श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

उन्नति का मार्ग।

भाग 10 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 10 · अध्याय 3 / 5

उन्नति का मार्ग।

(24 सितम्बर सन् 1905 को दिया हुआ व्याख्यान)

व्याख्यान आरंभ करने से पहले राम आपको यह बताना चाहता है कि आत्म-पूजा (सेल्फ़-रेस्पैक्ट Self respect) और आत्म सम्मान इन शब्दों के क्या अर्थ हैं। लोगों ने इनको गलत समझ रखा है। यदि आप स्वयं (सेल्फ़ Self) के अर्थ परिमित समझते हैं और उसको केवल अपना शरीर मानते हैं, तो आत्म-पूजा (सेल्फ़ रेस्पैक्ट) के अर्थ अहंकार और अहंमन्यता के होंगे, जो पाप है। यदि सेल्फ़ का तात्पर्य ईश्वर का स्वरूप समझा जाय, तो सेल्फ़-रेस्पेक्ट से बढ़कर कोई पुण्य नहीं होसकता है। राम आप लोगों से चाहता है कि व्याख्यान आरंभ होने से पहले आप अपने विचारों को एकत्र कीजिए, अर्थात् एकाग्रता से काम लीजिए, और खूब ध्यान से सुनिए। आप भगवत्-स्वरूप हैं, और जब कि आप अनंत स्वरूप हैं, तो आप में परिच्छिन्न सांसारिक विचारों का होना भी गलत है।

एक राजा का पुत्र किसी बुरे काम में प्रवृत है। अपने नौकरों में बैठता है, अथवा किसी को गंदी गालियाँ

देता है, और उससे यह कहा जाता है कि तुम क्या कर रहे हो, तुमको यह शोभा नहीं देता, तुम राजा के पुत्र होकर इन नीच लोगों में बैठते हो और ऐसी गालियाँ अपनी जिह्वा पर लाते हो; वह तत्काल अपनी असली अवस्था को जान करके अपने कर्म पर लज्जित होता है। इसी प्रकार आप अपने स्वरूप का ध्यान कीजिए। आपका स्वरूप तो परमेश्वर है, वह स्वरूप तो त्रिलोकी को आनंद देनेवाला है, सूर्य को सोना और चंद्रमा को चाँदी देनेवाला है, अतः आप ठीक उस बालक की तरह अपने कर्मों पर लज्जित होओ, और सांसारिक वस्तुओं में अपने को इतना आसक्त न होने दो। अपने स्वरूप को जानो और समझो। देखो, तुम्हारा गायत्री मंत्र क्या सिखाता है। राम उस मंत्र को नहीं पढ़ता, केवल उसका आशय (उद्देश) बतलाएगा। वह यह है, मेरी बुद्धि प्रकाशित हो, क्योंकि वह जो सूर्य और चंद्र और तारों को प्रकाश देनेवाला है, वह मेरा आत्मा है। जब यह बात है तो राम कहता है कि वे लोग जो अभेदवादी हैं, वे अपनी अभेद-दृष्टि को सन्मुख रखकर, और वे जो भेदवादी हैं वे अपनी भेद-दृष्टि को धारण करके उस ज्योतिस्वरूप का ध्यान करें। वह ध्यान क्या है? वह यह है कि वह जो बाह्यप्रकाश का स्रोत है और जो भीतरी ज्ञान-ज्योति का स्रोत है, वह मेरे हृदय में है, मेरे हृदय में वह दीपक जलरहा है, मेरे हृदय में वह ज्योति प्रकाशमान है। अब राम आज के विषय पर आता है। वह विषय यह है।

यह विषय अत्यंत विस्तृत है। इसलिये इसमें से केवल एकाध आवश्यक भागों को राम लेगा। आम तौर से लोग

यह प्रश्न करते हैं कि ये उन्नति उन्नति पुकारने वाले लोग कहाँ से आगये? अरे भाई! अपने घर रहने और आमोद-प्रमोद से जीवन व्यतीत करने में सुख है या उन्नति-उन्नति की शिर पीड़ा मोल लेने में? लोगों की जिह्वा पर यही है कि हमको यहीं रहने दो, हम आगे नहीं जाना चाहते और इसी पर वे आचरण भी करते हैं, और उनका कथन है।

बक़द्रे-हरसकूँ राहत बुवद बनिगर तफ़ावत रा। दवीदन रफ़्तन ईस्तादन निशस्तन ख़ुफ़्तनो मुर्दन॥

अर्थ-इस कहावत के प्रमाण में कि प्रत्येक स्थिति (ठहराव) में कितना आनंद होता है तुझे दौड़ने, चलने, खड़े होने, बैठने, सोने और मरने की स्थिति के अन्तर पर विचार करना उचित है।

किंतु यह आनंद क्या वस्तु है? यह तो क्षणभंगुर है। यह कोई अवस्था स्थिर नहीं रहसकती। कभी तो ख़ुफ्तन (स्वप्न) की दशा ख़त्महोगी, फिर उसके बाद राहत (आराम) का अन्त है। सबसे अधिक आनंद तो वहाँ होगा कि जब ऐसी मृत्यु आवे कि फिर मरने की नौबत न आवे। ऐसे आलस्योपासक महात्माओं को राम एक प्रकृति का नियम बतलाता है। विकासवाद का इतिहास (History of Evolution) हमको यह उपदेश देता है कि "move or die" आगे बढ़ो, या मरो। जो कोई आगे बढ़ने से इनकार करेगा, वह कुचला जायगा। इसके सिवाय और कोई वश वा इलाज नहीं है। संसार में जितने प्राणी हैं, सब की दशाओं पर ध्यान करने से यही नियम मालूम होता है कि आगे बढ़ो। जड़, चेतन, वनस्पति सभी स्थान पर इसी नियम का सिक्का (आतंक वा राज्य) है।

असभ्य जातिओं और पशुओं की दशाओं को पढ़ने से भी यही मालूम होता है कि उनके खून के प्रत्येक बूँद पर लिख दिया गया है कि आगे बढ़ो। कहा गया है और सच कहा गया है कि उन्नति (Evolution) जंगोजद्दल पुरुषार्थ से, परिश्रम से, और कष्ट उठाने से होती है। जो व्यक्ति परिश्रम और प्रयत्न न करेगा, वह नष्ट होगा और कुचला जायगा। जिस तरह एक गाड़ी में घोड़ा जोता जाता है, उसका काम है कि गाड़ी को खींचकर आगे लेजाय। यदि वह न चले और रुक जाय तो कोचबान उसपर चाबुक पर चाबुक मारता है। यही दशा व्यक्तियों और जातियों की है।

जो व्यक्ति या जाति आगे चलने से इनकार करती है, उसको दैव या प्रकृति (providence) के नियम चाबुक मारते हैं। यह नियम अटल है। इसके बर्तनेमें कभी रिआयत नहीं हो सकती। परमेश्वर को किसी जाति या संप्रदाय का पक्ष नहीं है। जो कोई उसके नियम के अनुसार चलता है, वह उसका प्यारा है, वह बचता है; किंतु जो उसके नियम को तोड़ता है, वह उसका शत्रु है, वह मरता है और नष्ट होता है। ज़रा देखो तो, यदि तुम सांसारिक गवर्नमेंट के नियमों के विरुद्ध चलो, तो तत्काल दंड पा जाते हो, किसी तरह बच नहीं सकते; जब सांसारिक गवर्नमेंट के नियमों के विरुद्ध चलने का यह हाल है, तो भला परमेश्वर के नियमों के विरुद्ध चलना और बचने की आशा करना बिलकुल मूर्खता है या नहीं। धर्मशास्त्र के अनुसार भी आगे बढ़ने से इनकार करने का ही नाम पाप है। इसको तमोगुण कहते हैं। भौतिक विज्ञान-शास्त्र हमको सिखाता है कि गति के नियमों में से एक नियम का नाम है Law of Inertia, जड़ता का नियम। अपनी दशा बदलने

से इनकार करने को जड़ता कहते हैं। प्रत्येक वस्तु में यह भाव या स्वभाव है कि वह अपनी दशा बदलना नहीं चाहती। यही सुस्ती, शिथिलता या जड़ता है। हमारे शास्त्रों में श्रम या शक्ति से शून्य होने को तमोगुण कहते हैं। यह नियम विस्तार के साथ इन शब्दों में वर्णन किया जासकता है कि यदि एक वस्तु को स्थिर अवस्था में रक्खा जाय, तो वह सदैव उसी अवस्था में रहेगी और जबतक कोई चेतन वस्तु उसपर कार्य न करे, उस समय तक वह अपनी दशा नहीं बदलेगी। इसी प्रकार यदि एक वस्तु को गतिकी दशा में रक्खा जाय तो वह बराबर उसी दशा में रहेगी, और जबतक कोई चेतन वस्तु उसपर कार्य न करे, उस समय तक वह उस दशा को परिवर्तित नहीं करेगी। इसको स्थिरता का नियम भी कहते हैं। अतः आगे न बढ़ना, या यों कहिए कि अपनी दशा को परिवर्तित न करना, जड़ता है, तमोगुण है, अर्थात् पाप है। एक दूसरा नियम (Law of Acceleration) वर्धमानता या गत्यन्तर का नियम है। इससे रजोगुण प्रकट होता है। अर्थात् यह वह दशा है कि जब जड़ता के ऊपर अपना वश वा शासन प्राप्त होजाता है। और आगे बढ़ने या दशा परिवर्तित करने का विचार और उसकी शक्ति आजाती है।

अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि मनुष्य तो अनन्त स्वरूप है। इसमें यह पाप कहाँ से आया। इसका उत्तर कुछ लोग यों देते हैं कि प्रथम पाप हज़रत आदम ने किया था और उसमें से हमको यह बपौती मिली। राम इस प्रश्न पर इस ढंग से बहस नहीं करेगा। राम आपको बतलायगा कि ज़रा हिन्दू-शास्त्र (Hindu Philosophy) की ओर ध्यान करो और देखो कि उसने क्या सिखाया

है। यहाँपर पुनर्जन्म का प्रश्न आजाता है, जो सच है और जो स्वतः एक स्वतंत्र व्याख्यान का विषय है। राम इस समय उसपर कुछ नहीं बोलेगा। हमको हिन्दू-शास्त्र यह सिखाता है कि मनुष्य चौरासी लाख योनियों में से फिरकर आया है। विज्ञान का भी यह एक निर्णीत सिद्धान्त है कि मनुष्य सबके पश्चात् उत्पन्न हुआ है। इतिहास-चिह्न विद्या (Archeology) और भूगर्भ विद्या (Geology) आदि से इसका पूरा प्रमाण मिलता है। गर्भ शास्त्र (Embryology) भी इसको सिद्ध करता है। यह नवीन विद्या है जिसका हेकल (Heckel) ने आविष्कार किया है। इस विद्या के प्रत्यक्ष अनुभवों से भली भाँति सिद्ध होता है कि मनुष्य सब से बाद को आया। राम स्वयं एक अद्भुतालय (अजायब घर) में गया। उसमें देखा कि गर्भ के भीतर के एक दिन, दो दिन, तीन दिन, पाँच दिन. इसी क्रम से महीने, दो महीनें तक के भ्रूण (बच्चे) शीशियों के भीतर स्पिरिट में रक्खे हुए थे। उनसे ज्ञात होता था कि माता के पेट में चेतन की क्या अवस्था होती है। वह भिन्न भिन्न रूप धारण करता है—अर्थात् मछली, मेंढक, कुत्ता, बन्दर आदि दशाओं में से होकर उसके बाद मनुष्य की अवस्था धारण करता है। अतः स्पष्ट सिद्ध है कि मनुष्य संसार में सब से बाद को आया। और क्योंकि वह पाशविक अवस्थाओं को छोड़कर आया है, इसलिये उसमें अभी (Animal passions) तमोगुण शेष है, इसीलिये उसमें पाप पाये जाते हैं। पाप या पुण्य, ये सापेक्षक शब्द (relative terms) हैं। जो वस्तु एक दशा में पाप है, वह दूसरी दशा में पुण्य है। बच्चे के लिये जो पाप नहीं है, वह बूढ़े के लिये पुण्य है। चौथी श्रेणी का एक बालक

अपनी कक्षा की पुस्तकों को पढ़ता है, वह इसके लिये पुण्य है, किन्तु यदि एम्॰ ए॰ क्लास का एक विद्यार्थी अपनी पुस्तकें छोड़कर चौथी श्रेणी की पुस्तकें पढ़े, तो उसके लिये पाप है। एफ़॰ ए॰ क्लास से उन्नति पाकर बी॰ ए॰ में पढ़ना पुण्य है, किन्तु बी॰ ए॰ में फेल होकर पुनः २ बी॰ ए॰ में पढ़ना पाप है। इससे स्पष्ट होताहै कि पाप की जड़-मूल यह है कि एक अवस्था से उन्नति न करना। इसी प्रकार जो बातें पशुओं में मौजूद थीं और उनमें पाप न थीं, परन्तु मनुष्य की अवस्था में आने से पाप में परि- वर्तित होगईं। पशुओं की दशा छोड़ने के पश्चात् मनुष्य मनुष्य की दशा में आता है, किन्तु उसमें तमोगुण (Animal passion) शेष रहता है। यदि इस समय वह उस बुद्धि से जो उसको पशुओं से पहचान करने के लिये दीगई है, काम न ले और इस बात पर विचार न करे कि क्या उसके लिये पुण्य है और क्या उसके लिये पाप है, तो वह जड़ता के नियम (Law of Inertia) के अनुसार जड़ है, क्योंकि वह अपनी अवस्था परिवर्तित करना नहीं चाहता है। वह उन बातों को, जो उसमें पशुता की अभी शेष हैं, ज्यों की त्यों रहने देना चाहता है, और बुद्धि के प्रकाश से लाभान्वित होकर आगे नहीं बढ़ना चाहता है।

अतः जो व्यक्ति आगे बढ़ने के लिये तैयार नहीं है, वह पाप करता है। यही पाप का तत्व है, और यही है सम्बन्ध जिस तरह से पाप मनुष्य में आता है।

तुम्हारी बाइसिकिल का पहिया घूम रहा है, और तुम्हारा कुत्ता उसके आगे-आगे दौड़ता चला जा रहा है। यदि वह बराबर चला जायगा तो उसका कोई सद्मा

( चोट ) तुम्हारी बाइसिकिल के पहिए से नहीं पहुँचेग किन्तु यदि वह रुक जाय या तुम्हारी बाइसिकिल की चाल की अपेक्षा अपनी चाल कम करदे, तो वह अवश्य पहिए के नीचे दबजायगा। हाँ, एक उपाय उसके बचाव का यह भी है कि तुम स्वयं अपनी बाइसिकिल को रोक दो। इसी तरह पर काल का पहिया चक्कर लगा रहा है उसके साथ-साथ दौड़ो तो कुशल है, नहीं तो उसके नीचे दबकर मरना आवश्यक है। यहाँ एक कठिनता और भी है कि परमेश्वर अपने पहिए को नहीं रोकेगा। उसके नियम अटल हैं, वे सदैव प्रचलित हैं। वहाँ किसी का पक्षपात नहीं है।

अतः उन्नति करो, नहीं तो कुचले जाओगे, पिस जाओगे और नष्ट होजाओगे। वही जातियाँ नष्ट होती हैं जो आगे नहीं चलती हैं। जो सदैव पीछे ही को पग हटाती हैं, जो नवता (originality) और नूतन मार्ग प्रवर्तन (Innovation) को पाप समझती हैं। राम इन शब्दों की व्याख्या नहीं करेगा। इनका तात्पर्य तो तुम अपने आप समझ गये होगे। इससे यह परिणाम निकला कि उन्नति के अर्थ प्रयत्न और पुरुषार्थ के हैं।

इस पर यह प्रश्न होता है कि यह तो सत्य है कि उन्नति के अर्थ प्रयत्न के हैं; किन्तु प्रयत्न से क्या हो सकता है, प्रत्येक वस्तु प्रारब्ध के अधीन है, अर्थात् भाग्य पर निर्भर है। यह विषय स्वयं ऐसा है कि इस पर एक स्वतंत्र व्याख्या न दिया जाय, किंतु संक्षेपतः उत्तर यह है:—

तत्व तो यह है कि जो लोग कहते हैं कि प्रत्येक काम भाग्य से होता है, वह भी सत्य कहते हैं। वह इस सिद्धान्त

को लागू करने में भूल करते हैं। दृष्टान्त रूप से, जैसी ऋतु होगी, वैसा स्वभाव हो जायगा। जाड़े की ऋतु में गरम कपड़े पहनोगे, घर के भीतर रहोगे, आग जलाओगे, आदि- आदि। गर्मी की ऋतु में मैदान में रहोगे, ठण्ढे कपड़े पहनोगे, ठण्ढा पानी पियोगे, आदि-आदि।

अब ऋतु का बदलना दैव-इच्छा वा भाग्य या प्रारब्ध है, अर्थात् वह एक नियत वस्तु है। और यह प्रारब्ध सारे देश पर प्रभुत्व स्थापन किये है, किंतु ऋतु के अनुसार कपड़े पहनना और उसके अनुसार स्वभावों को बनाना अपने ही पुरुषार्थ पर निर्भर है। परिवर्तित ऋतु की दशा इसमें कुछ नहीं कर सकती। चोर चोरी करता है, विद्यार्थी पढ़ता है, जज मुक़द्दमे फैसल करता है, ये सब लोग अपने अपने काम सूर्य की सहायता से करते हैं। इन लोगों में काम करने की शक्ति अन्न खाने से आती है, अन्न सूर्य के प्रकाश और शक्ति को खा जाता है। इस प्रकार वही सूर्य का तेज इन लोगों में आकर काम करता है। दीपक के प्रकाश में भी वह ज्योति है, जो उसने सूर्य से उधार ली है। अतः स्पष्ट है कि दरअसल इन सब के कामों का करने वाला सूर्य है। किंतु क्या बात है कि सूर्य को कोई चोरी का लांछन नहीं लगाता है। उसको क्यों नहीं अपराधी निश्चित किया जाता। कारण यह है कि सूर्य सामान्य जुज्व वा अवयव (Common factor) है, क्योंकि उसने वकील, मुद्दई और जज को भी उसी तरह पर शक्ति दी है जिस तरह पर कि चोर को। व्यवहार में सामान्य जुज्व (Common factor) निकाल दिया जाता है। जिस तरह जुज्व तुलना में अ-ब=ज-ब के अर्थ अ=ज हैं, अर्थात् ब जो सामान्य अवयव (Common factor) था, खारिज

