सुधार।
[ भारतधर्म महामण्डल भवन मथुरा में स्वामी राम के दिये हुए व्याख्यान के श्रीनारायण स्वामी द्वारा लिखित नोट। ]
आज कल संसार में परोपकार का बड़ा कोलाहल सुनाई देता है। यह शब्द प्रत्येक कान में सुनाई देते ही हृदय में जोश सहानुभूति उत्पन्न करता है और सुनने वालों के मनमें सुधार करने का विचार उत्पन्न कर देता है। किन्तु आश्चर्य की बात है कि परोपकार के यथार्थ अर्थ से तो लोग जानकारी नहीं प्राप्त करते, केवल वाह्य हू हू हा हा की लेक्चरबाज़ों में लग जाते हैं। इसी लिये परोपकार के वास्तविक अर्थ न समझने से और उस पर आचरण (अमल) न करने से सुधारक महाशय से न तो संसार का पूरा पूरा उद्धार होता है और न उसे स्वयं कुछ लाभ प्राप्त होता है। अतः औरों का सुधार करने से पहले सुधार के इच्छुक को पहले सुधार के अर्थ और साधनों से जानकारी प्राप्त करनी चाहिये। अँगरेज़ों के यहाँ आज कल यह उक्ति रिवाज़ पकड़ती जाती है कि (First deserve & then desire) "पहले अपने को किसी चीज़ के योग्य बनाओ, फिर उसके प्राप्त करने की इच्छा करो।" किंतु वेदांत का इस विषय से सम्बन्ध नहीं।
वेदांत में तो यह सिद्धांत अनादि काल से चला आता है कि (Deserve only & need nct desire) "अपने को किसी वस्तु के योग्य तो निस्सन्देह बनाओ, किंतु उसकी प्राप्ति की इच्छा न करो।" क्योंकि वेदांत पुकार पुकार कर कहता है कि जिन वस्तुओं का तुमने अपने को अधिकारी बनाया है, अधिकार प्राप्त करने के पश्चात् वह वस्तु आपके पास बिना किसी प्रकार की इच्छा के किसी न किसी द्वारा अवश्य चली आयगी। अधिकारी बनने या होने से कोई और अभिप्राय नहीं है, बरन् इस प्रबंध का स्पष्ट तात्पर्य और उद्देश यह है कि जिस प्रकार से एक मनुष्य छोटे छोटे पदों से उन्नति पाता हुआ एक अवसर पर पहुँच कर राजा का पद पा लेता है, तो उस समय वह अपने राज के समस्त सम्पत्ति, महल और धन धरती के पाने का अधिकारी हो जाता है। अब वह इन वस्तुओं के पाने की इच्छा प्रकट करे या न करे, वस्तुएँ उसके सिंहासनासीन होने पर उसकी सेवा करने को अपने आप उसके पास चली आती हैं, बरन् उस समय उसका इच्छा करना अपने आप को छोटा बनाना है और अपने को बट्टा लगाना है। यह एक कहानी है कि एक महात्मा इस बात के अधिकारी हो गये थे कि उनके निकट सांसारिक पदार्थ आन कर उनकी नित्यप्रति सेवा करें, किंतु एक अवसर पर एक व्यक्ति जब उनके लिये बताशों का थाल लाया, तो महात्मा जी ने बताशे लेने की इच्छा करके अपने मुखारविंद से यह उच्चारण किया कि दो बताशे हमको दे दो। इस पर थाल लाने वाले ने दो बताशे तो महात्मा जी को दे दिए, किंतु वह शेष बताशों को उन्हें लालची समझने के कारण वहाँ रखना उचित न समझ कर थाल लौटा ले
