने लग पड़ते हैं। परन्तु कामकाज के लिये, शक्ति, वल तो आनन्द-स्वरूप आत्मदेव से ही आना है, जिसकी सत्ता के आगे संसार की नामरूप सत्ता वा भेदभावना रह नहीं सकती। जगत् के धंधों में फँसे हुए को नित्य प्रति निद्रा घेर कर पृथ्वी पर फेंक कर यह सन्ध्या पढ़ाती है कि यह जगत् है नहीं आत्मा ही आत्मा है, क्योंकि निद्रा में संसार मिथ्या हो जाता है और अज्ञाततः एक आत्मा ही आत्मा शेप रह जाता है।

पोल निकाल्यो जगत् का, सुपुप्त्यवस्था मांहि। नाम रूप संसार की, जहां गन्ध भी नाहि॥

स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रवद्धो दिशं दिशं पतित्वान्य- आयतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपश्रयत एवमेव खलु सोम्य

* देखो गीता अ० 2 श्लो० 55, 56, 61, 68,...

तन्मनो दिशं दिशं पतित्वान्यायतनमलब्ध्वा प्राणमेवो- पश्रयते। [छांदो० उप०]

सुषुप्ति द्वारा अज्ञाततः परम तत्व में लीन हुए इस क़दर शक्ति-बल आ जाता है तो उपासना ध्यान आदि द्वारा ज्ञाततः परम तत्व में लीन हुए शक्ति वल, आनन्द क्यों न बढ़ेंगे! जब देखो कि चिन्ता, क्रोध, काम, (तमोगुण) घेरने लगे हैं, तो चुपके उठकर जल के पास चले जाओ, आचमन करो, हाथ मुंह धोवो, या स्नान ही करलो, अवश्य शांति आ जायगी और हरिध्यान रूपी दूरसागर में डुबकी लगाओ, क्रोध के धूएं और भाप को ज्ञान-अग्नि में बदल दो।

उपासना में आवश्यक उदारता।

उपासना की चेटक यज्ञ, कर्म और दान से लगनी आरम्भ होती है। जब कुछ चीज़ यज्ञ में या और समय पर दी गई तो चित्त में ठंडक और शांति व्यापी, यह रस फिर लेने को जी करने लगा। बाहर के स्थूल पदार्थ कभी कभी देते दिलाते, अति कठिन और सूक्ष्म दान अर्थात् चित्त वृत्ति का हरिचरणों में खोया जाना भी शनैः शनैः आ जाता है। उपासना, ध्यान का रंग जमने लगता है। अय यहां पर इतना विस्मयजनक है कि जिसे एक दृष्टि से हम ने खो देना (दान) कहा है, वह दूसरी ओर से देखें तो लूट लेना है। भक्ति (उपासना) चित्त की उस दर्जे की उदारता का नाम है, जिसमें अपने आप तक को उछालकर हरिनाम पर वारकर फेंक दिया जाय। उपासना का आनन्द को तंग दिलवाला कभी नहीं पा सकता, जिसका दिल बादशाह नहीं, वह क्या जाने भक्तिरस को? और बादशाह वह है जिसका अपने दिल के भीतर से एक लंगौटी (कौपीन) के साथ भी दावा न हो।

धन चुराया गया, रोता क्यों है! क्या चोर ले गए? रो इस समझ पर, प्यारे! और कोई नहीं है लेने ले जाने वाला, एकही एक, शुक्र की आंख, यार प्यारा अनेक वहानों से तेरा दिल लिया चाहता है। गोपिकाओं के इससे बढ़ कर और क्या सुकर्म होंगे कि कृष्ण मक्खन चुराय। धन्य हैं वह जिनका सव कुछ चुराया जाय, मन और चित्त तक भी बाक़ी न रहे।

ककुभाय स्तेनानां पतये नमः, नमो निचेरवे परिचराय॥ तस्कराणां पतये नमः॥ (शु० यजु० सं०)

ऋग्वेद और यजुर्वेद के पुरुष सूक्त में दिखाया है कि जब ऋषि, देवता लोगों ने विराट् पुरुष की हवि देदी तो उनके सव काम स्वयं ही सिद्ध होने लग पड़े। यज्ञ से जगत् की उत्पत्ति हुई। वृहदारण्यकोपनिषद् के आदि में समस्त संसार रूपी अश्व का मेध किस मनोहर रीति से वर्णन किया है। वाह वा! जब तक नामरूप समस्त संसार, और विराट् रूप समग्र जगत् सम्यक् प्रकार से दान न कर दिया जाय, और यज्ञवलि में आहुति न कर दिया जाय, तव तक अमृत चखने का मुंह कहां?

"सर्वं खल्विदं ब्रह्म" रूपी ज्ञान की अग्नि में जगत् के पदार्थ और उनकी कामना का विपत्कार हो जाय तो साम्राज्य (स्वराज्य) की प्राप्ति में देर ही क्या है?

राजा वलि ने जल का करवा हाथ में लेकर तीनों लोक भगवान को दान कर दिये, तुम से एक असुर के वराबर भी नहीं सरती। अपना शिर रूपी चमस वा खप्पर को हथेली पर ले सारे संसार में सत्तादृष्टि करदो ब्रह्म के हवाले। बला टली, बोझ हटा, और फिर ईश्वर को भी ईश्वरत्व देने वाले तुम हो, सूर्य चंद्रमा भी तुम्हारे भिखारी हैं। लोग कहते हैं

जी! भजन में मन नहीं ठहरता, एकाग्रता नहीं होती। एकाग्रता भला कैसे हो, छपणता के कारण वन्दर की तरह मुट्ठी से पदार्थों को तो छोड़ते नहीं और मुट्ठी में लिया चाहते हैं राम को। आख़िर ऐसा अनजान (भोला) तो वह भी नहीं, कि अपने आप ही हत्थे चढ़ जाय।

जहां काम तहां राम नहिं, जहां राम नाहिं काम।

राम तो उसको मिलता है जो हनुमान् की तरह हीरों जवाहिरों को फोड़ कर फेंक दे, "यदि उनमें राम नहीं हैं तो इस इनाम को कहां धरूं? क्या करूं?"

कुन्दकुञ्चमसु पश्यं सरसीरुह लोचने। अमुना कुन्द कुञ्जेन सखि मे कि प्रयोजनम्॥ (सभा तरंग)

'मु' रहित 'कुन्द' कुञ्ज को मैं क्या देखूं, अर्थात् मुकुन्द नहीं तो कुन्द कुञ्ज को आग लगाऊं?

भजन करते समय निर्लज्ज चित्त में मकान के, खान पान के, अपने मान, अपनी जान के ध्यान आजाते हैं। मूर्ख को इतनी समझ नहीं कि यह चीज़ें चिन्तनयोग्य नहीं, चिन्तन-योग्य तो एक राम है।

आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्॥ [गीता]

प्रभु का डेरा हमारे चित्त में लगे, तो फिर कौन सी आशा है जो अपने आप पूरी न पड़ी होगी? जब तक पदार्थ में सच्चादृष्टि है, या उसमें चित्त लगाये हुए हो, सिर पटक मारो, वह पदार्थ कभी नहीं मिलेगा, या सुखदायी होगा। जब यत्ततः अथवा स्वाभाविक उस पदार्थ से दिल उठता है, अर्थात् आत्मारूपी अग्निकुण्ड में वह चीज़ पड़ती है, मन में यज्ञ हो जाता है, तो स्वयम् इष्ट पदार्थ हाज़िर हो जाता है। हिमालय पर्वन की ठोकर से गेंद की तरह शायद कभी उछलने भी लग पड़े, परन्तु यह ज्ञानून वाल के बराबर कभी इतर

नहीं हो सकता।

ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद, क्षत्रं तं परादाद्यो- ऽन्यत्रात्मनःक्षत्रं वेद लोकास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो लोकान्वेद, देवास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो देवान्वेद, भूतानि तं परादुर्यो- ऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद, सर्वे तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वे वेदेदं ब्रह्मेदं क्षत्रमिमे लोका, इमे देवा, इमानि भूतानीदं सर्वे यदयमात्मा। [बृह० उप०]

बात बात में राम दिखाता है कि मैं ही हूं, जगत् है नहीं। अगर जगत् की चीज़ें हैं, तो केवल मेरा कटाक्ष मात्र हैं। भाई! समाधि और मन की एकाग्रता तो तब होगी, जब तुम्हारी तरफ़ से माल, धन, बंगले, मकान पर मानो हल फिर जाय, स्त्री, पुत्र, वैरी, मित्र पर सुहागा चल जाय, सव साफ़ हो जाय, राम ही राम का तूफ़ान (अग्धि) आ जाय, कोठे दालान वहा ले जाय।

अत्र पिताऽपिता भवति, माताऽमाता, लोका अलोकाः देवा अदेवाः वेदा अवेदाः अत्रस्तेनोऽस्तेनो भवति भ्रूणहा- ऽभ्रूणहा, चाएडालोऽचाएडालः पौल्कसोऽपौल्कसः श्रमणो- ऽश्रमणः, तापसोऽतापसः। [बृह० उप०]

जाने की कोई ठौरही न रही तो फिर भड़वे मन ने कहां जाना है? सहज समाधि है।

जैसे काग जहाज़ को सूकत और न ठौर॥ मोहि तो सावन के अन्धहि क्यों सूकत रंग हरो॥

क्या मांगना भी उपासना का अंग है?

