श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

राम ढँढोरा

भाग 10 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 10 · अध्याय 4 / 5

राम ढँढोरा

यह पत्र स्वामीराम ने यंग मेन्स इंडियन ऐसोसिएशन (भारतीय नव युवक समाज) लाहौर के वार्षिकोत्सव पर पढ़ने के लिये लाला हरदयालजी एम. ए. के पास भेजा था।

एकता, एकता। प्रत्येक व्यक्ति एकता की आवश्यकता का अनुभव कर रहा है। लाखों शक्तियाँ एक दूसरे को शिथिल कर रही हैं। इस लिये कोई परिणामजन्य शक्ति प्रकट नहीं होती। करोड़ों मस्तिष्क और हाथ चल रहे हैं, किन्तु कौन जानता है, किस ओर जा रहे हैं। हज़ारों मन मतान्तर अपनी अपनी नौकाएँ अपने २ काल्पनिक मन्तव्यों की ओर खेने का प्रयत्न कर रहे हैं। किन्तु कोई खेना नियम पूर्वक नहीं हो रहा है। भारत की यह वर्तमान अवस्था है। पतवारों को जहाँ के तहाँ रहने दो, अपने अपने स्थानों पर डटे रहो, हटो मत, किन्तु एक दिशा में खेना आरम्भ कर दो। इस प्रकार के अविरोध (संयोग, Harmony) से, अर्थात् अनेकता में एकता से, उन्नति का दृढ़ निश्चय होता है। बस अपने अपने स्थानों पर डटे हुये काम करते रहो, और गाते बजाते आगे बढ़ते चलो। जातीय लाभ आप से यही चाहता है। और समस्त (जाति) के लाभ में प्रत्येक व्यक्ति का हित सम्मिलित है।

इस प्रकार वाक्यालंकार से प्रलाप करना तो बहुत सहज है; किन्तु फिर भी अभी तक भारतवर्ष में प्रेम और एकता के भावों का इतना अत्यन्त अभाव क्यों प्रत्यक्ष है?

इसके मुख्य कारण ये हैंः—

(क) व्यावहारिक ज्ञान की न्यूनता। (ख) जन संख्या की अधिकता।

आओ, इन पर हम अनुक्रम से विचार करें।

(क) व्यावहारिक ज्ञान की न्यूनता।

मुसलमानी राज से पहिले खुरासान देश निवासी अलबरूनी ने इस देश भर में यात्रा की थी। यह एक अनुभवी तत्ववेत्ता और बहुत बड़ा विद्वान हुआ है। उसने संस्कृत विद्या पढ़ी और हमारे शास्त्रों को वैसे ही उत्साह के साथ पढ़ा जैसे कि उसने (यूनानी तत्ववेत्ता) अरस्तू और अफ़लातून के तत्वज्ञान को पढ़ा था। वह तत्कालीन भारतवर्ष का विस्तृत वर्णन वैसा ही कर गया है जैसा उसने अपनी आँखों से देखा था। वह हिन्दुओं के दर्शन, काव्य और ज्योतिष शास्त्र का अत्यन्त सन्मान एवं आदर के साथ उल्लेख करता है। वह कई एक पण्डितों की विद्वत्ता की, जिन से उस की भेंट हुई थी, अत्यन्त प्रशंसा करता है। किन्तु जन साधारण की दशा और स्त्रियों की अवस्था को अत्यन्त शोचनीय बतलाता है। उनको वह शारीरिक, मानसिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक रूप से अनाथ, उपेक्षित और सब प्रकार से पददलित (पतित) बतलाता है। सामाजिक, धार्मिक, और राजनैतिक रूप से भी वे अलग थलग हैं। इन लोगों के अगणित जत्थों के जत्थे अपने विक्षिप्त चित्त और बिखड़े हुए दल होने तथा

अनियमता के कारण मुसलमान विजेताओं के सामने, जो महमूद ग़ज़नवी के सेनापतित्व में प्रतिवर्ष भारत को लूटने के उद्देश्य से आते हैं, धूलि के कणों के समान उड़ते चले जाते हैं।

इसके पश्चात् बाबर भारतवर्ष के निवासियों की इस तरह शिकायत करता है कि "ये लोग नवीन वस्तु के उत्पन्न करने की कुछ भी योग्यता व शक्ति नहीं रखते, और व्यावहारिक रूप में शिल्प वाणिज्य से बिलकुल अनजान हैं। न तो इनके यहाँ कहीं उत्तम इमारतें वा बागीचे हैं और न नहरें, यहाँ तक कि इनके यहाँ बारूद भी नहीं है।" और आगे चलकर वह इस प्रकार दोष लगाता है कि "ये लोग इस योग्य भी नहीं हैं कि एक दूसरे से तनिक स्वतंत्रता पूर्वक मिलें जुलें।"

इन कथनों में व्यक्तिगत योग्यता और अत्युक्तियों को, यदि कोई हों, छोड़ करके हमको अत्यन्त शोक के साथ कहना पड़ता है कि ये वर्णन सच्चे हैं। यह व्यावहारिक ज्ञान की न्यूनता ही है जिससे भारतवर्ष का पतन हुआ है।

जो कुछ इन विदेशी ऐतिहासिकों ने वर्णन किया है, उसको मौखिक बकवाद से खंडन करना राम के लिये वैसा ही सरल है जैसा कि किसी और के लिये; किन्तु ये प्यारे! ये वर्णन सीधे सादे और सच्ची घटनायें हैं जिनको ये लोग बिना न्यूनाधिक किये लेख रूप में ले आये हैं। और किस तरह मैं इस प्रत्यक्ष प्रमाण से इन्कार कर सकता हूँ। उक्त व्यावहारिक ज्ञान की न्यूनता के अन्तर्गत समाज के समस्त दोष हैं, जैसे दस्तकारी (manual labour) से घृणा, जात पाँत के हेतु नाना विभाग, विदेश यात्रा से घृणा, बाल विवाह, एवं स्त्रियों की शारीरिक और मान-

सिक समस्त दुर्बलतायें, इत्यादि। इन सामाजिक बुराइयों का दूर करना अत्यन्त कठिन है।

वर्क (Burke) ने क्या ही अच्छा कहा है—

"सुधार एक ऐसी वस्तु है जो प्रसन्नता के लिये दूर फासले पर ही रक्खी रहनी चाहिये"।

खुश चाहो अगर रखना अपने को तुम। रीफार्म से दूर ही रहो तुम॥

रस्म और रिवाज के बन्धनों को तोड़कर बाहर निकल आना एक बड़े मार्के का काम है। सुधार का काम कार्य-कर्त्ताओं के ऊपर समाज का लांछन और समाज पर कार्य-कर्त्ताओं का लांछन लाता है, और परस्पर छिद्रान्वेषण बुद्धि उत्पन्न करता है जिससे परस्पर द्वेष भावना, मिथ्या मति (गलत फ़हमी) और अनबन वा फूट उत्पन्न हो आते हैं। क्या इस फूट से बचने के लिये हम उन बातों को यौंही अटकल पच्चू चलने दें और "हमको अपने मतलब से काम" ऐसा समझ कर अपने पर झाड़ दें? "हमको अपने उद्धार से काम, समाज पड़े चूल्हे भाड़ में।" ओह, कहीं ऐसा सम्भव होता तो क्याही अच्छा था। डूबता समाज तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेगा। यदि वह डूबेगा तो तुमको उसके साथ डूबना होगा, और यदि उठेगा तो तुमको उसके साथ उठना होगा। मानो समाज कहता है:—

