श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

अद्वैत।

भाग 14 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 14 · अध्याय 3 / 4

अद्वैत।

साधो ! दूर हुई जब होवे । हमरी कौन कोई पत खोवे ? सिंध विषै रंचक सम देखें । आज नहीं पर्वत सम पेखें ! ऐसा कौन नशा तुम पीया । अब लौ आप सही नाहीं कीया चमके नूर तेज सब तेरा । तेरे नैनन काहे अंधेरा ? तू तां आप भूपपति राजा । तू ही तीन लोक को साजा ॥

ऐ अद्वैत सागर की तरंग ! प्यारे नररूप नारायण (human face divine) नित्य-प्रसन्न-चित्त पुरुषों के कहकहे (अट्टहास) में, बुलबुल के चहचहे में, रुस्तम के युद्धीय घोष में, अत्याचार-पीड़ित के हृदयवेधी आर्तनाद में, कुसुम कलिकाओं की चटक (प्रस्फुटन) में, ललनाओं की मटक में, तेरी ही खटक है । क्या बाज़ार और क्या गुलज़ार, क्या भिचुक का भिक्षापात्र और क्या राजमुकुट, तेरे दरबार में बार पाने को तरसते हैं । सुमन कपोलों की आवाज़ और बुलबुलों की ध्वनियाँ तेरी स्वीकृति (साचित्व) के भूखे और प्यासे हैं । कस्तूरी को सुगंध और प्याज़ को दुर्गंध का प्रमाणपत्र तेरा ही दिया हुआ है । एक पत्थर (हीरे) को जो चाटा जाय तो हलाहल विष है, यह उच्च पद तेरा ही प्रदान किया हुआ है । प्रियतमा के अधरों पर स्वाद (अर्थात् ठीक होने की स्वीकृति) तेरा ही दिया हुआ है ।

बादा अज़ मा मस्त शुद नै मा ज़ मै । हम ज़ मादाँ बूए-गुल आवाज़े-नै ॥

अर्थ – मदिरा हम से उन्मत्त है, हम मदिरा से नहीं । ऐसे ही बाँसुरी की सुरीली ध्वनि और सुमन की सुगंध हमारे कारण से ही है, ऐसा तू समझ ।

Ye glittering towns with wealth and plenty crowned Ye fields where Summer spreads profusion round For me your tributary store combine Creation's heir the world, the world is mine.

अर्थ – ऐ संपति और समृद्धि से अभिषिक्त शोभायमान नगरो ! ऐ खेतो ! जिनमें गरमी की ऋतु चारों ओर प्रखरता से फैली हुई है ! मेरे लिये तुम्हारे ये सहायक समुदाय इकट्ठे होते हैं । समस्त सृष्टि का उत्तराधिकारी यह संसार है, और यह संसार मेरा है ।

(1) संसार का वह भाग जो श्रोत्र-इन्द्रिय से बोध होता है, आकाश; और (2) वह जो स्पर्शशक्ति (त्वच-इन्द्रिय) से बोध होता है, वायु; (3) वह जो चक्षु-इन्द्रिय से बोध होता है, तेज; (4) वह जो जिह्वा-इन्द्रिय से बोध होता है, जल; (5) वह जो घ्राण-इन्द्रिय से बोध होता है, पृथ्वी; यह समस्त पांचभौतिक जगत् (उपरि-लिखित पंच तत्वों से संयुक्त प्रपंच) अपने अस्तित्व के लिये तेरा भिक्षुक है । ओ प्यारे साक्षी (Subject)!

नेस्त ग़ैर अज़ हस्तिए- तो दर जहाँ मौजूद हेच । ख़्वाह दर इनकार कोशो ख़्वाह दर इक़रार वाश ॥

अर्थ – तेरे अस्तित्व के सिवाय संसार में कोई मौजूद नहीं है, इसमें चाहे तू इनकार कर और चाहे इक़रार कर ।

तेरी ज्ञान (consciousness) रूपी किरणें नयन-झरोखों से निकलकर चित्र विचित्र पदार्थों को अस्तित्व में लाती हैं, तेरी विवेक रूपी रश्मियाँ कानों से निकलकर मधुर और कटु ध्वनियों को मौजूद करती हैं । ऐ लघु और महान के आधार ! तेरे भरोसे वीर होकर प्रभात-समीर को अटखेलियाँ सूझती हैं ।