मांगना दो प्रकार का है, एक तो तुच्छ. "मैं" (अहंता, ममता) को मुख्य रख कर अपनी बुद्धि और भोगकामना के लिये प्रार्थना करना, और दूसरा ज्ञानप्राप्ति, तत्वदर्शन, हरि-

सेवा को परम प्रयोजन ठान कर आत्मोन्नति मांगना। प्रथम प्रकार की प्रार्थना तो मानो ईश्वर को तुच्छ नामरूप (जीव) का अनुचर बनाना है। अपनी सेवा की खातिर ईश्वर को बुलाना है, उलटी गंगा वहाना है। द्वितीय प्रकार की प्रार्थना सीधी वाट पर जाना है।

आत्मा में चित्त के लीन होते समय जो भी संकल्प होगा, सत्य तो अवश्य होही जायगा, परन्तु यदि वह संकल्प अज्ञान, अधर्म और स्वार्थमय है तो कांटेदार विषभरे अंकुर की नाईं उग कर दारुण परिणाम का हेतु होगा। अहंताममता और भोगकामना सम्बन्धी ईश्वर से प्रार्थना करना मैले तांचे (ताम्र) के वर्तन में पवित्र दूध को भरना है। दुःख पाकर जो सीखोगे तो पहले ही अपवित्र वासना को क्यों नहीं त्याग देते? अशुभ भावना में औरों का भी बुरा होता है और अपनी भी खराबी। शुभ भावना, पवित्र भाव, ज्ञान विज्ञान की प्राप्ति में न केवल अपना ही कल्याण होता है वरञ्च परोपकार भी। मन में सत्व गुण, शान्ति, आनन्द और शुद्धि हो तो हमारे काम स्वयं ईश्वर के काम होते हैं। पूरे होते देर लगही नहीं सकती। भागवत पुराण में एक जगह यह श्लोक दिया है:—

देवासुर मनुष्येपु ये भजन्त्य शिवं शिवं। प्रायस्ते धनिनो भोजा न तु लक्ष्म्याः पतिं हरिम्॥

अर्थात् प्रायः जो कोई भी त्यागी शिव की उपासना करते हैं वे धनवान हो जाते हैं और लक्ष्मीपति विष्णु के उपासक निर्धन रह जाते हैं। इस श्लोक में शिव और विष्णु की छुटाई वड़ाई दिखाने का तात्पर्य नहीं है, शिव और विष्णु तो वस्तुतः एक ही चीज़ हैं। किन्तु अभिप्राय यह है कि जिन लोगों के हृदय में शिवरूप त्याग और वैराग्य वसा है, ऐश्वर्य, धन, सौभाग्य उनके पास स्वयं आते हैं और जिन लोगों के अंतः

करण लक्ष्मी, धन, दौलत की लाग में मोहित हैं वे दारिद्र्य के पात्र रहते हैं। जैसे जो कोई सूर्य की तरफ़ पीठ मोड़ कर अपनी छाया को पकड़ने दौड़ता है, छाया उससे आगे बढ़ती जाती है, कभी क़ाबू में नहीं आती। और जो कोई छाया से मुंह फेर कर सूर्य की ओर दौड़े, तो छाया अपने आपही पीछे भागती आती है, साथ छोड़ती ही नहीं।

कौन प्रार्थना अवश्य सुनी जाती है:-जिसमें हमारा स्वार्थांश इतना कम हो, कि मानो वह सत्य स्वभाव ईश्वर का अपना ही काम है, और यदि उपासना के समय मारे आनन्द के चित्त की यह दशा हो रही होः—

यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह॥ [तैत्ति० उप०]

तो यही अवस्था ब्रह्मावस्था है और इस कारण सत्य कामता और सत्य संकल्पता तो स्वभावतः आ जाती है।

यह तो रही अति उत्कृष्ट उपासना। उपासना की ज़रा न्यून स्थिति बच्चे की सी श्रद्धा और विश्वास है, और यह निष्ठा भी क्या प्यारी प्यारी और प्रबल है। बच्चा अपने माता पिता को अनन्त शक्तिमान मानता है, और उनके बल को अपना वल समझ कर माता की गोद में बैठा हुआ शाहन्-शाही करता है। रेल को भी धमका लेता है, पवन और पत्तियों पर हुक्म चलाता है, दरिया को भी कोसने लगता है, और कोई चीज़ असम्भव जानता ही नहीं। चंद्र सूर्य को भी हाथ में लिया चाहता है:—...

चांद खिलोना ले दे री मैय्या, चांद खिलोना ले दे॥

धन्य हैं वे पुरुष उच्च भाग्य वाले, जिनका इस ज़ोर का विश्वास सचमुच सर्वशक्तिमान पिता में जम जाय, जो कुछ भी दरकार हुआ, फ़ट देव का पल्ला पकड़ा और करवा लिया, दूध मांगना हो तो देव से, भोजन, वस्त्र मांगना हो तो देव

से, क्या अच्छा कहा है:—

जग जाचे कोउ न जाचे जे जिया जाचगे जानकी जानहिरे। जांहि जाचत जाचकता जर जाहि, जांहि जरे जोर जहानहिरे॥

दुःखी दुष्ट में, और रंगीले मतवाले मस्त में फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि एक के चित्त में कामना अंश ऊपर है, भक्ति अंश नीचे। दूसरे के चित्त में राम ऊपर है, और काम नीचे। एक यदि साह्दर है तो उलट पलट से दूसरा राक्षस है।

जब प्रेम और त्याग का अंश उपासना में याचना अंश से अधिक हो, तो वह मांगना भी एक तरह देने ही के तुल्य है। पर भाई! सच बात तो है यूं, कि मांगना सच्ची उपासना का कोई अंग नहीं, हां देना (उदारता) तो उपासना रूप है। जब अपने मतलब के लिये मैं तुम्हारी सेवा करूं, तो इसमें तुम्हारी भक्ति काहे की? वह तो दुकानदारी है, या ठग वाज़ी। मंगते भिखारी को कोई पास नहीं छूने देता, परमेश्वर तो बादशाह है। भिखमंगे कंगाल बन कर उसके पास जाओगे तो दूर ही से दूर २ पड़ी होगी। बादशाह से मिलने चले हो, परे फेंको मैले फुचैले, फटे पुराने इच्छा रूपी चीथड़े! "खानों के खान महिमान" जब तक तुम बादशाह न बनोगे, बादशाह के पास नहीं बैठ सकते। इच्छा कामना की गंध तक उड़ा दो, जम कर बैठो त्याग के तख़त पर, धारण करो वैराग्य के मोती, पहन लो ज्ञान का मुकुट, और वह तुम्हारे पास से कभी हिल जाय तो मुझे वांध लेना।

टूने कामन करके नी मैं प्यारा यार मनावांगी। इस टूने नूं पढ़ फूकांगी सूरज अग्न जलावांगी॥ सात समुन्दर दिल दे अन्दर दिल से लहर उठावांगी। वदली होकर चमक डरावां वन वादल घर घर जावांगी॥ टूने० इश्क अंगीठी अस्पंदे तारे सूरज अंग चढ़ावांगी।

लासवां शौह नूं गल अपने तद मैं नार कहावांगी॥ टूने० ना मैं व्याहो ना मैं कुआरी वेटा गोद खिलावांगी। वुल्हा लामकान दी पौड़ी उचे वह के नाद वजावांगी॥ टूने०