हम जो डूबेंगे तो फिर तुमको भी ले डूबेंगे। हम जो उठेंगे तब ही तुमको भी ले उठेंगे॥

ऐसा निश्चय करना कि "कोई व्यक्ति असंपन्न (Imperfect) समाज में संपन्न (Perfect) होसकता है" सरासर

मूर्खता वा नासमझी है। यह ठीक ऐसा ही है कि हाथ भुज से अलग कट कर शक्ति की पूर्णता को पहुँच जाय।

बहुत काल से भारतवर्ष में इस अवेदांती विचार को भारत वासियों ने छाती से लगा रक्खा है जिसका परिणाम यह हुआ कि समाज के अस्थि-पंजर ढीले पड़गये। ऐ उत्तम आशा दिलाने वाले नवयुवको! भारत का भविष्य तुम्हारा भविष्य है, अर्थात् तुम्हारी भलाई और तुम्हारे देश की भलाई का निर्भर तुम्हीं पर है। कायरों पर ही बहुमत का जादू चला करता है। जनता के विचार और हृदय पर तो सच्ची और जीती जागती आत्मा ही शासन करती है, चाहे बाहर से नाम मात्र का कोई और शासक क्यों न हो। बी. ए. या एम. ए. के दर्जे तो तुम विश्वविद्यालयों से प्राप्त कर लेते हो, किन्तु कायर और वीर होने के मध्य में स्वयं तुम्हीं को निर्णय करना होगा। बोलो, तुम कौन सी दशा चाहते हो—दास की या जीवन के सम्राट् की? तुम्हारा ही शक्तिमान और पवित्र जीवन इतिहास का तुलायंत्र (lever) है। न्यूटन का दूसरा गति-नियम यह सिद्धान्त है कि अन्य वस्तुओं पर जिसकी प्रेरणा से कुछ विकार (परिणाम) उत्पन्न होना है वह शक्ति है। शताब्दियों से अस्वाभाविक घृणा (द्वेष) और उससे भी बढ़कर उदासीनता का प्रभाव हमारे देश के रीति रिवाज और मूढ़ विश्वास के मार्ग पर बराबर पड़ता चला आ रहा है। ऐ शिक्षित और सदाचारी नवयुवको! यह अब तुम्हारा काम है कि जीती जागती शक्तियाँ बनकर इस व्यर्थ वेग को, जिसकी अब आवश्यकता नहीं रही, तुम बदल दो। पुराने आलस्य को पराजित करो। गति के वेग को उधर बदलो जिधर आवश्यकता है। और जहाँ कहीं कमी

हो उसको उद्वेग से पूरा करदो और साधारण लोगों की चित्त वृत्ति उसी ओर फेरो जिधर उचित हो। इस प्रकार अपना काम करते चलो, करते चलो और अपनी दृढ़ता से इस बात को दिखला दो कि सीली (Seeley) जैसे ऐतिहासकार जो भारतवर्ष को केवल "भविष्यहीन भूतकालिक" बतलाते हैं (अर्थात् जो यह कहते हैं कि भारतवर्ष को जो उन्नति करनी थी उसे वह भूतकाल में कर चुका है, अब भविष्य में कोई उन्नति न करेगा) उनको बतला दो कि ऐसा कहने वाले भारी भूल पर हैं। भूतकाल को ढाल कर वर्तमान काल के अनुसार बनाओ, और वीरता के साथ शुद्ध और प्रबल वर्तमानकाल को भविष्य की दौड़ में डालो। अपने पूर्वजों के रिक्थ माल (Inheritance) बिना हम कुछ नहीं कर सकते। जो समाज इस पैत्रिक धन को त्याग देते हैं वह बाहर से अवश्य नाश होजाती है। पर इस (रिक्थ माल) की अधिकता से भी हम कुछ न कर सकेंगे। वह समाज जिसमें इस बपौती का ख्याल सब पर प्रबल है भीतर से नष्ट होजावगी। क्या तुम्हारा यह विचार है कि तुम में सच्चा जीवन होने से समाज में झगड़ा व फूट उत्पन्न होजायगी? जमे हुये डटे रहो, चाहे अकेले ही क्यों न हो। फिरो मत, मुँह न मोड़ो, यही मरदानगी (शूरवीरता) है।

गर्चि कुतुब जगह से टलै तो टलजाये। गर्चि बहर भी जुगनू की दुम से जलजाये॥ हिमालय बाद की ठोकर से गो फिसल जाये। और आफ़ताब भी क़व्लै-अरूज़ ढल जाए॥ मगर न साहबे-हिम्मत का हौसिला टूटे। कभी न भूलै से अपनी जर्बीं पर चल आए॥

यदि तुम सत्य के मार्ग से नहीं हटते तो प्रवाह तुम्हारे साथ है, समय तुम्हारी ओर है, क्षेत्र तुम्हारे हाथ है। लोगों को पिछली महिमा पर उछलने दो, अगली महिमा सबकी सब तुम्हारी है।

राष्ट्रः—क्या वह मेल जो सच्चाई के लिये न हो राष्ट्र को बचा सकता है? क्या लोगों को अंधकार में रखकर तुम उनमें मेल उत्पन्न करसकते हो? क्या प्रमाद और अंध विश्वास की स्वीकृत दासता से राष्ट्र में ऐक्य लाया जासकता है? अच्छा मान लो, कि सबके सब मल्लाह एक ही ओर खेने लगें, पर वह रुख उलटा हो, अर्थात् वह रुख उन्नति व सच्चाई का मार्ग न हो, तो क्या वह आपको पसन्द होगा? ऐसी नाव तो बहुत शीघ्र किसी चट्टान से टकरा कर टुकड़े टुकड़े होजायगी, और कदाचित जितनी शीघ्र टूटे, उतना ही अच्छा। (शारीरिक) मिलाप तो केवल स्वर्ग में ही संभव है। परन्तु केवल पार्षवता और सच्चाई में मिलाप यहाँ हो सकता है। ऐ राष्ट्रीय एकता के चाहने वालो! राष्ट्र को पहिले अनन्त अमानुषिक भ्रान्तियों से मुक्त करो। यदि मनुष्यत्व, सच्चाई और उन्नति के लिये आज सर्व साधारण कष्ट पारहे हैं और कल काम करने वाले सताये जा रहे हैं, तो इससे स्पष्ट होरहा है कि देश आध्यात्मिक दृष्टि से अभी जीवित है और नीचे ऊपर साँस ठीक ठीक ले रहा है।

