श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

लोगों को वेदान्त क्यों नहीं भाना?

भाग 11 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 11 · अध्याय 3 / 6

लोगों को वेदान्त क्यों नहीं भाना?

उर्दू भाषा में स्वामी जी की लेखनी से निकले हुए लेख, जो सन् 1900 में रिसाला आलिफ़ नामी मासिक पत्र के भिन्न २ अंकों में प्रकाशित हुए थे, उनका हिन्दी अनुवाद यहां से आरम्भ होता है।

जब कोई नया ख़याल मनुष्य सोचता है तो मस्तिष्क के भीतर एक लकीर-सी पड़ जाती है। बालक जब नई-नई संगति में से गुज़रता है या नई नई पुस्तकों को पढ़ता है, तो उसके मस्तिष्क के भीतर नई-नई लकीरें बन जाती हैं, और आगे चलकर फोनोग्राफ की भाँति ख़याल की चढ़ाई उन लकीरों (धारियों) पर सरल हो जाती है। अर्थात् जो विचार एक बार हृदयंगम हो चुके हों, उनको दुबारा स्मरण करना कराना या समझना समझाना सहल हो जाता है, और उन विचारों के संबंध में कहीं चर्चा हो रही हो तो वह तत्काल समझ में आ जाती है। किन्तु यदि कहीं इस प्रकार के विचारों का सिलसिला सामने आ जाय कि उनमें और मस्तिष्क की वर्तमान लकीरों (धारियों) में कोई समानता न हो, तो कुछ पल्ले नहीं पड़ता, बुद्धि चकरा जाती है, गड़बड़ मालूम देती है। कथा कहानियों में प्रायः उन बातों की चर्चा होती है जिनके अनुसार नित्य प्रति के अनुभव ने मस्तिष्क में पहले ही से (धारियें) बना रक्खी हैं; इसलिये साधारण उपन्यास नाटक को पढ़ते समय मस्तिष्क में उन प्रस्तुत लकीरों (पटरियों) पर मनुष्य की समझ रेलगाड़ी की भाँति दौड़ जाती है। परन्तु दर्शन या गणित शास्त्र का

अध्ययन करते समय मस्तिष्क में नई लकीरें तैयार करनी पड़ती हैं; इस कारण इन विद्याओं के प्राप्त करने में बड़ी कठिनाई होती है। वेदान्त के कठिन समझे जाने का भी कारण प्रायः यही है।

मैत्रायण ब्राह्मण उपनिषद में आया है। कि कठिनता के जाल में फँस जाने का कारण निश्चय पूर्वक यही है कि जो स्वर्ग अर्थात् पवित्रता में रहने योग्य हैं वे उनकी संगति ग्रहण करते हैं कि जो उस स्वर्ग अर्थात् भीतरी पावित्रता के योग्य नहीं। आज कल के प्रायः सभी युवक बाल्यावस्था से ही ऐसी संगति में अपना समय बिताते हैं, ऐसी किताबों को पढ़ते हैं, और इस प्रकार की शिक्षा पाते हैं कि संसार का अल्पकालिक जीवन उनके मस्तिष्क में घर कर बैठता है। वास्तविक रहस्य की ध्वनियाँ निकालनेवाली कोई तार उनके मस्तिष्क रूपी तंबूरे में लगने ही नहीं पाती, तो अवसर पर बजे क्योंकर? जब कहीं व्याख्यान आदि में वे अपने रुचि की बात सुन पाते हैं, तो उसके उत्तर में उनके हृदय की कोई तार हिल जाती है, इसलिये झट तालियाँ बजाते हैं। पर जहाँ परमार्थ का उपदेश सुनाया, आत्मज्ञान की कोई बात पढ़ी, ऊँघने लगे, जमुहाई लेने लगे, तबियत घबरा गई, बोल उठे—"मन नहीं लगता, कुछ मज़ेदार (interesting) नहीं हैं, जी उकता गया"; यह नहीं तो कोई और हुज्जत पेश कर दी। गणित, दर्शन, विज्ञान-शास्त्र यद्यपि कठिन हैं, पर हमारे नवयुवक इन कठिनाइयों को विश्वविद्यालय की परीक्षा के भय से उत्तीर्ण कर जाते हैं। और माना कि ब्रह्मविद्या (वेदांत) भी गूढ़ है पर मृत्यु की परीक्षा पास करने के लिये इसी की आवश्यकता है।

