भारत वर्ष
[ 384 ] भारत स्तुति राग गारा, ताल धुमाली। सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा। हम बुलबुलें हैं उसकी, यह बोस्तां' हमारा ॥1॥ ग़ुर्बत' में हों अगर हम, रहता है दिल वतन' में। समझो वहीं हम भी, हो दिल जहां हमारा ॥2॥ पर्वत वह सब से ऊँचा, हमसाया आसमां' का। वह सन्तरी हमारा, वह पासवां' हमारा ॥3॥ गोदी में खेलती हैं जिस के हज़ारों नदियां। गुलशन' हैं जिनके दम से रश्क़े-जहां' हमारा ॥4॥ ऐ आबे-रवद' गंगा ! वह दिन है याद तुझ को। उतरा तेरे किनारे जब कारवां' हमारा ॥5॥ मज़हब नहीं सिखाता आपस में वैर रखना। हिंदी हैं हम, वतन है हिन्दोस्तान् हमारा ॥6॥ यूनानो-मिस्रो-रूमा सब मिट गये जहां से। बाक़ी पर है अभी तक नामो-निशां हमारा ॥7॥ कुछ बात है कि हस्ती' मिटती नहीं हमारी। सदियों' से आसमां है ना मेहरवान् हमारा ॥8॥ Notes: 1 बाग़, 2 विदेश, 3 स्वदेश, जन्मभूमि, 4 आकाश का पड़ोसी, 5 चौकीदार, रक्षक, 6 वाटिका, 7 संसार के दैत्यों का स्थान, 8 ऐ बहती गंगाजी का जल, 9 काफ़िला, 10 स्थिति, वस्तुतः, 11 सैंकड़ों वर्षों से।
इक़बाल' अपना कोई मैहरम' नहीं जहां में। मालूम है हमीं को दर्दे-निहां' हमारा ॥9॥ [ 385 ] भारत वर्ष की महिमा। चिश्ती' ने जिस ज़मीन् में पैग़मे-हक़' सुनाया। नानक ने जिस क़लीम में वहदत' का गीत गाया ॥ तातारियों ने जिस को अपना वतन बनाया। जिसने हजाज़यों से दशते-अरब' छुड़ाया ॥ मेरा वतन वही है । मेरा वतन वही है ॥1॥ (टेक) यूनानियों को जिस ने हैरान कर दीया था। सारे जहां को जिसने इल्मो-हुनर दीया था ॥ मिश्री को जिसकी हक़' ने ज़र' का असर दीया था। तुर्कों का जिस ने दामन' हीरों से भर दीया था ॥ मेरा वतन वही है । मेरा वतन वही है ॥2॥ फिर ताव' देके जिस ने चमकाये कहकशां' से। टूटे थे जो सतारे फ़ारस के आस्मां से ॥ वहदत की नै' सुनी थी दुनया ने जिस मकां से। मीरे-अरब' को आई ठंडी हवा जहां से ॥ मेरा वतन वही है । मेरा वतन वही है ॥3॥ Notes: 1 कवि का नाम है, 2 मेल-मित्र, परिचित या वाक़िफ़ पुरुष, 3 छुपा हुआ दर्द, 4 मुसलमानों का पैग़म्बर, 5 ईश्वर का हुक्म, 6 मुल्क, 7 अद्वैत, 8 अरब मुल्क का जंगल, रेगिस्तान्, 9 ईश्वर, 10 स्वर्ण, 11 चादर का पल्ला अर्थात् नेव, 12 ताक़त, 13 आकाश में दूधिया रास्ता (miky path) के समान, 14 बाँसुरी अर्थात् अद्वैत का राग, 15 हज़रत महम्मद से अभिप्राय है।