गया। इस प्रकार महात्मा जी शेष बताशों से भी वंचित रहे, और इच्छा प्रकट करने के कारण थाल लाने वालों की दृष्टि में भी कम उतरे। इसी तरह अधिकारी होने पर भी अधिकार-योग्य वस्तु की इच्छा प्रकट करना अपने अधिकारों को खोना और अपनी इच्छा को बट्टा लगाना है। भगवन्! यदि आप अपने आपको समस्त वस्तुओं का मालिक और अधिकारी बनाना चाहते हैं, तो उठो, अपने स्वरूप ( ) में झण्डे गाड़ो, अपने असली स्वरूप में लीन हो जाओ, और अपने असली स्वरूप में मस्त होकर सारे संसार के ईश्वर और मालिक बन जाओ। तुम्हारा अपने स्वरूप में लीन होना ही तुमको सारे संसार का सम्राट बना देगा। यह सम्राट पद केवल संसार का ही नहीं प्राप्त होगा, बरन् तुम्हारा अपने स्वरूप में निवास करना तुम को समस्त लोक और परलोक का सम्राट बना देगा। अपने इस वास्तविक साम्राज्य का सिंहासन सम्हालने पर तुम समस्त धरती और आकाश अर्थात् लोक और परलोक की वस्तुओं के स्वामी और अधिकारी हो जाओगे। यह केवल असली साम्राज्य पाने की आवश्यकता है। संसार के पदार्थ आदि तो अपने आप तुम्हारी सेवा करने को तत्पर हो जाँयगे, तुमको उस समय इच्छा करने की भी आवश्यकता न होगी। उठो! उठो!! अपने स्वरूप में डेरे लगाओ और विराट स्वरूप के सिंहासन पर आरूढ़ हो, फिर तुम्हारे केवल एक संकेत ( ) से भी सारे संसार के काम पूरे होते चले जाँयगे। परोपकार का उपाय केवल हाहा हूहू ही नहीं है, बरन् सर्वोत्तम परोपकार आत्मा में लीन होना ही है। जैसे विज्ञान के मतानुसार वायु हल्की होकर जब ऊपर को उठती है और
अपना प्रथम स्थान छोड़ देती है, तो इधर-उधर के चारों ओर की भारी और ठंढी हवा हल्की हवा की ख़ाली जगह घेर लेती है, अर्थात् चहुँ ओर की हवा पहली हवा के हल्का होकर उड़ जाने पर एक एक श्रेणी अपने आप उन्नति करती जाती है, इसी प्रकार एक महात्मा के ब्रह्मनिष्ठ होने अर्थात् अपने असली स्वरूप में लीन हो जाने पर ऊपर वर्णित वायु की भाँति शेष चारों वर्णों के लोग बिना किसी प्रकार की इच्छा और प्रयत्न के महात्मा की ख़ाली की हुई जगह को घेरने के लिये अपने अपने दरजों से एक एक दरजा अपने आप उन्नति कर जाते हैं। अतएव अपने आप का अपने स्वरूप में लीन होना अर्थात् निमग्न होना ही परोपकार करना है। तात्पर्य यह कि तुम्हारे मन का अपने सूर्यरूपी आत्मा की किरणों के द्वारा अहंकार रूपी भारी बोझ से शून्य और हल्का होकर अपने स्वरूप में उड़ जाना अर्थात् लीन हो जाना ही संसार के और पुरुषों का सुधारना है, नहीं तो सुधारक महाशय या सुधार के इच्छुक जितना ही अपने वास्तविक स्वरूप से नीचे रहेंगे, उतना ही शेष मनुष्य निचले दर्जों पर रहेंगे और परोपकार करने के अर्थों का मिथ्या बरन् उलटा व्यवहार करते रहेंगे, क्योंकि अपने स्वरूप में अवस्थान न करना ही दूसरों का परोपकार न करना है, बरन् अपने आप को नीचे गिराए रखना है। इसलिये ऐ सुधार के इच्छुकों! और ऐ संसार का उद्धार करनेवालो! यदि संसार का उद्धार करना चाहते हो तो उठो, अपने स्वरूप में लीन हो जाओ, शेष सब लोग अपने आप उन्नति कर लेंगे, या यों कहो कि शेष सब लोगों का बिना तुम्हारी इच्छा और प्रयत्न के अपने आप भला हो जायगा, और तुम में भी जब अपने स्वरूप में निष्ठा होगी तो
