श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

राम परिचय ।

भाग 13 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 13 · अध्याय 4 / 4

राम परिचय ।

( स्वर्गवासी रायबहादुर चैनराय कं लल 'सच्चा साधु से उद्धृत ) ।

वर्तमान समयमें स्वामी राम तीर्थजी महाराज एम,ए, एक सच्चे साधु इस (लेख, 'सच्चे साधु')के बड़े उदाहरण हुए हैं।यह की जीवन महात्मा गोस्वामि तुलसीदासजी के कुल में हुए। चरित्र मुरारी वाला ज़िले गुजरांवालेमें कार्तिक शुक्लप्रति- पदा संवत् 1930(सन् 1873 ई०)को उनका जन्म हुआ था । उनके कुल में सदा से गुरु शिष्य परंपरा चली आई थी।घरसे कुछ अधिक रुपयेवाले नहीं थे, परंतु अपने पुरुषार्थ से पंजाब यूनीवर्सटी में एम. ए. की पदवी पाई, और फ़ोरमैन कालेज लाहौर में गणित विद्या के दो वर्ष तक अध्यक्ष रहे। उनका पाण्डित्य अंगरेज़ी में बड़ा प्रसिद्ध था और वह पंजाब यूनिवर्सिटी के गणित विद्या में बहुधा परीक्षक भी हुआ करते थे। उनके दो पुत्र व एक कन्या हुई। उनको 180) महीना मिलता था। अवस्था केवल 26 वर्ष की थी और शरीर में किसी प्रकार का रोग भी नहीं था,वरन् बड़े बलवान् थे,स्त्री और पुत्र सब अनुकूल थे,सर्वत्र उनका मान होता था, और कोई सामग्री संसार से वैराग्य की न थी, तथापि केवल यह अनुभव करने को कि "उपनिषदों के महावाक्यों का साक्षात्कार कैसे हो सकता है और वेदांत शास्त्र केवल पुस्तकों अथवा वाणी का विषय नहीं है किन्तु हर घड़ी अनुभव का विषय है--नौकरी, स्त्री, पुत्र, पिता, कुटुम्ब

आदिक सब को छोड़ कर सन्यास ग्रहण किया, और बिना तत्त्व साक्षात्कार किये न रहे। दिसम्बर 1801 (1897) में स्वामि जी मथुरा आए। वहां व्याख्यान दिए और फिर आगरे, लखनऊ, फ़ैज़ावादादि स्थानों में सोतों को जगाया, सहस्रों मनुष्यों को यह बतलाया कि सिवाय त्याग और ज्ञान के और कहीं सुख नहीं। उन्होंने कपिल, पातंजली, गौतम, कणाद, जैमिनि, व्यास शंकर आदि के सिद्धान्तों के साथ साथ, शमसतबरेज़ु, मौलना रूम के सिद्धान्तों को फ़ारसी में और प्लेटो, कैण्ट, हेगल शूपनहार हक्सले, स्पेंसर, कार्लाइल, इमर्सन प्रोफ़ेसर जेम्सादि के सिद्धान्तों को अंग्रेज़ी में जांचा, और सबका सारांश यह पाया कि आत्म-साक्षात्कार होते ही सारा जगत अपना शरीर हो जाता है, अपने से भिन्न कुछ नहीं रहता। इतनी विद्या होने पर भी उनका स्वभाव बड़ा सरल था, अहंकार का लेशमात्र नहीं था, सदा, हँसते रहते थे, सब के साथ प्यार से बोलते थे, किसी प्रकार का अभिमान नहीं था, देशभक्ती से परिपूर्ण थे, परोपकार स्वाभाविक था, दिन रात इसी विचार में बीतता था कि भारत का कल्याण कैसे हो। उनको निश्चय था कि समष्टि और व्यष्टि दोनों का रोग एक है और उसकी चिकित्सा भी एक ही है, ईश्वर में निवास करो और कराओ, फिर आनन्द ही आनन्द है; पैसा न करने से दुःख ही दुःख है। वह शुद्धाहार, शुद्धाचार, शुद्ध व्यवहार की मूर्ती थे। अमरीकादि देशों में अत्यन्त क्लेश सहने पर भी कोई अभक्ष्य पदार्थ ग्रहण नहीं किया; खटाई सिठाई नमकीन जो कुछ कोई देता था एक कमण्डलु में डाल कर खा लेते थे। कभी खाली नही बैठते थे। सदा

कुछ न कुछ उपदेश, विचार वा पाठ किया करते थे, और इतने बड़े परिश्रमी थे कि तीनों वेद-भाष्य, निरुक्त सहित ब्रह्मविद्या-भरण, चित्सुखी आदि वेदान्त के कठिन ग्रन्थ एक साल में ऐसे पढ़ डाले कि जैसे कोई बड़ा पण्डित पढ़ता है। वह शरीर को कभी शिथिल नहीं होने देते थे, और सदा व्यायाम करते थे। यदि किसी ने दुशाला दिया तो वह भी ओढ़ लिया, कम्मल मिल गया तो उसी में सन्तुष्ट रहे। उनका कथन था कि जब जीव ईश्वर दो नहीं किंतु एक ही हैं, तो जो मनुष्य द्वैत-भाव को त्याग कर काम करेगा, उसके साथ सारा जगत अवश्यमेव मिल कर काम करेगा; दुःख से मोक्ष और क्लेशों का अन्त यदि चाहते हो, तो शरीर को कार्य में उद्यत और मन को शान्त रक्खो, जब खुद को अपना आत्मा जान लिया, तो फिर सारे विधि निषेध का भेद घुल गया। बड़े एकान्त सेवी थे। पहाड़ों और जंगलों में विचरना बहुत पसन्द था। मान अपमान का ध्यान रंचक मात्र न था।

महात्मा मथुरा पुरीजी ने धर्म के विषय में जो प्रश्न [हाशिया: धर्म तत्व किए] उनके उत्तर में स्वामीजी ने कहा कि "यद्यपि धर्म देश काल और अधिकारी भेद से बदलता भी रहे तथापि उसका साधारण लक्षण चित्त की वह बढ़ी चढ़ी अवस्था है कि जिससे शान्ति, सतोगुण, उदारता, प्रेम, शक्ति और ज्ञान स्वयं प्रगट हों, सब जगत अपना आत्मा दीखे, भेद सर्वथा नष्ट हो जावे, आत्म-ज्योति ही सारे प्रकाशे, इसका नाम वेदान्त अर्थात् वेद (ज्ञान) का अन्त (परिणाम) है। इस धर्म की जीव को ऐसी आवश्यकता है जैसे वृक्षों को वायु की, प्राणियों को अहार की। इसी का पर्यवसान समाधि है कि जिसमें अहं-मम