गौतम' का जो वतन है, जापान का हरम' है। ईसा के आशक़ों का छोटा येरूशलम' है ॥ मदफ़ून' जिस ज़मीन में असलाम का चश्म है। हर फूल जिस चमन का फ़रदौस' है, अरम' है ॥ मेरा वतन वही है । मेरा वतन वही है ॥4॥ [ 386 ] हुब्बे-वतन' अर्थात् स्वदेश-प्रीति देखा है प्यारे ! मैं ने दुनया का कारख़ाना। सैरो-सफ़र' किया है, छाना है सब ज़माना ॥ अपने वतन से बेहतर' कोई नहीं ठिकाना। ख़ारे-वतन' को गुल' से खुशतर' है सब ने माना ॥ अहले-वतन' से पूछो, तुम खूबियां वतन की। बुलबुल ही जानती है आज़ादियां चमन' की ॥1॥ खाओ हवा वतन की, कुछ और ही मज़ा है। पानी पीयो वतन का, अमृत से भी खरा' है ॥ खाके-वतन' न कहिये, इक्सीरो-कीमिया' है। रुतवा' तेरी ज़िर्मीं का कुछ ऐ वतन ! जुदा है ॥ जो शय' ग़रज़ यहां है, दुनया से है निराली। नामे-वतन' ने इसमें ताज़ा है जान डाली ॥2॥ Notes: 1 बुद्ध भगवान्, 2 तीर्थ का मुक़ाम, बड़ा मंदर, 3 ईसायों के पूजने का मंदिर, 4 दफ़न कीया गया, 5 बहिश्त, 6 स्वर्ग, 7 अपने देश की प्राप्ति, 8 देश यात्रा देशाटन, 9 उत्तम, 10 स्वदेश का कांटा अर्थात् दुःख, 11 पुष्प, 12 उत्तम, 13 स्वदेश के लोगों से, 14 बाग़, 15 अच्छा, स्वच्छ, 16 जन्मभूमि की मट्टी, 17 दुःखनाशक रसायन, 18 दर्जा, 19 वस्तु, 20 स्वदेश के नाम ने।
बाग़ों में फिर के देखो कुछ और ही है तुज़हुतें'। खेतों से यहां के आती है आँख में तरावतें ॥ रखते हैं यां के दरिया कुछ और ही लताफ़तें। यां के पहाड़ में हैं अर्ज़ो-विरों' की रफ़अतें ॥ दुनया में फिर के देखा हरगिज़ कहीं नहीं है। वागे-बहिश्त' कहिये यां की ज़मीन् नहीं है ॥3॥ है धूप में वतन की कुछ और नूर' तावां'। और चांदनी यहां की चांदी सी है दरख़शां' ॥ अन्वार' की तजल्ली' बिजली सी है नुमायां'। रहमत की वह झड़ी है, कहिये न उसको वारां' ॥ मिलके-ज़मीरे-रौशन' मतला' की है, सफ़ाई। दिल में उठीं उमंगें, जिस दम घटा भर आई ॥4॥ देखे यहां के इंसां अक्सर फ़रिश्ता' खो हैं। सब औरतें' हुसीं' हैं सब मर्द ख़ूबरू' हैं ॥ रखते हैं यहां के हैवां कुछ और खो ओ बू' हैं। और ताइरों' को देखो तो क्या ही खुशगलू' हैं ॥ इंसान और हैवान् यूं तो हैं देखे भाले। लेकिन यहां हैं सब के अन्दाज़' कुछ निराले ॥5॥ Notes: 1 शुद्धताई, पवित्रता, 2 स्वच्छता, कोमलता, 3 सबसे ऊंचा आकाश स्वर्ग, 4 उंचाई, बुलन्दी, 5 स्वर्ग की बाटिका, 6 और सूर्य वा प्रकाश, 7 चमक रहा है, 8 चांदी सी है चमकीली, 9 प्रकाश अर्थात् चांद सतारे इत्यादि, 10 तेज, चमक, 11 अधिक स्पष्ट, 12 वर्षा, 13 शुद्ध चित्त की तरह, 14 आकाश से अभिप्राय है, 15 देवता के स्वभाव वाले, 16 स्त्री जाति, 17 सुन्दर, 18 सुन्दर मुख, 19 स्वभाव और मिज़ाज़, 20 पक्षी, 21 उत्तम गले (सुरीले कंठ) वाले, 22 ढंग, यहां बज़ा, कता क़द इत्यादि से अभिप्राय है।