यह सच है कि आदर्शवान् आचरण में कोई कष्ट नहीं होता क्योंकि वह मूर्तिमान शांति वा सुख है और चारों ओर प्रेम तथा प्रकाश फैला रहा है। परन्तु जिस समाज में प्रकाश का आगमन दुःख का कारण माना

जाता है, उसमें दुःख रहित शांति और जागृति लानेवाला प्रकाश दोनों एक साथ कैसे रह सकते हैं? सो यदि किसी विशेष दशा में तुम आदर्श के अनुसार आचरण नहीं करसकते, तो जितना कर सको वह सच्चा तो हो। इसी की अत्यन्त कमी और जरूरत है। किसी देश को शक्ति या बल छोटे २ ख्याल वाले बड़े २ मनुष्यों से नहीं बल्कि बड़े बड़े ख्याल वाले छोटे २ मनुष्यों से मिल सकता है।

शान्ति? क्या पाशवी निद्रा (तन्द्रा) में शान्ति रक्खी है? क्या दुर्गन्धयुक्त कब्र में शान्ति है? हम तो जीती जागती शान्ति चाहते हैं, न कि निर्जीव। लोग तो अँधेरे में गिर गिर पड़ते हों और तुम प्रकाश को बर्तन में छिपा रक्खो, ऐसे प्रकाश से तो यह अच्छा होता कि तुम्हारे पास प्रकाश बिलकुल न होता। जो व्यक्ति ऐसे अवसरों पर अपने कर्त्तव्य को छोड़कर यथाशक्ति सहायता पूर्ण शब्द कहने से पीछे हटता है और चुपचाप रहता है वह वास्तव में दोषी है।

(ख) अब हम जन संख्या के प्रश्न की ओर आते हैं:—

जन संख्या के विषय पर जो कुछ मालथस (Malthus) व अन्य अर्थ शास्त्रों ने कहा है उस के ऊपर विचार करने की यहाँ कोई आवश्यकता नहीं है। मालथस तो केवल जीवछ्छाश्त्र (Biology) के मत या निर्णय को दुहराता है। आओ, ज़रा देखें कि प्रकृतिवादी (Naturalists) लोग इस विषय में क्या कहते हैं। हक्सले (Huxley) नई आबादी (बस्ती) या जाति या समाज की तुलना उस बाग़ से करता है जो अपने आप उगे हुये जंगल के अन्तर्गत है। सामाजिक उन्नति का क्रम (Process of social

evolution) या जिस को हक्सले आचार सम्बन्धी क्रिया (Ethical process) भी कहता है उद्यान विद्या के (Horticultural process) के क्रम के बहुत नज़दीक है। किन्तु ये दोनों क्रम स्वछन्द वा स्वतन्त्र सृष्टि-क्रम (Wild nature or cosmic process) के निनान्त विपरीत हैं। स्वछन्द सृष्टि-क्रम की विशेषता यह है कि इसमें जीवन (स्थिति) के लिये प्रचण्ड व निरन्तर द्वंद्व मचा रहता है। उद्यान विद्या और आचार सम्बन्धी क्रिया इस झगड़े की जड़ उखाड़ती हैं, अर्थात् उन कारणों को दूर कर देता है कि जिन से ऐसा झगड़ा उत्पन्न होता है। हेनरी ड्रमण्ड (Henry Drummond) दोनों क्रमों की तदात्मकता सिद्ध करने का बड़ा भारी प्रयत्न करता है, किन्तु इस हल्ला गुल मचाने पर भी वह उन परिणामों से जो डार्विन और हक्सले ने निकाले हैं एक पग या इंच भर आगे नहीं बढ़ सका, और न उसको इस बात से इन्कार होसका (जो कभी किसी व्यक्ति को भी जिस के होश हवास ठीक हैं कदापि अस्वीकार नहीं हो सकता था) "कि यदि माली स्वयं उत्पन्न होने वाली घास फूस को बराबर उखाड़ता न जाय और इसकी अधिकता रोकने के लिये बराबर निराई इत्यादि न करता रहे, तो शीघ्र ही वही स्वछन्द सृष्टि-क्रम (Wild process) बाग़ में फिर अपना सिक्का जमा लेता है और फिर संहार करने लग जाता है, अर्थात् शान्ति एवं उन्नति के साम्राज्य को हटा कर उसके स्थान पर प्राचीन लड़ाई झगड़े वाले निर्दयी ढंग से उखाड़-पछाड़ मचाता है। जाति या समाज का भी ठीक ऐसा ही हाल है। जिस समय जन-संख्या अपनी सीमा से बढ़ जाती है और यदि उस समय फालतू आबादी के अलग करने का कुछ प्रबन्ध

नहीं किया जाता, तो आए दिन भयानक लड़ाई और झगड़े खड़े होकर शान्ति को दूर करते तथा आचार सम्बन्धी क्रिया का नाश कर देते हैं, और सभ्यता का नष्ट भ्रष्ट करते हैं, बल्कि लोग ईश्वर की आज्ञाओं को मृतपत्र (Dead Letter) समझने लगते हैं। ऐसे कठिन समयों में राष्ट्रों में अधोपतन एवं आचार-भ्रष्टता का प्रारम्भ होना अनिवार्य हो जाता है। रूम, यूनान तथा अन्य किसी देश के अवनति और अधोपतन का मूलकारण यही लोक-संख्या की समस्या थी। आज से बहुत समय पहिले ही से भारतवर्ष जन-संख्या की अत्यन्त वृद्धि की नाज़ुक अवस्था पर पहुँच चुका किंतु हमने अभीतक इस मूल कारण को रोकने का कोई यत्न नहीं किया। इस जगतीतल पर कोई ऐसा देश नहीं जो भारत के बराबर गरीब (धन हीन) हो और साथही साथ जनसंख्या में भी इसके बराबर हो। इस देश में एक साधारण या मध्यम श्रेणी का घर समस्त राष्ट्र की अवस्था का एक आदर्श चित्र है। प्रथम तो आय (आमदनी) ही बहुत कम और फिर प्रतिवर्ष खाने वालों की संख्या-वृद्धि ही नहीं बल्कि निरर्थक एवं निर्दयता-पूर्ण रीति रवाजों की दासता के चुंगल में फँसकर उनमें अनुचित व्यय होता है। जब कि चारा केवल एक या दो के लिये हो और जानवरों की संख्या अगणित हो, तो वे भी तो आपस में लड़ मरते हैं। लड़ाई झगड़े की जड़ को दूर किये बिना यह उपदेश देना कि "लड़ो मत, शांति और मेल रक्खो" उपदेश को हँसी उड़ाना नहीं तो और क्या है। हमारे देश भाई चित्त से भोले भाले और शांत स्वभाव हैं। उनका हृदय निस्संदेह कोमल है। किंतु वे बिचारे स्वार्थ परता और ईर्षा-द्वेष से

