॥ ॐ ॥ — संक्षिप्त जीवन-चरित ।
मृत्यु बहुबार भी बाना बने, ताना मम की नित्य ही । हमें तथापि न मार सकती, बात यह है सत्य ही ॥ जनम हमारा कभी हुआ नहिं, पुनि संख्या सांस-जन्म की । वैसे ही अगणित हैं जन्मे, अनिद्र सिन्धु की नवलहरी ॥ फेंक दो मृत देह को पर कुछ बिगडता क्या कभी । फूंक दो चाहे इसे पर नष्ट होता क्या कभी ॥ है अनन्तता मन्दिर मेरी, सान्त होती नहिं कभी । ज्योति हूं उस अग्नि की जो बुझ नहीं सकती कभी ॥ सब नेत्र मेरे नेत्र हैं, हैं कान भी मेरे सभी । विश्व में जितने हैं मन क्या पृथक हो सकते कभी ॥ यमराज से डरता नहीं मैं, काल मेरा ग्रास है । लोक की बहुरूपता मम प्यास की नित आस है ॥ गृहस्थाश्रम में गोसांई तीर्थराम एम. ए. के नाम से परिचित स्वामी राम का जन्म पंजाब प्रान्तीय गुजरानवाला जिले के मुरालीवाला ग्राम में दीपमालिका के दूसरे दिन सन् 1873 ई० (22 अक्तूबर) को हुआ था। आपके पिता पण्डित हीरानन्द गोस्वामी और माता का नाम निहालदेई था। [सम्पादकीय टिप्पणी: मूल प्रति में यह वाक्य अपूर्ण था; तिथि व माता-पिता का विवरण अन्य प्रामाणिक जीवनी-स्रोतों से यहाँ जोड़ा गया है।]
वे सदा प्रफुल्लित रहते थे । जो प्रफुल्लता किसी प्रकार से भी नष्ट नहीं होती, वह उनके बांटे पड़ी थी । अमेरिका की 'ग्रेट पैसिफिक रेल रोड कम्पनी' के मैनेजर ने उन्हें 'पुल-मैन कार' में स्थान देते हुए कहा था, "उनकी मुस्कियां वशीभूत करने वाली हैं" । सेंट लुई की प्रदर्शिनी में धार्मिक संघ के महान् समारोह के सम्बन्ध में स्थानीय समाचार पत्र ने लिखा था, कि समारोह में एक मात्र चमत्कारपूर्ण वस्तु स्वामी राम थे । घरेलू ढंग से की हुई शंकाओं और प्रश्नों का उत्तर देने में मिनटों तक बराबर हंस कर मानो, वे अप्रत्यक्ष रीति से कहते थे कि ईश्वर और मनुष्य सम्बन्धी यावत् प्रश्नों के उत्तर के लिये मेरा मनोहर व्यक्तित्व और हृदयग्राही चैतन्यता ही यथेष्ट हैं । उनकी मुस्कराहट विजली का प्रभाव रखती थी । वे लोगों को सनसना देते थे । वे राम बादशाह कहलाते थे, क्योंकि अपने उल्लासपूर्ण जीवन से उन्होंने सांसारिक सम्राटों की सजधज वस्तुतः उपहास्य बना दी थी । एक बार उन्हों ने लिखा था, "मैं राम बादशाह हूँ जिसका सिंहासन तुम्हारे हृदय हैं । जब मैंने वेदों के द्वारा प्रचार किया था, जब मैंने कुरुक्षेत्र, जेरूसलम, और मक्का में उपदेश दिया था, तब लोग मुझे नहीं समझे थे । अब फिर मैं अपना स्वर उठाता हूँ । मेरा स्वर तुम्हारा स्वर है 'तत् त्वम् असि' । जो कुछ तुम देखते हो सब तुम्ही हो । कोई शक्ति इसे रोक नहीं सकती, कोई राजा, प्रेत या देवता इसके सामने ठहर नहीं सकते । सत्य की आज्ञा अटल है । म्लान मत हो । मेरा शिर तुम्हारा शिर है, इच्छा हो काट लो किन्तु इसके स्थान पर सहस्रों निकल आवेंगे" । वे पूर्ण प्रेममय थे । नीचातिनीच से भी उनका व्यवहार अत्यन्त कोमल होता था । वे अपनी पुस्तकों, कलमों, पेंसिलों,
छूरियों और आरियों तक को जीवधारियों की भांति सम्बोधन करते थे और अनेक बार मैंने उन्हें उनको चाटते चुमकारते तथा बड़े स्नेह से बात चीत करते देखा है । उनके विचार और वार्तालाप प्रत्येक वस्तु को ऊँचा कर देता था । उनके लिये कोई ऊँचा या नीचा, जानदार या बेजान नहीं था । प्रत्येक वस्तु उनके लिये अपने वाह्य रूप से कुछ अधिक थी—परमेश्वर थी । जिस किसी से उनकी भेंट होती थी उससे वे 'एकता' की हृदय और अन्तःकरण से चेष्टा करते थे, और अपने आपकी उससे सम्पूर्ण अभिन्नता का अनुभव करते थे । और इस प्रकार पहले उसके हृदय को वशीभूत करने के बाद अप्रत्यक्ष सूचनाओं द्वारा सत्य के नाम में वे उसकी बुद्धि से विनय करते थे । नेत्र बन्द कर, गहरी और स्वच्छ सत्यता के गम्भीर स्वरों से, वे उर्दू और फारसी के अपने कतिपय प्रिय पद्यों का जब बार २ पाठ करते थे, तब उनके गुलाबी गालों पर से आनन्दाश्रु बह चलते थे । उन पद्यों का ऐसा प्रभाव उन पर होता था कि प्रत्येक उपस्थित व्यक्ति को प्रत्यक्ष हो जाता