श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

विजयिनी आध्यात्मिक शक्ति।

भाग 11 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 11 · अध्याय 2 / 6

विजयिनी आध्यात्मिक शक्ति।

पाँच फ़रवरी 1903 को जी. जी. हाल में दिया हुआ व्याख्यान।

प्रश्न—दूसरों की दृष्टि में हम जैसे हैं वैसे ही अपनी नज़र से अपने को देखना हम कैसे सीख सकते हैं?

उत्तर—दूसरों की दृष्टि में तुम जैसे हो वैसे ही तुम स्वयं भी यदि अपने को देखना सीख लो तो तुम्हारी कोई भलाई नहीं हो सकती। दूसरे हमें वैसा देखते हैं, जैसे हम नहीं हैं। वास्तव में हम जैसे हैं वैसा वे हमें नहीं देखते। यदि लोग तुम्हें ईश्वर समझते, यदि वे तुम्हारे भीतर ईश्वर देख सकते, यदि तुम्हें वे ब्रह्म समझ सकते, तो तुम्हें ठीकर समझा होता। नातेदार, भाई, पिता, माता, मित्र सब के सब तुम्हारे कानों में भन्नाया करते हैं कि तुम वह वस्तु हो

जो वास्तव में तुम नहीं हो। कोई व्यक्ति तुम्हें पुत्र कहता है, दूसरे लोग भाई, शत्रु, मित्र इत्यादि कहते हैं। ये सब तुम को परिच्छिन्न करते हैं। एक मनुष्य तुम्हें सज्जन कहता है, वह तुम्हें परिच्छिन्न करता है। दूसरा मनुष्य तुम्हें दुर्जन कहता है, वह भी तुम्हें परिच्छिन्न करता है। एक और तुम्हारी खुशामद करता है या स्तुति करके तुम्हें फुला देता है, वह भी तुम्हें सीमावद्ध करता है। दूसरा तुम्हें और नीचे गिराता है या तुम्हारी निन्दा करता है, वह भी तुम्हारे बेड़ियाँ डालता है, तुम्हें परिमित करता और बाँधता है। भाग्यशाली है वह पुरुष जो इन प्रत्येक बन्धन के विरुद्ध खड़ा होकर अपने दैवत्व, अपने ईश्वरत्व का निरूपण करता है। जो मनुष्य अपने शुद्ध-आत्मा का वा अपने शुद्ध स्वरूप का अनुभव कर लेता है, जो मनुष्य सारे संसार के सामने तथा अपने इर्दगिर्द अन्य सब लोगों के सामने निडर खड़ा होकर अपने ईश्वरत्व का निरूपण कर सकता है और ईश्वर से अपनी अभेदता पहचान सकता है, वह इन सब लोगों की अवज्ञा कर सकने के समर्थ है। जिस क्षण तुम अपनी ईश्वरत्व के जतलाने के लिए खड़े होने को तैयार हो जाते हो, उसी क्षण सारा संसार तुम्हें ईश्वर मानने को बाधित होता है, सारी सृष्टि को तुम्हें परमात्मा मानना पड़ेगा?

प्रश्न—कृपया हमें राजयोग का अर्थ समझाइये।

उत्तर—राजयोग का अर्थ है ध्यान या एकाग्रता का शाही साधन या राजमार्ग। यह शाब्दिक अर्थ है="राज" का अर्थ है शाही, और "योग" का अर्थ है मार्ग (सड़क)।

प्रश्न—वेदान्त शास्त्र के प्रचार का कोई सर्वोत्तम उपाय या ऐसा तरीका बताइये जिसे सब अंगीकार कर सकें।

उत्तर—वेदान्त शास्त्र के प्रचार का सब से अच्छा ढंग यही है कि उसके अनुसार जीवन बिताया जाय, और कोई राजमार्ग नहीं।

लोग सदा कोई न कोई ठोस या स्थूल पदार्थ पाना चाहते हैं, या ऐसी चीज चाहते हैं कि जिस पर उनका हाथ पड़ सके। स्थूल भौतिक पदार्थों को हथियाना या पकड़ना चाहते हैं, और वे सर्वदा विफल-मनोरथ होते हैं। तथापि वे उस भौतिकता को नहीं छोड़ना चाहते। वे खरी नगदी के रूप में कोई वस्तु चाहते हैं, वे रूप और रेखा को नहीं छोड़ना चाहते।

प्रिय बन्धु! ये खरी नगदी कहे जानेवाले रूप, ये भौतिक तत्व इन्द्रियों की भ्रान्ति के सिवाय और कुछ नहीं हैं। इन नाममात्र तत्वों और रूपों पर जो भरोसा करता है, उसे कभी सफलता नहीं होती। रूपों और परिच्छिन्न भावों पर निर्भर रहना कभी सफलता न लायगा। वह सफलता की कुंजी नहीं है। सूक्ष्म सिद्धान्त—सत्य पर निर्भर रहना—सफलता की कुंजी है। उसे ग्रहण करो, अनुभव करो, निदिध्यासन करो और उसका व्यवहार करो, और ये नाम, ये तत्व, ये रूप और रेखा तुम्हें खोजते फिरेंगे।

इसका दृष्टान्त वे दो मनुष्य हैं जो एक बड़ी वेगवती नदी में बहे जा रहे थे। एक मनुष्य ने तो एक बड़ा भारी लट्ठा पकड़ा और दूसरे ने एक पतला सा डोरा। जिस ने बड़ा लट्ठा पकड़ा था वह तो डूब गया और जिसने महीन सूत का सहारा लिया था वह बच गया। इसी तरह जो लोग बड़े बड़े सहारों पर भरोसा रखते हैं, जो बड़े नामों और दौलत पर आश्रय करते हैं वे अन्त में विफल होंगे।

सत्य के सूक्ष्म तागे पर, वास्तविकता के महीन तागे पर आश्रय करो। यदि तुम्हें अपनी ईश्वरत्व का बोध हो जाय, यदि तुम्हें अपने ईश्वरत्व का अनुभव हो जाय, तो फिर तुम चाहे सघन बनों में या भीड़ से भरी गलियों में कहीं भी रहो, कोई परवाह नहीं। वह सत्य का अनुभव हरेक वस्तु का रूपान्तर कर देगा, समग्र जगत को बदल देगा।

यह एक मेज़ है। कल्पना करो कि तुम इसे हटाना चाहते हो। यदि तुम किसी कोने से भी ज़ोर लगाओ, यदि मेज़ का कोई भी कोना तुम पकड़ लो, अथवा किसी भी ओर से पकड़ो तो तुम उसे सरका सकते हो, मेज़ हट जायगी। सारी दुनिया एक बड़े ठोस पदार्थ के समान है, और तुम्हारा शरीर इस दुनिया रूपी मेज़ का एक कोना या एक बिन्दु है। यदि आप इस अकेले बिन्दु को पकड़ लें, यदि आप इसे उठाकर तान दें, यदि आप इसे ईश्वर कहें, यदि आप इसे परमात्मा समझें, यदि यह अकेला बिन्दु ईश्वर में मानों समा जाय, यदि यह अकेला बिन्दु इस निश्चय बल से उठा दिया जाय, तो सारी दुनिया खिंच जायगी, सारी दुनिया सरक जायगी, क्योंकि सारा संसार मेज़ की तरह ठोस पदार्थ है। अपने व्यक्तित्व को तान दीजिये और आप सारी दुनिया को तान देंगे संगठनों में, या बड़ी २ संस्थाओं में, महान् मठों और उनके प्रचारक दलों में भरोसा करना बड़ी ही मूर्खता है, भयंकर भूल है। यह भयंकर भूल है, विफलता के सिवाय और इसमें कुछ भी हाथ न आवेगा, और आज नहीं तो कल्ह दुनिया की समझ में यह आजायगा। इसी प्रकार जो लोग केवल एक शरीर पर भरोसा करते हैं, संगठनों और सभाओं पर नहीं, वही लोग सारे संसार को बदल देते हैं। सभाओं और

संघों से जिन लोगों का सम्बन्ध है, वे रुपये जमा करते हैं, भवन बनाते हैं, कपड़े ख़रीदते हैं, परन्तु ऐसी विजय आध्यात्मिक वृद्धि नहीं है।

जंगलों में सियार हमेशा बड़ी जमात जोड़ते हैं, बड़ी सभायें रचते हैं, सदा बहुत बड़ी संख्याओं में मिलते हैं, एक साथ उठते बैठते हैं और हुआते (चीखते) भी एक साथ ही हैं। वे बड़े २ झुंडों में होते हैं और बड़ा शोर मचाते हैं। इसी भांति भेड़ें भी अपने झुंड पर भरोसा करती हैं, वे इकट्ठी होती और झुंड बनाती हैं। परन्तु सियार या भेड़ियाँ क्या खड़ी होकर शत्रु का सामना कर सकती हैं? नहीं, नहीं। क्या तुमने कभी सिंहों को दल बाँध कर रहते सुना है? एक बड़ी संख्या में सिंहों का यात्रा करना कभी तुमने पढ़ा है? कभी उनको समाज बनाते या जमात या झुंड जोड़ते भी सुना है?

गीध (बाज़) पत्तियों के राजा होते हैं। क्या वे सभायें रचते हैं? कदापि नहीं। नन्ही और छोटी २ चिड़ियाँ ही साथ उड़ती हैं। गीध (बाज़) और सिंह अकेले रहते हैं। परन्तु एकही बाज़ आपकी छोटी २ चिड़ियों के अनेकों समूहों को भगा दे सकता है।

हाथी जमात जोड़ते हैं, वे बड़ी संख्या में भ्रमण करते हैं, क्योंकि उनका स्वभाव मिलने जुलने का होता है। यूथ में रहना उनका शील है, वे विराट शरीर के जन्तु होते हैं, किन्तु एक ही सिंह आकर हाथियों के समग्र समूह को परास्त कर तितर-बितर कर देता है। संघों या समूहों पर न भरोसा करो। अपने आप भीतर से शक्तिशाली बनाना हरेक का और सब का कर्त्तव्य है। अतएव वेदान्त को फैलाने

का सब से अच्छा उपाय यही है कि वेदान्त को व्यवहार में लाया जाय, चाहे अकेला हो मनुष्य, चाहे दूसरों के बीच में। वेदान्त पर अमल करो हवा उस वेदान्त को ग्रहण करने को विवश होगी, सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, आकाश सभी उसे ग्रहण करने को बाध्य होंगे और उसका प्रचार होगा।

ईसा ने क्या कोई जत्था बनाया था? नहीं, नहीं। बिचारा अकेला ही रहा। शङ्कराचार्य ने कोई जत्था बनाया था? नहीं, बिचारा अकेलाही रहा। प्रत्येक प्राणी को अवश्य अकेले रहना चाहिये, अकेले खड़े होना चाहिये, हरेक को अपने भीतर परमेश्वर का बोध और साक्षात्कार करना चाहिये। जिस क्षण तुम्हें अभ्यन्तरात्मा का बोध हो जायगा, जिस क्षण तुम्हें उसका अनुभव हो जायगा, और दैवी जीवन बिताने लगोगे, उसी क्षण वेदान्त तुम्हारे भीतर से वैसे ही फूट निकलेगा जैसे सूर्य से प्रकाश।