[पंजावी काफ़ी, वुल्हा शाह]

उपासना और ज्ञान।

उपासना ऐसे है जैसे गुणन के उदाहरण सिद्ध करना और ज्ञान यह है कि बीज गणित तक पहुंच कर उस गुणन की विधि का कारण आदि भी जान जाना। उपासना साधन है, ज्ञान सिद्ध अवस्था। उपासना में यत्न के साथ अन्दर बाहर ब्रह्म देखा जाता है। ज्ञान वह है जहां यत्नरहित स्वाभाविक अन्दर तो रोम रोम से "अहं ब्रह्मास्मि" के ढोल और सव वृत्तियों को दवादे, और बाहर हर त्रिसरेण "तत्वमसि" का दर्पण दिखाता हुआ भेदभावना को भगादे। यह ज्ञान ही असली त्याग है:—

त्यागः प्रपञ्चरूपस्य चिदात्मत्वावलोकनात्। त्यागो हि महतां पूज्यः सद्यो मोक्षमयो यतः॥

जहां श्रुति ने त्याग का उपदेश वर्णन किया है "तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा" वहां त्याग का लक्षण इतना ही किया है॥

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्॥ [ईशा० उप०]

जो कुछ दीखे जगत् में सव ईश्वर में ढांप। कर हो चैन इस त्याग से धन लालच से कांप॥

ऊपर ऊपर के त्याग इस असली त्याग के साधन हैं, यह त्याग रूपी ब्रह्मदृष्टि यत्नतः करना उपासना है। "अब यह त्याग रूपी उपासना भी और त्यागों या दानों की तरह होगी, करें वा न करें, किसी को पैसा दें या न दें हमारी इच्छा पर है" जो ऐसा समझे हैं धोके में हैं। यह त्याग रूपी उपासना आव-

...श्यक है। आवश्यक क्यों कि और कहीं ठंड पड़ने की नहीं।

वृत्ति तब तक एकान्त नहीं हो सकती जब तक मन में कभी यह आशा रहे और कभी वह इच्छा। शान्त वह हो सकता है जिसे कोई कर्त्तव्य और आवश्यकता खींच घसीट न रही हो। अपने आप तो इन वासनाओं ने पीछा छोड़ना ही नहीं, जब पहला छुटेगा, आप छुड़ाना पड़ेगा। इसलिये जीने तक की आशा को भी त्याग कर मन को ब्रह्मानन्द में डाल दो। एक दिन तो शरीर ने जाना ही है, सदा के लिये पट्टा तो लिखवा कर लाये ही नहीं थे। आज ही से समझ लो कि यह है नहीं और ब्रह्मानन्द के सागर में शङ्का रहित होकर कूद पड़ो। आश्चर्य यह है कि जब हम इन कामनाओं को छोड़ ही बैठते हैं, वह अपने आप पूरी होने लग पड़ती हैं।

गङ्गातीरे हिमगिरिशिला बद्धपद्मासनस्य । ब्रह्मध्यानाभ्यसनविधिना योगनिद्रां गतस्य ॥ किं तैर्भाव्यं मम सुदिवसैर्येषु ते निर्विशङ्काः । कण्डूयन्ते जरठ हरिणाः शृङ्गमङ्गे मदीये ॥ [ भर्तृहरि ]

जब दिल में त्याग और ज्ञान भरता है और शान्त साक्षी बन कर विचार (observation) शक्ति आती है तो वही दुनिया जो माया का पर्दा हो रही थी राम की झांकियों का लगातार प्रवाह बन जाती है। 'दर्शन धारा' कहला सकती है, एक रस अभिव्यञ्जक हो जाती है। वह लोग जो भेद वाद और अभेद वाद के शास्त्रार्थ में लीन हैं उनको झगड़ने दो, उस अवस्था के लिये यह बुद्धि की छानबीन भी अयुक्त नहीं, परन्तु जब बुद्धि (अर्थात् सूक्ष्म शरीर) के तल से उतर कर कारण शरीर (subjective mind, ganglionic conciousness) में ज्ञान भाव का दीवा जलता है तो यह झगड़े तै होते हैं, और जब तक मनुष्य के अन्तर हृदय

(मानो सातवें पर्दे) में राम का डंका नहीं बजता तब तक उसे न उपासना ही रस देगी न ज्ञान, न वेद की संहिता का अर्थ आयगा न उपनिषद् का।

जैसे भूखे भूख अन्नाज, तृषावन्त जल सेती काज। जैसे कामी कामिनी प्यारी, वैसे नामे नाम मुरारि ॥

टेलीफ़ोन द्वारा प्यारे ने बातें कीं, टेलीफ़ोन प्यारी लगने लगी। जब तक मोहन दूसरी जगह है टेलीफ़ोन की बड़ी क़द्र है, जब मोहन अपने घर आ गया तो अब टेलीफ़ोन क्या ? ये मित्र, सम्बन्धी, राजे, धन, दौलत सब टेलीफ़ोन हैं, जिन द्वारा राम हमसे बोलता था। जब तक राम नहीं मिला था, दिल कांपता था कि हाय ! इन बिना कैसे सरेगी ? वह प्यारा घर आ गया, आ मिला, अब तो है मित्र गण ! मुझको भले छोड़ दो, सम्बन्धी जनो ! त्याग जाओ, धन दौलत ! लुट जाओ, भाग जाओ इज़्ज़त सन्मान ! बेशक पीछा दिखाओ, यहां बैठे क्या करते हो, राजा जी ! निकाल दो अपने देश से, घर रक्खो अपनी दुनिया।

राजा रूठे नगरी राखे अपनी, मैं हर रूठे कहां जाना ? अब दिलवर घर आया है। नैनों का फ़र्श विछाऊंगी ॥ गुण औगुण पर घर चिनगारी। यह मैं धूप धुकाऊंगी ॥ प्राणों की मैं सेज करूंगी। हरि को गले लगाऊंगी ॥

शिवोऽहम् भाव ( अद्वैत दृष्टि ) बिना सम्यक् शुद्धि नहीं होगी ।

"शिवोऽहम्" तो सभी कहते हैं, क्या भेदवादी क्या अभेदवादी, क्या भक्त, क्या कर्मकाण्डी, क्या हिन्दू क्या और कोई। सबही अपने दिल के भीतर से अपने आप को बड़े से बड़ा मानते हैं और साबित करते हैं। वह भेदवादी भक्त

जो अभी मन्दिर में देव के सामने अपने तई 'नीच-पापी अधम मूर्ख' कहते कहते थकता नहीं था, जब बाहर बाज़ार में निकला तो उसे कोई "अरे ओ नीच" कहकर पुकारे तो सही, फिर देखो तमाशा, कचहरियों में क्या क्या गति होती है। अन्दर का 'शिवोऽहम्' कभी मर ही नहीं सकता। मरे क्योंकर, सांच को आंच कहां ? पर हां ! अपने तई देहादि रख कर जो शिवोऽहम् का मुलम्मा ऊपर चढ़ाना है यह तो पौंड़क की नाईं झूठा विष्णु बनना है। इस प्रकार से 'वासुदेवोऽहम्' सब दुनिया अहंकार की बोली द्वारा बोल रही है। यह तो मैले तान्र के पात्र में पायस पकाना है और ज़हर से मर जाना है। वेदान्त का उपदेश यह है कि खीर तो पिया जाय, पर मैले तान्र पात्र में नहीं। देहाभिमान अन्दर और शिवोऽहम् का ऊपर २ से मुलम्मा तो हो नहीं चाहिए शिवोऽहम् अन्दर हो और अन्दर से अग्नि की तरह भड़क २ कर देहाभिमान को जला दे। यह हो गया तो देहाभिमान, छपनता, भय, शोक की ठौर कहां ? इस भेद को (नहीं अभेद को) जिसने जाना, निधड़क हो गया, उदारता मूर्त्तिमान बन गया, वह शक्ति और तेज का दरिया (नद) हो निकला। कोई भी बल हो कहां से आता है ? उस उदारता से जिसमें शरीर और प्राण की बलि देने को हम तय्यार हों, शिर को हथेली पर लिये चलें। देखो यारो ! जब "ज्योतिषां ज्योतिः" अपने आप को पाया तो शिर से गुज़र जाना रूपी सूरमापन स्वतः कैसे न आजायगा ?