कैसे बच सकते हैं जब शरीर की दुर्बलता और आवश्यकताओं ने उनको विवश कर रक्खा है। यदि जन-संख्या की समस्या बिना हल हुये रह गई, तो राष्ट्रीय एकता और परस्पर मेल मिलाप की वातचीत आकाश पुष्प के समान कल्पनामात्र रहेगी। बैताल की पहेलो (विकट प्रश्न) को हल करना ही होगा, नहीं तो हम मरें। जीवछ्छाश्त्र के नियमानुसार सहानुभूति और निस्स्वार्थता का वृद्धि ऐसे सामाजिक घिराव (अड़ोस पड़ोस) में कभी नहीं हो सकती जहाँ पर प्रति दिन दुःख और पीड़ा हमारे साथियों के सामने खड़ी रहती हैं। ऐ भारतवासियों! देश में ऐसी घनी आवादी और निर्धनता के होते हुये, सहानुभूति, प्रेम और ऐक्य के बढ़ाने की आशा करना केवल निराशा मात्र है। भौतिक-शास्त्र के विद्यार्थी इस बातको जानते हैं कि किसी प्रकारका भी भौतिक पिंड अपनी भीतरी समता उसी समय तक स्थिर रख सकता है जब तक कि उसके परमाणु जिन से वह युक्त है, एक दूसरे से समान दूरी पर रहते हैं। ताकि प्रत्येक परमाणु को नियमबद्ध गति करने के लिये पर्याप्त स्थान मिलता रहे। अब भारतवर्ष के पिंड अर्थात् भारत निवासियों की दशा देखिये। क्या उसका प्रत्येक परमाणु अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति बिना औरों से टकराये हुये तालबद्ध गति कर सकता है? क्या उनको स्वतंत्रता के साथ स्वभाविक गति अनुसार चलने के लिये पर्याप्त स्थान मिलता है? यदि एक के खाने से दस आदमियों को भूखा रहना पड़ता है, तो जातीय (राष्ट्रीय) समता को सुरक्षित रखने के लिये तुम्हें बहुत शीघ्र उपाय करना चाहिये। नहीं तो भारतवर्ष की उन्नति की आशा केवल वन्य प्रकृति के उग्र परामर्श पर निर्भर होगी

जिसकी व्याख्या हमारे ऐसे असाध्य रोगियों के लिये महर्षि वशिष्ठजी ने इस प्रकार की है।—(1) कण्टक, व्याधि, उत्पात, महामारी (2) दुर्भिक्ष (3) प्राणनाशक संग्राम (4) भूकम्प।

बस बुराइयों का अब बहुत वर्णन हो चुका। इस की औषधि क्या है? यह कई प्रकार की है (1) इस अन्ध विश्वास को कि "भारत वर्ष से बाहर पैर रखना अपने आप को स्वर्ग से वंचित करना है" सदैव के लिये इस भूमि से निकाल देना चाहिये। और तब जिनका यहाँ पर निर्वाह नहीं हो सकता उनको चाहिये कि इस भूमि को छोड़ कर बाहर जा बसें। कुएँ के मेंढक बनने में क्या आनन्द मिलता है? क्या तुमको यह बात नहीं सूझती कि तुम स्वयं इस पवित्र भारतवर्ष को अपने लिये एक गड्ढा घोर काल कोठरी बना रहे हो।

(2) एक समय था जब भारतवर्ष में आर्यों के लिये बहुत सी सन्तान का उत्पन्न करना आनन्ददायक समझा जाता था, किन्तु अब वह समय नहीं रहा, सब उलट पुलट हो गया है। आज कल आवादी (जनता) की दृष्टि से बहुत बड़े कुटुम्ब का होना जी का जंजाल माना जाता है। विचारहीन पुरुष जो अभी तक बच्चा का सा निश्चय पकड़े हुये हैं "कि अपने बच्चों पर ही स्वर्ग की प्राप्ति निर्भर है" उसे ज़रा आँख खोल कर देखना चाहिये कि वह मरने से पहिले ही भारतवर्ष में अपना घर बहु सन्तान के कारण नरक बना रहा है। अर्जुन का ठीक यही बहाना था कि पुत्रों के द्वारा स्वर्ग मिलता है। श्रीकृष्ण के ख्याल में था जबकि उन्होंने भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में 42 से 44 श्लोक तक उन

लोगों को फटकार बताई है, जो भोग विलास पूर्ण स्वर्ग के पीछे मारे मारे फिर रहे हैं।

इन श्लोकों को ध्यान देकर पढ़िये और उस स्वतंत्रता के भावको जो इनसे प्रकट होरहा है, ग्रहण कीजिये। आओ, इस हानिकारक प्रथा (अर्थात् विवाह करके संतति उत्पन्न करना और अज्ञानता में जीवन बिताकर बंधन में मरजाना) को जो हमपर बहुकाल से शासन करती चली आती है देश से बाहर निकाल दें।

हम कभी मुसलमानी शासकों को अपने पतन का कारण समझकर उन्हें कोसने लगते हैं, कभी ब्रिटिश साम्राज्य में दोष निकालने लगते हैं, कभी भारतवर्ष के धर्मों को इस दुर्दशा का उत्तरदाता ठहराते हैं, और कभी शिक्षा परिपाटी को बदनाम करने लगते हैं। संभव है कि इस तरह की छिद्रान्वेषण में हम किसी हद तक ठीक हों, किंतु वास्तविक लांछन तो अपवित्रता के सिर आता है कि जो संसार में सब से पवित्र संबन्ध को, जो विवाह है, अपवित्र करदेती है, और यह वही संबन्ध है जिससे हम सब भारतवासी उत्पन्न हुये हैं, और जिसने हमको ऐसा बना रक्खा है जैसे हम आज हैं। इस अत्यन्तावश्यक और अति पवित्र प्रथा की ओर अत्यन्त बेपरवाही से, अत्यन्त निर्लज्जता से, और अत्यन्त अशास्त्र विधि से ध्यान दिया जाता है। जन्मपत्रों का मिलान, ज्योतिषशास्त्र की गिनती, शुभ शकुनों की पहिचान, मंत्रों के गान और असीम पवित्र रीति के होते हुये भी भारतवर्ष में विवाह शादी, बुरे समय, अशुभ शकुन से, और अपवित्र होते हैं। कोई भी नक्षत्र ऐसे अशुभ घरों में नहीं ठहर सकते, जहाँ वह देख रहे हों