जौहर' वतन में आकर खुलता है आदमी का। जब था वतन से बाहर, बेशक वह आदमी था ॥ यां आदमी नहीं वह है वाप या कि बेटा। कहता है कोई भाई, कोई उसे भतीजा ॥ यां गोशज़द' हैं हरसू' उल्फ़त भरी सदायें'। बाहर वतन से हरगिज़ जो कान में न आयें ॥6॥ है हम को जानो-दिल से अपना वतन प्यारा। अच्छा वह दिन है उस की खिदमत में जो गुज़ारा ॥ कहते हैं हम वतन को आँखों का अपनी तारा। वह जान है हमारी, ईमान है हमारा ॥ हां मेहर' ! यह सुख़न' है, दुनया में सब ने माना' । अपने वतन से बेहतर' कोई नहीं ठिकाना ॥7॥ [ 387 ] स्वदेश की पूर्वदशा स्मृति राग देश कभी हम भी वलन्द इक़बाल थे, तुम्हें याद हो कि न याद हो। हर फ़न में रखते कमाल थे, तुम्हें याद हो कि न याद हो ॥1॥ पढ़ते थे जब हम वेद को, जानें थे सब के भेद को। रखते न अपनी मिसाल थे, तुम्हें याद हो कि न याद हो ॥2॥ पाबन्द थे जब धर्म के, माहर' थे अपने कर्म के। रौशन सभी पुरजलाल' थे, तुम्हें याद हो कि न याद हो ॥3॥ Notes: 1 गुप्त, खूबी, 2 कान भर रही या कानों को सुना रहीं, 3 सर्व शोर, 4 प्रेम भरी, 5 आवाज़ें, 6 कवि का नाम है, 7 वचन, वाक्य, बात, उपदेश है, 8 अच्छा, उत्तम, 9 दबदबे वाले, बड़े तप वाले।
जब से जहालत' आ गयी, तारीकी' हर सू' छा गयी। मुफ़लिस हैं जो खुशहाल थे, तुम्हें याद हो कि न याद हो ॥4॥ हाकिम हैं जो महकूम' थे, ख़ादम' हैं जो मख़दूम' थे। शेर अब हुए जो श्रृगाल थे, तुम्हें याद हो कि न याद हो ॥5॥ हालत दिगरगूं' हो गयी, क़िसमत किश्वर' की सो गयी। रोते हैं अब जो निहाल' थे, तुम्हें याद हो कि न याद हो ॥6॥ [ 388 ] स्वदेश की वर्तमान दशा भजन इक दिन राहे-तरक़्क़ी में हम भी रहनुमा' थे। अब लोग पूछते हैं नामो-निशां हमारा ॥ यूनान, मिसर, रूमा, इंगलैण्ड, गाल, जरमन'। शागिर्द इक ज़माने में था जहान् हमारा ॥ दुनया में हो रहा था भारत वर्ष का चर्चा। सब की जुवान पर था लुत्फ़े-वियां' हमारा ॥ गौतम, व्यास, भीषम थे नामवर यहीं के। अर्जुन सा तीर-अफ़गन' था इक तवान' हमारा ॥ Notes: 1 अज्ञान, 2 अन्धकार, 3 तरफ़, सर्व ओर, 4 प्रजा, जिन पर हुकूमत थी, 5 नौकर, दास, 6 खिदमत किया गया अर्थात् स्वामी, 7 दूसरी तरह, 8 मुल्क, देश, 9 खुश, आनंद, 10 नायक, रास्ता दिखाने वाला, 11 मुल्कों के नाम हैं, 12 हमारे ही ज़िक्र के गीत अथवा महिमा, 13 तीर फैंकने वाला, 14 शूरवीर बहादर।