अब ज़रा ध्यान देकर सुनना, मैं तुमसे कुछ मांगता तो नहीं ?

पूत कहे, अवधूत कहे, रजपूत कहे, जुलाहा कहे कोऊ। काहू की बेटी से बेटा न व्याहूं; काहुकी जात बिगाड़ न सोऊ।

मांग के खाऊं, शमशान में सोऊं, लेने की एक न देने की दोऊ।

किसी के टके देने नहीं, किसी से कौड़ी लेनी नहीं, लाग लपेट से क्या ? कड़वा मानो, मीठा मानो, सच ही कहूंगा, पर्वत के शिखर के शिखर से राम पुकार कर सुनाता है:—

संसार को सत्य मान कर उसमें कूदते हो, फूस की आग में पच पच कर मरते हो, यह उग्र तपस्या क्यों ! इससे कुछ भी सिद्धि नहीं होगी। देहाभिमान के कीचड़ में, अपने शुद्ध सच्चिदानन्द स्वरूप को भूल कर, फंसते हो, दल दल में धसते हो, गल जाओगे। ब्रह्म को विसार कर दुःखों को दुलाते हो, शिर पर गोले वरसाते हो, और गुल (पुष्प) ! जल जाओगे। सत्य को जवाब देकर मिथ्या नामरूप में क्यों धक्के खाते हो ? जिनको श्वेत माखन का पेड़ा समझे हो, यह तो चूने (कली) के गोले हैं। खाओ तो सही, फट जांगी अंतड़ियां, झूठ बोलने वाले का बेड़ा गर्क। मैं सच कहता हूं, दुनियां की चीज़ धोका है। होश में आओ ब्रह्म ही ब्रह्म सत्य है। ज्येष्ठ आषाढ़ की दोपहर के चक्र भाड़ की तरह तपे हुए मरुस्थल में मंकि मुनि जब अति व्याकुल हो रहा था, और उसने पास के एक ग्राम में जाकर आराम करना चाहा, उस समय वसिष्ठ भगवान् के दर्शन हुए। वसिष्ठ जी कहते हैं:—बेशक इस गरमी में हज़ार बार जल मर, पर वहां मत जा, जहां तनु के तनूर में पड़ेगा। यहां पर तो शरीर ही जलता है, वहां अविद्या के ताप से सारे का सारा सड़ेगा।

वरमन्धगुहां हित्वा शिलान्तः कीटता वरम् । वरं मरौ पंगु मृगो न ग्राम्य जन संगमः ॥ [ योगवासिष्ठ ]

आप वीती कहूं कि जग वीती:—जब कभी भूल से किसी सांसारिक वस्तु में इष्टता वा अनिष्टता का भाव जमाता हूं, हानि लाभ, लुटाई बड़ाई में दिल टिकाता हूं, तन्दुरुस्ती

(देह की आरोग्यता) आदि को बड़ी बात गरदानता हूं, किसी पुष्प को अपना वा पराया ठानता हूं, कोई चीज़, भावी व वर्त्तमान सत्य मानता हूं; अपने आप को परिच्छिन्न देहादि जानता हूं, अर्थात् शुद्ध स्वरूप को भूल कर शरीर में जम कर भेददृष्टि से देखता और विचार करता हूं, तो अवश्यमेव तीन तापों में कोई न कोई आन घेरता है। मेरी दृष्टि थोड़ी गिरे तो ताप भी थोड़ा होता है, बहुत गिरे, तो ताप भी बहुत। इस क्षुद्र दृष्टि और तुच्छ भावना का फल खेद दुःख मिले बिना कभी नहीं रहता। और जब देहादि स्वप्न को परे मार, भेदभावना को उड़ाकर आत्मदृष्टि खोलता हूं, तो संसार के तत्व ऐसे हो जाते हैं, जैसे किसी के अपने हाथ पैर, जिस तरह चाहे हिला ले। प्रकृति की चाल मेरी आंखों की कटाक्ष हो जाती है। यही क़ानून और सब लोगों के दुःख सुख लाने में भी राज करता है, इसको न जान कर लोग मरते हैं। यह क़ानून कहीं कच्चा सून न समझ लेना, अनाड़ी का काता धुआ। यह वह लोहे का रस्सा है जिससे इन्द्र और सूर्य भी बांधे पड़े हैं। संसार समुद्र में यह वह एक पत्थर की चट्टान है जिसको न देख कर महाराजे, पण्डित, देव और दानव अपने जहाज़ों (पोतों) को तोड़ बैठते हैं। वंशों के वंश, क़ौमों की क़ौमें, मुलकों के मुलक इस क़ानून को भुला कर मट्टी में मिल चुके हैं।

अजगर ने समझा कि कृष्ण को खा ही लूंगा और पचा जाऊंगा। तो खा गया, पर पेट के अन्दर चली कटारियां। खंड भंड होकर आतशबाज़ी के अनार की तरह अजगर उड़ गया, और कृष्ण वैसे का वैसा शेष रहा। क्या तुम इस सत्य रूपी क़ानून को खा सकते हो ? दबा सकते हो ! छिपा सकते हो ? इस सत्य को किसी का लिहाज़ नहीं। और तो और,

खुद कृष्ण के कुल वाले जब सत्य को मखौल में उड़ाने लगे, और अपनी तरफ़ से मानो इसे रगड़ रगड़ कर रेत में मिला भी गये। तो यह सत्य सत्या मेल होकर भी फिर उगा, और क्या कृष्ण और क्या यादव सब के सब को हड़प कर गया, द्वारका पर पानी फिर गया। भाई ! मुर्दे को उठा कर जो चिल्लाया करते हो "राम राम सत्य है।" आज पहलेही समझ जाओ, अभी समझ लो तो मरोगे ही नहीं, मरने के बाद गीता तुम्हारे किस काम आयगी ! अपनी ज़िन्दगी को ही भगवत् का गीत बनादो। मरते वक्त दीवा (दीपक) तुम्हें क्या उजाला करेगा ? हृदय में हरिज्ञानप्रदीप अभी जला दो।

कृष्ण त्वदीय पद पंकज पञ्जरान्ते । अद्यैव मे विशतु मानस राजहंसः ॥ प्राणप्रयाणसमये कफ वात पित्तैः । कण्ठावरोधन विधौ स्मरणं कुतस्ते ॥ [ पाण्डव गीता ]

पतितः पशुरपि कूपेनिःसृतौ चरणचालनं कुरुते । धिक्त्वां चित्त भवाब्धेरिच्छामपि नोविभर्षिनिःसृतुम् ॥

एक जुलाहा भूखों मर गया, उसकी मां मुर्दे के मुंह और पायु को पैसे का घी लगा कर सबको दिखाती थी, देखलो ! मेरा पुत्र भूखा नहीं मरा, घी खाता और घी त्यागता गया है। प्यारे ! उधारी मुक्ति तो जुलाहे का घी है। रोकड़ मुक्ति (नक़दनिजात) जीवनमुक्ति, जब मिल सकती है, तो क्यों न लेनी ?

सच्चा उपासक ।

भाई ! सच्ची कहें ? उपासक और भक्त होने की पदवी हमको तो नसीब नहीं। हमने तो सच्चा उपासक सारी दुनिया में एक ही देखा है। बाक़ी भक्तों, ऋषियों, मुनियों, पीरों, पैग़म्बरों का "प्रेममय उपासक" कहलाना एक कहने ही

की बात है। वह सच्चा आशिक़ और उपासक कौन है जिसको लोग उपास्य देव कहते हैं, क्योंकर ? प्रेमी, यार (यार) की तरह छिप छिप कर छेड़ता है। शनैः २ वृत्ति की कमी (चित्त का आंचल) खींचता है। अनेक प्रकार के भेप बदल कर, रंग रूप धारण करके, स्वांग भरके परदों की ओट में नयनों की चोट मार जाता है। जब मन अनात्म पदार्थों में कहीं लग जाता है तो हा ! फिर उसके मान करने (रूठने) का क्या कहना ? भृकुटी कुटिल किये कैसा २ कोप दिखाता है ! जब वृत्ति मार्ग में कहीं रुक जाय तो चुटकियां भरता है। दम तो लेने नहीं देता, आराम तो नाम को भी और कहीं नहीं मिलने पाता, सिवाय एक मात्र उस राम की निष्काम शय्या के।

हे प्यारे ! अब आशिक़ होकर रूठना (मचलना) कैसा ? अब रस चखा कर नटते हो ? हे प्राणनाथ ! इधर देखो ! वह दुष्ट शिशुपाल आ पड़ा, छीन कर ले चला तुम्हारी हक़्क़ानी को। कुछ रांस, शर्म भी है ? यह तो बड़ा मान करने का नहीं, आओ आओ !

