—जातीय धर्म—
सूर्यास्त होने का समय है। ठण्डी साँसें भर-भरकर मैं गुनगुना रहा हूँ। लिखते समय मेरी आँखों से आँसू बह रहे हैं—
"So many sects, so many creeds, So many paths that wind and wind, While just the art of being kind, Is all the sad world needs."
"I saw a vision once, and it sometimes reappears ; I know not if 'twas real, for they said I was not well. But often as the sun goes down, my eyes fill up with tears, And then that vision comes, and I see my Florid (India).
The day was going softly down, the breeze had died away ; The waters from the far West came slowly rolling on.
The sky, the clouds, the ocean- wave, one molten glory lay ; All kindled into crimson by the deep red sun.
As silently I stood and gazed before the glory passed, There rose a sad remembrance of days long gone ; My Youth, my childhood came again, my mind was overcast, As I gazed upon the going down of that red sun.
The past upon my spirit rushed, the dead were standing near, Their cheeks were warm again with life, their winding sheets were gone ; Their voices rang like marriage-bells once more upon my ear ; Their eyes were gazing there with mine on that red sun.
Many days have passed since then, many chequered years ; I have wandered far and wide, still I fear I am not well ;
For often as the sun goes down, my eyes fill up with tears, And then that vision comes, and I see my Florid. (India.)
शिखरिणी छन्द।
अनेकों पंथी हैं, बहुत मत भी हैं जगत में, अनेकों धर्मों हैं प्रसरित चतुर्दिक भुवन में, अपेक्षा तो भी है दुःखित जग को एक गुण की— बता दे कोई सदय बनने के यतन को।
बहरे-तवील
दृश्य जो एक दफ़ा लखा आँख से, वह कभी सामने मेरे आ जाता है। ज्ञात मुझको नहीं वह था सत् या असत्, क्योंकि स्वप्नस्य था मैं कहा जाता है॥ किंतु बहुधा दिवाकर के डुपते समय लोचनों में छजल मेरे भर आता है। और तब दृश्य आता पुनः मोदमय, मेरा भारत दुलारा नज़र आता है॥1॥
मंद गति से इधर ढल रहा था दिवस, चाल धीमी हवा ने उधर ली पकड़। पश्चिमी सिंधु में दूर से आगे बढ़, धीरे धीरे तरंगें रही थीं उमड़॥ मेघमाला, गगन और सागर-तरंगों का संमिश्र सौंदर्य दिखलाता था। और गंभीर आरक्त दिनकर-छटा से छलाली लिए दृश्य दिखलाता था॥2॥
मैं खड़ा चुप रहा देखता दृश्य को, जुत जबतक न वह आँख से हो गया। तब गये दूर दिनकी हुई खुद मुझे, दुःखमय भाव सारा उदय हो गया॥ मेरा शिशुपन, जवानी मुझे याद आते ही मनमें उदासी मेरे छा गई। देखता मैं रहा जबकि अस्तमित लाल रविको दया सी मुझे आ गई॥3॥
भूत युग जल्द मेरे निकट आ गया, पास मृतकों का मजमा खड़ा हो गया। उनके उतरे कफ़न, प्राण आए, तो गालों का रंग उनके फिर लालसा हो गया॥ विवाह बाजों सी उनकी छरीली सदा, एकदा मेरे कानों में आने लगी। लाल रविकी तरफ उनकी आँखें मेरी आँख के साथ नज़रें मिलाने लगीं॥4॥
