जीवित कौन है ?
आपत्तिकारक—यह भूल भुलैयाँ क्यों बना रक्खी हैं ? ये पेच पेच वाले घेरे किसको फँसाने के लिये हैं ? विचित्र चक्करों में डाला चाहते हो ?
*यह उर्दू लेख दूसरा है जो गृहस्थाश्रम के समय सन 1900 में स्वामी राम जी की लेखनीसे निकला था और उर्दू मासिक पत्र (रिसाला अलिफ़) के दूसरे नम्बर में प्रकाशित हुआ था। यद्यपि इस लेख का विषय वही है जिस पर स्वामी राम का अमरीका में आत्मविकास (Expansion of Self) के नाम तले व्याख्यान हुआ था, और जो ग्रन्थावली के प्रथम भाग में दूसरे नम्बर पर प्रकाशित भी हो चुका है;तथापि लेखनी ओर वक्तृता की शैली में बहुत भेद है जिससे लेखनी का भी शब्दशः अनुवाद दे देना पाठकों के लिये आवश्यक समझा गया । मंत्री
राम—प्यारे ! चक्करों से छुटकारा दिलाने को ये घेरे प्रकट किए गए हैं—तुम्हारी दशा दिखाने को ये दर्पण उपस्थित किए गए हैं ।
कबूतर को जब बिल्ली पकड़ने आती है, तो वह बेचारा भोला कबूतर अपनी आँखें बंद कर लेता है । मानो ऐसा करने से बिल्ली की दृष्टि से अोभल हो गया है । पर अोभल कहाँ ? कबूतर को यद्यपि बिल्ली दिखाई न दे, बिल्ली की आँखें बराबर खुली हैं, चट शिकार कर लेगी । वैसे ही भई, अपनी शोचनीय दशा को तुम यदि बिसार दोगे तो क्या विपत्ति रूप सर्प के चक्कर से छुटकारा हो जायगा ? विरुद्ध इसके सुना होगा कि जंगल में यदि सिंह चीता आदि से सामना आ पड़े, तो वह व्यक्ति बच निकलता है जो सिंह आदि से नेत्र-युद्ध ( टकटकी लगाकर घूरने ) में न हारे । इसी तरह संसार में बहुधा अपनी त्रुटियों और अपराधों पर विचार पूर्वक दृष्टि टिकाने (retrospection) में झट उनसे निवृत्ति की विधि निकल आती है । पाठक ! आज अपनी- अपनी दशा पर विचार करना होगा ।
आपत्तिकारक—अजी ! इस पेचीदा निबंध को पढ़कर कौन मस्तिष्क चक्कर में डाले ? आप ही इसे लिखो और आप ही पढ़ो; दूसरे को इससे क्या सरोकार ? इस तरह आपका अद्वैत खूब सिद्ध होगा ( ठीक उतरेगा ) ।
राम—निस्संदेह "रहनुमा अज़ पेचो-ताबस्त ई रहे- पेचीदा रा" ( इस पेचीले मार्ग का मार्गदर्शक ही स्वयं पेच और ताब में है ) । पर भई ! आप ही लिखने और आप ही पढ़ने की तो एक ही कही—
खुद कूज़ा ओ खुद कूज़ागरो खुद गिले-कूज़ा । अर्थ—आपही बर्तन, आपही बर्तन बनानेवाला, और आपही बर्तन की मिट्टी हूँ ।
शागिर्द हैं तो हम हैं, उस्ताद हैं तो हम हैं ।
हमारे स्वरूप की एकता में कभी अंतर नहीं आसकता । स्पष्टतः यद्यपि सहस्रों और लाखों मनुष्य इस निबन्ध के पढ़ने वाले हों, फिर भी एक राम ही सब में रहनेवाला है, सब से समवाय-संबंध रखनेवाला है, स्वयं लिखता है, स्वयं पढ़ता है, और स्वयं निबंध (मज़मून) बनता है, और पढ़ कर स्वयं ही आनंदित होता है ।
हा 3 वु हा 3 वु हा 3 वु । [unclear] । अहमन्ना- दो 3 ऽहमन्नादो 3 ऽहमन्नादः । अहꣳ श्लोककृदहꣳ श्लोक- कृदहꣳ श्लोककृत् । (यजु० तैत्तिरीयोपनिषद् भृ० व० अ० 10)
अर्थ—आहा ! आहा ! आहा ! मैं अन्न ( ज्ञेय-Object ) हूँ, मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ । मैं अन्न खानेवाला ( ज्ञाता-Sub- ject ) हूँ, मैं खानेवाला हूँ, मैं खानेवाला हूँ । मैं कवि ( अन्न और भोक्ता को मिलानेवाला ) हूँ, मैं कवि हूँ, मैं कवि हूँ । अर्थात् ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय मैं ही हूँ ।
अलिफ़ के अर्थ हैं "हज़ार", तिसपर भी अलिफ़ एक (١) ही है । सागर में लाखों तरंगें होने दो, सागर की एकता में अंतर नहीं आ सकता । मेरे अपना आप आपत्तिकारक महा- शय ! यदि इन गोल चक्करों से बचने के लिये इस निबंध से उपेक्षा करना चाहते हो, तो बताओ तो सही कि पहले इस संसार-चक्र के चक्करों से रक्षा का कोई उपाय निश्चित कर चुके हो ? पहले तो आपका नेत्र ही गोल है, चक्कर है, फिर आकाश की ओर दृष्टि डालो,तो वह गोल चक्कर है । सूर्य,
चंद्र,तारक सब गोल हैं (चक्ररूप हैं) । समधरातल वा सीधी रेखा ( Straight line ) जिसे कहते हैं, वह आधुनिक काल के गणितज्ञों के अनुसंधान की दृष्टि से एक अति विस्तृत वृत्त है, बहुत ही चौड़ा चक्कर है, जिसका केंद्र अनंत व्यवधान ( दूरी ) पर है । सेंट आगस्टन के कथनानुसार
God is like a circle whose centre is every- where but circumference nowhere.
"ईश्वर एक वृत्त है जिसका केंद्र तो है सर्वत्र, किंतु वृत्तरेखा कहीं नहीं ।" ऋतु की (monsoon) और व्यापारिक वायु (trade wind) विषुवत्रेखा (equator) की ओर चलती हैं, हल्की बनकर ऊपर उड़कर ऐंटी-मानसून (Anti-monsoon) और ऐंटी-ट्रेड-विंड ( anti-tradewind ) के नामों से नामित हो लौट जाती हैं, फिर सर्दी से नीचे उतर विषुवत्रेखा की ओर मुख करती हैं; यों हर समय चक्कर में लगी हैं, चक्कर प्रकट करती फिरती हैं । समुद्र के ज्वारभाटा की गति का यही हाल है, जैसा कि गल्फस्ट्रीम (Gulf Stream) और ऐंटी-गल्फस्ट्रीम ( anti Gulf- stream) के नाम ही स्पष्ट करते हैं । नदियाँ बेचारी रहट के टिंडों की तरह चक्कर में लगी हैं, पहाड़ों से उतरती हैं, बड़े परिश्रम से भूतल-वृत्तखंड ( क्रौसे-नज़ूली ) पार करके समुद्र तक पहुँचती है, वहाँ से वाष्प के स्वरूप में ऊपर आकाशी-वृत्तखंड ( क्रौसे-सऊदी ) पार कर के पहाड़ों तक लौट जाती हैं और पूरा चक्कर बनाती हैं । घड़ी की सुइयाँ XII ( बारह ) से चलती हैं, और I (एक) II (दो) आदि सब निबेश स्थान पार करके फिर XII ( बारह ) पर आ जाती हैं । उनके भाग्य में दिन-रात इसी
चक्कर की क़ैद रक्खी है । इसी साइक्लिक आर्डर ( cyclic order) काल-चक्र में पड़ी चक्कर खाती हैं ।
इसी प्रकार "सबेरा, दोपहर, शाम और रात" काल-चक्र के पेच में लुढ़क रहे हैं । वसंत, ग्रीष्म, पतझड़ और शीत उसी टाइम के फ्लाई-ह्वील (flywheel) या चक्र पर धावमान हैं । सत्युग,त्रेता,द्वापर और कलियुग अस्तित्व (existence) के सर्कस ( circus ) क्रीड़ा-चक्र में यह चारों उचकते फांदते ( घोड़दौड़ मचाते ) संसाररूपी धूलि उड़ाते चक्कर लगा रहे हैं । स्वयं भूमि परिक्रमा में है । चंद्रमा इस घूमने के कारण पीला हो रहा है । सब नक्षत्र किसान की घुमानी की तरह घुमाए जा रहे हैं । ध्रुव तारा प्रकृतिमाता के चक्र (Spinning wheel) में तकले का सिरा बन अपने आप में चक्कर खा रहा है । समुद्र इस गति के कारण कोलाहल मचा रहा है । वायु इस चक्र में ठंढी सांसें खींच रहा है । विपत्तिग्रस्तों के घरों में जो धौं उपद्रवी (दैव विरोधी) कहलाता है, वह धौं इस दिनों के फेर ( काल-गति ) की आँखें देखकर तारा रूपी शोक भरी दृष्टि चारों ओर डाल रहा है ।
हवा नहीं है, ये नेचर की सर्द आहें हैं । सितारे कब हैं ? ये हसरत-भरी निगाहें हैं ॥
निदान कहाँ तक इस चक्कर के अत्याचार लिखें ? जीवन स्वयं भी तो अस्तित्व-सागर में एक भँवर ( चक्कर ) है । कुछ-काल अस्तित्व-नद ( अधिष्ठान, Noumenon ) के तल पर जीवन का भँवर विहार बनाता है, फिर मिट जाता है ।
यदि जन्म-मरण की चक्की से मुक्ति चाहते हो, तो इस वृत्तवाले निबंध को ध्यान और धैर्य से पढ़ो । धीरज के साथ चुपके चुपके हम से बातें करते हुए पहले कुछ टेढ़ी खीर
वाले पृष्ठों की यात्रा पार कर जाओ, फिर सीधी पगडंडी दृग्गोचर होगी, सत्य मार्ग दिखाई पड़ेगा । देखना ! कहीं इन छोटे-छोटे घेरों के फंदे में ही फँसे न रह जाना ?
वृत्त के घेरे अर्थात् (phenomena, नाम रूप) पर जब तक दौड़ धूप ( परिभ्रमण ) रहेगा, विरोध और भगड़े-बखेड़े कदापि शांति ( peace ) का रूप नहीं पकड़ेंगे । यदि (distracations) चित्त के विक्षेप (खैंचातानी) और चिंताओं से छुटकारा पाना मंज़ूर है, तो केंद्र अर्थात् (noumenon, स्वरूप ) की ओर मुख करो, उपनिषद् विद्या पढ़ो, जहाँ सब भेद मिट जाते हैं, भिन्नता आग जाती है । बाहरी (अपरा) विद्याएं लैंटर्न ( lantern ) के प्रकाश के सदृश हैं । यह प्रकाश आस-पास की वस्तुओं को किसी अंश में जगमगा अवश्य देता है, किंतु उसका वृत्त सदैव अंधेरे के वृहद् वृत्त से घिरा होता है । प्रकाश जितना बढ़ेगा, अंधकार का वृत भी उतना ही वृद्धि कर जायगा । यूनानी लोग पानी को तत्व (Element) स्वीकार करते थे । आज कल के विज्ञान ने पानी को कई तत्वों से युक्त बताकर उसकी जगह आक्सीजन और हाइड्रोजन को तत्व सिद्ध कर दिखाया । जहाँ पहले एक ( पानी ) अज्ञात ( विज्ञातव्य ) था, अब दो ( आक्सीजन और हाइड्रोजन ) अज्ञात निकल पड़े । विद्या अवश्य बढ़ी, किंतु साथ ही उसके अज्ञान का वृत्त भी विस्तीर्ण हुआ । बाहरी विद्याओं में इधर न्यूटन के ज्ञात-तत्वों की प्राप्ति होगी, उधर अविज्ञात वस्तुओं का सागर ऐसा तरंगाकुल हो जायगा कि उन ज्ञात-तत्वों को केवल किनारे के कंकड़-सीप आदि से तुलना देना पड़ेगी ।
Empirical science ( रूप-गुण-विज्ञान ) का दुःशासन प्रपंच ( संसार ) रूपी द्रौपदी के आवरण ( चीर ) उतारना
चाहता है, एक तह उतरने नहीं पाती कि दूसरी उपस्थित हो जाती है, वह उतरते ही तीसरी उपस्थित हो जाती है— इत्यादि; और दुःशासन बेचारा घबराकर कह उठता है— "नारी में साड़ी है कि साड़ी में नारी है ?"
Veil after veil will left and there will be veil after veil behind.
सर आइज़क न्यूटन ने एक बेर अपने घर में पँखा लगाया । एक अद्भुत लक्ष्य से लीवर और चक्र आदि को तर्तीब देकर पँखाकुली पालतू चूहों को नियत किया । वह यों कि दांतों वाले एक पहिए ( toothed wheel ) के सिरे के निकट थोड़े से गेहूँ इस विधि से रक्खे कि पहिए के चलने फिरने से गेहूँ न हिलने पावें । चूहा गेहूँ को लेने की कामना से जब एक दाँत से उछल कर दूसरे दाँत की ओर जाता तो पहिया फिर जाता, पँखा हिल जाता, किंतु गरीब मज़दूर ( चूहा ) फिर अपनी पुरानी जगह पर नीचे गिर जाता और गेहूँ से उतने ही अंतर पर रहता जिस पर पहले था । वह भोंदू (dupe) फिर उछलता, पँखा हिला देता, किंतु आप कुछ न पाता, इत्यादि । हाँ, यह विचार उसे प्रतिक्षण रहता कि "लो, यह गेहूँ मिला, वह मिला, अब मिला कि मिला, एक बेर और उछलने की देर है, तत्काल पालूँगा ।" इसी प्रकार संसार की चाह अथवा सांसारिक विद्याओं की चाह भोले चूहे के समान कभी अपने मनोरथ को नहीं पा सकती, कभी शांत नहीं हो सकती, वास्तविक तत्व (Truth) को कभी छू नहीं सकती । यद्यपि इतना अवश्य है कि इसकी कृपा से ठाठी ईश्वर भगवान् का पँखा हिलता जाता है ।
सूर्य के प्रकाश के स्पैक्ट्रम ( Spectrum-सप्त रंजन व रश्मिवर्ण ) में काली लकीरें ( dark lines ) हुआ करती
हैं, किंतु सूर्य-ग्रहण के अवसर पर स्पेक्ट्रम को देखें, तो ये लकीरें श्वेत दृष्टिगोचर होंगीं । ठीक उसी तरह प्यारे पाठक ! ये रेलें, तोपें और बिल्लोनें जो अविद्या रूपी ग्रहण के समय सफ़ेद तारें ( प्रकाशमान ) मालूम देती हैं, ग्रहण हटने पर देखी जायँ तो काली धारियाँ बन जायँगी ।
वकूए-मयफ़रोशानश ब जामे बर न मे गीरंद । ज़हे सज्जादहे-तक़्वा कि यक सागर न मे अरज़द ॥
कुलाहे-ताजे-सुल्तानी कि बीमे-जाँ दरो दर्ज स्त । कुलाहे-दिलकश स्त अम्मा व दर्दे-सर न मे अरज़द ॥
अर्थ—यह अद्भुत संयम ( तप ) का उपासनासन है कि ( प्रेम के ) एक प्याला के बदले भी नहीं बिकता, क्योंकि मध-विक्रेताओं ( ज्ञानियों या तत्वविदों ) की गली में उस (सांसारिक व्रत, नियम वा संयम) को एक प्याले के बदले भी नहीं लेते हैं, अर्थात् सत्पुरुषों के समक्ष बाह्य संयम या सांसा- रिक उन्नति कुछ सम्मान नहीं रखती । बादशाही-ताज की टोपी, जिसमें कि प्राण का भय है, यद्यपि चित्ताकर्षक है, किंतु शिरपीड़ा के बदले भी नहीं विक सकती, अर्थात् इस बहुमूल्य ताज से शिर-पीड़ा (बेचैनी) भी दूर नहीं हो सकती ।
What shall it profit a man if he shall gain the whole world but lose his own soul.
"यदि आत्मा को बेच कर किसी ने समस्त संसार को प्राप्त कर लिया, तो क्या लाभ !"
इसमें कुछ संशय नहीं कि सांसारिक विद्याओं के ज्ञाता सांसारिक ख्याति के आकाश पर तारा होकर चमकने के योग्य हैं, और अंधेरी रात में कई भूले भटकों को मार्ग-लुप्त करने से बचाते हैं, और अपने प्रकाश से यात्रियों को कीचड़ में फँस जाने या गड़हे में गिर जाने से हटाते हैं । यह सब
कुछ तो ठीक, किंतु ज्ञान का सूर्य उदय होने पर तारे-वारे सब लुप्त हो जाते हैं, उनकी कुछ भी शक्ति नहीं रहती ।
दुनिया व आक़बत बना, वाह वा जो जहल ने किया । तारों सा मिहरे-राम ने दम में उड़ा दिया कि यों ॥
अय भारतवासियों ! अंधेरे कमरों में घुसकर अंधेरी रात की उपयुक्त आतिशबाज़ियों और कृत्रिम भाड़-फ़ानूसों के द्वारा सजावट बनावट करना तो तुम विदेशियों से सीख ही रहे हो, किंतु हाय ! अपने देश के दिवाकर ( ब्रह्मविद्या ) को मुँह दिखाने से भी परहेज़ किया जाता है ।
वृत्त—आओ, अब तनिक इन वृत्तों के तत्त्व पर विचार करें । इस अवसर पर उचित मालूम होता है कि वे पारिभा- षिक शब्द जो बेर-बेर इस प्रबंध (मज़मून) में आवेंगे, उनकी भी कुछ व्याख्या की जाय ।
परिभाषा—वृत्त (circle-दायरा) उस गोलाकार को कहते हैं जो एक रेखा ( गोल लकीर जिसको कि परिधि (circumference या 'मुहीत" कहते हैं ) से घिरी हुई हो, और जिसके बीच में एक ऐसा बिंदु ( केंद्र, centre या मर्कज़ नामक ) हो जिससे चाहे कितनी ही रेखायें ( लकीरें ) परिधि तक खींची जाएँ,सब परस्पर समान हों । इन परस्पर समान लकीरों में प्रत्येक को अर्धव्यास ( त्रिज्या, radius ) कहते हैं ।
[Diagram: a circle labelled परिधि at the top (circumference); a line from the centre to the circumference inside the circle labelled अर्धव्यास, with the centre point labelled केंद्र; the circle as a whole labelled वृत below.]
