स्वामी राम की जीवनी ।
पर
श्रीयुत सी एफ़ एण्डरूज़, भूतपूर्व प्रौफेसर मिशन कॉलेज देहला द्वारा लिखित लेख।
मैं इस लेख का शीर्षक एक ऐसे पुरुष को बनाया चाहता हूं कि जिस का नाम पञ्जाब में, उस के त्याग के जीवन और धार्मिक तपश्चर्या के कारण, बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। वह कौन है? स्वामी राम तीर्थ।
यद्यपि मुझे उन के साक्षात् दर्शन का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ जैसा कि इस लेख के पढ़ने वालों में से कुछ लोगों को हुआ होगा; किन्तु मैं ने अपने भारतीय मित्रों से उन का बहुत कुछ हाल सुना है और बड़े ध्यान से उनके व्याख्यानों और लेखों को पढ़ा है। मैं बहुत सी बातों में उन के विचारों को स्वीकार नहीं कर सकता, विशेष करके जब वह एक पक्के वेदान्ती की स्थिति (हैसियत में) दृष्टिगोचर होते हैं, जो आत्मा और परमात्मा में किसी प्रकार का अन्तर या सापेक्षक अन्तर स्वीकार नहीं करता, तो मेरा अन्तःकरण और मेरा विचार दोनों चौंक उठते हैं। परन्तु कई एक सिद्धान्त और मामले ऐसे हैं जिन के सम्बन्ध में मैं उनकी सम्मतियों से नितान्त सहमत हूं। और मेरे समीप उनकी धार्मिक वृत्ति ऐसी शुद्ध, पावित्र, सादी और सच्ची है कि उन की प्रशंसा में मैं दूसरों के साथ अपनी सराहना भी मिला देना चाहता हूं।
यदि मैं उन के प्रमुख वाक्यों का सार वर्णन करूं कि
जिन का प्रभाव मेरे चित्त पर अधिक पड़ा है और जो स्वामी राम के व्याख्यानों वा लेखों में पाये जाते हैं, तो वे निम्न लिखित होंगेः
(1) त्याग (renunciation) (2) यज्ञ, अर्पण अथवा आत्म-समर्पण (Self sacrifice) (3) स्वार्थ-त्याग (Self denial)
सब से प्रथम और सब से मुख्य त्याग का भाव है, जो सदैव उनके सन्मुख रहा, और उनका मनोहर संदेशा भी वही है जो माया (धन), सांसारिक इच्छा, भोगों और ठाठ-बाटों के त्याग देने के विषय में हैं। स्वामी जी ने अत्यंत स्पष्ट रीति से मालूम कर लिया कि यदि हमें आध्यात्मिक उन्नति और विकास की इच्छा है तो इन उक्त विषयों से न केवल मौखिक बरन् व्यावहारिक रीति से पृथकता करनी चाहिए। इस विषय में उनमें एक सच्चे संन्यासी की वृत्ति (Spirit) पाई जाती है, और इसमें उनकी भारी प्रवृत्ति तथा हृदय की शुद्धि उस समय सब से अधिक हार्दिक सन्तोष देती है, जब कि वह त्याग के विषय पर कुछ लिख रहे हों। लेकिन वह भूत काल की बातों को मनोहर ढंग से वर्णन करते हुए यह चाहते हैं कि लोग बीरता के साथ स्वार्थ-त्याग और बलिदान (आत्मसमर्पण) की नई चट्टियों (मंज़लों) पर पहुँचें, और साथ यह भी चाहते हैं कि इस युग में संन्यास का तात्पर्य यह लिया जाय कि संन्यासी सामाजिक काम करें और स्वदेश-भक्ति को प्रत्यक्ष व्यवहार में लायें। वह लिखते हैं— "नियम और सिद्धांत मनुष्य के लिये हैं; न कि मनुष्य उन के लिये"। क्या हमारे पुराने बर्तनों में पहले ही बहुत से पैवंद और टांके नहीं लग चुके हैं? मुझे एक तो ऐसी