त्वमसि ममभूषणं, त्वमसि ममजीवनं, त्वमसि ममजलधिरत्नं । भवतु भवतीह मयि सतत मनुरोधिनस्तत्र मम हृदयमतियत्नं ॥ [ जयदेव ]

सूर्य को बारह महीने तेज प्रकाश दे दिया मुफ़त में। हमको आठों पहर निजानंद देते कंगाल तो नहीं हो चले ?

हे प्रभो ! अब तो मुझसे दो दो बातें नहीं निभ सकती। खाने पीने कपड़े कुटिया का भी ख़याल रक्खूं और दुलारे का भी मुख देखूं। चूल्हे में पड़े पहनना, खाना, जीना, मरना, इनसे मेरा निर्वाह होता है ? मेरी तो मधूकरी हो तो तुम; कामली हो तो तुम, कुटि हो तो तुम, औपधि हो तो तुम, शरीर हो

तो तुम, आत्मा हो तो तुम। शरीरादि को रखना चाहते हो तो पड़े रक्खो। अकेले वन रहे हो, निकम्मे बैठे क्या करते हो ! करो सेवा।

आंखें लगा के तुमसे न पलकें हिलाएंगे। देखेंगे खेल हम, तुम्हें आगे नचाएंगे ॥ वयं सोम व्रते तव मनस्तनूपु विभ्रतः ॥ [ यजुर्वेद ]

तुम्हारी ख़ातिर है प्रभो ! यह मन था तन बीच ॥

लेलो अपनी चीज़। वार कर फेंक दो अपने "बेनाम" पर। स्थाली भर भर कर हीरे, जवाहिरात, तुझ पर वार २ कर फेंके गये। जिनको लोग तारे, नक्षत्र, ग्रह, चन्द्र, सूर्य और पृथिवियां कहते हैं, लूट लो ज्योतिषियों, लूट लो तत्वविज्ञानियों, लूट लो सौदागरों, राजाओं लूट लो। पर हाय ! मार डालो तो भी मैं तो यह माल नहीं लूंगा। डोली पर वार कर फेंका हुआ टका रुपया लूटना कोई और लोगों का काम है। मैं तो वही लूंगा, वही ! परदे वाला, दुलारा, प्यारा।

उपासना के मंत्र ।

तासीर उस उपासना की होती है, जो दिल से निकले। गले के ऊपर ऊपर से निकले हुए उपासना के वाक्य तो मानो मख़ौलबाज़ी है और परमेश्वर को मुग़लाना है। जैसी चित्त की अवस्था होगी, सच्ची उपासना की वैसी सूरत होगी। (1) विद्यार्थी (मुमुक्षु) की प्राथना:—

(क) ये त्रिसप्ताः परियन्ति विश्वा रूपाणि विभ्रतः । वाचस्पतिबला तेषान्तन्वो अद्यदधातु मे ॥ पुनरेहि वाचस्पते देवेन मनसासह । वसोष्पतेनिरमय मय्येवास्तु मयिश्रुतम् ॥ इहै वाभवतनूमे अत्नोइवज्यया । वाचस्पतिनियच्छतु मय्ये वास्तु मयिश्रुतम् ॥ उपह्रुतो वाचस्पतिरुपास्मान् वाचस्पति-

ईहयताम् । सश्रुतेन गमेमहिमाश्रुतेनधिराधिपि ॥ [ अथर्ववेद ]

इसमें वाच् (वाणी) के पति (वाचस्पति) रूप ब्रह्म का ध्यान है। जब लोहा अग्नि में पड़ा रहे, अग्नि के गुण उसमें आजाते हैं, इस तरह जब बुद्धि वाच् (वा मन) के पति सर्वव्यापी चैतन्य में कुछ काल अभेद रहे, तो उसमें विचित्र शक्ति कैसे न आजायगी ?

कोई भी मन्त्र हो उनको ख़ाली पढ़ या गा ही नहीं छोड़ना, किन्तु पढ़ कर उनके भावार्थ में मन को लीन और शान्त होने देना चाहिये।

(ख) यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदुसुप्तस्य तथैवेति । दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु ॥ [ यजुर्वेद ]

भावार्थः—क्या जाग्रत, क्या स्वप्न, क्या सुषुप्ति, तीनों दशा में मेरा मन किसी और विचार की तरफ़ न जाने पाय, सिवाय शिवरूप आत्मचिन्तन के। चलते, फिरते, बैठे, खड़े मेरा मन शिवरूप सत्यस्वरूप आत्मा के सिवाय और कोई चिन्तन न करने पाय। इसी प्रकार शु० यजु० अ० 34 के अगले पांच मंत्र भी यही भाव प्रकट करते हैं।

(ग) ॐ भूर्भुवःस्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्यधीमहि । धियो योनः प्रचोदयात् ॥ [ गायत्री मन्त्र ]

यहां पर पहले तो यह देखना है, कि 'धीमहि' और 'नः' दोनो बहुवचन हैं। एकान्त में अकेले तो इस ब्रह्मगायत्री का ध्यान है और "हम ध्यान करते हैं" "हमारी बुद्धियां" ऐसा क्यों ? "मैं ध्यान करता हूं" और "मेरी बुद्धि" क्यों नहीं लिखा ? इसमें वेद की आज्ञा यूं है, कि प्रथम तो देहाभिमान रूप स्वार्थदृष्टि और परिच्छिन्नता का परित्याग करना है। सब देश के लोगों को अपना स्वरूप जान कर, सब शरीरों

को अपना शरीर मान करे, सुख के साथ एक होकर अभेद बुद्धि के साथ यह ध्यान करना है:—

"वह सविता देव जो हमारी बुद्धियों को चलाता है, उसके प्रिय (पूज्य) तेज (स्वरूप) का हम ध्यान करते हैं।" "प्रचोदयात्" में महीधर और सायणाचार्य ने व्यत्यय माना है और यह ठीक भी है। सूर्य रूप सविता देव को हमारी बुद्धियों का प्रेरक माना है। वही जो सूर्य को प्रकाश करता है वही बुद्धियों को प्रकाशता है, वही आत्मा है। "योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽसावहम्" ॥ (यजुर्वेद)

उसका ध्यान करने से क्या लाभ:—बड़ी आपदा आन पड़ी और संध्या करते समय परमेश्वर को मुग़लाया नहीं, किन्तु सचमुच वार वार देहदृष्टि को छोड़ कर जो यह ध्यान किया कि "मैं तो सूर्य के प्रिय तेज वाला हूं, मेरा तो वही धाम है।" तो कहिये, चिन्ता जल न जायगी ? प्रतिदिन तीन वक्त, या दो वक्त, या एक काल ही सही, सच्चे भाव के साथ जो इस तत्व में लीन हुए कि "इन बुद्धियों का प्रेरक आत्मदेव (मैं) तो वही हूं जिसका तेज सूर्य चन्द्रमा में चमक रहा है।" तो कहिये कौन सा अन्धेरा खड़ा रह सकता है ? विद्या पढ़ रहे हैं या कोई बड़ा कार्य हाथ में है और हर दिन एकान्त में बैठ बैठ और सब तरफ़ से वृत्ति को खैंच, तेज के पुंज में अभेदभावना करते हैं, तो यारो ! दुहाई है अगर यश और कीर्ति खिंचकर तुम्हारे आगे नृत्य न पड़ी करे। क्या "खलु क्रतुमयः पुरुषः।" श्रुति ने झूठ ही कह दिया था ?

