श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

भारत का भविष्य ।

भाग 14 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 14 · अध्याय 1 / 4

भारत का भविष्य ।

(स्वर्गवासी रायबहादुर लाला बैजनाथ द्वारा लिखित "हिन्दुधर्म प्राचीन व अर्वाचीन"――'Hinduism, Ancient and Modern'――नामक ग्रन्थ में स्वामी राम की लिखी हुई प्रस्तावना )

हम अब भारतवर्ष के भविष्य-सम्बन्ध में जो कि आशा- जनक और उज्जवल दिखाई देता है कुछ शब्द कहेगा।

संसार में प्रत्येक वस्तु की गति तालबद्ध है, और सारी सृष्टि काल-चक्र (सामयिक-चक्र-क्रम, law of periodicity) के नियम के अधीन है। इसी नियम के अनुसार विभूति के सूर्य व नक्षत्र को भी घूमना चाहिये। एक समय था जब कि भारत वर्ष में ज्ञान और वैभव का भास्कर मध्याकाश पर प्रकाशमान था। ऐतहासिक दृष्टि से देखा जाय तो

आकाश मण्डल के अन्य नक्षत्रों की तरह यह सूर्य भी धीरे २ पश्चिम की ओर बढ़ता हुआ चला। पहले वह ईरान, इसीरिया आदि देशों से होता हुआ पश्चिम की ओर बढ़ा। मिश्र देश को इस की मध्यान्ह किरणें देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस के बाद यूनान की बारी आई। तत्पश्चात् रोम को इसी के मध्यान्ह तेज को भोगने का आनन्द मिला। फिर इस के बाद जर्मनी, फ्रान्स और स्पेन की जागृति इसी के प्रकाश से हुई।

अन्त में इसी वैभव-सूर्य की चका चौंध करने वाली किरणें इंगलैंड के भाग में आईं। ये लो ! सूर्य पश्चिम की ओर और बढ़ा और अमरीका को धन धान्य से परिपूर्ण कर दिया। संयुक्त देश ( अमरीका ) में भी वह अपने नियमानुसार पूर्व की ओर अर्थात् न्यूयार्क ( New york ) से चल कर पश्चिम की ओर बढ़ते २ कैलीफोर्निया ( California ) तक पहुँचा। जब भारत वर्ष में ( वैभव-सूर्य के चढ़ने से ) दिन था, तब अमरीका को कोई नहीं जानता था। अब जब कि अमरीका में दिन है तो दरिद्रता और पीड़ा की रात्रि भारत वर्ष पर छा रही है। किन्तु नहीं, विभूति का सूर्य शांति-महासागर ( pacific ocean ) से भी गुज़रता दिखाई दे रहा है। और जापान सर्वशिरोमणि राष्ट्रों की श्रेणी में आने लगा है। यदि प्राकृत नियम विश्वासनीय और सत्य हैं, तो ज्ञान व विभूति का सूर्य अपना चक्र ( प्रदक्षणा ) अवश्य पूर्ण करेगा, और भारत वर्ष पर एक वार द्विगुण कांति से दीप्तवान होगा। तथास्तु

भारत वर्ष का प्राचीन इतिहास देखने से हमें जान पड़ता है कि अन्य देशों की दशा के समान भारत वर्ष में भी रात्रि