दूसरे संसार को हिला देने की शक्ति आजायगी, अर्थात् अनन्त स्वरूप से अभेद होने के कारण अनन्त शक्ति भी तुम में भर जायगी। इस प्रकार तुम्हारा केवल राजगद्दी सँभालना ही सारे राज-काम को ठीक कर देता है, क्योंकि बिना असली साम्राज्य के सिंहासन पर स्थित हुए साम्राज्य के काम पूरे नहीं होते, अतः अपने स्वरूप में लीन होना परोपकार के लिये मुख्य समझना चाहिए, अपने अनन्त स्वरूप से मन को अभेद करने से ही अनन्त शक्तियाँ प्राप्त होंगी। जैसे एक नमक की डली यदि ख़ाली गिलास में डाली जाय तो एक परिच्छिन्न स्थान घेरती है, और जब पानी से भरे हुए गिलास में डाली जाय, तो पानी में घुल जाने से (अर्थात् जल के साथ मिल जाने से) वह डली अपनी परिच्छिन्न जगह छोड़कर गिलास के समस्त पानी में फैल जाती है और समस्त जल में नमकीन स्वाद देने की शक्ति रखती है, या यों कहा जाय कि जितना ही नमक की डली अपने परिच्छिन्न स्थान, नाम और रूप को छोड़ती जाती है और पानी में समाती जाती है, उसमें उतना ही स्वाद फैलाने की शक्ति बढ़ती जाती है। इसी प्रकार यद्यपि मन परिच्छिन्न शक्ति का खंड माना गया है, किंतु जितना ही अपने परिच्छिन्न स्थान, नाम और रूप को छोड़कर अपने स्वरूप के अनन्त सागर से अभेद होता है, उतना ही उसकी अनन्त (अपरिच्छिन्न) शक्तियाँ फैलती भी दिखाई देती हैं, अर्थात् उतना ही मन अपरिच्छिन्न शक्तियाँ प्रकट करने का बल भी उत्पन्न करता चला जाता है। इसी प्रकार से, भगवन्! यदि आप अपनी अनन्त (अपरिच्छिन्न) शक्तियाँ प्रकट किया चाहते हैं और उन अपरिच्छिन्न शक्तियों से संसार का उद्धार किया चाहते हैं, तो मन को कैवल्य-स्वरूप में इस
प्रकार लीन कर दो कि जैसे मजनूँ के प्रेम के सम्बन्ध में एक कविने कहा है—
खूँ रँगे-मजनूँ से निकला फ़स्द लैली की जो ली। इश्क़ में तासीर है पर जज़्बे-कामिल चाहिए॥
अर्थात् मजनूँ लैला के साथ ऐसा अभेद हुआ कि लैला और मजनूँ में बिलकुल अंतर न रहा, बरन् लैली की फ़स्द लेने पर भी ख़ून मजनूँ की नस से निकला। जितना ही आप अपने को परिच्छिन्न करते जाओगे, अर्थात् नमक की डली की भाँति परिमित शरीर में मन को घेरे रखोगे, उतना ही आप अपने को असमर्थ और शक्तिहीन बनाते जाओगे। अतः मन को शरीर के ख़याल से दूर हटाकर आनंद घन रूपी समुद्र में लीन करना ही समस्त अनंत शक्तियाँ प्राप्त करलेना है। जब इसी प्रकार से व्यावहारिक रीति पर मनुष्य तन्मय (यूयं वयं, वयं यूयं) हो जाता है, अर्थात् जिस समय वेदांत रूप हो जाता है, तो पूर्व संकल्प नमक की डली की तरह परिमित स्थान को छोड़कर अपने अनंत स्वरूप में समा जाते हैं, और इस प्रकार सबके साथ अभेद और प्रेममय होने पर समस्त मनोकामनायें बिना इच्छा और प्रयत्न के पूरी हो जाती हैं। अपने आत्मा में लीन होने के लिये सुधारक महाशय को पहली आवश्यकता हृदय रूपी पद्म को ज्ञान रूपी तेल से तर करने और स्वच्छ बनाने की है। जैसे काग़ज़ की तह यदि लैम्प की लाट के आगे रक्खी जाय तो लाट इतनी प्रकाश नहीं करती जितना तेल से भिगोई हुई काग़ज़ की तह उसकी जगह रखने से प्रकाश प्रकट करसकती है (अर्थात् काग़ज़ की तह बिना तेल से भिगोने के अच्छी तरह दीपक