वृत्त यादि अत्यंत छोटा हो, अर्थात् उसका अर्धव्यास यदि अत्यन्त दर्जे तक सूक्ष्म हो,तो इस दशा में वृत्त केवल एक बड़ा बिंदु (point-नुकता ) सा बन जायगा, जैसे इस निबन्ध के पहले पृष्ठ पर की शकल में सब से छोटे वृत्त का केंद्र ह्,य के बहुत निकट है; अर्थात् अर्धव्यास ह् य बहुत छोटा है, इसीलिये ह् वृत्त शून्य बरन् बिंदु सा बना हुआ है । फिर ज्यों ज्यों य से केंद्र की दूरी बढ़ती जायगी, अर्धव्यास लंबा होता जायगा, और वृत्त चौड़ा होता जायगा । पहले पृष्ठ की शकल में दूसरे वृत्त का केंद्र ( छोटा ) द् अधिक अंतर पर गया, तो वह वृत्त द् भी बढ़ा । इस वृत्त में ह् जैसे कई वृत्त आ जाते हैं । तीसरे वृत्त का केंद्र (छोटा) ज और भी दूर गया, तो साथ ही उस वृत्त का राज्य भी फैल गया, यहाँ तक कि इसमें द् जैसे कई वृत्त समा सकते हैं ।
इसी धारणानुसार ब् वृत्त ( जिसके केंद्र छोटे ब् ने पग और भी आगे बढ़ाया ) इस उन्नति को पहुँचा कि ज और द् और ह् जैसे कई वृत्त उसमें खप जाने की गुंजाइश हो गई ।
परिणाम—परकार का केंद्र-बिंदु ज्यों ज्यों दूर रक्खा जायगा, वृत्त का विस्तार बढ़ता जायगा ।
यहाँ पर एक और बात पर भी दृष्टि पात करना उचित होगा । इन वृत्तों पर एक विचार की दृष्टि डालियेगा । य स्थान सब वृत्तों के लिये सांझा ( मुशतरका ) है, और अ य आ सब वृत्तों की स्पर्श-रेखा (tangent-मुमास) है । ह् वृत सब से छोटा है । द् वृत उससे बड़ा । इसीलिये छोटा वृत ह् बड़े वृत द् के भीतर विद्यमान है ।
या यों कहो कि बिंदु य के निकट वृत द् की परिधि सीधी रेखा अ य के और वृत ह् के बीच में विद्यमान है ।
इसी बात को अन्य शब्दों में यों कह सकते हैं कि वृत द् ( जो ह् वृत से बड़ा है ) सीधी रेखा अ य की ओर वृत ह् की अपेक्षा अधिक झुके हुए है ।
या वृत ह् की अपेक्षा बड़े वृत द् का लगाव सीधी लकीर अ य की ओर अधिक है ।
और छोटे वृत की अपेक्षा बड़े वृत का सीधी रेखा से ( टेढ़ापन वक्रता ) कम है ।
अर्थात् ( दूसरे शब्दों में ) वृत द् जो बड़ा है, उसकी वक्रता ( खम, टेढ़ापन, curvature ) छोटे वृत ह् की वक्रता की अपेक्षा कम है, और य बिंदु के निकट बड़ा वृत छोटे की अपेक्षा सीधी रेखा से अधिक अनुरूप है । इसी प्रकार ज वृत की वक्रता (curvature) द् वृत की वक्रता से भी कम है, और ज वृत द् से भी अधिक सीधी रेखा की सादृश्यता रखता है । इसी प्रकार से वृत ब् वृत ज को भी मात कर गया है ।
परिणाम—स्थान य पर एक गुण आलिंगन के लिये अपने बाहुओं को दहिने बाएँ फैला, प्रेम का वृत ज्यों ज्यों बढ़ेगा, त्यों त्यों उसकी परिधि सीधी-रेखा से अधिक अनुरूप होती जायगी ।
इन दोनों परिणामों को मिलाने से यह उपलब्ध होता है कि ज्यों ज्यों केन्द्र आगे को उन्नति करेगा, वृत का विस्तार
अधिक होता जायगा और सीधी लकीर ( सीधा मार्ग वा सन्मार्ग ) से उसकी तदाकारता ( एकता ) बढ़ती जायगी ।
अंततः केंद्र जब अनंत (infinite) दूरी पर पहुँचा तो वृत के विस्तार की नाप-जोख करना मानवी शक्ति से परे हुआ । और य के निकटस्थ परिधि के हाल चाल की सुध ली, तो काया पल्टी हुई पाई । सीधा आलिफ़ (!) का स्वरूप दृगोचर हुआ, कुबड़ी पीठ अर्थात् वक्रता को लुप्त पाया, और वृत ने लम्बा क़द बनकर ऊँचे सरू समान प्रिया का सौंदर्य दिखाया, अर्थात् केंद्र के अत्यंत दूरी पर चले जाने से वृत सीधी रेखा बना ।
उदाहरण—नारंगी गोल होती है । उसके केंद्र में से होता हुआ एक खंड काट लिया जाय, तो सदैव गोल वृत होगा । खरबूज़े को भी ( केंद्र से होती हुई सीधी सतह में ) चीरा जाय, तो वृत ही लब्ध होगा । एक बड़े हिन्दवाने ( तरबूज़ ) को लो । उसको काटने का कष्ट तो क्या स्वीकार करोगे, उसके ऊपर चाकू को इस प्रकार टिकाओ कि चाकू की नोक सदैव हिन्दवाने की ओर रहे, और फिर उस नोक से हिन्दवाने पर लकीर खींचते जाओ । यह लकीर भी एक वृत की परिधि होगी, किंतु खरबूज़ा वाले वृत से यह बड़ा होगा, क्योंकि हिंदवाना स्वयं खरबूज़े से बड़ा होता है ।
अब पृथिवी भी तो नारंगी, खरबूज़ा या तरबूज़ की तरह गोल ही मानी गई है । अंतर है तो इतना कि पृथिवी इन की अपेक्षा बहुत ही बड़ी है, इस लिये किसी ऊपर के ऊर्ध्वाधार धरातल ( vertical plane ) में चलते २ तरबूज़ की तरह धरती पर भी एक लंबी रेखा खेंचते जाएँ, तो गणित शास्त्र के मत से यह रेखा सीधी रेखा न होना चाहिए, बरन् एक
वृत्त का खंड (या धनुष) होना चाहिए । और जिस प्रकार हिंदवाने आदि पर खिंची हुई कोई भी रेखा सीधी रेखा नहीं होती, गोल ही होती है; इसी प्रकार भूमि पर चाहे किसी भी प्रकार से रेखा खींची जाय, बिलकुल सीधी कभी नहीं होना चाहिए, गोल ही होगी ।
आपत्तिकारक—क्या अच्छी कही,ऐसा क्यों न होगा ? यह तो बच्चा भी बता देगा कि भूमि पर सीधी लकीरें खिंच सकती हैं, बताने का तो क्या चर्चा है, अभी खींचकर दिखा देगा, और सब लोगों का अनुभव इस बात का साक्षी है कि सड़कें और बाज़ार सीधे हुआ करते हैं; यह विचित्र बुद्धि का अजीर्ण है जो आप आदेश करते हैं कि "बाज़ार धन्वाकार हैं, सबकी सब सड़कें वृत्तों के खंड हैं"। बचपन में सुना करते थे यह कहावत कि "अरबा ज्यों का त्यों कुनबा डूबा क्यों" ।?*
यहांपर वही कहावत ठीक फबती देख ली । पढ़ पढ़ कर
*नोट-किसी को जाडे की ऋतु में परिवार-सहित नदी पार उतरना था । पहले तो उसने स्वयं अकेले ही लाठी हाथ में ली और नदी की गहराई को स्थान स्थान से जाकर नापा। फिर बहुत समय खर्च करके त्रैराशिक (Rule of three, अरबा) आदि गणित के नियमों की सहा- यता से गहराई का मध्यमान (औसत) ज्ञात किया।तदनंतर अपनी उँचाई को और अपने स्त्री-पुत्रों की उँचाई को मापा । और समस्त कुटुंब के लिये उँचाईके मध्यमान(औसत)को अनुमानतः निकाला। यह उँचाई का मध्यमान नदी की गहराई के मध्यमान से अधिक पाया गया, और इसी उँचाई के भरोसे बाल बच्चों को लेकर बेधड़क नदीमें उतर पड़ा । अब यचपि गहराई का मध्यमान तो उन सब के शरीरों की लंबाई के मध्यमान से कम था किंतु नदी के किन्हीं किन्हीं स्थानों पर पानी बहुत गहरा था; वहाँ तक पहुंचे तो बच्चे विचारे लगे डूबने ।
भी तो मस्तिष्क कैसे प्रकीर्ण ( परिभ्रष्ट ) हो जाते हैं ! ठीक है, इसही मस्तिष्क-विकृति ( परेशानिये-दिमाग ) के कारण तो ये लोग अच्छे भले प्रत्यक्ष दिखाई देते संसार को मिथ्या निश्चत कर दिया करते हैं, और सब ब्रह्म ही ब्रह्म बताया करते हैं, और ऐसे निरर्थक वाक्य बोला करते हैं ।—
बसकि दर चश्मो-दिलम हर लहज़ा ऐ यारम तूई । हरचे आयद दर नज़र आज़ दूर पिंदारम तूई ॥
अर्थ—मेरे नेत्रों और हृदय में हर समय ऐ यार ! तू ऐसा बसा हुआ है कि जो कुछ मुझे दूर से दिखाई देता है मैं ख्याल करता हूँ कि तू ही है ।
बेगाना गर नज़र पड़े तू आशना को देख । बंदा गर आए सामने तो भी खुदा को देख ॥
राम—प्यारे ! पहले हमारी पूरी बात तो सुन ली होती, फिर आप रोष भी प्रकट कर लेते । तेज़ी (तीव्रता) तनिक न करो, इस तीव्रता के कारण बुद्धि के पैर अवश्य फिसलेंगे । हम जानते हैं आज इन साधारण गणित के प्रश्नों से आंखें घिसाते २ आप थक गए हैं, और इसी लिये भवें चढ़ाए हुप हैं, किंतु आप को यह एक बेर स्मरण दिलाया जाता है कि आप उस देश के रहने वाले हैं जहां से गणित का सूर्य उदित हुआ, आप उन ऋषियों की संतान हैं जिनके लिये तत्त्व-विचार, तत्त्व-चिन्तन, high thinking ही भोजन पान ( meat and drink ) था । और पूर्ण आशा की जाती
उस समय हमारे पाश्चात्य गणितशास्त्रज्ञ महाशय को बच्चों के डूवने मरने का तो कुछ शोक हुआ या नहीं, नहीं कह सकते; पर हाँ अपने हिसाब के उत्तर पर अत्यंत विस्मय हुआ कि अहो आश्चर्य "अरबा ज्यों का त्यों, कुनबा डूबा क्यों ?" ।
है कि भविष्य में अत्यंत सूक्ष्म और जटिल प्रश्नों का सामना करते भी आप घबराएँगे नहीं । लो सुनो, भूमि पर जो रेखाएँ और लकीरें खींची जाती हैं, वस्तुतः वे धनुष और वृत्त के खंड ही होते हैं ; मगर क्योंकि समस्त पृथ्वी एक अति बृहत् गोला है, इस लिये भूमि पर की ये रेखाएँ बहुत बड़े वृत्त के खंड होती हैं, और इसी कारण ये रेखाएँ सीधी लकीरों के सदृश दिखाई देती हैं ।
पृथिवी-तल पर मनुष्य का चलना-फिरना ऐसा है जैसे मिट्टी के किसी भांडे ( गोल बर्तन अर्थात् ठलिया या घड़ा ) के तल पर चींटी का रेंगना । भूमि के जिन वृत्तों के खंडों पर मनुष्य चलता फिरता है, उन वृत्तों का केंद्र लगभग चार हज़ार मील की दूरी पर होता है । फिर वह वृत-खंड सीधी रेखाओं के रूप में क्यों न दृग्गोचर हो ? यह बात इस सिद्धांत का व्यावहारिक प्रमाण है कि जिस वृत का केंद्र अत्यंत दूरी पर जायगा, वह सीधी रेखा बन जायगा ।
ऐ प्यारे ! वृत का सीधी रेखा बन जाना जिस प्रकार गणितज्ञ लोग निश्चत करा देते हैं,उसी तरह तनिक धैर्य और शांति से काम लिया तो आपको बेगाना ( अजनबी, पराया ) का आशना ( मित्र, सखा, अपना ) बनाना और बंदे ( जीव ) का खुदा (ईश्वर) बन जाना भी अवश्य निश्चत हो जायगा ।
जिस प्रकार संसार के नाशमान बखेड़ों में हिम्मत (साहस) नहीं हारते, इधर ( भीतर की ओर ) भी कटिबद्ध होकर ध्यान दिया तो अच्युय जीवन मिलेगा, नित्यानंद पाओगे ।
क़तरा बिगरीरस्त कि अज़ बहर जुदायम-हमा । बहर बर क़तरा बख़ंदीद कि मायेम हमा ॥
बहक़ीक़त दिगरे नेस्त खुदायम हमा । लैक अज़ गरदिशे-यक नुक्ता जुदायम हमा ॥
अर्थ--बिंदु रोया कि हम सब समुद्र से भिन्न हैं, और समुद्र विंदु पर हँसा कि हम सब पानी हैं । वास्तव में कोई दूसरा नहीं, हम सब खुदा हैं, किंतु एक बिंदु के एर फेर से हम सब खुदा ( خدا ) से जुदा ( جدا ) हो गए हैं ।
जीवन—की सामान्य पहचान ( characterestic ) है गति ( चेतनता, energy ) ।
जीवित मनुष्य ( बाहुबल से ) सब कुछ कर सकता है, कोठे पर चढ़ता है, गड्ढ़ों में उतरता है, उछलता है, कूदता है, दौड़ता है, बरन् अपने बल से निकटस्थ वस्तुओं को गतिशील करता है । मृत-मनुष्य का न हाथ हिल सकता है, न पैर, न आँख कान और न कोई अन्य अंग ; उसकी नाड़ी गति नहीं करती, उसकी साँस गति नहीं करती । और क्योंकि मृतक से किसी प्रकार की गति प्रकट नहीं हो सकती, उसमें जीवन का नाम और चिन्ह भी नहीं होता ।
जीवित पशु आप चलता है । बग्घी रथ आदि को चलाता है, किसान का पुर ( रहट ) चलाकर खेतों को सिंचित करता है, अरब के मरुस्थल में इतना काम आता है कि "जंगल का जहाज़" नाम पाता है । बंगाल के कुछ वनों में जब उच्च स्वर से गरजता है, तो बनके समस्त पशुओं को चहुँ ओर दौड़ा देता है, तादृश गति में डाल देता है । मृत पशु बिचारा स्वयं गति करना या औरों में गति डालना तो एक ओर रहा, कुत्तों, चीलों तानिक-तानिक से (जीवित) कीड़ों की खुराक ( आहार ) बन जाता है ।
( जीवित वनस्पतियाँ बढ़ती हैं, फैलती हैं, शाखाएँ छोड़ती हैं, और बीज उत्पन्न करती हैं, जिनकी बदौलत अपने जाति भेद के वृक्षों से भूमि को मालामाल बनाती हैं; तात्पय यह कि गति करती हैं और गति से अभिवृद्ध पाती हैं । मृत वनस्पति (काटे हुए वृक्ष आदि) क्या बढ़ेंगे ? क्या उन्नति करेंगे ? उनमें गति प्रकट होती तो मृत क्यों होते ? "गति" ( energy ) का प्रकाश ( आविर्भाव ) विविध प्राणियों में विविध प्रकार का है । थोड़ा विचार करने से ज्ञात होगा कि सृष्टि में खनिज वर्ग, वनस्पति वर्ग, प्राणिवर्ग और मनुष्य वर्ग में ऊँचे नीचे पद गति के माप (तराजू) में तोलकर नियत किए गए हैं । जीवन की ( उच्च, नीच ) श्रेणियाँ सब गति ही की माप से परखी जाकर निश्चत हुई हैं, और गति ही की कसौटी में मनुष्य को समस्त जीवधारियों में श्रेष्ठ ठहराया है ।
जड़-सृष्टि ( खनिज वर्ग ) सामान्य ख़याल के अनुसार मनुष्य, पशु या वनस्पति की तरह अपने आप कोई गति नहीं कर सकती ; न बढ़ती है न संतति उत्पन्न करती है, न चलती फिरती है, न उछलती कूदती है, बल्कि बिलकुल जड़ (inert) है । यदि बाह्य शक्तियों के वशीभूत होकर जड़ वस्तुएँ ( पाषाण आदि ) एक-बेर स्थिर हो जाँय, तो सदैव स्थिर रहेंगी । और यदि बाह्य शक्तियों की बदौलत गति में आजायँ, तो गति में रहेंगी (न्यूटन के पहले गति-नियम के अनुसार ) । पाषाण आदि में अपने आप दशा बदलने या किसी प्रकार का गति-प्रकाशन करने की कुछ भी सामर्थ्य नहीं होती । अतः इसीलिये बिलकुल निर्जीव (inorganic) कहलाते हैं, और जीवन की निसेनी ( श्रेणी ) में सब से निचले पत्थर का दरजा पाते हैं ।
कुछ मनुष्यों का कथन है कि पृथिवी वर्ग अर्थात पहाड़, खानें आदि, या अन्य मुख्य २ जड़ पदार्थ अपने आप अपनी दशा बदलने की सामर्थ्य रखते हैं, किन्तु इतना कम कि शताब्दियाँ बीत जाने पर जो परिवर्तन इनमें हो वह सैकड़ों कठिनाइयों से मनुष्य को अनुभव हो सके । इस कथन को सत्य मान कर खनिज वर्ग को विशेषतः यदि हम "जीवन वाले" ( जीवित ) कह भी दें, तो उनकी भीतरी गति के भावानुसार उनको अधमतम श्रेणी के जीवन वाले मानना पड़ेगा । हाँ ! जीवन के परिषद् (दरबार) में वनस्पतियों का तटास्थान (प्रविष्ट) होना प्रायः सब कोई स्वीकार कर लेते हैं। खनिज वर्ग से वनस्पति वर्ग की महत्ता (श्रेष्ठता) का कारण जानना चाहो तो ज्ञात होगा कि उनकी भीतरी गति खनिज वर्ग की अपेक्षा अधिक प्रभाव (उत्तम स्वभाव) की है । वनस्पति फलते हैं,फूलते हैं, हरे भरे होते हैं, छाया देते हैं, भीनी भीनी सुगंध देते हैं, सुस्वादु मेवा देते हैं, इत्यादि । खनिज वर्ग में इनमें से एक बात भी कहाँ ?