भीषाऽस्माद् वातः पवते । भीषोदेति सूर्यः । भीषाऽस्मादग्निश्चेंद्रश्च । मृत्युधावति पंचम इति ॥ ( यजुर्वेद तैत्तिरीयोपनिषद् ब्रह्मावल्ली अ08 मं० 1)

अर्थ – जिस के भय से वायु चलती है, जिस से भीत होकर सूर्य उदय होता है, जिस के भय के मारे अग्नि और इंद्र धावमान रहते हैं, और जिस से भय भीत होकर मृत्यु मारा-मारा फिरता है, वह ब्रह्म तेरा ही अपना आप है ।

जलवागाहे-रुख-तो दीदए-मन तनहा नेस्त । माहो खुरशेद हमीं आईना मीगर्दानन्द ॥

अर्थ – तेरे मुखमंडल की शोभा दिखलाने वाली केवल मेरी ही आँख नहीं, बरन् चंद्रमा और सूर्य भी यही दर्पण अपने सम्मुख लाते हैं (अर्थात् उनकी आँखों में भी तेरी ही शोभा है, या वह भी तेरे रूप को दिखलाने वाले हैं) ।

तस्मै सर्वं ततः सर्वं स सर्वं सर्वतश्च सः । (वासिष्ठ) अर्थ – उसी (परब्रह्म) के लिये यह सब (नाम-रूप- प्रपंच) है, उस से ही यह सब हैं, वह खुद यह सब हैं, और सब जगह वही है ।

आश्चर्य है कि

जब वह जमाले-दिलफ़रोज़ सूरते-मिहरे-नीमरोज़ । आप ही हो नज़ारा-सोज़ परदे में मुँह छिपाए क्यों ?

अग्नि के तेज से लकड़ी-पत्थर आदि यद्यपि जल उठें, किंतु अपने तेज से आग को कभी हानि नहीं पहुँच सकती । सम्राट् की तेजस्विता से मंत्री और श्रीमंत लोग यद्यपि भयभीत हो जाँयँ, किंतु अपनी तेजस्विता से सम्राट् कभी भय भीति नहीं होता । सिंह का गर्जन और नरसिंह की ललकार, तरवार के जौहर और सर्प की फुफकार, तपस्वी की धमकी और न्यायाधीश की फटकार, तेरे ही प्रकाश हैं । तू उनसे panic Stricken (भयभीत) क्यों है ? असमंजस (शशो-पंज) में क्यों पड़ता है ? उनको "घर की बिल्ली घर को म्याऊँ" वाला हिसाव बनाने की आज्ञा क्यों दे रहा है ?

दश्नाए-गमज़ा जाँस्तां नाविके-नाज़े-बे वनाह । तेरा ही अक्से-रुख़ सही, सामने तेरे आप क्यों ?

प्यारे ! ज़रा अपने आप में आकर तो देखो । भय कैसा ? बला का क्या काम ? विपत्ति का क्या नाम ? शोक और क्रोध, दुःख और पीड़ा का प्रयोजन क्या ?

मस्तो-खराब मी रवम, बे सर व पा हमी रवम । बीम नदारम अज़ बला, तन तलमला तला तला ॥ राहे-बक़ा हमी रवम, चूँ शहे चरख मुफ़र्दम । ग़म न ख़रम ज़माना रा, तन तलमला तला तला ॥

अर्थ – मैं मस्त और दीवाना बनकर और बेशिर-पैर हुआ फिरता हूँ । मुझे दुःखसे कुछ भय नहीं,तन तलमला तला तला। अमर लोक के मार्ग पर मैं चलता हूँ, और स्वर्ग के सम्राट् के समान मैं एक हूँ । मुझे समय की ज़रा चिंता नहीं, तन तलमला तला तला ( सारंगी के ताल का स्वर )

आनंदं ब्रह्मणो विद्वान् । न विभेति कदाचनेति ॥ ( य० तै० उ० ब्र० अ० 4 मे० 1 )

आत्मानंद वाले को भय और आशंका कैसी ?