नदी बताओ जिसने अपना पहला मार्ग छोड़ दिया हो और फिर दुबारा उसी मार्ग पर बहने लगे; मुझे एक ऐसा उदाहरण बताओ जहां एक शरीर म पहिले प्राणों के त्यागने के बाद नये प्राण पैठ गये हों। नई मदिरा पुरानी बोतलों में नहीं भरी जाती। गन्ना जिसका रस शुष्क हो, वह उसी रूप में अपने रस को दुबारा प्राप्त नहीं कर सका, उसे तो जला देना चाहिए। फिर वह लिखते हैं "इमारतें और अन्य बस्तुएँ अपने रूप और संबन्ध बदलती रहती हैं; और जिन रूपों और संबंधों को वे एक बेर छोड़ देती हैं, उनको दुबारा ग्रहण नहीं करतीं. इत्यादि। कुछ ऐसे लोग हैं जिनके निकट स्वदेश-प्रेम के अर्थ यह हैं कि भूत काल की महिमा का रोना प्रति समय रोया जाय; वह उन घोंघों के समान हैं जो नए पानी में एक ठौर से दूसरे ठौर पर अपने पुराने घरों को पीठ पर लादे फिरते हैं; वह दीवालिया साहूकार हैं जो अपने जीर्ण बहीखातों को, जो बिलकुल निकम्मे हैं, सँभाल-सँभाल कर रखते हैं। इस चिंता में समय नष्ट न करो कि भारतवर्ष में महिमा थी; बरन् अपनी शक्ति सञ्चित करो जो बिखड़ी हुई और अनन्त है। और अनुभव करो, हाँ यह अनुभव करो, कि भारतवर्ष को महिमा प्राप्त होगी।
फिर स्वामी जी यह ग्रहणीय शब्द लिखते हैं कि "शब्द त्याग को लाचारी और भाग्य पर भरोसा सिखलाने वाली दुर्बलता का तुल्यार्थ वाची शब्द नहीं समझना चाहिए, और न उसे अभिमान पूर्ण संन्यास का समानार्थक मानना चाहिए। यह कोई त्याग नहीं कि तुम बिना सामना किए भयानक भेड़ियों को अपने इस शरीर, अर्थात् 'ईश्वर के मंदिर' को खा जाने दो। त्याग के अर्थ तो हैं—'सत्य के
लिये सब कुछ त्याग कर देना, उस पर से सब कुछ बालिदान कर देना'। तुम्हारा यह शरीर और माल सब कुछ ईश्वर का है। इसे ईश्वर की सेवा में ख़र्च करना चाहिए। तुम अपने स्थान पर होशियार खड़े रहो। अपने आप को सत्य से भिन्न और पृथक समझना और फिर सत्य के नाम से त्याग आरंभ करना. इसका अर्थ तो दूसरे शब्दों में यह है कि जो वस्तु तुम्हारी नहीं तुम उसका अनुचित व्यवहार करते हो! और इसी का नाम तो ग़बन या अनुचित अधिकार जमाना है।" स्वामी जी के लेखों में निस्संदेह त्याग के विषय में उत्तम, लाभदायक और व्यावहारिक शिक्षा मौजूद है।
स्वामी जी के सदाचारिक गुण—स्वामी जी उदार, कृपालु-स्वभाव, ईर्षा-द्वेष से रहित और शुद्ध, पक्षपात और मत मतान्तर की सनक से बिलकुल मुक्त थे। सत्य या सचाई चाहे किसी से भी और कहीं से भी मिलती हो, वह उसे स्वीकार करने और अपनाने में हर समय तैयार रहते थे। वह लोगों को विवश नहीं करते थे, वरन् उनके हृदयों पर अधिकार प्राप्त करने का प्रयत्न करते थे। वह व्यर्थ और असंतोषप्रद वाद विवाद में समय नष्ट करना नहीं चाहते थे। उनकी यह उदारता पूर्ण वृत्ति वहाँ प्रकट होती है, जहां वह ऐसे सिद्धांतों की चर्चा करते हों जो उनके अपने सिद्धांतों के विरोधी हों। उस में वह सदैव सदाचरण और सहानुभूति से काम लेते हैं। यही व्यवहार वह मसीही धर्म से करते हैं जिसकी पुस्तकों से वह सदैव प्रमाण दिया करते थे। इस विषय में वह सच्चा और स्वतंत्र भाव प्रकट किया करते थे, जो पक्षपात से सदैव
ऊंचा होता। सुतरां, स्वामी जी लिखते हैं कि "इंजील की नित्य प्रार्थना में आया है, "ऐ परमेश्वर! हमारी आज की रोज़ी हमें दे।" एक बादशाह को जिसे अपनी रोज़ी (आजीविका) की कोई चिंता नहीं, उसे भी यह प्रार्थना करनी होती है कि "हमारी आज की रोज़ी हमें दे", इस के अर्थ यह नहीं कि मनुष्यों को भिक्षारी भाव से प्रति समय ईश्वर से आर्थिक संपत्ति के लिये प्रार्थना करते रहना चाहिए, बरन् यह है कि प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह बादशाह हो या भिक्षुक, उसे अपने इर्द-गिर्द की समस्त वस्तुओं को अपना नहीं