श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

वार्तालाप।

भाग 1 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 1 · अध्याय 4 / 4

वार्तालाप।

( नीचे लिखी वातचीत प्रश्नोत्तर के रूप में लालभवन, फ़ैज़ावाद में, ता॰ 12-9-1905 मंगळवार को सवेरे 6 बजे श्री रामतीर्थ भगवान् ने श्रीमान् कुंदनलाल डिप्टी कलेक्टर, पांडेय शांतिप्रकाश, पंडित शिवानन्द तथा अन्य कतिपय जिज्ञासुओं की उपस्थिति में की। स्वामी राम ने इन महानुभावों के प्रश्नों के जो उत्तर दिये उनकी संक्षिप्त नोट श्रीमान् शांतिप्रकाश मंत्री, साधारण धर्मसभा फ़ैज़ावाद ने ली जो अविकल रूप से उद्धृत की जाती है। )

प्रश्नः- अब दिनों दिन, जैसा कि पुराणों में लिखा है, भारतवर्ष की अवस्था खराब होनी चाहिये, क्या यह ठीक है?

उत्तरः- अब भारतवर्ष सँभले बिना न रहेगा। अब इसके अच्छे दिन आयें। अधोगति की रात्रि वीत गई। एक समय था जब भारतवर्ष स्वर्गोपम कहलाता था; उसके सौभाग्य का सूर्य मध्यान्ह काल पर था। फिर दिन ढलना आरंभ हुआ। वह सूर्य मिस्र में पहुँचा। मिस्र से यूनान और रोम होता हुआ स्पेन आदि योरप के देशों में जा चमका। फिर इँगलैंड की बारी आई। और, इँगलैंड से अमेरिका जा पहुँचा जिसने सारे संसार को चकाचौंध में डाल दिया। सो, वही सौभाग्य-सूर्य अब जापान पर चमक रहा है। यही कारण है कि जापान उन्नति पर उन्नति किये चला जाता है। जापान के बाद चीन और चीन के बाद हमारा देश भारतवर्ष इस विश्वद्योतक सूर्य से प्रकाशित होगा। कोई शक्ति नहीं जो इसको रोक सके, There is no power human or divine that can stand in the way! कोई ऐसी सभ्यता नहीं जो इस

सौभाग्य सूर्य को इस चक्कर काटने से रोके रख सके। भगवन्! इस मुर्दापन को दूर करो और प्रफुल्लता को हृदय में स्थान दो। फिर कौन सी ऐसी शक्ति है जो तुमको आनंद के भोगने से वंचित रख सके। आओ और आनंद का आस्वादन करो। देखो यह अमी रस कैसा मीठा और प्यारा है। ॐ आनंद! आनंद!! आनंद!!!

फिर पुराणों के विषय में स्वामी जी ने यूं कहाः- वेदों का कर्मकांड अब कहाँ रहा? वे राजसूय यज्ञ आदि अब कहाँ गये? साँप निकल गया और लकीर रह गई और तुम लोग लकीर के फ़क़ीर, लकीर पीटे चले जाते हो। यज्ञोपवीत तो रह गया, मगर यज्ञ कहाँ गये? खाली शिखा रह गई मगर वह बात कहाँ गई जिसके लिये शिखा रक्खी जाती थी? अब तो विवाह और मृत्यु के यज्ञों का भी केवल नाम मात्र रह गया है।

महाभारत के बाद वेदों का संस्कार नहीं रहा। पहले तो युद्ध में कितने ही योधा काम आये और फिर जो कुछ बचे खुचे क्षत्रिय रह गये थे, उनमें से बहुत से अश्वमेध-यज्ञ की भेंट हो गये। अर्जुन का पुत्र अभिमन्यु मरने को जाते समय क्षत्रिय वंश का बीज बो गया था, नहीं तो इस घरेलू लड़ाई ने क्षत्रियों का बीज ही संसार से नाश कर दिया था। हाँ, इन क्षत्रियों के बाद भारतवर्ष में खत्री आ गये, कायस्थ आ गये- मगर भाइयो! बुरा न मानना,- वे क्षत्रिय नहीं रहे। इस महान् युद्ध के अंत होने पर स्त्रियाँ ही-स्त्रियाँ रह गईं। अब बिना पुरुषों के वे कर्मकांड कैसे करें? यह दशा तो क्षत्रियों की थी, बेचारे ब्राह्मण भी क्या करें? क्या बिना क्षत्रियों की सहायता के ब्राह्मण अपना निर्वाह कर सकते हैं? कदापि नहीं। देखो, महाराज विश्वामित्र को