कि अल्पायु बच्चों के विवाह नक्षत्रों के लग्न और मुहूर्त के नाम से हो रहे हैं। इस दृश्य को जो मनुष्यत्व से विपरीत बल्कि पशुत्व से भी नीचे है देखकर वह भय के मारे काँपने लगते हैं। ऐसे अपवित्र विवाह पर, जो अपना निर्वाह तक नहीं कर सकते, उन पति पत्नियों को पवित्र करने का अपना प्रभाव पवित्र वेद की ऋचाएँ भी खो देती हैं, वरन् उसी क्षण से सदा के लिये निरर्थक हो जाती हैं। देश में अयोग्य, कर्तव्यहीन, निकम्मे और परोपजीवी प्रजा के उत्पन्न करने के लिये निर्धनों के विवाह करने वाली प्रथा की पुण्य-द्रव्य दूषित दुर्गन्ध के सन्मुख किन पुष्पों में ऐसी सामर्थ्य है कि अपना माधुर्य सुरक्षित रख सकें।

नवयुवको! इस प्रथा को रोको, रोको! अय नवयुवको! तुम जो भारतवर्ष के भविष्य के उत्तरदायी हो, इसको रोको! रोको! सदाचार के नाम पर, भारतवर्ष के नाम पर, अपने लिये और अपनी संतान के लिये कृपा करके इस विचारहीन और अशुभ काल के अंधाधुंध विवाहों को जो देश में हो रहे हैं, रोको, रोको। ऐसा करना लोगों को पवित्र कर देगा, और आबादी वाली समस्या को भी किंचित हल कर देगा।

क्या तुम ऐसा मानते हो कि ये प्रस्ताव प्रकृति नियम विरुद्ध हैं। यदि इन आज्ञाओं पर न चलोगे तो प्राणनाशक दुर्भिक्ष और कतर कतर कर मारने वाली मृत्यु तुम्हारा पीछा करेंगे। इसमें अत्युक्ति नहीं। इन शब्दों में तो कठोर घटनाएँ और दारुण वास्तविक तथ्य आवृत हैं। पृथिवी भर में संसार के किसी सभ्य समाज से पूछ देखो-क्या बाल विवाह और बाल विधवा की दुर्दशा संसार में घोर

प्रकृति नियम विरुद्ध नहीं है? क्या तुम में मनुष्यत्व का कोई परमाणु शेष रह गया है? तब इन अमानुषिक और अप्राकृतिक रीति रवाज के रोके बिना भला तुम्हें कैसे चैन आ सकता है? बाल विधवाओं के सुकोमल राष्ट्र सहायता के लिये अज्ञातत: फैले हुये हैं। तुम्हारी आँखों के सम्मुख तुम्हारी अग्निवत् रीति रवाज़ की चिता पर ये जीती जागती सतियाँ जल रही हैं, और उनकी निर्दोष रोती हुई आँखों द्वारा साक्षात भगवति तुम्हारी ओर सहायता के लिये देख रही है। कबतक तुम रोती चिल्लाती भवानी से मुख मोड़े रक्खोगे? यदि तुम कान में कड़ुवा तेल डाल कर बैठ जाओगे, अर्थात् उनके रोने चिल्लाने को कुछ काल तक न सुनोगे, तो वह भवानी भयानक रक्त प्यासी और बदला लेनेवाली चुड़ैल बन जायगी। भवानी की इस दशा को देखकर धरती भी काँप उठती है। लोग शांति शांति पुकारते हैं, किंतु जबतक यह स्वयं बुलाई हुई चुड़ैल (Nemesis) तुम्हारे देश में मौजूद है, तबतक तुम शांति कैसे पा सकते हो। क्या तुम इस बात के लिये रुके हो कि ज़रा इस बात को सोच विचार लें और इस समस्या के विषय में सतशास्त्रों को देख भाल लें कि वे क्या कहते हैं? शोक यह तो बिल्कुल स्पष्ट है, प्रत्यक्ष है, रुको मत। भगवान शंकर का उपदेश (जो गीता भाष्य के अध्याय 18 श्लोक 66 में है) सदैव स्मरण रक्खो कि पवित्र ग्रन्थ और श्रुति उन्हीं बातों के लिये प्रमाण मानी जाती है जिनको ज्ञान के सामान्य प्रमाणों (जैसे प्रत्यक्ष) से हम नहीं जान सकते। वह उद्भट भाष्यकार इस प्रकार कहता है कि "श्रुति केवल उसी बात के जानने के लिये प्रमाण है जो मनुष्य के ज्ञान से परे हैं" आगे बढ़कर आचार्य जी

महाराज इस प्रकार व्याख्या करते हैं:—"चाहे सैकड़ों श्रुतियाँ कहा करें कि अग्नि सर्वदा अंधकारमय होती है, किन्तु इस विषय में कोई प्रमाण नहीं है। इसलिये ऐसी श्रुति भी अनुकरणीय नहीं।"

योरप में जितने ही नीची श्रेणी के लोग होते हैं, उतने ही शीघ्र उन के यहाँ विवाह आदि होने हैं, किन्तु इसमें संशय नहीं कि जितनी शीघ्र भारतवासियों का विवाह होता है उतनी शीघ्र किसी नीच से नीच जाति का भी वहाँ विवाह नहीं होता। ऊँची जातियाँ 30 वर्ष से पहले कभी भी शादी-विवाह नहीं करतीं। उनका यह ख़याल है कि बच्चे कम हों, किन्तु योग्य हों।

हर्बर्ट स्पेंसर अपने जीवन-शास्त्र के मूल तत्व नामी पुस्तक में इस बात को दिखलाता है कि ज्यों ज्यों मानसिक उन्नति अधिक होती जाती है, त्यों त्यों सन्तानोत्पादक शक्ति कम होती जाती है। सन्तानोत्पादक शक्ति को ही जो प्रायः समस्त प्राणियों में रहा करती है, अपना लक्ष्य बना कर हम अपने आप को कब तक इतना नीचा बनाये रक्खेंगे। हमारे यहाँ के शास्त्रों के अनुसार (जो ब्रह्मचर्य का गुण वर्णन करने में कभी उकताते नहीं) कोई भी शक्ति, चाहे शारीरिक हो या मानसिक, पवित्रता के बिना नहीं हो सकती। मानवी पौरुष का वह भाग जिस को मैथुन-क्रियाओं और मैथुन-विचारों में काम-शक्ति कहते हैं, यदि रोका जाय और वश में लाया जाय, तो वह सहज में ओजस और अटूट आत्मिक बल में बदल जाता है।

ऐ ऋषियों की सन्तान! तुम्हें काम-वासनाओं को अपने वश में करना चाहिए। वह मूर्ख जिसने इस पाश-