बीते तब से बहुत दिन तथा दुःख छखमय वरस भी बिताए अनेकों कहीं। दूर तक मैं चतुर्दिक फिरा घूमता, हूँ मैं अस्वस्थ, संशय गया ही नहीं॥ क्योंकि जब प्रायः सूर्य है ढलता, अश्रु-जल आँख में मेरे भर आता है। और तब दृश्य आता पुनः मोदमय, मेरा भारत दुलारा नज़र आता है॥5॥
ऐ अस्ताचल-गामी सूर्य! तू भारत-भूमि पर निकलने को जा रहा है। क्या तू कृपा करके राम का यह संदेशा उस तेजोमयी प्रतापी माता की सेवा में ले जायगा? क्या ही अच्छा हो, यदि यह मेरे प्रेम-पूर्ण आँसू भारत के खेतों में पहुँच कर ओस की बूँदें बन जाँय। जैसे एक शैव शिव की पूजा करता है और वैष्णव विष्णु की, ईसाई ईसा की और मुसलमान मुहम्मद की; वैसे ही मैं प्रेमाग्नि में निमग्न चित्त से भारत को शैव, वैष्णव, बौद्ध, इसाई, मुसलमान, पारसी, सिक्ख, सन्यासी, अछूत, इत्यादि भारत सन्तान के प्रत्येक बच्चे के रूप में देखता और पूजता हूँ। ऐ भारत माता! मैं तेरे प्रत्येक रूप में तेरी उपासना करता हूँ, तू ही मेरी गंगा है, तू ही मेरी कालीदेवी है, तू ही मेरी इष्टदेवी है, तू ही शालिग्राम है। भगवान् कृष्णचन्द्र जिनको भारत की मिट्टी खाने की रुचि थी, उपासना की चर्चा करते हुए कहते हैं कि जिनका मन अव्यक्त की ओर लगा हुआ है, उनके लिये बहुत सी कठनाइयाँ हैं क्योंकि अव्यक्त का रास्ता प्रत्येक के लिये अत्यन्त कठिन है।
अत्यन्त ही कठिन हो जायगा। भारतवर्ष की भौतिक अवनति भारत का धर्म एवं परमार्थ निष्ठा का दोष नहीं है। वरन् भारत की विकसित और हरी भरी क्यारियाँ इसलिये लुट गयीं कि उनके आस पास काँटों और झाड़ियों की बाड़ नहीं थी। काँटों और झाड़ियों की बाड़ अपने खेतों के चारों ओर लगा दो, किन्तु उन्नति और सुधार के बहाने से सुन्दर गुलाब के पौधों और फलवाले वृक्षों को न काट डालो। प्यारे काँटो और झाड़ियो! तुम मुबारिक हो, तुम ही इन हरे-भरे लहलहाते हुये खेतों के रक्षक हो, तुम्हारी इस समय भारतवर्ष में बहुत ज़रूरत है।
जब राम शूद्रों के परिश्रम की महिमा करता है तो इससे यह प्रयोजन नहीं कि राम तमोगुण को रजोगुण और सतोगुण से अच्छा समझता है; वरन् असली तात्पर्य यह है कि भारत में चिरकाल से हम तमोगुण से घृणा करते आये हैं और घृणाकी क्रिया से ही तमोगुण हम में बेहद बढ़ गया है। अब हमको चाहिये कि तमोगुण का उपयोग करना सीखें और उसको लाभदायक बनायें।
भला बाग बगीचे क्योंकर उग सकते हैं, यदि हम कूड़ा कर्कट बाहर फेंकदें और उसका सदुपयोग न करें।
तमोगुण रूपी कोयले के बिना रजोगुण रूपी अग्नि एवं सतोगुण रूपी प्रकाश नहीं हो सकता। और जिस देश में कोई आन्दोलन उत्पन्न करना हो, तो उसमें तमोगुण रूपी कोथला जितना अधिक होगा उतनी ही राजसी अग्नि और सात्विकी प्रकाश अधिक बढ़ेगा। यह ख़याल वर्तमान सामुद्रिक शास्त्र (Phrenology) के सिद्धान्तों के सर्वथा अनुकूल है। जिससे स्पष्ट है कि शूरवीरता और आचरण