याद रक्खो, तुम्हें ध्यान रहे, कि सुधार करने के ये सब उपाय, मानव जाति को सुधारने के ये सब यत्न, जिनका आधार धन पर है, अथवा जो धन या बाहरी सहायता पर आश्रय करते हैं, या जो दूसरों से किसी बात की आकांक्षा करते हैं, ये सब उपाय, जो दूसरों से माँगने के हैं, सब के सब असफलता में समाप्त होते हैं, यही नियम है। केवल भीतर की परम और अनन्त शक्तिका आश्रय करो। और बाहरी सहायता जब तुम्हें ढूँढ़ती हुई आवे तो उसे स्वीकार करने की कृपा करो। यदि बाहरी सहायतायें आपकी रंगरूट, आप की चेलियां बनने को तैयार हों तो अस्वीकार न करना, आपकी कृपा होगी। यह ठीक मानिये कि, ज्यों ही आप उनका आश्रय करेंगे वे आपको छोड़ देंगी, आपको त्याग देंगी। यही नियम है।

बाहरी मदद पर कभी भरोसा न करो। केवल अपने पर, वा अपने अन्तरात्मा पर भरोसा करो। यही आवश्यक है और कुछ नहीं। ये जो बड़े २ रूप लोगों ने धारण किये हैं, ये जो सब लम्बी दुमदार उपाधियाँ हैं, ये सब विफल हैं। ये असली लक्ष्य खो बैठती हैं। इनसे किसी का भी छुटकारा नहीं होता, ये किसी व्यक्ति को भी स्वतंत्र नहीं बनातीं, ये कष्ट और पीड़ा पहुँचाती हैं।

एक मुर्दा लाश को लीजिए। बिजली से हम उसे जानदार कर सकते हैं। हम उसके ओठों को हरकतदार कर सकते हैं, हम उसकी भुजाओं को उठवा सकते हैं हम उसे इस ओर व उस ओर झुकवा सकते हैं। परन्तु इसका नाम ज़िन्दगी नहीं है। इसी प्रकार बाहर से जो मदद मिलती है, जो सम्पूर्ण शक्ति हमें दौलत से, वैभव से, वस्त्रों से प्राप्त होती है, समाचार पत्रों द्वारा जो खुशामद किसी की की जाती है, समाचार पत्रों द्वारा जो हमारी प्रशंसा होती है, चेलों और भक्तों से जो आदर हमें प्राप्त होता है, यह सब सहायता वैसी ही सहायता है जैसी बिजली द्वारा मुर्दा लाश में गति का उत्पन्न होना। इससे जीवन नहीं मिलता, इससे पीड़ा नहीं दूर होती, यह मुझे स्वाधीन और स्वतंत्र नहीं बनातीं। तुरही वजने से जिन्दगी नहीं आती। जिन्दगी बीज से बढ़ती है; भीतर से, न कि बाहर से। यह एक जीता जागता सजीव बीज छोटा सा गर्भ पिण्ड है। इस में जीवन है, यह भीतर से बढ़ेगा। इस में कुछ देर तो अवश्य लगेगी, परन्तु वह असली जीवन होगा न कि धोखे की टट्टी।

मुर्दा लाश को गतिशील बनाकर, उस से उसका हाथ या सिर आदि उठवा कर हम बिजली के तात्कालिक प्रभाव

और बड़े आश्चर्यमय परिणाम पैदा कर सकते हैं, परन्तु इसमें जिन्दगी कहाँ। हमें तो जिन्दगी चाहिए। इसी तरह राम कहता है, कि बीज बो दो, अपने कानों में सत्य और उसका कलरव भर जाने दो। एक बार बीज बो दिया जाने पर हमें उसके लिए हैरान होने की जरूरत नहीं। इसी भांति वेदान्त के प्रचार के लिए, वेदान्त के उपदेश के लिए, तुम्हें स्वयं सत्य स्वरूप की अवश्य प्राप्ति करना चाहिए। इस तरह बीजों का बोना हो जायगा, उनकी वृद्धि की चिन्ता मत करो। तुम्हारे बिना हैरान हुए वे बढ़ेंगे।

एक महर्षि था, उसका एक श्रद्धालु बड़ा भक्त था, वह बड़ा भक्त शिष्य था। जो रोज महर्षि के दर्शन करने जाया करता था। एक बार कुछ दिनों के लिये महर्षि कहीं चले गए और जब स्थान पर फिर लौटे तो उनका वह परम भक्त चेला किसी दिन भी न दिखाई दिया। दूसरे लोग आए और चेले की निरन्तर अनुपस्थिति पर उन्हों ने आवाज़ा कसा, और उस भक्त की शिकायत की जो पहले महात्मा जी के साथ बहुत रहा करता था। महात्मा ने मुस्करा कर कहा, "क्यों शिकायत करते हो, क्यों दोष निकालते हो; मेरे पास उसके आने की ज़रूरत ही क्या है, वह इस शरीर से अनुरक्त क्यों रहे? मैं यह व्यक्तित्व नहीं हूँ, मैं यह शरीर नहीं हूँ। यदि उसने मुझे यह व्यक्ति ही समझा है, यदि उसने मुझे यह देह ही समझा है, तो वह स्वयं ही शूली चढ़ेगा। केवल उसे इस शुद्ध स्वरूप का जो मैं हूँ, इस सत्य स्वरूप का, इस ब्रह्म का, इस परम शक्ति का, जो मैं हूँ, अनुभव करने दो, मेरे उपदेशों के प्रति उसे सच्चा होने दो और वह मुक्त होगा, वह परमानन्द होगा"। फिर महात्मा ने कहा,

"घोड़ी जब एक बार गाभिन हो जाती है तो उसे फिर घोड़े के पास जाने की जरूरत नहीं होती। बीज डाल दिया गया और यथा समय बच्चा पैदा होगा"। महर्षि ने कहा, "इसी तरह, बीज बोये जा रहे हैं और मैं नतीजों के लिए परेशान नहीं हूँ। बीज नतीजे पैदा करेगा"।

इसी तरह, तुम सभाएँ करते रहो या नहीं, राम को क्या, राम का नाम चाहे तुम याद रक्खो या पैरों से कुचलो, इससे राम को क्या, तुम चाहे सराहो या कोसो, या इस देह की निन्दा करो, इससे राम को क्या। प्रत्येक क्षण बीज बोया जा रहा है, वह आप नतीजे पैदा करेगा। अपितु दुनिया या उसमें जो कुछ है उसके लिए हम हैरान क्यों हों। जिस क्षण हम संसारके सुधारक बन कर खड़े होते हैं उसी क्षण हम संसार के बिगाड़ने वाले बन जाते हैं।

ऐ वैद्य! पहिले अपनी चिकित्सा कर!

वेदान्त के अनुसार सम्पूर्ण संसार ईश्वर के सिवाय और कुछ नहीं है। समग्र संसार पूर्ण है, समग्र संसार ब्रह्म है, मेरा ही अपना आप है, समग्र संसार एक अद्वैत है। यदि यही बात है और फिर मैं सुधार का कोई उपाय ग्रहण करता हूँ, फिर मुझे यह समझ पड़ता है कि तुम पद-लित (अत्यन्त पतित) हो, और फिर मुझे ऐसा दिखाई पड़ता है कि तुम तुच्छ अभिलाषाओं के कारण दुःखी और पीड़ित हो, तो मैं तुरन्त तुम्हें बिगाड़ रहा हूँ, क्योंकि मैं तुमको अपने से कोई भिन्न वस्तु समझ रहा हूँ। इस लिये वेदान्त कहता है कि "ऐ सुधारको! ऐ सुधारकों का पद लेने वालो! तुम दुनिया को पापिनी समझते हो, तुम दुनिया को कुरूपा समझते हो और उसे गाली देते हो। दुनिया इतनी दीन

क्यों मानी जाय कि उसको तुम्हारी सहायता की जरूरत है ? ईसा मसीह आया और उसने यथा शक्ति लोगों को उठाने वा प्रबुद्ध करने की चेष्टा की, परन्तु दुनिया का सुधार नहीं हुआ । भगवान् कृष्ण आये और जो कुछ कर सके किया । भगवान् बुद्ध आये और बहुतेरे तत्वज्ञानी आये, परन्तु आज भी अभी तक वही पीड़ा, वही दुःख और वही क्लेश है, संसार हम ज्यों का त्यों पाते हैं । आज क्या लोग पहिले से किसी तरह अधिक खुश हैं ? क्या तुम्हारी रेलगाड़ियों, तुम्हारे तारों, तुम्हारे टेलीफोनों, तुम्हारे बड़े २ जहाजों, तुम्हारी समस्त महान् वैज्ञानिक रचनाओं ने लोगों को पहिले से अधिक सुखी बनाया है ? बात ठीक उसी अपूर्णांक (fraction) के समान है जिसके अंश और हर (Numerator and Denominator) दोनों बढ़ा दिये गये हों, अपूर्णांक दूसरा मालूम पड़ने लगे, वह बढ़ा हुआ प्रतीत हो, परन्तु वस्तुतः वही अपूर्णांक सम अनुपात से बढ़ा हुआ होता है । यदि तुम्हारी आमदनी या सम्पत्ति बढ़ गई है तो तुम्हारी अभिलाषाऐं भी तो बढ़ गई हैं । यह कुत्ते की दुम की तरह है । जितनी देर तुम उसे सीधी पकड़े रहोगे उतनी देर वह सीधी रहेगी, किन्तु ज्यों ही आप उसे हाथ से छोड़ेंगे, त्यौंही वह फिर पहिले की सी ऐंठी हुई दिखाई देगी । इस तरह पर वह लोग जो सुधार करने की इच्छा से उठते या चलते हैं, जो लोग इस तरह पर ब्रह्माण्ड में गुल मचाते हैं. वे स्वयं धोखे में हैं । युवकों ! याद रक्खो, संसार के संबंध में किसी काम को शुरू करके तुम बड़ी भूल करते हो । अपना आकर्षण-केन्द्र (centre of gravity) अपनेसे बाहर मत जमाओ । निश्चय से जानो और अनुभव करो अपने वास्तविक ईश्वरत्व का, जिस क्षण तुम ईश्वरत्वभाव से परि-

पूर्ण हो जाओगे, उसी क्षण अनायास सदा के लिए जीवन, शक्ति, और उत्साह की धारा बहने लगेगी । सत्य को फैलाने का यही उपाय है ।

आर्कीमेडिस ( Archimedes ) कहा करता था, "मैं अखिल विश्व को हिला दे सकता हूं यदि मुझे कोई स्थिर बिन्दु (स्थल) मिल जाय" । परन्तु बेचारे को स्थिर बिन्दु कभी नहीं मिला । वह स्थिर बिन्दु तुम्हारे भीतर है, उसे पकड़ो, उसे ढूंढो, उसे निश्चयसे जानो, उसे प्राप्त करो, यह अनुभव करो कि मैं ब्रह्म हूं, मैं प्रभुओं का प्रभु हूं, अखिल न्यायाधीश हूं, अखिल सौंदर्य हूं, सम्पूर्ण बल और शक्ति की योनि ( मूल ) हूं, अनुभव करो कि अखिल विश्व का मैं पति हूं, मैं वही ( ब्रह्म ) हूं; और अपने वास्तविक स्वरूप का यह अनुभव आप ही समग्र संसार जीत लेगा, संसार को जीवन देगा, और संसार को गतिशील बना देगा ।

सूर्य अपना सब काम वेदान्त के अनुसार या वेदान्त के सिद्धान्तों पर किया करता है । वह समग्र संसार के जीवन और उद्योग का उत्पत्तिस्थान व मूल है । सूर्य वेदान्ती है । राम ने तुम्हें जो शिक्षा दी है उसी को मान कर सूर्य चलता है । सूर्य ऐसा ही करता है । वह संसार को अखिल जीवन, अखिल उद्योग शक्ति देता है, परन्तु अकर्त्ता-भाव से देता है, उसमें अहं मम भाव नहीं है, उसमें स्वार्थ परता नहीं है, उसमें आत्मश्लाघा नहीं है । वह अपने को उद्यम से परिपूर्ण रखता है; वह समस्त बल, समस्त उद्योग, समस्त तेज और समस्त चेष्टा है । इसलिये जब तुम उठते हो और सूर्योदय होता है, तो क्या वह अपने आगमन की कोई विशेष घोषण करता है ? क्या वह इसके सम्बन्ध में कोई