महाराज रामचंद्र से सहायता लेने की आवश्यकता ही पड़ी। फिर युद्ध के पश्चात् जंगली जातियों ने उस समय ऐसे सिर उठाया कि महाभारत का वीर अर्जुन जो यादवों की स्त्रियाँ लिये आ रहा था, मार्ग में भीलों के हाथ से लुट गया। जिस समय देश की ऐसी दशा थी तो भला ब्राह्मण बेचारे कैसे अपना यज्ञ पूर्ण कर सकते थे? परिणाम यह हुआ कि वैदिक यज्ञों का अंत होगया। तो क्या उसके साथ धर्म का भी अंत हो गया? कदापि नहीं! कदापि नहीं!! यह नहीं हो सकता। समय की आवश्यकता के अनुसार वेदों का कर्मकांड बदलता रहता है और बदलता रहेगा, मगर वेदों का प्राण अर्थात् सत्-ज्ञान न कभी बदला है और न बदलेगा। जिस प्रकार मनुष्यों की आत्मा भिन्न भिन्न शरीरों में आया-जाया करती है मगर ज्यों की त्यों रहती है, उसी प्रकार वेदों का प्राण ज्ञान भिन्न भिन्न रूपांतरों में आया जाया करता है किंतु वस्तुतः वह स्वयं ज्यों का त्यों रहता है।

अब ब्राह्मणों ने धर्म का अंश स्थिर रखने के लिये वैदिक कर्मकांड को पौराणिक कर्मकांड में बदल दिया अर्थात् जो कर्मकांड एकादशी से पूर्णमासी तक हुआ करते थे, उनकी जगह अब केवल एकादशी और पूर्णमासी रख दिया। स्तंभ-पूजन से लिंग-पूजन रह गया। वेदों की कथाओं को पुराणों में सुनाया। अब उन कथाओं की यदि वास्तवता देखो तो मालूम होगा कि उनके भीतर कैसी फ़िलॉसॉफ़ी कूट-कूटकर भरी है। पराशर और भस्माशुर आदि की कथाओं में गूढ़ तत्वों का किस सुंदरता के साथ निरूपण किया है!

और देवता के अर्थ क्या हैं? व्यष्टि रूप से जिसको इंद्रिय कहते हैं समष्टि रूप से उसी का नाम देवता है। उपनिषद् और तैत्तिरीय ब्राह्मण में सिवाय इंद्रियों के देवता का और

कुछ अर्थ नहीं है। देवताओं ने पहले गौ के शरीर में प्रवेश किया, फिर घोड़े के, अंत में मनुष्य के शरीर में। पैरों का देवता विष्णु है जो पैरों में रहता है, इसीसे चरण धोने का काम, राजसूय यज्ञ में, श्रीकृष्ण को दिया गया था। 33 कोटि देवताओं से 33 करोड़ देवताओं का अभिप्राय नहीं है जैसा कि सर्व साधारण समझते हैं, वरन् 'कोटि' के अर्थ 'प्रकार' के हैं, इस लिये 33 कोटि से प्रयोजन 33 प्रकार के देवताओं से है*। यह सीधी सादी बात थी, मगर टेढ़ी होगई। व्याकरण और ज्योतिष ही से सब बात सिद्ध नहीं होती।

जर्मन भाषा राम ने आठ दिन में सीखी। जिस जहाज़ में राम अमेरिका गया था, उस में गाँव-छः सौ जर्मन लोग थे। राम अपने कमरे (केबिन) से बाहर आकर बहुधा जहाज़ के डेक पर घूमा करता था। मगर वहाँ से कुछ जर्मन लोग उसको अपने कमरों में ले आया करते थे और उससे बातचीत करते थे। राम ने जर्मनी ज़बान इसी तरह आठ दिन में सीख ली जैसे बच्चा कोई भाषा सीखता है। इसी तरह संस्कृत के सीखने के लिये व्याकरण और कोष में सारी आयु नष्ट न करो। पुस्तकें पढ़ना आरंभ कर दो। केवल रटंत से समझ नहीं खुलेगी। महाराज! यह तो बताओ कि 'निरंभौं' भी कोई शब्द है? पर हाँ, गुरू नानक जी के कारण गुरुमुखी भाषा में यह एक उत्तम शब्द होगया है। गुरु नानक जी के कारण गुरुमुखी एक भाषा हो गई, साहित्य बन गया। प्यारो! तुम कविता के अनुप्रास (क़ाफ़िया) रदीफ़ और बहरें पढ़े

* स्वामी जी का अभिप्राय यहाँ उन मुख्य 33 देवताओं से है जिनका उपनिषदों में ऐसा वर्णन है:- (क) आठ वसु (ख) ग्यारह रुद्र, (ग) बारह आदित्य, (घ) एक इंद्र और (ङ) एक प्रजापति।