फा गन्धमात्र भी शेष नहीं रहता, परिच्छन्न भाव मिट जाता है, जिस से व्युत्थान होने पर अपने सुख दुःख की विस्मृति होकर देश भर का दुःख, जगत भर का सुख दुःख अपना ही भान होता है। उपनिषद्-गीतादि सत्- शास्त्रों का पुनः पुनः विचार और ऐसे ज्ञानियों का संग जिनके पास बैठने से चित्त शुद्धि हो जावे मुख्य उपाय है। कम से कम दिन रात में पाँच बार अपने अन्दर से अज्ञान और पाप को निकालना, अन्तर्मुख हो कर चित्त से संकल्पों और वासनाओं को हटाना और "तदेवाहमस्मि" इस महा-वाक्य का अनुसन्धान करना चाहिये। अपने आत्मा को जिसमें शरीर और मन तरंगवत् लहराते हैं जानना और तन्मय होना इस धर्म का परम उद्देश्य है। जिस चित्त की एकाग्रता के बिना कोई सांसारिक विषय नहीं मिलता, वैसी एकाग्रता यदि तुम आत्म-विचार में एक क्षणमात्र के लिये भी करो, तो सारा ब्रह्माण्ड अपने में दीख जायगा। यदि थोड़ी सी देर भी इस चित्त को जीतने की संग्रामभूमि में कूद कर बुद्धि और मन को देश काल और क्रिया के परिच्छेद से हटादो, तो वह निर्भय पद प्राप्त होगा और बल की वह नदी बह निकलेगी कि जिसमें मग्न हो आनन्द ही आनन्द होगा। जब तक यह नाम रूप की कैद आत्मा को बन्द कर रही है, स्वयं प्रकाश आत्मरूपी सूर्य के ऊपर यह अहं, मम् का बादल छा रहा है, अन्तर्दृष्टि अविद्या के अन्धकार से ढकी हुई है; तब तक भय, कायरता, दुःख और क्लेश हैं। जब मन बुद्धि प्राण और इन्द्रिय आत्मा में लय हो गये तो फिर दुःख कहाँ? प्राणीमात्र को सुषुप्ति अवस्था यों सुख दायक है कि उसमें देह, इन्द्री, मन और बुद्धि सब आत्म

में लय हो जाते हैं। जब तक यह अवस्था रहती है, दुःख होता है। समाधि दशा में जहां इनका लय ज्ञान से हो, तो वहां आनन्द का कहना ही क्या। यहां पर सब शास्त्रों की समाप्ति है। इसी अवस्था के सम्पादन करने के लिये सारे साधनों की अपेक्षा है। धर्म के साधक यह हैं (1) ऐसा भोजन करना चाहिये और इतना करना चाहिये जो शीघ्र पच जावे (2) नींद भर सोना चाहिये (3) सार्थ, प्रातः व्यायाम करना चाहिये (4) ऐसे संगति से बचना चाहिये कि जिससे द्वेष उत्पन्न हो, यदि किसी महात्मा का संग न मिले तो अकेला रहना ही भला है (5) शुद्ध आचार, शुद्ध व्यवहार, सत्य, उदारता, क्षमा, सदा परो- पकार में तत्पर रहना, धर्म के मुख्य साधन हैं। मनुष्य जैसा भोजन करता है, अथवा जिन लोगों के पास बैठता है, या जैसा आचार व्यवहार करता है; वैसी उसके चित्त की दशा हो जाती है। जो संस्कार अनेक जन्मों से इस प्राणी के होते हैं। और जैसी माता पिता के शुक्र शोणित की शक्ती होती है वह अवश्य फलती है, परन्तु शिक्षा और सत्संग से बुरे संस्कार भी शुद्ध हो सकते हैं। वृक्षों और पशुओं के संस्कार देश काल तथा आहार से पूरे नहीं पलट सकते, परन्तु मनुष्य में वह शक्ति है कि जिससे वह इनको अपने अधीन कर सकता है। ऐसी शक्ति यदि सर्वथा पूरी २ सम्पादन की जाये और काम, क्रोध, लोभ, आदिक का जड़ से नाश करके अपने आप को सब में और सब को अपने आप में देखा जाय, तो सारे संस्कार बुरे नष्ट हो जावेंगे। वह किसी विशेष व्यक्ति का वर्णाश्रम पर निर्भर नहीं है। जिसके अन्दर उसकी तीव्र चाहना होगी, उसी को मिलेगा। कृष्ण महाराज से सहस्रों राजे

महाराजे मिले, परन्तु गीता तो किसी ने न सुनी, अर्जुन ने सुनी, और वह भी उस समय जब राज्य-मान (जीव) अपने पराये, दीन दुनियां को कृष्ण के चरणों में अर्पण करके वैराग्य स्वरूप हो गया। यदि इच्छा सच्ची है तो यह असम्भव है कि कोई ज्ञानी जिसको अपने आत्मा का साक्षात्कार है न मिले। गुरु आप खिंचकर चले आयेंगे, यदि शिष्य के मन में वासना शुद्ध है। कोयलों की आग लगी हुई ओक्सेजन को आप से आप खींच लेगी। यदि सत्यान्वेषण में परायण हों, तो सत्य की प्राप्ति अवश्य होगी।"

"जितनी ठोकरें मनुष्य को लगती हैं, जितने दुःख और [हाशिया: दुःख का कारण और उसका निवारण] क्लेश होते हैं, उनका कारण बाहर से तो कुछ और उसका और दीख पड़ता है, परन्तु अन्तर मुख होकर पक्षपात्, धोखे और राग द्वेष को हटाकर देखने से यही प्रगट होगा कि अध्यात्म-अवनति आधिभौ- तिक दुःख का मूल कारण है। चित्त में आत्मा अथवा ब्रह्म की विस्मृति होकर नाम रूप के फन्दे में पड़ना ही दुःख है। जब यह चित्त स्त्री की चाह में डूबा या किसी को अपना शत्रु जानकर ज़हर उगलने लगा, या जो वस्तु कि स्वयं प्यारी नहीं थी किन्तु इसलिये प्यारी थी कि अपना आत्मा सब को प्यारा है, उसे प्यारा मानने लगा, तो उसको सिवाय दुःख के और क्या होगा। जब कोई आदमी राजा को राजा, धनाढ्य को धनाढ्य, देवता को देवता, पंच महाभूतों को महाभूत-दृष्टि से देखता है, तो वह धोखा खाता है। बुद्ध भगवान का सिद्धान्त था और उन्होंने शिष्यों और अनुयायियों को यह सुनाया कि "जो जैसा चिंतवन करेगा, वैसा वह हो जावेगा।" यदि इसी नियम को "सब जगत् मेरा ही आत्मा है, मुझ से

मिश्र नहीं," अपने सामने रख कर सांसारिक विषयों को देखो, तो ये विषय विरूप होकर तुम्हें न डसेंगे॥

यह काकुल-ए-ज़ुल्मत-ए-माया पेच पेचां है बले। सीधे का जल्वा-ए-राम है,उलटे को डसता मार है॥

अर्थात् यह माया रूपी सुन्दर स्त्री के मुखपर जो काले2 पेंचदार बाल लटकते हैं, वह ज्ञानी के लिये तो ब्रह्म की महिमा है, और अज्ञानी के लिये ज़हर से भरे हुए सर्प।"

क्या इन्तिज़ारी क्या नुसीयत क्या बला क्या ख़ारे दश्त। शोला-ए-मुबारक जब भड़क उट्ठा तो सब गुलज़ार है॥