कर दिया गया, और इस समानता में कोई अन्तर भी नहीं आया। इसी तरह पर कल्पना करो कि एक मनुष्य दूसरे के धक्के से गिर पड़ा, तो वस्तुतः इसके गिरने का कारण गुरुत्वाकर्षण का नियम (Law of gravitation) है, किंतु वह उस नियम से नहीं लड़ेगा। वह तो उस धक्का देने वाले को पकड़ेगा। अतः प्रत्येक मनुष्य में कुछ भाग अस्थिर (Variable) है, और कुछ भाग स्थिर (Invariable) है। स्थिर भाग तो प्रारब्ध है, और अस्थिर भाग पुरुषार्थ है। अब यह देखना है कि इन दोनों में कोई सम्बन्ध भी है या एक दूसरे से वे बिलकुल सम्बन्ध-रहित और निष्प्रयोजन हैं। राम इसको व्यावहारिक दृष्टि से आपके समक्ष उपस्थित कर रहा है। इनमें एक विशेष सम्बन्ध है। आपकी प्रारब्ध आपही की बनाई हुई है। यदि पुरुषार्थ कोई वस्तु ही नहीं है, तो धार्मिक पुस्तकों में विधि और निषेध क्यों सिखाया गया है? इसी के लिये कहा है—

दर्मियाने-कारे-दरिया तह्तावंदम कर्दए, वाज़ मी गोई कि दामन तर मकुन हुशियार बाश़।

अर्थ—नदी के भारी वेग में तो हाथ पाँव बाँध कर मुझे डाल दिया और फिर यह तू कहता है कि हुशियार हो। पल्ला मत भीगने दो, अर्थात् लिपायमान मत हो।

धार्मिक पुस्तकों के देखने से, चाहे वह मुसलमान, हिंदू या ईसाई धर्म की हों, यह स्पष्ट विदित होता है कि उन्होंने तुम्हारे भीतर पुरुषार्थ का एक अंश पाया है।

अब राम दोनों का सम्बन्ध दिखाता है। रेलगाड़ी पटरी को छोड़ कर इधर या उधर नहीं जा सकती है। पटरी उसकी भाग्य है, किंतु चलने में वह स्वतन्त्र है, यह

उसका पुरुषार्थ है। किंतु रेल जारी होने से पहले पटरी भी रेल वालों के अधिकार में थी। इसी प्रकार एक व्यक्ति एक ग़रीब के यहाँ उत्पन्न होता है, जहाँ उसके माता-पिता खाने तक को मुहताज हैं। वे उसकी सामान्य परिपालना भी नहीं कर सकते। एक दूसरा व्यक्ति किसी अमीर के यहाँ उत्पन्न होता है, और दूसरा किसी गंड मूर्ख के यहाँ जन्म लेता है। यह तो रेल की पटरी की तरह उसकी प्रारब्ध है, किंतु इसमें पुरुषार्थ का भी भाग है जिसके कारण वह अपनी दशा को सँभाल सकता है। विदित रहे कि यह भाग्य की पटरी उन्हीं के पुरुषार्थ के अनुसार बनाई जाती है। देखा, मकड़ी अपने मुँह से तार निकालती है और उसके बाद उसी पर चलती है। अब वह किसी दूसरी ओर नहीं जा सकती, यदि वह किसी दूसरी ओर जाना चाहे, तो फिर वह अपने मुँह से तार निकाले और उसको उसी ओर ले जावे, तब उस ओर भी जा सकती है। तार निकलने से पहले वह (तार निकालने का काम) उसका पुरुषार्थ था, किंतु निकलने के बाद वह उसकी प्रारब्ध बन गया। अब उसको उस पर चलने के सिवाय और कोई उपाय नहीं है।

यह विदित है कि तार निकालने से पहले उसके अधिकार में था कि किसी ओर इसको ले जावे, अर्थात् अपने प्रारब्ध का बनाना उसके अधिकार में था। किंतु जब एक बेर वह बनगई फिर उसके बदलने के लिये पुनः पुनः वही कलकी कार्रवाई करनी पड़ती है जो एक बेर करचुकी है। रेशम के कीड़े की दशा से भी यही सिद्ध होता है। एक और उदाहरण लीजिए। कल्पना कीजिए कि एक मनुष्य दस्तावेज़ लिखना चाहता है, अर्थात् कुछ पुरुषार्थ

करना चाहता है। अब इस पुरुषार्थ के समय उसको अधिकार है कि करे या न करे (अर्थात् दस्तावेज़ लिखे या न लिखे), अथवा जो शर्तें चाहे लिखे। किंतु जब एक बेर लिख चुका, तो फिर पाबंद होगया। वह उसकी प्रारब्ध बन गई। अब सिवाय शर्तों की पाबंदी के और कोई इलाज नहीं है। यथा—

यारे-मन खुद कर्दा रा इलाजे नेस्त; कर्दनी ख्वेश, आमदनी पेश।

अर्थ- मेरे प्यारे! अपने किये हुये पुरुषार्थ का और कोई इलाज नहीं, सिवाय इसके कि जो कुछ किया है वह भोगने के सामने आवे।

हैं ख़ते-तक़दीर से यह ख़त-पेशानियाँ; पेश आती हैं यही जो हैं पेशआनियाँ।

योगवाशिष्ठ में लिखा है कि पुरुषार्थ ही से कार्य की सिद्धि होती है। सारे बुद्धिमान् लोगों के काम पुरुषार्थ ही से होते हैं। प्रारब्ध का शब्द तो केवल उन लोगों के आँसू पोंछने के वास्ते बनाया गया था जो कोमल चित्त हैं और जिनपर कोई विपत्ति आपड़ी है, नहीं तो नित्यप्रति जीवन के कुल काम पुरुषार्थ ही से हो सकते हैं। मनुष्य भोजन भी पुरुषार्थ ही से खाता है, पानी भी पुरुषार्थ ही से पीता है, नौकरी भी पुरुषार्थ ही से करता है, कोई सार्वजनिक काम भी पुरुषार्थ ही से करता है।

इस भूमिका के पश्चात् ज़रूरी उन्नति को सफलता के साथ करने के उपाय को राम बताता है। उद्यमों में कृतकार्यता प्राप्त करने के लिये इन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

(1) सांसारिक काम धंधों के निमित्त सबसे पहली वस्तु प्रकाश है। कैसा ही निर्मल और स्वच्छ घर क्यों न हो, यदि अँधेरे में जाओगे तो कहीं कुर्सी की चोट लगेगी, कहीं दीवार से शिर टकराएगा, कहीं लैम्प से ठोकर लगेगी, और वह टूट जायगा, निदान, पग २ पर दुःख ही दुःख होगा। फिर बिना प्रकाश के कोई वस्तु उग नहीं सकती। एक पौधा अँधेरे में बोया जाय और दूसरा प्रकाश में, और दोनों का सींचना एकही प्रकार किया- जाय। परिणाम क्या होगा? स्पष्ट है कि अँधेरे में बोया हुआ पौधा सूख जायगा और प्रकाश वाला खूब हरा भरा होता चला जायगा। फिर जब बिना प्रकाश के वृक्ष नहीं उन्नति कर सकते हैं, तो मनुष्य का उन्नति करना तो एक किनारे ही रहा। अब प्रकाश से प्रयोजन क्या है? वही ध्यान जिसका उल्लेख राम भाषण के आरंभ में कर आया है। वही तेजों का तेज ज्योतिस्वरूप आत्मदेव। उसका न भूलना इसी का नाम प्रकाश है। अब इसपर कदाचित् कहोगे कि यह क्या बेहूदगी है। संसार में सहस्रों नास्तिक होते हैं, क्या उन्होंने कोई उन्नति नहीं की है। राम का उत्तर यह है कि ये सुप्रसिद्ध लोग, जिनको आप नास्तिक कहते हैं और जो बड़े बड़े काम करगये हैं, जैसे हरबर्ट- स्पेंसर, स्पाईनोज़ा, और हक्सले (Herbert spencer, Spinoza और Huxley)। मान भी लीजिए कि ये लोग नास्तिक थे; किंतु व्यावहारिक रीति पर अर्थात् प्रत्यक्ष रूप से इनकी उन्नति का कारण उनकी ईश्वर प्रमुखता और उनकी ईश्वरोपासना है। इन लोगों के जीवनचरित्रों को पढ़िए। इससे ज्ञात होगा कि यद्यपि ये लोग हमारे माने हुए ईश्वर को नहीं मानते थे, किंतु वे ईश्वर के भाव

(Spirit) को अपने नस २ में रखते थे। एक राजा के यहाँ दो नौकर हैं। इनमें से एक तो राजा की खूब खुशामद करता है, किंतु काम कुछ नहीं करता है; दूसरा राजा की खुशामद (चाटुक्ति) से कुछ प्रयोजन नहीं रखता, केवल अपना धार्मिक कर्तव्य अत्यंत सुन्दरता के साथ पालन करता है। अब प्रश्न यह है कि राजा किससे प्रसन्न होगा? स्पष्ट विदित है कि वह काम करनेवाले से प्रसन्न होगा। काम प्यारा है; चाम नहीं प्यारा है। बस यही दशा उन नास्तिकों की है। उन्हों ने माला नहीं जपी, उन्होंने माथा नहीं रगड़ा, किंतु उन्हों ने अपने आचरण से ईश्वर की उपासना की, उनका प्रत्येक काम माला का एक दाना था, और उनकी जीवनी एक माला थी। राम आप से यह नहीं कहता कि आप नास्तिक होजाइए। आप दर्शन भी कीजिए और काम भी कीजिए; किंतु नास्तिकों की भाँति प्रत्येक व्यक्ति कर्म नहीं करसकता। कोरे ज्ञान योग से उन्नति नहीं करसकता, सहारे की आवश्यकता है। कोरे सगुण ईश्वर (Personal God) का मानना इस सहारे की आवश्यकता के कारण से है। अतः उन लोगों को जो बिना सहारे के नहीं चल सकते, यह चाहिए कि नित्यप्रति बिना नागा के आध्यात्मिक भोजन खायँ। इससे उनको बड़ी सहायता मिलेगी। वह आध्यात्मिक भोजन क्या है? ध्यान, भजन, उपासना। क्रामवील (Cromwell) और महाराजा रंजीतसिंह इत्यादि के विषय में लिखा है कि जब ये कोई युद्ध आरंभ करते थे, तो अपने तन मन और धन को परमात्मा को अर्पण करके प्रार्थना के साथ काम का आरंभ करते थे और कृतकार्य होते थे। ऐसे ही लोगों के लिये कहा है कि—