बरन् ईश्वर का समझना चाहिए। इसके अर्थ भिक्षा नहीं; बरन् त्याग हैं। जो मनुष्य प्रार्थना करता है, वह अपने घर की सारी संपत्ति और वस्तुओं को त्याग देता है। वह मानों पूजकों का पूजक और विरक्तों का विरक्त है, क्योंकि वह यह कहता है कि मेज़ और उस पर की समस्त वस्तु उसकी नहीं बरन् ईश्वर की हैं, और "प्रत्येक वस्तु जो हमें मिलती है, वह मेरे प्यारे अर्थात् ईश्वर से मिलती है।" इस प्रकार की बातें सहानुभूति, बुद्धि और धार्मिक विचार की स्वतंत्रता को प्रकट करती हैं।
कुछ सुनहरे वाक्य—स्वामी जी के लेखों और व्याख्यानों में तीसरी बात जिसने मुझ पर विशेषरूप से प्रभाव डाला वह यह है कि उनमें गंभीर बुद्धि पाई जाती है जो हर स्थान पर स्वीकृत होती है। यह गुण पंजाब के बहुत से मनुष्यों में पाया जाता है। इसके कई उदाहरण हमें पहले भी मिल चुके हैं, किंतु मैं कई उदाहरण और उपस्थित करता हूँ। जैसे इस विज्ञापन से बढ़कर और कौन सी बात अधिक व्यावहारिक और लाभदायक हो सकती है कि
"सुधारकों की आवश्यकता, ऐसे सुधारकों की जो दूसरों के सुधारक न हों, बरन् स्वयं अपने सुधारक हों।" या यह उदाहरण कि "इस नवीन हल चल के युग में अंत्यजों की सहायता करने से बढ़ कर काम कौन सा हो सकता है? बेचारे शूद्रों को प्रकाश, विद्या, और जीवनकी आवश्यकता है। लोग तुम्हें निकम्मों की सहायता करने के लिये बुरा भला कहेंग, क्योंकि वह अंत्यजों को निकम्मा समझते हैं। किंतु एक निकम्मी वस्तु अर्थात् शून्य दस गुना मूल्य बढ़ा देता है जब कि उसे एक के सीधी ओर लगा दिया जाय। आओ तुम भी अपने एक (1) के अंक की सीधी ओर शून्य (0) बढ़ा दो।"
मैं स्वामी जी की एक और कहावत पेश किए बिना नहीं रह सकता जिसमें पूर्वोक्त तीनों बातें पाई जाती हैं [अर्थात् स्वामी जी में सेवा करने की इच्छा, कृपालु स्वभावता और व्यावहारिक तेज समझ] वह लिखते हैं—"हम ऐसे अवसर पर उत्पन्न हुए हैं जो भारत वर्ष के इतिहास में नाज़ुक समय कहलाता है, इस लिये हमें धन्यवाद देना चाहिए कि हमारे लिये सेवा करने के अवसर बहुत अधिक हैं। हमारा समय अधिक विचित्र, अधिक मीठा और अधिक शक्ति का है। कहा जाता है कि जो लोग खूब सोते हैं, वह खूब काम करते हैं। भारत वर्ष बड़ी लंबी नींद सो चुका, इस लिये इसकी जागृति भी अत्यंत महान होनी चाहिए। हमें गुण-ग्राहकता की वृत्ति को जगाना है न कि छिद्रान्वेषिता के भाव को। हमें भ्रातृभाव में जोश उत्पन्न करना है न कि विच्छेद के भाव को उन्नति देना। शोक कि इस देशमें एक संप्रदाय दूसरे संप्रदाय का छिद्रान्वेषण करने
में अपनी कितनी भारी शक्ति व्यर्थ नष्ट कर रहा है! आओ, हम प्रयत्न करके ऐसी बातें मालूम करें जो एक समान हों, जिनमें एकता और मिलाप हो, और उनको ही अपने बीच ज़ोर से प्रचलित करें। ऐसे लोग पाए जाते हैं जिन तक आर्यसमाज की पहुँच हो सकती है, किंतु सनातन धर्म की नहीं। कुछ ऐसे हैं जिन तक कवल ब्रह्मोसमाज की पहुँच हो सकती है। इसी तरह ऐसे लोग भी हैं जिन तक केवल वैष्णव ही पहुँच सकते हैं। मुझे उन लोगों में दोष निकालने का क्या अधिकार प्राप्त है जो उस शक्ति और उस आनंद की परवाह नहीं करते कि जो मेरे निश्चय वा विश्वास से प्राप्त होते हैं? मुझे या तुम्हें क्यों यह प्रयत्न करना चाहिए कि हम ही हितैषियों और प्रशंसकों को पाने के इजारेदार हैं। मेरा कर्तव्य तो यह है कि मैं सेवा करूँ; हां, उन सब की सेवा करूँ जो प्रेम करने वाले और घृणा करने वाले हैं। माँ उन्हीं बच्चों से प्रीति करती है जो सब से कमजोर होते हैं।"