अर्थात् प्रतीक्षा, आपत्ति, दुख, और जंगल के काँटे क्या चीज़ हैं, जब प्रेम-अग्नि भड़क उठी तो सब गुलज़ार हो गया। इस नियम पर सारी सृष्टि चलती है, क्या समष्टि क्याः व्यष्टि। जिस देश अथवा जाति में सत्य और अपने को सब का आत्मा जानना प्रबल है, वह देश और जाति सदा सुखी और श्री सम्पन्न रहेंगे। जिनमें यह नहीं है, उन में दुःखही दुःख होगा। यही सच्चा धर्म है, इसी पर चलने से कल्याण है। रस्म और रिवाज, खाना, पीना, स्वर्ग-नरक के उपायों का विचार, आचार और विचार का आन्दोलन, ये सब इस के अंग हैं। सब का अंगी यह धर्म है कि "आत्मवत् सब को देखो।" जो लोग कि इस धर्म को भूल कर बाहर की बातों पर व्यर्थ वादविवाद में समय खोते हैं, उनको कभी कुछ हासिल नहीं होता, जो लोग इस धर्म को नहीं जानते, वही एक धर्म को बड़ा दूसरे को छोटा मानते हैं; एक को छोड़, दूसरे को ग्रहण करने को तैयार होते हैं। सच्चे धर्म में न मतमतान्तर का खंडन मंडन है, न वादविवाद। उस में अपने अन्तःकरण की शुद्धी ही मुख्य है।"

"लोग अपना समय इस विचार में खोते हैं कि यह [हाशिया: [unclear]] जगत कैसे उत्पन्न हुआ; यह नाम रूपात्मक प्रपंच मायामात्र है अथवा नहीं, तीन काल में विद्यमान है या नहीं। इन सब प्रश्नों का उत्तर न किसी ने अब तक दिया न कोई दे सकता है, क्योंकि जिस नामरूपात्मक जगत के अधिष्ठान को जानना चाहते हो वह देशकाल के बाहिर है, देशकाल और क्रिया से बाहर बुद्धि ज्ञान कैसे जाना जावे। इसलिये इन विचारों पर समय व्यतीत करना व्यर्थ है। वर्तमान समय की पदार्थ-विद्या (साइंस) में अन्वेषण का यह नियम रक्खा गया है कि भेद से अभेद को पाना, अर्थात् नानत्व में एक को ढूँढ़ना। जैसे एक फल का किसी वृक्ष से गिरना उसी नियमानुसार है कि जिस से चन्द्रमा पृथ्वी के गिर्द फिरता है। इसी को वह आकर्षण नियम कहते हैं कि जिसे साइंस में नाना प्रकार के पदार्थों की आकर्षण शक्ति का दृश करके सिद्ध किया है। इसी प्रकार धर्म में भी जितने भेद ऊपर से दिखाई देते हैं, उनके अन्दर एक ही नियम बर्त रहा है। उस नियम को जानना और उस पर चलना ही धर्म का फलितार्थ है। यूरोप के साइंस के विद्वान् बुद्धिबल से द्वैत से अद्वैत पर पहुंचने का प्रयत्न कर रहे हैं; इस दृश्यमान जगत् में अधिष्ठान एक ही है, यही पुकारते हैं। हमारे उपनिषद्, मुसलमानों का तसव्वुफ़, चीन की ताओइज़म, पारसियों का ज़ेन्दवस्था आदि भी और कुछ नहीं कहते। साइंस प्रत्यक्ष प्रमाण से धर्म का तत्व साक्षात्कार कर रहा है। जिस धर्म में तत्व साक्षात्कार नहीं, वह धर्म नहीं। साइंस नामरूप तथा इन्द्रियों के आधीन है, धर्म अन्तरात्मा का अनुगमन करता है, इसलिये उनको धृत इन्द्रियादिक की अपेक्षा नहीं। यही नियम

जगत के तत्व के अन्वेषण में काम लाना पड़ेगा, व्यर्थ वाद- विवाद नहीं।"

"जितने जाति भेद, मतभेद, सम्प्रदायभेद. आश्रमभेद हैं, [हाशिया: भेद और उसके दूर करने के उपाय] वह केवल इस वास्ते हैं कि काम अलग 2 हों, परन्तु लक्ष्य एक हो। इसी के भूलने से सारी आपत्ति हुई है। शास्त्र और स्मृति हमारे लिये हैं न कि हम शास्त्र और स्मृतियों के लिये। भारतवर्ष के नदियों का बहाव पलट गया, पहाड़ों पर बर्फ़ के गिरने की जगह हट गई, जंगल कट गये, नए २ शहर आबाद हो गये, ज़ुबान पलट गई, लोगों के रंग रूप और के और हो गये, परन्तु हम ऐसी रस्मों और रिवाजों को जिनमें कुछ जान बाक़ी नहीं है रखना चाहते हैं। हमारी वही मसल है कि आगे को तो चलें और पीछे को देखें। हम यह तो कहते हैं कि हम ऋषियों की सन्तान हैं, परन्तु इस बात को भूल गये कि ऋषियों के ज़माने में रेल, तार, बिजली, स्टीमर आदि कहां थे; उनको यूरोप और अमेरिका के बीसवीं सदी के साइंस के जानने वाले कारीगरों और विद्वानों से कहाँ मुक़ाबिला करना पड़ा था। इसलिये या तो हम वर्तमान समय के साथ चलने के योग्य बनें, या पितृ-लोक को सिधारें। जो लोग देशभक्ति पुकारते हैं, वह अब तक देश के साथ ऐसे एक चित्त न होंगे कि जिस से द्वैत का नाम भी न रहे, कुछ न कर सकेंगे। जब दिल में यह बात दृढ़ हो जायगी, रोम २ से यह फूट निकलेगा कि "मैं ही भारतवर्ष हूँ, सब भारतवर्ष मेरा ही शरीर है, मेरी आत्मा सब भारतवर्ष की आत्मा है, यदि मैं चलता हूँ तो भारतवर्ष चलता है, यदि मैं दम लेता हूँ, तो भारतवर्ष दम लेता है, मैं ही शंकर हूँ, मैं ही शिव हूँ," तब ही हम

भारत के सच्चे पुत्र हूँगे। अजगर कृष्ण को निगल गया, परन्तु पचा न सका। यही हाल हमारा है। मरने पर तो "राम राम सत्य है" कहते हैं, परन्तु जीते जी राम राम सत्य नहीं कहते। मरते समय तो गीता सब को सुनाते हैं, जीते जी ही क्यों नहीं अपने जीवन को भगवद्गीता अर्थात् भगवान का गीत बनाते? मा ने बच्चे को आम चूसने को दिया, आम चूसते २ मुँह रस से भर गया, कपड़े भी रस से पूर्ण हो गए, और आम्र के चूसने में उस बालक को न आम्र की ख़बर, न मा की, न कपड़े की गही, रसही रस होगया; इसी प्रकार यदि श्रुति भगवती का दिया हुआ महा-वाक्य रूपी आम्रफल हमारे मुख में पड़ने ही हमको रस रूप कर सच्चा देशभक्त, सच्चा भारतवर्षी न करे तो और कौन करेगा।"