था कि राम उनमें बिलकुल डूब गये हैं । घंटों भर उनकी यह दशा रहती थी । अपनी सार्वजनिक वक्तृताओं के बीच में वे अपनी दशा को भूल कर अपने प्रिय पवित्र मंत्र " ॐ " " ॐ " " ॐ " की आवृत्तियां करने लगते थे, यहां तक कि उनके अमेरिकन स्नेहियों ने कहा था कि शरीर-केन्द्र में वे बहुत ही कम रहते थे । उनका निवास सदा परमात्मा में रहता था । कुछ साल हुई अमेरिका के कुछ मनोविज्ञान-शास्त्रियों ने भविष्यद्वाणी की थी कि स्वामी जी के से उच्च आध्यात्मिक विचारों में जो पूर्णतया व्यस्त है, और इस तथ्य को नितान्त भूल कर कि वह शरीरधारी, है उनमें दिन रात निरन्तर लीन रहता है, वह इस शारीरिक ढांचे की हृदवन्दी
में अधिक काल तक नहीं ठहर सकता । वे वस्तुतः अपने को भूल गये थे, अथवा कदाचित बहुत ही न्यून स्मृति रह गई थी । अपना शरीर राम के लिये उच्चतर जीवन का वाहन मात्र था, जैसा कि ईसा के शरीर के सम्बन्ध में उन्होंने कहा था । अमेरिका में राम ने कहा था, "जीवन इस शरीर-पींजरे में बन्द तोते के पंखों की फड़फड़ाहट मात्र है" । शब्दों द्वारा उनके शरीर की मोहनी अंकित नहीं हो सकती । उनकी दृष्टि आपका सम्पूर्ण आन्तरिक प्रेम उनकी ओर आकृष्ट कर लेती थी । उनका स्पर्श मात्र ही शुष्क हृदयों में भी कवियों की सी उमंगें उत्पन्न करता था, और मनुष्य की आत्मा को दैवी आनन्द की सुवासित हरियाली से सुसज्जित कर देता था । सभी महात्माओं के जीवन का यही लक्षण रहा है । पौराणिकों ने अपने काव्यमय वर्णन में इसका मनोहर उल्लेख इस प्रकार किया है कि अमुक के आगमन से सूखे वृक्षों में नई पत्तियां और कलियां निकल आईं, अंगूरों के बाग हरे भरे हो गये, और सूखे सोते मानो हर्षोन्माद में स्फटिक जल की धारा बहाने लगे । समुद्रयात्रा में स्वामी राम को उनके अमेरिकन सहयात्रियों ने अमेरिकावासी समझा था । जापानी उनसे ऐसा स्नेह करते थे कि मानो वे उन्हीं के देश के निवासी हैं । जब वे उनके देश से अमेरिका को उड़ गये थे, तब उनके परिचित अनेक जापानियों ने कहा था, अब भी हमें अपने कमरों में उनकी ईषत्हास्य की विद्युच्छटा के दर्शन होते हैं । उनके ललाट की चमत्कारिणी विशुद्धता अब भी हमें अपने प्रिय फ़ूजीयामा हिम शिखर की भांति याद है । गैरिक वस्त्रधारी व्याख्याता राम जापानी चित्रकार को अग्नि स्तम्भ प्रतीत हुआ था, जो श्रोतृमण्डली में जीवनस्फुलिंगों की वर्षा
कर रहा था, न कि शब्दों की। कैलिफोर्निया में दैवी ज्ञान की मशाल, हिमालय का बुद्धिमान पुरुष कहकर उनका अभिनन्दन किया गया था, जिसके अनुभव के सामने सभ्यता के वर्तमान क्रम का उलट जाना अवश्यम्भावी समझा गया था। वे अमेरिका की सब रियासतों में घूमे और उतने ही व्याख्यान दिये जितने दिन कोलम्बिया में ठहरे। उन्होंने कहा, "मैं पूर्ति करने को आता हूँ, न कि नष्ट करने।" ईसाई गिरजों में उन्होंने व्याख्यान दिये, और उनके व्याख्यान वैसे ही मौलिक होते थे जैसे व्याख्यानों के उनके नियत किये हुए शीर्षक। डेनवर में बड़े दिन की संध्या को उनके व्याख्यान का विषय था, "प्रत्येक दिन नये वर्ष का दिन और हरेक रात बड़े दिन की रात है।" एक अमेरिकन ने उनके अन्य व्याख्यानों का संक्षिप्त वर्गीकरण निम्नलिखित शीर्षक देकर किया है। [1] तुम क्या हो? [2] आनन्द का इतिहास और घर। [3] पाप का निदान, कारण और उपचार। [4] प्रकाश। [5] आत्म विकास। [6] प्रकाशों का प्रकाश। [7] यथार्थ-वाद और आदर्शवाद एकीकृत। [8] प्रेम के द्वारा ईश्वर का अनुभव। [9] व्यावहारिक वेदान्त। [10] भारत। और अमेरिका में दिये हुए उनके उपदेशों का सार-संकलन उसने इस प्रकार किया हैः— (1) मनुष्य का देवत्व। (2) संसार उसकी सहकारिता करने को बाध्य है जो सम्पूर्ण संसार से अपनी एकता समझता है। (3) शरीर को सचेष्ट संघर्ष में और मन को प्रेम तथा शान्ति में रखने का ही अर्थ है यही अर्थात् इसी जीवन में पाप और दुःख से मुक्ति। (4) सब से अभिन्नता के व्यावहारिक अनुभव से हमें