का प्रकाश प्रकट नहीं करसकती, क्योंकि तेल के साथ भिगोने से इसकी तह स्वच्छ और हल्की हो जाती) है। इसी तरह हृदय को ज्ञान रूपी तेल से भिगोये बिना आत्मा रूपी ज्योति का प्रकाश बाहर भली भाँति प्रकट नहीं होसकता। अतः ज्योतिके प्रकट करने के निमित्त हृदय रूपी पद्म को ज्ञान रूपी तेल से तर करने और उससे उसको स्वच्छ बनाने की अत्यंत आवश्यकता है।
विकासवाद की दृष्टि से भी मनुष्य को समस्त सृष्टि पर श्रेष्ठता दी गई है। इसका अधिकांश कारण केवल यही है कि वह चैतन्य शक्ति जो वेदांत में ज्योति के नाम से पुकारी जाती है, जड़ जगत् में प्रकट होना चाहती है, किंतु जड़ जगत में पर्दा अत्यंत मोटा होने से उस (ज्योति) का प्रकाश वहाँ इतना प्रकट नहीं होता जितना कि वनस्पति जगत् में से होता है, इस लिये वनस्पति जगत् की श्रेणी जड़ जगत् से ऊँची मानी गई हैं। और वनस्पति में भी जब वह चैतन्य शक्ति अपने आप को प्रकट किया चाहती है, तो यद्यपि जड़ जगत् की अपेक्षा पर्दा वहाँ ज़रा कम स्थूल होता है, तौभी कुछ स्थूल होने के कारण वहाँ वह इतना प्रकट नहीं होती जितना कि प्राणी (चेतन) जगत् में होती है, इसी लिये प्राणियों की श्रेणी जड़ और वनस्पति से बढ़कर मानी गई है। फिर पशुओं में जब वह प्रकाशस्वरूप आत्मा अपना प्रकाश बाहर फैलाना चाहता है, तो यद्यपि उनमें जड़ और वनस्पति की अपेक्षा पर्दा और भी कम स्थूल होता है, मगर तौभी स्थूल होने के कारण उनमें से ज्योतिमय सूर्य का प्रकाश उतना भासमान नहीं होता जितना कि मनुष्य में होसकता है, अतः मनुष्यों का दर्जा अन्य समस्त सृष्टि अर्थात् जड़, वनस्पति और प्राणि-सृष्टि से उत्तम
माना गया है। किन्तु विकासवाद केवल यहाँ तक ही अन्त नहीं करता, बरन् आगे मनुष्यों में भी बहुत सी श्रेणियाँ हैं; विशेषतः दो दर्जे मनुष्यों के बतलाए जाते हैं। इन दर्जों के आगे कोई और दर्जा विकासवाद ने आज तक न तो बताया, न स्थिर किया है। मनुष्य को दो बड़ी श्रेणियों में विभक्त किया गया है—एक ज्ञानी की, दूसरी अज्ञानी की। ज्ञानी वह जिनका अन्तःकरण रूपी पर्दा अत्यन्त सूक्ष्म और स्वच्छ है, और अज्ञानी वह जिनका अन्तःकरण स्थूल और मलिन है। जैसे ग्लोबदार लैम्प में दो चिमनियाँ होती हैं—एक अत्यन्त निर्मल, स्वच्छ और पतली होती है कि जिसके भीतर से लैम्प का प्रकाश निकल कर समस्त मनुष्यों की आँखें चौंधिया देता है; दूसरी निर्मल और अल्प स्वच्छ तो होती है, मगर पहली की अपेक्षा थोड़ी मोटी और धुँधली होता है जिसमेंसे लैम्पका प्रकाश बाहर प्रकट तो होता है मगर पहले की अपेक्षा बहुत ही हल्का होता है। इस तरह ज्ञानी का अन्तःकरण उस अत्यन्त महीन, निर्मल और स्वच्छ चिमनी के समान होता है जिसके भीतर से आत्मदेव की ज्योति ऐसे वेग से बाहर प्रकाशित होती है कि बीच में अन्तःकरण रूपी पर्दा दखने में ही नहीं आता, बरन् असली ज्योति ही आँखें मारती मालूम देती हैं; मगर अज्ञानी का अन्तःकरण उस ग्लोब के समान होता है कि जिसके भीतर तो प्रकाश उसी प्रकार ज़ोर का होता है जैसा पहली चिमनी के भीतर था, मगर बाहर इस ज़ोर से प्रकट नहीं होता जैसे पहली चिमनी से फूट-फूट कर निकलता था। अर्थात् जिसमें से पहले की अपेक्षा प्रकाश हल्का और धुँधलासा निकलता है और ज्योति रूपी लाट भी धुँधला पर्दा होने के कारण आँखें मारती