रुपया-पैसे के हिसाब-किताब में, तर्क और तत्त्वज्ञान के गोरखधंधों में, और विज्ञान-गणित के इंद्रजाल में औरों की देखा देखी (भेड़चाल) बारीकियाँ छांटते हो, मूं-शिगाफ़ियां (छिद्रान्वेषण, बाल की खाल उतारने का क्रम) करते हो, पर ( घड़े जितना नहीं, किन्तु ) पहाड़ जितना मोती (दुर्रे-यतीम, असली अपना आप) लुप्त कर बैठे हो। आश्चर्य है निहाँ चूँ मान्द आँ राज़ कि बूदा शमए-महफ़िलहा।

अर्थ - वह रहस्य जो सभा की ज्योति बन चुका है, कब तक छिपा रह सकता है। तात्पर्य यह है कि जो भेद साधारण सभा में प्रकट किया गया, फिर उसका छिपा रहना असंभव है।

मेरे प्यारो ! अपनी लुप्तीकृत ( गुम करदा ) अँगूठी को एक बेर पा लो, धरती-आकाश में शासक तुम ही हो।

सुलेमाना बियार अंगुश्तरी रा। मुती ओ बंदाकुन देवो-परी रा॥ ज़ चाहो आब चे रजूर मांदेम। रवाँ कुन चश्मा हाए कौसरी रा॥ ज़ सूरतहाय ग़ैबी पर्दा बरदार। मुनव्वर कुन सराए-शशदरी रा॥

अर्थ - ऐ सुलेमान ! तू अपनी अंगूठी ला, और देव और परियों को अपना दास बना। हम इस संसारी पानी व कुएँ से बीमार हो गए हैं, तू अपने स्वर्गीय सोते को जारी कर। छिपी हुई सूरतों से पर्दा उठा और छे द्वारोंवाले घर (अर्थात् शरीर) को प्रकाशित कर।

ऐ भोले साधक ! सदाचारिक शिक्षा के पेडवोकेट ! कहाँ

तक पहरा दोगे ? कहाँ तक भय और आशा की व्यवस्थाओं से "हु कम दर*" करोगे ? कहाँ तक नरक और विपत्ति के बंदीघरों से धमकाओगे ? कहाँ तक तरह-तरह की गीदड़-भबकियाँ सुनाओगे ? जब तक रात ( मूढ़ता, अविद्या ) दूर न होगी, तब तक चोरी, जारी, जुआ, मद्य-पान आदि कभी बंद न होंगे, लाख यत्न पड़े करो।

Deeds of darkness can not be avoided in the dark.

अर्थ - जो कर्म अंधकार या अज्ञान के हैं वह अंधेरे में बंद नहीं किए जा सकते। तात्पर्य यह कि मूढ़ता के काम मूढ़ता में दूर नहीं होते, बरन् ज्ञान के प्रकाश से दूर होते हैं।

सच्ची विद्या (Light, Truth) रूपी सूर्य निकलने दो। पाप और पातक अंधेरे के साथ हरण हो जायँगे। अफ़लातून ने क्या सच कहा है, Knowledge is virtue, अर्थात् ज्ञान ही शुद्धि रूप है। सूर्य के प्रकाश के आगे दीपक आदि के प्रकाश कभी स्पष्ट नहीं हो सकते, ज्ञानवान् के आनंद रूपी सूर्य के सम्मुख विषय-सुख रूपी दीपक क्योंकर जल सकते हैं ? उस Orpheus ( ओरफ़्यूज़ ) के ईश्वरीय ध्वनियों के होते बिचारी Sirens ( साइरंस ) की सारंगी क्या कर सकती है ?

"What woman will you find, Though of this age the wonder and the fame,

_______________ * हुकमदर = who comes there कौन आता है ? सेना में रात को पहरा देते समय चोकीदार लोग किसी को आते देखकर चिल्लाते हैं। इसके उत्तर में पहरा वाला चोर वा साधु पहचान जाता है।

On whom His leisure will vouchsafe an eye

On fond desire?......................

How would one look from his majestie brow,

Seated as on the top of virtue's hill, Discountenance her despised, and put to rout, All her array!"

(Milton.)

अर्थ - ऐसी कौन सी स्त्री तुम्हें मिलेगी, चाहे वह इस समय की विचित्र और प्रसिद्ध ही हो, जिसपर उसकी (अर्थात् ईसा मसीह की) फुरसत ( अवकाश ) वा उल्लास पूर्ण चाह की दृष्टि डालेगी⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯⋯ उसके ( ईसा मसीह के ) उज्ज्वल ललाट से मानो भलाई की पहाड़ी की चोटी पर बैठे हुए कोई व्यक्ति किस दृष्टि से देखेगा ? घृणा से उसकी(स्त्री की) परवा न करेगा और उसके समस्त मनोमोहक आकर्षणों को पूर्ण पराजित करेगा।