"सब लोग एक्यता एक्यता तो पुकारते हैं परन्तु उसका वास्तविक कारण नहीं ढूँढ़ते। वह यह है कि हम वर्तमान समय के साथ पिछले वक्तों को तोलने का प्रयत्न नहीं करते। क्या एक्यता अविद्या और अन्धकार से जो हम पर छा रहा है पैदा हो सकती है? जब तक इस बात पर ध्यान नहीं दिया जावेगा कि खाने वालों की संख्या के बढ़ने के साथ २ खाने की सामग्री भी अधिक पैदा होनी चाहिये; जब तक यह होगा कि एक तो खाप और दस मरें भूखे; तब तक कुछ न होगा। जब हिन्दुस्तानसे बाहिर पाओं रखते ही जाति बाहर होता है, एक्यता कहाँ? चाहे जन्म-पत्रियां मिलवाओ,मन्त्र पढ़ो, पूजा करो, क्या ऐसे घर जहाँ बच्चे व्याह के नाम से बांधे जावें, फल फूल सकते हैं? जब इन बाल-विधवाओं की प्यारी प्यारी आँखों सेआँसू गिरते देखकर भी हमारा कलेजा नहीं फटता, तो फिर हम ऋषियों

की सन्तति कैसे कहला सकते हैं ! इन विधवाओं की आह हम को यदि काली भवानी की नाईं न खायेगी, तो क्या होगा ? जब तक हम ब्रह्मचर्य को पूरी रक्षा न करेंगे, हम नए होने से कैसे बच सकने हैं ? जब तक स्त्रियां अनपढ़ और धनाढ्य लोग अविद्या ग्रसत और देश सुधार से अनभिज्ञ अथवा विरोधी हैं, क्या हो सकता है ? यह सब अविद्या की वृद्धि से हुआ है। जब धर्म का तत्व विद्या द्वारा ढूँढ़ा जावेगा तभी हमारा और देश का कल्याण होगा।"

अगस्त 1802 में स्वामी राम जापान होते हुए अमरीका देश यात्रा पर विचार गए। वहां उनकी [unclear]-वस्त्र धारण करने वाली मूर्ति चित्रकारों का एक अग्नि का स्तम्भ सी, कि जिससे शब्द नहीं किन्तु ज्ञानकी चिंगारियां निकलती थी, प्रतीत हुई। वहां के लोग कहते थे कि उनके पीछे भी उनकी ज्ञानामृत से परिपूर्ण मूर्ति उनके कमरों में विराजती थी। अमरीका में केलीफोर्निआ के विद्वानों ने उनका यह कहकर स्वागत किया कि आपके तत्वसाक्षात्कार के सामने हमारी सारी सभ्यता विखर जावेंगी। अमरीका में उन्हों ने गिर्जाओं और अन्य स्थानों में व्याख्यान दिये। पैसिफ़िक रेलरोड कम्पनी के अध्यक्ष ने पुलमनकार जो रेल में सबसे उत्तम गाड़ी होती है उन को अर्पण करके कहा कि आप की सौम्यता अद्वितीय है। सेंट ल्यूईस की प्रदर्शनी में वहां के वर्तमान पत्रों ने कहा कि स्वामी राम ही सारे मेले के जीवन-प्राण थे। स्वामि जी अमरीका में दो वर्ष रहे, परन्तु भारत सदा चित्त पर रहा। वहां उन्हों ने क्लेश सहे, परन्तु अभक्ष्य न खाया। तरकारी के आहार पर ही सारे दिनों रहे। अमरीका में उनको यह निश्चय हुआ कि यहां

की उन्नति वास्तव में सुख का हेतु नहीं। रुपया कमाते कमाते मर जाना, अपने भाइयों से आप को सर्वथा अलग करके बहुत सजे हुए कमरों में रहना, अपने ऐश्वर्य और भोग में उन्मत्त हो दूसरों को कुछ न समझना, अधर्म से धनके पर्वत उपार्जन करना, कभी चित्त में शान्ति न लाना, सदा उद्विग्न व चिन्ताग्रस्त रहना, यह सब सुख नहीं दुःख है। इस उद्वेग को त्याग कर अन्तर्मुख होकर आत्मवत् सब को देखने में ही सुख है। यदि सुख चाहते हो तो इस दौड़ धूप, इस धनोपार्जन के ज्वर को छोड़ो। भारत की यही दशा है। इतना विशेष है कि यहां काम करने वाली बुद्धि का बहुत कुछ अभाव है। प्रत्येक मनुष्य यही चाहता है कि मैं अपना ही भला कर लूँ, चाहे देश मरे अथवा रहे। यह असम्भव है कि यदि किसी शरीर में हाथ तो प्रबल हों और अन्य सब अंग दुर्बल। देशोन्नती के लिये सब से पहिले एकाग्र चित्त हो काम में प्रवृत्त होना अवश्य है। इसी का नाम सच्चा वेदान्त है। लोग कहते हैं कि वेदान्त में कर्म के त्याग से ही शान्ति, सुख और मोक्ष होती है, परन्तु वे नहीं जानते कि अपने आप को भूल कर तन्मय हो परार्थ उद्योग करना ही कर्म का परम त्याग है। जब कोई विद्वान पण्डित, कारीगर, कवि अथवा गणित वेत्ता किसी गूढ़ विषय के विचार में प्रवृत्त होता है, तो जब तक अपने को सर्वथा भूल कर, एक चित्त होकर, तन्मय नहीं हो जाता, कोई बात सिद्ध नहीं होती। देहेन्द्रियादि को विस्मरण कर अपने इष्ट विषय के ध्यान में मग्न होने से ही सिद्धि होती है, जो विषय कभी नहीं सूझा था सूझ जाता है। उत्तम प्रवृत्ति ही परम योग, परम वेदान्त है कि जो जंगल में भी ऐसे ही सिद्ध हो सकती है जैसे कि नगर में। जब

तक तुम देहेन्द्रियादि को निरन्तर कर्माग्नि में न जलाओगे; जबतक तुम्हारे अन्दर कर्म का दीपक प्रज्वलित न होगा, तैल बत्ती का लालच करोगे; तब तक कोई काम सुफल न होगा, सब उद्योग निष्फल होंगे। चित्रकार चित्र के बनाने से पहिले किसी के सुन्दर नेत्र, किसी का मुख, किसी के हाथ, किसी के पांव, किसी की छाती देखकर अपने चित्त में रखता जाता है, और समय पाकर अपने अन्दर से नि- काल कर चित्र में ले आता है। उसका देखकर चित्त में रखना भी उद्योग था। इसी प्रकार सच्चा काम करने वाला हर तरफ से अपने काम की सामग्री एकत्र करके समय पाकर उसे काम में लगा देता है। नियम यह है कि बराबर काम करो; कभी काम से खाली न रहो। फलाभिसंधि त्यागो। जब तक यह आशा बनी हुई है कि अमुक कर्म से मुझे अमुक लाभ होगा, तबतक कोई उद्योग सिद्ध न होगा। जब यह आशा न रहेगी,तब सारे उद्योग सुफल हो जावेंगे। यह त्यागही मोक्ष का द्वार है। यही परम कैवल्य है। शरीर के शोषण से त्याग का लक्ष्य उससे बहुत ऊंचा है। वह अहंभाव का अभाव है, जो जितना देता है उतनाही वह सुखी होता है, जितना वह लेता है उतना ही वह सुखी नहीं। सूर्य की किरणों में सातों रंग होते हैं, परन्तु प्रत्येक पदार्थ उन सब को अपने अन्दर नहीं लेता, कुछ रंग ऐसे रह जाते हैं कि जिनको वह त्याग देता है, वही उसकी शोभा का हेतु होते हैं; इसी प्रकार चित्तमें भी नाना प्रकार की वासनाएं फुरती हैं, हम चाहते हैं कि हमारी सब इच्छाएं पूर्ण होजायें, परन्तु किसी की सारी आशाएं न पूर्ण हुईं, न होंगी। आशा के पूर्ण होने का मूल मन्त्र आशा का त्याग है। जब तक योधा धनुष की ज्या को खेंचे