( अज्ञान व दरिद्रता रूपी अन्धकार ) का भीतरी मुख्य कारण संकुचता [ परिच्छिन्नता ] के अतिरिक्त कुछ नहीं ; अर्थात् "इस कमरे [ भारत वर्ष ] में कैसा शोभायमान व सुहावना उजाला है, अोह ! यह मेरा है ! मेरा है !! केवल मैं ही इस का स्वामी बना रहूं", ऐसे कहते हुये हमने निस्संदेह पर्दों को गिरा दिया और दरवाजे तथा खिड़कियां बंद कर दीं। और भारत के उजाले को केवल अपना बनाने की चेष्टा में हम ने [ भारत में ] अंधकार उत्पन्न कर लिया। न ईश्वर किसी व्यक्ति विशेष का पक्षपाती है और न विभूति ही स्थान- बद्ध है। एकता [ तत्वमसि ] के अनुभव रूपी ईश्वरीय तत्व को हम अपने आचरणों में लाना छोड़ बैठे, और इस प्रकार परस्पर विभक्त और दुर्बल होगये। बड़ा भारी पाप जो [ हिन्दुजाति के ] नेताओं ने किया वह यह था कि अपनी सन्तान अन्त्यज जातियों के साथ अपने स्वार्थ-त्याग रूपी कर्तव्यों की अपेक्षा अपने स्वार्थपरता रूपी अधिकारों पर ही उन्होंने विशेष दृष्टि रक्खी। अस्तु, जो होना था, वह होचुका, इसी अवस्था के बदलने की आवश्यकता के कारण समय का रंग बदलता जा रहा है, और आशाजनक शकुन दिखाई दे रहे हैं। इस में संदेह नहीं, जो खूब सोते हैं, वे खूब जागते भी हैं। भारत वर्ष बहुत काल तक सोता रहा। निस्संदेह, यद्यपि धीमे २ आलस्य टूटता जा रहा है; और पूर्ण निश्चय के साथ, यद्यपि धीरे २ यह पुराण-प्रियता [ नव-विद्विषता, Conser- vatism ] परिवर्तित परिस्थिति को अंगीकार करने में उदारता दर्शा रही है।

प्रगति का नियम (Principle of progress) वाह्य रूप और क्रिया में तो विभिन्नता और भीतरी स्वरूप व भाव में

पूर्ण एकता चाहता है। हिन्दुओं की वर्ण-व्यवस्था का कारण तो राष्ट्रीय प्रगति व विकास था जिस से कार्य और व्यवहार का संगठित विभाग और हृदय तथा भाव का पूर्ण मिलाप स्पष्ट होता था। परन्तु समय के प्रभाव से भीतरी तत्व [मिलाप] की अपेक्षा बाहरी बातों [ विभाग ] पर लोगों की दृष्टि अधिक होने लगी जिस से स्वाभाविक क्रम बदल गया, प्रगति वा उत्क्रान्ति के स्थान पर अवगति वा अवक्रान्ति ने डेरा जमाया, और अन्त में प्रेम तत्व-का विभाग और व्यवहार का मिलाप होगया, अर्थात् एक वर्ण के लोगों ने दूसरे वर्ण के व्यवहार [ कर्म वा वृत्ति ] को ग्रहण कर लिया, तिसपर प्राचीन जाति-भेद ने हृदयों को पहिले से भी अधिक फाड़ डाला। देह वा चर्म-दृष्टि [ अर्थात् जातीय पक्षपात ] के अधिक बढ़ जाने से शुद्धस्वरूप (आत्मा वा ईश्वर) इन क्षणभंगुर नाम रूप उपाधियों के गढ़े में लुप्त होगया। श्रुति [आत्मा-सम्बन्धी वैदिक ज्ञान ] वास्तव में निर्जीव कर दी गई, और स्मृति [ प्राचीन रीति सम्बन्धी धर्म-शास्त्र ] एक अत्याचारी की संस्था बना दी गई। इस प्रकार स्मृति श्रुति के ऊपर हावी होगई। किसी ने कहा है कि व्याकरण भाषा का श्मशान है (Grammer is the grave of language) । यह ठीक है कि यूंही आप भाषा को अचल और सुरक्षित बनाने का प्रयत्न कीजिये, वहीं भाषा तत्काल निर्जीव होजायगी। ठीक इसी प्रकार नियमों, रीतियों और कर्म-काण्ड की दृढ़ अचलता राष्ट्र का सत्व भक्षण करलेती है। कुछ काल तक तो ये नियम और शासन उपयोगी होते हैं, जैसे कि बीज या दाने की रक्षा और स्थिति के लिये उस के ऊपर का छिलका उपयोगी होता है; परन्तु कुछ काल के बाद उन में यदि परिवर्तन न हो, तो वे उन्नति के प्रतिबंधक हो जाते हैं। प्रिय देश-भाइयो ! याद रखिये, ये