(2) जब चित्त संसार में डूब जाय, क़ानून रूहानी टूट जाय, पाप कर्म हो जाय, आत्मदेव भूल जाय, तब आंसू भरे नयन, जोड़े हुए हाथ, रगड़ते हुए घुटने, माटी में घिसता

हुआ माथा, जलता हुआ दिल, यदि इस प्रकार की उपासना करें, तो वह कौन सा पाप है जो धुल न जायगा:—

मोघं वरुण मृन्मयं गृहं राजग्रहं गमन् । मृळा सुक्षत्र मृळय ॥ यदेमि प्रस्फुरन्निव दतिनेध्मातो अद्रिवः । मृळां सुक्षत्र मृळय ॥ ऋत्व समह दीनता प्रतीपं जगमाश्चे । मृळा सुक्षत्र मृळय ॥ अपांमध्येतस्थिवांसंतृष्णाविजरितारम् । मृळां सुक्षत्र मृळय ॥ यत्किंचेदं वरुण दैव्ये जनेऽभिद्रोहं मनुष्य 3 श्चरामसि । अचित्तीयराव धर्मायुयोपिममानस्तस्मादेनसो देवरीरिषः ॥ ( ऋ० मं० 7 सू० 89 )

सोने का गढ़ छोड़ कर धसूं न कांटों बीच । हीरे मोती फेंक कर लेऊं न माटी कीच ॥

अब दया ! हे राम ! अब दया ! मैं भूला, मैं उड़ा, मैं पड़ा, मैं गिरा, मैं मरा। अब दया ! हे राम ! अब दया !

(3) जब तक देह में प्रीति और किसी प्रकार की कामना बनी रहती है तब तक तो भेद उपासना ही दिल से निकलेगी। प्रेम, अनुराग जब बहुत बढ़ेगा, तो उपासना की यह शकल हो जायगी:—

तं त्वा भग प्रविशानि स्वाहा । स मा भग प्रविश स्वाहा ॥ तस्मिन्सहस्रं शाखे । निभगाहं त्वयिमृजे स्वाहा ॥ [ तैत्ति० उप० ]

यह भेद उपासना उच्चतम श्रेणी को पहुंच जाय तो इसका ढंग कुछ यूं होगा:—

ॐ गणानांत्वा गणपति 3 हवामहे । प्रियाणांत्वा प्रियपति 3 हवामहे । निधीनांत्वा निधिपति 3 हवामहे । वसो मम, आहमजानि गर्भधं मा त्वमजासि गर्भधम् ॥ [ यजु० संहिता ]

रक़ीबों में गर है मुरव्वत तो तुझ से। अज़ीज़ों में गर है मुहब्बत तो तुझ से ॥

ख़ज़ानों में जो कुछ है दौलत तो तुझ से। अमीरों में है जाहो-शौकत तो तुझ से॥ हकीमों में है इल्मो-हिकमत तो तुझ से। है रौनक़ जहां या है बरकत तो तुझ से॥ है रोकर यह तक़रारे-उल्फ़त तो तुझ से। कि इतनी यह हो मेरी क़िस्मत तो तुझ से। मेरे जिस्मो-जां में हो हरकत तो तुझ से॥ उड़े मा-मनी की वह शिरकत तो तुझ से॥ मिले सदक़ा होने की इज़्ज़त तो तुझ से। सदा एक रहने की लज़्ज़त तो तुझ से॥

महेचन त्वामद्रिवः परा शुल्काय देयाम्। न सहस्राय नायुताय वज्रिवो न शताय शतामघ॥ [सामवेद]

(4) पर हां, जो लोग सदा के लिये निचले दर्जे की उपासना का पेशा बना लेते हैं वह अनर्थ करते हैं, क्योंकि अगर कोई प्रार्थना एक दफ़ा भी सच्चे दिल से निकली थी तो कोई वजह नहीं कि चित्त की अवस्था बदल न गई होती और दिल का दर्जा बढ़ न गया होता। यदि मन दूसरी क्लास (दर्जे) में चढ़ गया, तो फिर पहली क्लास में रोना क्यों? यदि नहीं चढ़ा, तो वह प्रार्थना झूठ दिखावास थी, अब झूठी ही एक बक को पेशा बनाया चाहता है। उपासना का परम प्रयोजन यह था कि शरीर के स्नेह से चित्त मुड़े और आत्मा संग जुड़े। सच्चे उपासक को जब शरीर से हुआ अपराध याद आता है, तो वह 'सांसारिक अपने आप' से भागना चाहता है। हरि की शरण में आता है और आत्मा से तदाकारता पाता है। ऐसा ध्यान एक दफ़ा नहीं, दो दफ़ा भी हो जाय तो फ़ायदा है, कोई डर नहीं। परन्तु जो लोग "पापोऽहं

पापकर्माहं पापात्मा पापसम्भवः" को प्रतिदिन पढ़े ही रटते हैं, उनको इस प्रकार की आवृत्ति न केवल देह से सम्बन्ध पका देती है, बल्कि पाप संस्कार मन में दृढ़ जमा देती है। शुद्ध अन्तःकरण और सच्चे हृदय वालों से भेद उपासना कभी हो ही नहीं सकेगी, जैसे एम. ए. क्लास के विद्यार्थी का जी मिडल क्लास वालों की पुस्तकों में कभी लग ही नहीं सकता।

ज्ञानी।

अब ज़रा चौकन्ने होकर सुनने का समय है। लो अब फिर फोड़ते हैं भांडा। निर्भयता, जीवन मुक्ति, साम्राज्य, स्वराज्य, और किसी को कभी भी नहीं नसीब होते सिवाय उस पुरुष के, जो अपने आप को संशयरहित होकर पूर्ण ब्रह्म शुद्ध सच्चिदानन्द नित्य मुक्त जानता है, जो सर्वत्र अपने ही स्वरूप को देखता है। क्यों हिलेगा उसका दिल जो एक आत्मदेव विना कुछ और देखता ही नहीं? बड़ा भयानक घोर शब्द हुआ, पर सिंह क्यों डरे, वह तो सिंह की अपनी ही गर्ज थी। लोहा तलवार के जौहरों से क्या भय माने, वह तो उसी के तेज़ चमत्कार हैं। अग्नि अपनी ज्वाला से आप क्या संतप्त हो? तारे टूट पड़ें, समुद्र जल उठे, हिमालय उड़ता फिरे, सूर्य मारे ठंड के चक्र का गोला बन जाय, आत्मदर्शी ज्ञानवान् को क्या हैरानी हो सकेगी, जिसकी आज्ञा से कुछ भी बाहर नहीं हो सकता।

तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥ [कैन॰ उप॰]

अपि शीतरुचा वह्नौ सुतीक्ष्णे चन्द्रमण्डले। अव्यधः प्रसरत्यग्नौ जीवन्मुक्तो न विस्मयी॥ प्रलयस्यापि हुंकारैर्महाचल विचालकैः। विक्षोभं नैति यस्यात्मा स महात्मेति कथ्यते॥

भेद भावना दिल से छोड़। निर्भय बैठा मूंड़ मरोड़॥

सूर्य उसीके हुकुम से जलता है, इन्द्र उसीका पानी भरता है, पवन उसीका दूत है, उसीके आगे दरिया रेत में माथा रगड़ते हैं, राजे महाराजे, देवी देवता, वेद किताब जो कुछ भी है, एक आत्मदर्शी का संकल्प मात्र है। तीनों भुवन और चारों खानि जंगल हैं, जिनमें शिकार केवल एक चैतन्य पुरुष रूप ज्ञानवान की है। त्रिलोकी लालटेन है जिसमें ज्योतिरूप ज्ञानवान है। चौदह लोक एक शरीर हैं, प्राण जिसके ज्ञानवान् है। बस वही सत् है, और कुछ भी नहीं। पृथ्वी अन्न पैदा करती है कि कभी ब्रह्मनिष्ठ के चरण पड़ें। ऋतु बदलते हैं कि कभी आत्मस्वरूप महात्मा के दर्शन नसीब हों।

"सुर तिय, नर तिय, नाग तिय" इन सबको उदर में बोझ उठाने पड़े, वेदना सहनी पड़ी, उस एक व्रज, अमर रूप ज्ञानी को प्रकट देखने के लिये। दुनिया के राज्य काज उसके लिये थे, वह आया तो राज्य कांजों की ड्यूटी (कर्तव्य) पूरी हुई। घर बनते रहे थे, कपड़े बुने और पहने जा रहे थे ब्रह्मनिष्ठ की पधरावनी के लिये। वह आया, सब परिश्रम सफल हो गये। रेलें चलती थीं, नदियां बहती थीं, कभी ब्रह्मनिष्ठ तक पहुंचने के लिये। युद्ध होते थे, लोग मरते थे, कभी जीवनमुक्त की झांकी के लिये। नाना विधि विकास (evolution) एक ज्ञानवान् रूप फल की ख़ातिर था। उपासना, प्रार्थना, भक्ति, नाक रगड़ना, आठ आठ आंसू रोना, प्रेम की ज़र्दी (पीत) कब तक थी, जब तक ज्ञान की लाली नहीं आई।