जीवन की श्रेणी में पशुओं का दर्जा वनस्पति से ऊपर है । उसका कारण स्पष्ट ही है कि पशुओं की भीतरी गति उत्तम तर स्वभाव (प्रभाव) की है; पशुगण न केवल वनस्पति की तरह दिन प्रतिदिन बढ़ते हैं और मोटे होते हैं,बरन् एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सकते हैं, समुद्र के तल की खबर लाते हैं, आकाश की सैर करते हैं, चहचहाते हैं, गाते हैं । ये बातें वनस्पति को भला कहाँ प्राप्त हैं ?
मनुष्य पशुओं पर भी श्रेष्ठता रखता है । इससे संभवतः किसी मनुष्य को इनकार नहीं होगा, चाहे कारण प्रत्येक व्यक्ति को ज्ञात न हो, जो यह है कि मनुष्य में श्रेष्ठतम स्वभाव
( प्रभाव ) वाली ( भीतरी ) संकल्प शक्ति प्रकट होती है । बाहरी शक्ति से पत्थर आदि खनिज वर्ग के अनुसार मनुष्य का शरीर उछाला जा सकता है, और गिराया या फेंका जाना संभव है । वनस्पति के अनुसार मनुष्य का डील डौल बड़ा होता है, शरीर मोटा होता है । पशुओं के समान मनुष्य एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सकता है, दौड़ सकता है, गा सकता है । किंतु इसी पर बस नहीं है, मनुष्य की महत्ता उसकी श्रेष्ठतम भीतरी गति ( चेतनता ) पर निर्भर है, जो सृष्टि में और कहीं नहीं पाई जाती, जिसके कारण मनुष्य रेल को यह शीघ्रता प्रदान करता है कि महीनों की मंज़िलें घंटों में वह पार कर जाती है, जिसकी बदौलत शीघ्रगामी बिजली को चपरासी बना हज़ारों कोसों पर बैठे हुप मित्रों के समा- चार सिकंडों में मँगा सकता है, और तेज़गामी वायुयान ( विमान–Balloon ) तयार करके वायु की पीठ पर एक प्रकार से ज़ीन पालान जमा सकता है, जिसकी बदौलत एक स्थान पर बैठे बिठाए महाकाश की सैर कर आता है, और चंद्रमा, सूर्य, बुध, वृहस्पति, शुक्र आदि आकाश के नक्षत्रों की दशा को पहुँच जाता है । निदान, मानवी जीवन को श्रेष्ठता देनेवाला मनुष्य के भीतर चेतनता का स्रोत है । देवतागण अपने भक्तों के विचारानुसार इस प्रकार के जीवन वाले हैं कि जहाँ चाहें तत्काल उपस्थित हो जाते हैं, अभी आकाश पर थे, अभी किसी के स्मरण करने से भूमि पर आ उपस्थित हुए । भूत,भविष्य और वर्तमान के regions (प्रदेश वा मंडलों) में बिना रोक टोक प्रवेश कर सकते हैं । मन से भी अधिक गतिवाले हैं । उनकी गति श्रेष्ठतम होने के कारण वे मनुष्य से भी श्रेष्ठतम जीवन वाले हैं ।
परिणाम—जीवन का प्रमाण "आंतरिक गति का प्रकाश"
है, और इस गति के उतम या अधम प्रकार पर जीवन का उतम या अधम होना निर्भर है ।
मानवी रूप में जड़ ( खनिज वर्ग )-डाक्टरों ने सिद्ध किया है कि जब मनुष्य माँ के पेट में होता है, उसका शरीर श्रेणी-क्रम से कई छोटे २ पशुओं का रूप धारण करता है । सब से अंत में मनुष्य का रूप धारण करता है । अतः कैलग ( Kellogg ) साहब जैसे सुप्रसिद्ध डाक्टर का कथन है ।
During the period of pregnancy, the ovum undergoes a most remarkable series of changes, passing through various stages of develop- ment, in some of which it resembles in the most wonderful degree vareous lower forms of animal life. At one period, the developing human being, technically called a foetus, resem- bles not very remotely a partially developed chick from an egg which has been incubated for a few days. At another period the resemblance of the foetus to that of a dog of different age is so great that any but an experienced physio- logist might readily be deceived. At one time, the extremities of the foetus resemble very closely the stunted flippers of a seal or walrus. At a certain period, its body is entirely covered with hair, like its near relative in the animal kingdom, the ape.
अर्थ –गर्भ के दिनों में मानवी भ्रूण में लगातार अत्यंत अद्भुत परिवर्तन होते हैं, और वह विकास ( संवर्धन ) की विभिन्न श्रेणियों में से गुज़रता है । कुछ श्रेणियों में तो वह अत्यंत विस्मयकारक सीमा तक पशु जीवन के तुच्छ जीवों के सदृश्य होता है । यह क्रमशः विकास को पानेवाला ( या अभिवृद्धि करने वाला ) मनुष्य, जो परिभाषा में फीटस नाम से नामित होता है, एक समय ऐसे अधूरे मुर्गी के बच्चे से जो कुछ दिन ही से सिहा गया हो बहुत कुछ मिलता जुलता है; दूसरे काल में उसकी सदृश्यता विभिन्न आयुवाले कुत्तों से इस प्रकार अधिक होती है कि सिवाय अनुभवी डाक्टर के और सब उसकी पहचान करने में धोका खा जाते हैं; एक और काल में उस भ्रूण के सब सिरे सील या वालरस (Seal or Walrus) मछली के ठिठरे हुए परों से बहुत ही ज़्यादा मिलते जुलते हैं; एक विशेष काल में उसका शरीर बालों से बिलकुल ढका हुआ होता है जैसा कि पशुओं में उसके निकट के संबंधी बंदर का ढका हुआ होता है । ( डाक्टर कैलग )
कुछ कोमल-स्वभाव महाशयों को तो डाक्टर कैलग साहब का यह लेख भी अप्रिय प्रतीत हुआ होगा । क्योंकि इस लेख से उनके पवित्र मानवी चोले का पाशवी चोले के साथ बहुत बड़ी समता रखना सिद्ध होता है । किंतु हाय ! बड़े दुःख से कहना पड़ता है कि उत्तम मनुष्य देह के भीतर खनिज के जीवनवाले, वनस्पति के जीवन वाले और पशु जीवन वाले बहुलता से विद्यमान हैं, अधिकता से पाए जाते हैं । हाँ, यह हर्ष की बात है कि मनुष्य-तन में मनुष्य भी अवश्य होते है, किंतु तिल-तिल; और इसमें भी कुछ सन्देह नहीं कि मानवी चोले में देवते भी मिला करते हैं, यद्यपि अति विरत ।
पहले उल्लेख हो चुका है कि पत्थर की ठीकरी आदि ( खनिज वर्ग ) का स्वभाव जड़ता (inertia) है । अपने आप अपनी दशा वे तनिक नहीं बदल सकते । उनकी स्थिति-गमन का कारण बाह्य शक्तियें हुआ करती हैं । इन बिलकुल निर्जीव खनिज पदार्थों में मोती, लाल, रुपया, हीरा आदि भी सम्मि- लित हैं, जिनको अत्यंत मूल्यवान् माना जाता है । तीर, तलवार बंदूक़ और तोप के गोले भी जड़ निर्जीव और गतिहीन खनिज वर्ग में सम्मिलित होते हैं ; यद्यपि दूसरों से चलाए जाकर ये शख्त बड़े २ बलवान् वीरों को निर्जीव कर देने की शक्ति रखते हैं,किंतु निर्जीव खनिज वर्ग को न तो हीरे,मोती के रूप में कमाल(पूर्णपद) प्राप्त होता है, न ताज और तोप के रूप में, बरन् पवित्र नर-स्वरूप में । इस देवदुर्लभ मानव रूप में खनिज ( जड़ ) स्वभाव प्रकट होकर राजदरबार के चाटुकार ( खुशा- मदी ) और सतबचनिये बन अपने पिठलगों ( सम्वन्धियों ) को उस टिक्किया की तरह गोल गोल श्वेत श्वेत वस्तु ( रुपया ) से भी अधिक प्रिय होते हैं, और अन्य शक्तियों से तीर व तोप की तरह चलाए जाकर विचारे घायल भारत- वर्ष को और भी अधिक घायल करते हैं । निस्संदेह वे महा- शय जो केवल आभूषणों ( mere ornaments ) का काम देते हैं, किंतु भीतरी ( वस्तुतः ) जान नहीं रखते ( जिसकी बदौलत बाहरी प्रभावों का सामना किया जाता है, बाह्य वस्तुओं से काम लिया जाता है, और जिसकी बदौलत वास्त- विक उन्नति की जाती है), वह यदि खनिज स्वभाव के जीवन वाले नहीं हैं तो और क्या हैं ? इनमें नाम को भी faith in self ( अपने ऊपर विश्वास या सूरमापन ) नहीं होता, और न ही उनका कोई विशेष उद्देश या लक्ष्य जीवन में होता है, जिधर की वायु आई, उधर उड़ा ले गई ।
आपत्तिकारक——बड़े-बड़े प्रतिष्ठित और महान पुरुषों को गाली देते हो ? तुमपर मान हानि का दावा किया जायगा ।
राम——निर्जीव पत्थर चाहे कैसे ही बहुमूल्य हों, नालिश वालिश नहीं कर सकते । और नालिश करेगा कौन ? आतिशी शीशे में मुँह देखते-देखते लकवा दूर हो जाया करता है, वैसेही इस अलिफ़ ( ! ) को पढ़ते-पढ़ते तो उनकी दशा बदल जानी है, उनमें जान आ जानी है, जड़ता दूर हो जानी है, सतवचनियापन उड़ जाना है । कचेहरी तक पहुँचते पहुँचते वादी से प्रतिवांदी बन जायँगे, फिर नालिश कैसी ?
जड़-सृष्टि का स्वभाव रखनेवाले मनुष्यरूपा विशेष व्यक्तियों को यदि सजीवन मान भी लिया जाय, तो खनिज वत् उनके जीवन को उस न्यूनतम गति ( चेतनता ) वाला मानना पड़ेगा जिस गति का होना न होना एक समान है,जिस गति से स्पष्ट कुछ भी उन्नति नहीं होती, जो गति खिलाड़ी बच्चे के घूमते हुए लट्टु में हुआ करती है, जिस dead motion ( मृत गति ) का centre ( केंद्र ) छोटे से शरीर के बाहर नहीं होता । इस चेतनता वाले जड़ मनुष्यों के जीवन चक्र को हम ( पहले पृष्ठ पर के छोटे से छोटे ) ह् वृत से निरूपण (represent) कर सकते हैं,अर्थात् उस वृत से जतला सकते हैं जो इतना अल्प है कि मानो शून्य ही हो गया हुआ है । ये वह महाशय हैं जिनका centre of force (चेतनता का केंद्र) उनके छोटे से तन में ही है । अर्थात् जो अपने प्यारे पेट ही के चहुँ ओर घूमते हैं; जो कुछ करते हैं सब अपने material self ( भौतिक शरीर ) ही के लिये करते हैं । जिनकी चेष्टा
अपने उदर ही के अर्पण होती है ( शिश्नोदर परायणः ), जिनका परमेश्वर उनका पेट ही है, धर्म और विश्वास (Religion) स्वार्थपरता है; जिनके यहाँ Temple of God ( ईश्वर के मंदिर, शरीर ) में कामदेव ( शैतान ) बेखटके राज्य करता है; जिनके अंधकार से भरे मन-मंदिर को तंग (संकुचित) और अंधकार पूर्ण बिल समझकर उसमें काम क्रोध रूपी नाग ( सर्प ) रात-दिन फुफकारें मारते हैं, और हलाहल (विष) घोलते रहते हैं । इनको "पेट-पालू" या "उदरपरायण" नाम देना उचित है ।
आपत्तिकारक—किसी युग का कोई इतिहास या किसी देश का कोई भूगोल "स्वार्थ-परता" को धर्म ( या religion) नाम नहीं देता, किसी धर्मशास्त्र से यह अनोखी बात प्रकट नहीं होती, तुम भी विचित्र मनगढ़ंत ( कपोल कल्पित ) लटके (शगूफ़े) उड़ाते हो ।
राम—वाह प्यारे ! हाँ हाँ ! इसी पर क्या इति थोड़ी ही है ? "अ" ( अलिफ़ ) को पढ़ते रहे तो देखोगे कि समस्त संसार ( मैं, तू, यह, वह, सब ) राम ही की मनगढ़ंत है ।
न नक्शे-दुई दिल से मिटा दूँ, तो सही । मख़लूक़ को ख़ालिक़ न बना दूँ तो सही ॥ क़तरा न अनलबहर कहे, तो कहना । आबिद से न मा'बूद बना दूँ तो सही ॥
"धर्म" से मुराद हमारी वह जाति या सम्प्रदाय नहीं है जो मुक़द्दमाबाज़ी के समय लोग Law Courts ( न्यायालयों, अदालतों ) में अर्ज़ीदावा पर लिखवाया करते हैं, बरन् 'धर्म' से हमारा अभिप्राय है वह विश्वास जो लोगों के हृदय-पटल
पर अधिष्ठित होकर रक्त के साथ उनके नस-नाड़ियों में उबला करता है, और छाप बनकर उनके समस्त कर्मों और विचारों पर छपता है । वह जीवित शक्ति वा विश्वास (living force) किसी मनुष्य का असली धर्म होती है, जिसके प्रकाश में वह शेष सब काम करता है ।
The thing a man does practically believe (and this is often enough without asserting it even to himself, much less to others), the thing a man does practically lay to heart and know for certain, that is in all cases the primary thing for him, and creatively determines all the rest. That is his religion. (Carlyle.)
अर्थ – किसी व्यक्ति का जो कुछ व्यावहारिक निश्चय होता है ( और यह निश्चय बहुधा करके अपने आप को भी बिना बताए या प्रकट किए के होता है, औरों की तो भला क्या चर्चा ) और जिस विश्वास ( निश्चय ) को मनुष्य व्यवहार रूप में अपने हृदयंगम करता है और दृढ़ निश्चय से जानता है, वह व्यावहारिक विश्वास ही समस्त दशाओं में उसके लिये प्रारम्भक बात होती है, और शेष सब चेष्टाओं और कर्मों को उत्पन्न करता है । ऐसा व्यावहारिक निश्चय ही उस ( मनुष्य ) का religion ( धर्म या ईमान ) होता है ।
क्या वह परान्न-भोजी भोंदू ( मूढ़ ) हिंदू या ब्राह्मण या वैष्णव या आर्य या वेदांती आदि कहलाने-योग्य है जो "चल मेरी लकड़ी रंग बदल जा" का वाक्य है और किसी अंगरेज़ बहादुर या किसी अन्य मत के प्रभावशाली वा तेजस्वी (influential) व्यक्ति के सम्मुख फट अपने ( नाममात्र के )
निश्चय से इनकार कर जाता है । भला इतनी सदाचारिक शक्ति (moral courage) तो कहाँ कि अपने विश्वास का शुद्ध शब्दों में इक़रार करते न शरमाए ? कितनी अधिक संख्या ऐसे हिंदू-मुसलमान और ईसाइयों की है जो जिह्वा से ईश्वर को सर्वत्र-सर्वव्यापी मानने वाले हैं, सर्वव्यापी वर्णन करते हैं; मंदिरों में, प्रार्थनालयों में, लेक्चरों के समय, और बाइज़ (उपदेश वा कथा) के समय अपना तन मन धन परमेश्वर के अर्पण कर देते हैं, किंतु जब ज़रा स्त्री का, हवेली का, रुपया का, या सुस्वादु भोजन-पान का मुँह देखा, तो हाय ! उस शुद्ध पवित्र (pure) परमेश्वर की आँखों में नमक डालकर तन भी उससे छीन लिया, मन भी छीन लिया, कंचन पर, भूमि पर अपने भाइयों से लड़ाइयाँ और मुक़द्दमें आरंभ कर दिए । किसी स्त्री के साथ आँखें चार हुई, तो सर्वत्र सर्वव्यापक एकमेवाद्वितीयम् परमेश्वर धरा ही रह गया । किसी डिप्टी कमिश्नर साहब या उच्च अधिकारी ( शासक ) की हाज़िरी में यदि होते, तो दीन-हीन बने रहते, मानों मुँह में जिह्वा ही नहीं । किंतु सर्वत्र सर्वदर्शी शासकों के शासक ईश्वर भगवान् जिसको न केवल भारतेश्वर, चीन-सम्राट् या ज़ार रूस का स्वामी जानते हैं, बरन् समस्त भूमि, तारे, नक्षत्र, सूर्य और चंद्र का सम्राट् वर्णन करते हैं, उस सर्वशक्तिमान (omni- potent कादेर-मुतलक़ ) महान् की उपस्थिति में अकर्तव्य और अवक्तव्य बातों के अपराधी होने का साहस पड़ गया । हाय ! इस दंभ और पाखंड से भरे हुए हिंदूपन और मुसलमानपन, ईसाईपन या और किसी पन पर तीन हरफ़ ( ध. क. र=धिक्कार ) !