समतोल निश्चिन्तता का जीवन प्राप्त होता है। (5) सकल संसार के पवित्र धर्मग्रन्थों को हमें उसी भाव से ग्रहण करना चाहिये जैसे हम रसायनविद्या का अध्ययन करते हैं और स्वयं अपने अनुभव को अन्तिम प्रमाण मानना चाहिये। दो वर्ष से भी कम में उन्हों ने अमेरिका में कितना कार्य किया, अथवा जिन अमेरिकनों को उनका संसर्ग हुआ उन पर कैसे संस्कार पड़े, इसका सविस्तर वर्णन मैं यहां नहीं कर सकता। किन्तु अमेरिका से भारत के लिये उनके यात्रा करने के समय विदाई की सभा में कुछ अमेरिकनों ने निम्नलिखित जो कविता पढ़ी थी, उसे बिना उद्धृत किये मैं नहीं रह सकताः— डाल रसाल पै बैठी सी कोयल "राम" हमैं नित गाय सुनावत। सीरी भरी पंडिताई से बातैं हैं पूरब की जो विशेष कहावत॥ देश हमारे प्रतीची कृपा करि हैं उनको विस्तार बढ़ावत। मारग के तो पछी हू बने ये संदेश सुरेश को पूरो हैं लावत॥ घनघोर पुकार यों गूँजति है सुन लेइ जो चाहत याहि सुनो। "है ईश की वस्तु सभी जग की पुनि ईश सभी के सदा ही गुनो"॥ समुझाय संदेश यों दूरि भजे दुत तारा है टूटत रात मनो। पै स्वर्ग की ज्योति को लेश सो छोडि चले हेतु स्वजाति के प्रेमदुनो॥ प्रिय राम हमारो है अन्त प्रणाम कछू जिमि औरहु बूझि परै। मृदु हांसी तुम्हारी अनोखी बडी जो निर्जीवहु में नवशक्ति भरै॥ याहि लोक मैं फेर चहैं न मिलैं पर दिव्य प्रभा न कभौ विसरै। तेरो भलो है सदा ही घनो हरि राजै तुव में तू हरि में बिहरै॥ मिस्रमें मुसलमानों ने उनका हार्दिक स्वागत किया था। उनकी मसजिद में उनके लिये राम ने फारसी में एक व्याख्यान दिया। दूसरे दिन समाचार पत्रों ने लिखा कि, स्वामी
राम एक प्रतिभाशाली हिन्दू हैं और उनसे भेंट होना बड़े गौरव की बात है। टोकियो के राजकीय विश्वविद्यालय के संस्कृत कालेज के अध्यापक टका कुटसू ने कहा था कि राम के सिवाय किसी दूसरे वास्तविक भारतीय तत्ववेत्ता के दर्शन मुझे नहीं हुए। ऐसा उनका प्रेम था। भारत लौटने पर मथुरा के उनके कुछ भक्तों ने एक नया समाज संगठित करने की प्रार्थना की थी। राम ने यह कहते हुए कोरा जवाब दिया कि भारत में जितनी सभायें काम कर रही हैं, वे सब मेरी ही सभायें हैं और मैं उनके द्वारा काम करूँगा। इस समय उन्होंने हर्षोन्मत्त होकर नेत्र मूँद लिये, प्रेममय आलिंगन के चिह्नस्वरूप अपने हाथ फैलाये, और अश्रुपात करते हुए नीचे लिखे शब्द कहे, जिनसे उनके महान् विश्वव्यापी प्रेम तथा महत्तर आत्मिक मौनता पर बड़ा प्रकाश पड़ता है; "इसाई, हिन्दू, पारसी, आर्य्यसमाजी, सिख, मुसलमान और वे सभी जिनकी नसें, अस्थियां, रक्त और मस्तिष्क की रचना मेरे प्रिय इष्टदेव भारत भूमि का अन्न और निमक खाकर हुई है, वे सब मेरे भाई हैं, नहीं, मेरी आत्मा ही हैं। कह दो उनसे मैं उनका हूँ। मैं सब को आलिंगन करता हूँ। मैं किसी को परे नहीं करता। मैं प्रेम हूँ। प्रकाश की भांति प्रेम हरेक वस्तु और सब को प्रकाश के चमत्कार से सज्जित करता है। सत्य ही सत्य में प्रेम की कान्ति और प्रवाह के अतिरिक्त और कुछ नहीं हूँ। मैं सब से समान प्रेम करता हूँ।" बनि घनघोर मेघ घेरि कै गगन मंडल, बडे २ बूंदन सों प्रेम बरसावैंगे। साहस बढाय कै करि है प्रतिरोध कोऊ, बांह धरि वाको वाही प्रेम में नहवावैंगे॥ सभायें बडी औ भारत समुदाय जेते, उनसो कदापि नाहीं बिलग बनावैंगे। शक्तियां हैं जौन स्वागत सभीको आज, शान्ति सुख प्रेमकी बहिया बहावैंगे॥ राम विचित्र पुरुष थे। वे वर्तमान और भावी मानव-