पुस्तक या पोथी लिखता है ? क्या वह इस विषय में कोई हल्ला मचाता है ? हो नहीं, परन्तु तुम देखते हो कि (सूर्योदय से) समस्त भूमि, आपका यह समग्र संसार संजीवित हो जाता है, आपकी इस भूमि में जान आ जाती है । अहा ! कितने धीरे धीरे, कितने क्रमशः, कितनी मन्द-गामी से, परन्तु निश्चय पूर्वक प्रकृति जाग उठती है, नदियें जाग उठती हैं । आप जानते हैं रात को नदियां जम जाती हैं. किन्तु सूर्य आकर उन्हें गरमा देता है, उनको जीवन देता है. और वे बहने लगती हैं । नदियों और झीलों के तटों के गुलाब और पुष्प सूर्य की उष्ण और प्रिय किरणों से खिल उठते हैं ।

फिर मनुष्यों के नेत्र-कमल खिल उठते हैं, अथवा दूसरे शब्दों में मनुष्य भी जाग पड़ते हैं और जीवन तथा उद्योगिता से भर जाते हैं । हवा डोलने लगती है, वायु जीवनमय और उद्योगशील हो जाती है, क्योंकि सूर्य में जीवन और कर्मण्यता है, और उसके द्वारा ही समस्त संसार में प्रकाश और उद्योग प्रवाहित होते हैं । संसार को संजीवित करने में, तुमको जगाने में, चिड़ियों को गवाने में. और फूलों को खिलाने में सूर्य अपनी वाहवाही ( श्लाघा ) का विचार भी नहीं करता । हरेक बस्तु उसके द्वारा होती है, क्योंकि वह अपने आप पर निर्भर है और अपने भीतरी जीवन पर निर्वाह करता है । यही सिद्धान्त है—अपने भीतरी जीवन पर निर्वाह करो, अपने अन्तरात्मा में स्थित हो जाओ, निश्चय से जानो कि तुम प्रकाशों के प्रकाश हो, प्रभुओं के प्रभु हो, अखिल न्याय, बल, और सौन्दर्य के नियन्ता हो, और सम्पूर्ण अस्तित्व तुम ही से है । ऐसा भान

करो, ऐसा निश्चय करो, इन आध्यात्मिक प्रयोगों को परखो और देखो ।

छोटे लड़के, छोटे बच्चे को प्रफुल्लित और खुश रखने के लिए लोग क्या उपाय करते हैं ? ये सब मूढ़ माता पिता बच्चों के शार्गिद बन जाते हैं । ये सब के सब बच्चे के पाठ याद करते हैं । माता पिता (बच्चों के) शिष्य क्योंकर हैं ? वे बच्चों की भांति बोलना, बच्चों की तरह नाचना, बच्चों की तरह मुँह बनाना शुरू करते हैं । बच्चा, वह नन्हा सा उपद्रवी बालक उनके कंधों पर सवार होता है । बच्चा सरल जीवन बिताता है, बच्चा स्वतंत्र है, उसे किसी का भय नहीं है । तुम्हारे किसी भी डेमासथीन्स या बर्क (Demos-thenes or Burkes) की अपेक्षा बच्चे के फैले हुए ओठ अधिक आदेशक, अधिक प्रभावशाली, और अधिक प्रवर्तक होते हैं । उसकी बात माननी ही पड़ेगी । यह नन्हा सा उपद्रवी, जिसका शरीर अत्यन्त कोमल है, जिसके हाथ और अंग अत्यन्त नन्हें हैं, अपने में विश्वास रखता है, उसकी इच्छा पूरी ही होगी । वह दुर्बल होते हुए भी बलवान है । अपने में निश्चयात्मा होने के कारण वह अपने को ओछा नहीं होने देता । माता-पिता कभी २ अपनी सम्पत्ति बेच डालते हैं; बच्चे की, उस नन्हे से जालिम की भलाई के लिए सर्वस्व निछावर कर देते हैं; और धिक्कार है उस मनुष्य को जो उसकी आशाओं का पालन नहीं करता । बच्चे की शक्ति का रहस्य वेदान्त है । जगत उसके लिए जगत नहीं है; चतुरता उसके लिए तुच्छ है, संपूर्ण शक्ति और परमानन्द से इतर उसके लिए कुछ भी नहीं है, सम्पूर्ण शक्ति उस नन्हे से सरल और मधुर बच्चे के भीतर है । यही लड़के की सफलता का रहस्य है ।

इसी तरह वेदान्त को व्यवहार में लाओ, निश्चय से समझो और अनुभव करो कि मैं सर्व शक्तिमान परमेश्वर हूं, विश्व (ब्रह्माण्ड) का शासन कर्ता हूं, ईश्वरों का ईश्वर हूं, देवों का देव हूं, संसार के सर्व भूतों का अध्यक्ष और अधिष्ठाता हूं; निश्चय से बूझो और जानो, कि "मैं परमार्थ तत्व हूँ"; इसका साक्षात्कार करो और इसे व्यवहार में लाओ, फिर तुम्हें काफी चेले (अनुगामी) मिल जांयगे । बिना विज्ञापन दिये, बिना किसी बड़े आदमी की कृपा पात्र बने और बिना समाचारपत्रों की अनुग्रह दृष्टि के बच्चों को शिष्य मिल जाते हैं । जो कोई बच्चे की तरफ देखता है, वही चेला होजाता है । क्या यह यथार्थ नहीं है ?

वेदान्त को अमल में लाओ और तुम्हें यथेष्ट मनुष्य तुम्हारी बात सुनने को मिल जायेंगे । जब चन्द्रमा निकलता है तब उसके सौन्दर्य ( शोभा ) से आनन्द लेने वालों की कमी नहीं रहती । भारत में दूज के दिन सब लोग घरों से बाहर निकल आते हैं और चन्द्रमा की ओर देखते हैं और उस के भीतर चेतन देवकी उपासना करते हैं । यह तिथि द्वितीया कहलाती है, जिसका अभिप्राय है "आनन्द का दिन" । उस दिन लोग अच्छा भोजन करते हैं, मित्रों और सम्बन्धियों से मिलते जुलते हैं और मौज उड़ाते हैं ।

अपने हृदयों में चन्द्रोदय होने दो और कार्य सम्पादन विधि के लिए व्यथित मत हो । उपाय और साधन तुम्हें खोज लेंगे, उनको तुम्हें खोजना पड़ेगा । जब गुलाब खिलता है तब भौंरों की कमी नहीं रहती । जहाँ शहद ( मधु ) होगा वहाँ चींटियां पहुँच ही जाँयगी ।

इसी तरह केवल अपने हृदयों में मधु पैदा करने की

चिन्ता करो; ज्ञान के पूर्ण खिले हुए गुलाबों को अपने भीतर उत्पन्न करो; तब सब आ जांयगे, तुम्हें किसी की आवश्यकता नहीं रहेगी. तुम्हें किसी प्रकार का अभाव नहीं रहेगा: यदि तुम्हें किसी बस्तु की आवश्यकता भी होगी तो वह आत्म साक्षात्कार की. आत्मानुभव की; तब भी जब तुम इससे पीछे हटोगे तो सब पदार्थ तुम्हें छोड़ जांयगे । जब तुमने अपने परमात्मा दैवत्व का दृढ़ निश्चय से आश्रय कर लिया, जब तुमने उसे खूब जान लिया, और जब तुम जीवन में उसे व्यवहार में ले आवोगे, तब सारा संसार कुत्ते के समान तुम्हारे पैर चाटने की इच्छा करेगा । संसार के पीछे २ मत दौड़ो । सम्पूर्ण शक्ति की कुंजी ( रहस्य ) तुम्हारे भीतर है, अन्यत्र कहीं नहीं है ।

यहां कैलीफोर्निया में शास्ता झरने ( चश्में ) हैं । कहा जाता है कि उनका जल बड़ा ही उत्तम है । हर मनुष्य वहां जाना चाहता है । शास्ता चश्मों को दर्शकों की चिन्ता नहीं होनी चाहिए. उनको किसी प्रकारकी घोषणाएँ नहीं जारी करनी चाहिए, उन्हें लोगों के पास कोई विज्ञापन भेजने की ज़रूरत नहीं । लोग स्वयं उन्हें ढूँढ़ लेंगे और ढूँढ़ने को बाध्य होंगे ।

इसी तरह जिस घड़ी ज्ञान, जीवन, पवित्रता तथा प्रेम शुद्ध और ताजे भरने तुम्हारे हृदय से उमड़ने लगेंगे, उसी घड़ी मानो शास्ता चश्में तुम्हारे भीतर मौजूद होंगे, और दर्शक और लोग तुम्हें ढूँढ़ निकालेंगे । यह अपरिवर्तनीय और अटल नियम है । आवश्यकता केवल इस बात की है कि वे चश्में तुम्हारे अन्दर जारी हों फिर चाहे तुम एक स्थान पर रहो या भ्रमण करते रहो । अपने

भीतर सत्य और परमार्थ की निष्ठा होने के बाद यदि तुम एक स्थान पर रहे तो लोग तुम्हारे पास वहीं आवेंगे यदि तुम घूमते रहे तो तुम्हें ढूँढ़ेंगे । बाहरी वर्ताव पर कुछ भी निर्भर नहीं है । उन चश्मों को अपने भीतर जारी करने का एक मात्र उपाय यही है कि आत्मनिष्ठा की धारा निर्विघ्न और स्वतंत्र तुम्हारे अन्दर बहने लगे ।

कैंट ( Kant ) के बारे में कहा जाता है कि उसे अपनी जन्म-तिथि नहीं मालूम थी किन्तु सारे संसार में वह विख्यात है । एक स्थान पर रहना ही सफलता का रहस्य नहीं है । आध्यात्मीक शक्तिका आवाहन करो और फिर चाहे पलंग ही पर पड़े रहो । तब धिक्कार है संसार को यदि वह तुमसे सत्य को प्राप्त करने के लिये न आवे ।

जब कोई मजिस्ट्रेट आकर अदालत में अपने आसन पर बैठ जाता है, तब सब वादी. प्रतिवादी, वकील और गवाह आप से आप आजाते हैं. मजिस्ट्रेट को उन्हें बुलवाने का कष्ट उठाना नहीं पड़ता. उसे अदालत के कमरे में कुर्सियों को यथा स्थान रखने की चिन्ता करनी नहीं पड़ती, उसे अदालत के कमरे के चित्र-पटों को यथास्थान रखने का भभट करना नहीं पड़ता, उसे वादियों या प्रतिवादियों या गवाहों को आमंत्रण भेजने के लिये हैरान होना नहीं पड़ता; इन सब बातों का प्रबन्ध दूसरे कर लेंगे । राम कहता है वैकुण्ठ के इस आधिपत्व को प्राप्त कीजिये । अपने भीतरी दैवत्व (सम्राट) पर अपना अधिकार जमाइये । हे परम देव ! हे परम प्रभु ! ऐ मनुष्य ! तुम तो चक्रवर्ती हो और तदनुकूल अपने गौरव में विचरो, अपने दिव्य ऐश्वर्य में चलो फिरो, तुम तो देव हो, अपने दिव्य भाव में