कम दिखाई देती हैं। इस तरह से, हे भगवन्! उस सूर्यों के सूर्य के तेज को बाहर प्रकट करने के लिये सिवाय अन्तःकरण को शुद्ध करनेके और कोई साधन वा उपाय नहीं है। अन्तःकरण जब शुद्ध हो जायगा तो फिर चाहे आत्म-ज्योति प्रकाश को बाहर प्रकट करने का प्रयत्न करें अथवा न करें, ज्योति बिना आपके प्रयत्न के आपके भीतर से फूट फूट कर बाहर निकलेगी। इस स्वच्छ अन्तःकरणमें से प्रकाश निकल कर अन्य अज्ञानी मनुष्यों के अन्तःकरणोंको भी जो चिमनी के ऊपर के ग्लोब के समान है प्रकाशमान कर देगा। इस लिये आपका काम केवल अपने अन्तःकरण को ही अति पतली चिमनी के समान साफ़ और स्वच्छ बना देनाहै। जब अन्तःकरण ख़ूब निर्मल हो जायगा, तो उससे प्रकाश निकल कर अन्य अज्ञानी पुरुषोंके मनों को भी प्रकाशित कर देगा। इसी लिये हे भगवन्! पहले अपने अन्तःकरण को पतली और निर्मल-स्वच्छ चिमनी के तद्वत् बनाइए। इस प्रकार आपका अपना हृदय शुद्ध करना ही दूसरों का उपकार करना है। जिस समय अन्तःकरण बिल्लौर के समान स्वच्छ हो जायगा तो ज्ञानरूपी प्रकाश बिना आपके प्रयत्न और खोज के भीतर से प्रज्वलित होता हुआ औरों के हृदयोंको प्रकाशित करेगा, तब विकासवाद के नियम के अनुकूल भी आपका दर्जा समस्त जातियों से उत्तम होगा। क्योंकि जब वह ज्योति मनुष्य के अन्तःकरण से निकलती हुई अपना पूरा पूरा तेज बाहर दिखला देती है, तो उस समय विकासवाद के तत्व-वेत्ता भी उस मनुष्य को समस्त अन्य मनुष्यों पर विशेषता देते हैं, अर्थात् उसका दर्जा सारे संसार की सृष्टि से बढ़कर मानते हैं; मगर हिन्दुओं के यहाँ तो वह अवतार ही समझा जाता है। अतः यदि मनों में संसार के
उद्धार करने का आवेश उठता है, तो ऐ सहानुभूति करने वालो! पहले अपने आपका सुधार करो। और इस प्रकार से आपका अपने हृदय को शुद्ध करना और अपने आत्मा में निष्ठा करना ही अपने आप का सुधार करना होगा। जब इस रीति से अपना सुधार हो जायगा, तो यह अवश्य समझ लेना कि दूसरों का भी अपने आप सुधार हो जायगा; बरन् सबको निश्चय करना चाहिये कि इस नियम के विरुद्ध सुधार कभी भी संसार में हुआ नहीं। इस विषय में आपको अपना अनुभव गवाही देगा।
अन्तःकरण को शुद्ध करने का साधनः—पहले वर्णन कर आए हैं, कि सुधार के इच्छुक या सुधारक महाशय के लिये शुद्ध अन्तःकरण रहना अत्यन्तावश्यक है। अतः अन्तःकरण के स्वच्छ रखने का उपाय भी शास्त्र और तत्व-ज्ञान के अनुसार बता देना आवश्यक समझ कर स्पष्ट किया जाता है। इससे पहले कि अन्तःकरण के स्वच्छ करने की रीति वर्णन की जाय, पहले प्रत्येक का ध्यान प्रकृति की ओर खींचा जाता है कि उसने सांसारिक पदार्थों को निर्मल और स्वच्छ या मलिन और स्थूल करने का कौन सा ढंग वा नियम अंगीकार किया है। क्योंकि जो रीति प्रकृति ने सांसारिक पदार्थों को स्वच्छ और निर्मल करने के लिये अंगीकार की हुई है, वही ढंग या नियम यदि मनुष्य स्वीकार करेंगे तो निश्चयतः आशा की जा सकती है कि अन्तःकरण बहुत शीघ्र स्वच्छ और निर्मल हो जायगा यद्यपि मलिन तो पहले से है ही। विज्ञान के मत से सूर्य का प्रकाश सप्त रंगों का समुदाय होता है और जो रंग संसार में मौजूद हैं, वह केवल सूर्य के ही हैं।