वाइज़ाँ काई जलवा बर महराबो-मिनबर मेकुनंद । चूँ ब ख़िलवत मे र वंद आँ कार दीगर मे कुनंद ॥
अर्थ—ये उपदेशक लोग ( वाइज़ करने वाले ), जो कि मेहराब व मिम्बर ( प्लेटफ़ार्म ) पर विराजमान होते हैं, जब एकांत में जाते हैं, तो और और काम करते हैं ( अर्थात् बाहर में कुछ कहते हैं और भीतर में कुछ करते हैं ) ।
किसी एकांत स्थान में, या रात को सोने से प्रथम, या रात के स्वप्नों में जो वासनाएँ या ख़यालात (cravings) हृदय में वेग के साथ प्रकट होते हैं, उनसे मनुष्य के असली धर्म का पता मिलता है कि आया उसका धर्म या उपास्यदेव रुपया है, स्त्री है, विद्या है, या सचमुच ईश्वर है ।
धन्य हैं वे जिनका असली धर्म वही है जो वे ऊपर से प्रकट करते हैं ।
"सद जाँ फ़िदाए आँ कि ज़ुबानो-दिलश यकेस्त ।" अर्थ-जिनका मन और वाणी एक है, उन पर मैं सौ जान से फ़िदा हूँ ।
हिंदी-भाषा के महाकवि, भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र से रसखान-खानखाना आदि सच्चे मुसलमान भक्तों के विषय में क्या ही अच्छा कहा है ।
"इन दो चार मुसलान पर कोटों हिंदू वारिये ।"
वह व्यक्ति जो सच्चे हृदयवाला (sincere heart) है, वह राम का अत्यंत अधिक निकटस्थ है उस व्यक्ति की अपेक्षा कि जो राम के विचारों से तो बिलकुल सहमत है, किंतु उन विचारों को व्यवहार में नहीं लाता ।
मन नमेगोयम अनलहक़्क़, यार मेगोयद, बिगो । चूँ न गोयम ? बर सरे-बाज़ार मेगोयद, बिगो ॥
अर्थ—मैं अनलहक़्क़ नहीं कहता हूँ, यार ( सत्यरूप ) ख़ुद कहता है कि तू कहो । मैं फिर क्यों न कहूँ, वह सरे-बाज़ार कहता है कि कहो ।
कब लिबासे-दुनयवी में छुपते हैं रौशन ज़मीर । जामाए-फ़ानूस में भी शोला उर्याँ ही रहा ॥
वह पुरुष, ऊपर से चाहे हिंदू हो या मुसलमान या ईसाई आदि, "स्वार्थपरता" रूप धर्म का अनुयायी है जो केवल इंद्रियों के विलास के लिये कटिबद्ध है; जिसे घर की परवाह है न घाट की; स्त्री, बाल बच्चे मरें चाहे जियें; नंगे रहें, भूखे रहें, प्यासे रहें, उसकी बला से; किसी की शिक्षा की चिंता है न किसी के सुधार की चर्चा है; संतान तो फ़ाक़ामस्ती में दिन काटे और आप यारों में बैठकर भंग-बूटी उड़ाएँ, गाँजा और सुलफ़े के दम लगाएँ, चिमन बीबी ( अफ़यून ) से सोहबत गरमाएँ ।
भंगा पीवन सोवन बाग़ीं । धर दे जीवन अपनी भागीं ॥
व बीं आँ बे हमीयत रा कि हरगिज़ । न ख़्वाहिद दीद रूए-नेक बख़ती ॥
तन आसानी गुज़ीनद ख़ेश तन रा । ज़नो फ़रज़ंद बिगुज़ारद ब सख़्ती ॥
अर्थ—उस निर्लज्ज मनुष्य को देख, वह कभी नेकबख़्ती का मुँह न देखेगा, क्योंकि वह केवल अपने लिये आराम पसंद करता है और स्त्री-पुत्रों को विपत्ति में छोड़ता है ।
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च । तमस्येतानि जायंते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥ गीता० (14-14)
अर्थ-हे अर्जुन ! तमोगुण के बढ़ने पर मूर्खता, अकर्मण्यता, आलस्य और मोह ये सब छा जाते हैं ।
यदि मानवी स्वरूप स्वीकार करने पर भी जड़-सृष्टि के गुणों में जकड़े रहना था, तो कवि की उक्ति के अनुसार हजरुलयहूद अथवा कोई बहुमूल्य पत्थर होना हजार गुना अच्छा था ।
किसी रंजकश को देते तो कुछ उसको सूद होता । दिले-सख़्त काश पत्थर हजरुलयहूद होता ॥
इस स्वार्थपरता धर्म का अनुयायी, इंद्रियों का दास, यदि ऊपर से धनवान् बरन् राजराजेश्वर भी हो जाय, तो हृदयवान् (विशाल चित्त) पुरुषों की दृष्टि में शूद्र ही गिना जाता है, जड़ सृष्टि की श्रेणी में गिना जाता है ।
रोम (Rome) के सौभाग्य का सूर्य जब पूर्ण उन्नति पर था, जब वह नगर लगभग संसार-भर का ( जितना कि तब ज्ञात था ) राजासिंहासन था, वहाँ के उन दिनोंवाले महा प्रतापी महाराजों की तालिका में ये नाम भी पाये जाते हैं ।
क्लाडियस (Claudius), कैलीगोला (Caligula), टाई- बेरस (Tiberius), डोमीशियन (Domition), वाईटेलियस (vitellius), नीरो (Nero) ।
ये वह नाम हैं जिनको सुनते ही इतिहासज्ञों के सम्मुख वह समस्त अकथनीय अत्याचार और पाप मूर्तिमान होकर दृष्टिगो- चर हो जाते हैं कि जो संसारमें लुच्चेसे लुच्चा महागुंडा मनुष्य भी विचार में नहीं ला सकता है, जिनको वर्णन करते लेखनी का हिया फटता है, जिनमें से एक को भी लिखने का ख़याल ही करने से रोंगटे खड़े हो जाते हैं । पाठको ! यदि उपरि-
लिखित सम्राटों का प्रभुत्व इस शर्त पर प्राप्त होता हो कि उन लोगों जैसी प्रकृति और स्वभाव भी अवश्य लेना पड़े, तो थूक दो इस साम्राज्य पर, धूलि डालो इस शाहंशाही पर !
गर फ़रेदूं शवद ब नेमतो-मुल्क । बे हुनर रा ब हेचकस मशुमार ॥ परनियां व नसीज बर ना अहल । लाजवर्दों-तिलास्त बर दीवार ॥
अर्थ – निर्गुणी मनुष्य यदि ऐश्वर्य और वसुधा में फ़रेदूं जैसा बन जाय, तो भी उसको सामान्य मनुष्य के बराबर भी तू मत गिन । अशिष्ट मनुष्य के शरीर पर रेशमी वस्त्र ऐसे हैं जैसे दीवार पर लाजवर्द और सोना ( अर्थात् दीवार पर चित्रकारी ) ।
अो भारत-निवासी ! स्मरण रख, आदि से तू वह है जिसके यहाँ रुपयेवाले की तो महिमा और मान नहीं, बरन् सद्गुण (virtue) वाले की । जिसके यहाँ अब तक भी रुपये को न छूनेवाला संन्यासी अपने ज्ञान के कारण नारायण-स्वरूप माना जाता है । और जिसके यहाँ एक कुटिया में रहनेवाला नग्न शरीर, फल-फूल पर निर्वाह करनेवाला ग़रीब ब्राह्मण अपने ज्ञान और सद्गुण के कारण देवताओं के समान पूजा जाता था; न केवल (सांसारिक ऐश्वर्य के स्वामी) वैश्य लोगों से, बरन् ( शारीरिक शक्तिवाले सुंदर शोभायमान वस्त्रों से सुशो- भित, रत्नाभूषणों से समलंकृत ) राजाओं, महाराजाओं से ।
बाहरी वैभव, ऐश्वर्य, सांसारिक ठाठ-बाट, और अल्प- कालिक ( क्षणिक ) तेज-प्रताप के बदले वास्तविक आनंद (peace), अक्षय प्रसन्नता ( शांति ) को हाथ से मत दो । बुभी क़लई ( चूने ) का छोटा सा गोला देख उसकी सफ़ेदी
पर मोहित होकर उसके बदले अपने हाथवाला ताज़ा मक्खन का पेड़ा मत बदल लो । पछताओगे, यह चूना खाया हुआ कलेजा फाड़ देगा, हृदय रक्त कर देगा, मार डालेगा । प्यारे ! जिस चाह से सांसारिक संपत्ति को एकत्र करने में दिन-रात मिहनत करते हो और कुछ हाथ भी नहीं आता, उसी परिश्रम से आत्मिक उन्नति के लिये कुछ भी समय व्यय करो तो अमृत जीवन प्राप्त हो जाय ।
शशि सूर पावक को करे प्रकाश सो निज धाम बे । इस चाम से ताजि नेह तू, उस धाम कर विश्राम बे ॥ इक दमक तेरी पाय के, सब चमकदा संसार बे । टुक चीन ब्रह्मानंद को, जग नीर ते है पार बे ॥ मंसूर ने सूली सही, पर बोलता वही बैन बे । बंदा न पायो ख़ल्क़ में, जब देखियो निज नैन बे ॥ आशिक़ लखावें सैन जो, लख सैन को कर चैन बे । तूं आप मालिक ख़ुद ख़ुदा, क्यों भटकदा दिन रैन बे ॥
मनुष्य-स्वरूप में वनस्पतिवर्ग—वनस्पतिवर्ग यद्यपि कई प्रकार के होते हैं ( नारियल, सरो, सेब, अंगूर, पीपल, आक, ढाक, सुंबल आदि ), जिनके विस्तृत विवरण में वनस्पति-विद्या ( Botany ) के बड़े-बड़े ग्रंथ मौजूद हैं, किंतु सामान्य रीति से वनस्पतिवर्ग का स्वभाव यह है कि एक ही स्थान पर बढ़ना, फलना फूलना, अपने वंश (Species,कुल)को स्थिर रखना,पत्ते टहनियाँ आदि पर्याप्त हों तो पथिकों को छाया भी देना, अतिथि के आगे या स्वामी की सेवा में मीठे या कड़वे फल ( जैसे मौजूद हों ) उपस्थित कर देना; परंतु एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की
सामर्थ्य न रखना और प्रायः पशुओं या मनुष्यों के अत्याचारी हाथों से नष्ट हो जाना, काटे जाना । जैसे विश्व ( ब्रह्मांड, Macrocosm ) में वनस्पतिवर्ग की आवश्यकता है ( आवश्य कता न होती तो मौजूद ही क्यों होते ), वैसेही मानवी चोला (microcosm, अंड, सूक्ष्म सृष्टि ) में भी वनस्पतिवर्ग की प्रकृति और गुणवालों की आवश्यकता है, परन्तु कवि के कथनानुसार ।
गरचे कस बे अजल न ख़्वाहद मुरद । तौ मरौ दर दहाने-अयदरहा ॥
ख़ंदाँ रू बूदन बिह अज़ गंजो गुहर बख़शीदन अस्त । ता तवानी बर्क बूदन अब्रे-नेसानी मुवाश ॥
अर्थ—यद्यपि कोई मनुष्य बिना मृत्यु के नहीं मरेगा; तो भी तू जान-बूझकर सर्प के मुँह में न जा । हँसमुख रहना मोतियों का कोष दे देने से भी अच्छा है, जबकि तू बिजली बनकर रह सकता है ( अर्थात् प्रसन्न-चित रह सकता है ) तो वर्षा का बादल ( अर्थात् रोनी सूरत ) मत बन ।
यदि मानवी चोले में आनकर भी वनस्पतिवर्ग ( जड़ ) बने रहे और उस स्वतंत्रता को प्राप्त न किया जो इस चोले में मिल सकती है, और टैंटेलस (Tantalus) की तरह मीठे जल में खड़े होने पर भी प्यासे और चारों ओर सुस्वादु मेवों के बीच में रहकर भी भूखे रहे, तो शोक, महाशोक है ।
हीरे जैसा जन्म तुम्हारा कौड़ी बदले वेच दिया ।
पाठक जान गए होंगे कि मनुष्यों में वनस्पति कौन हैं । यह हैं "कुटुंब-पालक", "परिवार उपासक", साधारण गृहस्त लोग, जिनके जीवन को वैश्य-जीवन
की उपमा दी जा सकती है, जिनके जीवन का वृत ह से बड़े अन्य वृत द से वर्णित हो सकता है, जिनके जीवन की गति की तुलना कोल्हू के बैल की गति से है,जिनका असली धर्म दुकानदारी है,जिनका मुक्ति के लिये सिफ़ारिश करनेवाला ( अवतार वा पैगम्बर) रुपया है, जिनका गुरुदेव स्त्री है, और जिनके लिये यथार्थ पूज्य ( इष्टदेव ) देह-दिखावा (vanity, पाखंड, शेखी) है । इन लोगों के जीवन का वृत पेट-पालकों के वृत से बहुत अधिक विस्तृत होता है । 'पेट-पालू' तो केवल अपना ही पेट पालता है, कुटुंबवाला समस्त कुटुंब की पालना करता है, आप भूखा रहकर दुःख भेलकर कुटुंब की सेवा करता है । पेटपालू की प्रीति के बाहु इतने छोटे होते हैं कि बिचारा लुंजा जब छाती के सामने आलिंगन के लिये प्रेम के बाहु फैला एक हाथ से दूसरे हाथ को छूता है तो ( और किसी को अपने प्रीति के घेरे में ले आना तो एक ओर रहा ) महा मुश्किल से अपनी छाती की चौड़ाई को नापता है । कुटुंब वाला यत्किंचित् विशाल-बाहु होता है, पुत्र-पुत्रियों को अपने अंक(कच्चाक्ष)में ले सकता है । जैसे कोल्हू के बैल वाले वृत में लट्टू वाले वृत अधिक संख्या में समा सकते हैं, वैसे ही "कुटुंब- पालक" की उदारता का क्षेत्र कई अशक्तों को शरण देता है । लट्टू की अपेक्षा बैल अति अधिक मूल्य का होता है, वैसे ही "पेट-पालू" की अपेक्षा "परिवार-पालू" का होना धन्य है । वनस्पति वर्ग की चर्चा में किसी ने कहा है ।
हे नर ऐसी प्रीति कर जैसी वृच्छ करे । धूप सहे सिर अपने औरों छाँव करे ॥
मानवी वनस्पति वर्ग भी बहुत कुछ इस प्रशंसा के योग्य है, और देश की शोभा-सौंदर्य को बढ़ाता है ।
आज कल भारतवर्ष में इस वैश्य ( गृहस्थी ) समुदाय का बोल बाला है, क्षत्री हैं तो सारे देश को अपना घर समझने के स्थान पर एक छोटे से घर को अपना देश समझते हैं, ब्राह्मण हैं तो ब्रह्म ( ईश्वर ) के स्मरण में घर-बार को भुला देने के स्थान में स्त्री-बच्चों की चिंता में ब्रह्म ( ईश्वर ) को निमग्न कर रहे हैं, और वैश्यों को रुपए का विहित त्याग सिखाने के स्थान में उनसे अविहित और अनुचित ग्रहण सीख रहे हैं । जो है सो व्यावहारिक रूप से वैश्य-धर्म का दम भरता है । ले वैश्य-धर्म ! तेरे पौ बारह हैं । राजा जाति ( अंगरेज़ ) भी तो सौदागर ही हैं, अर्थात् वैश्य हैं ।
'अतीक़ के अहदनामे' में लिखा है कि हज़रत लूत,उसकी लड़कियाँ और उसकी स्त्री सोदोम (Sodom) नगर से इकठे बाहर जा रहे थे;शेष सब का मुख तो नगर के बाहर की ओर था, किंतु लूत की स्त्री का ध्यान पीछे नगर की ओर था । परिणाम यह हुआ कि शेष सब को मुक्ति मिली, किंतु लूत की स्त्री विचारी वहीं लवण का स्तंभ बन गई । प्यारे पाठको ! यह कहानी मनुष्य से संबंध रखनेवाले एक प्राकृतिक नियम को प्रकट करती हैं, जो लॉर्ड बैरन (Lord Byron) के शब्दों में इस प्रकार वर्णित हो सकता है ।
"'Tis his nature either to advance or die; He stands not still, but or decays or grows.
अर्थ—मनुष्य का स्वभाव यह है कि या तो वह उन्नति करे या अवनति; वह कभी थिर नहीं रहता, अपितु अवनति करता है । जैसे मनुष्य का शरीर बचपन से लेकर वराबर बढ़ता जाता है, वैसे ही मनुष्य की आत्मिक अवस्था के लिये भी लगातार उन्नति करते जाना आवश्यक है । जब:—
From well to better daily. Self-surpassed. (Wordsworth)
"नित्यप्रति उन्नति करना और पहले दिन की अपेक्षा दूसरे दिन और उत्तम हो जाना मानवी स्वभाव है",(वर्ईसवर्थ)
अपने वृत्तों को बढ़ाना, प्रतिदिन पग आगे चलाना रोक दिया जायगा तो प्रकृति-नियम के चक्कर में कुचले जाना होगा, पतन आरंभ हो जायगा, मृत्यु का सामना होगा ।
"Advance or Perish" is the grim watch word of Nature.
