श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

भाग 10

भाग 10 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 10 · अध्याय 1 / 5

भाग 10

* उपनिषद कहते हैं, "जब कोई सचमुच आनन्द प्राप्त कर लेता है अथवा आत्म-साक्षात्कार कर लेता है, तब उसके कर्तव्य पुण्य रूप हो जाते हैं, और पुण्य उससे अनायास वह निकलता है। यही नियम है। जो आनन्द नहीं प्राप्त करता वह मानव-हित नहीं कर सकता। केवल वही जो विज्ञानन्द को प्राप्त होता है मानव-हित कर सकता है। जब स्वयं आप बड़े गरीब हैं, जब आपके पास ही बिलकुल भोजन नहीं है और भूखों मर रहे हैं, तो दूसरों की भूख आप भला कैसे शान्त कर सकते हैं" ?

शिष्य :—महाराज ! कृपया मुझे बताइये कि यह आनन्द क्या वस्तु है।

गुरु :—अनन्त वस्तु ही आनन्द है। किसी सान्त वस्तु में आनन्द नहीं है। जब तक आप सान्त हैं, तब तक आपके लिये कोई आनन्द, कोई सुख नहीं है। अनन्त आनन्द है। केवल अनन्त ही आनन्द है।

यह अनन्त, इसे हम कैसे समझें ? किसी व्याख्या की ज़रूरत नहीं है। परन्तु राम चाहता है कि इन शब्दों पर आप ध्यान दें, इन पर विचार करें, और अपने मन में निश्चिन्त हो जायँ। फिर वह समय आ जावेगा जब आप इन शब्दों का कि "अनन्त आनन्द है, सान्त में कोई आनन्द नहीं है" स्वयं प्रयोग करेंगे। और इस अनन्त को तुम्हें अवश्य समझना चाहिये।

अंग्रेज़ी भाषा में "समग्र" (whole) शब्द है। "क्या आप समग्र हैं" ? इसका अर्थ होता है—"क्या आप बलिष्ठ

Notes: छान्दोग्योपनिषद, प्र० 7 के अन्त में जो गुरु शिष्य संवाद है उसी का यह उल्लेख है।

हैं, क्या आप स्वस्थ हैं" ? बड़ा सुन्दर शब्द है। जब तक आप अपने को एक अंश मात्र, नन्हा सा, साढ़े तीन हाथ (पौने दो गज) लम्बी और 170 पौण्ड (लगभग पौने दो मन) भारी कोई परिच्छिन्न वस्तु समझते हैं, जब तक आप अपने को केवल रक्त और मांस का पिण्ड समझते हैं, जब तक आप परिच्छिन्न (सीमाबद्ध) हैं; तब तक आप बिलकुल वा क्षीण हैं, अवच्छिन्न हैं, विभक्त हैं, समग्र नहीं हैं; तब तक आप केवल एक अंश मात्र हैं, समग्र नहीं हैं, बलवान वा स्वस्थ नहीं हैं; तब तक आप अपने को (गतिहीन बना कर) सड़ा रहे हैं। यदि आप पानी के एक छोटे से बूँद को समुद्र से अलग कर लें तो वह मैला, कुचैला और दुर्गन्धित हो जायगा। इसी तरह से जो मनुष्य, महात्मा या साधु, या कोई भी व्यक्ति अपने को परिच्छिन्न वस्तु समझता है, जो अपने को काल और देश से परिच्छिन्न मानता हुआ परिमित समझता है, जो अपने को छोटे से क्षेत्र में सीमाबद्ध बोध करता है; वह स्वस्थ नहीं है, सुखी नहीं है, समग्र नहीं है, सुख पर उसका कोई दावा नहीं हो सकता। ज्योंही आपकी दृष्टि की परिच्छिन्नता जाती रहती है, उसी क्षण आप का परिच्छिन्न ज्ञान छिन्न-भिन्न हो जाता है और आप फिर समझने लगते हैं "मैं सर्व हूँ, मैं अखिल विश्व हूँ, मैं अनन्त हूँ।" जब आप ऐसा अनुभव करने लगते हैं, तब आप समग्र हो जाते हैं और शारीरिक रोग, पीड़ा, व्यथा, चिन्ता तब दूर हो जाती हैं, उड़ जाती हैं, और छिन्न भिन्न हो जाती हैं।

समस्त चिकित्सा, समस्त आकर्षण (चुम्बकत्व), समस्त वशीकरण (Mesmerism) का रहस्य यही है। तू अपने को समग्र निश्चय कर, फिर वास्तव में समग्र

तू है। यही तत्त्व है। इसी तत्त्व में वास कर, अनुभव कर कि "मैं समग्र हूँ," "मैं सर्व शक्तिमान हूँ," "मैं परमेश्वर हूँ।"

शिष्य—इस अनन्त का क्या स्वरूप है ?

गुरु—परिच्छिन्नता तीन प्रकार की है—काल की परिच्छिन्नता, देश की परिच्छिन्नता और वस्तु की परिच्छिन्नता। समग्र होने का तात्पर्य है उस आत्मा का अनुभव जो सम्पूर्ण काल में व्याप्त भी है और सम्पूर्ण देश काल वस्तु की सीमा से पार टपा हुआ भी है। जहाँ (या जिस अवस्था में) एक अपने से अतिरिक्त न कुछ देखता है, न कुछ सुनता है और न कुछ जानता है, वहाँ (या वह अवस्था) अनन्त है, क्योंकि जब तक अपने सिवाय कोई दूसरी वस्तु भान होती है, तब तक आप सीमाबद्ध और सान्त हैं।

जहाँ (या जिस अवस्था में) एक अपने से अतिरिक्त अन्य देखता, सुनता या समझता है, वहाँ (या वह अवस्था) सान्त व परिच्छिन्न है। प्रेतात्माओं के देखना व सुनना, या पित्र लोक के घण्टे (अनाहद वाणी) सुनना, या जिसे दिव्य दृष्टि कहते हैं, यह सब सान्त व परिच्छिन्न है। तुम आत्मानुभव के पथ पर तो हो, परन्तु अभी तक तुम उस अन्तिम लक्ष्य तक नहीं पहुँचे हो जहाँ अनन्त के अतिरिक्त कुछ और दिखाई नहीं पड़ता, अनन्त के सिवाय कुछ और सुनाई नहीं पड़ता। अनन्त अमरत्व है, और सान्त मरणत्व है।

शिष्य—भगवन् ! अनन्त का वास किस देश व काल में है ?

