आंतरिक शुद्धि।
वेदांत किसी संप्रदाय या मत का नाम नहीं है कि दूसरे मत के लोग उस पर आक्षेप करें तो ठीक हो। यह तो उस आत्मा (तत्त्व वस्तु) का ज्ञान (the Science of the Soul) है जो सब का स्वरूप है। यह ब्रह्मविद्या तो गणित की भाँति वह ज्ञान है जिस में संशय का नाम निशान नहीं। अंकगणित से वही विद्यार्थी नाक भौं चढ़ाए रहते हैं जिनकी अपनी बुद्धि दुरुस्त नहीं, या जिन में थिरता नहीं होती। वेदांत से भी वही महाशय अप्रसन्न रहते हैं जिन्होंने उचित
रीति से कभी उसकी प्राप्ति नहीं की। ज्ञान की प्राप्ति दो रीति से हो सकती है—(1) पुस्तकीय ज्ञान (theoratical knowledge) (2) व्यावहारिक ज्ञान (practical or experimental knowledge)। रसायन शास्त्र का पढ़नेवाला साथ ही साथ प्रयोग भी न करता जाय, तो कभी उस विद्या से लाभ नहीं उठा सकता। वैसेही आत्म विद्या का जिज्ञासु जभी आनंद उठा सकता है जब विद्या के साथ साथ उसका प्रयोग (व्यवहार) भी होता जाय। गणित शास्त्र में किसी रीति को केवल कंठस्थ कर लेना ही काफ़ी नहीं होता। जब तक उस रीति से संबंध रखने वाले अभ्यास के प्रश्न हल न किये जांयगे, उसमें प्रवेश न होगा। जब तक गणित की रीतियाँ जिह्वा पर हैं, सफलता नहीं होती। सफलता के लिये तो रीतियों का नखों में उतर आना आवश्यक है, अर्थात् रीतियों पर इतना अधिकार अपेक्षित है कि मानो अपने आप अँगुलियाँ उन रीतियों के अनुसार प्रश्न हल करती चली जाँय। यही हाल वेदांत का है। इस विद्या का आनंद तभी है जब ब्रह्म-अभ्यास इस कोटि का हो कि शम, दम, विवेक, वैराग्य आदि अपने आप रोम-रोम में झलकने लगें, चितवन से शांति और आनंद वरसने लगे, वाणी से आनंद टपकने लगे। कोई व्यक्ति यदि रेखागणित की 47 वीं शकल का सबूत पढ़ा चाहे तो उसे उचित है कि पहले 46 शकलों को समझकर आए; यदि वह उन शकलों को नहीं जानता, तो 47 वीं शकल भी उसकी समझ में नहीं आवेगी। अगर कोई बालक हिसाब में महत्तम समापवर्तक (G. C. M.) की रीति सीखना चाहता है, किंतु गुणा और भाग नहीं जानता, तो उसे महत्तम समापवर्तक कभी नहीं आवेगा। ठीक
इसी रीति पर यदि सत्य का जिज्ञासु वेदांत के नीचे-लिखे आरंभिक पाठों को व्यावहारिक रूप से याद न कर लेगा, तो वह चाहे जितने ग्रंथों को पढ़ा करे आत्मिक आनंद से वंचित ही रहेगा।