अर्थ—" आगे बढ़ो या नष्ट हो जाओ ", ऐसा प्रकृति का उग्र संदेशा है ।
खंजर न चले तो मोर्चा खाए । पानी न बहे तो उसमें बू आए ॥
( लूत-पत्नी की तरह ) जिस समय अपनी पहली अवस्था ( सोदोम नगर ) से निकलने को बुरा माना और बड़े वृत्त fresh fields and pastures new ( हरित खेतों, मैदानों और नए-नए लता-कुंजों ) की ओर जाने से इनकार किया, बस वहीं लवण का खंभा बनना पड़ेगा । जिस समय बैल ने ज़रा आगे चलने से सुस्ती की, तड़ से कृषक का चाबुक खाया । जब कोई व्यक्ति या जाति या देश एक ही अवस्था में गलना ( Stagnate करना ) चाहता है, तो प्रकृति-नियम (Divine Providence नेचर, ईश्वर या कर्म ) का भट डंडा खाता है; अर्थात् भाँति-भाँति की विपत्तियों के चंगुल में फँसता है, मृतक की तरह कीड़ों का आहार बनता है,
दासता की पाश (बन्धन) में फँसता है । बी० ए० की श्रेणी अत्यंत श्रेष्ठ ही सही, किंतु यदि कोई मनुष्य उस श्रेणी में घर कर बैठे और फ़ेल ही होने पर कटिबद्ध हो जाय, मल्लाह की तरह सहपाठी विद्यार्थियों के एक खेवे को परीक्षा रूप नदी पार करा आए, और फिर उसी नौका में दूसरे खेवे को उत्तीर्ण कराने आ जाय, और इसी तरह फिर तीसरे चौथे खेवे को, इत्यादि, तो वह व्यक्ति अयोग्यों की पंक्ति में गिना जायगा, निराशा और अपमान सहना पड़ेगा । वैसे ही वैश्य बुद्धिवाला मनुष्य ( कुटुंब का ग़ुलाम ) यदि घर की चार- दीवारी में अपनी मनो-संपति गाड़ दे, और प्रेम का क्षेत्र विस्तीर्ण न करे, तो अपमान उठाएगा और दुःख पाएगा ।
द वृत्त की ओर ध्यान करके देख लो । थोड़े से क्षेत्र को घेरे हुए अवश्य है, किंतु शेष सब कागज़-पृष्ठ की ओर पीठ मोड़े हुए हैं । थोड़े से तल (क्षेत्र) को include (सम्मिलित) करता है, तो शेष सारे संसार को exclude ( पृथक् ) करता है । यही हाल ( आगे उन्नति न करनेवाले ) गृहस्थी के चक्र में आबद्ध व्यक्ति का है । बालबच्चों का पालन पोषण अवश्य करता है, किंतु महकमा कमसरियेट में, महकमा बंदोबस्त में, महकमा इंजीनियरिंग में, डाक्टर के वेष या वकील के रूप में, या जिस आफ़िस में हो, अपने सजातियों के रक्त में हाथ रँगने को हर समय तैयार रहता है, जिनसे काम पड़ जाय उनके गले काटने को भली भाँति तत्पर रहता है । यदि शेष सब घर उजड़ेत हैं तो बला से, यह उत्कोच ( घूस ) ले लेकर अपने घर को किसी धनिक की समाधि ( क़बर ) के बराबर ऊँचा अवश्य बनाएगा । जिन लोगों को इससे पाला पड़ जाय, उनकी स्त्रियों के मुख शोक से मुर-
झाते हैं तो क्या डर है, यह उनके आभूषणों को बिकवाकर अपनी स्त्री के मुखड़े को सोने से अवश्य-अवश्य सज्जित करेगा, उसे पीत-वर्ण बनाएगा । अपनी आत्मा पस्त ( शिथिल वा निर्बल ) होती जाय और बराबर सुकड़ती जाय,तो क्या परवा है, यह अपनी स्थावर संपत्ति को अवश्य ही बढ़ाएगा, घर को ऊँचा बनाएगा । शोक ! सहस्र शोक !!
वरी अंग्लो-दानिश बवायद गिरीस्त । अर्थ—ऐसी बुद्धि और समझ पर रोना चाहिए ।
इस बंदी घर में अधिक काल बंद रहने से चोरी, ठगी, डाकूपन के रोगों में फँस जाता है, धनी लोगों का खून करना भी इसी स्कूल में सीखता है ? क्यों न हो:—
कि बू फ़साद की आती है बंद पानी में ।
कठिन परिश्रम करने पर भी वहाँ का वहीं रहने और उन्नति न करने में कोल्हू का बैल प्रसिद्ध है । बैल पर यह पंजाबी कहावत चरितार्थ होती है-"भौं चौं के उग्गों दे चक्क"। ठीक यही हाल संसारी ( स्त्री-पुत्रों में ग्रस्त ) व्यक्ति का है । बिचारा बैल की नाईं श्रम करता है, रात-दिन दफ्तरों या दुकानों में ज्ञान-दृष्टि पर आवरण डाले कोल्हू चलाए जाता है । यह कुछ पता नहीं कि इस कोल्हू के चलाने से क्या प्राप्त होगा, कहाँ जा रहा हूँ, क्या बना रहा हूँ ? इत्यादि; हाँ जब आँखों पर से मृत्यु समय पर्दा ज़रा उठेगा, तो देखेगा कि हाय-हाय ! रात दिन परिश्रम करते-करते मर मिटे, समझते थे बहुत यात्रा पार कर चुके होंगे, किंतु अपने आपको वहाँ का वहीं पाया, कुछ न उन्नति की । हाय री तृष्णा ! वाय री तृष्णा ! कुछ न कर सके ! कुछ न बना सके ! उस समय
रोना और दाँत पीसना होगा, प्राण भी संकट ही में निकलेंगे।
जाँ ब जानाँ दिह वगरना अज़ तो बिस्तानद अजल। खुद तो मुंसिफ़ बाश, ऐ दिल ! ई निको या आँ निको ॥
अर्थ – प्राण अपने प्यारे (प्रिया) को दे, नहीं तो मृत्यु तुभ से इसे अवश्य ले लेगी। ऐ दिल ! तू स्वयं न्याय कर कि यह अच्छा है, या वह अच्छा है।
अो कुटुंब के फंदे में फँसे हुए !
आराम की नहीं है यह जगह, हाँ बढ़े चलो, हाँ बढ़े चलो। आलिंगनार्थ फैलनेवाले बाहुओं को विशाल करो, अपने प्रेम (fellow-feeling) के वृत्त को विस्तृत करो, बढ़ो, यहाँ तक कि जीवन को निरूपण करनेवाला चारों ओर से परिमित वृत्त फैलते-फैलते अपरिमित विस्तार को स्वीकार करे और सीधीरेखा बन जाय, और तुम्हारा जीवन भूल भुलैयाँ से निकलकर सब को सीधा-मार्ग दिखाए। आगे बढ़ो, आगे बढ़ो, यहाँ तक कि मिथ्या जगत् का "आगा पीछा" बिलकुल अर्थहीन हो जाय।
ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्तात् ब्रह्म पश्चात् ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण। अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् (अथर्व॰ मुंडको॰ अ॰ 2 खं॰ 2)
अर्थ – ब्रह्म ही यह अमृत-रूपी सामने है, ब्रह्म ही पीछे है, ब्रह्म ही दहिने और ब्रह्म ही बाएँ है। यह नीचे और ऊपर फैला हुआ है, ब्रह्म ही यह सब कुछ है, वह सब से श्रेष्ठ है।
अंदरूँ व बिरूँ तुई ऐ दोस्त ! दर चुपो-रास्त-ज़ेरो-बालाई।
अर्थ– भीतर-बाहर, दहिने-बाएँ और ऊपर-नीचे, ऐ मित्र ! तू ही है।
आगे चलो, आगे चलो, यहाँ तक कि "चलना-फिरना" निरर्थक हो जाय।
तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके। तदंतरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥ (यजु॰ ईशा॰ मं॰ 5)
अर्थ–हम चल हैं, हम चल हैं नाहीं, हम नेड़े, हम दूर। हम ही सब के अंदर चानन, हम ही बाहर नूर ॥
मस्तम कुनाँ चुनाँ कि न दानम ज़ बे खुदी। दर अरसए-ख़याल कि आमद कुदाम रफ़्त ॥
अर्थ – मुभको ऐसा मस्त करदे कि मैं बेखुदी से इस बात को न जान सकूँ कि विचार के मैदान में कौन आया और कौन गया ? (अर्थात् उस प्रियतम के ख़याल में बेहोश और निमग्न हो जाऊँ)।
आगे चलो, आगे चलो, यहाँ तक कि चक्कर में व्याकुल और त्रस्त करनेवाले वृत्त से बचकर सन्मार्ग में चलने वाले सूर्य का जीवन पा लो, प्रकाश ही प्रकाश बन जाओ, और यह अवस्था आ जाय।
कचात्मा कच वानात्मा क शुभं काशुभं तथा। क चिंता कच वाचिंता स्वमहिम्निस्थिस्य मे ॥
अर्थ – है कहाँ ज्ञात और कहाँ है ग़ैर ज्ञात ? क्या बुराई ? कौन सी खूबी की बात ? फ़िक्र कैसी मुभको ? बेफ़िकरी कहाँ ? मस्त अपने नूर में हूँ महे-ज़ात।
प्यारे पाठक ! एक भूठी, काल्पनिक, नाशमान धर्मशाला (सिवाय) से यह प्रीति कि तू अपने असली घर को बिलकुल भूल बैठा ! यह भोलापन छोड़ो, असली घर (निजधाम) को मुँह मोड़ो, असली स्वदेश-प्रीति को मत खो दो।
तायरानेम कज़ क़ज़ा व क़दर। अफ़तादा जुदा ज़ गुलज़ारेम ॥ मुर्गे-शाख़े-दरख़्ते-लाहूतेम। गौहरे-गंजे-दुर्जे-असरारेम ॥ या दुरे अज़ मुहीते-तौहीदेम। गौहरे या ज़काने-इरफ़ानेम ॥
अर्थ – हम वह पक्षी हैं जो भाग्य वश अपने बाग से अलग गिर गए हैं (या जुदा हो गए हैं)। हम ब्रह्मलोक के वृक्ष की शाखा के पक्षी हैं, और रहस्यों के डब्बे के कोष के मोती हैं, या अद्वैत रूपी वृत के एक मोती हैं, या ईश्वर-परायणता की खानि के एक मोती हैं।
बराए नाम भी अपना न कुछ बाक़ी निशां रखना। न तन रखना, न दिल रखना, न जी रखना, न जां रखना॥
तअल्लुक़ तोड़ देना, छोड़ देना, उसकी पाबंदी। ख़बरदार अपनी गर्दन पर न यह बारे-गिरां रखना ॥
मिलेगी क्या मदद तुभ को मददगारने-दुनिया से। उमेदे-यावरी उनसे न याँ रखना न वाँ रखना ॥
बहुत मज़बूत घर है आक़बत का दारे-दुनिया से। उठा लेना यहां से अपनी दौलत और वहां रखना ॥
उठा देना तसव्वुर ग़ैर की सूरत का आँखों से। फ़क़त सीने के आईने में नक़्शे-दिलासितां रखना ॥
किसी घर में न घर कर बैठना इस दारे-फ़ानी में। ठिकानां वे ठिकाना और मकां बर लामकां रखना ॥
मनुष्य-रूप में प्राणि-वर्ग—अब ज वृत पर दृष्टि डालिएगा। द वृत से बहुत बड़ा है, यद्यपि टेढ़ापन (वक्रता) दूर नहीं हुआ। यह वृत उन लोगों के जीवन-चक्र को निरूपण करता है जो अपनी जाति (caste) भर के साथ उतनी प्रीति रखते हैं जितनी पेट-पालू अपने शरीर के साथ रखता है, या कुटुम्ब-पालक अपने बाल बच्चों के साथ। और जो समस्त जाति की भलाई के लिये उतने ही उद्यम के साथ परिश्रम करते हैं जितना कुटुम्ब-पालक अपने कुटुम्ब के लिये करता है। पेट-पालू का प्रीति-केंद्र (लट्टू की नाईं) अपने ही शरीर में था, कुटुंब-पालू का गति-केंद्र (centre of force) बैल की भांति शरीर से ज़रा दूरी पर था, जाति-पालक को घुमाने वाली शक्ति (जाति-प्रीति) उसके शरीर से और भी दूरी पर क्रिया करती है। उसके जीवन चक्र का गति-केंद्र देह-अभ्यास (य बिंदु) से अपेक्षाकृत बहुत दूर है। इसीलिये उसका जीवन-चक्र भी बहुत विस्तृत है। जाति-पालक की जीवन-गति को घोड़दौड़ के घोड़े (race horse) की गति से तुलना दी जाती है। यह घोड़ा अपनी गति से बैल आदि की अपेक्षा बहुत बड़ा वृत्त बनाता है। मेलों में या और अवसरों पर इस पशु के चमत्कार देखने को नगरों के प्रत्येक गली-कुचों के कौतुक-प्रिय लोग दौड़े जाते हैं। अत्यंत मूल्यवान् होता है। बहुत प्रशंसा के योग्य है। स्वजाति-प्रतिपालक को भी यह सब प्रशंसा शोभा देती है। सृष्टि के भीतर जीवन के Evolution (विकास) की दृष्टि से इसी quality.
(श्रेणी) की गति का प्रकाश (खनिजवर्ग और वनस्पतिवर्ग की अपेक्षा) पशुवर्ग में होता है, और मानवी वेष के भीतर आध्यात्मिक जीवन के Evolution (विकास) के विचार से इसी श्रेणी की चेतनता जाति-पालक के जीवन को विविक्त करती है। अर्थात् प्राणिवर्ग (पशुओं) का शारीरिक जीवन और जाति-पालक का आध्यात्मिक जीवन एक ही श्रेणी का होता है, और वे एक ही वृत्त से निरूपित हो सकते हैं (उस वृत्त से जिसमें घोड़दौड़ का घोड़ा चक्कर लगाता है)। और जो चेतनता (energy) का प्रकाश प्राणिवर्ग में होता है, जाति-प्रतिपालक मनुष्य में भी उसके अनुकूल और समतुल्य चेतनता का प्रकाश होता है। ऐसे महाशय की बदौलत कई परिवार तृप्ति और सुख पाते हैं, कई दोषों और कुरीतियों का जुवा उसके सजातियों के गर्दन पर से उतरता है। किसी जाति या समाज या सभा के लिये ऐसी उत्तम अभिलाषा वाले का अस्तित्व सौभाग्य का चिन्ह है। किंतु पाठको ! लूत की बीबी वाले दृष्टांत को भूल न जाना, और न विज्ञान की इस बात को विस्मरण कर देना कि चेतनता का होना या न होना गतिशील शरीर के स्थान पर निर्भर नहीं होता, बल्कि गति के मुख (रुख) पर अवलंबित होता है। और यह भी स्मरण रखना चाहिए कि शरीरिक जीवन के स्वास्थ्य का अनुमान जानदार के डील-डौल से लगाना बिलकुल अयुक्त है। किसी बच्चे आदि का डील छोटा देखकर बोल उठना कि उसका स्वास्थ्य ख़राब है (रोगग्रसित है), और किसी बिछौने पर चित लेटे रोगी को देखकर कह देना कि इसका स्वास्थ्य अत्यंत उत्तम है, उचित नहीं। बल्कि शरीर चाहे छोटा हो, चाहे मोटा (या लंबा), यदि अवनति की ओर धावमान है, तो जानदार का स्वास्थ्य अवश्य ख़राब है,
और यदि उन्नति की ओर धामवान है, तो स्वास्थ्य अच्छा ही है। ठीक यही हाल आध्यात्मिक जीवन का है।
यदि कोई व्यक्ति ह वृत्त में जीवन यापन (व्यतीत) करता दृष्टिगोचर होता है, हर प्रकार के पापों में प्रवृत्त है, किंतु आज तोबा (पश्चात्ताप) करके अपना वृत्त विस्तृत करने को है, प्रेम के बाहु फैलाने में यत्नशील हो रहा है, तो वह व्यक्ति साक्षात् (Positive) गति प्रकट कर रहा है। उसके जीवन का मुख (दिशा) ठीक है, उसका आध्यात्मिक स्वास्थ्य उत्तम है। और यदि कोई महाशय, जिनका जीवन-वृत्त ज या ब से निरूपित हो सकता है (अर्थात् जो जाति-प्रतिपालक या देश-सेवक नाम पाते हैं), अपने Sphere (वृत्त) में बराबर भ्रमण करते रहने पर इति कर रहे हैं, किंतु साथ के साथ उस वृत्त को विस्तार नहीं दे रहे हैं [दूसरे शब्दों में उनकी पहली गति (velocity) में चपलता (acceleration) नहीं हो रही है], वह महाशय आध्यात्मिक-रोगी हैं, अवनतिपरायण हैं, उनकी जीवन-गति शीघ्र अभाव रूप (negative) हो जायगी, गिरेंगे, अपने जीर्णरोग से जाति की जाति को और देश के देश को हानि पहुँचाएँगे, और घोर पतन का कारण होंगे। वह जाति का नेता जिसके मन में अपनी जाति ही समा रही है, अपनी जाति को जिस तरह हो सके उन्नति दिया चाहता है, जाति के कल्याण और भलाई के यत्न में तन-मन से संलग्न है, पर अन्य जातियों की कुछ परवा नहीं करता, बरन् अन्य जाति को अपनी जाति के अधीन बनाया चाहता है [स्वयं ब्राह्मण-सभा का होकर यह चाहता है कि ब्राह्मणों का तो अभ्युदय हो, शेष सब जातियाँ जाँय जहन्नुम को; और स्वयं यदि कायस्थ-कान्फ्रेंस या अरोड़वंश
सभा का है, तो कायस्थों या अरोड़ों का राज्य लाने का इच्छुक है, शेष सब जातियों को पददलित करने पर तुला है; स्वयं आर्यसमाजी है, तो सनातनधर्मियों और ब्रह्मसमाजियों के रक्त का प्यासा है, या सनातनधर्मी होकर आर्यसमाज आदि के नाम का कट्टर शत्रु है—इत्यादि-इत्यादि], ऐसा जाति-पालक, पेट-पालू और परिवारोपासक (दोनों) से डील डौल में तो बढ़ा हुआ है, उनका बड़ा भाई है; किंतु है आध्यात्मिक रोगी। उसकी गति अभावरूप होनेवाली है, अवनति की ओर धावमान है, उसका जीवन-वृत्त दिन बदिन संकीर्ण (तंग) होता जायगा, क्योंकि जो Sectarian (जातिवादी या पन्थाई) अन्य जातियों से संग्राम करके अपनी जाति वा पन्थ को उन्नति दिलाना चाहता है, केवल इस सिद्धांत पर कि यह जाति "अपनी है", "मेरी है", वह आत्महत्यारा [आत्महत्यारा, क्योंकि व्यावहारिक रीति पर "मैं" और स्वयं अर्थात् आत्मा को (जो वस्तुतः शुद्ध, सर्वव्यापक और आनंदघन है) शरीर मानता है, जो मलिन और परिच्छिन्न है] जब अपनी जाति वालों में बैठेगा, तो अपने आप अपने सिद्धांत के अनुसार उस जाति में अपने कुटुंब वालों को प्रतिष्ठा दिलाने का प्रयत्न करेगा। मनमें यह कहकर कि "मेरा समीपी है", यह कुटुंब "अपना है", "मेरा है" और दूसरे कुटुंबों की शक्तियाँ छीन कर अपने कुटुंब का गौरव बढ़ाने में संकोच न करेगा। ऐसे महाशय का वृत्त ज से गिरकर द वृत्त में पड़जाना कुछ कठिन बात नहीं हैं। और जो व्यक्ति अपने कुटुंब से केवल इस ख़याल से प्रेम करता है कि यह कुटुंब "मेरा है, अपना है" (अर्थात् जो केवल शारीरिक संबंध को भान वा महसूस कर सकता है, उत्तम संबंध से बिलकुल अनजान है), वह अपने कुटुंब को शेष कुटुंबों पर गौरवान्वित
करने में चाहे उद्यत हो, किंतु भय है कि जब अवसर पाएगा, अपने भाइयों का स्वत्व छीन कर पेट-पालू के वृत्त में गिर जायगा।
कभी-कभी एक संस्था या संप्रदाय किसी सच्चे हृदय वाले (उन्नतिशील) महाशय की कृपा से कड़वी बेल की तरह बढ़ती है, फैलती है, किंतु शीघ्र उसमें फूट पड़ जाती है, टुकड़े-टुकड़े हो जाती है। इस पतन का प्रधान कारण प्रायः यही होता है कि उस मत के अनुयायी जो आरंभ में छोटे वृत्तों से उन्नति करते-करते उस बड़े वृत्त में प्रवृष्ट हुए थे, वह आगे को उन्नति करने से विमुख रह जाते हैं, अपना स्वास्थ्य बिगाड़ लेते हैं [इसमें उनका अपना अपराध समभ लो या उस मत के ideal (आदर्श) के छोटा होने का]। इस नाशमान संसार में एक अवस्था में स्थिर हो बैठने का अर्थ है मृत्यु। (भई जमकर बैठने-योग्य तो एक तेरा अपना सच्चा धाम रूप सिंहासन ही है)। वह energy (उत्साह, शक्ति, आवेश) जो उन मतवादियों के जीवन-वृत्त को विशाल करने के लिये उन्हें दी गई थी अपने समुचित कर्म में व्यय नहीं होती, परन्तु शक्ति-स्थिति (Conservation of energy) के सिद्धांत के अनुसार नष्ट भी भला कब होने की है ? तत्काल ईर्षा, डाह, क्रोध में परिवर्तित हो जाती है, और फूट का कारण होती है (जहाँ गाली-गलौज, कीना और फसाद की दुर्गंध आ रही हो, समभ जाओ कि किसी आध्यात्मिक मृतक की दुर्गंध है)। बहुत देर तो बात यहाँ तक विस्तार पकड़ती है और पक्षपात इस सीमा तक नेत्र बंद कर देता है कि धर्मकी आड़ में शरीर-भाव शासन करता है, और एक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय की मूलोच्छेद करने को तत्पर हो जाती है, केवल इस विचार से कि "यह मेरी नहीं है"; और यह दूसरी
सम्प्रदाय पहले की मूल उखाड़ने को तुल जाती है, केवल इस हेतु से कि यह अन्य का मत है। पर हाय री आत्महत्या ! हाय री खुदकुशी ! दोनों भूल बैठे हैं कि उनका अपना आप तो Divine Truth Itself (केवल वस्तुमात्र और सत्य) है, उनका अपना आप तो शत्रु का भी अपना आप है, शत्रु कहाँ ?