स्मृतियां और शासन आप के लिये हैं, आप उनके लिये नहीं। सर्वत्र नित्यश्रुति का प्रचार कीजिये, किन्तु स्मृति को समय की आवश्यकता के अनुसार बना लीजिये। स्मृति पर तुम्हारा पैतृक अधिकार (heritage) हो, न कि स्मृति का तुम पर। भारत वर्ष में नदीपात्र (beds of rivers) बदल गये,हिम-रेखा (Snow lines) स्थान-च्युत हो गई, जंगलों के स्थान पर खेत बन गये, देश [ भारत भूमि ] का रूप भी बदल गया, राज्यपद्धति बदल गई, भाषा बदल गई, देशवासियों के वर्ण [ रंग ] बदल गये, तिस पर भी इस क्षणभंगुर और अस्थिर जगत में आप प्राचीन रीति-रवाज को स्थिर करने के यत्न में लगे हुए हैं, जो आज कल वस्तुतः निस्सार हैं। उस प्राणी की दशा वास्तव में शोचनीय है कि जो आगे को चलना चाहता है परन्तु देखता निरन्तर पीछे को है। ऐसा मनुष्य पग पग पर निःसन्देह ठोकर खाता है।

वंश-परम्परा [ heredity ] और कालानुकूल-वर्तन [ adaptation ] के नियमों पर जीवन का विकास निर्भर है। वंश-परम्परा के नियम का पशुवर्ग में साम्राज्य है। परन्तु कालानुकूल-वर्तन या शिक्षा का मनुष्ययोनि में साम्राज्य है जिस के कारण मनुष्य पशुओं व वनस्पति से विलक्षित है। एक सुन्दर छोटा सा बालक नन्हें पिल्ले [ puppy ] के समान अज्ञान और मूढ़ होता है; नहीं, नहीं, पिल्ला या तोते का बच्चा मनुष्य के बालक से प्रायः अधिक ज्ञान रखता है। किन्तु अन्तर इस में यह है कि पिल्ला या तोते का बच्चा तो जन्मते ही वंश-परम्परा के नियमानुसार आवश्यक ज्ञान अपने माता पिता से पा लेता है, परन्तु मनुष्य का बालक काला- नुकूल-वर्तन वा शिक्षा द्वारा समस्त संसार अपने अधीन कर सकता है।

मेरे प्यारे हिन्दुभाइयों ! परिवर्तन या कालानुकूल-वर्तन के नियम से द्वेष करके और प्राचीन रीति रिवाज तथा वंश- परम्परा के नियमों पर ज़ोर देने से, ईश्वर के वास्ते, अपने आप को मनुष्यत्व [ मानवी पद ] से नीचे मत गिरने दो।

तुम इस देश और काल में रहते हो। तुम भारत वर्ष के प्राचीन ऋषियों की सन्तान हो, किन्तु तुम अब उन के युग [ समय ] में नहीं रहते हो, क्या यह ठीक है ? तुम्हें अब इंजिन, जहाज और तारघर इत्यादि से वास्ता पड़ा है; तुम अब वर्तमान संसार से अपने को पृथक नहीं कर सकते; तुम्हारा भगड़ा [ मुकाबला ] वीसवीं शताबदी के योरूप और अमरीका के शास्त्र, शिल्पज्ञ और कारीगरों के साथ है; तुम इस मुकाबले से नहीं बच सकते। और यदि तुम विचार पूर्वक ध्यान दोगे तो तुम्हें पता लग जायगा कि जबतक समय की परिवर्तित परिस्तिथि में तुम अपने को रहने योग्य नहीं बना लेते, तो तुम्हारा इस संसार से नामो-निशां मिट जायगा। यदि तुम नूतन प्रकाश को अपनाने में उद्यत और प्रसन्न नहीं, जो प्रकाश कि आपही की भूमि का वास्तव में पुराना प्रकाश है, तो जाओ अपने पूर्वजों के साथ पित्रलोक में वास करो। यहां क्यों ठहरे हुये हो ? जाइये, नमस्कार।

राम का यह प्रयोजन नहीं है कि आप का राष्ट्रीयत्व सब नष्ट हो जाय। पौधा बाहर से जल, वायु, खाद और मिट्टी सोख लेता है, तो इस से क्या वह वायु, जल और पृथिवी में बदल जाता है ? कभी नहीं। इसी प्रकार आपको भी वाह्य वस्तुएं ग्रहण कर उन्हें अपनाते हुये अपनी उन्नति और विकास करना चाहिये, परन्तु श्रुति की वास्तविक अवस्था