विक काम पर अधिकार नहीं पाया और प्रकृति के गुरुतर सम्बन्ध अर्थात् स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध को खेल-तमाशा समझ रक्खा है उसे नहीं मालूम कि वह सचमुच अपना ही रक्त, अपना ही श्वेत रक्त-जो उसकी जान है, बहा रहा है। समस्त पापों की जड़ इसी दैवी शक्ति का अनुचित प्रयोग है, जैसे कुपात्र के पास धन-सम्पत्ति (अर्थात् अनुचित स्थान पर द्रव्य) कूड़ा-कर्कट ही है। काम वासना को जो पशु वृत्ति का विशेषण दिया जाता है उस से भी उसका नीचत्व स्पष्ट होता है। पशु निस्सन्देह अधम और मूर्ख हैं, क्योंकि अंधाधुंध सन्तति बढ़ाते चले जाते हैं। और उस धड़ाधड़ सन्तान उत्पन्न करने का परिणाम भयानक रक्त-युद्ध है, जिस से कलंक का टीका उनके सिर लगता है। फिर भी पशु इस लिये बिलकुल पाप-रहित हैं कि विषय-सुख के लिये वे इस क्रिया को नहीं करते। मनुष्य तो पशुओं से श्रेष्ठ इस लिये माना जाता है कि उसकी वासनायें उसकी बुद्धि के वश में होती हैं। अब जो मनुष्य सन्तान के अंधाधुंध उत्पन्न करने में पशुओं की बराबरी करता है, और अनावश्यक तथा अपवित्र विषय-सुख में लिप्त होने से पशुओं से भी अधमतर हो जाता है, कौन सी नीचता और अधोगमन ऐसा है जो उस पर न आय?

पवित्रता, पवित्रता, पवित्रता तो तुम्हें तलवार की धार पर प्राप्त करनी होगी। यदि तुम पवित्रता को प्राप्त न करोगे, तो विकासवाद का निर्दयी पहिया तुम्हें कुचल डालेगा, और समूल नाश कर देगा। आज के दिन तुम्हारी एक मात्र आशा पवित्रता ही रह गई है। जिस प्रकार वन-चरों के बीच विकासवाद की रीति ने निकट-सम्बन्धियों में बल पूर्वक पवित्रता का व्यवहार पैदा कर दिया है,

उसी तरह ऐ भारत के रहने वालो! आज कल की स्थिति इस बात की बड़े वेग से इच्छुक है कि तुम्हारे विचार पवित्र हों, तुम्हारा आचरण पवित्र हो। ऐ भारतवासियो! यदि तुम में इसकी कमी रही, तो तुम बच नहीं सकते। चाहे यह कठिन हो या सहज, तुम्हें तो यह प्राप्त करना ही पड़ेगा। भारतवर्ष के लिये, अपने शरीरों के लिये, अपनी बुद्धि के लिये, अपने धर्म के लिये, इस लोक के लिये, और परलोक के लिये, ऐ भारत निवासियो! तुम्हें तो पूर्ण पवित्र होना ही पड़ेगा। बिना पवित्रता के वीरता नहीं; बिना पवित्रता के प्रीति नहीं, बिना पवित्रता के साहस नहीं, बिना पवित्रता के एकता नहीं, और बिना पवित्रता के शांति नहीं।

शुद्धि बिना नहिं वीरता, नहिं साहस नहिं मेल। बिन पवित्रता प्रीति नहिं, औ नहिं शांति अमेल॥

शिक्षा—अमेरिका और इंगलैंड के अपढ़ लोग भी हमारे यहाँ के विश्वविद्यालयों के सामान्य अंडर ग्रेजुएटों से अधिक चतुर होते हैं। यह कैसे? उनकी शिक्षा का मुख्य साधन दैनिक सस्ते समाचार पत्र होते हैं। इंगलैंड जापान और अमेरिका में कालेजों से बढ़कर समाचार-पत्र विद्या का प्रचार करते हैं। सरकार और अन्य संस्थाओं को हम इसी लिये धन्यवाद देते हैं कि वे हमारे देश में किसी दर्जे तक शिक्षा फैलाते हैं, किन्तु यह वास्तव में कुछ भी नहीं है। सर्व साधारण की मूर्खता और स्त्रियों की अंधकारमयी भयानक अवस्था का दोष सिवाय हमारे और किसी पर नहीं लग सकता। वह प्राण-भूतशक्ति जो निकष्ट कर्मों अथवा अकर्मों में व्यर्थ नष्ट हो रही है उसे स्त्रियों की दशा के सुधार में, सर्व साधारण को मूर्खता से निकालने

अर्थात् पढ़ाने में, और अपने आप तथा जाति को जगाने में लगा दो। इस उद्देश्य की पूर्ति में सबसे पहला और सीधा सादा ढंग जो पकड़ना पड़ेगा, वह देशी समाचार पत्रों की दशा का सुधारना होगा। ऐसे समाचार पत्र निकालो जो सचमुच लाभदायक हों, और उन समाचार पत्रों को जो स्त्रियों तथा सर्व साधारण की समझ में आने योग्य भाषाओं में पहले से मौजूद हैं, उन्नति प्रदान करो। इस ओर पहले भी कुछ प्रयत्न किया गया था, किंतु असफलता हुई, क्योंकि उच्च कोटि का शिक्षित विद्यार्थी वर्ग प्रायः देशी भाषा में लिखे वा छपे हुए ग्रन्थावलोकन से घृणा करता है। तुम्हें अपनी मातृभाषा का सम्मान करना सीखना चाहिये। (Young men's Indian Association) भारतीय नवयुवक-समाज को चाहिए कि सीधी सादी हिंदी भाषा में बल्कि हिन्दी अक्षरों से पंजाबी भाषा में एक पत्र निकालें, और जहाँ तक हो सके, फ़ारसी और संस्कृत के शब्दों को उसमें न आने दें, और उस प्रकार की पद्धति से विरक्त रहें जिसमें वह पूर्ण रूप से भाव को प्रकट न कर सकते हों। (Be natural) असली बनो। जैसा ख़याल करते हो वैसा लिखो। किसी की नक़ल मत करो। कालिज के विद्यार्थी भी उस पत्र में छोटे २ लेख दिया करें। उन आश्चर्य उत्पन्न करने वाले भावों और विचारों को जो तुम्हारे पढ़ने समय उत्पन्न हों, अपनी मातृभाषा में कभी २ प्रकट करने से तुमको पढ़ने वालों की अपेक्षा अधिक लाभ प्राप्त होगा, यद्यपि दूसरे ऐसा समझेंगे कि तुम्हारा लेख तुम्हारी अपेक्षा पाठकों को लाभ अधिक देता है। इस काम के लिये किसी बड़े लम्बे चौड़े विचार से तुम्हें अपने को थकाने वा तंग करने की आवश्यकता नहीं है।