अब प्रत्येक व्यक्ति जो विज्ञानविद् नहीं है, यह सुन कर बड़ा चकित होगा और यों कहेगा कि जब हम नील-कमल कहते हैं तो उससे स्पष्ट पाया जाता है कि कमल का रंग नीला है, फिर किस प्रकार कहा जा सकता है कि रंग केवल सूर्य का ही है? नीला रंग कमल का न होने में विज्ञान यह प्रमाण देता है कि रात को अँधेरे में हम कमल की पँखड़ियाँ और आकार, गोलाई, और वज़न आदि वैसा ही पाते हैं जैसे कि दिन में प्रकाश के समय पाते थे, मगर नीला रंग जो सबेरे प्रकाश में कमल का देखते थे अब अँधेरे में कमल के साथ बिलकुल दिखाई नहीं देता। यदि कमल की पत्तियाँ, आकार और गोलाई आदि की तरह नीला रंग भी कमल का अपना होता, तो कमल के शेष सब अंगों के समान वह भी सदैव कमल के साथ बना रहता।
परन्तु अँधेरे में शेष सब अंग तो कमल के साथ बने रहते हैं और मान भी होते हैं, किन्तु केवल रंग ही रंग नहीं रहता और न दिखाईही देताहै। इससे स्पष्ट सिद्ध होता है कि रंग कमल का नहीं बरन् उस प्रकाश का है जिसमें या जिसके कारण नीला रंग दिखाई देता था और लगातार नज़र आता था। इसमें अब फिर यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि यद्यपि यह सिद्ध होगया कि रंग कमल का न था, किंतु यह किस प्रकार कहा जासकता है कि जो रंग किसी वस्तु का प्रकाश में देखा जाय वह केवल प्रकाश का ही होता है? इस विषय में सविस्तर उत्तर तो प्रत्येक महाशय को नेबुलरथियूरी (नीहारिका सिद्धान्त) के पढ़ने से मिल सकता है, किंतु यहाँ केवल संक्षेपतः वर्णन किया जा सकता है। इस विषय में विज्ञान यों कहता है कि जो रंग
नीला या पीला आदि वस्तुओं का दिखाई देता है, उसका कारण केवल यह है कि जो सात रंग (लाल, नारंगी, नीला, आसमानी, पीला, हरा, और बनफ्शी) विज्ञान ने सूर्य के प्रकाश के वर्णन किये हैं, उनमें से छे रंग तो वस्तुयें शोषण करजाती हैं, और शेष एक रंग सूर्य की ओर वापिस लौटा देती हैं। जो रंग वस्तुएँ नहीं शोषण करतीं बल्कि सूर्य ओर ही वापिस लौटाती रहती हैं, वही रंग दिखाई देता है। यद्यपि दृष्टि में तो ऐसा ही आता है कि रंग वस्तु का है, किंतु वास्तवमें वह रंग केवल उसी सूर्य का ही होता है कि जिस स्रोतसे पहिले निकलकर वह वस्तुओं में शोषित होने के लिये वस्तुओं की ओर आया था, और शोषित न किये जाने के कारण फिर अपने स्रोत सूर्य की ओर ही वह गमन करता है। इस तरह से प्रत्येक रंग जो वस्तुओं का दिखाई देता है, वास्तव में सूर्य का ही होता है।
अब यहाँ एक और प्रश्न उत्पन्न होता है कि प्रकाशके सातों रंगोंमें काला और सफेद गिने नहीं गए, इसलिये हम किस प्रकार से कहसकते हैं कि यह दो रंग सूर्य के प्रकाश के ही हैं? और यदि सूर्य के प्रकाश के नहीं हैं तो ये दोनों रंग कहाँ से उत्पन्न हुये? इसके उत्तर में विज्ञान का यह कहना है कि यदि आप इन रंगों का भी स्रोत मालूम किया चाहें तो पहले इन दोनों रंगों के प्रकट होने का कारण आपको जानना चाहिए। जब उनके प्रकट होने का कारण मालूम होजायगा तो फिर इनके स्रोत का हाल भी अपने आप मालूम हो जायगा। वस्तुओं का काला रंग उस समय होता है जब वस्तुएँ प्रकाश के सातों रंगों को शोषण करलेती हैं; और सफेद रंग उस समय होता है जब वस्तुएँ प्रकाश के सातों रंगों में से एक को भी शोषित नहीं करतीं, वरन् सातों के सातों रंगों