गुरु—अपनी ही महिमा (विशालता) में—महिमा में भी नहीं।

तात्पर्य यह है कि अनन्त देश और काल से परे है। तो फिर आप अनन्त को काल और देश के अन्तर्गत कैसे ला सकते हैं ? अनन्त कहाँ रहता है, ऐसा प्रश्न करना इस कथन के समान है, "मुझे तोला भर समुद्र की लहरें ला दो।" समुद्र की लहरों की नाप तोलों और छटाँकियों से नहीं हुआ करती। इसी तरह, कैसे, कब और क्यों, से अनन्त का अन्दाज़ा नहीं लगाया जा सकता। अगर लगाया जा सके तो वह अनन्त ही नहीं।

राम से जो पूछा गया था वह यह था कि सब आकांक्षाओं और अनुरागों के त्याग का उपदेश देकर वेदान्त घृणा (द्वेष) की शिक्षा देता है। परन्तु यह बात नहीं है। वेदान्त के शब्दों पर ध्यान दीजिये, "लव (Love) और अटैचमेंट (Attachment) अर्थात् राग और मोह को छोड़ दो।" किन्तु आप का कहना है, "अरे, यदि हम लव (Love) को छोड़ देते हैं, तो हमने ईश्वर को छोड़ दिया, क्योंकि लव (Love) ईश्वर है।" अरे भाइयो ! इस देश में लव (Love) का अर्थ है कामुकता, स्टुपिडिटी (Stupidity), न कि शुद्ध प्रेम।

भारत में (Stupidity) के लिये एक उपयुक्त शब्द है, मूढ़ता। लोग कहते हैं, "वह लव (Love) है।" भाई, यह कदापि लव (Love) नहीं है, यह तो एक घोर निन्दनीय चीज़ है। राम के लिए सत्य से अधिक आदरणीय और कुछ नहीं। समस्त व्यक्तिगत अथवा शरीरगत अनुराग आपको सान्त कर देता है, और अनुराग-पात्र को भी सान्त बना देता है। इस तरह दोनों का पतन होता है, तुम्हारा भी और अनुराग-पात्र का भी। वेदान्त आप से कामुकता, मूर्खता और सब आसक्तियाँ छोड़ देने की

कहता है, वह यह नहीं चाहता कि तुम सच्चे प्रेम को छोड़ दो। वह सच्चा प्रेम तुम्हें नहीं छोड़ना होगा।

बच्चे की बात ले लीजिये। क्या बच्चा प्रेमी है ? नहीं, नहीं। बच्चा प्रेमी नहीं किन्तु प्रेम स्वयं है। वेदान्त यही कहता है, "प्रेमी न बनो, परन्तु स्वयं प्रेम बनो।" अच्छा, बच्चे को कौन सी वस्तु आकर्षक बनाती है ? उसका प्रेमी होना नहीं बल्कि स्वयं प्रेम होना। लड़के का किसी से प्रीति नहीं होती, कोई आसक्ति नहीं होती, कोई व्यक्तिगत स्वार्थपरता उसमें नहीं होती, परन्तु बच्चा स्वयं प्रेम होता है। और यही वेदान्त सिखाता है, "स्वयं प्रेम रूप हो जाओ, तभी तुम आकर्षक बनोगे, समग्र हो जाओगे।"

लोग अपने को स्वस्थ बनाने और दूसरों को चंगा करने के सम्बन्ध में बहुत कुछ कहा करते हैं। किन्तु कृपा करके उन सब स्वार्थमय उपायों और अभिप्रायों को दूर हटा दीजिये जो आपको परिच्छिन्न रखते हैं। सब वासना राग है, सब वासना व्यक्तिगत या शरीरगत प्रेम है, सब वासना आसक्ति है। इसे फेंक दो और स्वयं पवित्रता रूप हो जाओ। अगर आप इसे (पवित्रता को) प्राप्त कर लें, तो आपका शरीर अवश्य स्वस्थ होगा। आपकी बुद्धि अवश्य पूर्ण स्वरूप होगी, यदि आप उस पवित्रता को प्राप्त कर लें जिसकी शिक्षा वेदान्त देता है। यह पवित्रता ही वास्तविक वैराग्य है, जिसकी शिक्षा बार बार वेदान्त से मिलती है।

इस पवित्रता को प्राप्त करो। क्या बच्चा पवित्र नहीं है। वह किसी वस्तु से भी कोई मतलब नहीं रखता। उस नन्हे से ज़ालिम पर ध्यान दो। वह बलिष्ठतम कन्धों पर

चढ़ता है और विजय-माल-भूषित शिरों के बाल नोचता है। वह कैसा ज़बरदस्त चुम्बक है। कारण क्या है ? पवित्रता। यही (पवित्रता) बच्चे को चुम्बक बनाती है और यही बच्चे को इतना सुन्दर बनाती है। इसीलिये वेदान्त कहता है, "इस त्याग को प्राप्त करो, और तुम स्वयं प्रेमरूप हो जाओगे। और तब आप से आप स्वभावतः तुम से सम्पूर्ण मानव जाति के हित की धारा बहेगी। यदि हम लोक-हित करना चाहें तो हम तभी कर सकते हैं, जब हम स्वयं हित स्वरूप बन जाते हैं। इसके बिना हम से स्वाभाविक रूप में वैसा अनायास प्रकाश नहीं बह निकलता जैसा जलते हुए दीपक से प्रकाश निकलता है।

ध्यान दो। साँप के नेत्र मोहन हैं, वे चुम्बक हैं; और छोटी छोटी चिड़ियाँ आप ही उड़कर साँप के मुख में चली जाती हैं। सर्प की आँखों में यह मोहनी शक्ति क्या है ? उन नेत्रों से तो तटस्थता (बेगरवाही) प्रकट होती है। उनमें किसी वस्तु के प्रति आसक्ति नहीं है। और आप कहावत जानते ही हैं कि "साँप से बुद्धिमान बनो"।

चुम्बकता, शक्ति, स्वस्थता और हरएक बात की यही पूरी कुंजी है। यह सही है कि देखने में सर्प कभी कभी अपने ही बच्चों को उनकी रक्षा के लिए निगल जाता है, दूसरे शब्दों में साँप अपने बच्चों को उनकी रक्षा के लिये अपने मुख में रख लेता है, किन्तु वह प्रायः अपने बच्चों को खा लेता है। साँप सैकड़ों बच्चे पैदा करता है। यदि वे सब बच्चे जीते रहें तो संसार रहने के योग्य न रह जाय। किन्तु प्रकृति ने संसार की रक्षा की व्यवस्था की है, और सपाँ अपने बच्चों को खा लेता है। साँप एक ऐसा जन्तु है जिस