जाति के विश्वव्यापी चैतन्य में हृदय और आत्मा सहित अपने को विसर्जित कर देना चाहते थे। उनकी अंग्रेजी काव्यकृति में जिस अद्भुत ज्ञान की कुछ अभिव्यक्ति हुई है, वह उनके मृत्यु-लोक में अवस्थान के अल्पकाल का महत्तम कार्य है। पूर्ण आत्मानुभव की प्राप्ति के लिये वे दिन रात प्रयत्न करते थे। जहां कहीं उनकी दृष्टि पड़ती थी, सब कुछ ईश्वरमय-उन्हें ईश्वरमय दिखाई देता था। वे प्रबुद्ध साधक थे। उनमें बुद्धि और आत्मा की अत्युन्नत दशाओं का मिलान हुआ था। रावी नदी के तट पर अनेक रात्रियां उनकी योगाभ्यास में बीतीं। अनेक रातों को वे इतना रोये कि सबेरे बिछौने की चद्दर भीगी मिलती थी। कहा जाता है कि, अगले दिनों कट्टर ब्राह्मणपन की दशा में जब प्रिय संस्कारों से उनका हृदय परिपूर्ण था, सनातन धर्मसभाओं में भक्ति या कृष्ण पर व्याख्यान देते हुए उनके मुख से जितने शब्द निकलते थे सभी आसुओं में तरबतर होते थे। अपने आध्यात्मिक उत्कर्ष की इस अवस्था में वे कहा करते थे, कि अनेक बार जागृत दशा में ही ज्ञान ध्यान में, बिना किसी प्रकार का अन्तर पड़े मन ने मेघवर्ण कृष्ण को कालीनाग के मस्तक पर नाचते और बंशी बजाते देखा है। बाद को वे कहा करते थे "यह मन की एकाग्रता की विशेष अवस्था थी, मेरी ही कल्पना की साकारता के, मेरे ही मन के उतावलेपन के सिवाय यह और कुछ भी नहीं था"। वे जन्म के संन्यासी थे। छात्रावस्था में भी उनका जीवन घोर दीनताजनित कठोर तथा दुस्सह कायक्लेशों, और अति भयंकर परिश्रमों, एवं भीषण यातनाओं में बीता। यहां तक कि, कभी २ निरन्तर कई २ दिन तक लगातार उन्हें भोजन नहीं नसीब होता था। आहार की कमी के साथ २ वे आधी
रात तक पढ़ने में परिश्रम करते थे, और प्रायः गणित के प्रश्नों में ऐसे तन्मय हो जाते थे कि उन्हें घंटों का बीतना जान ही नहीं पड़ता था और सबेरा हो जाता था। भविष्य में उन्हें जैसा जीवन व्यतीत करना था, जान पड़ता है, जान बूझ कर वे उसके लिये अपने को प्रस्तुत कर रहे थे। अध्यापक होने के पूर्व ही असीम आत्मनिर्भरता, जिसे वे बाद में समतोल निश्चिन्तता कहते थे, प्रौढ़ विश्वास, कुछ गहरे मत, महान् इच्छाशक्ति, अपने और पर्यावेदित तथ्यों की मान्य बातों के संग्रह में यथार्थ, उनके विश्लेषण और तर्कशैली में शुद्ध, एवं परिणामों के निकालने में बिलकुल स्पष्ट तथा निभ्रान्त गणितशास्त्रीय मन का विकाश उन्हों ने अपने में कर लिया था। उन्हें पदार्थविज्ञान से प्रेम था और निपुण रसायनी तथा वनस्पतिशास्त्रज्ञ थे। तत्त्वविज्ञानशास्त्र में विकासवाद उनका विशेष विषय था। उन्हों ने समस्त पाश्चात्य और पूर्वीय दर्शनशास्त्रों का अपने ढंग से पूरा २ अध्ययन किया था। उन्हों ने शंकर, कणाद, कपिल, गौतम, पातञ्जलि, जैमिनि, व्यास और कृष्ण के ग्रन्थों के साथ २ कांट, हेगल, गेटे, फिक्टे, स्पिनोज़ा, कोंट, स्पेंसर, डार्विन, हैकेल, टिंडल, हक्सले, स्टार, जार्डन, और अध्यापक जेम्स के ग्रन्थों में भी पारदर्शिता प्राप्त की थी। फारसी, अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू, और संस्कृत साहित्यों के पूरे पंडित थे। ई० 1806 में उन्हों ने चारों वेदों का अध्ययन किया था और प्रत्येक मंत्र के पूर्ण ज्ञाता थे। वैदिक ऋचाओं के प्रत्येक शब्द का विश्लेषण वे शब्दशास्त्री की तीखी शुद्धता से करते थे। इस प्रकार उन्होंने अपने को विलक्षण विद्वान बना लिया था। ऐसा प्रतीत होता है कि अपनी आयु के तैंतीस वर्षों के प्रत्येक क्षण का उन्हों ने अत्यन्त सदुपयोग किया था। अपने
अन्त समय तक वे कठोर परिश्रम करते रहे। अमेरिका में दो वर्ष के प्रवास काल में, सार्वजनिक कार्यों में घोर श्रम करते हुए भी, प्रायः समस्त अमेरिकन साहित्य उन्हों ने पढ़ डाला। संसार के सब ग्रन्थकारों, साधुओं, कवियों, और परम-भक्तों के सम्बन्ध में अपना मत प्रकट करते समय वे एक अद्भुत रसिकता का परिचय देते थे। उनकी अनोखी तथा निष्पक्ष आलोचना में किसी प्रकार का पाण्डित्य प्रदर्शन, बनावटी अभिमान की नाम मात्र की भी छाया, अथवा कोई निस्सार बात नहीं होती थी। बात चीत करते समय वेद से लगाकर किसी नवीन से नवीन मौलिक पंक्ति तक का जो विचार उनके दिल पर चुभ जाता था, वह यथायोग्य उनके विचारों के समर्थन में सहायक ही होता था तथा उन्हीं का अनुभूत सत्य उसे प्रकट करना पड़ता था। वे अत्युच्च कोटि के विद्वान, तत्वज्ञ, और ब्रह्मवादी थे। मेधाशक्ति के विकाश साथ ही वे अपने आध्यात्मिक उत्थान को बड़े ऊंचे शिखर तक पहुंचा सके थे। जनाकीर्ण लाहोर भी उनकी आत्मा के विस्तारों को संतुष्ट कर सकने में असमर्थ होता था। जो कुछ समय उन्हें मिलता था, वे उपनिषदों के रहस्यों और प्राचीन आर्यब्रह्मविद्या पर मनन करते हुए हिमालय की पहाड़ियों तथा जंगलों में बिताते थे। हृषीकेश के निकट, ब्रह्मपुरी के घने वन में स्वामी राम का अभीष्ट सिद्ध हुआ था—उन्हें आत्मा का साक्षात्कार हुआ था। यही वह स्थान है जहां उन्हें मन की उस भयातीत आनन्दमय अद्वैतावस्था की प्राप्ति हुई थी, जिसमें न खेद है और न मोह। विश्वात्मा को ही जब कोई अपना स्वयं समझने लगता है तब अखिल विश्व उसके शरीर का काम देता है।