को प्रकाश के स्वामी सूर्य की ओर वापस लौटा देती हैं, या दूसरे शब्दों में यों कहा कि वापस लौटाती रहती हैं। अतः ये दोनों रंग कहीं बाहर से किसी और वस्तु के द्वारा उत्पन्न नहीं हुए, वरन् वस्तुओं का ये दोनों रंग प्रकट करना केवल सूर्य के प्रकाश के सातों रंगों को अपने में शोषित करने या अपने से बाहर निकालकर सूर्य की ओर वापस लौटाने के कारण से है। इस लिये इन दोनों रंगों के प्रकट होने का कारण भी सूर्य का प्रकाश ही हुआ। किंतु यहाँ पर कर्म और कर्ता, या सूर्य और प्रकाश, में कुछ अंतर ही नहीं है, क्योंकि अपरिमित प्रकाश के स्रोत को विज्ञानविद् सूर्य मानते हैं। अतः इन दोनों रंगों का कर्ता अर्थात् इन दोनों का उत्पन्न करने वाला सूर्य ही हुआ। अतएव ये दोनों रंग सूर्य के हुए। अस्तु, यहाँपर और लंबे तर्क की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इतने लंबे प्रमाण से केवल तात्पर्य यह था कि संसार की समस्त वस्तुओं के काले और श्वेत होजाने का कारण स्पष्ट किया जाय और यह सिद्धान्त आपकी समझमें आजाय कि संसार की समस्त वस्तुएँ केवल त्याग से अर्थात् सूर्य के प्रकाश के रंगों को अपने में प्रविष्ट न करने से, या उनके त्याग करने से, ही श्वेत होती हैं। अतः जिस प्रकार त्याग से अर्थात् प्रकाश के रंगों को अपने स्वामी की ओर वापस लौटा देने से समस्त वस्तुएँ श्वेत रंग की होजाती हैं, वैसे ही प्राणियों के अंतःकरण भी यदि यह शैली ग्रहण करें, अर्थात् भाँति भाँति के सांसारिक पदार्थों को अपने में शोषित न करें, वरन् उनके स्वामी परमात्मा की ओर वापस लौटा दें, तो वह भी श्वेत वस्तुओंकी भाँति श्वेत स्वच्छ और शुद्ध होसकते हैं, और जब मन उस पतली और स्वच्छ चिमनी के समान, जिसका उल्लेख पहले
होचुका है स्वच्छ और निर्मल होजायँगे, तो उनमें से आत्मा का प्रकाश फूट फूट कर बाहर स्वतः निकलेगा, वरन् स्वयं आत्मा रूपी ज्योति स्वच्छ पर्दे में से आँखें मारती हुई दिखाई देगी। विरुद्ध इसके जब समस्त सांसारिक पदार्थों का प्रवेश अंतःकरण में होजायगा, अर्थात् जब मन समस्त भाँति भाँति के पदार्थों की कामना करके उनको अपने में शोषित करेगा, तो वह मन काली वस्तुओं की भाँति मलीन और काला होजायगा। इसलिये यदि आप स्वच्छ हृदय होना चाहते हैं तो प्यारो! स्वच्छ वस्तुओं की तरह आप सब पदार्थों का त्याग स्वीकार करिये। संसार में समस्त काली वस्तुएँ आपको यही उपदेश कर रही हैं कि यदि सांसारिक पदार्थों को इस तुच्छ अहंकार के वश में आकर अंतःकरण में शोषित करते जाओगे, तो उनकी भाँति तुम्हारा अंतःकरण, या तुम स्वयं, काले हो जाओगे, और इस तुच्छ स्वार्थपरता के फंदे में फंसना ही आत्म-हनन करना है। इस लिये भगवन्! स्वच्छ या शुद्ध अंतःकरण वाला बनने के लिये यह आवश्यक है कि आप श्वेत वस्तुओं के समान मनको समस्त सांसारिक पदार्थों का पीछा करने से हटा दें और मन में उनका लेश मात्र भी प्रविष्ट न होने दें। जब इस प्रकार से आप आचरण करेंगे, तो फिर आपके रोम रोम से यह आवाज़ प्रत्येक को सुनाई देगी कि त्याग ही अन्तःकरण की शुद्धि का एक मात्र साधन है।