दौलतो गुलामे-मन शुदो इक़बाल चाकरम। अर्थः—दौलत मेरी गुलाम है और इक़बाल है चाकर।

अथवा—बाँधे हुए हाथों को ब उम्मेदे-इजाज़त; हैं रहते खड़े सैकड़ों मज़मूँ मेरे आगे।

किन्तु प्रार्थना में दो अंश हैं—एक माँगना; दूसरा अर्पण करना। माँगने का अंश स्वार्थपरता है; अर्पण करना ही प्रार्थना का सच्चा अंश है, और यही ईश्वर-संग ईश्वर-संभाषण (Communion with God) है। इसका मतलब यह है कि जो कर्म किया जाता है, वह ईश्वर के लिये किया जाता है। समर्पण का अर्थ हृदय में प्रकाश का रखना है, और यही सच्ची प्रार्थना है। जो व्यक्ति अपने हृदय को ऋणात्मक (negative) दशा में रखता है अर्थात् जो सदैव इच्छाओं का दास बना रहता है, उसके कामों में बड़ा हरज होता है, और ऐसे लोग कभी सफल नहीं होते। सफल वही होते हैं जो सदैव नत-मस्तक और हँसमुख रहते हैं। शोकातुर लोगों की उन्नति नहीं हो सकती है। जैसी तुम्हारे भीतर की दशा होगी, वैसी ही तुम्हारी सफलतायें भी होंगी। वही प्रसिद्ध उक्ति (मिसल) है, 'घर से जाओ खा के, बाहर मिले पका के, घर से जाओ भूखे, बाहर मिलें धक्के।'

यदि आप परमेश्वर की भक्ति धन या सन्तान की कामना से करते हैं, तो वह परमेश्वर की भक्ति नहीं है, वरन् वह तो अपनी स्वार्थपरता की भक्ति है। आप वास्तव में परमेश्वर की भक्ति नहीं करते, वरन् उनको अपना खानसामाँ बनाते हैं कि वह हर समय आपकी सेवा को उपस्थित रहे, और जब जिस वस्तु की आपको आवश्यकता हो, उसको वह तत्काल आपके सम्मुख लाता रहे।

अहा! यह तो उलटी गंगा बहाना है। प्यारे! पर- मेश्वर को अपनी विषय-कामनाओं के लिये मत नचाओ। तुमको चाहिए कि प्रत्येक काम को हिम्मत और शांति के साथ करो। यही सफलता का साधन है। अगर तुम्हारे पास कोई व्यक्ति भीख माँगने आए, तो तुम उससे आँख चुराते हो, इसी तरह जब तुम परमेश्वर के पास भिखारी बनकर जाओगे, तो वह भी तुमसे आँख चुराएगा। परमेश्वर से हृदय की शुद्धता और भक्ति के साथ मिलो। यदि तुम्हारे यहाँ कोई बड़ा आदमी आवे, तो तुम उसको बड़े आदर से बिठा लेते हो, किंतु एक थका और दीन मनुष्य तुम्हारे पास आकर बैठना चाहे, तो तुम उससे घृणा करते हो। याद रक्खो, कि यह आत्मा कमज़ोर से नहीं मिलना चाहता है। दुर्बल की परमेश्वर के घर में दाल नहीं गलती है। यथा—

हर दीदा जलवागाहे-आँ माह पारा नेस्त।

अर्थ—प्रत्येक चक्षु से उस (प्रिय स्वरूप परमात्मा) का प्रकाश समान रूप से ज्ञात नहीं होता है।

तुम इसकी चिंता न करो, कि तुम्हारी आवश्यकतायें कहाँ से पूरी होंगी। राम तुमको प्रकृति का वह नियम बतलाता है जिससे प्रत्येक वस्तु की आवश्यकता का पदार्थ उसके पास अपने आप पहुँच जाता है। (Law of affinity) जिसको रसायन प्रीति-नियम कहते हैं, यह प्रकृति का नियम है जिसके अनुसार जलते हुए दीपक को आक्सीजन वायु मंडल से प्राप्त हो जाता है। अतः यदि आप अपने शरीर को प्रत्येक के लिये जला रहे हो, तो आपके पास आपका भोजन अपने आप खींचकर आ

जायगा। आपके पास वह वस्तुयें जिनकी आवश्यकता है, अपने आप आयेंगी। देखो, प्रकृति का विचित्र खेल क्या प्रबन्ध कर रक्खा है। जब दीपक जैसी निर्जीव वस्तु के लिये प्रकृति ने उसके भोजन का प्रबन्ध कर दिया है, तो क्या मनुष्य ही वंचित रहेगा?—नहीं, कदापि नहीं। किंतु शर्त यह है कि अपने में भी पिघलाहट चाहिए।

असर है जज़्बे-उल्फ़त में तो खिंचकर आ ही जायेंगे; हमें परवा नहीं इसकी वह हम से तन के बैठे हैं।

आप नाना वस्तुओं को देखते हैं कि उनके रंग हैं, किंतु यह रंग वस्तु के निज के रंग नहीं हैं। पत्ते का रंग हरा दिखाई देता है, किंतु यह हरा रंग पत्ते का नहीं है। रंग सब सूर्य के हैं; वस्तुओं के नहीं हैं। यदि रंग वस्तुतः चीज़ों के होते और सूर्य के न होते, तो उनको अँधेरे में देखने से भी वे दिखाई देते। यदि तुम एक पत्ते को अँधेरे में देखो, तो तुम उसकी अन्य सब अंगो को अनुभव करोगे, किंतु रंग का अनुभव नहीं करोगे। कारण यह है कि यह रंग तो रंग वाले का है, हरे पत्तों में एक मसाला है—क्लोरो- फ़िल (Chlorophyll), इसमें यह गुण है कि वह सूर्य की किरण के और सब रंग खा लेता है, किंतु हरे रंग को लौटा देता है। अर्थात् यह कि जो रंग इस पत्ते में बिलकुल नहीं है, वही हम कहते हैं कि पत्ते का रंग है। काली वस्तुएँ वे हैं जो उन सब सातों रंगों को खाती हैं। सफ़ेद वस्तुएँ वे हैं जो उन सातों मेंसे एक को भी नहीं खाती हैं, सबको लौटा देती हैं। यह प्रकृति का नियम प्रत्यक्ष जगत् में मालूम होता है, किंतु नियम प्रत्येक स्थान पर एकही है। वही नियम वाह्य जगत् में है और वही आभ्यन्तर जगत्

में भी है। आभ्यन्तर जगत् में इस नियम को देखो। जिस प्रकार सूर्य में ये सात रंग हैं भी और नहीं भी हैं, उसी प्रकार परमेश्वर में भी सब गुण हैं भी और नहीं भी। इसी का नाम माया है। जिस बात की हम पूर्ण रूप से व्याख्या न कर सकें, उसी का नाम माया है। संसार के लोगों को जो गुण दिये जाते हैं, वह वस्तुतः उनके नहीं हैं। वह परमात्मा के हैं। किंतु मनुष्य के गुण वह इस कारण कहलाते हैं कि वह इनके साथ काम करता है, अर्थात् उनको वास्तविक स्रोत की ओर लौटाता है। धन वाला धनको व्यय करने के कारण धनी बनाहै, बुद्धिमान् बुद्धिको व्यय करने से बुद्धिमान् बना है। दाहना हाथ बाएँ से अधिक बलवान् क्यों है? क्योंकि वह शक्ति का प्रयोग करता रहता है, अर्थात् क्लोरोफ़ाइल (chlorophyil) के समान ये सब सदैव काम किया करते हैं। प्रकृति का एक नियम यह है कि जितना व्यय करोगे उतना पाओगे। काले मनुष्य वह मनुष्य हैं जो कहते हैं "यह भी मेरा है, वह भी मेरा है"। सफेद वह हैं जो प्रत्येक वस्तु को परमेश्वर के समर्पण करते चले जाते हैं, अर्थात् जो परोपकार करते हैं अथवा जो अपने प्रत्येक काम को परमेश्वर के लिये करते हैं। मतलब यह कि वे यह नहीं कहते कि अमुक काम में हम ने यों सफलता प्राप्त की, वरन् वे इस सबको परमेश्वर के कारणसे कहते हैं। शाह महमूद-ग़ज़नवी का एक सच्चा मित्र आयाज़ नामक था जो वास्तव में घसियारा था, किंतु बादशाह की मित्रता के कारण इसका यहाँतक उत्सर्ग हुआ कि वह मंत्री के पद पर नियुक्त किया गया। जब उसका उत्सर्ग हुआ तो कई ईर्ष्या-युक्त पुरुषों, डाहियों को बुरा मालूम हुआ। और ये इस चिंता में लगे कि इसको किसी प्रकार नीचा दिखायें; अतः उन्होंने