रौनक़ चमन' की सारी फ़सले-खज़ां' ने लूटी। वीरान हो गया है सब गुलिस्तान' हमारा ॥ हां अहले-हिन्द' उठो, हालत ज़रा संभालो। नक़्शा हुआ दिगर' गूं है बेगुमान् हमारा ॥ राहत' की गर तलब' है, सब इत्तफ़ाक़ करलो। छोड़ो नफ़ाक़, इसी में होगा ज़ियान' हमारा ॥ [ 389 ] भारत कुल लावनी आशा में जिन की जहान था, उन की कुल में हमीं तो हैं । सात द्वीप नवखंड बीच में जिन का मान था, हमीं तो हैं ॥ (टेक) चौदा विद्या जो निधान' थे, उन की कुल में हमीं तो हैं। जिन से चतुर हैं पशु हैवान् अब, उन की कुल में हमीं तो हैं ॥ वेदों का मानें प्रमाण थे, उन की कुल में हमीं तो हैं। बांचें हैं मिथ्या ज्ञान अब, उन की कुल में हमीं तो हैं ॥ सब विद्याओं की जो खानें' थे, उन की कुल में हमीं तो हैं ॥1॥सात० ब्राह्मण वहां पूर्ण गुणवान थे, उन की कुल में हमीं तो हैं। मूर्ख हूये ज्योती अभिमान में, उन की कुल में हमीं तो हैं ॥ Notes: 1 बाग़ की बहार, 2 शरद ऋतु, 3 उपवन, 4 भारत वासी, 5 उलट दूसरी तरह का, 6 आराम, आनन्द, 7 जिज्ञासा, 8 नुक़सान, हानि, 9 चौदह विद्या में चतुर अर्थात् चौदह विद्या के ख़ज़ाने वाले, 10 मूल, संख्या, ख़ज़ाना।
सब का जो चाहें कल्याण थे, उन की कुल में हमीं तो हैं। ठग्गी की धरली दुकान अब, उन की कुल में हमीं तो हैं ॥ विद्या का करते थे दान जो, उन की कुल में हमीं तो हैं ॥2॥सात० ऋषी मुनि जहां ज्ञानवान् थे, उन की कुल में हमीं तो हैं। भंग चर्स में हैं गलतां' अब, उन की कुल में हमीं तो हैं ॥ जिन का देव सर्व शक्तिमान था, उन की कुल में हमीं तो हैं। जिन का इष्ट है विषय ध्यान अब, उन की कुल में हमीं तो हैं ॥ संसकृत जिन की अपनी जुवान् थी, उन की कुल में हमीं तो हैं ॥3॥सात० आकाश में चलते विमान थे, उन की कुल में हमीं तो हैं। रेल देख हो गये हैरान अब, उन की कुल में हमीं तो हैं ॥ चली भीमसैन वालों से समान थे, उन की कुल में हमीं तो हैं। घुटनों पर रख उठें हाथ अब, उन की कुल में हमीं तो हैं ॥ कृष्ण, राम, भीषम् समान थे, उन की कुल में हमी तो हैं ॥4॥सात० ब्रह्मचर्य की जिन को वान थी, उन की कुल में हमीं तो हैं। बल बीर्य खोय नातवां' हुए, ऐसे नादान् हमीं तो हैं ॥ लक्षसिंहारी' जिन के वान थे, उन की कुल में हमीं तो हैं। चूहें का नहीं कटें कान अब, ऐसी सन्तान हमीं तो हैं ॥ अंगद सुग्रीव हनूमान थे, उन की कुल में हमीं तो हैं ॥5॥सात० देश उन्नति का था ध्यान जिन्हें, उन की कुल में हमीं तो हैं। भारत में कर बैठे हान अब, उन की कुल में हमीं तो हैं ॥ प्राणियों पर देते प्राण जो, उन की कुल में हमीं तो हैं। अब मद मांस को करे पान जो, उन की कुल में हमीं तो हैं ॥ गौ जान पर जिनकी जान थी, उनकी कुल में हमीं तो हैं ॥6॥सात० Notes: 1 फंसे हुये, डूबे हुये, 2 कमज़ोर, 3 वक्ष सिंहों को मारने वाले।