किंतु स्मरण रहे कि उक्त अमृत उस समय ही प्राप्त होगा जब आप मनको पदार्थों से विरक्त करेंगे, अर्थात् मनको त्याग सिखाएँगे, क्योंकि इस अमृत को पाने के लिये श्रुति भगवति यह सिखलाती है।
धीराः प्रेत्यास्मार्ल्लोकादमृता भवन्ति।
(सामवेद केनोपनिषद्)
अर्थात् धैर्यवान् पुरुष इस जगत् से मुहँ मोड़कर अमृत को प्राप्त होते हैं। वैसे भगवन्! यदि तुम अमृत को चाहते हो तो मोड़ो मुहँ जगत् के पदार्थों से, वापस लौटाओ मनको अपने मालिक सूर्य की ओर, देखो, प्रत्येक पदार्थ में अपने सूर्य रूपी आत्मदेव को ही जिससे पदार्थ भाव मनसे गर्दभ श्रृंगवत् उड़जाय, जैसे नामदेव के मन से उड़गया, था कि जो कुत्ते के रोटी लेजाने पर अपने हाथ में साग लेकर यह कहते हुए "रूखी न खाइयो मेरे स्वामी जी अपना बाँटा ले जाइयो" उसके पीछे हो लिये थे। अर्थात् लोगों की दृष्टि में तो कुत्ता रोटी लेजा रहा था मगर नामदेवजी के विचार में तो उनका स्वामी परमात्मा ही उनके हाथ से छीनकर लेजा रहा था।
इसी प्रकार प्यारो! मनको यदि पदार्थों से वापस लौटाकर अपने सूर्य रूपी आत्मदेव में लगाओगे, तो पदार्थ देखने के स्थान पर आपको वहाँ भी अपना आत्मदेव ही दिखाई देगा, वरन् पदार्थ-भाव बिलकुल ही उड़जायगा। जगत् के चित्र बिचित्र पदार्थों को मनमें न शोषित (जज़ब) करने का तात्पर्य यही है कि उनसे मनका मुहँ ऐसा मुड़जाय कि तनिक पदार्थ भाव मन में न रहे, वरन् उसकी द्वैत-दृष्टि भी उड़जाय और परमात्मा ही परमात्मा दिखाई दे। किंतु ऐ सुधार के इच्छुको! ऐ संसार पर सहानुभूति प्रकट करने वालो! यह स्मरण रहे कि पदार्थ भाव मनसे कभी नहीं मिटेगा जबतक कि मनको आत्मा में लीन न करोगे। क्योंकि मन का केवल पदार्थों की ओर जाने से रोकना ही
पदार्थ भाव को दूर करने के लिये काफी नहीं होगा, वरन् मनका पदार्थों से हटकर अपने आत्मा में निष्ठा करना पदार्थ भाव को दूर करेगा। ऐसे ही भगवन्! यदि तुम पदार्थों का विचार अंतःकरण से उड़ाना चाहते हो तो उठो! उठो! मनको आत्मा में स्थित करो, क्योंकि तुम्हारे मन का आत्मा में स्थित होना ही हल्का होकर ऊपर उड़जाना है। ब्रह्मनिष्ठ होने के बाद आपको सुधार करने की चिंता भी न करनी होगी वरन् बिना प्रयत्न किये संसार का भला स्वाभाविक होता जायगा, चाहे उस समय तुम निर्जन वन में बैठो, चाहे संसार में प्रकट रूप से उपदेश दो, स्वाभाविक ही संसार का कल्याण होगा। इस लिये प्यारो! इसके पहिले कि कोई और साधन सुधार का ग्रहण करो, यही रीति जो अपने आप को सुधार करने की पुकार पुकार कर बतलाई गई है और जिससे संसार का श्रेष्ठ उपकार होसकता है, उसको तुम हृदयंगम करो।
ॐ! ॐ!! ॐ!!!