अग्रसर हो । अपने व्यापार विषयक मामलों के लिए, अपनी पोशाक के लिए, अपने रेल-मार्ग, सम्पत्ति और घर के लिये व्यग्र मत हो । इन चीजों के लिये चिन्ता मत करो, यह बाह्य प्रपञ्च का कार्य है; यह उनका काम है जो अधिकारापन्न हैं । आओ, अपने देव भाव का. अपने ईश्वरभाव का अनुभव करो । अपने को सूर्यों का भी सूर्य अनुभव करो । और चन्द्रमा, नक्षत्र, तथा देवदूत तुम्हारी टहल करेंगे । उन्हें ऐसा करना पड़ेगा । यही नियम है । यही सत्य है । और इसे सफलता की कुंजी बता कर वेदान्त इसी का प्रचार करता है ।

जिस क्षण तुम अपने दिव्य स्वरूप में स्थित होगे, जिस क्षण तुम अपने असली स्वरूप का अनुभव करोगे, जिस क्षण तुम अपने वास्तविक स्वरूप को जान लोगे, उसी क्षण तुम्हारी शक्ति महान होगी, उसी क्षण संसार तुम्हारी ढूंढ में लगेगा उसी क्षण विश्व तुम्हारी कृपा की भीख मांगेगा ।

और देखिये, लोगों का यह समझना संसार की बड़ी भारी भूल है कि सफलता नियमों और बनावटी कानूनों से प्राप्त की जा सकती है, या सफलता सर्वशक्तिमान धन पर, उपकार, सहायता. रुपए-पैसे, नौकरों, मित्रों और सम्बन्धियों पर निर्भर है । अरे, इसी तरह तो वे अपने को चौपट करते हैं । इस तरह के प्रयत्न वैसे ही हैं जैसे बुलबुल को बनावटी तौर पर गवाने की चेष्टा करना ।

फाख़ता ( कपोत ) को ही ले लीजिए । यादि हिमालय के ऊंचे स ऊंचे सरू वृक्ष पर वह बैठने पावे तो स्वतः प्रेरित होगी और मधुर ध्वनियां उससे खुदबखुद निकलने लगेंगी । हिमालय की मनोरम चोटियों पर. गुलाबों पर बैठी हुई बुल-

बुल मधुर तान से गाती है, ऊंचे स्वरों में अलापती है । राम कहता है, ठीक इसी तरह जब तुम आत्म-साक्षात्कार की मनोरम चोटियों पर बैठ जाते हो, जब तुम वहां निश्चिन्त रूप से जम जाते हो, जब तुम अपने दिव्य स्वरूप में दृढ़ता से घर कर लेते हो: तब तुम्हारे दिव्य स्वरूप द्वारा तुम्हारे कार्य, तुम्हारा श्रेष्ठ जीवन, तुम्हारा शुद्ध आचरण, तुम्हारे उत्कृष्ट कर्म, अवश्य अंकुरित होते हैं, आप से आप फूट निकलते हैं, उगते हैं पल्लवित होते हैं, यही ढंग है ।

सुधारक लोग नियम और कानून बनाकर महापुरुष व प्रभाव शाली पुरुष पैदा किया चाहते हैं और वे उनको आदेश दिया चाहते हैं तथा अपने को दूसरों का परिचक बनाते हैं । यह अस्वाभाविक है, इससे काम न चलेगा ।

लोग कहते हैं 'अरे ! हम तो अभ्यास चाहते हैं,' राम कहता है, भाई ! अभ्यास आवेगा कहां से ? देखो बाहरी कामों के द्वारा यह अभ्यास करना बुलबुल के बनावटी गाने के समान है । बुलबुल का गला पकड़ कर और उससे यह कहकर कि बुलबुल मेरे पास आजा और गा' हम बुलबुल के मधुर गीत नहीं निकलवा सकते । जिस क्षण बुलबुल या फाख़ता स्वतंत्र होती है । उसी क्षण बुलबुल गाती है और फ़ाख़ता गुटकती है । इससे जिस क्षण तुम अपने केन्द्र में स्थित होते हो. जिस क्षण तुम अपने ब्रह्मत्व में विराजमान होते हो, जिस क्षण तुम अपने (ईश्वरत्व) में घर कर बैठते हो. जिस क्षण तुम आत्मानुभव के ऊंचे ऊंच शिखरों पर पहुँच जाते हो: उसी क्षण तुम्हारे द्वारा उत्तम अभ्यास शूरवीरता के कार्य उसी तरह पर उमगने लगते हैं जिस प्रकार फ़ाख़ता

कूकती है और बुलबुल मधुर मधुर गाती है जबकि वह ठीक जगह पर बैठी होती है; यही सच्चा सीधा मार्ग है ।

कल्पना करो कि यहां पर एक लोहे का टुकड़ा है और हम लोहे के इस छोटे से टुकड़े को चुम्बक बना कर लोहे के दूसरे टुकड़ों को इसके पास घसीटना चाहते हैं । यह हम कैसे कर सकते हैं ? केवल लोहे के उस छोटे टुकड़े को आकर्षण-शक्ति-सम्पन्न बनाने से । यही असली उपाय है कि लोहे का यह छोटा टुकड़ा ऐसा बनाया जाय कि लोहे के दूसरे छोटे टुकड़ों को खींच ले और पकड़ ले । अभी यह छोटा लोहे का टुकड़ा लोह के दूसरे छोटे टुकड़े को पकड़ नहीं सकता, और ऐसा कर सकने की योग्यता उसमें उत्पन्न करने के लिए हमें पहले उस चुम्बक में बदल देना होगा । अब हम यह कल्पना करते हैं कि यहां पर एक चुम्बक है, अब इस चुम्बक के साथ पहले लोहे के टुकड़े को युक्त कीजिये जिससे पहला लोहे का टुकड़ा भी चुम्बक हो जाय और दूसरे लोहे के टुकड़े को खींच व पकड़ सके । अब यह पहला टुकड़ा चुम्बक में बदल दिया गया, परन्तु सच्चे चुम्बक से आप इस पहले टुकड़े को अलग कीजिये तो इस की ताकत जाती रहेगी और वह टुकड़ा लोहे के दूसरे टुकड़े को न पकड़ सकेगा । याद रहे, जब तक लोहे का पहला टुकड़ा सच्चे चुम्बक से जुड़ा हुआ या सम्बद्ध है, तब तक वह भी चुम्बक है, तब तक उसमें चुम्बक के सब गुण मौजूद हैं, और लोहे के चाहे जितने टुकड़े हों उनको थाम सकता है । जिस क्षण हम इस पहले लोह-खण्ड का सम्बन्ध असली चुम्बक से तोड़ देते हैं, उसी समय इस की ताकत जाती रहती है, और यह लोहे के दूसरे टुकड़ों को पकड़ रखने के असमर्थ हो जाता है ।

इसी तरह कल्पना करलो, यहां एक शरीर है, हम उसे मानो ईसा कहते हैं । वह बड़ा अच्छा शुद्ध मनुष्य था । वह क्या है ? अपने जीवन के पहले तीस वर्षों में वह लोहे के इस छोटे टुकड़े के तुल्य था, कोई उसे नहीं जानता था, वह एक बढ़ई का लड़का था, वह बड़ा गरीब लड़का था और अज्ञात माता का पुत्र था, वह हेय वा घृणित समझा जाता था, अब इस लोहे के टुकड़े ने अपने वास्तविक स्वरूप आत्मा से अर्थात् आकर्षण-शक्ति के मूल रूप चुम्बक से, सम्पूर्ण जीवन और शक्ति के केन्द्र से अपना सम्बन्ध जोड़ लिया । उसने परमात्मा से, सत्य स्वरूप से, आत्म साक्षात्कार तथा शक्ति स्वरूप स अपना नाता जोड़ लिया । फिर उसका क्या हुआ ? लोहेका वह टुकड़ा भी आकर्षण-शक्ति से सम्पन्न हो गया, वह एक चुम्बक हो गया, और लोग उसकी ओर खिंच आये, चेले और बहुतेर लोग उसकी ओर आकृष्ट हुए, स्वभावतः वे लोग उसके सामने झुकने लगे । उसके जीवन के अन्तिम दिनों में ऐसा समय आया कि ज्यों ही ईसा का शरीर, जिसे लोहे का टुकड़ा कहा गया है, चुम्बक से अर्थात् आत्मा से वियुक्त होगया, त्यों ही लोहे के जितने टुकड़े इसमें लगे हुए थे सब के सब गिर गये, उसके सब चेलों ने उसे छोड़ दिया; जेरूसलेम के उन्हीं लोगों ने जो उसे पहले पूजते और प्यार करते थे, जिन्हों ने पहले उसका शाही स्वागत किया था, जिन्हों ने उसके सम्मान के लिए नगरों को सजाया था, सब ने उसे छोड़ दिया । उसकी ताकत ठीक उसी तरह जाती रही जैसे लोहे के टुकड़े से चुम्बक की ताकत हटा लेने से लोहे के टुकड़े की जाती रहती है; अब उसमें चुम्बक के गुण बाकी नहीं रहे । जब उसके चेलों ने उसे छोड़ दिया, जब उन ग्यारहों ने उसे छोड़ दिया और

लोग उस से ऐसे फिर गये कि उन्हों ने उससे बदला लेना चाहा, बल्कि उसे सूली देना चाहा; उसी समय ईसा ने कहा था, "ऐ पिता, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया है"। इससे स्पष्ट होता है कि सम्बन्ध टूट गया था। देखो, ईसा की ज़िन्दगी तुम्हें क्या सिखाती है। वह सिखाती है कि ईसा की समग्र शक्ति और नेकी, इस सच्ची आत्मा या चुम्बक से सम्बन्ध या संयोग रखने में थी। जब ईसा का स्थूल शरीर सच्ची आत्मा या चुम्बक से संलग्न था, तब ईसा का शरीर भी चुम्बक था। परन्तु जब ईसा का शरीर सच्ची आत्मा या चुम्बक से अलग होगया, तब उसकी शक्ति जाती रही, और उसके चेलों ने तथा अनुयायियों ने उसे त्याग दिया। अपनी मृत्यु के पहले ईसा ने आत्मा से पुनः संयोग स्थापित कर लिया था। आप जानते हैं, कि सूली मिलने के समय ईसा की मृत्यु नहीं हुई थी, यह तथ्य सिद्ध किया जा सकता है। वह समाधि की अवस्था में था, जिस अवस्था में प्राणों की सब चेष्टाएँ (व्यापार) रुक जाती हैं, जब नाड़ी की गति बन्द हो जाती है, जब मानो रक्त नसों को छोड़ जाता है, जब जीवन का कोई भी लक्षण नहीं रह जाता, जब शरीर को मानो सूली दे दी जाती है। ईसा ने तीन दिन तक अपने को इसी हालत में रक्खा और योगी की भाँति पुनः जीवन को प्राप्त किया और भाग कर काश्मीर में फिर आकर रहने लगा। राम काश्मीर गया है, और ईसा के वहाँ रहने के बहुत से चिन्ह उसे मिले हैं। तब तक काश्मीर में ईसाइयों की किसी सम्प्रदाय का कोई दल नहीं था। वहां बहुत से स्थान ईसा के नाम से विख्यात हैं, ऐसे स्थान जहाँ ईसाई कभी नहीं आये थे। कुछ नगरों के भी वही नाम हैं जो जरूसलीम के उन अनेक नगरों के

हैं जिनमें से होकर ईसा गुज़रा था। वहाँ दो हज़ार वर्ष की पुरानी एक क़ब्र है। यह बड़ी पूज्य मानी जाती है और ईसा की क़ब्र कहलाती है। हिन्दुस्तानी में क्राइस्ट का काम ईसा है। ईसा के माने हैं राजकुमार। इस तरह के बहुत से ऐसे प्रमाण हैं जिनसे सिद्ध होता है कि ईसा भारत आया था, जिस भारत में उसने अपने उपदेशों की शिक्षा पाई थी।