महमूद से शिकायत की कि आयाज़ प्रति दिन ख़ज़ाने में जाता है और वहाँ से नित्य रत्न निकाल लेजाता है। महमूद ने चाहा कि उसको अपनी आँख से देखें। एक दिन जब आयाज़ अपने नियत समय पर खजाने में गया, तो लोगोंने बादशाह को सूचना दी। महमूद उन लोगोंके साथ वहाँ गया और झरोखों के द्वारा देखने लगा। वहाँ क्या देखता है कि आयाज़ ने अपने मंत्री वेष के सब वस्त्र उतार कर एक ओर रखदिए और अपने खुरपे को अपने सामने रख लिया, और कंबल को बिछाकर उसपर नमाज़ पढ़रहा है और यह स्मरण कर रहा है कि हे भगवन्! यह मंत्रित्व मेरा नहीं है, यह तेरा है; यह मंत्रियों के वस्त्रादि मेरे नहीं हैं, तेरे हैं; यह शरीर में शक्ति तेरी है; यह आँख में ज्योति तेरी है; यह बाहुओं में बल तुम्हारा है-अर्थात् वह अपने समस्त रंगों को जो जहाँ से आए थे, वहाँ को वापिस लौटा रहा था और प्रेम से तार २ रोता था। जब आयाज़ इससे निवृत्त होकर जाने का संकल्प करने लगा, तो महमूद तत्काल वहाँ पहुँच गया और आयाज़ से कहने लगा कि तुम मेरे गुरु हो, तुमने मुझ को बचा लिया, नहीं तो मैं तो संसार के उन प्रलोभनों में डूब चुका था। अतः सफलता की पहली शर्त यह है कि हृदयों में प्रकाश भर जाय। प्रकाश अर्पण से भर जाता है। कर्म करने का तुम को अधिकार है, किन्तु कर्म करने के साथ जो स्वार्थपरता लगी हुई है, इसको छोड़ दो। जिन लोगों और जिन जातियों को सफलता हुई है, उनको इसी प्रकार व्यवहार करने से हुई है। यदि किसी इतिहास या जीवन-चरित्र में इसके विरुद्ध लिखा है कि कोई व्यक्ति या कोई जाति स्वार्थपरता के साथ काम करके कृतकार्य हुई है, तो उसके सम्बन्ध में राम

अत्यन्त ज़ोर के साथ कहता है कि वह ग़लत है और सरासर झूठ है। आर्थर हेल्प्स (Arther Helps) ने ऐसे ही अवसरों पर कहा है कि मुझको इतिहास मत दिखाओ, क्योंकि वह अवश्य मिथ्या होगा। जितना ही तुम संसार के पीछे पड़ोगे, उतना ही वह तुम से दूर रहेगा।

भागती फिरती थी दुनियाँ, जब तलब करते थे हम। अब कि जब नफ़रत हुई, वह बेकरार आने को है॥

निदान जब तक तुम अपने मन को हाय-हाय वाय-वाय में रखते हो, उस समय तक तुम्हारा प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता है। परमेश्वर आनन्द है। जो मनुष्य आनन्द में रहता है, वह परमेश्वर में रहता है, और परमेश्वर उसमें रहता है। परमेश्वर का ध्यान करने की विधि यह है कि जो वस्तु तुम्हारे पास मौजूद हो, उसपर सन्तोष करके उससे लाभान्वित हो। अतः इस समय जितना प्रकाश या ईश्वरीय ज्योति तुम्हारे पास मौजूद है, उसको बर्ताव में लाओ। उसके पश्चात् तुमको आगे मार्ग मिलेगा। इस रीति पर व्यवहार करने से धार्मिक लड़ाई-झगड़े तत्काल बन्द हो सकते हैं। आप प्रश्न करेंगे कि यह कैसे सम्भव है? इसका उत्तर स्पष्ट है। आप अपने धार्मिक नियमों को व्यवहार में लाइये, फिर देखिये कि धार्मिक लड़ाई-झगड़े बन्द होते हैं या नहीं। लड़ाई-झगड़े तो उस मार्ग के छोड़ देने से उत्पन्न होते हैं। आपके पास एक लालटैन है जो दो सौ क़दम तक तुमको तुम्हारा रास्ता दिखला सकती है। अब यदि आप इस प्रकाश के सहारे दो सौ पग तक चले जाओ, फिर वहाँ से वह और दो सौ क़दम तक आपको ले जा सकेगी। इसी तरह पर उस

लालटैन के सहारे से, जिसमें केवल दो सौ क़दम तक प्रकाश डालने की शक्ति है, आप कोसों तक पहुँच सकते हैं, किन्तु यदि आप पहले ही से अपनी कोसों की मंज़िल का ख़याल करने लगें, तो परिणाम क्या होगा। स्पष्ट है कि लड़ाई-झगड़ा उत्पन्न होगा। यही दशा तुम्हारे धार्मिक सिद्धान्तों की है। यदि तुम उन पर व्यवहार करने जाओगे, कभी लड़ाई-झगड़े की दशा न आवेगी। यदि तुम उनके प्रकाश को पृथक रखकर पहले तर्क-वितर्क करने लगोगे, तो झगड़ा होना आवश्यक है। धार्मिक युद्ध केवल वही लोग करते हैं जो अपने भीतर के प्रकाश को व्यवहार में नहीं लाते हैं—

सद जाँ फ़िदाए—आँकि ज़ुबानों-दिलश यकेस्त।

अर्थ—जिनका दिल और वाणी एक है, उनपर सैकड़ों जानें निछावर (क़ुरबान) हैं।

कदाचित् इसपर यह आपत्ति हो कि हम तो भूमि पर रहते हैं, हमसे भूमि की बातें कहना चाहिये, यह अलौकिक बातें हमारे किस काम की। प्यारे! इसका यही उत्तर है कि यहाँ धरती पर भी ऐसा ही आचरण करना चाहिये—अर्थात् हाथ रहे काम में और मन रहे राम में। जब कुमरी (घुग्घी) सरो की शाखा पर बैठती है, उसकी जिह्वा से मीठे-मीठे राग और स्वर अपने आप ही निकलने लगते हैं। इसी तरह जब आपका मन उस ईश्वरीय प्रकाश से भर जाता है, तो आपके मन से भी वे प्यारे-प्यारे राग आप ही निकलने आरम्भ हो जाते हैं। यह लैम्प जो रक्खा हुआ है, इससे प्रकाश क्यों निकलता है। कारण यह है कि इसकी चिमनी, जो इसका बाह्य

शरीर है, स्वच्छ और निर्मल है। इस कारण इसके भीतर का प्रकाश बिना रोक बाहर चला आता है। अब स्वच्छ होने से क्या प्रयोजन है। उसका प्रयोजन यह है कि उसने अपने मन की कालिमा और द्वेष-भाव को निकाल दिया है। इसी प्रकार यदि तुम भी अपने मन की कालिमा और अहंकार के भाव को निकाल दो, तो तुम्हारे भीतर का प्रकाश भी अपने आप बाहर निकल आयगा। यथा—

कब लिबासे-दुनयवी में छिपते हैं रौशन ज़मीर। जामए-ख़ानूस में भी शोला उर्यां ही रहा॥ कब सुबुकदोश रहे कैदे-रिज़्ज़ाने-वतन। बूए-गुल फाँदती है बाग़ का दीबारों को॥

कदाचित् यह कहा जाय कि हम अपने धार्मिक सिद्धांतों की पाबन्दी करते हैं और धार्मिक सिद्दान्त चाहते हैं कि झगड़ा किया जाय। इसका उत्तर यह है कि धार्मिक सिद्धान्तों का उद्देश कदापि लड़ाई-झगड़ा करना नहीं हो सकता। प्रत्येक धर्म का पहला सिद्धांत यह है कि ईश्वर को जानो और मानो। क्या इसपर आप आचरण करते हैं?—कदापि नहीं। यदि आप इसपर चलते होते, तो क्या आप परमेश्वर की इतनी भी परवा और इज़्ज़त न करते कि जितनी आप अपने ज़िले के कलेक्टर की करते हैं। यदि इस समय इस जमायत (समारोह) में कलेक्टर साहब आ जायँ, तो सब की साँस बन्द होजायगी। प्रत्येक समय इस बात का ध्यान करेंगे कि कोई बुरा वाक्य मुख से न निकल जाय, अथवा कोई निर्लज्ज चेष्टा न हो जाय। आप कभी कलेक्टर साहब के सामने चोरी न करेंगे, कभी उनके सामने किसी स्त्री को कुदृष्टि से न देखेंगे, और न उनके सामने कोई ख़राब वार्ता करेंगे।

बवीं तफावत राह अज़ कुजास्त ता बकुजा!