आर्यावर्त जिन का स्थान था, उन की कुल में हमीं तो हैं। जिन का स्थान हिन्दुस्थान अब, उन की कुल में हमीं तो हैं ॥ बड़े बड़े यहां धनवान थे, उन की कुल में हमीं तो हैं। भोजन बिन हो रहे विरान अब, उन की कुल में हमीं तो हैं ॥ विद्या में करते स्नान थे, उन की कुल में हमीं तो हैं ॥7॥सात० सत उपदेश करते थे गान जो, उन की कुल में हमीं तो हैं। कोक' शास्त्र करें बिखान अब, उन की कुल में हमीं तो हैं ॥ सत असत हेतें थे छान जो, उन की कुल में हमीं तो हैं। सुन के सत जायें बुरा मान अब, उन की कुल में हमी तो हैं ॥ नहलसिंह' कहे वेद धर्म पर धरो ध्यान फिर हम ही तो हैं ॥8॥सात० [ 390 ] भारत-नींद उठो अब नींद को त्यागो, हुआ बिलकुल सवेरा है। हवा बदली ज़माने की, तुम्हें आलस ने घेरा है ॥ बड़े बनने लगे तुम से जो छोटे थे कई दर्जे। तुम्हारी अक़्ल पर कीना जहालत' ने बसेरा है ॥ पड़े तुम बेखबर सोते, नहीं जगते जगाने से। तुम्हारे घर में घुस बैठा, अविद्या का लुटेरा है ॥ बुजुर्गों की थी क्या इज्ज़त, तुम्हारा हाल है अब क्या ? ज़रा तो ग़ौर कर सोचो, हुआ यह क्या अँधेरा है ॥ Notes: 1 एक शास्त्र का नाम है जिनमें विषय भोग करने की नानाविधि दिखाई हैं अर्थात् विषय भोग का शास्त्र, 2 कवि का नाम है, 3 अविद्या, अज्ञान।
करो अब देश की चिंता यह गफ़लत नींद को त्यागो। नहीं तो डूबता कुछ दिन में यह भारत का बेड़ा है॥ चली जब जायगी सारी तुम्हारी शान और शौकत। तो फिर अफ़सोस खाओगे, पड़े जब दुःख घनेरा है॥ जगाओ ऐ प्रभु! अब तो हमारे देश भाइयों को। यही बलदेव की अरज़ी, भरोसा नाथ! तेरा है॥ [ 391 ] स्वदेश-प्रीति की नित्यता आग में पड़कर भी सोने की दमक जाती नहीं। काट देने से भी हीरे की चमक जाती नहीं॥ सिल पर घिसा देने से भी जाती नहीं चन्दन की बू। फूल की मिट्टी में मिल कर भी महक² जाती नहीं॥ कूट कर आता नहीं कुछ लाल की रंगत में फ़र्क़। तोड़ देने से भी मोती की चमक जाती नहीं॥ रंज में आता नहीं नेकों की पेशानी³ पै बल। धूप की तेज़ी में सब्ज़ा की लहक जाती नहीं॥ रुक नहीं सकती कटहरों में शेरों की दहाड़। दस्ते-गुलचीं⁴ में भी गुंचों की महक⁵ जाती नहीं॥ Notes: 1 अति भारी, 2 सुगंध, 3 मत्था, 4 फूल तोड़ने वाले हाथ में, 5 सुगंध।
ख़ौफ़ो-ख़तरे में बदल सकती नहीं मर्दों की ख़ू¹। अन्दलीबों² की क़फ़स में भी चहक जाती नहीं॥ साहिबे-हिम्मत नहीं दबता मुख़ालिफ़ से कभी। ज़ोर से आंधी के आतिश की भड़क जाती नहीं॥ नारवज़न रहता है आफ़ातो-हवादिस³ में दलेर। बादलों में घिर के बिजली की कड़क जाती नहीं॥ मुल्क की उल्फ़त का जज़्बा⁴ दिल से मिट सकता नहीं। क़ौम की ख़िदमत में ख़्वाहिश, ऐ फ़लक⁵! जाती नहीं॥ [ 392 ] भारतीय का प्रण नाम ज़िन्दों में लिखा जाँयगे मरते मरते। लाज भारत की बना जाँयगे मरते मरते॥ जान पर खेल ही जाँयगे अगर हम तौ भी। सैंकड़ों ही को जला जाँयगे मरते मरते॥ सगे-तन होंगे जुदा उन को तो होना ही है। हम तो बिछड़ों को मिला जाँयगे मरते मरते॥ वह कोई और होंगे जो रो के छला के मरते। हम रक़ीबों को हँसा जाँयगे मरते मरते॥ Notes: 1 प्रकृति, 2 बुलबुल पक्षियों, 3 कष्टों और विपत्तियों, 4 प्रेम का वेग वा प्रवाह, 5 कवि का नाम, देव लोक।
ख़ाक में जिस्म किसी और का मिलता होगा। हम तो भूखों को खिला जाँयगे मरते मरते॥ तिशनह लब आयँगे जिस वक़्त रक़ीबे-नादान। ख़ूँ तक अपना पिला जाँयगे मरते मरते॥ [ 393 ] हिन्दुओं को चितावनी हे हिन्दू क़ौम! तेरा गो है निशान बाक़ी। लेकिन नहीं है तुझ में बिल्कुल ही जान बाक़ी॥1॥ सब गोश्त पोस्त तेरा अफ़सोस सड़ चुका है। अब रह गये हैं तुझ में कुछ उस्तख़्वान¹ बाक़ी॥2॥ सिर हाथ पैर टाँगें, तेरी अलग अलग हैं। हैरत है किस तरह फिर तुझ में हैं प्राण बाक़ी॥3॥ मत भेद से हज़ारों फ़िरके हुए हैं तुझ में। जिन में नहीं है कुछ भी जुज़² पँठ तान बाक़ी॥4॥ हर एक दूसरे का बदख़्वाह³ हो रहा है। दिल में नहीं किसी के कुछ तेरा ध्यान बाक़ी॥4॥ ऐ हिन्दु क़ौम! तेरे बेटों के पास अब तो। बस रह गई है ख़ाली ज़िल्लत⁴ व हानि बाक़ी॥6॥ ईसाई खा रहे हैं मुर्दा समझ के तुझ को। खा लेंगे जो रहा है पहले क़ुरान⁵ बाक़ी॥7॥ Notes: 1 हड्डी, 2 अतिरिक्त, 3 अनिष्टचिन्तक, 4 ज़लील होना, 5 मुसलमान लोग।
हालत यही रही गर कुछ दिन भी तो बिलाशक। क़ायम नहीं रहेगा तेरा निशान बाक़ी॥8॥ जो तेरे थे मुहाफ़िज़ दुनिया से चल बसे वह। कोई नहीं है तेरा अय पासबान बाक़ी॥9॥ राम और कृष्ण जैसे सच्चे सपूत तेरे। सब चल बसे, रहे हैं हमनाम जान बाक़ी॥10॥ वीरों से गोद तेरी ख़ाली हुई है माता। कोई नहीं है तुझ में मौक़ूफ़¹ समान बाक़ी॥11॥ बाज़ार धर्म का सब मसमार² हो चुका है। ठगों की रह गई है वेशक़ दुकान बाक़ी॥12॥ पीछे पड़ी हुई हैं जुमला³ अछूत क़ौमें। जिन को नहीं है तेरा मुतल्लिक़ भी ध्यान बाक़ी। सालिग⁴ से पुत्र तेरे बलहीन प्यारी अम्मां। करने को रह गये हैं आहो-फ़ुग़ान⁵ बाक़ी॥14॥ [ 394 ] हिन्दुओं की दशा किस ओर गिर रहे हो किस धुन में जा रहे हो? अपनी यह हिन्दुओं! क्या हालत बना रहे हो?॥1॥ किस कोढ़ ने है घेरा! कैसी लगी बीमारी! न वह छोड़ती है, न तुम ही छोड़ रहे हो॥2॥ न तो सो ही तुम रहे हो, जगते भी नहीं खुलकर। कहला के आर्य भारत रज⁶ में मिला रहे हो॥3॥ Notes: 1 टूट गया, नष्ट हो चुका, 2 समस्त, 3 नितांत, 4 कवि का नाम, 5 रोना चिल्लाना, 6 मिट्टी में।