मिलाया करो, पर जो वाक्य आत्मनिष्ठ पुरुषों से निकलते हैं, वहाँ इनकी क्या आवश्यकता? कविता की भूमि से उठकर कविता के आकाश पर आओ। गुरु नानक की कविता को देखो, उसमें कहाँ अनुप्रास और कहाँ छंद? मगर एक पारलौकिक कविता होने के कारण उसने जो गौरव पाया है, वह सूर्य की तरह प्रकाशित है। छंदःशास्त्र के विचार से गीता भी त्रुटियों से रहित नहीं है, तथापि उसको ईश्वरीय गान अर्थात् भगवद्गीता कहते हैं। इसका प्रकाश युगों के पर्दों को भेदकर आज तक बराबर छनता चला आता है। उपनिषदों में भी व्याकरण के नियम भंग किये गये हैं। व्याकरण बदल दो। जीवात्मा के साथ शरीर चलता है, न कि शरीर के साथ जीवात्मा।

स्मरण रहे कि वेदों की आत्मा (ज्ञान) सत्-ज्ञान है। उसको नहीं बदला, वेदों के केवल शरीर अर्थात् कर्मकांड को बदल दिया। आत्मा कहाँ बदल सकती है? शरीर ही बदला करते हैं। कई जगह यही घटित होता है। स्वामी दयानंद सरस्वती से पहले भी वेदों का ज्ञान तो मौजूद था, हाँ वेदों के कर्मकांड का वेशक प्रचार न था। उपनिषद् श्रद्धा और चाव से पढ़े जाते थे। संहिता छपी हुई मौजूद न थी और न सामान्य रूप से किसी के पढ़ने में आई थी। वर्तमान संहिता के प्रकाशन का इतिहास इस तरह है कि जब ईस्ट-इंडिया कंपनी भारतवर्ष में आई तब अँगरेज़ों ने वेदों की संहिता को इकट्ठा करना शुरू कर दिया। किसी एक पुस्तक वा घर से नहीं, वरन् अनेक ब्राह्मण घरानों से। क्योंकि प्रत्येक ब्राह्मण घराने में कोई न कोई वेद की शाखा मौजूद थी। कोई सी एक शाखा पढ़ लो, वाक़ी सब वही हैं। अग्नि आदि का ज़िक्र सभी में तो आ जाता है विष्णु केवल एक

स्थान पर आया है। बात वही है भेद केवल शब्दों का है। जैनियों और बौद्धों के मत से ब्राह्मणों का धर्म गया। ब्राह्मणों के मारे जाने से उनकी शाखा लुप्त हो गई। निदान जो कुछ शाखाएँ मिलीं, उनको ईस्ट इंडिया कंपनी ने इकट्ठा कराया और प्रोफ़ेसर मैक्स मूलर ने यथानियम संपादित किया। फिर वे पुस्तक के आकार में छपीं। स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने उन वेदों को पढ़ा। यद्यपि पुराणों में वेदों की आत्मा स्थिर रक्खी गई है, मगर बौद्ध धर्म का प्रभाव कहीं कहीं रह गया। बुद्ध का मुख्य मत शुद्ध उपनिषदों से निकला है। उनके शिष्यों ने बौद्ध धर्म की मट्टी पलीद की। बौद्ध मत तो क्या वरन् चार्वाक मत भी उपनिषदों से निकला है। चार्वाकों का मत वेदों से सिद्ध होता है। सारांश यह है कि वेद तो मोम की नाक है, सचाई तो हमारे भीतर होनी चाहिये। रामानुज, माधवाचार्य आदि सभी तो अपने अपने मत को वेदों से सिद्ध करते हैं। यह सब इसी प्रकार है जैसे एक मुसलमान पियक्कड़ (शराबी) ने कुरान से शराब पीना सिद्ध कर दिया। बात क्या थी कि क़ुरान में कहीं आया है कि "खाओ तुम खाव और पियो तुम शराब, जाओगे तुम जहन्नुम को।" इसका अंतिम वाक्यांश उड़ाकर अपना स्वार्थ सिद्ध कर लिया। इसी तरह वेदों से सब लोग अपना अपना स्वार्थ सिद्ध कर लेते हैं। सत्य तो यूं है कि उपनिषदों से शंकराचार्य का मत निकलता है। रामानुज का काम सामाजिक सुधार का था जो हरएक को अवश्य स्वीकारना चाहिये। प्रत्येक मनुष्य सब वस्तुओं को नहीं जानता। स्वामी दयानंद जी बड़े व्याकरणी थे चूंकि वह व्याकरण, कोष, काव्य और वेदों की संहिताओं को जानते थे, मगर वह तत्वज्ञान में अधिक जानकारी न रखते थे। श्रुत के विरुद्ध जो कुछ उन्होंने कहा