इस पत्र के पहिले अंक में हिन्दी की वर्णमाला और वर्णों की सरल मिलावट से घरेलू शब्द होने चाहिए, और कालेज के भाग्यमान् विद्यार्थियों को, जो देश में ज्ञान और शिक्षा फैलाने के लिये मार्गदर्शक (pioneers) हैं, चाहिए कि इस आदरणीय कर्तव्य को अपने ज़िम्मे लें; अर्थात् अपनी बहनों, माताओं, स्त्रियों, लड़कियों और अन्य सम्बन्ध वाली स्त्रियों को, जो लिख-पढ़ नहीं सकतीं, लिखना-पढ़ना सिखलायें। सार्वजनिक पाठशालाओं अर्थात् सरकारी मदरसों की प्रतीक्षा में बैठे न रहो। यह आदरणीय ज़िम्मेदारी तुम्हारे ही ऊपर है।

यदि भारत वर्ष को जीवित रहना है, तो स्त्री-शिक्षा का अत्यन्त विस्तार के साथ प्रचार करना पड़ेगा। तब फिर तुम्हारे ही हाथों से यह काम क्यों न आरम्भ हो। इस बात को देखो, कि अपने प्रान्त में कोई स्त्री या ग़रीब मनुष्य अपढ़ न रहने पावे। देश के मुख से इस कलंक के टीके को मिटा दो। क्या तुमको अपने पड़ोस की भंगिन को पढ़ाते हुए भय वा लज्जा मालूम होती है? यदि ऐसा है तो तुम्हारी सभ्यता और सदाचार पर धिक्कार! ग़रीब और अपढ़ लोगों के पास मातृवत् सहानुभूति और प्रेम के साथ पढ़ाने के लिये जाओ। यह कैसा देवताओं का सा काम है। भारतीय नवयुवक समाज के पत्र में शारीरक-शास्त्र (Physiology) भौतिक शास्त्र (Physics), अर्थ शास्त्र (Political economy), ज्योतिष शास्त्र (Astronomy), इतिहास (History), मानस शास्त्र (Psychology), इत्यादि अन्य विद्याएँ एक अत्यन्त मनोरंजक और सरल रीति में जैसे तुम लिख सकते हो, धीरे-धीरे स्थान पावें, और फिर धीरे-धीरे भाषा की पद्धति भी अधिक श्रेष्ठ बनाई जाय।

राम इस पत्र के लिये हिन्दी अक्षरों की सिफ़ारिश करता है, क्योंकि बहुत शीघ्र हिन्दी भारत वर्ष की राष्ट्रीय भाषा हुआ चाहती है। स्त्रियों और ग़रीबों को शिक्षा देना हमारे लिये बड़े महत्व का काम है, और यह वह काम है कि यदि पूर्ण रीति से किया गया तो हम को अन्ततः भारी उन्नति तक अवश्य पहुँचा देगा। मगर भूलना मत। तुम्हारे लिये एक और काम है जो इससे भी अधिक सीधा सादा और अत्यन्तावश्यक है। वह यह है कि समुन्नत देशों में जाकर कृषि-विद्या, कला, कौशल तथा व्योपार को सीखो और उस लाभदायिकी विद्या को समस्त भारतवर्ष में फैला दो।

भोजन—भोजन का प्रश्न भी बड़ा ही आवश्यक है। मस्तिष्क और शरीर की शक्तियाँ उसी समय पूरा-पूरा विकास पा सकती हैं जब खान-पान के प्रश्न पर उचित ध्यान दिया जाय।

जैसा खावे अन्न, तैसा होवे मन। जैसा पीवे पानी, वैसी होवे वाणी॥

यदि तुम्हें अपनी शक्ति के मुख्य कारण अर्थात् भोजन का पूरा ज्ञान प्राप्त हो, तो समस्त अनुचित थकावट दूर और शक्ति की कमी भरपूर हो सकती है। क्या खाना चाहिए? और कैसे खाना चाहिये? इस विद्या को विज्ञान की दृष्टि से आप जानिए। और फिर स्त्रियों को जो हम को खिलाती हैं, खान-पान का तत्वज्ञान आप बतलाइये। यह बड़े शोक की बात है कि भारत वर्ष के शिक्षित पुरुषों ने अत्यन्त बलबर्धक (पुष्टिदायक) खान-पान का प्रश्न बिना हल किये छोड़ दिया, और यह और भी लज्जा की बात है कि विज्ञानविद् लोग भी भोजन के साथ कभी-कभी

औषधियों और अलकोहल आदि का प्रयोग करते हैं, और इससे कुछ अधिक नहीं जानते हैं।

धर्म—क्या इस पत्र ने तुम्हारे धैर्य को थका दिया, और क्या तुम उकता गए? चाहे उकता गए हो या नहीं, ठहरो, जबतक वह एक बात जो राम जानता है, तुम से कह न ले, तुम्हें कहीं जाने न देगा। ऐ बरानियो! क्या तुम्हें कहीं बड़े आवश्यक काम पर जाना है? अस्तु, किन्तु यह पुराना कर्णधार (मल्लाह) तुम्हें उस समय तक न छोड़ेगा जब तक कि वह एक बात जिस के कहने के लिये यह जन्मा है, तुम से कह न ले। कोई और कर्तव्य राम का सन्देशा सुनने से बढ़कर आवश्यक हो नहीं सकता।

घरेलू, सामाजिक, या राष्ट्रीय कर्तव्य तुम्हारे कर्मकाण्ड हैं, और कोई भी शुभ कर्म अँधेरे में नहीं किया जा सकता है। हाँ, अंधेरखाता हो अँधेरे में हो सकता है। "Deeds of darkness are committed in the dark." श्रद्धा वा निश्चय की ज्वाला जगाये रखे बिना और दहकते हुए ज्ञान दीपक को हृदय में लाए बिना तुम कुछ नहीं कर सकते, एक पग आगे नहीं बढ़ सकते। यह समस्त आज्ञायें और सविस्तर सूचनायें जो प्रति दिन तुम्हारे कानों में फूँकी जाती हैं, यह आप के जीवन का बाह्य शरीर हैं। किन्तु बिना आत्मा के कोई शरीर कदापि ठहर नहीं सकता। समस्त सफल आन्दोलनों का प्राण (Spirit) एक जीता जागता विश्वास (निश्चय) और प्रज्वलित ज्ञान है। बड़े-बड़े नामी देहात्मवादी (जड़वादी), अनीश्वर वादी, प्रत्यक्ष वादी, नास्तिक और अज्ञेयवादी (Agnostics) लोगों तक की भी सफलता इसी