प्यारे भारतवासियो ! शत्रु को घायल किया चाहो, तो करो यह अभ्यास, पकाओ यह पाठ, याद करो यह संथा, realise (अनुभव) करो यह सच्चाई कि शत्रु तुम से भिन्न (जुदा) नहीं है। जिस प्रकार से अपने आपको शरीर में हिप्नोटाइज़ (hypnotise संमोहित) कर चुके हो (भ्रांति के वेग से अपने आपको गन्धा देह बनाए बैठे हो), उसी तरह अपने शुद्ध स्वरूप में निष्ठा करो और देखो कि भयानक शत्रु के शरीर में मैं ही स्थित हूँ कि नहीं।
आत्मैव ह्यात्मनो बंधुरात्मैव रिपुरात्मना। (गीता 6-5)
अर्थ – अपना आप ही अपने आपका मित्र (या बंधु, संबंधी) है; और अपना आप ही अपने आपका शत्रु है।
I appear as the enemy, I am the enemy, I am the enemy.
मैं ही शत्रु दृष्टिगोचर होता हूँ, मैं ही शत्रु हूँ, मै ही शत्रु हूँ। शत्रु उड़ गए, शत्रु उड़ गए। ज्ञान के गोलों ने शत्रु उड़ा दिए। मैं ही मैं हूँ। एक मेवाद्वितीयम् हूँ। शुद्ध स्वरूप हूँ।
बेरंग कभू हो के दिखाऊँ तुभको। तू गुल है, तो बू हो के दिखाऊँ तुभको ॥ मैं आप से जो अपने से फुरसत पाऊँ। क्या और तो ? तू हो के दिखाऊँ तुभको ॥
I am the monarch of all I Survey My right there is none to dispute.
अर्थ – जहाँ तक दृष्टि जाती है, मैं सब का बादशाह हूँ और मेरे स्वत्व पर कोई भगड़ने वाला नहीं।
खुद खुदा हूँ, शाहे-शाह हूँ, एक दिन और रात है। सो रहे हैं हो के बेग़म, लात ऊपर लात है ॥
सब शाहों का शाह मैं, मेरा शाह न कोय। सब देवों का देव मैं, मेरा देव न होय ॥ डंडा कुल पर है मिरा, क्या सुलतान अमीर। पत्ता मुख बिन ना हिले, आँधी मेरी असीर ॥
([unclear]) सीन सुखी सुरूप नूँ जान होय। सिरों लाह सुट्टे तीनों तापड़े जी ॥ तिनके तोड़ चौरासी दे चार कीने। जन्म मरण दे चुक्के सियापड़े जी ॥ दोषी दूसरा ग़ैर काफ़ूर होया। गोले वस गए चुप चुपातड़े जी ॥ आठो याम हर हाल में मस्त फिरदे। जमदूतां दे मारके मापड़े जी ॥
मनुष्य-रूप में मनुष्य-स्वभाव—अब ब वृत की बारी आई। यह अ वृत से भी बड़ा है। अ जैसे कई वृत इसमें साम्मिलित हैं। इसकी वक्रता (Curvature) बहुत कम है, मार्ग सीधा सा है, किंतु अभी कुछ टेढ़ापन शेष है, वक्रता अभी बिलकुल दूर नहीं हुई। यह वृत्त उन व्यक्तियों के जीवन-चक्र को निरूपण करता है जो देश-भर के साथ वही प्रेम और प्रीति रखते हैं जो पेट-पालू अपने पेट के साथ, कुटुंब-पालू एक कुटुंब के साथ, और जाति-पालक एक जाति के
साथ रखता है; जिन्होंने अपने समस्त समय और ध्यान को देश की भलाई के लिये अर्पित कर दिया है; जिनको अपने देश की धूलि तक प्यारी है; और जो caste colour or creed (जाति, वर्ण और मत) की अपेक्षा के विना ही अपने देश के प्रत्येक व्यक्ति को अपने सगे भाई के समान प्रिय समभते हैं। इस वृत में गतिशील मनुष्य का गति-केन्द्र विन्दू य (अर्थात् शरीर) से बहुत अधिक दूरी पर होता है, और उसका जीवन-वृत अत्यंत विस्तृत होता है। देश-सेवक की जीवन-गति को वृत-विस्तार के विचार से हम चंद्रमा की गति से तुलना दे सकते हैं। देश-सेवक वह है जो भूखों मरते (दरिद्र) देशवासियों के लिये चंद्रमा की तरह ईद् (उत्सवतिथि) हो, या जो देश की दारिद्य-निशा में चारों ओर प्रकाश का जल बरसा दे, यद्यपि उसकी उदारता का यह प्रभाव न हो सके कि रात्रि मिट जाय (दिन आ जाय)। और जिस तरह उजियाली की बदौलत पौदों में रस भरता है, वैसेही देश-सेवक की बदौलत गृहस्थ लोगों को अमन चैन और प्रसन्नता प्राप्त होती है। आध्यात्मिक जीवन के विकास (Evolution) में देशहितैषी वा देश-सेवक (आध्यात्मिक वनस्पतिवर्ग आदि की अपेक्षा) असल मनुष्य की श्रेणी वाला है, भीतर बाहर मनुष्य है। उसका काम मनुष्य का है और नाम मनुष्य का है।
मरना फला है उसका जो अपने लिये जिए। जीता है वह जो मर चुका इंसान के लिए ॥
"Breathes there a man with heart so dead Who never to himself has said This is my own my native land." (Scott)
अर्थ – क्या कोई मनुष्य ऐसा मृत-चित है जिसने अपने मन में कभी ऐसा न कहा हो कि यह मेरा स्वदेश अपना है।
ऐ भारत ! तेरे शिवाजी, गुरु गोविंदसिंहजी और राना प्रताप कहाँ तक सोए रहेंगे ? यदि स्वदेश-प्रीति (the Spirit of patriotism) का पाठ भी और वस्तुओं की तरह अंगरेज़ों ही से लेना स्वीकार है, तो क्यों नहीं उस डाक्टर के वृतान्त को हृदय-दर्पण पर अंकित बना रखते जिसकी स्वदेश-प्रीति की बदौलत भारत-साम्राज्य में अंगरेज़-जाति के पैर दृढ़रूप से आ जमे। यद्यपि पाठकों ने इतिहास में कई बेर यह उल्लेख पढ़ छोड़ा होगा, किंतु जीवन में बरत कर भविष्य इतिहास के पृष्ठों पर स्वदेश-प्रीति की स्मृति स्वयं छोड़ने का संकल्प नहीं कर लिया, तो मानो इस वृतान्त को स्वप्न में भी नहीं पढ़ा। एकांत में अध्ययन करने और पढ़कर अपने नस-नाड़ियों में प्रविष्ट करने के लिये मौलाना आज़ाद की कविता में से यह भाग पाठकों की भेट किया जाता है।
फ़र्रुख़सियर था हिंद में फ़रमारवाए-मुल्क। और गैरते-नसीमो-सबा थी हवाए-मुल्क ॥ पर हिंद पर था हादसा-ए-आम अजब पड़ा। यानी कि बादशाह था खुद जाँ बलब पड़ा ॥ इस तरह का फ़ितूर पड़ा था मिज़ाज में। था मुब्तिला वह इक मरज़े ला इलाज में ॥ सब अहले-अक़लो-होशो-हवास अपने खो चुके। सारे तबीब हाथ इलाजों से धो चुके ॥ पर इस मसीहदम ने जो आकर किया इलाज। ऐसा वहस्व-तबा मवाफ़िक़ पड़ा इलाज ॥ गोया दवा बकारे-दुआ हो गई उसे। और तीन चार दिन में शिफ़ा हो गई उसे ॥
नौबत खुशी की बज गई सारे जहान में। और जान ताज़ा आ गई इक-इक की जान में ॥ फ़र्रुख़सियर कि शाहे-सख़ावत मआब था। बहरे-करम का जिसके भकोला सहाब था ॥ इक जश्ने-आम उसने किया धूम-धाम से। और शोर तहनियत का उठा ख़ासो-आम से ॥ हाज़िर हुए अमीरो-वज़ीर आ के सामने। और उस तबीब को कहा बुलवा के सामने ॥ ला दामने-उम्मेद कि भरदें अभी उसे। ता उम्र भर न पाए तू ख़ाली कभी उसे ॥ दरियादिली तबीब की देखो मगर ज़रा। डाली न उसने लालो-गुहर पर नज़र ज़रा ॥ हुब्बुलवतन के जोश से बेताब होगया। दिल आब होके सीने में सीमाब होगया ॥ की अर्ज़ हाथ जोड़के ख़िदमत में शाह की। बंदा को आरजू नहीं कुछ इज़्ज़ो-जाह की ॥ ज़र की हवस न माल की है जुस्तजू मुभे। पर आरजू जो है तो यही आरजू मुभे ॥ कुछ ऐसा मेरे वास्ते इनआमे-आम हो। जिससे मेरा तमाम वतन शाद-काम हो ॥ बोला यह शाह इसका भी तुभपर मदार है। जो माँगना है माँग, तुभे इख्तियार है ॥ तब अर्ज़ की तबीब ने यूँ बादशाह से। रोशन जलाले-शाहो खुरशेदो-माह से ॥ थोड़ी ज़मीन नवाहिये-दरिया-किनार में। मुभको अता हो ममालिकते-शहरयार में ॥ ता इस तरफ़ जो मेरे वतन के जहाज़ आयँ।
और उनमें ताजरान ज़वील इम्तयाज़ आयँ ॥ कुछ उनपै होवे राह न वीमे-ज़वाल को। आराम से उतारें यहाँ अपने माल को ॥ और जिन्स जो कि लाएँ वह नज़दीको-दूर से। महसूल सब मुआफ़ हो उसका हुज़ूर से ॥ दम उस मसीह-दम का बहुत कारगर पड़ा। यह नुस्ख़ा बल्कि सब से सिवा पुर असर पड़ा ॥ हरचंद उसे न फ़ायदए-सीमोज़र हुआ। पर नफ़ा बहरे-अहलेवतन किस कदर हुआ ॥ दामन में इक अताए ख़ुदादाद पड़ गई। और सल्तनत् की हिंद में बुनियाद पड़ गई ॥ अए आफ़ताबे-हुब्बे वतन ! तू किधर है आज ?। तू है किधर कि कुछ नहीं आता नज़र है आज ॥ ठंढे हैं क्यों दिलों में तेरे जोश हो गए ?। क्यों सब तेरे चिराग़ हैं ख़ामोश हो गए ? ॥ हुब्बे-वतन की जिन्स का है कहतसाल क्यों ? हैराँ हूँ आजकल है पड़ा इसका काल क्यों ? ॥ कुछ हो गया ज़माने का उल्टा चलन यहाँ। हुब्बुलवतन के बदले है बुग़्ज़ुलवतन यहाँ ॥ बिन तेरे मुल्के-हिंद के घर वे चिराग़ हैं। जलते इवज़ चिराग़ों के सीने में दाग़ हैं ॥ कब तक शबे-सियाह में आलम तवाह हो। ऐ आफ़ताब ! इधर भी करम की निगाह हो ॥ आलम से ताकि तीरादिली दूर हो तमाम। पंजाब तेरे नूर से मामूर हो तमाम ॥
( अज़ मजमूआ नज़मे-आज़ाद )।
परंतु पाठक ! माना कि स्वदेश-रत्तक का जीवन अत्यंत उच्च कोटि का है, और उसका जीवन-वृत्त (ब) अत्यंत विस्तृत होता है, परन्तु यह वृत्त अभी और भी विस्तृत होने की योग्यता रखता है। सीधी-रेखा नहीं बना। यद्यपि त्तेत्र बहुत घेरे हुए है, परन्तु उस त्तेत्र के सिवाय शेष समस्त धरातल से मुँह फेरे हुए है। देशसंरत्तक (John Bull) अपने इँगलैंड के अधिकार में चँद्रमा है, तो फ़ांस और स्पेन आदि के लिये राहु (ग्रहण) से कम नहीं। और इस वृत्त में निवास करने वाला देशगौरव-स्वरूप (फखरे-मुल्क) पूर्वोक्त समस्त वृत्तों में गति शील भाइयों से ज्येष्ठतम तो अवश्य है, किंतु रोगी हो जाने पर (अर्थात् अपने वृत को अधिक विस्तार देने की योग्यता खो बैठने पर) समस्त देश की सत्यानाशी का कारण होता है। पेटपालू से तो प्रायः एक कुटुंब के मनुष्य दुःख पाते हैं, कुटुंबोपासक बिगड़ बैठें तो एक कुटुंब को दूसरे परिवार से भिड़ाएँगे, जाति-प्रतिपालक ख़राब हो जायँ तो एक समाज वा जाति को दूसरी समाज, जाति या सभा से लड़ाएँगे, और सैकड़ों या सहस्रों स्त्री-पुरुषों के मनों में ईर्षा-द्वेष की अग्नि प्रज्वलित करेंगे; परन्तु सोकाल्ड (नाम मात्र) देश-संरत्तक (वा देशभक्त) जो कृपा-वृष्टि के बड़े-बड़े कणों (बूँदों) की भाँति देश को सिंचित करने आ रहे थे, यदि अपनी अवस्था में जम जायँ तो मानों भारी पत्थर बनकर देश पर ओले बरसाएँगे, हिम-वृष्टि (Snow-fall) नहीं बल्कि शिलावृष्टि (hail-storm) से देश-निवासियों के धुएँ उड़ाएँगें, सहस्रों बल्कि लत्तों भगवान् के जीवों (बंदों) के शिर कटवाएँगे, एक देश को दूसरे देश के अधीन करने के लिये रक्त की नदियाँ बहाएँगे, स्वयं इंद्रियों की दासता करने के लिथे दूसरे देशवालों की स्वतंत्रता का नाम मिटाएँगे। हाय शोक!