है वह रामानुज और माधवाचार्य से लिया है, और मूर्ति पूजन के विरुद्ध जो कुछ कहा है, वह मुसलमानों और ईसाइयों से लिया है। स्वामी दयानंद जी में कोई नई बात नहीं थी। जो कुछ कहा है, औरों से लिया है। इस पर पंडित शिवानंद जी ने प्रश्न किया कि यदि खंडनात्मक भाग दयानंद मत से निकाल दिया जाय तो वाक़ी कुछ न रहेगा।

स्वामी जी ने उत्तर दियाः- भगवन्, ऐसा मत कहो। उसमें बहुत कुछ ग्रहण करने योग्य शेष रह जाता है। स्वामी दयानंद के खंडन और गाली गलौज को छोड़कर तुम उनके जोश खरोश और निर्भयता को क्यों नहीं लेते? तुमको चाहिये कि हंस की तरह दूध को पीलो और पानी को छोड़ दो। जहाँ कहीं अच्छी बात मिले- चाहे दयानंद से मिले, चाहे मोहम्मद साहब से- चाहे मूसा से, चाहे ईसा से- तुम उसे तत्काल ग्रहण कर लो। प्रायः लोग गुण की ओर दृष्टि नहीं देते, दोषों को ही देखा करते हैं। इस प्रकार के भद्दे कटाक्ष लगाना (Sweeping Remarks) छोड़ दो और युक्ति का परित्याग मत करो।

बुद्ध ने वेदों के ज्ञानकांड को ले लिया, मगर पुराणों ने वेदों के कर्मकांड को भी नहीं छोड़ा। बुद्ध के बाद उनके मत के चार संप्रदाय भारतवर्ष में हो गये और वे सब जापान के उत्तरीय और दक्षिणीय भाग में हैं। बुद्ध भगवान् का जीवन अत्यंत पवित्र था। बुद्ध भगवान् ने वर्णाश्रम को बिल्कुल उड़ा दिया। कुछ तो आर्य लोग और कुछ यहाँ के मूल निवासी शैल, भील, गोंड आदि कुछ दिनों बाद सर्पों, नदियों और पत्थरों की पूजा करने लगे। भंगी लोग हारून पैग़ंबर की संतति से हैं जिनका उल्लेख बाइविल में है। राम ने अच्छी तरह इस विषय का अध्ययन किया था।

वाम मार्ग (तांत्रिकम) बौद्धों में फैल गया और अब भी अमेरिका, चीन और जापान में तांत्रिक लोग मौजूद हैं। बौद्ध मत के पश्चात् कुमारिल भट्ट ने वेदों का प्रकाश किया। मंडन मिश्र कुमारिल भट्ट का शिष्य था किंतु जिसने वेदों की आत्मा अर्थात् ज्ञानकांड प्रकाश किया वह शंकर था। भारतवर्ष, क्या सारे संसार में यह सब से महान् पुरुष हुआ है। राम और कृष्ण की बात दूर गई, किंतु वर्तमान काल में शंकर से बढ़कर दूसरा मनुष्य जगद् में उत्पन्न नहीं हुआ। उसने द्वारकाजी से जगन्नाथजी अर्थात् अटक से कटक तक पैदल कई भ्रमण किये। कन्याकुमारी अंतरीप से बद्रीनाथ तक उसने पृथ्वी को नापा। शंकराचार्य के तत्वज्ञान ने योरप के तत्वज्ञान में जीवन डाल दिया। जर्मन तत्ववेत्ता कैंट (Kant) आदि ने इसके ग्रंथों का अध्ययन किया था। अब ऐसे ही जाग्रतात्मा पुरुष, जो परमात्मा के अस्तित्व के आगे जगत् के अस्तित्व तक को कुछ नहीं मानते, दूसरों को जगा सकते हैं, नहीं तो "खुफ़्ता रा खुफ़्ता के कुंद बेदार" अर्थात् "सोते को सोता भला क्योंकर जगा सके?"