फ़रियादी जो पिता का ऋषियों की हम के ऊपर। क्यों भाग्यहीन उस को नीचे गिरा रहे हो॥4॥ सब त्यागते के साथ ही भाषा भी छोड़ बैठे। हो कौन मुँह लगाकर हिन्दू कहा रहे हो॥5॥ इस बाढ़ में समझ लो वह जाओगे सरासर। हिन्दी का हिन्द से जो नाता छुड़ा रहे हो॥6॥ अब भी समय बहुत है कर लो सुधार अपना। सिर पर कलंक का क्यों टीका लगा रहे हो॥7॥ चिल्लाते मर गये हम, पीछे जगे भी तो क्या। "माधव¹" के दिल जले को, फिर क्यों जला रहे हो॥8॥ [ 395 ] स्वदेश-भारत को हिन्दी माता की अपील ऐ हिन्द के सपूतों! क्या है ख़ता हमारी। जो आज गिर रही हूँ आँखों से मैं तुम्हारी॥1॥ मुख चूम चूम मैं ने है बोलना सिखाया। हा²! वह मेरी मुहब्बत तुम देते हो बिसारी॥2॥ हिन्दी हूँ माँ तुम्हारी, कुछ तो नज़र उठाओ। देखो पिता तुम्हारा भी हो रहा भिखारी॥3॥ खाती हूँ लात दर दर, जीती हूँ वेह्या³ हूँ। पर क्या करूँ जिगर में इक आस है तुम्हारी॥4 तुम लाख कैसे ही हो, ख़ूने-जिगर हो अपने। इक दिन कभी तो बच्चो! सुधि लोगे ही हमरी॥ Notes: 1 कवि का नाम, 2 अपराध, 3 हाय शोक, 4 निर्लज्ज।
[ 396 ] बलि-बलि जाऊँ। मैं तो भारत पै बलि-बलि जाऊँ। गुइयाँ मैं तो भारत पै बलि-बलि जाऊँ॥ टेक भारत है मेरा प्राणों का प्यारा। दिल का दुलारा, जीवन अधारा॥ उस पै तन मनको वारूँ, उस पै त्रिभुवन को हारूँ। उसको पलकों पै धारूँ, उस को दिल पै बैठाऊँ॥1॥ टेक भारत है मेरा कुँवर कन्हैया, बन बन में मेरी चराता है गैया। उस को बन से बुलाऊँ, उस को मालन खिलाऊँ। उस से वंसी बजवाऊँ, अपने अँगना नचाऊँ॥2॥ टेक भारत है मेरा प्यारा ललनवा। करता कलोलें (मेरे) दिल के पलनवा। उस को गोदिया उठाऊँ, उस के कजरा लगाऊँ। उसको मल-मल निहलाऊँ, उसको अंचरा पिलाऊँ॥3॥ टेक भारत है मेरा दुनिया से न्यारा। मेरी बलंदी, मेरा सितारा। उस पै दिठिया लगाऊँ, उस से रोशन हो जाऊँ। मैं तो उस में समाऊँ, अपना आपा भुलाऊँ॥4॥ टेक ( श्रीपद्म-कोट, प्रयाग ) [ 397 ] शिक्षक भारत भारत हमारा जग को क्या क्या सिखा रहा है। (टेक)
उस के सुपुत्र सारे संसार के हैं प्यारे। पूरण प्रशान्त पावन जीवन की ज्योति धारे। संसार भर के सेवक, संसार भर से न्यारे। उन के पवित्र मन का दर्पन दिखा रहा है॥1॥ टेक "दुष्कृत कोई न कर तू, करते सुकृत न डर तू। "हर कर किसी के धनको अपना भवन न भर तू। "पर-हित के साधने में कोई न कर कसर तू"। शुभ कर्म की तरफ यों सब को झुका रहा है॥2॥ टेक "कर न्याय की न हिंसा, हे नर न हो मृशांसा। "धर सत्य की सुपंथा, होकर निडर, निसंसा। "मर ले हृदय-भवन में भगवान् की प्रशंसा"— अनमोल सत-बचन का अमृत चखा रहा है॥