रहता है, वाण नहीं छूटता, डोरी को ढीला छोड़ते ही वाण छूट जाता है; इसी प्रकार आशा की डोरी को ताने रहने से आशा पूर्ती का वाण नहीं छूटता, उस के डीला छोड़ते ही छूट जाता है। जबतक अपने आप को औरों से पृथक जानोंगे, तब तक कोई उद्योग सुफल न होगा, कोई सिद्धी नहीं मिलेगी। जब यह परिच्छिन्न भाव दूर होगा, जब प्रेम से परिपूर्ण होकर सब के साथ ऐसे ही प्रीती करोगे जैसे अपने शरीर के अंगों से, सम्बन्धियों से; तब सारी सृष्टि, सब देशकाल तुम्हारे अनुकूल हो जावेंगे। जो अपने को सर्व रूप देखता है, जिसने अपने चित्त को जगत के साथ एक कर लिया, उस के पवन, अग्नि, जल, सब सहायक हो जाते हैं। जैसा चित्त में होता है, वैसाही बाहिर फुरता है, वैसाही दूसरों पर भी असर होजाता है। कहते हैं कि एक बादशाह शिकार को गया, मार्ग में अपने साथियों से अलग हो प्यास का मारा किसी बाग में पहुंचा, माली से पानी मांगा, वह तत्काल एक सुन्दर अनार का फल ले आया और रस निकाल प्याला भर दिया; परन्तु बादशाह की प्यास न बुझी और दूसरा प्याला मांगा। ज्यों ही माली लेने गया, बादशाह के चित्त में यह फुरा कि ऐसे सुन्दर बाग के मालिक पर अवश्य कर लगाना चाहिये। बादशाह यह सोचही रहा था कि माली दूसरा फल लेकर आगया, परन्तु उसके रस से प्याला न भरा। बादशाह ने कारण पूंछा। माली ने उत्तर दिया कि पहिले आपके मन में कालुष्य नहीं था इस लिये प्याला भर गया था, अब हो गया इस लिये नहीं भरा। सच है कि बाहर का जगत अन्दर के जगत का प्रतिविम्ब मात्र है। यदि चित्त में प्रेम होगा तो जगत भी प्रेममय भासेगा; द्वेष होगा तो द्वेषयुक्त

भासेगा। चित्त की प्रसन्नता, सन्तोप, शान्ति बड़ौं चीज़ है। उद्विग्नचित्त का कोई उद्योग सुफल नहीं होता। प्रसन्न चित्त पुरुष के ही सारे काम पूरे होते हैं। यह प्रसन्नता कथन मात्र से नहीं आती, किन्तु अनात्म वृत्तियों को हटा कर आत्मा में प्रतिष्ठ रखने से आती है। जब अपने आत्म-देत्र में दृढ़ निष्ठा बांधोगे, जब यह निश्चय हो जावेगा कि यह देहेन्द्रियादि मैं नहीं हूं, न मैं किसी बन्धन से बंधा हूं, किन्तु नित्य शुद्ध नित्य मुक्त हूं; जब नटवत् अपने आप को इस जगत रूपी तमाशा-घर में एक तमाशा करने वाला जान कर उस में आसक्त न होगे; जब अपनी ही आत्मज्योति से प्रकाशोगे, तो क्या ताकत किसी की है जो तुम्हारे मार्ग में विघ्न डाले। देवता भी उस प्राणी के, जो अहंभाव और आसक्ति को त्याग कर कर्म में प्रवृत्त होता है, सहायक हो जाते हैं। देखो, बच्चा कैसा स्वतंत्र है, सब पर कैसा अधिपत्य चलाता है, बड़ों बड़ों की डाढ़ी खॅंचता है, किसी के शिर पर चढ़ता है, किसी की गोद में मूतता है; परन्तु सब उसकी सहते हैं, क्योंकि उसको अभिमान नहीं और न देहेन्द्रियादि की कुछ सुध है; ज्योंही उस बच्चे में कुछ सुध आ गई, वह अपने अधिपत्य से गिर गया। यह अहंकार ही चित्त की प्रसन्नता और सन्तोप का नाशक है। इसको हटा कर जब चन्द्र, सूर्य, नक्षत्रों की नाईं ईश्वर को नीतिपालन मात्र बुद्धि से काम करोगे, तब सारे दुःख दूर हो जावेंगे। आधिव्याधि, जन्म, जरा, मृत्यु, इष्ट के वियोग, अनिष्ट के संप्रयोगादि, सारे क्लेश तब तक ही हैं, जबतक अहंमम है। जब यह नहीं, तो फिर दुःख कहां, शोक कहां, आशा भंग कहां? यही सच्चा वेदान्त है। भय ही सारे उद्योगों को

सिद्धि में विघ्न है। शरीर के क्लेशों का भय, धन के नाश का भय, लोक-भय, इत्यादि भय ही सारे शुभ कार्य में विघ्नकारी हैं। परन्तु आत्मा-ब्रह्म अभय है, जब उसने अभय पद में दृढ़ निश्चय बांध लिया, तो सारे विघ्न आप से आप जाते रहे। जिस के चित्त में भय नहीं, उसके सामने भयकी सामग्री खड़ी नहीं रह सकता। स्वामी राम का यह दृढ़ निश्चय था। उनके पास एक बार पांच जंगली भालू आ गये, परन्तु वह कहते हैं कि मेरे चित्त में भय बिल्कुल नहीं हुआ, क्योंकि मैं अपने आप को देह नहीं जानता था, मैंने उन भालुओं की ओर नज़र भर कर देखा कि देखते ही भाग गये। इसी प्रकार भेड़िये सिंघादि भी आए और आंखें चार होते ही भाग गये।

स्वामी राम कहते हैं "ज़रूरत है सुधारकों की, न कि औरों के किन्तु अपने आप के सुधारकों की। ज़रूरत है ऐसे लोगों की कि जिन्हों ने युनिवर्सिटियों की पद्वियों के स्थान में मन की विजय की पढ़ी पाई हो। जो महानुभाव इस पद की आकांक्षा करें, उन के लिये अवस्था का कोई नियम नहीं। वह तो सदा युवा ही गिने जावेंगे। इस पद का वेतन ईश्वर भाव है। पत्र-व्यवहार करो, याचना द्वारा नहीं, किन्तु आज्ञापालन द्वारा, सब जगत के नियन्ता अपने आत्मदेव से"। "साधु वह कि जिसके अन्दर ज्ञानाग्नि ऐसी भड़क रही हो कि देह का अभिमान, या साधु होने का अभिमान, या रेल तार आदि से नफ़रत, या पुराने ढंगों से महत्वत, नितान्त (बिल्कुल) जल जाय; सारी दुनियां को उसके ज्ञानाग्नि के प्रकाश से उजाला पड़ा हो और आगे चलने का रास्ता पड़ा नज़र आए। अगर यह नहीं, तो गीला ईंधन है, जो धुआं ही धुआं कर रहा है

जिससे सब लोगों का नाक में दम हो रहा है। जब तक धुलेगा नहीं, न आप रोशन होगा, न किसी को उजाला करेगा; दिल नहीं रंगा तो कपड़े रंगने से अपना या पराया दुःख कहां दूर हो सकता है?