इसके सिवाय, भारत में एक प्रकार का छूमंतर जादू की तरह लाभ पहुँचानेवाला मरहम है जिसे ईसा मरहम कहा जाता है। जो लोग इस मरहम को बनाते हैं उनका कहना है कि पुनः संजीवित होने के बाद यही मरहम ईसा के घावों में लगाया जाता था। और यह मरहम सब तरह के घावों को अच्छा करने में जादू का सा काम करता है।

ईसा भारत को लौट कर गया था, इस की गवाही बहुतायत से मिलती है। राम यहाँ उसका व्यौरा न देगा। राम तुम से यह कह रहा है कि ईसा ने जब शरीर चुम्बक रूपी ईश्वर से संलग्न कर लिया, तब सारा संसार उसकी ओर खिंच गया। यह सम्बन्ध टूटा कैसे? अनेक कारण थे। बाहरी प्रभाव, लोगों से बहुत मिलना-जुलना, और आध्यात्मिक उत्कर्ष (उन्नत्ति की शिखरों) से बहुत काल तक अलग रहना, इत्यादि। इन्हीं बातों से हम उस परम शक्ति से दूर गिर जाते हैं। आप को मालूम है कि जन समूह को छोड़कर ईसा को पहाड़ की कन्दराओं में शरण लेना पड़ी थी। और अपने एक चेले से ईसा ने कहा था. "मुझे मालूम होता है कि मेरी शक्ति निकल गई, किसने मुझे छू लिया?"। इस तरह पर लोगों के साथ बहुत काल तक रहने और बहुत दिनों तक आध्यात्मिकता की

उन्नति से रहित रहने के कारण यह सम्बन्ध टूटा था। यह बिलकुल स्वाभाविक है, बिलकुल मनुष्योचित है। ईसा के दोषों से भी हमारा हित होता है। हरेक व्यक्ति की जीवनी से हमें लाभ पहुंचता है यदि हम उसका ठीक २ परिशीलन करें। किसी भी मनुष्य की जीवनी के यथार्थ परिशीलन से आप उतनाही लाभ उठा सकते हैं जितना कि ईसा की जीवनी से। राम कहता है कि जिस क्षण तुम अपने को आत्मा से अलग कर लेते हो, उसी क्षण तुम कुछ नहीं रह जाते। अपने को परमेश्वर में लीन रक्खो, अपने को परमेश्वर से अभेद रक्खो, उन आध्यात्मिक उन्नति की उच्च शिखरों से नीचे न उतरो, सत्य को अनुभव करो, फिर तुम वैसे ही चुम्बक हो जैसे लोहे का दुकड़ा चुम्बक है। तुम्हारा शरीर वैसे ही सजीव होजाता है जैसे कि एक छोटे बच्चे को उसका मांस सजीव होता है, उसके सारे अश्रु जिसे उसका तरल शोक कहा जा सकता है वास्तविक होते हैं।

इसी तरह यदि परमेश्वर से तुम्हारी अभिन्नता है, तो तुम पवित्र हो, तुम चुम्बकी शक्ति सम्पन्न लोहे का टुकड़ा हो, और चुम्बक से संलग्न रहते हुए तुम चुम्बक हो जाते हो। यह बात हमें उसी प्रश्न के दूसरे रूप की ओर लेजाती है। हमने मूल स्रोत को, मूल कारण को, शक्ति की वास्तविक कुंजी को बताया है। परन्तु लोग इसे कुछ और ही समझ लेते हैं। जैसे बच्चे में वास्तविक शक्ति सत्य-आत्मा अर्थात् अपने स्वरूप की उपलब्धि से आती है, किन्तु लोग उसके शरीर को महत्व प्रदान करदेते हैं, और बच्चे के जीवन में शक्ति के इस वास्तविक

स्रोत को उन्नत करने के बदले लोग बच्चे के जीवन को पदर्दलित बनालेते हैं। ईसा की जीवनी पढ़ो, और जैसा ईसा ने किया था वैसाही तुम भी करो। ईसा के शरीर पर नहीं बल्कि ईसा की आत्मा पर निर्भर करो, अपने भीतर आत्मा पर निर्भर करो। ईसा होने का सच्चा मार्ग यही है।

वेदान्त भारतवासियों के लिये ही नहीं है। वह ईसाइयों के लिये भी वैसाही है जैसा कि हिन्दुओं के लिए। वेदान्त की दृष्टि से ईसा के नाम से मनुष्य की मुक्ति कैसे होती है, यह समस्या कैसे हल होती है? यह एक कथा से वर्णन किया जा सकता है। एक माता थी, वह बहुत समझ-दार नहीं थी। उसने अपने बच्चे में विश्वास पैदा कर दिया कि बैठक से मिली हुई कोठरी में एक प्रेत रहता है, जो बड़ा बिकट है, कोई बड़ी भयंकर चीज़ है। बच्चा बहुत डर गया और उस कोठरी में पैर रखते सहमता था। एक दिन शाम को जब लड़के का बाप अपने दफ्तर से लौट कर आया तो उसने लड़के से उस कोठरी से एक वस्तु ले आने को कहा। उसे इस समय उस वस्तु की ज़रूरत थी। लड़का डरा हुआ था। अंधेरी कोठरी में पैर रखने की उसकी हिम्मत नहीं पड़ी। और उसने दौड़ कर बाप से कहा, "दादा! मैं उस कोठरी में न जाऊंगा, क्योंकि उसमें एक बड़ा भयंकर प्रेत, पिशाच है, जिस से मैं डरता हूं"। बाप को यह बात नहीं पसन्द आई। वह बोला "नहीं, नहीं, बेटा! वहां न प्रेत है, न पिशाच है, वहां ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो तुम्हें हानि पहुंचा सके, इस लिए जाओ और मैं जो चीज़ मांगता हूं वह ले आओ; किन्तु लड़का न टसका। बाप बड़ा चतुर था, उसने एक उपाय सोचा; इस रोग की,

इस अंध विश्वास की, जो लड़के में जम गया था, एक दवा तजवीज़ की। पिता ने नौकर को अपने पास बुलाया और उसके कान में कुछ चुपके से कहा। जिस कमरे में बाप था उससे नौकर चला गया और पीछे के एक दरवाज़े से बगल वाली कोठरी में जो भूतखाना मान लीगई थी, घुस गया। उसने एक तकिया ले ली और उसके एक कोने पर एक काला कपड़ा डाल दिया। तकिया के जिस कोने पर काला कपड़ा पड़ा हुआ था उस कोने को कोठरी की एक खिड़की की एक दराज से बाहर निकाल दिया, और इस ढंग से बाहर निकाला कि वह विकट जान पड़ने लगा। लड़के का ध्यान उस ओर गया और उसे एक अद्भुत विकट वस्तु दिखाई पड़ी। बाप ने (तकिये के बाहर निकले हुये कोने की ओर दिखा कर) कहा, "यह तो कान सा जान पड़ता है। इस पर लड़के की फुर्तीली कल्पना-शक्ति ने तुरन्त जान लिया कि यह माने हुए प्रेत का कान है, और वह चीख उठा, "दादा, यह तो पिशाच का कान है, मैंने तो तुमसे कहा ही था कि इस घर में प्रेत रहते हैं, अब मेरी बात सच्ची होगई"। पिता ने कहा, "प्यारे पुत्र! तुम्हारी बात ठीक है, पर हिम्मत करो और मर्द बनो, इस छड़ी को ले लो, और हम पिशाच का नाश कर देंगे"। आप जानते हैं, लड़के बड़े वीर हुआ करते हैं, उनमें बड़ा साहस होता है, वे हर काम की हिम्मत कर सकते हैं, और लड़के ने बाप की सुन्दर छड़ी उठा कर एक ज़ोर का हाथ मारा। एक शोर सुनाई पड़ा और कुछ मन्द सा रोना। इस पर अंधेरी कोठरी के भीतर वाले नौकर ने पिशाच के कल्पित कान को फिर कोठरी के भीतर खींच लिया। लड़का इससे प्रसन्न हुआ और दिलेरी से उसने गुल मचाया कि मैं प्रेत पर प्रबल

पड़ रहा हूं। पिता ने ताड़ी बजा कर उसका हौंसला बढ़ाया, उसे पानी पर चढ़ाया, उसकी तारीफ की और कहा, "मेरे प्यारे बेटे! तुम बड़े बहादुर हो, तुम तो बड़े ही दिलेर हो"। किन्तु जब पिता लड़के से इस तरह बात चीत कर रहा था तब दरार से या कोठरी के दरवाजे के बीच की भिरी से पिशाच के दोनों कान दिखाई पड़े। लड़का फिर उत्साहित किया गया और उसने पिशाच की तरफ बढ़कर, कल्पित पिशाच के शिर पर, चोट पर चोट जमानी शुरू की। उसने उसे बारम्बार पीटा और भीतर से रोने की आवाज़ आने लगी, और बाप ने कहा, "सुनो, बेटा! पिशाच परेशानी से रो रहा है; तुम जीत गये, तुम्हारी जय हुई"। लड़का कल्पित प्रेत को पीटता ही रहा और बाप ने उस तकिया को बाहर खींच लिया। पिता पुकार उठा, "ऐ बहादुर बेटे! तुमने पीट कर प्रेत को तकिया बना दिया, तुमने उसे तकिया में बदल दिया"। लड़के को सन्तोष होगया कि यह बात ठीक है; प्रेत, पिशाच, अथवा अन्ध विश्वास चला गया और लड़का बहादुर बन गया, तथा प्रसन्नता से वह उछलने कूदने नाचने और गाने लगा। इसके बाद वह कोठरी में गया और जिस चीज़ की पिता को जरूरत थी वह ले आया। किन्तु क्या कोई समझदार बाप सयाने लड़के के लिए ऐसी दवा तजवीज़ करेगा? कभी नहीं। यह दवा छोटे बच्चों के लिए बहुत अच्छी है, परन्तु सयाने के लिए नहीं। उस छोटे लड़के की इस उपाय से भलाई हुई, इससे उसका काम चल गया, परन्तु सयाने लड़कों के लिए ऐसी दवा की जरूरत नहीं है। हर छोटे बच्चे की ऐसी कल्पनाओं या स्वप्नों को हम विताड़ित कर सकते हैं, यदि हम उनके लिए काफी समय दे सकें। अब

ध्यान दीजिये, वेदान्त कहता है कि इस प्रेतवाली कोठरी के मामले की तरह असली प्रेत लड़के द्वारा तकिया पीटे जाने से नहीं दूर हुआ। प्रेत के भाग जाने का असली कारण लड़के द्वारा तकिया का पीटा जाना नहीं है; बल्कि लड़के में इस विश्वास का प्रकट हो आना है कि कमरे में प्रेत नहीं है। लड़के को यह विश्वास करा दिया गया कि वहाँ प्रेत नहीं है; और वहाँ प्रेत था भी नहीं। लड़के की कल्पना के द्वारा प्रेत कोठरी में आया था वास्तव में प्रेत वहाँ कभी भी नहीं था। मिथ्या कल्पना ने कोठरी में प्रेत को ला बैठाया था, और इसी मिथ्या कल्पना को चंगा करने की ज़रूरत थी। सयाने लोगों की कल्पनाओं का दूसरा ही इलाज है।