में किसी प्रकार का मोह नहीं है। साँप अपनी केंचुल उतार देता है। उसे अपनी खाल का भी मोह नहीं है। ऐसे ही राम कहता है, यदि तुम मन से वेदान्तिक चेतनता का अनुभव कर सको और देह को यथार्थ में दूर कर सको, मानो वह कभी थी ही नहीं; यदि तुम उसे दूर फेंक सको और अनुभव कर सको कि "मैं दिव्य हूँ, सर्वरूप हूँ, वा परमात्मदेव हूँ"; यदि तुम अनुभव कर सको कि "मेरा इन्द्रियों से, व्यक्तित्व से, कोई भी वास्ता नहीं है; तो तुम अनन्त वस्तु हो जाते हो; तब तुम चुम्बक हो जाते हो। वेदान्त कहता है, यदि तुम यह अनुभव करो, यदि तुम पूरे पवित्र हो जाओ, तो तुम चुम्बक हो जाते हो। और यह चुम्बक क्या ? तुम प्रेम का केन्द्र रूप तत्व हो जाते हो, और फिर आपही आप तुम से कल्याण (लोकहित) बहने लग जाता है।

पुनः क्या तुम इस अपनी सब आसक्ति में यह नहीं देखते कि यह इनकार नहीं किया जा सकता, कि तुम अपने इन अनुरागों और भावों को उलटा पढ़ रहे हो, अर्थात् उनका उलटा अभिप्राय निकाल रहे हो, और जब तुम अपने को रागासक्त बताते हो, तब तुम वास्तव में द्वेषासक्त हुए होते हो। इसलिये वेदान्त जब कहता है, "राग को त्याग दो" तब उससे यह समझना चाहिये कि "द्वेष को त्याग दो"। यह बात खूब समझ लेने की है। जब कभी तुम किसी एक से लगन लगाते हो, तब तुम एक वस्तु से तो संयुक्त हो जाते हो, और सम्पूर्ण विश्व से वियुक्त। ऐसा है या नहीं ? जब तक बच्चा प्रेम करना नहीं सीखता, तब तक वह प्रेम स्वरूप बना रहता है, तब तक वह मानो सब से अभेद हुआ होता है। एक मास के बच्चे को चाहे कोई उठा ले, चाहे कोई चूमे चाटे, वह अत्यन्त भला लगता है।

बच्चा उस समय साक्षात प्रेम रूप हुआ होता है, किन्तु कुछ काल के बाद वह समय आता है, जब बच्चे की लगन किसी एक से लग जाती है। फिर इसका क्या परिणाम होता है ? माता-पिता भार हो जाते हैं, बहिन और संगी नहीं भाते, पुराने मित्रों से नाता टूट जाता है, सारा संसार छूट जाता है। सियाना बच्चा काम के लिये जाता है, परन्तु वह विकल है; समुद्र-तट पर जाता है पर उसके लिये वह भी दुःखदायी होता है, क्योंकि उसकी प्रिया वहाँ मौजूद नहीं है। उस प्रिया की तुलना में सभी चीजें फीकी हो जानी हैं। जब आप कहते हैं कि अमुक मनुष्य अनुरागासक्त है, तब यथार्थ में वह सारे संसार से द्वेषासक्त है। जब आप किसी विशेष वस्तु से स्नेह करते हैं, तब अपने को अखिल विश्व से अलग कर लेते हैं। इसी से वेदान्त कहता है, व्यक्तिगत आसक्ति मात्र का अर्थ है असंसक्ति, वियोग, उसका अर्थ है (बन्धन के कारण) निश्चलता। ऐसी आत्म-हत्या न करो।

वेदान्त कहता है, एक तो यह कामुकता (Cupidity) है और दूसरी यह बच्चा की दशा। बच्चा तो साक्षात् प्रेम था और वह पहली दशा तो कामुकता मात्र थी, इससे अधिक कुछ भी नहीं थी। इस लिये जब वेदान्त कहता है, "अपनी वासनाओं से ऊपर उठो," तब वह तुम्हें मानव-जाति के कल्याण की वस्तु बनाना चाहता है। वेदान्त तुम्हारी शक्तियों को ठीक मार्ग पर लगाता है और तुम्हें मानव जाति से संयुक्त कराता है।

क्या यह तथ्य नहीं है कि सभी उपकार करने वालों का आचरण शुद्ध था और व्यक्तिगत आसक्ति से रहित था ? ईसा ने क्या गाँठ जोड़ी थी ? नहीं। साधुओं और महात्माओं

ने क्या विवाह किया था ? नहीं। राम विवाह का विरोध नहीं कर रहा है। किन्तु उसका अभिप्राय इससे यह है कि मन की परमात्मा से एकता बनी रहे, अखिल विश्व से आत्मा जुड़ी रहे। कुछ महात्माओं ने विवाह किया था। किन्तु उनके सम्बन्ध पर ध्यान दीजिये। उनका मन बिलकुल निरासक्त और पूर्ण पवित्र था, यद्यपि वे परिवार में रहे और बाल-बच्चेदार थे। जहाँ हमारे शरीर रहते हैं, वहाँ हम नहीं रहते। हम तो वहाँ रहते हैं जहाँ हमारे मन रहते हैं। यथार्थ में हम वहीं रहते हैं, जहाँ हमारे मन रहते हैं। इस लिए हमारे महात्मा देखने में तो गृहस्थाश्रमी होते हैं, पर वास्तव में एक मात्र सत्य से युक्त हुये होते हैं, और प्रकाश में रहते हैं। "मैं सर्वरूप हूँ," इस तरह सब स्नेहों, आसक्तियों को धीरे धीरे छोड़ने को कह कर वेदान्त तुम्हें समस्त मानव जाति का हितैषी बनाना चाहता है।

अमेरिका के छापेखानों से प्रकाशित बहुत से साहित्य अधिकांश चुम्बक शक्ति (Magnetism), मस्मर विद्या वा आकर्षशास्त्र (Mesmerism), स्वप्नमोहन विद्या (Hypnotism), दिव्य दृष्टि (Clairvoyance), सरीखे अनेक विषयोंकी लम्बी चौड़ी बातें बघारता है। और इस साहित्य का बहुत बड़ा भाग शरीर को स्वस्थ और बलिष्ठ रखने तथा रोग-निवारण के विभिन्न उपाय और ढंग को प्रकाशित करता तथा सिखाता है। यह सब बहुत अच्छा है। आशय प्रशंसनीय है। किन्तु कुछ विशिष्ट अपवादों को छोड़ कर ऐसे लेखकों का बहुत बड़ा भाग सत्य से सर्वथा प्रतिकूल सिद्धान्त का स्वाद लेता है, ऐसे सिद्धान्त का कि जो स्वार्थता से युक्त और कलङ्कित होता है, और जो (लेख या प्रकाशन के) अधिकार, कृपा प्राप्ति की जिज्ञासा, और