अर्थः—देखिये, एक से दूसरे में अन्तर कितना है।

आपका धर्म सिखाता है कि परमेश्वर सर्वत्र विराजमान है। किन्तु शोक है और रोना आता है कि आप इस बात को जान कर भी हर प्रकार की पूर्वोक्त बातें करते हैं, और आपके मन में तनिक भी ईश्वर का भय नहीं आता है। यदि हम लोग परमेश्वर के अस्तित्व को मानते और जानते होते, तो उसकी उपस्थिति में स्त्रियों की ओर तकते हुए आँखें फूट न जातीं, झूठ बोलते समय जुबान न निकल पड़ती? ब्रह्मश्रोत्री को ब्रह्मनेष्ठी होना चाहिये। यदि आचरण न हुआ तो विद्या व्यर्थ है, वरन् हानिकारक है। मस्तिष्क की नसें जो ज्ञान को ग्रहण करती हैं, उनको ज्ञानेंद्रिय कहते हैं और जो नसें भीतर के ज्ञान को बाहर व्यवहार में लाती हैं, उनको कर्मेंद्रिय कहते हैं, और स्वास्थ्य की दशा स्थिर रखने के लिये समस्त इंद्रियों को काम में लाना चाहिये, अन्यथा परिणाम अच्छा न होगा। जो ब्रह्मश्रोत्री ब्रह्मनेष्ठी नहीं होते, उनकी यह दशा होती है कि वह विद्या को भीतर ठूँसते जाते हैं, किन्तु उसको बाहर नहीं निकालते हैं, अर्थात् एक प्रकार की इन्द्रियों से काम लेते हैं और दूसरे प्रकार की इन्द्रियों को बेकार रखते हैं। इनका आध्यात्मिक कण्ठ और बुद्धि का अजीर्ण हो जाता है। इसीके कारण से वह लड़ाई-झगड़े में पड़ते रहते हैं। अतः शर्त यह हुई कि संसार में सफलता होने के वास्ते हमको चाहिये कि जितनी बुद्धि हमारे पास है उसको केवल अक़ली (तर्क वाली) ही न रक्खें, वरन् उसको व्यावहारिक भी बनावें। शर्त दूसरी सफलता की यह है कि ब्रह्मचर्य पालन करना चाहिये, चाहे आप नूतन रौशनी

(विचार) के हों, या पुरातन रौशनी के; चाहे आपकी पुस्तकों ने उस पर ज़ोर दिया हो अथवा न दिया हो, कुछ परवाह नहीं है। राम आप से यह कहता है कि सफलता के लिये पवित्रता और ब्रह्मचर्य की अत्यन्त आवश्यकता है। यदि भारतवासी बचे रहना चाहते हैं तो वीर्य को सुरक्षित रक्खें, अन्यथा कुचले जायेंगे। यह दीपक आपके सामने जल रहा है, यह क्यों जलता है?—इसके बीच के भाग में तेल भरा हुआ है। वह तेल बत्ती के द्वारा ऊपर चढ़ता है, और ऊपर आकर प्रकाश रूप में परिवर्तित हो जाता है। यदि इसके तेल वाले भाग में कोई छिद्र हो जाय, तो उसका तेल धीरे-धीरे बह जायगा, और फिर इससे प्रकाश न निकल सकेगा। यही दशा तुम्हारी है। यदि तुम्हारे भीतर का वीर्य नीचे न गिरेगा, तो यह ऊपर चढ़कर मस्तिष्क में जाकर आत्मिक ज्योति बन जायगा। किन्तु यदि तुम इसके विरुद्ध करोगे, अर्थात् अपने वीर्य को गिराओगे, तो तुम्हारी वही दीपक की सी दशा होगी। जिन लोगों के शरीर से कोई अपवित्र कर्म नहीं होता, या जिनके मन में कोई अपवित्र विचार उत्पन्न नहीं होता, उनका वीर्य ऊपर चढ़कर बुद्धि में परिवर्तन हो जाता है। ऐसी ही अवस्था को इंग्लैंड के प्रसिद्ध कवि ने यों वर्णन किया है—

My strength is as the strength of ten Because my heart is pure.

(Tennyson)

मेरी शक्ति है दसगुणी, किस लिये? कि मेरा हृदय शुद्ध है, इस लिये॥

दस ज्वानों की मुझ में है ताक़त। क्योंकि मुझ में है इफ़्फ़तो-इस्मत॥

हनुमान सबसे बड़ा वीर किस लिये था?—क्योंकि वह यती था। कहते हैं कि मेघनाद बड़ा योद्धा था। उसको वही व्यक्ति मार सकता था जिनके हृदय में 12 वर्ष तक कोई अपवित्र विचार न आया हो। यह कौन व्यक्ति था?—यह श्री लक्ष्मणजी थे। भीष्म का नाम भीष्म इसी कारण से पड़ा कि वह जितेंद्रिय थे। सरआइज़क-न्यूटन जैसा प्रसिद्ध तत्वान्वेषक, जिसके ऊपर आज इंग्लैंड को इतना अभिमान है, सत्तासी वर्ष तक जीवित रहा। मरते समय तक उसके होश हवास बहुतही ठीक थे, क्योंकि वह जितेंद्रिय था, और अत्यंत पवित्र था। जिस तत्ववेत्ता ने संसार के तत्वज्ञान को पल्टा दिया, वह कौन था—वह कैंट (Kant) था। यह बड़ा भारी यती था। इसके मन में कभी अपवित्र विचार तक नहीं आया। अमेरिका के हेनरी डेविड थोरो (Henry David Thoreau) और जर्मनी के प्रसिद्ध तत्ववेता हर्बर्ट स्पेंसर (Herbert Spencer) दोनों बड़े जितेंद्रिय थे। इस समय अमेरिका, इंग्लैंड, जापान आदि ये देश उन्नति कर रहे हैं, इसका क्या कारण है? कारण यह है कि इनके यहाँ के गृहस्थी भी आपके यहाँ के जितेंद्रियों से अच्छे हैं। प्रथम तो उनके विवाह बीस वर्ष के पश्चात् होते हैं, फिर उनकी स्त्रियाँ कैसी शिक्षिता होती हैं कि जब पुरुष और स्त्री मिलते हैं तो उत्तमोत्तम विषयों पर वार्तालाप करते हैं, एक दूसरे के सत्संग से लाभ उठाते हैं, कभी अपवित्र विचारों का अवसर नहीं आने पाता। इसके विरुद्ध आप के यहाँ की स्त्रियाँ शिक्षित नहीं होतीं। आप के यहाँ पुरुष और स्त्री की भेंट का अर्थ ही

अपवित्र विचार हैं। और ठीक भी है। जब वह कुछ जानती ही नहीं, तो आप उनसे क्या बातें करेंगे, सिवाय उन अपवित्र बातों के! अपने नित्यप्रति के जीवन में देखो कि पवित्रता का आप के कामों और संकल्पों पर क्या प्रभाव होता है। यदि आप पवित्र हैं, अर्थात् यदि आप अपने वीर्य (Sex energy) को सुरक्षित रक्खे हुए हैं, तो आप बहुत शीघ्र कृतकार्य होंगे। राम जब प्रोफ़ेसर था, उसका निजी अनुभव क्या था? और जिस समय राम सफल या असफल विद्यार्थियों की सूची बनाता था और उनसे पूछा करता था कि परीक्षा से कुछ दिन पहले उनकी क्या अवस्था थी? तो राम ने इससे भी परिणाम निकाला था कि जो विद्यार्थी परीक्षासे पहले उत्तम और पवित्र विचार रखते थे, वह कृतकार्य होते थे, और जो अपवित्र विचार रखते थे और सदैव भयभीत रहते थे, कि कहीं असफल न हों, वह अनुत्तीर्ण ही रहते थे। अतः सिद्ध है कि जैसे जिसके विचार हृदय के भीतर होते हैं, वैसाही उसका परिमाण प्रकट होता है। इस बात का प्रमाण इतिहास से भली भाँति मिल सकता है। पृथ्वीराज प्रसिद्ध योद्धा जो कई एक युद्धों में मुसलमानों को पराजित कर चुका था, अंत में भोग विलास में डूब गया और आप को आश्चर्य होगा कि अंतिम बार जब वह युद्धक्षेत्र को गया, तो उसकी कमर उसकी रानी ने कसी थी। परिणाम क्या हुआ?—युद्धक्षेत्र से मुँह काला करके असफल लौट आया। नैपोलियन जिसके साहस और वीरता की धाक सारे संसार में जम गई थी, जब वाटरलू के समरांगण को जाने लगा, तो उसके पहले शाम को वह अपने आपको एक अपवित्र चाह में गिरा चुका था। परिणाम स्पष्ट है कि

बड़ी विकट हार हुई। अभिमन्यु कुरुक्षेत्र के युद्ध का प्रसिद्ध योद्धा जिस दिन मारा गया, उससे पहले सायंकाल को वह अपनी नवीन प्रियपत्नी के पास गया था, और वहाँ वीर्य गिरा कर आया था। स्मरण रक्खो, अपवित्र वस्तु में कुछ आनंद नहीं है। जिस प्रकार गुलाब का फूल कैसा सुगंधित होता है, किंतु उसमें शहद की मक्खी भी रहती है। जब आप ने उसको नाक में लगाया, उसने नाक की नोक पर डसा। इस प्रकार संसार की कान्ति और कटाक्ष तथा सांसारिक वस्तुएँ बड़ी चित्ताकर्षक होती हैं और बहुत ही भली जान पड़ती हैं, और वह आपके मनों को लुभाती हैं। किंतु चखकर देख लो कि इनमें एक आध्यात्मिक विष है जो आपको उन्नति करने से वंचित रक्खेगा। ये अनुचित अनुराग, ये अनुचित कामप्रियता, ये अनुचित सतीत्व का भंग करना, ये सब उस गुलाब के फूल के तद्वत् हैं, जिनमें शहद की मक्खी है और जो आपके नाक की नोक पर काट लेती है। अतः नियम यह है कि यदि तुमको ये सांसारिक बातें नहीं हिला सकतीं, तो तुम संसार को अवश्य हिला सकते हो।

तीसरी शर्त सफलता की एक आध्यात्मिक शर्त है। एक बादशाह की कथा है कि उसने एक कमरे में एक सींग लटका रक्खा था और उस सींग की खोल में पानी भरा था। बादशाह ने यह विज्ञापन दे रक्खा था कि जो कोई इस सींग का सब पानी पी ले और सींग खाली कर दे, तो उसको वह अपना समस्त राज्य दे देगा। बहुत से लोग आये और उन्होंने पानी पिया, किन्तु कोई भी उसको खाली न कर सका। वह सींग देखने में तो ज़रा सा जान पड़ता था किन्तु उसका सम्बन्ध समुद्र से था और