अपने इस महान नियम के प्रचारण के लिये तथ्यों का संग्रह उन्हों ने यहीं किया था। समस्त पौर्वात्य स्वप्नदर्शकों और योगियों के वे प्रकृत शिरमौर और अध्यात्मवादी ही नहीं थे, किन्तु शारीरिक व्यायाम के भी बड़े भारी पक्षपाती थे। वे अपने आप ही में एक विश्व ब्रह्माण्ड थे। उनके नगर तेजोमय थे। उनकी गलियों में बुद्ध अब भी अपना भिक्षा-पात्र लिये घूमते थे और ईसा सत्य का प्रचार करते थे। राम के मन-आकाश में कोई महापुरुष पञ्चत्व को नहीं प्राप्त हो सकता था। वे ऐसे अमरप्राण थे कि मृत भी वहां पहुंच कर जी उठते थे। इस तेजोमय मन के क्षितिज में सत्य का प्रकाश स्पष्ट था। उनके प्रकाश के कौंधों के सामने जो कोई मनुष्य बड़प्पन और शक्ति तथा चमत्कार बुद्धि का ढोंग रचता था उसके हाथ अपनी योग्यता से अधिक कुछ भी नहीं लगता था। श्रुतियां और स्मृतियां, पद्य और गीत, विचार और पदार्थ, तत्वज्ञान और धर्म की समस्यायें, राजनीति और समाज सब साथ ही उनके दैवी प्रकाश में रेलमपेल करते थे और राम के ज्ञान के वस्त्र पहने हुए मनोहर सौंदर्य धारण करके बाहर निकलते थे। वायुमंडल, आस-पास, और संगति का पूरा प्रभाव पड़ता है, यहां तक कि मनुष्य की आकृति तक बदल जाती है। जलवायु का प्रभाव पड़ने पर उसके मुखमंडल की ज्योति तक में लक्षणीय अन्तर पड़ जाता है। कोई भी भावना, कोई भी समस्या, कोई भी साधारण विचार, राम का स्पर्श होते ही, उनकी अन्तरात्मा के रहस्यमय प्रभावों से परिवर्तित होकर नये स्वरूप में दर्शन देता था। जब वे ब्रह्मचर्य पर बोलते थे, तब विषय का हमें उसी प्रकार एक नये प्रकाश के साथ उपदेश होता था, जिस प्रकार पहाड़ हमें विलक्षण प्रभापूर्ण दिखाई देता है, जब
बालरवि उसके पीछे होता है। यज्ञ, प्रेम, धर्म, आत्मानुभव, आत्मविकास पर उनके निबन्ध पढ़िये, हमें विदित होता है कि जैसी व्याख्या उन्होंने की है, वैसी न तो दूसरे किसी ने की है और न कर ही सकता था। देशभक्ति और उसके सिद्धांत का सम्पादन क्या उन्होंने अनोखा नहीं किया है? मैं शपथ कर सकता हूं कि, वे सूर्य या चन्द्रमा के प्रकाश से तुमको, मुझको, उसको, या इसको कदापि नहीं देखते थे। वास्तव में, न सूर्य को और न चन्द्र को ही वे उनके प्रकाश से देखते थे। वे वस्तुओं को अपनी आत्मा की ज्योति से देखते थे, अतएव उनके लिये अपने से परे कोई भी पदार्थ नहीं था। वे प्रकट में कहते थे, सूर्य की आरक्त किरणों मेरी नसें हैं। कोई भी वस्तु उनकी दृष्टिपथ में पड़ी कि उन्हों ने परमात्मा से उसे पहनाया और फिर उनको परमात्मा के सिवाय कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता था। उन्हों ने प्रकृति से एक विचित्र नाता जोड़ लिया था। उनका मुस्कयाना वर्षाऋतु में सूर्य का मेघयुक्त होना, और रोना गर्मी की ठीक दोपहर में जलवृष्टि थी। मेघ उनके शिर पर छाया रखते थे, छत्री की उन्हें आवश्यकता नहीं थी। वे विकट बनों में रहते और निस्तब्ध रात में मार्गशून्य बीहड़ नालों में इस सुगमता से विचरते थे मानों आकाश में चिड़िया उड़ रही हो। वे कवियों में भी कवि थे। पहाड़ी नदी का नाद उनके लिये यथेष्ट संगी था। उनके लिये पक्षी, वृक्षों की छाया के नीचे प्रकृति के रहस्यों का वर्णन करते थे। विश्व-संगीत उन्हें सुनाई देता था। और उनके परमप्रिय कृष्ण ही विश्व-ब्रह्माण्ड तथा मूर्तिमान विश्व-नृत्य और विश्व-समाधि थे। समुद्र की थिरकती हुई लहरों में, बनों के (वृक्षों के) डोलने में जंगल की निर्जनता में उन्हें सार्वभौम सौन्दर्य दिखाई देता