अपने महत्व-वृद्धि की भावना के स्वर में उच्चारित होता है। और याद रहे, कि यद्यपि ये लोग यथाशक्ति अपनी ओर से कोई कसर बाक़ी नहीं रखते और एक महान् तथा श्रेष्ठ कार्य करते होते हैं, तथापि आप यदि उनकी दुर्बलताओं से साफ़ बचना चाहते हैं, यदि आप असली शक्ति का स्वामी अपने को बनाये रखना चाहते हैं, और सफलता के अभिलाषी हैं, तो आप को पता लग जायगा कि सत्य सर्वथा लोक विरुद्ध है। किसी वस्तु को पाने का रास्ता यही है कि उससे मुँह मोड़ लो। बात यही है, और हम क्या कर सकते हैं। राम तुम्हारे सामने यथार्थ तत्व रखता है। तुम आप अपने अनुभव से जाँच लो। पहले चाहे आप अन्य सब तरीक़ों को जाँच लें, और बाद को राम की बातों को जाँचिये, और समय पाकर उनका प्रयोग कीजिये।

किसी वस्तु को पाने का उपाय उसे खो देना है। जो अपने जीवन को पाना चाहता है, उसे उससे हाथ धोना पड़ेगा। राम देखता है कि अधिकांश लेखक इस सत्य का असत्य बताते हैं। यदि आप सफलता चाहते हैं तो अपने को चुम्बक बनाइये, क्योंकि लोहे के कण चारों ओर से चुम्बक की तरफ खिंच जाते हैं, और अभिलाषा भी चुम्बक के तुल्य है।

कृतकार्य मनुष्य चुम्बक हो जाता है। यदि तुम्हें चुम्बक बनना है, तो तुम्हें अपने को चुम्बक बनाने की क्रिया करनी पड़ेगी। वह क्रिया क्या है ?

यह एक वस्तु है। इसमें एक धन (Positive) तत्व है, और एक ऋण (Negative) तत्व भी। दोनों ही जमा हैं। दोनों ही इसमें हैं। परन्तु चुम्बक में इनका क्या हाल

है ? जहाँ दोनों तत्वों का समावेश है वहाँ आकर्षण शक्ति नहीं है। ऋण तत्व से रहित धन तत्व चुम्बक में है। धन तत्व इस ओर बटोरता है, और ऋण तत्व दूसरी विरुद्ध ओर। और तब शक्ति, हज़रत मूसा के डण्डे की तरह, जिससे कि उन्होंने लाल समुद्र (Red Sea) के जल को विभक्त कर दिया था, पूर्णता प्राप्त करती है। ऐसे ही जहाँ भिन्न भिन्न तत्व हैं चुम्बक तैयार करने के लिए उन्हें ध्रुवों में स्थित करना होगा। इसी भाँति तुम्हें ध्रुवों में स्थित होना है, और तब तुम चुम्बक हो जाओगे। अच्छा, वेदान्त क्या कहता है ? त्याग या वैराग्य का उपदेशक वेदान्त केवल मूसा के डण्डे के, (मूसा के छोटे डण्डे के) समान है। वह अनाज को भूसी से अलग कर देता है। वह नीच प्रकृति को उच्च प्रकृति से पृथक कर देता है। वह (नीर क्षीर का) विवेक करता है। वह आप को इस योग्य बनाता है कि आप अपने ईशत्व को अपनी पशु प्रकृति से अलग कर सकें। ध्यान दीजिये। सब आसक्ति पूर्ण अनुरागों का कारण आप में परिच्छिन्न प्रकृति है। अपरिच्छिन्न को किस वस्तु की कामना हो सकती है ? सब अभिलाषाओं में परिच्छिन्नता वा परिमितता गर्भित है। अपरिच्छिन्न को आकांक्षा नहीं हो सकती। अपरिच्छिन्न के लिए अपने सिवाय कुछ और है ही नहीं, क्योंकि जो कुछ भी है वह सब वही है। तो अपरिच्छिन्न फिर कामना कैसे कर सकता है ? केवल परिच्छिन्न जीव ही कोई अभिलाषा कर सकता है। इस तरह आप समझ सकते हैं कि आपकी सब इच्छाओं और अनुरागों की उत्पत्ति आपकी परिच्छिन्न प्रकृति, आपके माया-तत्व से होती है। आपका अनन्त स्वरूप इच्छाओं से परे है। अब आप को मालूम होगया होगा कि आप में

जो यह इच्छा करने वाला तत्व, यह क्षुद्र मिथ्या अहङ्कार है, वह आप में पशु-प्रकृति है, नीच प्रकृति है। और आप में जो परमात्मदेव या अनन्त है वह सब कामनाओं से परे है। इस पर अब वेदान्त क्या करता है ? वेदान्त चाहता है कि आप इन दोनों को अलग कर दें। हरएक चीज़ मिली हुई है। और आप अपने को यह क्षुद्र, स्वार्थी और परिच्छिन्न आत्मा बता रहे हैं। और शुद्ध आत्मा या राम अथवा ईश्वर को आप मिथ्या, देखने मात्र, मायावी और परिच्छिन्न प्रकृति से एक कर रहे हैं।

वेदान्त कहता है कि जिस पर कैसर (Caesar) की मुहर है वह कैसर बादशाह को दे दीजिये, और जिस पर भगवान की मुहर है वह भगवदर्पण कर दीजिये; अर्थात् मनुष्य का भाग मनुष्य को दे दीजिये, और तद्वत् ईश्वर-भाग को राम या ईश्वर के अर्पण कर दीजिये। इन इच्छाओं को, इस असत्यात्मा की यथायोग्य कदर होनी चाहिए, और समझ लिया जाना चाहिये कि ये कुछ भी नहीं हैं। अपनी ब्रह्म सत्ता का प्रतिपादन करो। अपने को देवों का देव, प्रभुओं का प्रभु और अनन्त समझो। तब फिर मुझे कौन सी अभिलाषा हो सकती है ? मैं तो सब कुछ हूं। वही इच्छा कर सकता है जो सब समयों में नहीं है। मुद्दतों के बाद होने वाली बातों ही की इच्छा हुआ करती है। सच्चे आत्मा के लिए चाहने को कुछ भी नहीं है, क्योंकि वास्तव स्वरूप आप ही सब कुछ है। हर एक वस्तु आप के भीतर है। सचमुच सब वस्तुयें, सब आनन्द, वैभव, हर एक चीज़, जो मनुष्य के लिये काम्य हो सकती है, मैं ही हूं। यही निश्चय करो और ॐ की ध्वनि उच्चारण करो, धुन लगाओ, और फिर वही अनुभव करने का यत्न