ब्रह्मविद् एव सोऽन्यं ते मुखे भाति॥ [छांदो॰ उप॰]

मननध्यान।

अभेद उपासना की विधि: मनन, निदिध्यासनः—शास्त्र

में से उन वाक्यों को चुन लिया, जो मन में खुबते, चित्त में खुभते हैं। और उनको एकांत में बैठ कर नीचे दिखाई विधि से वर्ता। जैसे शंकर के आत्मपंचक स्तोत्र को ले लियाः—

नाहं देहो नेन्द्रियाणं तरंगम् नाहंकारः प्राणवर्गो न बुद्धिः। दारापत्य क्षेत्रवित्तादि दूरः साक्षीनित्यः प्रत्यगात्मा शिवोऽहं॥

नहीं देह इंद्रिय न अन्तः करण। नहीं बुद्ध्यहंकार वा प्राण मन। नहीं क्षेत्र, घर बार, नारी न धन। मैं शिव हूं, मैं शिव हूं चिदानन्द घन॥

चौथ पाद को दिल में बारम्बार दुहराया, और नीचे दिखाए विचार पूर्वक दोहराते गये, यहां तक कि मन शिथिल हो जाय। निस्सन्देह, ऐसी तहक़ीक़ात (मीमांसा) से जिसमें विकल्प कभी स्वप्न में भी युग नहीं, मैं देह आदि नहीं, फिर देहभ्रम को अपने में क्यों आने दूंगा? देह अभिमान करना, युक्ति दलील को उल्लंघन करना है, महा मूर्खता, बेअक्ली है।

मैं शिव हूं, मैं शिव हूं चिदानन्द घन॥

निस्संदेह वेद, वेदांत का अंतिम निष्कर्ष और कुछ नहीं। वेद और सत् शास्त्र मुझको देह आदि से भिन्न बताते हैं, मेरा अपने तईं देह आदि ठानना घोर नास्तिक बनना है, यह अपराध मैं क्यों करूं?

मैं शिव हूं, मैं शिव हूं चिदानन्द घन॥

गुरू जी ने मुझे अपने साक्षात्कार के बल से कहा "मैं देह आदि नहीं"। फिर मेरा देहाभिमान रखना पूज्यपाद गुरू जी के मुंह और ज़बान पर जूते मारना है। हाय! यह उप-

द्रव में क्यों करूं? मैं शिव हूं, मैं शिव हूं चिदानन्द घन॥

शरीर आदि की पीड़ा, सम्बन्ध, लोगों की ईर्ष्या, द्वेष, सेवा, सन्मान से मुझे क्या? कोई बुरा कहे, कोई भला कहे, मैं एक नहीं मानूंगा। जो आप भूले हुए हैं, उनका क्या भरोसा? केवल शास्त्र और प्रमाण ही माननीय हैं, मुझ में कोई पीड़ा नहीं कोई शोक नहीं, ईर्ष्या नहीं, राग नहीं, जन्म नहीं, देह नहीं मन नहीं।

मैं शिव हूं, मैं शिव हूं चिदानन्द घन॥ मैं शिव हूं, मैं शिव हूं चिदानन्द घन॥ मैं शिव हूं, मैं शिव हूं चिदानन्द घन॥

मां छोटे बच्चे को आम्रफल खेलने को देती है। बच्चा दस्तूर के मुवाफ़िक़ हाथ से पकड़ कर मुंह के पास ले जाता है और लगता है चूसने। चूसते चूसते आखिर वह फल फूट पड़ा, और बच्चे के हाथ पर, मुंह पर, कपड़ों पर रस ही रस फैल गया। अब तो न कपड़े याद हैं, न मां याद है, न हाथ मुंह का ही होश है, रसरूप हो रहा है। इसी तरह श्रुति माता का दिया हुआ यह पका हुआ महावाक्य रूपी अमर फल एकान्त में अन्तःकरण के साथ दुहराते दुहराते आखिर फूट पड़ता है और परमानन्द समाधि आ जाती है।

आवृत्तिरसकृदुपदेशात्॥ [ब्रह्म सूत्र 4-1-3]

जब सर्व देश अपने आत्मा में पाने लगे, तो परोक्ष क्या रहा? और स्थान सम्बन्धी चिन्ता क्योंकर उठे? जब सर्व काल में अपने तईं देखा, तो कल परसों आदि की फ़िकर कहां रही? जब सर्व मनुष्य और पदार्थ सचमुच अपना ही रूप जाने गये, तो यह धड़का कैसे हो कि, हा! जाने अमुक

पुरुष मुझे क्या कहता होगा? जब कार्यकारण सच्चा आप हुए, तो चित्तवृत्तियों का बेड़ा कैसे न डूबे? मन पारा खाये हुए चूहे की तरह हिलने मुलने से रह जायगा। मानो चित्त के बच्चे ही मर गये। सहज समाधि तो स्वयं होनी ही होगी।

क्या सोचे क्या समझे राम! तीन काल का वां क्या काम? क्या सोचे क्या समझे राम! तीन लोक नहिं उपजा धाम। नित्य तृप्त सुखसागर नाम, क्या सोचे क्या समझे राम!

इस सिर से गुज़र जाने में जो स्वाद, शांति और शक्ति आते हैं, वही जानता है जो इस रस को चखता है। राजा जनक ने यह अमृत पीकर अपना अनुभव यूं वर्णन किया है:—

नाह्मात्मार्थं मिच्छामि गन्धान् प्राणगतानपि। तस्मान्मे निर्जिता भूमिर्वशे तिष्ठति नित्यदा॥ नाह्मात्मार्थं मिच्छामि रसानास्येऽपि वर्त्तत:। आपो में निर्जितास्तस्माद्वशे तिष्ठन्ति नित्यदा॥ नाह्मात्मार्थं मिच्छामि रूपं ज्योतिश्च चक्षुषः। तस्मान्मे निर्जितं ज्योतिर्वशे तिष्ठति नित्यदा॥ नाह्मात्मार्थं मिच्छामि स्पर्शान् त्वचि गतानश्चये। तस्मान्मे निर्जितो वायुर्वशे तिष्ठति नित्यदा॥ नाह्मात्मार्थं मिच्छामि शब्दान् श्रोत्र गतानपि। तस्मान्मे निर्जिता शब्दावशे तिष्ठन्ति नित्यदा॥ नाह्मात्मार्थं मिच्छामि मनो नित्यं मनोऽन्तरे। मनोमे निर्जितं तस्माद्वशे तिष्ठति सर्वदा॥ [महाभारत]

इसे अनुवाद:—

अपने मन की ख़ातिर शुल़ छोड़ ही दिये अंश। रूपरंगों के गुलशन मेरे ही बन गये सब॥ जितने ज़ुबां के रस थे कुल तर्क कर दिये जब।

बस जायके जहां के मेरे ही बन गये सब॥ खुद के लिये जो मुझसे दीदों की दीद छूटी। खुद हुस्न के तमाशे मेरे ही बन गये सब॥ अपने लिये जो छोड़ी ख़्वाहिश हवा बुरी की। बादेसबा के भोंके मेरे ही बन गये सब॥ निज की ग़रज़ से छोड़ा सुनने की आरज़ू को। अब राग और साज़े मेरे ही बन गये सब॥ जब बेहतरी के अपनी फ़िक्रोख़याल छूटे। फ़िक्रोख़यालेरंगी मेरे ही बन गये सब॥ आहा! अजब तमाशा! मेरा नहीं है कुछ भी। दावा नहीं ज़रा भी इस जिस्मोइस्म परही॥ ये दस्तोपा हैं सबके, आंखें ये हैं तो सबकी। दुनिया के जिस्म लेकिन मेरे ही बन गये सब॥

एक छोटे से बालक (वामदेव) का यह अनुभव है:—

अहं मनुरभवं सूर्यश्चाहं, कक्षीवां ऋषिरस्मि विप्रः। अहं कुत्समार्जुनेयं न्यृञ्जे कविरुशना पश्यतामा॥ अहं भूमिमददामार्यां याहं वृष्टिं दाशुषे मत्र्याय। अहमपो अनयं नावशन्त मम देवासो अनुकेत मायुम्॥ [ऋग्वेद]