बल के लिये केवल सदाचार और मास्तिष्किक शक्तियों का विकास ही पर्याप्त नहीं है, वरन् मनुष्य में तमोगुण या पाशविक शक्ति भी पूर्ण रीति से होनी चाहिये। यही कारण है कि हिन्दू लोग महादेव जी को तमोगुण का मालिक वा शासक मानते हैं।
यदि हम भारतवर्ष के इस विपत्ति-ग्रस्त समय में उत्पन्न हुए हैं, तो हमें ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए, क्योंकि हमको अपने स्वदेश-भाइयों की सेवा करने का ख़ूब अवसर मिला है। हमें जो काम मिला है वह बहुत ही निराला, सुरीला और गतिशील (Dynamic) है। यह कहावत प्रसिद्ध है कि जो ख़ूब सोता है वह ख़ूब जागता है। भारतवर्ष ख़ूब सोया, इसलिये इसकी जागृति भी ख़ूब होगी। अब हमको भारत के पुत्रों में गुण ग्रहण करने का स्वभाव, भ्रातृभाव, संयोग की वृत्ति, यथायोग्य कार्यविभाग और परिश्रम की श्रेष्ठता उत्पन्न करनी चाहिये। केवल छिद्रान्वेषण से काम चलना दुस्तर होगा।
ओह! इस देश की कितनी शक्ति भिन्न २ संप्रदायों के परस्पर गाली-गलौज देने में नष्ट हो रही है। हमें उत सिद्धान्तों का पता लगाना चाहिए जिनमें हम सब सहमत हैं, और उन्हीं पर ज़ोर देना चाहिये। कुछ मनुष्यों पर आर्य-समाज का ही प्रभाव हो सकता है, सनातन धर्म का नहीं; कई ऐसे हैं जिन्हें ब्रह्म-समाज ही अच्छा मालूम होता है; किसी को वैष्णव-धर्म ही प्यारा है; इसी तरह हमें क्या अधिकार है कि हम उस मनुष्य को बुरा-भला कहें जो हमारी प्रथा के अनुसार आचरण नहीं करता, और जो हमारी शैली पर चलने से शक्ति और आनंद की आशा नहीं करता। जो हमारे साथ आना चाहते हैं, वह आवें,
जो ठहरना चाहें, वह ठहरें, और जो न ठहरना चाहें वह न ठहरें। संसार कुछ कहे, हमें इसकी चिन्ता नहीं। हमें या तुम्हें क्या अधिकार है कि हरेक को अपने संप्रदाय में ही सम्मिलित कर लें। मेरा काम तो प्रत्येक की सेवा करना है, अर्थात् उनकी भी सेवा जो मुझसे प्रेम करते हैं और उनकी भी जो मुझसे द्वेष करते हैं। माता उन्हीं बच्चों का अधिक प्यार करती है जो अधिक दुर्बल और कृश होते हैं। क्या वह सब लोग जो तुमसे सहमत नहीं हैं, भ्रान्ति में पड़े हुए हैं? महा कठिनता से यदि हम यह कल्पना कर भी लें कि ऐसा ही है, तो इनकी भी देश के लिये अत्यंत आवश्यकता है। ऐसे चलने वाले मनुष्य की क्या दशा होगी जो केवल एक टाँग के बल से फुदकता फिरता है। सच्ची शिक्षा यह है कि प्रत्येक वस्तु को ईश्वरीय दृष्टि से देखा जाय।
O Lord ; look not upon my evil qualities ! Thy name, O Lord, is same-sightedness ; By thy touch, if Thou wilt, Thou cans't make me pure.
One drop of water is in the sacred Jamuna, Another is foul in the ditch by the roadside. But when they fall into the Ganges, Both alike become holy.
One piece of iron is the Image in the temple, Another is the knife in the hand of the butcher, But when they touch the philosopher's stone, Both alike turn to gold.
So, Lord, look not upon my evil qualities ! Thy name, O Lord, is Same-Sightedness, By the touch, If thou wilt, Thou canst make me pure.