करो। तुम्हें अवश्य यह अनुभव करना चाहिए। तुमने आज तक सदा अपने को जड़ देह समझा है, और जड़ देह तुम हो गये हो। चैतन्यात्मा (ईश्वर) का विचार करो, ईश्वर में रमो, और तब कामना के लिए जगह कहाँ पाओगे ? यह वेदान्त तुमको चुम्बक बना देता है, धन और ऋण के ध्रुव पृथक किये जाते हैं और शरीर आकर्षणशक्ति सम्पन्न हो जाता है।

अब कुछ अति महत्वपूर्ण विषय हैं। लोग भूल से कहा करते हैं कि अमुक अमुक वक्ता में व्यक्तिगत आकर्षणशक्ति बहुत अधिक है। केवल उसी आकर्षणशक्ति की आपको आवश्यकता नहीं है। एक मनुष्य विचार रूप चुम्बक बनना चाहता है, दूसरा दौलत बटोरने का चुम्बक बनने की इच्छा रखता है, तीसरा सौन्दर्य, शारीरिक कांति का चुम्बक होने का अभिलाषी है, अन्य पुरुष और प्रकार का चुम्बक होना चाहते हैं; किन्तु इन सब आकर्षणशक्तियों का रहस्य त्याग है। इन शब्दों पर ध्यान दो। सच्चे त्याग के सिवाय दूसरा कोई रहस्य नहीं है। पूर्ण स्वास्थ्य की शिक्षा देने के लिए तुम्हें पुस्तकें छपाने में अपना समय न गंवाना चाहिए। यदि तुम इन शब्दों को मन में रख सको और इनके अनुसार कार्य कर सको तो तुम बड़े भारी चुम्बक हो सकते हो। ये बातें राम तुम्हें स्वानुभव से बता रहा है। आप इनकी परीक्षा करें। विचार का चुम्बक बनने के लिये, जिस से हम सब विद्यायें अपनी ओर खींच सकें, क्या ईश्वर-प्रार्थना से काम चलेगा ? "ऐ सर्वशक्तिमान प्रभु ! मुझे प्रकाश दे; हे भगवन् ! तू प्रकाश स्वरूप है, मुझे प्रकाश दे" अरे ! क्या यह कहने से तुम प्रकाश स्वरूप बन जाओगे ? नहीं, इससे काम नहीं चलेगा।

"ओ, मुझे प्रकाश चाहिए," इससे काम नहीं चलेगा। याद रक्खो, जैसा हम विचारते हैं, वैसे ही हो जाते हैं। यदि आपका विचार इस प्रकार का है, "मुझे प्रकाश पाना है", तो क्या नतीजा होगा ? आप में इस विचार की पूर्णता का फल यह होगा कि आप उस स्थिति में पहुँच जायेंगे जहाँ से प्रकाश सदा दूर रहता है। "मुझे प्रकाश दो", इस प्रकार प्रकाश पाने का विचार प्रकाश माँगने और चाहने में आपको प्रकाश से दूर कर देता है, और नतीजा यह होगा कि प्रकाश आपके पास कभी न आवेगा; वह सदा दूर रहेगा।

राम कहता है, धनी माँ-बाप के लड़के पर ध्यान दीजिये। आप कहते हैं उसका जन्म-अधिकार एक करोड़ है। परन्तु वह अपना पैदायशी हक़ कब पाता है ? बहुत दिन उसे ठहरना पड़ेगा। वह हर घड़ी अपनी माता की मृत्यु की कामना किया करता है ताकि वह अपना जन्म-स्वत्व पावे। इसी तरह जब हम परमेश्वर से प्रार्थना करें और कहें, 'ऐ प्रभु, मैं तुम्हारा पुत्र हूं, और पुत्र होने के कारण, ऐ भगवन् ! मुझे यह दे और वह दे" तो हमें परमेश्वर की मृत्यु तक ठहरना पड़ेगा। परन्तु परमेश्वर कभी मरता नहीं, और तुम कभी अपना जन्म-स्वत्व न पाओगे। अपने आस पास से प्रकाश और विज्ञान पाने का यह ढंग नहीं है। प्रार्थना करने, माँगने, चाहने, या ढूँढ़ने से कभी किसी को कुछ नहीं मिला।

यह बड़ा आश्चर्यजनक वर्णन है। तत्वज्ञान इसे सिद्ध करता है। शक्ति क्या है ? प्रकाश पाने की इच्छा को भी त्याग देना ही शक्ति है। जब तक तुम प्रकाश की इच्छा

किया करते हो, तब तक वह तुम्हारे चुंगल से चम्पत होता रहता है। क्या मुझे ज्योति प्रकाश को अपने पास बुलाना चाहिये। माँगने और चाहने से मैं ज्योति को रोक देता हूँ। माँगने और चाहने की क्रिया ही ज्योति मात्र को तुम से दूर कर देती है।

राम एक बड़ी मनोरञ्जक कहानी कहेगा। भारत में एक मनुष्य अपनी प्रिया को पाने के लिए एक मन्त्र सिद्ध कर रहा था। किन्तु मन्त्र जपने को जिस साधु ने उसे बताया था उसने कह दिया था कि एक बात से सावधान रहना। किस बात से? साधु ने कह दिया था कि मन्त्र जपते समय बन्दर का ध्यान या विचार कभी न मन में लाना। उस मनुष्य ने मन्त्र जपना शुरू किया, और बड़ा यत्न करने लगा कि बन्दर का ध्यान न आवे। परन्तु जब २ वह साधना करता था, तब तब बन्दर का ध्यान उसे आ ही जाता था। बन्दर का ख्याल वह दूर न कर सका। बन्दर हर क्षण उसके सामने ही बना रहा। बन्दर का ख्याल लाये बिना वह एक क्षण भी मन्त्र न जप सका। वह साधु के पास गया और बोला, "महाराज! महाराज!! आप ने मुझे यदि बन्दर का विचार न करने को चिन्ता न दिया होता तो मैं मन्त्र जप सकता और बन्दर का विचार कभी न करता होता। किन्तु जब आप ने रोका कि मुझे बन्दर का ख्याल न आये, तब से वह अब मुझे घर दबाता है, बल्कि घेरे रहता है। इसी तरह अज्ञान को दूर रखने के यत्न से ही अर्थात् मूर्खता और दुर्बलता को पास न फटकने देने की चेष्टा से ही आप दुर्बलता और अज्ञान को ला बैठाते हैं।