3॥ टेक भारत का जग ऋणी है, यह जग-शिरोमणी है। शुचिता में सौम्यता में, दृढ़ता में अग्रणी है। दर्शक है पुण्य-पथ का, कर्मण्य है, प्रणी है। सद्धर्मता के धन की निधि को रखा रहा है॥4॥ टेक ( श्रीपद्म-कोट, प्रयाग ) [ 398 ] हित-अनहित समझ मन रे मूरख नादान। अपना और पराया, जग में, हित अनहित पहचान॥ टेक॥ अपनों का तुझे ज्ञान नहीं है, ग़ैरों पर है ध्यान।
जिन को कुछ पर्वाह नहीं तेरी, उन पर तू क़ुरबान॥ समझ मन रे मूरख नादान॥1॥ अपनों और परायों में जो रखता ग़लत गुमान। खाता ख़ता एक दिन भारी, खोता सारी शान॥ समझ मन रे मूरख नादान॥2॥ हित अनहित की समझ समस्या हो जा सजग, सुजान। अगर पार करना हो जीवन का अपार मैदान॥3॥ समझ मन रे मूरख नादान ( श्रीपद्म-कोट, प्रयाग ) [ 399 ] प्रेममय संसार प्रेममय है सारा संसार प्रेमहि का सारा प्रसार है, मत कह इसे असार॥1॥ प्रेम बार है, प्रेम पार है, प्रेमहि है मंझधार। बेड़ा पड़ा प्रेम सागर में, प्रेम से होगा पार॥ प्रेममय है सारा संसार॥2॥ प्रेमहि है स्वारथ, परमारथ, सकल-पदारथ-सार। प्रेम बिलग जो है तेरे मन में सो है प्रेम-विकार॥ प्रेममय है सारा संसार॥3॥ हो जा निडर, छोड़ दे गड़बड़, पकड़ प्रेम की धार। प्रेम केवल से केवल होगा, निबल, तेरा निस्तार॥ प्रेममय है सारा संसार॥4॥ ( श्रीपद्म-कोट, प्रयाग )
[ 400 ] लावनी* शुद्ध सच्चिदानन्द ब्रह्म हूँ, अजर, अमर, अज अविनाशी। जास ज्ञान से मोक्ष हो जावे कट जावे यम की फांसी॥ अनादि ब्रह्म, अद्वैत, द्वैत का जा में नामो-निशान् नहीं। अखंड सदा सुख, जा का कोई आदि मध्य अवसान नहीं॥ यही ब्रह्म हूँ, मनन निरन्तर, करें मोक्ष-हित संन्यासी। शुद्धि सच्चिदानन्द ब्रह्म हूँ, अजर, अमर, अज, अविनाशी॥1॥ सर्वदेशी हूँ, ब्रह्म हमारा एक जगह अवस्थान नहीं। रमा हूँ सब में, मुझ से कोई भिन्न वस्तु इल्जान नहीं॥ देख विचारो, सिवाय ब्रह्म के हुआ कभी कुछ आन नहीं। कभी न छूटे पीछू दुःख से जिसे ब्रह्म का ज्ञान नहीं॥ ब्रह्म ज्ञान हो जिसे उसे नहीं पड़े भोगनी चौरासी। शुद्ध सच्चिदानन्द ब्रह्म हूँ अजर, अमर, अज, अविनाशी॥2॥ अदृष्ट, अगोचर, सदा दृष्ट में जा का कोई आकार नहीं। नेति, नेति, कह निगम ऋषीश्वर, पाते जिस का पार नहीं॥ अलख ब्रह्म लियो जान, जगत नहीं, कार नहीं, कोई यार नहीं। आँख खोल दिख की टुक प्यारे कौन तरफ गुलज़ार नहीं॥ सत्य स्वरूप आनंद राशी हूँ, कहूँ जिसे षट् घट वासी। शुद्ध सच्चिदानंद ब्रह्म हूँ, अजर, अमर, अज, अविनाशी॥3॥ Notes: * भूल से यह लावनी निजानन्द के अध्याय में छपने से रह गई थी इसलिये अब इसे अन्त में दे दिया है।