यही कारण था कि वह ख़ाली नहीं होता था। इस तरह पर यद्यपि आपके शरीर ज़रा ज़रा से हैं, किन्तु उनका गुप्त सम्बन्ध उन समुद्रों के समुद्र ईश्वर स्वरूप के साथ है। जो व्यक्ति इस सम्बन्ध को जगाए रखना है, और इसको स्थिर रखता है, उसकी शक्ति अनन्त है। आप सिवाय उसके और कुछ नहीं हो। जब यह मामला है, तो परमेश्वर तो सत्यकाम और सत्य संकल्प है, अतः आपके अन्तःहृदय की तह में जो ख़याल है, वह सत्य होना चाहिए, और उस ख़याल की सदैव विजय है। यथा:—

दौलत गुलामे-मन शुदो-इक़बाल चाकरम्

अर्थ—दौलत मेरी गुलाम और इक़बाल (विभूति) मेरी सेवका हो गई है।

अब राम कुछ उदाहरण इतिहास से देगा जिस से सिद्ध होगा कि यह सिद्धान्त बिलकुल ठीक है। सिंहविक्रम महाराजा रणजीतसिंह अपनी सेना लिए हुए अटक नदी के निकट पड़ा हुआ था। उस पार शत्रु की सेना थी। रात का समय था। अन्धकार छाया हुआ था, न वहाँ पर कोई नाव थी जिसके द्वारा पार उतरा जाय, और न वहाँ कोई दूसरा साधन मालूम होता था। अब बड़ी कठिनता थी कि क्या किया जाय। सिपाहियों ने रणजीतसिंह से जाकर अपनी कठनाइयें वर्णन कीं। वह तो जैसा श्रीकृष्ण जी ने कहा है।

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥

अर्थः—"हे अर्जुन, तू सुख और दुख तथा हानि और लाभ को सम करके एवं हार जीत का विचार न करके

युद्ध के लिये खड़ा हो। यदि तू युद्ध नहीं करेगा तो तू महापाप का भागी होगा।" इस विचार में मग्न था। उसको न विजय की प्रसन्नता थी और न पराजय का शोक था। वह तो इस ख़याल में मस्त होकर अपना धर्म पालन करता था। उसने अपने सिपाहियों से कहाः—

जाके मन में अटक है, वाको अटक यहाँ। जाके मन में अटक ना, वाको अटक कहाँ॥

यह सुनतेही सेना फाँद पड़ी और उस पार पहुंच गई। उसको देखकर शत्रु का साहस टूट गया कि जब ऐसे विशाल अगम नद से यह लोग बिना किसी नौका आदि के आन की आन में पार उतर आए हैं, तो इनका सामना करना असंभव है, भाग खड़े हुए, और क्षेत्र रणजीतसिंह के हाथ में रहा।

इसी तरह एक बेर हज़रत मोहम्मद साहब एक मुहिम (युद्ध) पर जाने के लिये बड़ी तैयारी कर रहे थे। किसी ने कहा कि आप इतनी तैयारी तो कर रहे हैं किंतु यदि आपकी हार हुई तो कितनी लज्जा होगी और इसके साथ ही आप का साहस भी टूट जायगा। इसपर वह खिलखिलाकर हँस पड़े और कहने लगे—"परिश्रम करना मेरा काम है, न कि सफलता चाहना। मैं तो अल्लाह के हुक्म से काम कर रहा हूँ, अपना फ़र्ज़ अदा कर रहा हूँ, इससे अधिक मुझको कुछ संबंध नहीं है" फ्रांस और जर्मनी की लड़ाई में महाराज फ्रेडरिक की बिलकुल हार हो गई थी। शत्रु के सिपाही उसके दुर्ग में घुस गये थे और रंगरलियाँ मचा रहे थे; किंतु फ्रेडरिक को अपने पक्ष में भगवान होने का निश्चय था। अतः उसने साहस को हाथ से न दिया।

उसने अपने लोगों को जमा किया और उन में से कुछ को एक ओर भेज दिया, कि तुम टीले पर जाकर खड़े हो, कुछ को दूसरी ओर भेज दिया, इसी प्रकार चारों ओर भेज दिया। इसके बाद स्वयं साहस पकड़े हुए बेधड़क दुर्ग के भीतर घुस गया और सिपाहियों से बोला कि तुम लोग हथियार रखदो। उन्होंने प्रश्न किया कि क्यों? उसने कहा, तुम नहीं देखते हो कि मेरी सेना सब ओर से आ रही है और तुम घेरे गए हो। यह देखकर वह लोग भयभीत होगये। और सब हथियार उसके सामने रख दिए। यदि तुम्हारा हृदय ईमान से भरा है, तो एक शत्रु क्या, सारा संसार तुम्हारे सम्मुख हथियार डाल देगा। यही हृदय का उत्साह है जिसने विकट हार को पूर्ण विजयमें परिवर्त्तित कर दिया।

सारी ख़ुदाई इक तरफ़, फ़ैज़े-इलाही इक तरफ़। न मँहगे पर न सस्ते पर, नहीं मौक़ूफ़ गल्ले पर॥ फ़तेह तो बस उसी की है, ख़ुदा है जिसके पल्ले पर।

हाथी और सिंह के देह में कितना अंतर है। किंतु देखो, सिंह के उत्साह और साहस के कारण हाथी को अपने शरीर के भारी होने पर भी सामना करना कठिन हो जाता है। हाथी को अपनी शक्ति पर बिलकुल भरोसा नहीं होता। वह सदैव झुंडों में रहता है, क्योंकि उसको संदेह रहता है कि अकेला पाकर कोई उसको खा न जाय। सिंह यद्यपि तनमें उससे छोटा है, किंतु साहस उसमें भरा हुआ है। यही कारण है कि हाथी उसके सामने खड़ा नहीं हो सकता। सिंह अपने भीतर वाले ईश्वर अर्थात् आत्मा को मार नहीं रहा है, वरन् उसको व्यावहारिक रूप से स्पष्ट करता है।

चीन में एक लड़का था। उसके मां बाप अत्यंत दरिद्र थे। वह यहाँ तक दरिद्र था कि पढ़ने के लिये उसे तेल तक नहीं मिलता था, किंतु उसको पढ़ने का शौक़ था। वह बहुत से जुगुनुओं को एकत्र करके एक कपड़े में बाँधना था और जब वह चमकते थे, उनके प्रकाश से पढ़ लेता था। लोगों ने उससे कहा कि तुम यह क्या भद्दी चेष्टा करते हो, ऐसा परिश्रम किसलिये करते हो, क्या बादशाह के वज़ीर तुम्हीं होगे? अहाहा! उसने क्या उत्तर दिया, जिसको सुनकर सबका चित्त प्रसन्न होगया। कहता है, मेरे हृदय में ऐसी उमंगें उठती हैं. जिससे आशा बंधती है कि मैं वज़ीर बनूँगा। अंत में वह लड़का चीन का वज़ीर हो ही गया।

प्रायः लोग कहते हैं कि हम अमुक काम क्योंकर करें? अरे भाई; आत्महत्या या ईश्वर हत्या क्यों कर रहा है। तू शारीर नहीं है, तू स्वयं ही अनंत है, फिर किस प्रकार क्या पूछता है। तुम को क्या ज्ञात नहीं कि जलस्थित विद्या (Hydro Statics) का एक सिद्धांत है जिससे समस्त सागर के पानी को एक ज़रा सा पानी रोक सकता है। इस प्रकार एक मनुष्य सारे संसार को रोक सकता है, यदि वह अपने भीतर की ईश्वरत्व पर खड़ा हो जाय। कारणों का कारण तो तू ही है, फिर सामान या साधन क्या ढूँढता है।

स्काटलैंड का एक बच्चा वहाँ के अनाथालय से भाग-कर लंडन चला आया। लंडन में संयोग से वह लार्ड मेयर के बाग में पहुँच गया और वहाँ खेलने लगा। संयोग से उधर से एक बिल्ली निकली। बच्चे ने उसकी दुम पकड़ ली

और उससे बातें करने लगा। इतने में निकट से घंटे की ध्वनि सुनाई दी जो लगातार बज रहा था। बस अब वह बिल्ली से बात करने लगा और कहने लगाः—

What does the mad bell say? Ton! Ton!! Ton!!! Whittington, Whittington Lord Mayor of London!