लोग पहिले विश्वास करते हैं कि, "हमारा उद्धार नहीं हो सकता, हम स्वभावतः पापी हैं, हम उस भीषण नरक के किनारे पर हैं जिसमें हमें जाना है, भयंकर पापों का समूह हमें नीचे दबाये देता है, आदम के पाप के कारण हमारी प्रकृति पापिनी होगई, स्वभाव से ही हम पापी और संसारी हैं, हम दीन, घिसलनेवाले, और निर्बल जन्तु हैं।" कृपा करके राम को साफ़ २ कहने के लिए क्षमा कीजियेगा। इंजील का एक भाग लोगों में विश्वास पैदा करता है कि उनकी प्रकृति पापिनी हे। (इंजील के) प्राचीन संस्करण (ओल्ड टेस्टामेंट) ने इस संसार के विचारे ईसाइयों के अन्तः-करणों में यह बात जमा दी है; उसने तुम्हारे प्रकाशित हृदय कोष्ठकों में यही बैठा दिया है; उसने तुम्हारे मनों पर, तुम्हारे अखंडनीय आत्मा के कमरे अर्थात् अन्तः करण में पतन का प्रेत (घोस्ट आफ़दी फ़ाल Ghost of the Fall), पापमय

प्रकृति, पददलित, नीच वा दीनात्मा का प्रेत अंकित कर दिया है। ये विचार लोगों के दिलों में बलात भरे गये; ऐसे विचार कि वे संसार में कुछ भी नहीं हैं, केवल तुच्छ जन्तु हैं, दीन कीट के सिवाय कुछ भी नहीं हैं, सचमुच और कुछ भी नहीं हैं सिवाय दीन-हीन कीड़ों-मकोड़ों के जो पवन और तूफान की दया पर निर्भर हैं और इस संसार में अशक्त हैं। पहले संसार के अन्तःकरणों में अंध-विश्वास का भूत बसा दिया गया। तब नया संस्करण (निउ टेस्टामेंट New Testament) आया। राम द्वेष बुद्धि से नहीं कह रहा है। नवीन संस्करण में पिता ने भ्रान्त अंध विश्वास को हटाने की चेष्टा की, जिसे माता (प्राचीन संस्करण) ने लोगों में पैदा करादेया था। नवीन संस्करण में सेन्ट पाल पिता आया और दुनिया के दिलों से इस भूत को हटाने की उसने पूरी कोशिश की। उसने इस भूत से उनका पीछा छुटाने की, उन्हें स्वतंत्र करने की, यथाशक्ति चेष्टा की। उसने कौनसा उपाय ग्रहण किया? राम कहता है, सेंट पाल ने ऐसा नहीं किया, किन्तु ईश्वर ने सेंट पाल के शरीर के द्वारा ऐसा किया और लोगों को बतलाया कि यह (छुटकारा उनका) कैसे हो सकता है। जन समाज को बतलाया गया कि, यह पाप, यह स्थूल पापी प्रकृति, मन की यह नीचता, अँधेरे में यह भटकना, यह पाप, यह पाप और सम्पूर्ण सत्यानाश का प्रेत, एक विशेष तरीके से भगाया जा सकता है। इस तरीके को उस (सेंट पाल) ने शुद्धि या मार्जन (बपतिस्मा Baptism) समझा। ईसाई होने से, सम्प्रदाय में शामिल होकर, वा प्रार्थनाओं में उपस्थित होने से, भूने सुअर को प्रसाद बनाने की प्रार्थना से, धर्माचायों को खूब खिलाने पिलाने से, ईसामसीह की पोशाक (बाना) पहनने से-इन सब कामों के करने से तुम्हारा

उद्धार हो जाता है और तुम्हारा नाम जीवन की पुस्तक में लिख जाता है। इस उपाय को ग्रहण करो; इन रीतियों को बरतो, जो तकिया को पीटने के समान हैं; ये काम करो, ईसा का नाम भजो, गिर्जाघर में गीत गाओ, उपासना वा प्रार्थना करो, पादड़ियों को दान दो, उनको खिला २ कर मोटा करो; इस रीति से तुम्हारा उद्धार हो जाता है। राम कहता है, कि इन कामों को करने से यदि लोगों को सजीव विश्वास की प्राप्ति हो जाय, यदि उनमें सजीव निश्चय पैदा हो जाय कि उनका उद्धार हो गया, तो सचमुच उनका उद्धार हो जाता है। राम कहता है कि यथार्थ में पक्का ईसाई अपने धर्म के नाम में इन कामों को करने के बाद यदि अपना उद्धार हुआ समझता है, तो अवश्य उसका उद्धार होगा, जिस तरह कि लड़के ने पिशाच को पीट कर तकिया बना देने का श्रम किया और फिर कमरे से भूत का अड्डा उखड़ गया, प्रेत, पिशाच वहाँ नहीं रह गया।

इसी तरह यदि आप ईसाई हैं, और अपने उद्धार का आप को दृढ़ विश्वास होता है, तो अवश्य आप का उद्धार हो जाता है। राम उन स्वतंत्रानन्दी विचारकों और नास्तिकों से सहमत नहीं है जो ईसाइयों के जीते जागते विश्वास को भ्रान्ति या गया बीता बताते हैं; ईसाई धर्म की निन्दा करने में राम का मत इन लोगों से नहीं मिलता। यदि आप का निश्चय, धर्म-विश्वास आप के मन को सहस देता और आप में यह धारणा दृढ़ करता है कि आप का उद्धार हो गया, तो ठीक आप का उद्धार हो जाता है। परन्तु साथ ही साथ राम कहता है कि दुनिया अब बच्ची नहीं रही, दुनिया अब सयाने लड़के की दशा में है, इस प्रकार के सिद्धान्त ने अब तक

कोटियों प्राणियों की रक्षा की है; परन्तु अब ऐसा अनुभव करने की चेष्टा करके भूत को आप के कमरों से हका देने का समय आगया है कि:—"आप की प्रकृति पापिनी नहीं है; आप के कमरे में किसी प्रेत का अड्डा नहीं है; आप अभागे, घिसलने वाले कीड़े मकौड़े नहीं हैं; आप की आत्मा पददलित और मलिन नहीं है;" वेदान्त की तरह अनुभव कीजिये कि आप सदा से शुद्ध पवित्र हैं; आप हमेशा से बे दाग हैं; आप सदा से सर्वत्र सम्पूर्ण हैं; अनुभव करो कि हम पवित्रों में परम पवित्र, प्रभुओं के परम प्रभु, परमेश्वर हैं। यही विचारो, यही समझो, यही अनुभव करो, ऐसा ही जीवन व्यतीत करो। जब सामने से हाथ लाकर आप नाक छू सकते हैं, तो मूंड़ के पीछे से हाथ घुमा कर नाक छूने की क्या ज़रूरत है? उपासनाओं वा प्रार्थनाओं द्वारा मुक्ति में विश्वास करने से कोई लाभ नहीं है।

वेदान्त कहता है कि यदि आप अपना यह विश्वास बना सकते हैं कि आप सदैव से मुक्त हैं, तो आप विश्वब्रह्मांड के उद्धारक हो जाते हैं। यदि आप यह निश्चय करें कि आप शरीर कभी नहीं थे, आप कभी दासत्व में बन्धे नहीं थे; यदि आप सयाने लड़कों की तरह हो जाँय और अबोध बच्चे न बने रहें; यदि वेदान्त के स्वर में स्वर मिलाकर आप विश्वास करें कि आप सदैव से मुक्त हैं; यदि आप वेदान्त की तरह अनुभव करें कि आप शक्ति हैं; तो आप अखिल जगत के तारक (मोक्ष दाता) होजाते हैं। अनावश्यक, निरर्थक, और अयुक्त रीतियों में आप अपनी शक्तियों का नाश मत करें। अपना उद्धार करने के लिए तकिया को पीटने की बचपन की रीतियों में अपनी शक्तियों का आप

अपव्यय न करें। अब बच्चे न बनें रहें। आप अपने को मुक्त समझें, और आप मुक्त हैं। इस तरह सम्पूर्ण ईसाई धर्म में रक्षा-तत्व वेदान्त है। वेदान्त सूक्ष्मतर उपाय है। यदि इन सब रीतियों के पूरा हो चुकने पर आप में यह निश्चय दृढ़ हो जाय कि 'मेरा उद्धार होगया', दूसरा कोई विचार बाकी न रहे, तो याद रखिये कि आप की ईसाइयत में वेदान्त व्याप्त और फैला हुआ है, और वही आपकी रक्षा करता है। बाहरी नामों और रूपों तथा रीतियों को अनुचित महत्व न दो।

ईसाइयों की धार्मिक चढ़ाइयों (crusades) से, जिनमें बेहद खून बहा, जूडिया (यहूदियों का देश) में समर और संघर्ष फैला। एक मैदान में ईसाइयों ने मार और हार खाई। ईसाई सेना के एक धर्मोन्मत्त ने, जो नाम और कीर्ति का भूखा था, खबर उड़ा दी कि 'स्वप्न में मुझे एक देवदूत ने दर्शन देकर बताया है कि मेरे पैरों के नीचे एक पैसा भाला तुपा हुआ है जो एक बार ईसा के पैरों में लग गया था, और यह भाला मिल जाने से ईसाइयों की जीत होगी।" लोगों ने यह खबर फैलाना शुरू की, और वह सारी सेना में फैल गई। बात कहां तक सच या झूठ है, इसका विचार किये बिना ही सब के सब लोग वहां भूमि खोदने लग गये, परन्तु भाला न निकला। प्रातःकाल से बहुत रात तक वे खोदते रहे फिर भी भाला न हाथ लगा। वे बहुत निराश हुए, और खोज बन्द करने ही वाले थे कि वही मनुष्य गला फाड़ २ कर चिल्लाने लगा कि "मुझे वह स्थान मिल गया, वह मुकाम मिल गया"। सब के सब उसके साथ उस स्थान पर गये, जहाँ उसने भाला निकलने को बताया था। वहां

उन्हें भाला मिला। भाला बहुत पुराना और जीर्ण था, चींटियों और कीड़ों-मकोड़ों ने उसे चुन लिया था। उस (धर्मोन्मत्त) ने कहा "यह भाला है, इसको मिट्टी ने खा लिया है, इसका अवश्य ईसा के चरणों से स्पर्श हुआ होगा।" और उसने भाले को ऐसी जगह पर ऊंचा कर दिया जहां पर हरेक व्यक्ति उसे देख सके। ईसाई खुशी से भाले के इर्द-गिर्द उछलने लगे, उनके हर्ष की हद न रही। मिट्टी से भरे हुए भाले को पाने के आवेश में बल और उत्साह से परिपूर्ण होकर सब ने एक साथ फिर शत्रु पर धावा किया और विजयी हुए। बाद को जब ईसाई यूरोप को लौटे, तब सब में यही विश्वास जमा हुआ था कि भाले के ही प्रभाव से उन्हें जय, श्री प्राप्त हुई थी। परन्तु कुछ दिनों के बाद वही मनुष्य जिसने उक्त कहानी कही थी, बीमार हुआ. और मरणप्राय होगया। जो धर्माचार्य उसका कल्याण करने आया था उस से उसने कबूला कि भाले की कहानी जाली थी उसने कहा कि भाला वास्तव में मेरे परदादा का था. वह भी सैनिक था। परदादा के मरने के समय से भाला चीथड़ों में लपेटा हुआ घर में रक्खा था। केवल मेरे परदादा ने ही इस भाले का व्यवहार नहीं किया था, बल्कि उन्हें भी अपने पूर्व पुरुषों से यह प्राप्त हुआ था। जब ईसाई जरूसलेम को जा रहे थे, तब मैं इस भाले को जैसा का तैसा लपेटा हुआ अपने साथ लेता गया, किन्तु समरभूमि में वह बेकार जान पड़ा, और भागते समय मुझे यह ख्याल आया कि मैं सर्व प्रिय और साथ ही साथ नामी भी हो सकता हूँ। इस लिए मैंने कथा गढ़ी (रची) और जब लोग मुझ से दूसरी ओर खोद रहे थे तब मैंने खाही में भाले को फेंक दिया और जब लोगों ने आकर वहां