था। प्रकृति माता की आत्मा से एकता को ही वे वास्तविक आचरण समझते थे। किसी मनुष्य को इस केन्द्र में बैठा दो फिर उसे किसी की आवश्यकता नहीं। मनुष्य और सदाचार के सर्वोत्तम स्वार्थों को उसके पास सुरक्षित समझिये। मनुष्य वहीं गढ़े जा सकते हैं, न कि विद्वत्ता और पाण्डित्य के पुतलीघरों में। मनुष्य को वहां बैठ कर अपनी वास्तविकता के दर्शन, भर कर लेने दीजिये फिर निश्चय रखिये, वह अपनी अचलता और अजेयता की चट्टान पर खड़ा होगा। "मुझे आघात पहुंचाने को कोई बाहरी शिला नहीं है"। अनुभव ही धर्म है। यह अनुभव, कि मेरी आत्मा ही वह शक्ति है, जो अखिल विश्व को अनुप्राणित करती है और जड़ तथा चेतन की प्रत्येक नस की गुप्त शक्ति है, प्रत्येक साधारण मनुष्य को भी उन महाविजयों के राजमार्ग पर डाल देता है जो मनुष्य के लिये सम्भव हैं। उसकी सब सफलताओं का यही मूल मंत्र है। व्यावहारिक ब्रह्मविद्या के मन्दिर के उपासकों के सिवाय किसी का भी हृदय शुद्ध, मुखमंडल प्रभापूर्ण, और स्वभाव हंसमुख नहीं हो सकता। मेरी ब्रह्मविद्या कोई धर्ममत नहीं है, न सिद्धान्त ही है, बल्कि जीवन के सर्वकालीन अनुभव से श्रेष्ठ बुद्धिमानों द्वारा स्थिर किये हुए परिणामों का समूह है। उन्हों ने प्रकृति में ही सर्वश्रेष्ठ मानवीय काव्य पढ़ा था और उनकी आत्मा की अग्नि को शीतल हिम और पहाड़ी दृश्यों के विस्तार के सिवाय कौन बुझा सकता था। किसी घर में उन्हें अच्छा नहीं लगता था। सब से अधिक सुखी वे तभी होते थे जब हिमालय के जंगलों में नेत्रों को आधा बन्द किये हुए विचरते थे और सर्वाधिक शक्तिशाली पर्वत राज की ओर कनाखियों से देखते थे।
वे अपने समय के वेदान्त के एक बहुत बड़े प्रचारक थे। वे समस्त हिन्दू धर्म ग्रन्थों का निदर्शन थे। सकलश्रेष्ठ विश्वात्मा हिन्दू जीवनों के वे प्रतिनिधिक गौरव थे। बुद्ध धर्म के वे महान् व्याख्याता थे। पूर्ण सदाचार, आमूल संयम, धर्मसंगत आचरण के वे प्रचारक थे और अध्यात्म विद्या को मानव चरित्र का उपयुक्त पथ प्रदर्शक बताते थे। उच्च कोटि का परोपकार उनके अन्तःकरण का साधारण स्वभाव था। वे दिन रात कार्य और श्रम में लगे रहते थे किन्तु अपना एक क्षण भी हिन्दू जनता की दशा सुधारने में नहीं नष्ट करते थे। उनका कथन थाः—"केवल एक रोग है और एक दवा। राष्ट्र धर्म केवल संगत जीवन से नीरोग और स्वाधीन किये जा सकते हैं। उसी से व्यक्ति, ऋषि और देवों से भी बढ़कर बनाये जा सकते हैं। ईश्वर में जियो, सब ठीक है; दूसरों को ईश्वर में जीनेवाला बनाओ, और सब ठीक हो जायंगे। इस सत्य पर विश्वास करो, तुम्हारी रक्षा होगी; इसका विरोध करो, तुम कष्ट पाओगे"। वे अपने श्रम के लिये कोई पुरस्कार नहीं चाहते थे। अमेरिका से लौटते समय उन्होंने वहां के अपने कार्य के प्रशंसात्मक कागज पत्रों की गठरी समुद्र में फेंक दी थी। अपनी मातृभूमि की ओर से अमेरिका में जो कार्य उनसे हुआ था उसका ब्यौरा केवल एक बार अमेरिका जाने ही से प्रकट होगा। अन्त में यह कहा जा सकता है कि ऐसे अग्रगामी मेधावियों का आगमन इस संसार में अल्प काल के ही लिये होता है। वे अपने उपाय को पूरा करने को नहीं, दूसरों को राह सुझाने के लिये आते हैं। बिजली की चमक की तरह उनका कार्य केवल संकेतात्मक होता है, पूर्ति करनेहारा कदापि नहीं। वे मनुष्य को राह दिखाने वाले, कुछ सूत्र बताकर चम्पत हो