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प्यारे ! स्वतंत्रता के इच्छुक हो तो संसार रूप कारागार में उसे मत ढूँढो। देश के स्वामी वन जाने पर भी स्वतंत्रता नहीं प्राप्त होने की। अपने स्वरूप को समभो, स्वतंत्रता मिलेगी; किसी प्रकार की क़ैद पल्ला न पकड़ेगी; अपने आपको वही परम स्वतंत्र पाओगे कि जिसके साधारण भ्रू-विशेष से राव-रंक अस्ति-नास्ति (व्यक्त-अव्यक्त) होते है, जिस के आँत्ति-संकेत व संज्ञा (wink and gesture) पर देश, काल और वस्तु (Time, Space and Causality) का अस्तित्व अवलंबित है। तुम्हारी ही नैत्र-कटारी (निमेषोन्मेष) में सृष्टि का उद्भव, स्थिति, संहार है। धन्य है जगत-आदर- णीय दृष्टि! धन्य है जादू-भरे नेत्र-कमल!
अभी हलाहल मद्-भरे श्वेत श्याम रतनार। जियत मरत भुकि भुकि परत, जे चितवत इक बार॥
प्यारे, ज़रा जाग तो सही! अपनी महिमा (glory) रूपी घोड़े बेचकर अविद्या रूपी वेश्या से आलिंगन कर कब तक सोया रहेगा? श्रुति भवगती तेरे सिरहाने बैठ तुमको मोह- निद्रा से जगाने के लिये ऊँचे स्वरों में तेरी महिमा के गीत गा रही है; पर हाय! तेरे कान पर जूँ तक नहीं रेंगती।
सपर्य्यागाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छा- श्वतीभ्यः समाभ्यः॥ (यजु० ई० वा० सं० 8)
है मुहीतो-मनज़्ज़ा व वे अवदाँ। रगो-पै है कहाँ? हमा वीं हमा दाँ॥ वह बरी है गुनाहों से रिंदे-ज़माँ। बदो-नेक का उसमें नहीं है निशाँ॥
वह बुज़ुर्गे-बुज़ुर्गों है राहते-जाँ। वह है बाला से बाला व नूरे-जहाँ॥
वही खुद है जिनाँ व ब्रूज़ बेयाँ। दिये उसने अज़ल में हैं रंगतो-शाँ॥
यही राम है दीदों में सबके निहाँ। यही राम है बहर में बर में अयाँ॥
मृतकों से बाज़ी बदकर सोने का खेल अब बंद करो। एक बेर इंद्र (सब देवतों का राजा) स्वप्न में शूकर बनकर खुजली आदि तरह-तरह के रोगों में फँस गया। शेष देवताओं ने अपने स्वामी की जब यह गति देखी, तो लज्जित हुए और घबराए। अंततः इंद्र के स्वप्नावस्था में आ उपास्थित हुए, और एक ने निकट आकर कहा-"महाराज, यह क्या? आप अप्सराओं को भूलगए!", दूसरे ने कान में कहा-"चन्द्रलोक पति! देवराज! यह क्या? आप अमृत-रस को बिसार बैठे!", तीसरा बोला-"शरणागतवत्सल! यह क्या? आप अपनी इंद्र-पदवी वाले जटित-सिंहासन को स्मृति से खो बैठे!", इत्यादि। इंद्र ने इन सब के उत्तर में शिर हिलाया और अपने शूकर वाले मुख और वाणी के स्वर में कहा— "हुवाँ हुवाँ!", मानों अपनी वाणी से प्रत्यत्त यह जतलाया कि "शूकरनी, विष्ठा और कीचड़ जो इस समय मुभे आनंदित कर रहे हैं, इनसे उत्तम अप्सरा, अमृत और सिंहासन भला क्या होंगे! अय देवतागण! अपने सिंहासन विंहासन को तुम अपने घर रक्खो, हमें तो कीचड़ में लिथड़ना (निमग्न होना) फूलों के बिछौने पर लोटने से अधिक भाता है"। वाह! मेरे प्यारे! तेरा अपना आप तो इंद्र का भी इंद्र
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है। तू सांसारिक स्वप्न में फँसकर मृत्यु को चिकित्सक (वैद्य) और रोग को अपनी दवा क्यों समभ रहा है?
उतिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। (य० क० 1-3-14)
अर्थ—उठो, जागो, ज्ञानियों के पास जाओ और आत्म- ज्ञान को प्राप्त करो।
सर विनह बर कफ़ बया ऐ ग़ाज़िया! ख़्वाब रा बिगुज़ारो-खुद रा कुन रिहा॥
अर्थ—ऐ ग़ाज़ी (शूरवीर)! शिर हथेली पर रखकर आ। मूर्खता की निद्रा छोड़ और अपने आपको स्वतंत्र कर।
उठ जाग घुराड़े मार नहीं। पह सौन तेरे दरकार नहीं॥
सब का संच्तेप।
वृत्त गति जीवन काम या नाम ह……लट्टू…………खनिजवर्ग………पेट-पालू द……कोल्हू का बैल…वनस्पतिवर्ग……कुटुंब-पालक ज……घोड़दौड़ का घोड़ा…प्राणि अर्थात् जाति-प्रतिपालक पशु वर्ग ब……चंद्रमा…………मनुष्य…………देश-भक्त (नेता) अ……सूर्य (بی جا الله)…परमात्मा………ज्ञानवान्,आत्मदर्शी वक्ता नितान्त दूर
अमर पुरुष—अे प्रकृति! अपने पुरुष के दर्शन कर ले। अे तारागण के भूषण! तुम इस सूर्यों के सूर्य पर न्योछावर हो जाओ। अंधकार! भाग! अो आशा-पुष्पोद्यान (गुच्छहाये- चमने-उम्मेद)! आखें खोलो, विश्वप्राण की महिमा देखो।
मूर्खता के विछौने पर अँगड़ाइयाँ लेनेवालो! तुम्हारे नेत्र-कमल क्यों नहीं खुलते? अपनी ही आँखों के प्रकाश को बाहर देख लो। स्वप्नावस्था में संकल्पों के अढ़ाई चावल कहाँ तक पकाओगे? रात तो हो चुकी। संसार वाटिका के विहंगो! आनंद-भरे सोहले (गीत) गाए जाओ, दुल्हा (सूर्य-रूप ज्ञानवान्) का जलूस (उपगमन वा सिंहासनारोहण) का समय आ रहा है। अे धरती और आकाश! दुल्हा के लिये गुलाल (उवटना) तैयार करो। वासंती समीर (बादे-विहारी)! रंगरलियाँ मनाए जाओ। कृपा-वृष्टि के मेघ! सड़क पर पानी छिड़क। हरित पटावृता दुलहिन (वृत्तों)! वन ठन अपने कानों (फूलों) में मोती (ओस-कण) सजा निखरकर (प्रतीत्ता में) पंक्ति विन्यस्त हो जाओ। joy! joy!! joy!!! (आनंद! आनन्द!! आनन्द!!!)
नरगिस बचमन राहे कि मेदीद खुदा। गोशे-गुल आमदनीहाय कि असगा मे कर्द॥
अर्थ—अे खुदा! नरगिस (नेत्र) बाग़ में किसकी प्रतीत्ता कर रही है, और फूल (कर्ण) किसके आने की राह में भुके हुए (ध्यान लगाये हुए) हैं।
किस का आगत-स्वागत है? उसका जो पहले ही सर्वत्र विद्यमान है, सूर्य के जीवन वाला ज्ञानवान्।
आफ़ताबअस्त आफ़ताबस्त आफ़ताब। ज़रहा दारंद अज़ अो रंगो-ताव॥ मुत्तिलए-दीदारे-हक़ दीदारे-अो। मम्बए-गुफ़्तारे-हक़ गुफ़्तारे-अो॥
अर्थ—वह सूर्य है, वह वस्तुतः सूर्य है, और उसके कारण
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से समस्त परमाणुओं में वर्ण और प्रकाश है। उसका दर्शन सत्य के दर्शन का उदयाचल है, और उसकी वार्तालाप सत्य की वार्तालाप का स्रोत है।
यही सूर्य रूप ज्ञानवान् (ब्रह्मनिष्ठ) है जो पहाड़ और नदी में लाल और मोती बनाता है, पत्ते-पत्ते को प्रफुल्लता प्रदान करता है, प्राणियों (जीवधारियों) में प्राण डालता है, मनुष्य में जीवन का श्वास फूँकता है, भूमि इस ही वास्तविक सूर्य से निकला हुआ एक स्फुल्लिंग है, नत्तत्र सब इस ही के आकर्षण से गीतवान् हैं।
सूरज को सोना चाँद को चाँदी तो दे चुके। फिर भी तवायफ़ करते हैं, देखूँ जिधर को मैं॥ तारे भमक भमक के बुलाते हैं राम को। आँखों में उनकी रहता हूँ, जाऊँ किधर को मैं॥
यह अमर-पुरुष (चित्घन, The source of all energy) जिस देश में चमकता है, उस देश का आध्यात्मिक जीवन स्थिर रहेगा। सूर्य की तरह यह विज्ञान रूप महापुरुष प्रत्यत्त में कुछ न करता हुआ भी क्या पेट-पालू, क्या कुटुंब- पालू, जाति-प्रतिपालक, या देश-भक्त, सब को जीवन पहुँचाने वाला होता है; प्रत्येक की छाती में, प्रत्येक के मस्तिष्क में, प्रत्येक की आँखों में, इसका वास है; क्या अमीर के और क्या फ़क़ीर के नाम-रूप और नस-नाड़ी की विद्यमानता इसी के सहारे है; शरीरों की कोठरियों के भीतर भले या बुरे विचार कणों की भाँति उसही प्रकाशों के प्रकाश की stray beams (प्रविष्ट रश्मियों) में निवास वा स्थिति रखते हैं।
नाहनो अक़रबो अलह मिन हबलुलवरीद। (अल्लाह शाह रग थीं नज़दीक)
नाचूँ मैं, नट राज रे—नाचूँ मैं महाराज।
सूरज नाचूँ, तारे नाचूँ, नाचूँ बन महताब रे—नाचूँ मैं॰ तन तेरे में मन हो नाचूँ, नाचूँ नाड़ी नाड़ रे—नाचूँ मैं॰ बादर नाचूँ, वायू नाचूँ, नाचूँ नदी अरुनाब रे—नाचूँ मैं॰ ज़र्रा नाचूँ, समुद्र नाचूँ, नाचूँ मोघर काज रे—नाचूँ मैं॰ मधुवा लब बदमस्तीवाला, नाचूँ पी पी आज रे-नाचूँ॰ घर लागो रँग, रँग घर लागो, नाचूँ पापा दाज रे-नाचूँ॰ राग गीत सब होवत हरदम, नाचूँ पूरा साज रे-नाचूँ॰ राम ही नाचत राम ही बाजत, नाचूँ हो निलाज रे-नाचूँ॰
नज़र व हर कि कुनम, सूए-खुद हमे बीनम! बहर कि मे निगराम रूए-खुद हमे बीनम॥ ब जुज़ व कुल हमा मामूरम अज़ ज़मीनो-ज़माँ। ब जानबे-कि रवम कूए-खुद हमे बीनम॥
अर्थ—जिस अोर कि मैं दृष्टि डालता हूँ, अपना ही मुख देखता हूँ, और जिस किसी को देखता हूँ मैं अपना ही चेहरा देखता हूँ। देश और काल से मैं समस्त व्यष्टि और समष्टि में भरपूर हूँ, और जिस अोर कि मैं जाता हूँ, अपनी ही गली (निवास स्थान) पाता हूँ।
संपूर्ण जगदेव नंदनवनं सर्वेऽपि कल्पद्रुमा। गांगंवारि समस्तवारिनिवहाः पुण्याः समस्ताः क्रियाः। वाचः प्राकृत संस्कृताः श्रुतिशिरो वाराणसी मेदिनी। सर्वावस्थितिरस्य वस्तु विषया दृष्टे परे ब्रह्मणि॥
अर्थ—परब्रह्म के साक्तात्कार होने पर समस्त जगत् उसके लिये इंद्र का वन है, सब वृत्त कल्पद्रुम, सब जल उसके लिये
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गंगाजल है, सब कर्म पुण्य देनेवाले, सब बोलियाँ (वाणियां) उसके लिये संस्कृत है, महावाक्य काशी है, सब जड़ पृथिवी उसके भोगने की वस्तु है।
अहा हा हा!
कहूँ क्या हाल इस दिल का कि शादी मौज मारे है। है इक उमडा हुआ दरिया, अहाहाहा! अहाहाहा!!
शबे-महताबो-बादे-खुश, लबे-दरिया-सनम दर बर। चसाँ दानंद हाले-मा गरीक़ाने-तमव्वजहा॥
अर्थ—उजाली रात है, ठंढी वायु है, नदी का तट है, और प्यारा पार्श्व में है। ऐसी दशा में संसार-चिंता की तरंगों में निमग्न मनुष्य हमारी दशा का क्या अनुमान कर सकते हैं।
The World of spirits no clouds conceal; Man's eye is dim, it can not see. Man's heart is dead, it can not feel. Thou, who wouldst know the things that be, The heart of Earth in the Sunrise red, Bathe, till its stains of Earth are fled. (Goethe)
अर्थ—अध्यात्म-जगत् (ब्रह्मलोक) को बादल (सांसारिक लज्जादि का आवरण) नहीं छिपा सकते; केवल मनुष्य की दृष्टि पर धुंध छाया हुआ है, इसलिये वह नहीं (इस जगत् को) देख सकती। मनुष्य का मन मुर्दा है, इसलिये वह इस (लोक वा ब्रह्मानन्द की अवस्था को) अनुभव नहीं कर सकता। अे मनुष्य! यदि तू इन होनेवाली अवस्थाओं (या वस्तुओं) को जानना चाहता है, तो संसार के हृदय (अर्थात् पृथ्वी के ख्याल मात्र) को अहनोदय (ज्ञान के सूर्य) में खूब धो, और यहाँ
तक धो कि संसार का चिन्ह मात्र भी अपने चित्त से उतर जाय (या भाग जाय)।
वह है राजमार्ग पर चलने वाला नारायण रूप ब्रह्मज्ञानी जिसका अपना आप, पिता माता, पुत्र, घर-बार, और समस्त सम्पत्ति-वैभव, सव कुछ ब्रह्म ही ब्रह्म है।
तुरा गोयम तुरा दानम तुरा बीनम तुरा ख़्वानम।
मन तो शुदम तो मन शुदी मन जाँ शुदम तो तन शुदी। ता कस न गोयद बाद अज़ीं, मन दीगरम तो दीगरी॥
अर्थ—तुभे ही कहता हूं, तुभे ही जानता हूं, तुभे ही देखता हूं, और तुभे ही पढ़ता हूं। मैं तू हुआ, तू मैं हुआ, मैं प्राण हुआ, तू शरीर हुआ (अर्थात् मैं और तू ऐसे अभेद हुए) जिस में उस के बाद कोई यह न कह सके कि मैं और हूँ, तू और है।
आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः। (मुंडकोपनिषद् अ० 1 मं० 2)
अर्थ—जो मनुष्य आत्मा (अपने स्वरूप) में ही खेलता हुआ, आत्मा (अपने आप) ही में आनंद लेता हुआ समस्त कायौं को संपादन करता है, वह सब ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ ब्रह्म-ज्ञानी है।
सुबाहे-ईद कि मरदम ब कारो-बार रवंद। बलाकशाने-मोहब्बत ब कूए-यार रवंद॥
अर्थ—सवेरे जबकि और मनुष्य संसार के काम काज में प्रवृत होने के लिये जाते हैं, तो मोहब्बत (प्रेम) की विपत्ति सहन करने वाले अपने यार (प्यारे) की गली में जाते हैं।
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क्या प्यारे शब्दों में सुखमनी साहब में अमर पुरुष का चित्र दिखाया है—
ब्रह्मज्ञानी का भोजन ज्ञान। नानक ब्रह्मज्ञानी का ब्रह्म ध्यान॥ ब्रह्मज्ञानी सदा निर्लेप। जैसे जल में कमल अलेप॥ ब्रह्मज्ञानी सदा निदोष। जैसे सूर सर्व को सोख॥ ब्रह्मज्ञानी निर्मल ते निर्मला। जैसे मैल न लागे जला॥ ब्रह्मज्ञानी सदा समदर्शी। ब्रह्मज्ञानी की दृष्टि अमृत वर्षी॥ ब्रह्मज्ञानी संग सकल ऊधार। नानक ब्रह्मज्ञानी को जपे सकल संसार॥ ब्रह्मज्ञानी सदा सद जागत। ब्रह्मज्ञानी अहं बुद्धि त्यागत॥ ब्रह्मज्ञानी के मन परम आनंद। ब्रह्मज्ञानी के घर सदा आनंद॥ ब्रह्मज्ञानी का दर्शन बड़ भागीं पाइये। ब्रह्मज्ञानी को बल बल जाइये॥ ब्रह्मज्ञानी को खोजे महेश्वर। नानक ब्रह्मज्ञानी आप परमेश्वर॥ ब्रह्मज्ञानी का कथ्या न जाय अधाखर। ब्रह्मज्ञानी सर्व का ठाकर॥ ब्रह्मज्ञानी की मत कौन बखाने। ब्रह्मज्ञानी की गति ब्रह्मज्ञानी जाने॥
ब्रह्मज्ञानी का अंत न पार। नानक ब्रह्मज्ञानी को सदा नमस्कार॥ ब्रह्मज्ञानी सब सृष्टि का कर्त्ता। ब्रह्मज्ञानी सद जीवे नहीं मरता॥ ब्रह्मज्ञानी मुक्त जुगत जी का दाता। ब्रह्मज्ञानी पूरन पुरुष विधाता॥ ब्रह्मज्ञानी अनाथ का नाथ। ब्रह्मज्ञानी का सब ऊपर हाथ॥ ब्रह्मज्ञानी का सकल आकार। ब्रह्मज्ञानी आप निरंकार॥
प्रश्न—ज्ञानवान् तो हमारी तुम्हारी तरह अपवित्र शरीर वाला पीरछिछन्न होता है, वह इस उत्तम प्रशंसा का पात्र क्यौंकर हो सकता है?