स्वामि रामतीर्थ जी से पूछा गया कि आप सब पदार्थों को एक कमण्डलु में क्यों डाल कर खाते हैं; उत्तर दिया कि जो रसास्वादादि चाहता तो घर क्यों छोड़ता। महाभारतमें कहा है कि "धैर्यसे शिश्नोदर को रोको-अर्थात् बुरे खाने से बचो। पर स्त्री का ध्यान न करो। हाथ पांव को नेत्रों से रोको, अर्थात् बुरे कर्म करने, बुरे स्थानों में जाने से बचो। नेत्र और श्रोत्र को मन से रोको, अर्थात् बुरे शब्द मत सुनो, बुरी वस्तुओं को न देखो। और मन और वाणि को कर्म से रक्षा करो, अर्थात् बुरे संकल्पों को और पर निन्दा को त्यागो"। स्वामि राम ने एक आख्यान इस प्रकार कहा कि लाहौर में किसी बड़े घर की एक विधवा स्त्री जो तरुणी और सुन्दर थी किसी महात्मा के पास दिखावट के लिये तो उपदेश को गई, परन्तु मन में पाप था। महात्मा ने जान लिया और अपनी शुद्ध वृत्ति का प्रभाव उस के चित्त पर ऐसा डाला कि जो बात दिखावट से करती थी वह वास्तविक हो गई, और उसने यथार्थ त्याग किया। सच है कि सच्चे महात्मा की दृष्टिगोचर होतेही अशुद्ध भी शुद्ध हो जाता है। पदार्थ संग्रह का सर्वथा त्याग और अपनी ज़रूरतों को घटाना पहिली चीज़ है। जो धन साधु जमा करे वह या तो काम में आवे, या पड़े पड़े सड़ जावेगा, या अदालतों में जैसा के होता है, खर्च होगा। जितने सच्चे महात्मा हुए वा विद्यमा हैं, वह वस्तु संग्रह को बहुत

विक्षेपकार जानते हैं, उतने खाने या वस्त्र से जिस बिना शरीर यात्रा न चल सके अधिक रखना बोझ मालूम होता है। स्वामि राम को इधर लोग बहु मूल्य वस्तु देते थे, उधर जहां उसकी आवश्यकता न रही तत्काल दूसरों को दे दी, या फेंक दी। सिवाय एक कमण्डल के और कुछ नहीं रखते थे, कभी कभी फेंक देते थे। भारत में सच कहा है।

विस्तारः क्लेशसंयुक्ता संक्षेपास्तुसुखावहाः। परार्थविस्तराः प्रोक्ताः त्यागमात्महितो विदुः॥

(अर्थ) जितने विस्तार हैं वे क्लेशदायक हैं, संक्षेप ही सुखदायक है, विस्तार दूसरों के लिये है, त्याग अपने लिये है।

स्वामी राम जहां जाते थे वहां जाते ही सहस्रों लोग उनके पीछे हो सुनने को आ इकट्ठे होते थे। सच का बड़ा बल है। यदि वक्ता के चित्त पर उसके कथन का उतना ही प्रभाव है जितना वह श्रोता पर डालना चाहता है, यदि उसका कथन न्यायानुकूल सत्य और प्रेमपूर्वक है, यदि वह श्रोता की बुद्धी को विचार कर कहता है, यदि वह यह जानता है कि जो अर्थ अपने शब्दों का मैं समझता हूं वही श्रोतागण भी समझें; तो यह असम्भव है कि उसकी बात न मानी जावे। स्वामि राम के कथन का तत्काल असर होता था, क्योंकि उनका हर शब्द उनके हृदय से निकलता था। एक बार गाज़ीपुर में वह एक व्याख्यान के मध्य में सहसा इस कारण बैठ गये कि उनको अपने कथन का असर अपने ऊपर प्रतीत न हुआ। वर्तमान समय में धर्म का इतना उपदेश होने पर भी और इतने साधु गृहस्थों के धर्म धर्म पुकारने पर भी श्रोता वक्ताओं में रागद्वेष, काम क्रोध, लोभ-मोह बहुत करके देखने में आते हैं, जिससे

धर्म की वृद्धि नहीं होती। यही हाल वेदान्त के उपदेशों का भी है। कारण यह कि कहा बहुत जाता है और किया थोड़ा जाता है। किसी ने परमहंस स्वामि भास्करानन्द जी महाराज से जो तितिक्षा की मूर्ति थे पूछा कि आप सुखी हैं या नहीं। उत्तर दिया कि मेरा द्वैतभाव नष्ट नहीं हुआ, इसलिये सुख कैसे हो सकता है। वह हिन्दू, मुसलमान, अंग्रेज़, छोटे बड़े सब से प्रेम करते थे, किसी से कुछ सम्बन्ध नहीं था। सब लोग उनको सिद्धवत मानते थे। परन्तु वह भी आंखों से आंसू बहाकर वसिष्ठ भगवान् का यह श्लोक पढ़ा करते थे:—

न केनचिद्विक्रीता विक्रीता इव संस्थिताः। वत मूढ़ा वयं सर्वे ज्ञानाना अपिश्वरम्॥

अर्थ—यद्यपि किसी ने हमें बेचा नहीं, तथापि विक्रे हुए के समान स्थिति है। खेद की बात है कि जानकर भी कि यह माया है, हम मूढ़ हो गये हैं।

जब ऐसे जगद्विख्यात परमहंसों की यह दशा है, तो औरों की तो बात क्या? यदि सब उपदेश कहें थोड़ा और करें बहुत, तो धर्म अधिक सफल होगा।

स्वामि राम कहते हैं "समाधि और मनकी एकाग्रता तो तब होगी, जब तुम्हारी तरफ से माल मकान पर मानो हल फिर जावे, स्त्री-पुत्र, वैरी-मित्र पर सुहागा चल जावे, सब साफ हो जावे, राम ही राम का तूफान आ जावे, कोठे दालान वहा ले जावे। दुःखी-दुए में और रंगीले मस्त में फर्क इतना है कि एक के चित्त में कामना का अंश ऊपर है और भक्ति का अंश नीचे; दूसरे के चित्त में राम ऊपर और कामना नीचे। एक यदि साक्षर है तो उलट पलट कर दूसरा राक्षस"।