का संचार आपके हृदय व नस नाड़ी में सर्वदा होते रहना चाहिये।

शिक्षा का उद्देश्य यह होना चाहिये कि उस के द्वारा हम अपने देश के समस्त साधनों वा सामग्र[unclear] का सदुपयोग कर सकें। उचित शिक्षा लोगों को इस योग्य बना देती है कि वे इस के द्वारा पृथिवी को बहुफलप्रद [ उर्वर, fertile ], खानों को धनोत्पादक [ लाभपूर्ण ], व्योपार को समृद्ध, शरीरों को उद्योगी, मनों को अपूर्वरचक (स्वतः कल्पक), हृदयों को शुद्ध पवित्र, कलाकौशल को विस्तृत और राष्ट्र को समिलित [ संघ- टित ] पहिले से अधिक बना दें। अपना प[unclear]रिचय दर्शाने के लिये बड़े बड़े शास्त्रों के प्रमाण देने की योग्यता, प्राचीन ग्रन्थों के वचनों के आशय को मोड़ तोड़ करने क[unclear] व्यर्थ [ मूर्खता पूर्ण ] छिद्रान्वेषण, जीवन भर वर्ताव में न आने वाले विषयों का अध्ययन, इस का नाम शिक्षा नहीं है। व्यवहार में न लाने वाले ज्ञान का मस्तिष्क में भर लेना [ वा ठूँस लेना ] आध्यात्मिक बद्धकोष्ठ [constipation, कब्ज़] अथव[unclear] मानसिक अजीर्ण है।

यह बात सन्तोष जनक है कि ऊपरी उत्साह-भंग और उग्र किन्तु निर्जीव विरोधियों के होते हुए भी धीरे-धीरे किन्तु निश्चय पूर्वक हिन्दु भाई उचित शिक्षा पा रहे और आवश्यक कालानुकूल-वर्तन adaptation भी दर्शा रहे हैं। पुराने वा प्राचीन समयों के सामाजिक बन्धन धीरे-धीरे ढीले पड़ते जारहे हैं। और वर्ण-व्यवस्था दिन प्रतिदिन अपनी असली स्थिति पर आ रही है। पाश्चात्य विज्ञान-शास्त्र क[unclear] तिरस्कार करने के स्थान पर हिन्दु आज उसे अपनी ब्रह्मविद्या [ श्रुति ] का भारी सहकारी समझते हुए उसका सत्कार कर रहे हैं।

हिन्दुओं के विवाह के सम्बन्ध में, भिन्न २ जातियां प्रायः

कट्टर सनातनधर्मी और विद्वान पंडितों के आधिपत्य में विवाह में आयु की अवधि बढ़ाने वाले नियामों का विधान कर रही हैं। और कभी कभी भिन्न भिन्न जातियों में एक दूसरे के अनुकूल विवाह को चुपके से स्वीकार भी कर लतीहैं।

प्रत्यक्ष में भोजन का प्रश्न हिन्दुओं में इतना अनुचित विस्तार पकड़ गया है कि कुछ एक ने हमारे धर्म को केवल चौका धर्म (kitchen religion) की उपाधि दे दी है। परन्तु इस सम्बन्ध में इतना कोलाहल मचने पर भी हमारी शक्ति अनुचित ओर बह रही है और अत्यन्त व्यर्थ जा रही है। शास्त्री रीति से हमने कभी ऐसी विवेचना नहीं की कि हमें क्या और कैसे आहार करना चाहिये। जैसा आप का आहार होगा वैसा आप का विचार और आचार होजायगा। जो वस्तु कि मशीन में न डाली गई हो वह आप मशिन से प्राप्त कैसे कर सकते हैं। जो मनुष्य पट्टों (स्नायु) और मस्तिष्क को पुष्ट करने वाला आहार नहीं खाते, उनसे शारीरिक और मानसिक (मस्तिष्क सम्बन्धी) काम की आशा करना निरतान्त मूर्खता है। भाजी, तरकारी, अनाज और फलों में से हम आसानी से ऐसी उचित वस्तुएं चुन सकते हैं कि जिन से मानसिक तथा शारीरिक शक्ति सुरक्षित रखने के लिये यथेष्ट नाईट्रेट (यवत्सार, nitrates और फासफेट phosphates) मिल सकें। क्या यह खेद की बात नहीं कि हम घी को इतना महत्व देते हैं जवकि उस में दिमाग और पट्टों को बनाने का कोई अंश नहीं, और जौ को तुच्छ समझते हैं जो कि विद्यार्थियों के लिये अत्यन्त उत्तम आहार है ? मिर्च, मसाला तथा औषधिया हमारे शरीर-यन्त्र को घड़ बड़ में डाल देती हैं, हमारे स्वाभाविक स्वाद को बदल देती हैं, और सर्वप्रकार