खोदा तो भाला उनके हाथ लग गया। ऐतिहासकों ने भेदियों (छिपकर सुननेवालों) का काम किया और भेद को पाकर प्रकट कर दिया कि भाले की कोई माहेमा नहीं थी, महिमा थी लोगों के पूर्ण विश्वास और उत्साह की। उन्हों ने बतलाया कि जीत का कारण सैनिकों की भीतरी शक्ति थी, न कि भाला। उन्हों ने कहा कि सैनिकों ने अपने भीतर आत्मिक शक्ति उत्पन्न की और लोगों के उसी सजीव विश्वास ने विजय दिलाई; भाले ने कुछ नहीं किया। इसी तरह वेदान्त कहता है, "ऐ ईसाइयों, मुसलमानों, वैष्णवों, सम्पूर्ण संसार के विभिन्न २ धर्मावलम्बियों! यदि तुम यह समझते हो कि ईसा या बुद्ध या कृष्ण अथवा किसी अन्य महात्मा के नाम के कारण तुम्हारा उद्धार होजाता है, तो याद रक्खो कि ईसा में, या बुद्ध में, या कृष्ण में. या किसी दूसरे शरीर में कोई करामात नहीं है, असली करामात तुम्हारे अपने स्वरूप (आत्मा) में है"। विश्वास (faith) और स्वकृत मत (creed) के भेद को समझो। भाले की कहानी लोगों का मत और जीती जागती शक्ति थी। उससे प्रकट हुआ आवेश लोगों का विश्वास कहा जा सकता है। यह सजीव विश्वास ही लोगों का उद्धार करता है, न कि मत वा पंथ। वेदान्त कहता है, यदि यह सजीव विश्वास, यह सजीव शक्ति ही ईसाइयों की विजय का कारण थी तो उसे क्यों नहीं ले लेते, और उस सजीव विश्वास को अपने प्रिय आत्मा में, अपने सच्चे स्वरूप में क्यों नहीं प्रयुक्त करते? उस सजीव विश्वास को आत्मा में, भीतर के सच्चे स्वरूप में क्यों नहीं लगाते? सजीव या निर्जीव विश्वास को ईसा, बुद्ध, या कृष्ण अथवा दूसरों में क्यों लगाते हो?

इस को भीतर की आत्मा में, भीतर के ईश्वर में क्यों नहीं लगाते? कितना सरल उपाय है! सजीव विश्वास का कैसा स्वाभाविक प्रयोग है!!

यह प्रश्न राम से बहुत बारम्बार किया जाता है "यदि वेदान्त ऐसा है, यदि वेदान्त का सार यह है, और यदि वेदान्त का जन्म भारत में हुआ था, तो भारत इतना पददलित क्यों है?" भारत की दुर्दशा का कारण यही है कि लोग वेदान्त को व्यवहार में नहीं लाते। अमेरिका-वासी भारत के लोगों से अधिक वेदान्त पर अमल करते हैं, और इसी से वे ऐश्वर्यवान् हैं। वेदान्त को भारत के पतन का कारण बतलाने का संसार को कोई हक नहीं है। एक सुन्दर कहानी सुनाकर राम इसे सिद्ध करेगा। भारत में एक ग्राम का एक लड़का बड़ा भारी विद्वान होगया। उसने विश्वविद्यालय में पढ़ा था, और विश्वविद्यालय के नगर में रहने से उसमें कुछ यूरोपीय ढंग आ गये थे। आप जानते हैं भारत के लोग बड़े ही स्थिति पालक (conservative) होते हैं। और बहुत थोड़े दिनों से ही वहां यूरोपीय रीति-नीति का प्रवेश हुआ है।

राम ऐसे बहुतेरे लोगों को जानता है जिन्हों ने अंग्रेजी विश्वविद्यालयों में अभ्यास तो किया है परन्तु वे अंग्रेजी पोशाक कभी नहीं पहनते, अंग्रेजी भाषा कभी नहीं बोलते। माता पिता ऐसी गुस्ताखी अपने सामने नहीं सह सकते। अस्तु, इस लड़के ने विश्व विद्यालय के नगर में एक घड़ी खरीदी। गर्मीं की तीन महीनां को छुट्टी में वह अपनो दादी के यहां रहा। वहा उसे घड़ी की जरूरत जान पड़ी। वह घड़ी को अपनी दादी के यहाँ ले गया। दादी स्वभावतः घर में

इस अनाहूत प्रवेश (intrusion) के विरुद्ध थी। युवक कोई अंग्रेजी वस्त्र तो अपने साथ नहीं लाया, परन्तु उसने समझा कि अध्ययन के लिए घड़ी का होना अत्यावश्यक है। उसे अंग्रेजी कुर्सी या मेज़ लाने का साहस नहीं हुआ, क्योंकि ये चीज़ें तो बड़ी भीषण समझी जाती थीं। परन्तु सब आपत्तियों के लिए तैयार होकर वह घड़ी ले आया। सारा परिवार इसके विरुद्ध था, दादी विशेष करके थी। वह इस अनधिकार प्रवेश (intrusion) को नहीं सह सकी। उस के लिये तो यह बड़ी ही भयानक बात थी। उसने कहा, "देखो, यह हर क्षण टिक टिक का अप्रिय शब्द किया करती है इसे तोड़ डालो, नष्ट करदो, बाहर फेंक दो, यह एक अपशकुन है. यह किसी भीषण चीज की सृष्टि करेगी, यह किसी भीषण दुर्घटना का कारण होगी।" दादी किसी तरह से भी नहीं मानी। नवयुवक ने समझाने की यथा शक्ति चेष्टा की, परन्तु वह राज़ी न हुई। दादी के रोष क्षोभ का ख्याल छोड़ कर लड़के ने घड़ी को अपने पढ़ने के कमरे में ही रक्खा। संयोग से घर में चोरी हो गई। कुछ गहना और नगदी चोरी गयी। दादी को अपने पत्त पुष्ट करने के लिए एक और बात हाथ लगी। उसने चिल्ला कर कहा "क्या मैंने नहीं कहा था कि यह घड़ी आफत बरपा करेगी? चोर हमारा गहना और रुपया चुरा ले गये किन्तु घड़ी नहीं चुराई गई। वे जानते थे कि घड़ी ले जाने से हमारा सत्यानाश हो जायगा। अरे, इस आफत की पुतली (घड़ी) को म घर में क्यों रक्खे हुए हो?" लड़का बड़ा हठीला था। दादी की सारी हाय हाय व्यर्थ हुई। लड़के ने अपने पढ़ने के कमरे में घड़ी को रक्खा और कुछ ही दिनों बाद लड़के का बाप मर गया।

तब तो दादी बहुत ही विकल हुई। उसने हाहाकार किया, "ऐ हठी लड़के! इस अशकुन को घर से निकाल बाहर कर। अब एक क्षण भी इसे रखने की हिम्मत तुझे कैसे होती है?" लड़के ने इस पर भी घड़ी रहने दी। फिर थोड़े ही समय के बाद लड़के की माता भी मर गई। तब तो दादी किसी तरह भी घड़ी को घर में न रख सकी। अन्य बहुतेरे लोगों की तरह उसने समझा कि घड़ी में कोई कीड़ा है, क्योंकि कभी किसी वस्तु को यंत्र से चलते उन्हों ने नहीं देखा था; इस लिये उसने समझा कि घड़ी में कोई कीड़ा अवश्य है, और वही इसे चलाता है।

आप से आप घड़ी के टिक २ करने और चलने की बात उसके मन में बैठ ही नहीं सकी। कुटुम्ब के सब क्लेशों का कारण उसने घड़ी ही को समझा। इस लिए वह घड़ी अपने निजी कमरे में उठा ले गयी, और एक पत्थर पर उसे रख कर दूसरे पत्थर से चूर २ कर दिया। घड़ी से उसने अपना बदला चुका लिया। अब कृपा करके ध्यान दीजिये। आप भारतीय दादियों की दशा पर हँस भले ही लें, परन्तु दूसरी बातों में आप भी उन्हीं दादियों की तरह कर रहे हैं। लोग जिस तिस का सम्बन्ध जोड़ कर किसी नतीजे पर जा धमकते हैं, और कहते हैं कि अमुक वस्तु अमुक बात का कारण है। यूरप वासी विशेषतया पक्षपाती होते हैं, और इस नतीजे पर भट फाँद पड़ते हैं कि "वेदान्त ही भारत के पतन का कारण है"। इसी तरह इस संसार की दूसरी बातों में भी वे अपने तर्क-वितर्क के परिणामों पर फाँद पड़ते हैं।

अमेरिका और यूरोप के उत्थान का कारण ईसा की

व्यक्ति नहीं है। अज्ञात रूप से अमल में लाया हुआ वेदान्त ही यथार्थ कारण है। व्यवहार में वेदान्त का न होना ही भारत के अधोपतन का कारण है।

सम्पूर्ण जगत को उठाने में मातायें क्या भाग लेती हैं, इस विषय में राम कुछ इस स्थल पर कहेगा। संसार के सब महान नायक महान दादियों के बच्चे थे।

माताएँ ही सब संसार को उठा सकती हैं। माताएँ ही देश को उठा या गिरा सकती हैं। माताएँ ही प्रकृति के प्रवाह में ज्वार भाटा ला सकती हैं। श्रेष्ठ माताओं के पुत्र सदा ही महान नायक हुआ करते हैं। यदि बाल्य काल में ही बच्चे में ये सच्चाइयें भर दी जायँ, यदि बचपन में ही बच्चे को सच्चे स्वरूप की प्राप्ति का पाठ पढ़ा दिया जाय, तो वह बड़ा होने पर कृष्ण या ईसा बन सकता है।

माताएं अपने बच्चों की प्रकृति को विगाड़ सकती हैं या उत्तम व उच्च कर सकती हैं। यह माताओं का कार्य्य है। तुमने स्पार्टा की उस माता की कथा सुनी है जिसने रण क्षेत्र को जाते हुए अपने पुत्र से कहा थाः-"ऐ बेटा! या तो तलवार को लिए हुए आना या तलवार पर आना; बिना तलवार के न आना। अर्थात् मेरे पास या तो जिन्दा आना, या मुर्दा; परन्तु पराजित होकर मत आना"।

भारत वर्ष में एक रानी थी। जब उसका पति हार कर रण से भाग आया, तो उसने नगर के फाटक बन्द करवा लिए, और अपने पति को नगर में न घुसने दिया। उसने पति से कहला भेजा, "ऐ विश्वास घाती! दूर हो, तू मेरा पति नहीं है, तूने रण में पीठ दिखाई है; मैं अब तुझे नहीं ग्रहण

करूंगी; दूर हो, तू मेरा पति नहीं है"।

एक भारतीय रानी की कथा सुनाता हूं जिसने अपने सब बच्चों को पूर्ण बनाने की प्रतिज्ञा की थी। उसने अपने सब बच्चों को आवागमन से छुटा देने का संकल्प किया था। अपने बच्चों को आवागमन से मुक्त कर देने का भारतीय माताओं का एक मात्र लक्ष्य और उद्देश्य होता है। ज्ञानवान मुक्त होता है और उसका पुनर्जन्म नहीं होता। उस माता ने अपने समस्त राज्य को भी आत्मानुभावियों और ईश्वर-भक्तों से परिपूर्ण करा देने की शपथ ली।

उसने अपने सब प्रजा जनों को भी नर नारायण बनाना चाहा। यह एक माता का एक संकल्प था, और उसे सफलता हुई। उसके पुत्र नर-तन धारी नारायण हुए। वे कृष्ण हुए, बुद्ध हुए, तत्वज्ञानी हुए, त्यागी हुए, और सम्पूर्ण समाज पर शासक हुए थे। उसकी सारी प्रजा बन्धन मुक्त हो गयी। एक नारी ने यह कर दिखाया। किस तरह? जब उसके बच्चे बिल्कुल छोटे थे तब ही से वह उन्हें लोरी गा गा कर सुनाया करती थी। जब वह उन्हें दूध पिलाती थी, तब लोरी गा कर सुनाया करती थी; वह अपने दूध के साथ ब्रह्मज्ञान उनमें भरा करती थी। पालने को झुलाते समय जब वह उन्हें सुलाने के गीत गाया करती थी, तब वह वेदान्त का दूध उनमें पेवस्त किया करती थी।