उत्तार—नारायण! ज्ञानवान् एक शरीर में बद्ध नहीं होता।
वह मौजूद रहता है हर रंग में। कभी आब में और कभी संग में॥
इस भेद को वही जानता है जिस के ऊपर वीती हो। भई रे मीराँ-प्रेम दिवानी, मेरा मरम न जाने कोय। सूली ऊपर सेज पियादी, कित बिध मिलना होय॥
तुम्हारी दृष्टि में एक विशेष शरीर उस का है और दूसरा शरीर किसी और का, किंतु उस के यहां तो एक ही मामला है। यह शरीर उसका अधिक अपना नहीं है, और वह उसका कम सगा नहीं है, उसकी दृष्टि में तो शरीर वरीर हैं ही कहाँ; बुरा कह दो, भला कह दो, काट दो बदन को, टुकड़े कर दो यदि बल हो तो, उसका क्या बिगड़ता है।
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यह जिसम अपना तू ऐ बद गो! तसव्बर महज़ है तेरा। हमारा विगड़ाता है क्या? अहाहाहा! अहाहाहा!!
लोग समभते होंगे कि मंसूर को सूली पर चढ़ाया, शमस की खाल उतारी, और ऐसा करने से उनको मार डाला, पर हाय कहाँ?
सूली सलीब ज़हर दे मुक्के, कदे न मुकदा जो, फ़क़ीरा आपे अल्लह हो।
दार पर चढ़कर कहा मंसूर ने। आज अपना बोल बाला हो गया।
मरे न टेरे न जरे, हेरे तम, परम आनंद सो पायो। मंगल मोद भरयो घट भीतर, गुरु श्रुति ब्रह्म त्वमेव बताअो॥
न मे मृत्युशंका नमे जातिभेदः, पिता नैव मे नैव माता न जन्म। न बंधुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यश्चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं॥ (श्रीशंकराचार्य कृत स्तोत्र)
अर्थ—न मुभे मृत्यु का भय है, न कोई सांसारिक जाति- पाँति का भेद (अन्तर) है; न मेरा कोई पिता ही है और न माता ही है, और न जन्म ही हुआ है; इसलिये न कोई संबंधी, न मित्र, न गुरु, और न शिष्य मेरा है, बरन् मैं तो इन समस्त संबंधों (नाम-रूपों) से विमुक्त हुआ सच्चिदानंद-स्वरूप हूँ, शिव हूँ, शंकर हूँ।
इधर श्रुति डंके की चोट पुकार रही हैः—
"अयमात्मा ब्रह्म"। (अथर्व० मांडूको० मं० 2) अर्थ—यह आत्मा ब्रह्म है।
"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः। अनेन वेद्यं सच्छास्त्रमिति वेदांत डिंडिमः" ॥ (ब्रह्मनामावली)
अर्थ—ब्रह्म सत्य और संसार भूठा है, और जीव और ब्रह्म में वस्तुतः भेद नहीं है, इसी से सतशास्त्र जानने के योग्य हैं, यह वेदांत का ढिंढोरा है।
उधर पत्ता-पत्ता और परमाणु-परमाणु ढोल पीटकर कह रहा हैः—
"तत्त्वमसि," "तत्त्वमसि"। (साम० छांदो०प्रपा06खं08) अर्थ—वह (स्वरूप हे प्यारे!) तू है, वही वस्तुतः तू है।
अज़ माह ता बमाही, हाकिम तुई ओ शाही। अर्थ—चंद्रमा मछली तक अर्थात् आकाश से भूमि तक अे प्यारे! तू ही शासक और बादशाह है।
भूमि के प्रत्येक नस में मैं ऐसा भरा कि विचारी के उदर में मैं अब समा नहीं सकता, उसका शरीर फट रहा है, और मुभे धक्के खा कर वनस्पतिवर्ग के रूप में बाहर आना पड़ता है। पानी में जाकर शरण ली, सरोवर, भील,नदी सब मुभ मत्स्य (भगवान्) से ऐसे भरे कि उनके अपने लिये स्थान न रहा, उड़ गए, मैं ही मैं रह गया।
अजब यक दुरें-नायाबम कि दर दरिया न मे गुंजम। चे तुफ़ां आहुए हस्तम कि दर सहरां न मे गुंजम॥
अर्थ—मैं एक ऐसा सुंदर मोती हूं कि किसी नदी में नहीं समा सकता, और ऐसा विचित्र मृग हूं कि वन में नहीं समा सकता हूं।
समुद्र के प्रत्येक बिंदू में जा धँसा, बहुतेरा अपने आप
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को कूट-कूट कर भरा है, पर हाय ! वहाँ भी मुझे शिर छिपाने को स्थान नहीं । बावना सा समझ कर समुद्र ने पुष्प की भाँति मुझे अंक में लेना चाहा, आंखों में समोना चाहा, परंतु अंक ही टूट गया ।
दामाने-निगह तंग व गुले-हुस्ने तो बिसयार । गुलचीं बहारे-तो ज़ दामाँ गिला दारद ॥
अर्थ – दृष्टि का दामन तो तंग है और तेरे सौंदर्य के सुमन बहुत हैं । तेरी शोभा के प्रसून (पुष्प) चुनने वाला पल्ले की तंगी (संकुचन) की शिकायत करता है ।
मेरी भरमार के कारण समुद्र के बंद बंद में कठोर पीड़ा होने लगी, बेचारा मरोड़े खा रहा है, लगातार अपने शरीर को उछाल उछाल मार रहा है, हूहू हाहा का कोलाहल मचा रहा है ।
एक आकाश का बुद्बुदा है । मुझ प्राण रूपी वायु की समाई उस में भी कहाँ ? उस बिचारे का उदर मुझ को लेकर फूला फूला, आखर कहाँ तक ? लो, वह भी फूट गया, मुझ घर टूट गया । बे घर का हूं । नख-शिख विलापी हूं । मेरे लिये कोई घर न रहा । अब कहाँ जाऊँ, क्या बनाऊँ ? पर हाय ! सुनाऊँ किसको ? दूसरा कोई नहीं, दूसरा कोई नहीं, एकमेवाद्वितीयम् (वहद्हु लाशरीक) हूं ।
आप ही आप हूं याँ ग़ैर का कुछ काम नहीं ।
शब्द हुआ – जाओ जहन्नुम में ।
राम – जहन्नुम मेरे ध्यान ही करने से जहन्नुम को सिधारता (भागता) है । नितान्त नाश हो जाता है, नाम को भी नहीं रहने पाता । (आनंद स्वरूप हूँ) । समय मेरा ऐसा घोर
शत्रु है (कालानवच्छिन्न हूँ) कि जहन्नुम में जाऊँ तो जहन्नुम वहाँ नहीं रहता, मुझे पैर टिकाने को कहीं ठौर नहीं मिलता ।
न मे गुंजम, न मे गुंजम,, ब बहरो-बर न मे गुंजम । व जन्नत दर न मे गुंजम, तहय्युर बहरे-मन हैराँ ॥ निशानम बे निशाँ मेदाँ, मकानम लामकाँ भीख़्वाँ । जहाँ दर दीदाश्रम पिन्हाँ, मरा जोयंद गुस्ताख़ाँ ॥
अर्थ – मैं समुद्र और पृथ्वी पर कहीं नहीं समाता हूँ, मैं स्वर्ग में भी नहीं समाता हूँ, आश्चर्य स्वयं मेरे लिये आश्चर्य युक्त है । मेरा पता बेपता समझो, और मेरा घर बेघर जानो । संसार मेरे नेत्र में निहित है, मुझको ढूँढनेवाले अविनयी (गुस्ताख, अशिष्ट वा अनर्थक) हैं ।
ऐ रौशनी-ए-तवा तो बर मन वला शुदी ।
अर्थ – ऐ भीतर के प्रकाश (बुद्धि) ! तू मुझपर एक विपत्ति हो गया, यह क्या ? मैं कर ही क्या रहा हूँ ? देश(मकाँ)का देश मैं, काल का काल में, अपने स्वरूप में स्वतः स्थित मैं, किसी के सहारे (आश्रय) का इच्छुक नहीं, अपनी महिमा में क्यों न मस्त रहूँगा ? पर हाँ ! मेरे लिये एक स्थान अवश्य श्रुति ने निश्चत किया है, वहाँ मैं विश्राम करता हूँ ।
शब्द हुआ – वह क्या ?
राम – तुम्हारा अंतःकरण (हृदय) ।
अर्ज़ो-समा कहाँ मेरी वुसअत को पासकें । तेरा ही है वह दिल कि जहाँ हम समा सकें ॥
अंगुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मानि तिष्ठति । ( यजु० कठ० 1-4-12 )
अर्थ – अंगूठे मात्र वह पुरुष शरीर के भीतर स्थित है ।
जीवत कौन है ? 81
He is free and libertine Pouring of his power the wine, To every age and every race, Unto every race and age, He emptieth the beverage Unto each and all Maker and original The world is the ring of his spells And the play of his miracles ........................................
Thou seekest in globe and galaxy He hides in pure transparancy, Thou seekest in fountains and in fires. He is the essence that inquires; He is the axis of the star; He is the sparkle of the spar; He is the heart of every creature; He is the meaning of each feature; And his mind is the sky; Than all its holds more deep, more high. (Emerson)
अर्थ – वह (ज्ञान स्वरूप) स्वतंत्र और निरपेक्ष है । अपनी सुरा-रूपी शक्ति (आत्मिक जीवन) को प्रत्येक युगकी संतति को जी खोल कर दान करता है । वह प्रत्येक समय और मानुषी सन्तान तथा प्रत्येक व्यक्ति को हृदय खोल कर (यह मस्ती की मदिरा) पिलाता है । वह इस संसार
का बनाने वाला और असल स्रोत (आदि कारण) है । संसार उस के मंत्रों का (या जादू का) छल्ला (अंगूठी) है, और उस के चमत्कारों और कौतुकों का क्षेत्र है । तू (उस ज्ञानी को या आनंद स्वरूप को) लोक और परलोक में ढूँढता है, परन्तु वह (सुह्दनिमित्र) विशुद्ध अंतः करण की निर्मलता में निहित है । तू उसको बैकुंठ के स्रोतों और यज्ञों आदि की अग्नि में ढूँढता है, परंतु वह स्वयं उस जिज्ञासु का स्वरूप विशेष है । वह ध्रुव-तारे का धुरा है, अर्थात् वह स्वतः अभिष्ठित है । वह प्रकाशों का भी प्रकाश है । वह प्रत्येक प्राणी का हृदय है । वह प्रत्येक चिह्न (रेखा) और तिल का अर्थ (सार) और अभिप्राय है, अर्थात् समस्त नाम और रूप उसी (सुह्दनिमित्र- स्वरूप) का निरूपण करते हैं । और उसका अपना हृदय सुविशाल गगन है (जिसके भीतर लोक-लोकांतर घिरे हुए हैं) । और वह (परमात्म-स्वरूप) उन सब की अपेक्षा अधिक गंभीर और उच्चतम है । (एमर्सन)
बुलबुल अज़ गुल बिगुज़रद चूँ दर चमन बीनद मरा । बुत परस्ती कै कुनद गर बरहमन बीनद मरा ॥ दर सुख़न पिनहाँ शुदम चूँ बूए-गुल दर बर्गे-गुल । हर कि दीदन मैल दारद दर सुख़न बीनद मरा ॥
अर्थ – बुलबुल यादि मुझको चमन में देख ले, तो फूल छोड़ दे । यदि ब्राह्मण मुझको देख ले, तो मूर्तिपूजा फिर कब करे । मैं बात में इस प्रकार निहित हूँ जैसे कि फूल की गंध फूल की पत्ती में । जो कोई कि मेरे देखने की कामना रखता है, वह वाक्यों में मुझ को देख ले ।
ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
(पूर्व विषय "भारत का भविष्य"के अन्त में यह अंग्रेजी कविता थी, वह सहित अनुवाद के छपने से रह गई थी, अतएव उसे अब इस लेख के अन्त में दिया गया है)
Peace like a river flows to me, Peace as an ocean rolls in me,
Peace like the Ganges flows, It flows from all my hair and toes.
Through the arched door Of eye-brows I pour;
And sit in the heaven of heart, There well do I ride
In glory, and guide, And no one can leave me and part.
अर्थ-शांति-सरिता बह रही मम ओर है । शांति-सागर मन रहा हिल्लोर है ॥ शांति, जैसी सुरसरी-धारा बही । जो कि मेरे नख-शिखा से बह रही ॥ वक्र भ्रुकुटि-द्वार से मैं देखता । और हृदयाकाश में मैं लेटता ॥ गर्व-संयुत मैं विचरता हूँ जहाँ । और शासन भय-रहित करता वहाँ ॥ छोड़ कोई भी मुझे सकता कहीं । अथच कोई पृथक् हो सकता नहीं ॥
Merry wedlock, union, On each or in heaven, Is a dim foreshadowing symbol Of my perfect embrace Of the whole human race And my clasp so firm and nimble.
As the golden lance, Of the sun's sharp glance; I pierce the hearts of flowers. As the silvery ray, Of the full-moon gay, I hook up the sea to my bowers.
O Lightning ! O Light ! O thought, quick and bright ! Come, let us run a race. Avaunt ! Avaunt ! Fly ! Fly ! But you can't With me even keep pace
O Earths and Waters, My sons and daughters ! O Flora and Fauna ! All limitations flinging Break forth into singing Hosanna ! Hosanna ! Om ! om !! om !!!
अर्थ-स्वर्ग या संसार के जो ब्याह हैं । एकता के जो बड़े उत्साह हैं ॥ वे हमारे सकल मानव जाति प्रति । मिलन-छाया-मात्र ही हैं कालित अति ॥ किंतु आलिंगन हमारा है विमल । पूर्ण, सुदृढ़ और अतिशय ही चपल ॥
स्वर्णकांता सूर्य-किरणों के सदृश । बाणवत् या तीक्ष्ण भालों के सदृश ॥ वेध देता हूँ हृदय से फूल को । छेद देता हूँ तथा तरु-मूल को ॥ पूर्णिमा के पूर्ण शशि-श्री की तरह । रजतकांता शुभ्र ज्योत्स्ना की तरह ॥ जोड़ देता हूँ लता के कुंज से । क्षुब्ध सागर-लहरियों के पुंज से ॥
ओ विभा ! ओ अति चपल सौदामिनी ! ओ सु-चिंता शुभ्र अति द्रुतगामिनी ! आइए, हम लोग दौड़ें वेग से । शीघ्र दौड़ें, तेज़ दौड़ें वेग से ॥
किंतु तुम मेरे बराबर तीक्ष्ण भी । दौड़ सकते हो भला बढ़कर कभी ? ॥ हे धरित्री, सिंधु, मेरे सुत-सुता ! देवि वन की ! राजऋतु-श्री सुस्मिता ! छोड़ दो सब क्षुद्र निज परिच्छिन्नता । गीत गाओ ॐ ॐ अभिन्नता ॥ —————
(भाग 10 में जो विषय 'रामढँढोरा' छपा था और उस के अन्त में जो अंग्रेज़ी कविता सहित अर्थ के छपने से रह गई थी, उसे अब यहां दिया जाता है)
Peace immortal falls as rain drops, Nectar is pouring in Musical rain, Drizzle ! Drizzle !! Drizzle !!!
My clouds of glory, they March so gaily ! The worlds as diamonds drop from them , Drizzle ! Drizzle !! Drizzle !!!
My breezes of law blow rhythmical, rhythmical, Lo ! nations fall like petals, leaves ; Drizzle ! Drizzle !! Drizzle !!!
My balmy breath, the breeze of Law, Blows beautiful ! beautiful ! Some objects swing and sway like twigs. And others like the dew-drops fall ; Drizzle ! Drizzle !! Drizzle !!!
My graceful Light, a sea of white, An ocean of milk it undulates. It ripples, softly, softly, softly ; And then it beats out worlds of spray.
I shower forth the stars as spray. Drizzle ! Drizzle !! Drizzle !!! OM ! OM !! OM !!!
अर्थी अमृत-शान्ति मेघ के बुदों के सम । भड़ी सुरीली लगी सुधा-रस बरसै अनुपम ॥ रिम झिम ! रिम झिम !! रिम झिम !!!
मेरी द्युति के मेघ चले हैं सुन्दर कैसे । है उनसे ये बिन्दु-लोक सब हीरों-ऐसे ॥ रिम झिम ! रिम झिम !! रिम झिम !!!
मेरी नियम-समीर चले हैं सम से लेखो । पत्र-पंखुड़ी-सदृश देश गिरते हैं देखो ॥ रिम झिम ! रिम झिम !! रिम झिम !!!
मेरी स्वास सुगंध नीति की सुखद बयारी । बहती है क्या मन्द ताप की हरनेहारी ॥ मृदु शाखा सम वस्तु भूल झुक भूमैं कोई । ओस-बिन्दु-सम गिरै टूट कर भू में कोई ॥ रिम झिम ! रिम झिम !! रिम झिम !!!
मेरी शोभन-प्रभा श्वेत-सागर-सी सोहै । क्षीर-पयोनिधि, लहर लहर मानस को मोहै ॥ मन्द मन्द जो मञ्जु तरंगे उसमें आतीं । जल-फुहार-संसार मार बाहर कर जातीं ॥ तारागण की भड़ी नीर-कण-सम, मैं आदिम । रचता हूँ हर घड़ी, 'रिम' झिम ! रिम झिम !! रिम झिम !!!