की दुर्बलता, बीमारी ( रोग ) तथा मृत्यु को बुला लेती हैं। मक्खन, चीनी और नशास्ता (starch) जैसे कारबोनट्स पदार्थ (corbonates) जो केवल फेफड़ों के लिये ईंधन का काम देते हैं किन्तु पट्टों और दिमाग को किसी प्रकार से पुष्टि नहीं देते हैं, उनको सब से अधिक महत्व दिया जाता है। और इस का परिणाम यह होता है कि आलस्य, निद्रा-तन्द्रा और थकावट का रहना अनिवार्य हो जाता है। ज्ञान ( विज्ञान- शास्त्र, विद्या) हमारे भोजन के विषय पथ दर्शक होना चाहिये भारतवर्ष के साधू इस देश के लिये एक अद्भुत और अद्वितीय दृश्य है। जिस प्रकार तलैया के पानी पर हरी काई जम जाती है, वैसे भारत वर्ष में साधु फैले हुए हैं। इस समय ये पूरे बावन लाख की संख्या में हैं। इन में से कुछ साधु तो निःसन्देह सुन्दर कमल हैं जो तलैया वा सरोवर की शोभा बढ़ा रहे हैं, किन्तु अधिक अंश इन में रोगोत्पादक काई रूपी मल है। ज़रा जल को बहने दीजिये, मनुष्यों में जीवन संचार होने दीजिये, काई रूपी मल शीघ्र बह जायगा। ये साधु भारत- वर्षीय इतिहास के गत अवनत काल के स्वाभाविक परि- णाम हैं। परन्तु आज कल सुधार का साधारण प्रभाव जितना गृहस्थियों के स्वभाव व रुचियों को बदल रहा है, उतना साधुओं में भी परिवर्तन पैदा कर रहा है। अब ऐसे साधु उत्पन्न हो रहे हैं कि जो राष्ट्रीय वृक्ष पर जोंक और आकाश- बेल ( प्राणनाशक ) बने रहने के स्थान पर मन और शरीर से यदि अधिक नहीं तो इस वृक्ष की खाद बनने के इच्छुक हैं। मेहनत वा मज़दूरी के आदर का भाव तथा निष्काम कर्म का धर्म जो आजतक लाखों गीताभक्षों का जुबानी जमा-खर्च था, अब भगवान् कृष्ण की भूमि में लाचार थोड़ा व बहुत वर्ताव में आता अनुभव हो रहा है।

योगस्थः कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय । सिद्ध्यसिद्ध्योः समोभूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ 2. 48

अर्थः—हे अर्जुन ! योग में स्थित हुआ, कर्मसंग का त्याग कर और सिद्धि असिद्धि में सम होकर तू कर्मों को कर । यह समता ही योग कहलाती है ।

"And live in action! Labour; Make thine acts thy piety; Casting all self aside; Contemning gain and merit; Equable in good or evil; Equability is yoga, is piety!" ( Gita. 2. 48 )

कुछ साधु और गृहस्थों में प्रबल भक्ति और तीव्र विवेक दिखाई पड़ता है । और जिस किसी को भारतवर्ष की बाह्याभ्यन्तर तथा प्राचीन व अर्वाचीन स्थिति विदित है, वह यह सुगमता से भान कर सकता है कि व्यावहारिक वेदान्त अथवा भक्ति पूर्वक कर्मयुक्त संन्यास ही शिक्षित भारतवर्ष का भावी धर्म होगा ।