रंगदार महताबी का उजाला ( प्रकाश ) काले तवे पर भी पड़ जाय तो उसे जगमगा देता है, प्रकाशित कर देता है; वैसे ही प्रेमपात्र (माशूक़ा) के मल, रक्त, हाँड़, मास भरे चर्म पर प्रेमी की दृष्टि पड़कर उसे ज्योतिर्मय और कांतिमान बना देती है।

A thing giveth but little delight That never can be mine." (Wordsworth)

अर्थ - जो वस्तु कि बहुत कम आनंद देती है, वह मेरी कदापि नहीं हो सकती।

बादा अज़ मा मस्त शुद नै मा ज़ मै। हम ज़ मादाँ बूए-गुल आवाज़े-नै॥

अर्थ - मदिरा हमसे मस्त होती है, हम मदिरा से नहीं, सुमन की सुगंध और बंसुरी की ध्वनि हम से ही जान।

वह महात्मा जो इस सौंदर्य और उत्तमता को जानता है और अपने स्वरूप को पहचानता है, उस ज्योतियों की ज्योति के सामने विषय-भोग के भावों के खद्योत (fire flies) भला किस प्रकार चमकेंगे ?

ऐ प्यारे ! सूर्य तेरा अपना आप है। तेरी आँख खोलने पर सूर्य प्रकट होता है, आँखें बंद करके अविद्या की अँधेरी रात क्यों बना रक्खी है ?

मातः, किं यदुनाथ, देहि चषकं, किं तेन पातुं पयः। तन्नास्त्यद्यकदस्ति वा निशि निशा का, बांधकारोदये। आमील्याक्षि युगं निशाश्रुपगता देहीति मातुर्मुहुः। वत्सो जां शुक कृष्णोद्यतकरः कृष्णस्तपुष्णातु नः॥ ( लीलाशुक )

तात्पर्य -

कृष्ण - मैया ! मैया !

यशोदा - क्यों मेरे लाल, क्यों ?

कृष्ण - मुझे एक कटोरा दो, जल्दी !

यशोदा - उसे क्या करोगे ? कटोरे से भी कोई खेलता है ? वह खिलौने पड़े हैं, उनसे खेलो।

कृष्ण - ( यशोदा से गर्दन निहुराकर ) मैं खेलने के लिये थोड़े ही माँग रहा हूँ। हम तो दूध पिएँगे।

यशोदा - लाल ! अभी से दूध कहाँ ? यह कोई समय है दूध का ? दूध तो है नहीं, कटोरा क्या करोगे ?

कृष्ण - ( दुलार से भल्लाकर ) ऊँ ऊँ ! और कब दूध होगा ?

यशोदा - अभी तुम मक्खन खाओ और रात होने फिर पेट भरके ताजा दूध पी लेना।

कृष्ण - ( ओंठ बिसूर कर ) हाय, रात कब पड़ेगी ?

यशोदा - जब अंधेरा होगा ?

यह सुनकर नन्हें कृष्ण ने फट आँखें मीच लीं, और फुरती से हाथ फैलाकर ज़ोर से कहने लगे - "ला दूध देदे, अंधेरा हो गया। ला दूध दे दे, रात हो गई।"

माता अपने बच्चे की यह चतुरता देखकर विस्मित रह गई। खिलखिलाकर हँस पड़ी, और प्रेम से विह्वल होकर बच्चे को छाती से लगा लिया और प्यार करने लगी।

वही कृष्ण ( परमात्मा ) आँख मीचकर दिन को रात बनानेवाला, क्षीर समुद्र का स्वामी, दूध के कटोरे के लिये रोनेवाला तुम्हारे "शिर पर, आँखों पर और हृदय पर बैठकर लीला कर रहा है; वही चोरों का लार्ड ( तस्कराणां पतिः ) तुम्हारे मन और बुद्धि की कोठरी (गुहा) में छुपकर इंद्रिय आदि की पुतलियाँ नचा रहा है; वह कृष्ण तुम्हारा आत्मदेव है; तुम ही हो; आँखें बंद करके रात बनाने की मखौलबाज़ी छोड़ो।

यह हँसी खूब नहीं ओ गुले-ख़दाँ हम से।

हँसी की खसी कर रहे हो। ओ शिवशंकर ! तेरे सामने तेरी लापरवाही मूर्तिमान होकर "कामदेव" के रूप में प्रकट हो तुझपर तीर और तुफ़ंग बरसा रही है। खोल अपना तीसरा नेत्र ( ज्ञान चक्षु ), और इस कामदेव को भस्म कर।