प्रणव (ॐ) में इन मंत्रों के अर्थ का रंग भर कर, अर्थात् 'ॐ' को महावाक्य (ब्रह्मास्मि) का अर्थ देकर जपना, गाना, श्वास में भरना, चलते फिरते चिंतवन में रखना, ब्रह्मसाक्षात्कार में बहुत बड़ा साधन है।

एक स्त्री (वाक्) अपने स्वरूप को जानकर यूं गाती है:—

अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः। अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा॥ अहं सोममाहनसं बिभर्म्यहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम्।

अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्येऽयजमानाय सुन्वते॥ अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्। तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्या वेशयन्तीम्॥ मयासो अन्नमत्ति यो विपश्यति, यः प्राणिति य ईं शृणोत्युक्तम्। अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति, श्रुधि श्रुत श्रद्धिवं ते वदामि॥ अहमेव स्वयमिदं वदामि, जुष्टं देवेभिरुत मानुषेभिः। यं कामये तंतमुग्रं करोमि, तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्॥ अहं रुद्राय धनुरा तनोमि, ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ। अहं जनाय समदं कृणोम्यहं द्यावापृथिवी आविवेश॥ अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे। ततो वि तिष्ठे भुवनानु विश्वो तामूर्ध्वां वर्ष्मणोप स्पृशामि॥ अहमेव वात इव प्रवाम्यारभमाणा भुवनानि विश्वा। परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना संबभूव॥ [ऋ॰ वे॰ 7-8-11 सूक्त 125]

फूल खिलते हैं, गाते हैं रो रो खुलखुल। क्या हंसते हैं नाले नदियां॥ रंगे शफ़क़ घुलता है, बादेसबा चलती है। गिरता है छम छम बारां। मुझ में! मुझ में! मुझ में! करते हैं अंजाम जग मग, जलता सूरज धक धक। सजते हैं बाग़ो-ब्यावां*॥ बसते हैं लन्दन पैरिस, पुजते हैं काशी मक्का। बनते हैं जिन्नत-उ-रिज़वां। मुझ में! मुझ में! मुझ में! उड़ती हैं रेलें फ़र फ़र, बहती हैं बोटें भर भर। आती है आंधी सर सर। लड़ती हैं फ़ौजें मर मर, फिरते हैं योगी दर दर। होती है पूजा हर हर। मुझ में! मुझ में! मुझ में!

* बियावां

चरख़ का रंग रसीला, नीला नीला। हर तरफ़ दमकता है। कैलास झलकता है, बहर ढलकता है। चांद चमकता है। मुझ में! मुझ में! मुझ में! सब वेद और दर्शन सब मज़हब। क़ुरान अंजील और त्रिपिटका। बुद्ध, शंकर, ईसा और अहमद। था रहना सहना इन सब का। मुझ में! मुझ में! मुझ में!

ये कपिल, कणाद और अफ़लातूं, इसपन्सर, कैन्ट और हैमिल्टन। श्री राम, युधिष्ठिर, इसकन्दर, विक्रम, कैसर, लिंजवथ, अकबर। मुझ में! मुझ में! मुझ में! मुझ में!

हूं घांग पीछे, ऊपर नीचे, ज़ाहिर बातिन में ही मैं। मारूफ़ और आशक़ शार अज़सूं बुलबुल गुलशन, मैं ही मैं

जनक राजा के आनन्द का समुद्र यूं गर्जता है:—

इति वा इति मे मनो गामश्वं सनुयामिति। कुविदसोमस्थापामिति॥

प्रयाता द्वद्धावत उन्मापिता अर्यसत। कुवि॰ उन्मा पिता अर्यसत रथमश्वा इवाश्वः। कुवि॰ उपना अतिरस्थित वाश्रापुत्रमिव प्रियम्। कुवि॰ अहं तदेव वन्धुर्वं पर्यचामि हृदा मतिम्। कुवि॰ नहि मे आत्तिपच्चवताच्छांत्सुः पञ्च कृष्टयः। कुवि॰ नहि मे रोदसी उभे शन्यं पद्यं चन प्रति। कुवि॰ अभिघ्नां महिना, भुवमभी २ मां पृथिवीमहीम्। कुवि॰ हन्ताहं पृथिवीं इमां निदधानीह वेद्दा। कुवि॰ आ पामित्पृथिवी मह वेद्ऽवनानीह वेद्दा। कुवि॰

दिवि मे अन्यः पक्षो 3 धो अन्यमचीक्लृपम्। कुवि॰ अहमस्मि प्रहा महोऽभिनभ्य मुदीापितः। कुवि॰ गृहो यान्यर्कृतो देवेभ्यो हव्य वाहनः। कुवि॰ (ऋ॰ वे॰ 8-6-26 सू॰ 119)

पीता हूं नूर हरदम, जामेसरूर पै हम। है श्वासमां प्याला, वह शराबेनूर वाला॥ हैं जी में अपने आता, दूं जो है जिसको भाता। हाथी गुलाम घोड़े, ज़ेवर ज़मीन जोड़े। ले जो है जिसको भाता, मांगे बग़ैर दाता॥ पीता॰ हर क़ौम की दुआयें, हर मत की इल्तजायें। आती हैं पास मेरे, क्या देर, क्या सवेरे। जैसे अड़ाती गायें, जंगल से घर को आयें॥ पीता॰ सब ख़्वाहिशें, नमाज़ें, गुण, कर्म, और मुरादें। हाथों में हूं फिरता, "मेमार जैसे ईंटें। हाथों में है घुमाता" दुनिया है यूं बनाता॥ पीता॰ दुनिया के सब बखेड़े, भागें फ़साद भेड़े। दिल में नहीं रुकते, न निगह को बदल सकते। गोया गुलाल हैं यह, सुमन मिसाल हैं यह॥ पीता॰ नेचर के क़ाज़* सारे, अहकाम हैं हमारे। क्या मेहर क्या सितारे, हैं मानते इशारे। हैं दस्तोपा हर इक के, मर्ज़ी पै जैसे चलते॥ पीता॰ ख़्वाहिशे सिक़ल की क़ुदरत, मेरी है मेहरो-उल्फ़त। है निगाहे-तेज़ मेरी, इक नूर की अंधेरी। बिजली, शफ़क़, अंगारे, सीने के हैं शरारे॥ पीता॰

* Laws of Nature प्रकृति के नियम।

मैं खेलता हूं होली, दुनिया है गेंद गोली। क्वाह इस तरफ़ को फैंकूं, क्वाह उस तरफ़ चला दूं। पीता हूं जाम हरदम, नाचूं मुदाम धम धम। दिन रात है तरन्नुम, हूं शाहेराम बेग़म॥ पीता॰

किंकरोमि क्वगच्छामि किं गृह्णामित्यजामिकिम्। आत्मना पूरितं विश्वं महाकल्पाम्बुना यथा॥ सर्वाभ्यन्तरे देहे ह्यध ऊर्ध्वं च दिक्षु च। स आत्मा तथेहात्मा नास्त्यनात्ममयं जगत्॥ न तदस्ति न यत्राहं न तदस्ति न यन्मयि। किमन्यदिदमिच्छामि सर्वं संविन्मयं ततम्॥ स्फार ब्रह्मामलाम्भोधि फेनाः सर्वे कुलाचलाः। चिदादित्य महा तेजो मृगतृष्णा जगच्छ्रयः॥

आदर्शः—

कहां जाऊं! किसे खोऊं! किसे ले लूं! करूं क्या मैं! मैं एक तूफ़ान ख़यामत का हूं! पुरहैरत तमाशा मैं॥ नहीं कुछ जो नहीं मैं हूं, इधर मैं हूं, उधर मैं हूं। मैं चाहूं क्या? किसे ढूंढूं, सभों में ताना बाना मैं॥ मैं यातिन, मैं अयां, ज़ेरो-ज़बर, चपरास्त, पेशोपस। जहां मैं, हर मक़ां मैं, हर ज़मां, हूंगा, सदा था मैं॥

अस्मे सूर्या चन्द्रमसाविव चक्षे। श्रद्धेकमिन्द्र चरतो वितर्तुरम्॥

हे इन्द्र! हमारे हृदय में श्रद्धा उत्पन्न हो, इस कारण ही सूर्य और चन्द्र नियमानुसार पारी पारी से नित्य भ्रमण करते रहते हैं। इसी हेतु ब्रह्मांड भी झुलका।

ॐ! ॐ!! ॐ!!!