जाते हैं। इस प्रकार का प्रत्येक मेधावी महापुरुष अपने जन्म-समय में आवश्यक कुछ साधक शक्तियों का केन्द्र होता है। वे अपने विशिष्ट ढंग से मनुष्यों का प्रेम अपनी ओर खींच लेते हैं और जब लोग उन पर निर्भर करने लगते हैं, तब वे लोगों को बड़ी ही व्यग्रता की दशा में छोड़ कर चल देते हैं कि वे (लोग) अपने पैरों पर खड़े हों और अपनी ही शक्ति से काम लें। आन्तरिक मनुष्य की एकता का स्वामी राम का सिद्धान्त, भारत के नाम से परिचित इस छोटे संसार के समस्त विरोधी धर्मों और सम्प्रदायों का निस्संदेह बड़ा अपूर्व समन्वय है। उनकी प्रेम की शिक्षा राष्ट्रीय और व्यक्तिगत उद्योगशक्ति का अपव्यय रोकने की दवा है, और इस प्रकार कार्य और कार्यशीलता की मात्रा बढ़ाती है। पदार्थ विज्ञान और धर्म में छिटके हुए समस्त सत्य का संयोगरूप उनका चरित्र नित्य मानवीय आचरण के लिये आदर्श है। सार्वजनिक कार्यविषयक उनका एक मात्र विचार जनता की अनभिज्ञता और दासता से मुक्ति था। उनका व्यक्तित्व स्वाधीनता और बन्धन मोच का आकाशी दीपक था। उनकी रचना हैः— सकहि हमहिं को क्षति पहुँचाई, करै पूर्ति अस नहिं क्षमताई। सकै मनाय हमैं को भाई, कुपित करै नहिं यह मनसाई॥ हटत देख मोहि जग एक ओरा, छोडन हित शुभ मारग मोरा। जग मग ज्योति हमारे आवत, सगरी छाया आप परावत॥ सुन सागर अब मोर अवाई, बीच फाटि करु मारग भाई। अथवा जर भुनि वन जा छारा, भगे बिना नहिं तव निस्तारा॥ सुनहु कान दै भूधर मोरी, मारग त्यागि हटहु एक ओरी। कुशल नहीं नतु तुमरी आजू, गरद मिलहि सब अस्थि समाजू॥
सेनानायक नृपति सब मम क्रीडा के लाल। बहिया है यह बन्हि की, भाग बचहु बेहाल॥ पारिषद् हु अरु सचिव समाजा, वकहु व्यर्थ कृपया नहीं आजा। अवशि करहु मम आज्ञा पालन, काल करहु भक्षण दुहुँ गालन॥ पवन जाइ गरजहु अति घोरा, कूकुर मम भूकहु बरजोरा। आंधी चलहु भयंकर भारी, भेरि दुंदुभी बजहु सुधारी॥ पवन प्रचण्ड हमारो बाहन, अंधड़ चढ़े चलत हम राहन। है बिजली बन्दूक हमारी, लक्ष्य न चूकत हौं गुणधारी॥ मनो अहेरी पाछे धावत, करत कौर ज्यों ही धरि पावत। गिरिवर गण के हृदय महन्ता, भूमि खण्ड औ जलधि अनन्ता॥ तोप शब्द घोषित करहु दूरि दूरि सब जाय। भाग्य और देवन सबहिं रथ निज लेहुं जुलाय॥ उठहु जगहु हे भीत त्यागि देहु माया सबल। ॐ स्वाराज्य पुनीत जपहु सदा मानस विमल॥ अपने ही तत्वज्ञान पर उनकी अन्तिम घोषणा इस प्रकार है:— जड़ आलस को काम कह चलत बढ़त श्रम नेम। बेमन की तजि चाकरी सुघर काज सो प्रेम॥ शंक के कीट भगाय के दूरि सुशान्त अलापन में मत राखें। नित छोड़ि बिघातन को बद रंग सुचारु सवारन को रस चाखें॥ हैं सांचे सुधारन के मद भीजे औ लीक की रीति को नाँव न भाखें। बनावैं नहीं सुख सों बतियां लहरैं गहरी हियरे अभिलाखें॥ सांची बातैं जोरिकै काव्य करैं नव रंग। त्यागी कल्पना डोरिको सेवत तथ्य पतंग॥ हम देते नहिं मृतन के ग्रंथन केर प्रमान। तरकावलि घटनानकी सकल शास्त्रको प्रान॥ जीवित अनुभव घन घटा बरसौ तरक सुनीर। करौ किनारे बांधिकै अवतरणन बेहीर॥
महा वाक्य "अहं ब्रह्मास्मि" पर, व्यक्तियों और दलों पर ध्यानविस्तार तथा व्यग्रता से शून्य, मनन तथा एकाग्रता की स्वभावतः शक्ति, स्वाधीनता और प्रेम में परिणति होती है। शरीर के प्रत्येक रोम में लहराते हुए इस ब्रह्मत्व को, इस सपिण्ड अथवा प्रबल अद्वैत को, इस दैवी शक्तिदायक भक्ति को, इस प्रज्वलित प्रकाश को ही शास्त्र अचूक ब्रह्मशर कहते हैं। हे डगमग, चंचल, संदिग्ध मनो! बेमन का धर्माचरण (कट्टरता) और अधर्माचरण अब छोड़ो! सब प्रकार का सन्देह और अगर मगर निकाल डालो, सब प्रत्यय तुम्हारी ही सृष्टि हैं। सूर्य चाहे पारे की थाली सिद्ध हो जाय, पृथ्वी पुटाकार या खोखला मण्डल भले ही प्रमाणित हो जाय, वेद सम्भव है पौरुषेय ठहराये जा सकें, किन्तु तुम ईश्वर के सिवाय और कुछ नहीं हो, और कुछ नहीं हो। तुम्हारे ईश्वरीय कण्ठ से निकलने वाली एक भी ध्वनि घास के डंठालों, वालू के कणों, धूलि के विन्दुओं, हवा के भकोरों, वर्षा के बूंदों, पक्षियों, पशुओं, देवताओं और मनुष्यों को ग्रहण करना पड़ेगी। गुफाओं और वनों पर यह गर्जेगी, झोंपड़ियों और खेरों में घनघनायगी। नगरों और गलियों में यह गूँजेगी, नगरों से नगरों को जायगी, तथा समस्त संसार को परिपूर्ण करेगी और सनसना देगी। हे स्वाधीनता! स्वतंत्रता! किसी नदी के पहाड़ी सोतों को हिमशिलाओं की सुवर्ण राशियों से भर दो, फिर उस नदी की सब शाखायें, धारायें और नहरें खेतों को खूब सींचती हुई भरपूर बहेंगी। जीवन के सोत को, प्रेम के मूल को, हर्ष और प्रकाश के भरने को,