इस महापुरुष शंकर ने भारतवर्ष को जगा दिया। ओहो! इसने भारतवर्ष में सजीव मेधाशक्तियाँ उत्पन्न कर दीं। उसने दस प्रकार के संन्यासी बना दिये, और प्रत्येक का एक एक नाम रख दिया। चार मठ स्थापित कर दिये। ये दशनामी संन्यासी उन मठों में रहकर ईश्वरीय शिक्षा का संग्रह करते थे। 'Great men are always found in caves' "महान् पुरुष सदैव केंद्राओं में पाये जाते हैं।" ज्योतिर्मठ, शारदा मठ, शृंगेरी मठ, गोवर्धन मठ सब इन्हीं के स्थापित किये हुए हैं। राम भी द्वारका के शारदा मठ से संबंध रखता है।

जब नवीन जातियाँ बौद्ध बन गईं तो कुछ दिनों बाद

वाम मार्ग आदि के रूप में प्रकट होकर अत्याचार करने लगी। इस महापुरुष शंकर ने इन अत्याचारों को दूर किया और शंकराचार्य के पश्चात् हिंदू धर्म फैल गया। पिता तो है आर्य धर्म और माता है बौद्ध धर्म।

इंगलैंड में Hood (एक प्रकार का टोप) और Gown (साफ़ा) अभी तक ग्रैजुएट को दिया जाता है। ये क्या हैं? फ़क़ीरों के जुब्बा (एक तरह का बे-बाहों का कुर्ता) और कासा (कटोरा) की नक़ल है। जिस तरह Knight (शूरवीर) बनने से पहले Page (सेवक-अनुचर) होना पड़ता है, उसी तरह से पहले ब्रह्मचर्य फिर संन्यास। संन्यास देने का अधिकार गुरू को उस समय तक नहीं है जब तक संन्यास का वृत्ति-श्वास भीतर से फूट फूटकर बाहर न निकल आवे। इसी प्रकार से ये संन्यासी बनाए गये थे। ये चलती फिरती युनिवर्सिटियां थीं। शंकर के कारण हिंदू धर्म फैल गया। अब नामों की सनदों से काम होने लगा। लोग तो लेबलों के मातहत काम करते हैं। अगर एक आर्य समाजी ने कोई बुरा काम किया तो क्या सब आर्यसमाजी बुरे होगये? इस तरह के भद्दे विचारों को को छोड़ दो। शंकराचार्य के बाद पुराने फल उड़ गये, नये फल आ गये। शंकर के बाद बहुत सी ऐसी पुस्तकें लिखी गईं, जिनमें तंत्रवाद आदि का सब उल्लेख है।

जिस प्रकार वेदों के कर्मकांड को बदल दिया उसी प्रकार अब पुराणों के कर्मकांड को बदल दो। जिस तरह गर्मी आने पर जाड़े के गर्म कपड़ों को तुम बदल देते हो उसी तरह अब भी उपस्थित वर्तमान समय के अनुसार पौराणिक कर्मकांड को बदल दो, मगर पुरानी वैदिक आत्मा को स्थिर रक्खो अर्थात् श्रुति को रख लो।

"मोमिन ज़े क़ुरआन मर्ज़ ए बदइतम।

उस्तख़्वाँ ए पेशे सगाँ अंदाख़्तम" अर्थात्- मैंने कुरान से गूदे (मग़्ज़) को निकाल लिया है, और उसका छिलका (हड्डियाँ) कुत्तों के आगे डाल दिया है। अगर राम कोई चीज़ कहता है तो इस वजह से नहीं कहता है कि अमुक पुरुष ने कहा है या अमुक ग्रंथ में लिखा है, वरन् इसी हेतु से कहता है कि हमको इसकी आज अत्यंत आवश्यकता है।

बाबू जयदयाल जी ने प्रश्न कियाः- महाराज! शाक्त मत कैसा है?

स्वामी जी ने उत्तर दियाः- जिस शाक्त मत ने स्वामी रामकृष्ण परमहंस को पैदा कर दिया, उसको कौन बुरा कह सकता है? ॐ! ॐ! ॐ!

जिस वस्तु की चर्चा करते हुए तुम नीचे गिरते हो, उसे उड़ा दो।

बाबू कुंदनलाल ने प्रश्न कियाः- महाराज! हमको किस बात का अभ्यास होना चाहिये?

स्वामी जी ने उत्तर दियाः- जो पढ़ते हैं, उसी का अभ्यास करना चाहिये। यही सत्यता है। जिसके मन और वाणी एक हैं वही उन्नति कर सकता है।

बच्चा मा का दूध पीते पीते (अपना काम करते हुए) दाँत निकाल लेगा। इसी तरह हम लोग अपने कोमल से कोमल धर्म पर चलते हुए 'दासोऽहं' से 'शिवोऽहं' पर पहुँच जाते हैं। जो पलड़ा भारी हो उसी ओर centre of gravity भार का केंद्र होगा। यदि आपका संसारी पलड़ा भारी है तो वहाँ ही रहोगे। मंज़िलें अनेक हैं:- (1) 'तदेवाहं'=मैं उसी का हूं। वह कहीं अलग दूर है, अन्य पुरुष 3rd person है।

(2) 'तवैवाहं'=मैं तेरा हूं। तू सामने मौजूद है, मध्यम पुरुष 2nd person है। (3) 'त्वमेवाहं'=मैं तू ही हूं। जुदाई दूर, उत्तम पुरुष 1st person है। मनुष्यों और जातियों को इन्हीं मंज़िलों में से होकर गुज़रना पड़ता है। राम ने भी इन मंज़िलों को पार किया है। बच्चा गोद में रहते रहते और दूध पीते पीते कहता है कि मैं बाहर खेलने जाता हूं!