प्रकाश उसी तरह आता है जिस तरह सूर्य या नक्षत्रों से प्रकाश आता है। वेदान्त कहता है प्रकाश (ज्ञान) को माँगना और चाहना छोड़ दो, प्रकाश की यह कामना अपने से निकाल दो, इसे त्याग दो, हटा दो, और तब देखो कैसा आनन्द है। तत्त्व का अनुभव करो, प्रकाश चाहे आवे या न आवे, मुझे इस विचार से कोई मतलब नहीं है; "अरे, मैं तो सृष्टि का सूर्य हूँ, मैं तो विश्व का प्रकाश हूँ", ऐसा अनुभव करो। इस विचार में तुम अपने को प्रेमी नहीं बल्कि स्वयं प्रेम मूर्ति पाते हो। इस विचार में तुम प्रकाश की कामना या भिक्षा नहीं कर रहे हो, क्योंकि तुम स्वयं प्रकाश होते हो। मैं शरीर या मन नहीं हूँ, प्रकाश तो क्षुद्र व्यक्ति अर्थात् केवल तुच्छ अहंकार को चाहिये। तुम अहंकार नहीं हो, तुम तो यथार्थ में स्वयं प्रकाश हो। ऐसा मनन करो, ऐसा अनुभव करो, और तुम कामनाओं से ऊपर उठ जाओगे।

हिन्दुस्तानी भाषा में एक सुन्दर पद्य है जिसका अर्थ है, "तुम शहद (मधु) हो, शहद; कोई इच्छाएँ (तुम में) नहीं हैं, किन्तु सम्पूर्ण इच्छाओं से परे हो"।

यह निजी अनुभव की बात है कि राम ने जब कभी किसी भी विषय को विचारने की चेष्टा को, चाहे जितना भी मन लगाया, लाख चेष्टा करने पर भी राम सफल नहीं हुआ। अन्त में जब अनायास मन उपराम हो गया और राम ने कहा, "हटाओ भी झगड़ा, मैं इस लेख (विषय) का नाम भी न लूँगा, मेरी बला से लिखा जाय या न लिखा जाय" तभी यकायक यह विचार आ गया, "अरे क्यों, किस लिए प्रकाश के निमित्त छटपटाता है? इच्छा को

छोड़, उसे दूर फेंक, और आकांक्षा न कर"। तब प्रकाश आ गया, अर्थात् ज्ञान प्राप्त हो गया।

विश्व-विद्यालय की उच्च कक्षा में पढ़ते समय राम ने सब काम अध्यापकों की सहायता बिना ही करने की शपथ ली थी। यह बड़ी कठिन बात थी क्योंकि टीकाओं या अध्यापकों की सहायता बिना गणित के कठिन सवाल हल करने का भार स्वयं अपने ऊपर लाद लिया गया था। कठिन २ सवाल हल करने में राम भारी परिश्रम करता था। किसी २ में वह सफल होता था, परन्तु अधिकांश में असफलता ही हाथ लगती थी। संध्या के पाँच बजे से सवेरे पाँच बजे तक राम ने श्रम किया, फिर भी सवाल हल नहीं हुए, उपराम होकर ताज़ी हवा खाने के लिये राम घुड़कोठे पर चला गया, और चाकू से आत्म-हत्या कर डालने की बात सोच रहा था, क्योंकि जिन सवालों को उसे हल करना था उनको अभी तक नहीं हल कर सका था। ऐसे समयों पर, जब राम शरीर को भूल जाता था, वे सवाल आप से आप हल हो जाते थे। इस तरह हम देखते हैं कि कठिन मामलों में जब हम विचार से ऊपर उठ जाते हैं, तब हम अपने को विचार का चुम्बक बना लेते हैं। आज कल राम क्या करता है? पहली बात तो यह कि ऐसा वैसा करने के समग्र विचार को दूर हटाता है। "मैं कुछ नहीं लिखना चाहता; दुर, दुर, मुझे इससे मतलब ही क्या है; मैं प्रकाश हूँ और अपनी ही महिमा को भोग रहा हूँ; मेरी अपनी ही महिमा का भोगना सफलता है, असली सफलता है, और अन्य सब बातें धोखे की टट्टी हैं; यदि सांसारिक सफलता मुझे प्राप्त भी हो, तो मैं उसे कभी न भोगूँगा; ब्रह्म ही मेरा

सब तरह का आनन्द है"। यही विधि है। ब्रह्म-ज्ञान के अधिकारी बनने की चेष्टा करो, और सब बातें आप ही आ जायँगी। पहले अपने भेद को पहिचानो, अन्य सब बातें पीछे २ आ जायँगी। विचार यह है, "मुझे इससे या उससे कोई प्रयोजन नहीं है, किसी ज़िम्मेवारी या भय से मेरा कोई सरोकार नहीं है, मैं किसी के प्रति उत्तर-दाता नहीं हूँ, मुझे किसी का कुछ देना नहीं है, मैं स्वयं ही हूँ, मैं प्रकाश हूँ"।

संसार तुम्हें क्या आनन्द दे सकता है? सम्पूर्ण आनन्द, सम्पूर्ण सुख, आपके भीतर से आता है। शुद्धात्मा (शुद्धस्वरूप) ही सम्पूर्ण आनन्द है, सम्पूर्ण महिमा है, सम्पूर्ण सुख है। मैं सदा उसका भोग करूँगा। यदि मैं ये (लौकिक) वस्तुयें पाऊँ, और उन्हें न भोगूँ, तो क्या होगा? नतीजा यह होगा कि मेरा मन विचारों और भावनाओं से परिपूर्ण होजायगा। भावनायें तुम्हें तलाश करेंगी। यही नियम है। इस तरह से हम देखते हैं कि विचार का चुम्बक बनने के लिये (ज्ञान) की कामना से ऊपर उठने की ज़रूरत है, और (प्रकाश) की आकांक्षा से ऊपर उठना ही इस समस्या का ऋण (Negative) पहलू है, और धन पहलू है ऐसा ध्यान धरना कि "मैं प्रकाश हूँ, मैं अपनी ही महिमा को भोग रहा हूँ"।

अब दूसरा रहस्य सुनिये। अगर आप चाहते हैं कि मित्र या दौलत आपको मिलें, तो आप को क्या करना होगा? इच्छा से अपनी लगन हटा लो। और समस्या के ऋण पक्ष या भाग (Negative side) को हल करने के बाद धन पक्ष (Positive side) को लो, जो इस प्रकार का

कथन और निश्चय है, "मैं ईश्वर हूँ, मैं प्रभुओं का प्रभु हूँ, प्रकाशों का प्रकाश हूँ, पूर्ण सुन्दरता हूँ, पूर्ण आनन्द हूँ, पूर्ण सुख मैं ही हूँ, मैं सब की परम आत्मा हूँ, मैं विश्व का शासक हूँ"। ऐसा निश्चय करो, अपने को ईश्वर समझो, संकल्प को बिल्कुल छोड़ दो, और जब चीज़ें आवें तो दूसरी ही दृष्टि से उनको देखो, केवल ईश्वरत्व को भोगो। तब आप दूसरों की दृष्टि में कृतकार्य होते हैं, परन्तु अपनी सच्ची दृष्टि में आप कृतकार्य से भी बढ़कर हैं।