शुद्धोऽसि, बुद्धोऽसि, निरञ्जनोऽसि। संसार-माया परिवर्जितोऽसि॥ संसार-स्वप्नः त्यज मोह निद्रा। मंदालसा वाक्यमु वाचपुत्रः॥

(1) (इस श्लोक के अभिप्राय का अंग्रेजी में कविता राम से बही थी जिसका हिन्दी अनुवाद नीचे दिया जाता है)

सो जा बच्चे! सो जा, सो जा मुन्ना! सो जा। सो जा लल्ला! सो जा, सो जा सो जा सो जा॥

सिसक चीख़ मत, रो न कभी तू, कर अविघ्न आराम सदा तू। दूर फेंक सब भय बाधाएँ, गुण गंधर्व सभी तब गाएँ॥ सुंदरताई संपतियों का. तथा नियामक ऋद्धि-सिद्धि का। है निर्दोष आत्मा तेरा, शासक उन्नायक सुबडेरा॥

सो जा बच्चे! सो जा, सो जा मुन्ना! सो जा।

मृदु गुलाब, सित मधुर ओस-कण, महक, मधु, सुखद ताप, मृदुपवन। मधुरालाप अति प्रिय तानें, कान नयन अच्छा जो जानें॥ सो तेरे स्वर्गीय भवन से, आता है कल्याण-भवन से। शुद्ध, शुद्ध तू निर्विकार है, निष्कलंक तू ॐकार है॥

सो जा बच्चे! सो जा, सो जा लल्ला! सो जा।

शत्रु, मीति, शंका नहिं कोई, अमर! न छू सकता है कोई। मीठी, प्रिय, मृदु, शांत, अति कालित, निद्रा से आत्मा परिपूर्ति॥ तू ही तारामय अंबर छो, जटित तथा कमनीय शिखर को। उठा रहा शिर पर ऐ प्यारे! ॐकार के रूप दुलारे!

सो जा बच्चे! सो जा, सो जा लल्ला! सो जा।

सूर्य चन्द्र गेंदें क्रीडा की, घर महराबें इन्द्र धनुष की। राहें तव पय-सरिस उजेरी, मेघ करें मिल बातें तेरी॥ गुड़ियाँ तेरी सकल दिशाएँ, सदा घूमतीं नाचें गाएँ। वे तेरी स्तुति करती हैं, ॐ ॐ सत्सत् करती हैं॥

सो जा बच्चे! सो जा, सो जा लल्ला! सो जा।

कुमुद कमल में झील सरो माधि, देखे मधुर क्या तव शायित छवि। देश-काल की गरम कंबलें, सुप्त बाहु से तव मुख खोलें॥ करवट में दिखलाई दे तू, बच्चे जैसा सोता है तू। हंसते हुए नेत्रों वाले! प्यारे सुत नटखट ममवाले!

सो जा बच्चे! सो जा, सो जा लल्ला! सो जा।

ऊंची कड़ी कूक कोयल की, तेरी प्रिय गुड गुड गुड सीटी। तारे पवन विहंग पिदुकियाँ, हैं सु-खिलौने बाल-गाड़ियाँ॥ यह अपार संसार-प्रसारा, है कौतुकमय स्वप्न तिहारा। यह सब तेरे भीतर ही है, यद्यपि दिखता बाहर ही है॥

सो जा बच्चे! सो जा, सो जा लल्ला! सो जा।

ऐ जाग्रत-घर निद्रा सुख के, सक्रिय स्रोत गंभीर बुद्धि के! जीवन और कर्म के कैसे, शांति-भरे चश्मे के ऐसे! विषम विरोध और संघर्षण, के ऐ प्यारे सुंदर कारण! सीमाकारी अंधकार के, अंतिम नमस्कार तू कर ले।

सो जा मुन्ना! सो जा, सो जा लल्ला! सो जा।

सुंदर मनहर चीजें सारी, उड़ते हुए परों की न्यारी। हैं खुशामदी ध्वनियाँ जारी, हे आनंद-स्वरूप गरुड़ जी! तव अंखों की चलती छाबा, मोह युक्त सुंदरता-माया। आधी कभी प्रकट करती है, अर्ध छिपाती घूँघट इव है॥ इस घूँघट के ओढ़न वाले! मधुर ॐ अति आनंद वाले! तू सच्चा-स्वरूप है ॐ, ॐ ॐ तत्सत् तू ॐ॥

सो जा भैया! सो जा सो जा बेबी! सो जा। सो जा लल्ला! सो जा सो जा, सो जा, सो जा॥

वह रानी अपने सातों लड़कों को जिस तरह की लोरियां सुलाती थी उनका यह एक नमूना है। जब लड़कों

ने घर छोड़ा, तब वे ईश्वर भाव से परिपूर्ण हुए विचरने लगे। उनके द्वारा वेदान्त का प्रसार हुआ। आठवें लड़के की शिक्षा ठीक ऐसी नहीं हुई थी, क्योंकि पिता नहीं चाहता था कि वह राज-पाट छोड़ कर चला जाय। उसे पूर्ण स्वतंत्र मनुष्य बनाने की आवश्यकता नहीं थी। इस लिए माता ने इस लड़के को ऊपर की लोरी नहीं गा कर सुनाई। परन्तु किसी न किसी तरह उसे अपने इस प्रतिज्ञा की रक्षा करनी थी कि "लड़के को इस जीवन में किसी तरह का दुःख पीड़ा भोगनी न पड़े"। चूंकि आठवें लड़के से राज पाट छुटाना मंजूर नहीं था, इस लिए इसकी शिक्षा अन्य सातों की सी नहीं हुई थी। आठवां लड़का एक धाय को सौंप दिया गया। किन्तु जब माता मरने लगी, तब यह लड़का उसके पास लाया गया, और माता ने उक्त ज्ञान (गीत वा लोरी) लड़के को दे दिया। गीत कागज़ पर लिखा था और किसी ऐसी बहुमूल्य वस्तु में लपेटा हुआ था कि जिस पर रत्न लगे हुए थे। माता ने इसको लड़के की भुजा में बांध दिया, और इस तावीज़ को बहुत ही पवित्र रखने को कह दिया। माता ने लड़के से कहा, "इसके भीतर के कागज को पढ़ना, उस पर विचार करना, मनन करना, और वह तुम्हें स्वतंत्र बना देगा, तुम्हारे सब दुख हर लेगा"। उसने लड़के से कहा कि "घोर संकट पड़े बिना इस ताबीज को न खोलना"। माता और पिता दोनों मर गए। लड़का राजा हुआ, और बहुत दिनों तक राज्य करता रहा।

एक दिन लड़के के बड़े भाई अपने पिता की राजधानी में आये। उन्हों ने अपने छोटे भाई से, जिसका नाम अलक था, कहला भेजा कि "सिंहासन खाली कर दो, क्योंकि बड़े

भाई होने के कारण सिंहासन के हम न्यायसंगत उत्तराधिकारी हैं, और सब से बड़े भाई के लिये तुम्हें राजगद्दी छोड़ देना चाहिए"। जब अलक को बड़े भाई ने यह धमकी दी, जब सब से बड़े भाई के उत्तराधिकारी होने की धमकी उसे मिली, तब वह भय से काँपने लगा। वह डर गया और उसे कोई उपाय न सूझा। अपना सब गौरव और वैभव छिन जाने की आशंका से वह रोने लगा। रात को सोने के समय उसका ध्यान अपनी बाँह के यंत्र (तावीज़) पर गया और माता के अन्तिम शब्द उसके मन में बिजली की तरह कौंध गये। उसने यंत्र को खोला और कागज को पढ़ा। अश्रुपूर्ण नेत्रों से उसने पढ़ा, "तू शुद्ध स्वरूप है, तू निर्विकार है, तू सम्पूर्ण ज्ञान है, सम्पूर्ण शक्ति है, तू सम्पूर्ण शक्ति का नियामक है, तू संसार में सम्पूर्ण सौन्दर्य और आनन्द का दाता और प्रतिपालक है। अपने को शरीर मत समझ, सांसारिक पदार्थों पर भरोसा मत कर, उनसे ऊपर हो। इस पर मनन कर. इस पर विचार कर, शत्रु और मित्र तू ही है।" पुत्र ने इस उपदेश का पूरा २ अनुभव किया; उसकी चिन्ता और भय जाता रहा; हर्ष और आनन्द की उसे प्राप्ति हुई। उसने वार २ इसे गाया। गीत के अर्थ और गुण तथा माता की सदेच्छाओं के कारण वह पुनर्संजीवित हुआ और अपने आप में आया। सब भय और चिन्ता भाग गई, शोक सब जाता रहा; सब सांसारिक आशाओं, लौकिक इच्छाओं और तुच्छ कामनाओं को उसने अन्तिम नमस्कार कर लिया। उसे इसका ऐसा पूर्णानुभव होगया, पवित्रता और बल से वह इतना परिपूर्ण होगया कि वे (पवित्रता और बल) उससे उमड़ पड़ते थे। वह सोना भूल गया और कपड़े पहन कर

जिस स्थान पर उसके भाई थे वहाँ पहुँचा। उनसे उसने कहा, "आइये, आइये, और मेरा यह भार उतार दीजिये; शिर की पीड़ा का कारण यह राजमुकुट, यह भार, आप ले लीजिये; मुझे इससे मुक्त कर दीजिये। मैं जानता हूँ कि जो राज-सिंहासन पर बैठने और राज्य पर शासन करने के अभिलाषी हैं, वे सब शरीर मैं ही हूँ। मैं तुम हूँ, और तुम आर हम एक ही हैं, इसमें कोई भेद नहीं है"। भाईयों ने जब उसके मुखमण्डल पर इस पवित्रता को देखा, तो वे प्रसन्नता से खिल उठे। उन्होंने: कहा, "हम सिंहासन लेने नहीं आये थे क्योंकि हम तो सम्पूर्ण संसार के शासक हैं, हम तो केवल तेरा वह सच्चा जन्माधिकार तुझे देने आये थे, जो इस शरीर के भीतर है।" उन्हों ने कहा, 'भाई! तू इन्द्रियों का दास नहीं है; भाई! तू केवल इस लोक का ही राजा नहीं है बल्कि तू तो सूर्य, नक्षत्र मण्डल, अखिल विश्व, और समस्त लोकों का राजा तथा स्वामी है। भैया! आ, अनुभव कर कि तू अनन्त है, निर्विकार स्वरूप है, सूर्यों का सूर्य, और प्रकाशों का प्रकाश है।" राजा ने इस सत्य का अनुभव किया और राज्य करता रहा। परन्तु अब राज-काज को वह नाट्यशाला में नाटक का अभिनय मात्र समझता था। वह अपने को अभिनेता मात्र समझता था। अस्तु, राजा स्वस्थ हो गया, और किसी बात से भी उसे शोक नहीं होता था। उसने शक्तिशाली राजा की तरह राज्य किया, और जगत में अत्यन्त प्रबल राजा हुआ। सफलता उसे ढूँढ़ा करती थी।

नित्यानन्द, निरन्तर शान्ति तुम्हारी है। नहीं, नहीं, तुम ही वह हो, अपने केन्द्र को प्राप्त करो और सदा सर्वदा वहीं टिके रहो। ॐ! ॐ!! ॐ!!!