धर्म वह है जो भीतर से स्वतः निकले नकि वह जो बाहर से भीतर ठूंसा जाय। सूर्य चमकता है कि चीज़ें उत्पन्न हों। नक़ल से काम नहीं निकलता। सवार बुद्धिमान् पशु (Rational animal) है, घोड़ा बिल्कुल पशु है। घोड़े की नाथ से मत खींचो। ज़ोर से काम नहीं चलता, प्रेम से चलता है।

(1) जिसकी स्थिति 'दासोऽहं' पर है, वह उसी प्रकार की पुस्तकों को पढ़े जैसे इंजील, भक्तमाल, भागवत पुराणादि और इसी से उस मनुष्य को ढाढस होगा। भीतर की वृत्ति (Psychology) अर्थात् "हृदय के ज्ञान को पढ़ने से" बड़ा लाभ होता है।

(2) जिसकी स्थिति 'तवैवाहं' में है, अर्थात् मैं तेरा हूं, उसको विनयपत्रिका, सूरश्यामवाले पद, गीत गोविंद, नारद के भक्तिसूत्र, और कई प्रकार के भजन, रामायण के कोई कोई अंश, जैसे रामायण का वह अंश जहां राम वन जाते समय लक्ष्मण और सीता से विलग होते हैं, पढ़ना चाहिये।

(3) तीसरी श्रेणी वालों के लिये बुल्लाशाह और गोपालसिंह की वाणियों के पढ़ने से भी बड़ा लाभ होता है। ये दो पंजाबी हैं। मगर गोपालसिंह की वाणी ने अभी अधिक प्रसिद्धि नहीं पाई है। इन वाणियों को पढ़ते पढ़ते मारे प्रेम के आँखें बंद हो जाती हैं। गुरु ग्रंथसाहब में दोनों श्रेणी की

अपार वाणियां हैं, तीसरी श्रेणी की बहुत कम। पाठ करते हुए जहां देखा कि चित्त एकाग्र हो गया, किताब को छोड़ दो। घोड़े पर तुम सवार हो, न कि घोड़ा तुम पर सवार है। पाठ किसके लिये है? भीतर के आनंद के लिये। लोग पढ़ते हैं, मगर पागुर (जुगाली) नहीं करते। अगर पागुर न करोगे तो (mental dyspepsia) मानसिक अजीर्ण हो जायगा। राम जब योग वासिष्ठ पढ़ता था तो उसका नियम था कि उसने थोड़ा सा पढ़ा और फिर किताब को बंद कर दिया और उसको मनन करना आरम्भ कर दिया। यदि इसी तरह से पढ़ा जाय तो क्या बात है जो भीतर घर न बना ले। मनोविज्ञानशास्त्री लोग यह सिखलाते हैं कि जब बुद्धि की सीमा को छोड़कर निष्ठा की सीमा को जाते हैं तो अच्छे हो जाने के सामान बन जाते हैं।

यदि आप चाहते हैं कि अद्वैत या वेदांत को हम पढ़ें तो पहले बौद्धिक संशय और फिर निर्णायक संशय दोनों को उड़ा देना चाहिये। बुद्धि विषयक संशय को दूर करने के लिये राम एक पुस्तक* लिखेगा, और यह किताब उस समय लिखी जायगी जब राम दो वर्ष एकांत में रहेगा। निर्णायक संशय भी फिर उड़ जायगा। इन संशयों को दूर करने के लिये उपनिषदों, भगवद्गीता और शंकर के शारीरक भाष्य को पढ़ें। रिसाला †अलिफ़ ‡थंडरिंग डॉन (नून) आदि भी इसी प्रकार के रिसाले हैं। छांदोग्य उपनिषद के पाठ से राम

* शोक है कि राम हमको छोड़कर चल दिये, नहीं तो बहुत सा काम अभी करना था।

† यह रिसाला स्वामी राम ने उर्दू भाषा में निकाला था जब कि आप गृहस्थाश्रम में थे। इसका मंत्र 'कुलिआते राम' के नाम से छप चुका है।