हमारे प्रभु अवगुण चित न धरो। समदर्शी प्रभु नाम तिहारो, सोई पार करो॥ हमारे प्रभु अवगुण चित न धरो।
इक नदिया इक नार कहावत, मैला नीर भरो। जब दोनों मिलि एक वरन भई, गंगा नाम परो॥ हमारे प्रभु अवगुण चित न धरो।
इक लोहा पूजा में राखत, इक घर बधिक परो। सो दुविधा पारस नहिं राखत, कंचन करत खरो॥ हमारे प्रभु अवगुण चित न धरो।
हमारे प्रभु अवगुण चित न धरो। समदर्शी प्रभु नाम तिहारो, सोई पार करो॥ हमारे प्रभु अवगुण चित न धरो।
हमें अपने व्यक्तिगत और स्थानिक धर्म को राष्ट्रीय धर्म से उच्च पद न देना चाहिये। इनका उपयुक्त स्थान पर रखना ही परम सुख देने वाला है।
देश और जाति की उन्नति निमित्त काम करना ही आधिदैविक शक्तियों वा देवताओं की पुष्टि करना है। आज भारत-माता के निमित्त इस प्रकार के यज्ञ की आवश्यकता है। गीता के निम्न लिखित श्लोक में आजकल इसी यज्ञ से अभिप्राय है:—
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः। भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥ (3-13)
अर्थ—जो मनुष्य यज्ञ से बचे हुए प्रसाद को खाते हैं, वह समस्त पापों से शीघ्र छुटकारा पाते हैं, किंतु जो केवल अपने पेट को भरने के लिये ही पकाते हैं, वे पापी पाप को भोगते हैं।
ईश्वरानुभव के लिये सन्यासी का सा भाव रक्खो, भारत माता की महान आत्मा से अपनी लघु आत्मा को अभेद करते हुये अपने स्वार्थ का नितान्त त्याग करो। ईश्वरानुभव अर्थात् परमानन्द को पाने के लिये सच्चे ब्राह्मण बनो, अर्थात् अपनी बुद्धि को देश-हित चिन्तन में अर्पण करो। आत्मानन्द के अनुभव के लिये सच्चे क्षत्री बनो, अर्थात् अपने देश के लिये प्रतिक्षण अपने जीवन की आहुति देने को तैयार रहो। परमात्मा को पाने के लिये सच्चे वैश्य बनो, अर्थात् अपनी सारी सम्पत्ति को केवल राष्ट्र की धरोहर समझो। इहलोक या परलोक में राम भगवान या पूर्णानन्द को प्राप्त करने के लिये अपने परोक्ष धर्म को अपरोक्ष रूप ( व्यावहारिक ) बनाओ, अर्थात् तुमको पूर्ण सन्यास भाव ग्रहण कर सच्चे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की शूरवीरता धारण करनी होगी। और जो सेवा पहिले पवित्र शूद्रों का कर्त्तव्य था, उसे अपने हाथ पैरों से स्वीकार करना होगा। अछूत जातियों के कर्त्तव्य पालन में सन्यासी भाव का संयोग होना चाहिये। आज कल कल्याण का केवल एक यही द्वार है।
उठो! जागो! अब सोने का समय नहीं रहा!
आज कल अन्य देश भी जगद्गुरु भारतवर्ष को अपने आचरण से इसी धर्म की शिक्षा दे रहे हैं।
जिस समय एक जापानी नवयुवक को इस कारण से सेना में प्रविष्ट होने से रोका जाता है कि उसके बाद उसकी बूढ़ी माँ की सेवा करने का कोई न रहेगा, तो उस समय बुढ़िया अपने राष्ट्रीय धर्म को अपने व्यक्तिगत और घरेलू धर्म पर विशेषता देकर आत्म-हत्या कर लेती है जिससे उसके पुत्र को अपने देश के सम्मान में अपने प्राण न्योछावर करने का अवसर मिले।
आदर्श स्वरूप, प्रतापी, श्री गुरु गोविन्द सिंह का राष्ट्रीय धर्म के लिये अपने व्यक्तिगत, घरेलू और सामाजिक धर्म का त्याग देने की वीरता के बराबर और क्या वीरता हो सकती है ? लोग शक्ति प्राप्त करने के पीछे मरे जाते हैं—किन्तु वे यह नहीं समझते कि राष्ट्र की समष्टि आत्मा के साथ अपनी व्यष्टि आत्मा के अभेद करने पर उनके हाथ में कितनी अनन्त शक्ति आ जायगी, अंत में, राम इस्लाम के पैगम्बर (हज़रत मुहम्मद) के ही मधुर शब्दों में इसी भाव को दर्शाता है।
"यदि सूर्य मेरे दाहिने ओर और चन्द्र मेरे बाईं ओर खड़े हो जायँ और मुझे पीछे हटने को कहें, तो भी मैं उनकी आज्ञा कदापि कदापि नहीं मानूँगा !" ओम् ओम् ओम् हम रूखे टुकड़े खाएँगे, भारत पर वारे जाएँगे। हम सूखे चने चबाएँगे, भारत की बात बनाएँगे॥ हम नंगे उमर बिताएँगे, भारत पर जान मिटाएँगे। सूलों पर दौड़े जाएँगे, काँटों को राख बनाएँगे॥ हम दर दर धक्के खाएँगे, आनँद की झलक दिखाएँगे। सब रिश्ते नाते तोड़ेंगे, दिल इक आतम संग जोड़ेंगे॥ सब विषयों से मुँह मोड़ेंगे, सिर सब पापों का फोड़ेंगे।) (राम