मस्त कहता है—

नज़र आया है हर सू मह-ज़माल² अपना मुवारिक हो। "वह मैं हूं" इस खुशी में दिल का भर आना मुवारिक हो॥ यह उर्यानी³ रूखे-खुरशीद⁴ की खुद पदा हायल⁵ थी। हुआ अब फ़ाश पर्दा⁶ सितर उड़ जाना मुवारिक हो॥ यह जिस्मो-रूह का कांटा जो पेड़च सा खटकता था। खलश सब मिट गई, कांटा निकल जाना मुवारिक हो॥ तमसखुर से हुए थे कैद साढ़े तीन हाथों में। वले अब बुसते-फ़िकरो तख़य्युलसे भो बढ़ जाना मुवारिक हो॥ अजब तसख़ीरे-आलमगीर लाई सल्तनते-आली। महो-मही का फ़रमां⁷ बजा लाना मुवारक हो॥ न ख़दशा हर्ज़ का मुतलक़ न अन्देशा ख़लल वाकी। फुर्रे का बुलन्दी पै यह लहराना मुवारिक हो॥ तअल्लुक़ से बरी होना हरूफ़े-राम की मानिन्द। हर एक पहलू से रुका-ए-दाग़⁸ मिट जाना मुवारिक हो॥

अर्थ—अन्तिम पंक्ति के राम के जो अक्षर फ़ारसी में हैं वह परस्पर भिन्न हैं इसी प्रकार सब सङ्गों से छूटना और हर पहलू से दाग़ की बिन्दु मिट जाना मुवारिक हो।

है 'आनन्द स्वरूप ब्रह्मन! आनन्द से हंस, खुशी के राग गा। अब इस माया को अपनी धोखाबाज़ी मत करने दे। उपनिपद विचार बारंबार"। यही सच्चे साधु का

—————— 1 दया। 2 ज्योति। 3 नग्नत्व। 4 सूर्य 5 छिपा रक्खा था। 6 पर्दे। 7 नाम रूप। 8 पीड़ा। 9 हास्य। 10 देह में। 11 मन की गतिसे भी आगे जाना। 12 भय। 13 राम के अक्षर र-ा-म।

कर्त्तव्य है, न कि मण्डली मठ बनाना, चेले मूड़ना, रुपया इकट्ठा करना, मान बढ़ाना इत्यादि।

कार्तिक 1962में हरिद्वार से स्वामि राम वसिष्ठाश्रम को गए वहां से जो आनन्द के भरे हुए लेख उनकी कलम से निकले वह सामान्य नहीं थे। वह कहते हैं कि मनुष्य इस लिये नहीं बनाया गया कि इसी चिन्ता और फिकर में कि "मेरा जीवन कैसे चलेगा, मेरा क्या होगा" मर जावे। उसका इतना सन्तोप तो चाहिये कि जितना मछलियों, पक्षियों और वृक्षों को होता है। वे धूप अथवा वृष्टि की शिकायत नहीं करते, किन्तु प्रकृति के साथ एक होकर रहते हैं। कहो-"मैं ही यह मेघ हूं, जो वर्षा रहा है, मैं ही बिजली हो नर्तता हूं, मैं ही गर्जता हूं, मैं कैसा सुन्दर बलवान् भयंकर हूं"; इस प्रकार शिवोऽहं स्वतः हृदयसे निकले। आत्म-साक्षात्कार का अर्थ यह है कि अपने आत्मा को परमानन्द रूप जगत में स्फटिक की नाईं प्रकाशमान जानो। मेरे प्यारे! वेदान्त बनावट की बात नहीं। यह जगत कुछ वस्तु नहीं। वही मरता है जो इसे कुछ समझता है। जो कुछ सत्य है वह ईश्वर ही है। यह पदार्थ जो सुन्दर दीखते हैं, इन्हें कृष्ण की नाईं मनरूपी अजगर निगलता तो है, परन्तु पचा नहीं सकता। फिर रोता है, हाय मरा, हाय मरा, प्यारे! क्यों तुमने नाम रूप से धोखा खाया है? अब भी सत्य में निवास कर ईश्वर का आश्रय लो। ईश्वर को अपने अन्दर लाओ। ईश्वर के साथ चलो। ईश्वर का सा जीवन करलो। बिना त्यागे संसार के, पदार्थों में जो प्रेमानन्द है, वह कभी न प्रकटेगा। बिना नाम रूप का पर्दा उठाए तुम उस आत्मा को जो उन में छिपा हुआ है कदापि नहीं देखोगे। ईश्वर ही है, नाम रूप

नहीं हैं। पदार्थों के नाम रूपादि से उठकर उन के सत्ता-अंश में चित्त जमाना, पद या शब्द से उठकर उस के अर्थ में जुड़ने की तरह चर्म-चक्षु से दृश्यमान् जगत को भूल ब्रह्म में मग्न होना, यही उपासना है। उपासना साधन है, ज्ञान सिद्ध-अवस्था है। उपासना में यत्न के साथ अन्दर बाहिर ब्रह्म देखा जाता है। ज्ञान वह है जहां बिना यत्न के स्वाभाविक रोम रोम से 'अहं ब्रह्मास्मि' के ढोल अन्य सब वृत्तियों को दबादें, और बाहिर से हर वस्तु-रेणु तत्वमसि का दर्पण दिखाता हुआ भेद भावना को भगा दे। सच्चा उपासक कौन? जिसे लोग उपास्य देव कहते हैं। उपासक कहता है कि अब मुझसे दो दो बातें नहीं निभ सकतीं। खाने पीने, कपड़े-कुटिया का भी ख्याल रक्खूं, और दुलारे का मुख भी देखूं। चूल्हे में पड़े पहनना, खाना, जीना, मरना, इन से मेरा निर्वाह नहीं होता। मेरी तो मधुकरी हो तो तुम, कामली हो तो तुम, औषधि हो तो तुम, शरीर हो तो तुम, आत्मा हो तो तुम, शरीरादि को पड़े रखना चाहते हो तो पड़े रक्खो।

आंखें लगा के तुझसे न पलकें हिलाएंगे। देखेंगे खेल हम तुम्हें आगे नचापगें॥

लोग चाहें अन्ध परम्परा का विश्वास कहें परन्तु राम को तो यह अक्षरशः सत्य है।

न पश्येन्मृत्युपश्यति न रोगं नोत दुःखतां सर्वमाप्नोतिचिश्वरः॥

ब्रह्मवित् मृत्यु, रोग, दुःख को नहीं देखता। वह सर्व को सर्व प्रकार से व्याप्त करता है। प्यारे ब्रह्म! हृदय में विश्वास मृत्यु है, राम तेरा सत्य स्वरूप अमृत आनन्द है। तेरा आत्म-रसास्वाद अनुभव से आसक्ता है। जिसे अधिष्ठान रूपी रस्सी का साक्षात्कार है उसे भासने वाले

सर्प से बाधा नहीं। जिसने अधिष्ठान रूपी शक्ति को जान लिया, उसे रज्जुमान रजत नहीं खॅंचता। जिसे केवल सत का अनुभव हो गया, उसे मुँह देखी दुनिया का भय स्तुति चलायमान नहीं कर सकी। इस दुनियां में जो कुछ दिखाई देता है, वह सब तमाशा है। इदम् चेतन, सत्-ब्रह्म, अस्ति यह ही सत्य है। जो उसे नहीं देखता और इस मिथ्या दृश्य पर यकीन करता है, वह दुर्योधन की नाईं माया के मन्दिर में उसे पानी का जान नहाने को कूद कर आपको हास्य पद बनाता है। तुम्हारा अन्तरात्मा दीन जीव नहीं, किन्तु वह सूर्य है, वह साक्षी चेतन है, जिसके प्रकाश से अन्तःकरण प्रकाशता है।