‡ यह अंग्रेजी मासिक पत्रिका स्वामी राम की आज्ञा से उनके परम मित्र मि॰ पूर्णसिंह निकालते थे।

का मन तीसरी श्रेणी पर आया। जिस समय राम दूसरी श्रेणी में था तो वाल्मीकि रामायण के उस भाग को जहाँ राम को वनवास हुआ है, प्रायः पढ़ा करता था और रोया करता था।

राम का मन एक बार बिगड़ गया। लाहौर में अपने कोठे पर चढ़ा था। वहां से उसने किसी स्त्री को नग्न देखा जिससे उसका मन बिगड़ा। मगर मन की इस अवस्था को देखकर वह तत्काल छाती कूटने और रोने लगा, और उस दिन से इस बात का पक्का इरादा कर लिया कि या तो हम मरेंगे या मन को मारेंगे। राम बचपन में बड़ा हठी था। जिस बात के करने की हठ करता था उसको करके छोड़ता था। गणित के प्रश्न हल करना रहा हो तो उसमें जी-जान से लग गया, खाना पीना, खेलना कूदना सब बंद। एक बार ऐसा हुआ कि कुछ प्रश्न उसने हल करने का इरादा किया। रात भर हल करता रहा, मगर सब सवाल हल न हुए। बस, सवेरा होते ही कोठे पर चढ़ गया और ऊपर से गिर कर मरने लगा। मगर ख़याल आया कि मरूँ तो क्योंकर? सवाल तो अभी पूरे हल नहीं हुए। तात्पर्य यह कि इसी प्रकार से प्रायः हठ किया करता था और यही हठ वाद की दृढ़ता के रूप में परिवर्तित हो गया। संन्यास लेने से प्रथम राम एक बार कश्मीर को चला गया था। फिर वहाँ से आकर कुछ दिन घर पर रहा। मगर बकरे की मां कब तक ख़ैर मनायगी, दूसरी बार फिर निकल पड़ा। वर्ग में जब पढ़ाता था तब प्रायः गणितशास्त्र का व्याख्यान भक्ति के विषय में परिणत हो जाता था। अंत में उसको सांसारिक संबंध छोड़ने ही पड़े। हरिद्वार में पहुंचा। हरिद्वार से ऋषिकेश के मार्ग से सत्यनारायण के मंदिर पर पहुंचा। अपने रेशमी वस्त्र और सोने की जंजीर और घड़ी आदि सब इधर उधर फेंक दिये।

तीन सौ रुपये घर से और मंगवाये। वह भी खर्च कर डाले। फ़क़ीरों, साधुओं से मिला। वार्तालाप हुई। सब से शास्त्रार्थ हुए। तब राम ने यह देखा कि जवानी ज्ञान छांटने में किसी से कम नहीं हूं। मगर हाय! शांति फिर भी नहीं है। अब वह शांति की खोज में घूमता फिरता है। एक दिन प्रातःकाल सत्यनारायण के मंदिर से, जहाँ वह ठहरा था, सब साथियों को छोड़कर अकेला भाग निकला। मगर एक संस्कृत का विद्यार्थी उसके साथ हो लिया क्योंकि संस्कृत के विद्यार्थी प्रायः बड़े सवेरे उठते हैं। सुयोग से एक मस्त अद्वैत मूर्ति महात्मा से इसकी आंखें दो चार हुईं। उनके पास केवल एक लँगोटी थी और कुछ न था। वह लँगोटी कुछ फटी हुई थी। एक सेठ बद्रीनाथ को जा रहा था। इस मस्त महात्मा ने इस सेठ से अपनी लँगोटी की ओर, जो कुछ खुली थी, संकेत करके कहा-"अरे बद्रीनाथ! तू यह देख ले।" इन महात्मा का नाम बद्रीदेव था। इनसे जब राम की आंखें दो चार हुईं, दोनों हँस पड़े। वार्तालाप हुई। दशा पलट गई। वहाँ से पहाड़ पर चला, जहां जंगल के किनारे एक ब्रह्मपुरी नाम का आश्रय है। राम ने वहां उपनिषदों को पढ़ा। छांदोग्य उपनिषद शांकर भाष्य सहित पढ़ा जा रहा था। फिर तो ऐसी समाधि लगी कि कुछ न पूछो। अगर राम चट्टान पर लेटा है तो कोई पत्थर का टुकड़ा पड़ा है। अगर धूप में बैठा है तो खुद धूप हो गया है। ऐसी दशा में वह लड़का भी जो के साथ हरिद्वार से भाग निकला था, राम से अलग रहता था। कभी नीचे से कुछ लाकर राम को खिला जाया करता था। उस समय राम की ऐसी दशा हो गई कि यदि वह वायु को आज्ञा दे कि चल, तो वायु तत्काल चल पड़ती थी। पंचमहाभूत उसकी आज्ञा का पालन करते थे। यदि उसको किसी ग्रंथ की आवश्य-