धर्म की स्फूर्ति के कारण जो उनमें मौजूद थी, दृष्टिगोचर हुई है, यद्यपि उनको इसका ज्ञान न था। धर्म के प्रचारकों की अपेक्षा इन में से कुछ लोगों के आचरण में धर्म अधिक पाया जाता है। देखो, यहाँ एक रबड़ का कारख़ाना है। यह रबड़ का कारख़ाना हज़ारों वरन् लाखों बेकारों की जीविका चलाता है। ये लोग राष्ट्रीय व्यवसाय को चला कर देश में रुपया इकट्ठा करते हैं, ग़रीब तथा मिहनती लोगों का ढाढस बाँधते हैं, और जहाज़ों कम्पनियों, रेल के नौकरों, डाक आदि के लिये बहुत सा काम निकालते हैं। तौ भी यह सब ठाठ बाट कैसे हो सकता यदि एक-एक रसायन समीकरण और भीतरी प्रतिक्रिया (One Chemical equation और one Inner reaction) से इसे गुरुत्व वा महत्व न मिलता। बस जबतक कि भीतरी प्रतिक्रिया उत्पन्न न हो, जबतक हृदय में परिवर्तन उत्पन्न न हो, जबतक अन्तःकरण की शुद्धि वा मानसिक समीकरण न हो, जबतक ईश्वर-भाव में प्रवृत्ति और देह भाव से निवृत्ति न हो; तब तक उनके प्रसाद बिना तुम्हारा कोई काम चाहे निजका, चाहे घरका और चाहे सामाजिक, चाहे राजनैतिक, चल नहीं सकता। हृदय या चित्त में प्राण डालदेने वाला कारलाइल (Carlyle) इस तरह लिखता है कि "विश्वास एक बड़ी भारी वस्तु है। प्रत्येक जाति का इतिहास अपने ही विश्वास के अनुसार हरा भरा, आत्म-विकासी और उत्तम होता है।" अरबवालों में एक व्यक्ति हज़रत मोहम्मद ने देखो एक शताब्दी में क्या क्या कर दिखाया, मानो एक लुप्तनाम मरुस्थल पर एक चिनगारी आ पड़ी और उससे बालू के कण बारूद के छर्रे बन गए, और दिल्ली से ग्रीनाडा तक आकाश को उड़ा धुवाँ धार करदिया। "ला इलाह इल्लिल्लः"

अर्थात् सिवाय परमेश्वर के और कुछ है ही नहीं, और "अल्लाहू अकबर" ईश्वर से महान और कुछ नहीं।

जो कुछ सचमुच बड़ा है। वह हमारे अन्तःकरण के अकथनीय गूढ़ भावों से प्रकट होता है। अव्यक्त गहराई से निकला है। जो कोई पूर्ण रीति से ब्रह्म विचार में नहीं रहता तथा आंशिक रूप से इन विचारों में रहकर पूर्ण रूप से उसमें रहने का प्रयत्न नहीं करता; वह चाहे जहाँ रहे और जिस प्रकार के आडम्बर में रहे, काल के मुख में है, वह जीवित नहीं है वरन् मृतक है।

हर्बर्ट स्पेंसर तक अपने उस अंतिम ग्रन्थ में (जिस को उसके मृत्युप्राप्त राजहंस का गीत कह सकते हैं) हक्सले के उस अनुभव का जो उसने बड़े मस्तिष्क वाले सूस जलचर के साथ किया था, हवाला देते हुये यों कहा है कि "हमारी चित्त-शक्ति (thought consciousness) में वेदना अर्थात् अनुभव करने वाली शक्ति (feeling) भी सम्मिलित है, यद्यपि उसके बाह्य रूप से केवल वही शक्ति दिखलाई पड़ती है जिसको हम मनीषा या बुद्धि (intellect) कहते हैं। वह भाग (वेदना शक्ति) जिसको हम मन के विषय वार्तालाप करने में प्रायः उड़ा देते हैं, वह उसका आवश्यक अंश अर्थात् अनुभव करने की शक्ति या चेतना है। यही शक्ति या चेतना स्वामी है और बुद्धि दासी है।" इस वेदना अर्थात् अनुभव करने वाली शक्ति को साधारण लोग 'हृदय' कहते हैं, जो विश्वास और धर्म का स्थान अर्थात् निश्चय और ईमान का मकान है। यही शक्ति कार्य के लिये उभारती वा उत्साहित करती है, और कार्य को पूर्ण करने के लिये बल देती है। स्पेंसर साहब फिर यों कहते हैं कि "नौकर

( मस्तिष्क, दिमाग़ वा बुद्धि ) को उन्नति देने और मालिक ( हृदय ) को यौंही पड़ा रहने देने से कुछ काम नहीं निकलेगा।" ओहो! किस सौंदर्य के साथ इस सुप्रसिद्ध नास्तिक का निकाला हुआ परिणाम आज कल के अत्यन्त सुयोग्य अन्तःकरण शास्त्र (Psychology) के ज्ञाता आचार्य जेम्स महोदय के इस वर्णन से मेल खाता है कि "धार्मिक अनुभव ऐसे ही विश्वास दिलाने वाले होते हैं जैसे कोई सीधे इन्द्रिय-जन्य प्रत्यक्ष अनुभव होते हैं; बल्कि प्रायः ये अनुभव उन सिद्धान्तों से भी जो तर्क शास्त्र के तर्कों से सिद्ध हों, कहीं अधिक निश्चय कराने वाले होते हैं।" इस मौखिक वार्तालाप की तह के नीचे अपनी प्रकृति के गहरे तल पर रहना, अपने अस्तित्व की गहराई को नापना, उसका प्रत्यक्ष अनुभव करना और अपने भीतरी तत्त्व को जो वस्तुतः प्रकृति का भी तत्त्व है, अनुभव करके आप ही वह तत्त्व बन जाना बल्कि तत्त्वमसि का एक जीता जागता अवतार बनना:—

यह, यह है ज़िन्दगानी, ताक़त की है निशानी। खम्भों को फाड़ती है, हाँ यह नहीं है फानी॥

1—दुनियाँ हट दूर परे, अब तो मैं जाग उठा हूँ। नूर रोशन हूँ मैं, तारीकी! तू हट दूर परे॥

2—हो ख़बरदार पहाड़ो, मेरे रास्ते से हटो। वरना डालूँगा कुचल, हाड़ और पंजर सारे॥

3—ऐ सलातीन वज़ीरो, जो हो खिलौने मेरे। लाईन क्लीअर करो, इस नूर मुजा़स्सम के लिये॥

4—तोप और गोले से हूँ ढिंढोरा पीटूँ। क़िस्मत और देवता हैं रथ पै मेरे बंधे॥

5—माया! तू हट दूर परे, अब तो मैं जाग उठा हूँ। जाग जाग, और हो आज़ाद, ऐ प्रकाश मेरे॥

उक्त पदों की अंग्रेज़ी कविता व्याख्यान के अन्त में ऐसे है।

(1)—The world turns aside, To make room for me ; I come, blazing Light ! And the shadows must flee.

(2)—O mountains, Beware ! Come not in my way, Your ribs will be shattered And tattered to-day.

(3)—O Kings and Commanders ! My fanciful toys ! Here's Deluge of fire, Line Clear ! my boys.

(4)—I hitch to my chariot, The fates and the Gods, With thunder of Cannon, Proclaim it abroad.

ॐ ! ॐँ !! ॐँ !!!