उस दिन आपको बताया गया था कि जब आकाश में (वायु की) विरलता (सूक्ष्मता) के कारण कोई विशेष स्थल (वायु से) शून्य होजाता है, अर्थात् विरल वायु सूर्य-ताप से ऊपर उठ जाती है और शून्यता पैदा होजाती है, तब क्या होता है? शून्य स्थान को भरने के लिए वायु झपटती है। इसी तरह, जब अभिलाषा से ऊपर उठकर आप शून्यता उत्पन्न करते हैं, अर्थात् आपका शरीर शून्य हो जाता है, जब आप ईश्वर भाव में लीन होते हैं, तब शरीर अर्थात् यह आभासमात्र अहंकार, मर-मिट जाता है, यह अपना स्थान खाली कर देता है, और तब क्या होता है? आपके आस पास के प्रत्येक पदार्थ आपके पास अवश्य झपट कर आते हैं।

कुछ लोगों के मतानुसार चुम्बक की प्रकृति शून्यता के सिवाय और कुछ भी नहीं है। अच्छा! इच्छाओं को, अर्थात् स्वार्थपूर्ण इच्छाओं को, जो तुम्हारा गला घोंट रही थीं, त्याग देने के कारण यहाँ शून्यता उत्पन्न हुई। इन्हें दूर कीजिये और तब आप चुम्बक हो जाते हैं, अर्थात् शून्य स्थल उत्पन्न हो जाता है।

प्रश्न—क्या रोग को अच्छा करने के लिये यह ज़रूरी है कि पदार्थ (Matter) से वा उस रोग से इन्कार किया जाय?

उत्तर—रोग को दूर करने के लिए यह ज़रूरी है कि आप अपने को पूर्ण समझें, सब कहीं ईश्वर के सिवाय और कुछ भी आप को न दिखाई पड़े। अपने को ईश्वर समझो और ऐसा खूब समझो, फिर कोई रोग नहीं है। स्वास्थ्य, शक्ति, सब चीज़ें तुरन्त दौड़ती हुई आपके पास आ जायँगी, जब आप इनसे ऊपर उठ जाँयगे। ईश्वर को देखने या सुनने की इच्छा न करो, क्योंकि ईश्वर तो तुम अब भी हो। जब आप ईश्वर को देखने की इच्छा करते हैं, तब ईश्वर को आप अपने से बाहर मान लेते हैं, ईश्वर को दूर कर देते हैं। आप लोक हित करना चाहते हैं, परन्तु संसार इतना दीन क्यों हो कि उसे आप के ध्यान की आवश्यकता पड़े।

निउटन (Newton) ने अपने को चिंतवन (ध्यान) के अर्पण कर दिया था। चिंतवन करना इच्छा से ऊपर उठने के सिवाय और कुछ भी नहीं है। जो विषय उसके सामने था उसमें उसका तुच्छ अहंकार लीन हो गया था, और परिणाम यह हुआ कि वह मानव जाति का उपकारी हुआ। मानव जाति का कल्याण करने या मानव जाति को ऋण से दबाने के विचार से उसने समस्या को नहीं हल किया था। उसकी धारणा यह थी अर्थात् उसने अपना कार्य इस लिए किया था कि उस काम से उसे आनन्द मिलता था और वह इस प्रकार लोकोपकारी हो गया।

यदि लोग आपकी प्रशंसा नहीं करते तो कोई परवाह नहीं, यदि आपकी ख्याति नहीं है तो क्या चिंता। संसार की दृष्टि में जो सफलता है वह तो केवल इन्द्रियों की

धोखेबाज़ी है। तुम तभी सफलता प्राप्त करते हो जब तुम निश्चय करते हो कि "मेरी विराट से, ईश्वर से एकता है, और सफलता में स्वयं हूँ।"

क्या पदार्थ की स्थिति से इन्कार करना चाहिये? अवश्य। याद रखो कि तुम परमेश्वर हो और जिस क्षण तुमने अपने को परमेश्वर समझा, उसी समय पदार्थ की इतिश्री हो गई। पदार्थ को हटाओ, और वहाँ ईश्वर-भाव जमाओ। ये दो भिन्न २ उपाय नहीं हैं। दोनों ठीक एक ही हैं। इसी तरह आप अपने असली आत्मा को परमात्मा पाते हैं, अर्थात् इन सब शरीरों, सूर्यों, वृक्षों इत्यादि का नियन्ता और शासक पाते हैं। जब आप ऐसा निश्चय करते हैं और इससे भी ऊपर उठते हैं, तब और भी बढ़कर निश्चय करते हैं, तो आपको क्या ध्यान होता है? जब राम चलता है, तब वह समझता है कि वह सूर्य है, और सूर्य इन मेघों और कोहरों को पैदा करता है, इन सब का कारण सूर्य है। कुछ लोग पृथ्वी, जल आदि को इनका कारण बताते हैं। परन्तु यह ठीक नहीं है। जल, मेघ, कोहरा, सब सूर्य से निकलते हैं। सूर्य उनकी उत्पत्ति करता है, और जब उन्हें कड़ी निगाह से वह देखता है, तब वे (मेघ और कोहरे) विलीन होजाते हैं। इस तरह आत्म-साक्षात्कार की एक दशा तो यह है कि जब आप अपने को सूर्य की भाँति परमात्मा समझते हैं, और दूसरी अवस्था में परिच्छिन्न आत्मा रूपी कोहरों को दूर कर देते हैं।

लोग कहते हैं, "मैं परमेश्वर की प्रतिमा में बनाया गया हूँ"। राम कहता है, "प्रतिमायें बनो, और तुम हमेशा दुःखी रहोगे"। तुम ईश्वर की प्रतिमा या चित्र नहीं हो, तुम स्वयं ईश्वर हो।

जल में प्रतिबिम्बित होने वाली प्रतिमा को ले लीजिये। जल में इस प्रतिबिम्बरूप प्रतिमा की अपेक्षा से ही सूर्य सर्वोपरि-आत्मा अर्थात परमात्मा कहा गया है। ऐसे ही आत्म-साक्षात्कार की प्रथम अवस्था में मनुष्य अपने परम स्वरूप (परमात्मा) को सूर्य की तरह समझता है।