है मौन दुनिया में बस ग़नीमत, ग़रीबों¹ राहत को मौत के भाव। न फ़रमा चूं तक यही है मज़हब, खड़े हैं रोम और गला रुके है॥ जिसे हो समझे कि जाग्रत है, यह ख़्वाबे-गफ़लत² है सख़्त, ऐ जां! ख़ोरोफ़ारम है सब मनाहिय, खड़े हैं राम और गला रुके है॥ ठगों को कपड़े उतार दे दो, लुटा दो असबाबो-माल ज़र सब। खुशी से गरदन पे तेग़ धर तब, खड़े हैं रोम और गला रुके है॥ न वाक़ी छोड़ेंगे ज़ुल्म कोई, थे इस हरादे से जम के बैठे।

—————— 1 छत्र। 2 प्रभुति। 3 बेहोशी की दवा। 4 बुरी वासनाएं।

है पिछला लिखा पढ़ा भी गायब, खड़े हैं रोम और गला रुके है॥

सन् 1906 ई० में स्वामि राम वासिष्ठाश्रम से टिहरी आये और वहां गंगा तट पर रहते थे। वहां उन्होंने कार्तिक वदी 13 संवत् 1963 को एक लेख 'खुद मस्ती' पर लिखा और उस को समाप्त करके गंगा स्नान को गए और फिर न लौटे। उन का अन्तिम कथन है।

"अच्छा जी कुछ भी कहो, राम तो हर रग में रमता राम है, हर जिस्म (शरीर) में प्राण, हर प्राण का जान है। सब में सब कुछ है। परन्तु इस वक्त कलम बन कर लिख रहा है। सूरज बन कर चमक रहा है। गोली गद्दी (जिस को लोग श्री गंगा जी कहते हैं) बन कर बा रहा है। पवन बन कर सब्ज दुशाले ओढ़े कुम्भकरण की तरह पैर पसारे सुपुप्ति में लिपट रहा है। पर अपनी एक सूरत बहुत ही ज्यादा भारी है। मैं हवा हूं, वे हिस्सों-हरकत, वे जान। मेरी सत्ता पाए बिना पत्ता नहीं हिल सकता, मुझ बिन सब दीमक की तरह सो जाता है। जली हुई रस्सी की तरह रह जाता है। काम बिगड़ने लगा, मैं किस को इलज़ाम दूं, मेरे बिना और कुछ हो भी। ओ मौत! बेशक उड़ा दे इस एक जिस्म को, मेरे और अजस्राम ही मुझेकम नहीं। सिर्फ चान्द की किरणें चान्दी की तारें पहन कर चैन से काट सकता हूं। पहाड़ी नदी नालों के भेस में गीत गाता फिरूंगा, वहरे-अमवाज के लिबासमें लहराता फिरूंगा। मैं ही बादे-खुशगवाम नसीमे-मस्ताना गाम हूं। मेरी यह सूरते-सैलानी

—————— 1 शरीर। 2 सज्द की तरह के वेग। 3 प्रातःकाल की सुगन्ध शीतल वायु।

और वक्त रवानी में रहनी है। इस रूप में पहाड़ों से उतरा, सुप्तिं पौधों को ताज़ा किया, गुलों को हंसाया, बुलबुल को कुलाया, दरवाज़ों को खटखटाया, सोतों को जगाया, किसी का आंसू पूँछा किसी को घूँघट उठाया। इसको छेड़, उस को छेड़, तुझको छेड़। वह गया, वह गया, न कुछ साथ रखवा, न किसी के हाथ आया।"

किस की लेखनी में बल है कि ऐसे सच्चे देशभक्त उपसंहार आनन्द रस से परिपूर्ण महानुभाव का चरित्र लिखे, स्वामि राम उन गिनती के महापुरुषों में

हुए हैं कि जो थोड़े काल के लिये समय समय पर भारत को जगाने को ईश्वर की नीति अनुसार आते हैं, और अपना जीवन सदा के लिये आदर्श छोड़ जाते हैं। यदि भाग्य वासी, चाहे गृहस्त, चाहे साधु, ऐसे महापुरुषों की पद्धी पर चलें, तो उनके साथ भी आनन्द में रहने और औरों को आनन्दित करने में क्या सन्देह हो सकता है। हमारा यह कथन नहीं कि वर्तमान साधुओं में स्वामि राम ही ज्ञानी अथवा त्यागी हुए हैं। बहुत से महानुभाव जो इस असार संसार से चले गये और बहुत से जो अब विद्यमान हैं, उनसे त्याग वैराग्य और ज्ञान में अधिक हों, परन्तु ऐसे लोग देखने में कम आवेंगे जिन्हें इधर तो दोनों विद्याओं का बल हो, उधर देशभक्ति भी पूरी २ हो, और श्रीरामचन्द्र जी की नाईं अकारण वैराग्य हुआ हो। यह बात केवल स्वामी राम में ही देखने में आई। प्रायः दो प्रकार के साधु देखने में आते हैं, या तो वे जो त्यागी और ज्ञानी दोनों हैं, परंतु अपने ध्यान समाधि के आगे दूसरों के उद्धार की ओर ध्यान नहीं देते; या वे जो

केवल नाम मात्र या वेप मात्र से साधु है, और ऐसे बहुत हैं। भारत का इन दोनों में से किसी से भी कुछ उपकार नहीं हो सकता। वसिष्ठ भगवान कहते हैं कि यदि संसार में रागद्वेप और अंतःकरण की ग्रन्थियों से रहित साधु विद्यमान हैं, तो फिर तपदान और तीर्थों से क्या, ऐसे महात्मागणों का संग सन्मार्ग का दीपक और हृदय के अन्धकार को उड़ाने वाला है। यह सत्संग का ही प्रताप है कि जिससे पापी भी पुण्यशील हो मोक्ष का भागी हो सकता है, इसलिये जितना मान पूजा साधुका किया जावे, उतना थोड़ा है, परंतु साधु हो, अर्थात् अपने आचरण से साधुकारी-शुद्ध स्वभाव, ज्ञान-संपन्न, कार्य में तत्पर, देहाभिमान से रहित हो, अंदर देहाभिमान और ऊपर के शिवोहं का मुलम्मा न हो, वरन अंदर के शिवोहं ने देहाभिमान को जला दिया हो। ईश्वर से सदैव प्रार्थना है कि भारत के सारी साधु समाज शीघ्र ऐसी हो जावे कि जिससे वह सब भेद और द्वैत को दूर कर आत्मवत् सब को देखे; न केवल अभेदवादि किंतु अभेदकारी हो; अद्वैत को कथन मात्र न रक्खे किंतु वर्ताव में लावें; ज्ञान, आनंद, प्रेम, त्याग, वैराग्य के जैसे नाम धारण करती है वैसी हो जावे; हर प्रकाशानन्द ज्ञान, प्रकाश से स्वयं आनन्दित हो, और दूसरों को आनन्दित करें; हर सच्चिदानन्द सच्चित् स्वरूप में मग्न हो; हर आत्मप्रकाश अपने आत्मा को सब में देखे। धन्य होगा वह दिन जब ऐसा होगा।

ॐ तत् सत्।