किंतु आश्चर्य का स्थान है कि प्रायः सभी नवयुवक अंतिम परीक्षा (final examination अर्थात् मृत्यु) को ऐसा भूल बैठे हैं कि उसके लिये इस विषय की ओर तनिक भी ध्यान नहीं देते।

प्रायः सभी बच्चों में एक ख़ूबी की बात यह होती है कि मस्तिष्क में नई लकीरें प्राप्त करने को सदैव तत्पर रहते हैं—अर्थात् शिक्षा शील (docile) होते हैं, नई नई बातों के जानने (information) के भूखे और प्यासे होते हैं। ज्ञान के लिये बच्चों की सी अवस्था (भूख) कुछ नवयुवकों और वृद्धों के भीतर भी पाई जाती है, किंतु आजकल भारतवर्ष में बहुत विरल। प्रायः नवयुवकों में यह दोष हो जाता है कि ज्ञान-भंडार उपलब्ध करने के लिये सुस्त हो जाते हैं, दिमाग़ की जागृति खो बैठते हैं, जड़ (inert) बन जाते हैं; क्या पड़ी है कि अपने सांसारिक विचारों की लकीरें, जो मस्तिष्क में बन चुकी हैं, मिटाकर आध्यात्मिक विचारों का रंग जमाएँ।

किसी व्यक्ति की सम्मति। एक गाड़ी को सैकड़ों कठिनाइयों से खींच खांचकर किसी पहाड़ी सड़क पर चढ़ाओ और पहाड़ की चोटी तक ले जाकर छोड़ दो, तो किस वेग से गाड़ी स्वयं नीचे गिरती-गिरती लौट आएगी! यही दशा प्रायः आज कल के विद्यार्थियों की है। विद्या की गाड़ी को खींचते-खींचते शिक्षा प्रणाली की चोटी [एम॰ ए॰ बी॰ ए॰) तक पहुँचाते हैं, और वहां पहुँचते ही छोड़ देते हैं, अर्थात् पुस्तकावलोकन को नमस्कार कर लेते हैं, अनुसंधान और विवेचना को बिलकुल त्याग देते हैं, और थोड़े ही साल में सिवाय अपने दफ्तर की

प्रचलित विद्या के बाक़ी सब पढ़ा-लिखा हृदय के तख्ते से साफ़ धो डालते हैं। यद्यपि यह सम्मति बिलकुल दुरुस्त तो नहीं, किंतु इसमें भी संदेह नहीं कि चाहे सामाजिक संबंधों के कारण हो, चाहे निकम्मी घरेलू चिंताओं के कारण, कालेज छोड़ते ही शिक्षित पुरुषों की विद्या और आत्मा की उन्नति प्रायः रुक जाती है। जब यही दशा है तो वेदांत को कौन पढ़ेगा?

वेदांत के कठिन होने का बड़ा भारी कारण यह है कि प्रत्येक मनुष्य में यह योग्यता नहीं होती कि उस पर तत्त्व वस्तु का रहस्य खुल सके। जैसे डेढ़ वर्ष का बच्चा मेघदूत का अर्थ समझने के अयोग्य होता है; हाँ, कुछ शिक्षा पाकर कालिदास के सब नाटकों का अर्थ अपने आप लगा सकता है। वैसे ही वेदांत का भेद जानने के लिये संसारी मनुष्य को शिक्षा की आवश्यकता है, अंतःकरण की शुद्धि की आवश्यकता है। हृदय दर्पण की छाई उतर जाने पर ज्ञान की ज्योति अपने आपही प्रकाशित हो जायगी।