व्यावहारिक वेदान्त या भक्ति पूर्वक कर्मयुक्त संन्यास ।

सच्ची भक्ति और सच्चे ज्ञान से सत्यकर्म पृथक नहीं हो सकता । हमारे जीवन के प्रत्येक कर्म, भाव और विचार को श्रुति-धर्म [ व्यावहारिक वेदान्त ] एक यज्ञ [ देवताओं के प्रति आहुति ] बना देता है ।

वेदान्त की परिभाषा में देव का अर्थ भिन्न २ इन्द्रियों को

प्राण और प्रकाश देने वाली शक्ति है; और किसी एक इन्द्रिय के देवता से अभिप्राय ब्रह्माण्ड की समष्टि इन्द्रिय है, जैसे आध्यात्मिक और आधिदैविक । चक्षुर्देवता सब प्राणियों की चक्षु है, जो आदित्य कहलाता है, और जिसका चिन्ह ( मूर्ति ) ब्रह्माण्ड का नेत्र अर्थात् भौतिक सूर्य है । हस्तेन्द्रिय का देवता सब हाथों की शक्ति है, जो इन्द्र कहलाती है । पाद-देवता सब पांवों की शक्ति है, जिसे विष्णु कहते हैं । इसी प्रकार अन्यान्य देवताओं के विषय में समझिये । इस तरह देवयज्ञ से ठीक 2 अभिप्राय अपनी व्यष्टि इन्द्रियों को ब्रह्माण्ड की समष्टि इन्द्रियों में अर्पण करना है । इन्द्र देवता को आहुति देने से तात्पर्य इस भूमि पर समस्त हाथों के हित में अपना व्यष्टि हाथ अर्पण करना है, अर्थात् देश के सब हाथों के हित में काम करना इन्द्र-देव-यज्ञ है । आदित्य देवता को आहुति देने से अभिप्राय ब्रह्माण्ड के सब नेत्रों में ईश्वर का अस्तित्व भान करना है, अर्थात् सब नेत्रों का सम्मान और आदर करना; अपने अनु- चित व्यवहार से किसी की दृष्टि को कुपित न करना; बल्कि जिस किसी की भी दृष्टि अपने पर पड़े, उसे प्रसन्नता ( कृपादृष्टि ), आशीर्वाद और प्रेम से पेश आना; अपनी व्यष्टि नेत्र-इन्द्रिय को ब्रह्माण्ड की समष्टि नेत्र-इन्द्रिय के तई ऐसी अत्यन्त प्रीति वा भक्ति से अर्पण करना कि परिच्छिन्न अहंकार का अधिकार नितान्त लुप्त होजाय और समष्टि नेत्र ( आदित्य ) स्वयं आप के नेत्रों द्वारा ही भासमान होने लगे; यह आदित्य-देव-यज्ञ है । वृहस्पति देवता को आहुति देने से अभिप्राय अपनी व्यष्टि बुद्धि को देश की समष्टि बुद्धि के अर्पण करना है, अथवा देश की भलाई में इस प्रकार चिन्तन करना है कि जिस से हम में और हमारे देश निवा- सियों में कोई अन्तर न रहे, और देश के कल्याण में

अपना कल्याण तथा देश के आनन्द में अपना आनन्द भान होने लगे।

संक्षेपतः यज्ञ से अभिप्राय अपने आप को ठीक अपना पड़ोसी, अपने आप को समस्त से अभेद तथा सब का आत्म स्वरूप होने में अपने तुच्छ अहंकार का नाश अनुभव करते हुए उस को कार्य में परिणत करना है । यही है स्वार्थता का सूली पर चढ़ना, और यही है समष्टि आत्मा का पुनरुत्थान । इसका एक अंग ( रूप ) साधारणतः भक्ति और दूसरा अंग ( रूप ) ज्ञान कहलाता है । ॐ ॐ

Take my life and let it be. Humbly offered, All, to Thee.

Take my hands and let them be. Working, serving Thee, yea! Thee.