आनंद का स्रोत—स्वामी जी में चौथा गुण यह था कि वह आनंद और प्रसन्नता का स्रोत थे। वह उन पाषाण हृदय और अहंकारी साधुओं से सहानुभूति नहीं रखते थे, जो प्रत्येक व्यक्ति से कि जो तपस्या करने-योग्य नहीं, घृणा करते हैं। वह ऐसी कठिनाई और कष्ट को सहन करनेके लिये सदैव तत्पर रहते थे जिसको बहुत कम लोग सहन कर सकते हैं। किंतु इसके विषय में कोई घमएड नहीं करते थे, इसके अतिरिक्त वह त्याग के आनंद-पूर्ण पत्र की ओर सदैव झुकते थे और इस आनंद के मुकाबले में जो आत्मसमर्पण से मानवी हृदय में उत्पन्न होता है।
कष्टों को तुच्छ समझते और उनकी कुछ परवाह नहीं करते थे। वह अपने विचारों को बहुधा पद्य में प्रकट किया करते थे, और उन पद्यों में स्वर्ग-जीवन के विशेष आनंद को स्पष्ट किया करते थे। वह अपने हार्दिक भावों को रोकने का प्रयत्न नहीं करते थे, बरन् जोश की उमंग के साथ स्वयं भी बढ़े चले जाते थे, जिससे उनके शब्दों से आनंद का स्रोत बहने लगता था। उनकी आत्मा (चित्त) अपने कष्ट पर हँसती थी और दुःख से विहल नहीं होती थी।
कविता और वेदांत—अंतिम गुण स्वामी जी में यह था कि उनका चित्त कवियों-जैसा और मधुर था। वह उत्तम से उत्तम पाश्चात्य विचारों और उनके सोचने की शैलियों तक पहुँच जाते थे। उन्होंने तर्क शास्त्र और तत्वज्ञानके भीषण क्षेत्र में भी अपने चित्त की परीक्षा की। पाप और दुःख व्यावहारिक रूप में असत्य नहीं हैं और उनको तत्वज्ञान की आड़ में वा तर्क शास्त्र की रीति से असत्य सिद्ध करना उनका यह एक व्यर्थ प्रयत्न था क्योंकि दुःख को शास्त्र की सहायता से मिथ्या स्पष्ट करना व्यर्थ है और पाप को तत्वज्ञान की रीति से मिथ्या कहना मानों भयानक मार्ग पर पग रखना है। स्वामी रामतीर्थ ने इस कठिनता के विरुद्ध प्रयत्न तो किया किंतु इसे वेदांत के पद्य और माधुर्य से—और 'तत्वज्ञान छांटने' के स्थान पर 'दूसरों के साथ प्रेम करने' के उपदेश से—आच्छादित कर लिया। स्वामी रामतीर्थ के व्याख्यानों वा लेखों में अत्यन्त दुर्बल भाग वह है जहां वह भलाई और बुराई, पाप और पुण्य पर अपने विचार प्रकट करते हैं; और उत्तम भाग वह है जहां वह आत्म-समर्पण और त्याग पर युक्ति देते हैं।
अब मैं स्वामी रामतीर्थ के एक लेख की ओर ध्यान दिलाता हूँ जो आजकल के भारतवर्ष के लिये मानों एक संदेशा है। आप लिखते हैं—"मैं चाहता हूँ कि भारतवर्ष का बच्चा-बच्चा राष्ट्रीयता की ज़बरदस्त स्फूर्ति को फैलाने में सहायता दे। बचपन में से गुज़रे बिना कोई युवा अवस्था तक नहीं पहुँच सकता; और एक व्यक्ति को ईश्वर के साथ अपनी एकता उस समयतक अनुभूत नहीं हो सकती जब तक उसके शरीर की नस-नस में समस्त राष्ट्र की प्रीति उमंग न भर रही हो। ऐ भारतवर्ष के दृढ़-विश्वासी सुपुत्रो ! शास्त्रों का ठीक उपयोग करो। तुम्हारे देश का धर्म यह चाहता है कि तुम जाति-पांति के कठिन बंधन और नियमों को ढीले कर दो, और मत मतान्तरों, संप्रदायोंके अन्तर पर राष्ट्रीय हितके विचारों को अधिकृत रक्खो। हमें निजी धर्म को राष्ट्रीय धर्म से श्रेष्ठतर कभी न समझना चाहिए।"
श्री स्वामी रामतीर्थ। भारतीय प्रोफ़ैसर के वेष में
लाहौर 1864