अर्थः—यह पगली घंटिया क्या कहती है? टन! टन!! टन!!! ह्विट्टिंग्टन, ह्विट्टिंग्टन, लार्ड मेयर आफ लंडन।

वह अपनी इसी बातचीत में था कि संयोग से लार्ड मेयर उधर से आ निकला। उसने सुना कि कोई व्यक्ति बात कर रहा है। वहाँ आकर यह हाल देखा। उसने लड़के से पूछा कि क्या कह रहा है? उसने उत्तर दिया, लार्ड मेयर आफ लंडन। लार्ड मेयर बहुत प्रसन्न हुए। उसको अपने यहाँ ले गये, और उसको शिक्षा के लिये स्कूल में भेजा। वहाँ उसने अत्यन्त परिश्रम के साथ पढ़ा, और खूब विद्या प्राप्त की। धीरे-धीरे वह एक दिन लार्ड मेयर आफ लंडन हो ही गया।

एक कवि था। अपनी विद्या में प्रवीण था। उसने बहुत से पद्य कहे और बादशाह के सम्मुख ले गया। बादशाह उनको सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ, और खूब पारितोषिक दिया। बेगमों ने भी उसकी वाणी को पसंद किया, और जब बादशाह महल में आया, उससे इच्छा प्रकट की कि कवि कहीं महल के निकट ही रखा जाय। दूसरे दिन बादशाह ने कवि से पूछा कि कहाँ रहते हो? वह मतलब समझ गया और बादशाह से बोला—"मैं तो

अंधा हूँ।" यह सुनकर बादशाहने कहा—"जब यह अंधा है, तो कोई हरज नहीं है, इसको महल के निकट एक कमरे में ठहरा दिया जाय।" निदान, ऐसा ही किया गया। अब वह वहाँ रहने लगा और नौकरों-चाकरों को दिक्क करने लगा। एक दिन लौंडी से कहा कि लोटा उठा दो, हमको आवश्यकता है। उसने कहा, यहाँ लोटा कहाँ है? कहने लगा—उठा दो। उसने फिर वही उत्तर दिया। निदान, बहुत कहा सुनी के बाद बोल उठा, अरी! वह क्या पड़ा है, क्यों नहीं उठा देती? बस लौंडी दौड़ी हुई महलों में गई और बेगमातसे कहा — "यह मुआ तो देखता है, अंधा नहीं है। यह मुआ हम सब को बराबर घूरता है।" तत्काल बादशाह को खबर की गई। परिणाम यह हुआ कि दरबार से निकाला गया और अंधा भी हो गया।

आप कहते हैं, सामान नहीं है, कैसे काम करें? यह सब संकल्प का खेल है। जब तुम्हारे भीतर निश्चय की शक्ति आ जायगी, तो सब सामान अपने आप तुम्हारे सामने आ जायँगे। देवता (प्रकृति की शक्तियाँ) तुम्हारे लिये अपना स्वभाव बदल देंगे। ऊपर जो उदाहरण वर्णन किये गये हैं, उनसे स्पष्ट सिद्ध है कि अच्छे ख़याल वाले अच्छे होंगे, किंतु बुरे मनोरथ माँगने वाले बुरे होंगे। जैसा ख़याल करोगे, वैसे ही हो जाओगे।

गर दरे-दिल तो गुल गुज़रद गुल बाशो। बर बुलबुले बेक़रार बुलबुल बाशी॥ सौदाये-बला रंजो-बला मी आरद। अंदेशा-ए-कुल पेशा कुनी कुल बाशी॥

अर्थः—यदि तेरे चित्त में पुष्प (प्यारे) का ख़याल होगा तो तू पुष्प (प्यारा) हो जायगा, और यदि चंचल बुल

बुल का, तो व्याकुल बुलबुल हो जायगा। (स्मरण) रहे, कि दुःखों का ख्याल करने वाला दुःख और कष्ट अपने ऊपर ले आता है, और सब का शुभ चिन्तक स्वयं सब हो जाता है।

प्रत्येक प्रार्थना सुनी जाती है। जो प्रार्थना दिल से निकलनी है वही स्वीकृत होनी है। इसका यह तात्पर्य है कि जैसा आपका संकल्प होगा, उसको आपके भीतर का सच्चा बल पूरा कर देगा। आप में वह शक्ति विद्यमान है जिससे आप देवताओं की बराबरी कर सकते हैं। देवता के अर्थ प्रकृति की शक्तियों के हैं। यदि आप वेद के अनुसार चलें, तो आप देवताओं तक पहुँच सकते हैं। आप अपने विश्वास और निश्चय के बल से प्रकृति की शक्तियों को खींचकर ला सकते हैं, और उनसे बराबरी कर सकते हैं। किंतु आपने उन साधनों को भुला दिया है। जब तक उन साधनों को आचरण में लाते थे, तब तक उस प्रकार के विचार हृदय में खचित थे, उस समय वैसे ही परिणाम निकलते थे। किंतु जब से उन उपायों को छोड़ा, और ख़राब विचारों ने दिल में जगह पकड़ा, रंगत भी बदल गई। जब हिन्दुओं में यह विचार उत्पन्न हुआः—

"हमको नौकर राखो जी, हमको नौकर राखो जी। मैं गुलाम, मैं गुलाम, मैं गुलाम तेरा।" तू दीवान, तू दीवान, तू दीवान मेरा॥

और हिंदुओं में एक गुण विशेष यह है कि वह सदैव सच्चे होते हैं। अतः उनकी वह स्वाभाविक सच्चाई उक्त विचार पर लगाई गई। और उनका क्योंकि यह हार्दिक विचार था, इसलिये उनकी यह मनोकामना पूरी हुई।

और वह इस तरह से विदेशियों के गुलाम (दास) होगये। स्पष्ट है कि जैसा ख़याल करोगे, वैसा पाओगे। हमें अपने ख़यालों को सुधारना चाहिए। बुद्ध भगवान् ने भी यही सिखाया है। अतः न अपने संबंध में और न किसी अन्य के संबंध में अपने हृदय में मलीन विचारों को आने दो। भीतर और बाहर ईश्वर ही ईश्वर को देखो। मोहम्मद साहब के हृदय में यह बात समागई थी, इस कारण उन्होंने सिखाया था कि (ला इलाह इल्लिल्लाह) नहीं है कुछ सिवाय परमेश्वर के"। हज़रत ईसा मसीह की नस नसमें भी यही विचार दौड़ रहा था। अतः उन्होंने भी यही कहा कि "मैं और मेरा बाप (ईश्वर) एकही है" (I and my father are one.)। अब उसको लोग समझें या न समझें; मगर असल बात यही है। जब हज़रत मोहम्मद साहब के दिलमें यक़ीन आ गया, तो उन्होंने कहा कि अगर सूर्य मेरे दाहिने और चाँद मेरे बाईं ओर आकर धमकाने लगे कि पीछे हट जाओ तब भी मैं पीछे न हटूँगा। एक आदमी जो जंगलों का रहने वाला था, उसके हृदय में इस विश्वास की आग भड़क उठी और उसने अरब के मरुस्थल में इसके काले रेत के दानों को भड़काया। वह ज़रें बारूद के छर्रे बन गए, और योरप वा अफ़्रीका के पश्चिमी सिरे से लेकर एशिया के पूर्वी सिरे तक एक शताब्दी के भीतर फैलगए। यह शक्ति है आत्मबल की, यह शक्ति है विश्वास की, यह शक्ति है निश्चय (यक़ीन) की। इस पर भी कहते हो कि सामान की आवश्यकता है? सामानों के सामान तुम स्वयं हो। इस विचार को ब्रह्मविद्या कहते हैं।

जिस प्रकार एक सुन्दर बालक चेचक के रोग से बिलकुल कुरूप होजाता है और उसकी जान पर बन आती

है, और उसको कुछ लाभ गाय के थन के लिंफ़ (lymph) का टीका लगाने से होता है; इसी तरह हिंदू जाति को अविद्या की चेचक निकली है, और वह कुरूप होनी जानी है. उसका अंत भी निकट जान पड़ता है, अतः उसको भी टीका लगाने की आवश्यकता है। इस टीके के लिये लिंफ़ कहाँ से आवेगा? वह भी गोधन से लिया जायगा। गौ के अर्थ उपनिषद के हैं। और वह लिंफ़ गौ रूपी उपनिषद से लिया जायगा। मतलब यह है कि ब्रह्मविद्या को उपनिषदों से सीखो, और उसपर आचरण करो, तो यह अविद्या की चेचक तत्काल अच्छी होजायगी।

लोग कहते हैं कि इतिहास पढ़ने से ज्ञात होता है कि जो जाति एक बेर उन्नति करके अवनति को प्राप्त हुई. फिर वह दुबारा उन्नति नहीं करती। यह ख़याल तुच्छ है। आपका इतिहास क्या? वही एक हज़ार वर्ष का इतिहास, और उसपर यह अभिमान। अरे भाई! वह तो एक युग का भी पूर्ण इतिहास नहीं है। प्राकृतिक विकास का इतिहास देखने से ज्ञात होता है कि कोई वस्तु नष्ट नहीं होती. किसी न किसी रूप में वह विद्यमान रहती है। कहते हैं किः—

"हर शाख़ रंग आमेज़ी दर फ़स्ले-गुलिस्तां अंदाख़्ता।"

अर्थः—प्रत्येक शाख (टहनी) पतझड़ी की ऋतु में फली फूली है। कैसा (आश्चर्य) है।

फिर देखो, प्रकृति तुम्हें बताती है कि तारे पूर्व से पश्चिम को जाते हैं और फिर वहाँ से पूर्व को लौट आते हैं। यही दौर या चक्र है। इसी प्रकार सौभाग्य का तारा पूर्व से पश्चिम को गया और, फिर वहाँ से पूर्व को लौटा आ रहा है। इतिहास इसकी साक्षी देता है। देखो, एक युग

था, जब भारतवर्ष का तारा अभ्युदय पर था, वहाँ से पश्चिम को चला, फारस में आया। उसके पश्चात् आस्ट्रिया आदि की बारी आई। वहाँ से यूनान पहुँचा। यूनान को छोड़ कर रूम गया। रूम के बाद स्पेन आदि की बारी आई। फिर इँगलैंड पर कृपादृष्टि हुई। वहाँ से अमेरिका गया। इस समय अमेरीका का पश्चिमी भाग कैलीफ़ोर्निया अत्यंत उन्नति पर है। वहाँ से जापान में आया। फिर अब कैसे कह सकते हैं कि भारतवर्ष वंचित रहेगा, इसकी बारी नहीं आयगी?

ओ3म्! ओ3म्!! ओ3म्!!!

आनन्द! आनन्द!! आनन्द!!!