Take my heart and let it be. Full saturated, Lord, with Thee.

Take my eyes and let them be. Intoxicated, God, with Thee.

Take this mind and let it be. All day long a shrine for Thee बरवा छन्द । 1—मम सर्वस स्वीकारहु, हे कृपानिधान ! अर्पहुँ दोउ कर जोरे, मैं श्री भगवान ! 2—स्वीकारहु हाथन को, हे श्री महराज ! तव सेवा के कारण, मैं अर्प्पौं आज ! 3—हृदय मोर स्वीकारहु, हे अति निष्काम ! तव मूरति हिय भासै, सब सुख की धाम !

4—नयन मोर स्वीकारहु, हे श्री जगदीश ! भक्ति-धुंध ह्वै जावें, मैं नाचौं शीश ! 5—चित्त मोर स्वीकारहु, तुम अहो सुजान ! मंदिर होय तुम्हारो; कछु हेतु न आन ! 6—अस न रहे कछु मोपै, जो होवे मोर ; फुरै मोर सब तुममें, नहिं दूसर ठौर !

यह उक्त समर्पण पूर्णता पर पहुंचने के पश्चात् "तत्त्वमसि" ( वह ब्रह्म तू ही है ) इस महा वाक्य का आनन्द- मय स्वरूप अनुभव होता है ।

आप स्वदेशानुरागी वा स्वदेशभक्त हुआ चाहते हैं ? तब अपने आप को देश तथा देश बन्धुओं के प्रेम में एकताल [ अभेद ] करो, उनके साथ अपनी एकता अनुभव करो । आपकी यह परिच्छिन्न व्यक्ति की छाया भी आप में और आप के देश बन्धुओं में एक पतला कांच का पर्दा तक न होने पाय । अपने प्राणों को स्वदेश-हित में अर्पण करते हुए आप एक सच्चा आध्यात्मिक योद्धा बनिये । क्षुद्र अहंकार के त्याग से स्वयं समस्त देश रूप होने पर आप के मन में जो विचार उत्पन्न होगा, वह आप का ही नहीं किन्तु सारे देश का होगा । तुम चलो, देश तुम्हारे साथ चलेगा । तुम चित्त में स्वास्थ्य का ख्याल करो, आप के देशबन्धु स्वस्थ होजायंगे । आप का बल उनके नस नाड़ी में धड़कने लगेगा । ओह, मुझे निश्चय करने दीजिये, कि "मैं भारत वर्ष, समस्त भारत वर्ष हूं । भारत भूमि मेरा अपना शरीर है । कन्याकुमारी मेरा पांव है । हिमाचल मेरा शिर है । मेरे बालों से श्री गंगा जी वहती हैं । मेरे शिर से सिन्धु और ब्रह्मपुत्र ( नद ) निकलते हैं । विन्ध्या-

चल मेरी कमर के गिर्द कमरबन्द है । कोरूमण्डल मेरी दहिनी और मालाबार मेरी बायीं जंघा ( टांग ) है । मैं समस्त भारत वर्ष हूं । इस की पूर्व और पश्चिम दिशाएं मेरी दोनों भुजाएं हैं, और मैं उन भुजाओं को मनुष्य जाति को आलिंगन करने के लिये सीधा फैलाता हूं । आहा, मेरे शरीर का ऐसा ढांचा (वा आकार) है । यह सीधा खड़ा है और अनन्त आकाश की ओर दृष्टि दौड़ा रहा है । परन्तु मेरी वास्तविक आत्मा सारे भारतवर्ष की आत्मा है । जब मैं चलता हूं तो अनुभव करता हूं कि यह सारा भारतवर्ष चल रहा है । जब मैं बोलता हूं तो मैं भान करता हूं कि यह भारतवर्ष बोल रहा है । जब मैं श्वास लेता हूं, तो महसूस करता हूं कि यह भारत वर्ष श्वास ले रहा है । मैं भारतवर्ष हूं, मैं शंकर हूं, मैं शिव हूं" । स्वदेश भक्ति का यह अति उच्च अनुभव है । और यही व्यावहारिक वेदान्त है ।

ॐ ! ॐ !! ॐ !!!