नेत्र खोलने और बन्द करने से राम को साधारणतया यह भान होता है कि "सूर्य, चन्द्र तारागण इत्यादि सब पदार्थ मैं घेरे हुए हूँ। मैं उनको जीवन, शक्ति, और उद्योग प्रदान करता हूँ। मैं उनका आधार और आश्रय हूँ। मैं ही परम आत्मा हूँ।" एक अवस्था यह है। इस अवस्था को प्राप्त कर लेने पर आप देखेंगे कि सम्पूर्ण घृणा, द्वेष, भय, दूर भाग जाते हैं। फिर आप को यह आशंका नहीं रह जाती, कि आपकी रचनाओं का अधिकार कोई ले लेगा, या उनसे माल मारेगा।

जब लड़का कोई किताब उठा ले जाता है, तो माता को क्या क्षोभ होता है? नहीं। क्योंकि उसी का बच्चा है और उसी की पुस्तक, भला, वह क्षुभित क्यों होगी? इसी तरह यदि कोई मनुष्य तुम्हारी कोई चीज चुरा लेता है, तो तुम डरते क्यों हो? वह मनुष्य और तुम एक हो। और जो वस्तु वह चुराता है, वह तुम्हारी और उसकी दोनों की है। माँगने से तुम्हें सफलता या आनन्द न मिलेगा; लोग जिसे सफलता कहते हैं, उसे सफलता न समझो, वह तुम्हें न चाहिये। तुम्हारा लक्ष्य तो स्वयं परम तत्त्व है। और यदि संसार के दूसरे पदार्थ या सुख तुम्हें आ मिलते हैं, तो तुम्हें कहना चाहिए, कि शैतान! हटो मेरे सामने से तेरे हाथों से मुझे कुछ नहीं चाहिये। तब देखो

तुम कितने सुखी होते हो। तब तुम स्वर्ग स्वयं हो जाते हो, और अपने जीवन को सफल बना लेते हो।

स्वास्थ्य पाने वा प्राप्त करने के लिये रोग को जीतने के लिए, क्या पदार्थ की स्थिति से इनकार करने की ज़रूरत है? राम कहता है, नहीं, केवल अपने शुद्ध स्वरूप का मनन करो, और आत्मानुभव की दूसरी अवस्था में अपने को ले जाओ, जिस अवस्था में सूर्य जब ओस या कोहरे की तरफ देखता है तो वे गायब होजाते हैं। इसी भाँति जब दूसरी अवस्था में आप अपने को अनुभव करते हैं, तब आप उस अवस्था में पहुंच जाते हैं जिसमें स्वभाविक द्वैत नहीं है।

प्राणायाम या श्वाँस की साधना क्या है? इस बारे में लोग इस साधना पर ज़ोर देना चाहते हैं। परन्तु राम कहता है कि जब आपका मन तत्त्व में लीन या निमग्न होता है तब श्वाँस साधना आपही अपनी फिक्र कर लेती है। जिस क्षण हम उस भावना में डूब जाते हैं और उस दशा में ॐ की धुन लगाते हैं उसी क्षण स्वतः अत्यन्त वांछनीय और यथा सम्भव उत्तम रीति पर श्वाँस किया होने लगती है। फेफड़े श्वासों से भर जाते हैं, और अंतड़ियों के नीचे से भी चढ़कर वे तुम्हें परिपूर्ण कर देते हैं। मुख्य बात है परम तत्त्व का अनुभव करना। यदि वह मौजूद है, तो सब चीज़ें मौजूद हो जाँयगी।

इस देश में ऐसे लोग हैं जो सुन्दर नेत्र और सुन्दर नाक तथा ठोढ़ी पाना चाहते हैं।

राम कहता है कि मानसिक शक्तियों को प्राप्त करने पर भी तुम परिच्छिन्न और असुखी बने रहते हो। लोग

धन पाने में आध्यात्मिक शक्तियों का प्रयोग करना चाहते हैं। तब भी तुम परिच्छिन्न रहते हो, अभागे और दुःखी रहते हो।

इस पर ध्यान दो। यदि तुम काम्य वस्तुओं को, सौन्दर्य, वर्ण, दौलत, तन्दुरुस्ती को पाना चाहते हो, तो तुम्हें वेदान्तिक त्याग का अभ्यास करना पड़ेगा, किन्तु पूरा अभ्यास नहीं, केवल आंशिक। इस भाँति जितना आंशिक अभ्यास तुम करोगे वैसा ही आंशिक लाभ उठाओगे। परन्तु आंशिक लाभ से पूरी बात न बनेगी। तो फिर मुख्य मूल स्रोत को क्यों न प्राप्त करो। और तब जिन विशेष पदार्थों को तुम चाहते हो, वे तुम्हारे पास आ ही जाँयगे। इससे बढ़कर और अन्य सब पदार्थ भी तुम्हें तलाश करेंगे। इस लिये विशेष करके इच्छित वस्तुओं में ही न बँधे रहो; राज-मार्ग पकड़ो। वैकुण्ठ और परमानन्द का सबसे सीधा रास्ता यही अनुभव करना है कि "मैं आज ही स्वयं वैकुण्ठ वा सच्चिदानन्द हो।

आत्मानुभव दो प्रकार से होता है, निश्चय (faith) के द्वारा अथवा ज्ञान (knowledge) के द्वारा। वेदान्त शास्त्र पढ़कर तुम अपने संशयों को दूर कर सकते हो। और आशा है कि इस वेदान्त दर्शन की पूर्ण और सरल व्याख्या बहुत ही शीघ्र राम द्वारा प्रस्तुत करदी जायगी।

यदि वेदान्त शास्त्र पढ़कर तुम्हें आत्मानुभव न हो, तो उसमें निश्चय करो।

जब ईसाइयों को आत्मानुभव की एक झलक दिखाई पड़जाती है, तब यद्यपि उस झलक को वे उसी तरह नहीं

देखते जिस तरह ईसा ने देखा था। तथापि उन्हें निश्चय होजाता है कि झलक आत्मानुभव की है। इसी तरह यदि आपको अवकाश और यथेष्ट रुचि हो, तो वेदान्त शास्त्र पढ़ो। अन्यथा राम पर, ईश्वर पर, अपने आप पर, विश्वास करो। तुम्हारा उद्धार हो जायगा। अपनी मुक्ति आप ही प्राप्त करो। कोई दूसरा उपाय नहीं है। *

ॐ ! ॐ !! ॐ !!!

Notes: * नोट—हज़रत मूसा, ईसाई मत में एक पैगम्बर का नाम है जिसे परमात्मा का अनुभव तूर पर्बत की शिखर पर एक प्रकाश की झलक के रूप में हुआ था और उसे यह आकाशवाणी हुई थी कि तू इस अनुभव रूपी दण्ड को हाथ में ले। इस दण्ड को यदि तू समुद्र को भी मारेगा तो समुद्र दो टुकड़े होकर तुझे रास्ता दे देगा। जहाँ भी इसका बर्ताव करेगा वहाँ सफलता प्राप्त होगी।