कता होती थी तो कोई व्यक्ति वहीं किताब लिये उसके पास चली आती है। तात्पर्य यह कि यह अवस्था निरंतर छः महीने तक रही और यह स्थिति केवल इस प्रकार के मनुष्य की नहीं हो सकता, वरन् प्रत्येक व्यक्ति को प्राप्त हो सकती है। जब अनुभव प्रत्यक्ष होता जाय तब तर्क और दलीलों को उड़ा दो जो पुस्तक आप के चित्त पर प्रभाव डाले, साथ रखलो। मगर जब वह वस्तु भी मिल जाय तो पुस्तक को भी फेंक दो।

पहली चोट:-(क) पहला साधन-पढ़ना गुलीडंडे की पहली चोट है। फिर दूसरी चोट अभ्यास की है। पहला दर्जा पाठ, दूसरा दर्जा जप। (ख) दूसरा साधन-अभ्यास, संयम और आकर्षण से अपने शरीरों को उड़ा ले जाओ। क्यों न हम प्रकृति के दृश्य से आकाश तक उड़ते चले जायं? प्रातःकाल के समय नदियां, बाग़ और सूर्य के सामने आ जायँ कि जिससे मन उछव हो। महात्माओं के सत्संग से भी मन महान् हो जाता है। यह गुलीडंडे की पहली चोट है।

दूसरी चोट:-"चुनाँ पुर शुद क़िज़ाए सीना अज़ दोस्त। बयाले ख़्वेश गुम शुद अज़ ज़मीरम।" (अर्थात् मेरे हृदय की भूमि मेरे मित्र से ऐसी भरी हुई है कि मेरे दिल से अपने अस्तित्व का ज्ञान ही नष्ट हो गया। वातावरण (atmosphere) में भराव (Saturation) आ जाता है तब किताब को उठाकर ताक़ में रख दो। जब छैल छबीले की मूर्ति से आंख लड़ी तब ज्योति में ज्योति समा गई। जब इन मनोहर दृश्यों से चित्त में उमंग भर आवे, तब ओम् ओम् का गाना शुरू कर दो। यह ओम् का गाना ब्रह्मांड का गीत अर्थात् ब्रह्मध्वनि music of the sphere है, जिसको महात्माओं ने सुना है, और सुनाते हैं। और जो सुनना चाहे वह सुन सकता है:-

नग़मे सुरीले ओम् के हैं इससे आ रहे।

नदियां परिंदे याद में हैं सुर मिला रहे॥

अनुराग को न कुचलो। ऐसे अनुराग को रोक देना मानो महात्मा यूसुफ़ को कुएँ में डाल देना है। जब वह दशा आ जाय तो उसको स्थिर रक्खो। कृष्ण की बंसी का नाद सुनकर गोपियां विहाल हो जाया करती थीं। इस आंतरिक राग के सामने प्रत्येक वस्तु को न्योछावर कर दो, क्योंकि ईश्वर भीतर बैठा है। संसार का काम कभी नहीं बिगड़ेगा। इस अवसर पर यदि आप से कुछ पद निकलें तो निकलने दो। अंतर ध्वनि के अनुसार चलो तो आनन्द मग्न हो अन्यथा नष्ट हो जाओगे। वेदांत शास्त्र (आत्मज्ञान) का व्याख्यान पढ़ो। एकांत में अधिक सुख होता है।

सांस-सांस पर सुमिरो हरिनाम। जिह्वा से नाम लेने पर मन पर प्रभाव पड़ता है। जपः-(1) वाणी से, (2) मन से, (3) संपूर्ण शरीर से होना चाहिये। नाम की महिमा अद्भुत है। ओम् केवल वेद में नहीं, कुरान में भी मौजूद है:-

अलिफ़+लाम+मीम=उम=ओम्।

कुरान की बहुतेरी आयतों के आरंभ में अ, ल, म, जो आया है वह यह "ओम्" ही है। अ, ल, जो प्रायः शब्दों के आरम्भ में आता है उसका लकार 'पेश' अर्थात् उकार में परिवर्तित हो जाता है। जैसे करीम-उल-दीन पढ़ने में करीमुद्दीन हो जाता है। और 'पेश' अर्थात् ह्रस्व उकार 'वाव' अर्थात् वकार का संक्षिप्त रूप है। अतएव कुरान का अ+ल+म=अ+उ+म= (ॐ) के समान है।

ॐ ! ॐ !! ॐ !!!

आनन्द ! आनन्द !!