अनन्त शक्ति और पवित्रता को, ईश्वरत्व को, तुच्छ स्वयं को आलिंगन और स्थानच्युत करने दो, विचारों को तरबोर करने दो, मन को परिपूर्ण करने दो, फिर हाथ, पैर, नेत्र ही नहीं, शरीर की प्रत्येक स्नायु, आस पास तक संगति के स्वर्ग की रचना करेंगी और शक्ति की बहिया को जगमगावेंगी। सिंहासन पर महाराज की उपस्थिति मात्र से ही दरवार में व्यवस्था स्थापित हो जाती है। इसी प्रकार से मनुष्य के अपने ईश्वरत्व का, वास्तविक महिमा का आश्रय लेते ही समस्त जाति में क्रम और जीवन का सञ्चार हो जाता है। ऐ अल्प विश्वासियों! जागो! अपनी पवित्र महामहिमता का अनुभव करो! और तुम्हारी राजकीय तटस्थता की एक निगाह, तुम्हारी दैवी निश्चितता की एक सैन रौरव नरकों को मनोहर स्वर्गों में बदल देने को यथेष्ट होगी। घर आ घर! श्री, परिव्राजक! ॐ! ॐ!! ऐ भकोरो! चलो, ऐ पवनों! इन शब्दों से मिल जाओ, जिनका उद्देश्य वही है जो तुम्हारा। आहा! आनन्द! आनन्द!! न घटने वाले हर्ष और हास्य! स्वामी राम से जापान में किसी ने पूछा, आप का धर्म क्या है। उन्हों ने गेटे के शब्दों में उत्तर दिया:— धंधो कहा नर को शुभ श्रेष्ठ बतावत बात सुनो यह साची। लोक पताल हुते नाहिं एकहु सृष्टि जिती हम ही यह राची॥ ऐंचि समुद्र सों ऊंचो कियो तब ज्योति दिवाकर की जगनाची। थे द्विजराज अपाहिज दीन वै भये गति शील हमैं पुनि जांची॥ तो क्या सचमुच राम की मृत्यु हो गई? वह राम, जिन्हों ने अपने शरीर के विसर्जन के कुछ ही क्षणों पूर्व लिखा था:—
"ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, गंगा, भारत! ऐ मौत! बेशक उड़ा दे इस एक¹ जिस्म को। मेरे और 2अज्साम ही मुझे कुछ कम नहीं। सिर्फ चांद की किरणें, चांदी की तारें पहन कर चैन से काट सकता हूं। पहाड़ी नदी नालों के 3भेस में गीत गाता फिरूंगा। 4बहरे मब्वाज के 5लिवास में मैं ही लहराता फिरूंगा। मैं ही 6बादे खुश खराम, 7नसीमे मस्ताना गाम हूं। मेरी यह 8सूरतें सैलानी हर वक्त 9रवानी में रहती हैं। इस रूप में पहाड़ों से उतरा, मुरझाते पौदों को ताजा किया। 10गुलों को हंसाया, बुलबुल को रुलाया, दरवाजों को खटखटाया, सोतों को जगाया, किसी का आंसू पोंछा, किसी का घुंघट उड़ाया। इसको छेड़, उसको छेड़, तुझको छेड़। वह गया, वह गया। न कुछ साथ रक्खा, न किसी के हाथ आया।" * ( स्वामी राम के देह विसर्जन के थोड़े ही दिनों के बाद स्वामी जी के परम भक्त मि० पूर्णसिंह ने यह संक्षिप्त जीवन चरित वर्तमान पत्रों के लिये लिखा था, जिसका यह आवेकल अनुवाद है।) * यह लेख मूल उर्दू में लिखा है, किन्तु यहां यथाशब्द इस लिये रक्खा है कि उर्दू से परिचित हिन्दी वाचक वर्ग इसकी मूल भाषा से आनन्द ले सकें। अन्य पाठकों को हिन्दी शब्दों की टिप्पणी से स्पष्टार्थ हो जायगा। 1 शरीर. 2 शरीर. 3 वेष. 4 लहरें. मारता हुआ समुद्र. 5 पोशाक. 6 आनन्द से बहता हुआ पवन. 7 मस्ती से मटकता हुआ वायु. 8 सेर करने वाली मूर्ति. 9 चलती फिरती रहती है. 10 पुष्प.
एक आदेश। "तुम मुझे समझना चाहते हो तो मैं शपथ दिला कर कहता हूं कि, इस पुस्तक में या अन्य कहीं जो विचार मैंने लिखे हैं और मेरा यह शरीर जो कभी प्रारब्धवश युद्ध में तुम्हारे सामने आ जाय, कुचल कर नाश कर दो। मैं तुम्हें विश्वास देकर शपथ कराता हूं कि, डरो मत। उनका ऐसा नाश करो, जैसा मैं स्वयं तुम्हारे विचार और देह को नष्ट करने का प्रयत्न करूंगा। इसी से तुम मुझे अपने साथ अभेद रहने के लिये विमुक्त करोगे। मैंने जो कुछ लिखा है, उसमें से कुछ न रक्खो; उसकी कोई परवाह न करो; न उसमें विश्वास लाओ। रुको मत, जब तक कि दांतों में चबाते २ उसका मैदा न बन जाय। और मेरा चेहरा देखते हुए मैं जो कुछ करूं या कहूं, उसे कभी ग्रहण न करो, क्योंकि उसके ग्रहण करने की कोई आवश्यकता ही नहीं। जब तुम इन सब बातों को जुदा कर छोड़ दोगे, तभी मुझ अकेले —एकमेवाद्वितीयम्— के दर्शन पाओगे, और फिर कभी त्याग नहीं होगा। स्वामी राम की एक नोटबुक से उद्धृत।