न मारा आपको जो ख़ाक हो अक्सीर बन जाता। अगर पारे को ऐ अक्सीरगर ! मारा तो क्या मारा॥

ओ ! सूर्यरूप मनुष्य ! आप ही अविद्या के बादल बनाकर अपने प्रकाश को मत छिपा ले। क्यों नहीं तुम से प्रकाश के सोते प्रतिक्षण चारों ओर जारी रहते ? ओ सत्य के जिज्ञासु ! तेरी सुगंध से संसारोपवन महक जाना चाहिए, तेरे शुद्ध जीवन के प्रभाव की बदौलत शांति और आनंद (Peace on earth and good will) से संसार का वायु सुगंधित हो जाना चाहिए। जैसे दीपक से प्रकाश फैलता है, वैसे ही तुझ से आनंद चारों ओर बरसते रहना चाहिय। स्त्री या पुरुषों की छातियों में कामदेव के उपद्रव, एवं ईर्ष्याद्वेष की आँधियों को तेरे अमृत वरसाले वाले दर्शनों से ही रुक जाना चाहिए, जैसा कि भगवान् दत्तात्रेय को दूर से दो एक बेर देखने से एक प्रथमश्रेणी की पुंश्चली स्त्री ( वेश्या ) का जीवन पलटा खा गया था; हृदय को सुख और आँखों को शीतलता देनेवाले दर्शनों से शांति की ऐसी वर्षा हो गई कि मानों भयानक आँधी का तूफ़ान दूर हो गया; बिचारी के मन की कल्मष और कलुषता की धूलि आदि सब एक दम बैठ गई ( अर्थात् दूर हो गई )।

हर ज्ञान प्रदीप सदा लशके। मन मंदिर योगिल के वल के॥

बहु मोह उदय जो हृदय तिनके। तमपुंज वही ताको हनि के॥

अति लौल अनंग पतंग महा। छिन माहिं स्वाभाविक ताहिं दहा॥

निह काम समूह गुणाप्रदिपै। सो स्नेह स्नेह वही अरपै॥

जिनके अति भाल के भाग भले। अस दीपक तां मनधाम जलै॥

अर्थ - ज्ञान का दीपक सदैव जलता है ज्ञानियों के मन मंदिर में स्थिर होकर। और यदि उनके हृदय में मोह उदय होना चाहे, तो उसके अंधकार-समूह को वह दीपक निवारण करता है। काम रूपी पतंग महा चपल और चंचल है जो क्षण क्षण में अपने आप ही इस ज्योति में पड़कर जलता है। निष्काम कर्म इस दीपक की वाती है, और प्रेम रूपी तेल इसमें खर्च होता है। जिनका भाग्य अति उत्तम बलवान् होता है, उन्हीं के मनोमंदिर में यह प्रदीप जलता है।

आला ऐ गौहरे बहरे-मुसफ़्फ़ा। कि दर आलम तुई पिन्हाँ व पैदा॥

अर्थ - खबरदार, ऐ निर्मल सागर के मोती ! संसार में गुप्त और प्रकट तू ही है।

स्वच्छ और श्वेत बिल्लौर के पास यदि नीला कपड़ा पड़ा हो तो बिल्लौर नीला दृष्टिगोचर होगा, यदि पीला काँच का टुकड़ा पार्श्व में धरा हो, तो बिल्लौर पीला दिखाई देगा,

लाल वस्तु के पास होने से लाल मालूम होगा। वास्तव में बिल्लौर सब रंगों से रहित है। कोई द्रव्य (जल वा गैस) अपनी सूक्ष्मता वा कोमलता के कारण गोल ग्लास में गोल सूरत ग्रहण कर लेगा, चौड़े कटोरे में चौड़ा और चौकोर बर्तन में चौकोर हो जायगा। लोहे की लंबी सलाख़ आग में लाल गर्म की जाय तो उसके साथ मिलकर आग लंबी दिखाई देगी, गोल तवा भट्टी में तपाया जाय तो तवे से मिलकर आग गोल मालूम होगी, चौड़ी वस्तु में प्रविष्ट होकर आग चौड़ी दिखाई देगी, वस्तुतः आग का कोई आकार नहीं। सब नेत्रोंवाले इस बात को मानते हैं, और दृक्शास्त्र (optics) ने सिद्ध कर दिया है कि महल-अटारी वाग-बगीचे जो कुछ देखते हो, वस्तुतः प्रकाश ही को तुम देखते हो; प्रकाश ही की किरणों में सारा संसार दृष्टिगोचर होता है; यही प्रकाश "हरा, लाल, पीला, बना हुआ है, और तुरा यह कि अपने स्वरूप में बिलकुल बेरंग है। अब जिस प्रकार बिल्लौर, द्रव्य ( जल वा गैस ), अग्नि और प्रकाश अपनी स्वच्छता के कारण नाना प्रकार के रंग ग्रहण करते हैं; ठीक उसी तरह प्रकाशों का प्रकाश आपका असली अपना आप ( आत्मदेव ) अपनी स्वच्छता के कारण कहीं कुछ और कहीं कुछ होकर नज़र आता है।

अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्चय। (यजु० कठो० अ० 1 व० 5 मं० 9)

अर्थ - जैसे एक ही अग्नि समस्त ब्रह्मांड में प्रविष्ट होकर प्रत्येक से अभेद हुई नाना रूप होगई है, ऐसेही एक आत्मा

जो सब सृष्टि के भीतर है प्रत्येक से अभेद हुआ नाना रूपों में होगया है।

यार को हमने जा बजा देखा। कहीं बंदा कहीं खुदा देखा॥ सूरते-गुल में खिलखिला के हँसा। शकले-बुलबुल में चहचहा देखा॥ कहीं है बादशाहे-तख़्ते-निशीं। कहीं कासा लिये गदा देखा॥ कहीं आबिद बना कहीं ज़ाहिद। कहीं रिंदों का पेशवा देखा॥ करके दावा कहीं अनलहक़ का। बर सरे-दार वह खिंचा देखा॥ देखता आप है सुने है आप। न कोई उसके मासिवा देखा॥

बल्कि यह बोलना भी तकल्लुफ़ है। हमने उसको सुना है या देखा॥

गर नूर है तो वह है और नार है तो वह है।

हर रंग में बसता है, तौ भी ये विलास (कातुक) सब दिखावटी ही हैं, वास्तविक नहीं। वह अपने स्वरूप से शुद्ध पवित्र है, सब से न्यारा है। माना कि बुद्धि और प्राण उसी के अस्तित्व सागर के बुलबुले से हैं, या उसी में सर्प की भाँति भासते हैं, तौ भी वह निर्लेप है, शुद्ध है। वह (आपका असली अपना आप) शरीर नहीं है, इंद्रिय नहीं है। वह प्राण नहीं है, बुद्धि नहीं है। पर हाय ! इस शुद्धता, सत्यता और व्यापकता पर वारे जाऊं कि प्रकाश, बिल्लौर आदि की भाँति जो मिला उसी के होगए, जिससे भेंट हुई उसी से

अभेद हो गए। शरीर के साथ एक होकर कहने लग पड़े कि "मैं बदरिकाश्रम जाऊँगा, श्री अमरनाथ से हो आया, इत्यादि।" प्राणों से मिलकर उनके गुण अपने में गिन लिए, और बोल उठे - "मुझे भूख प्यास लग रही है, दूध लाओ।" बुद्धि से प्रणय हुआ तो बस ऐसा कि उस दासी को अपनी राज-मोहर सौंप दी, जो कुछ उससे उल्टा सीधा हुआ, मान बैठे, मैंने किया है, जैसे "मैंने क्या अच्छा प्रबंध लिखा है, यह युक्ति कैसी उत्तम सोची है, इत्यादि।" ऐ भोले महेश, मेरे प्राण ! बलिहारी ! तुम्हारी शुद्धता, व्यापकता और कोमलता पर बलिहारी ! पर ज़रा देखना ! वह बात मत करो "जिस लाई गिल्ली उसी नाल उठ चल्ली।" बुद्धि, प्राण, मन इंद्रिय आदि का कुसंग छोड़ो और अपने आप को कलंक मत लगाओ।

बाम पर नंगे न जाना तुम शबे-महताब में। चांदनी पड़ जायगी मैला बदन हो जायगा॥

असंगोऽहमसंगोऽहमसंगोऽहं पुनः पुनः। सच्चिदानंद रूपोऽहमहमेवाहमव्ययः॥ ( ब्रह्मवल्ली )

अर्थ - मैं असंग हूँ, मैं असंग हूँ अर्थात् मैं नितांत असंग हूँ, मैं सच्चिदानंद स्वरूप हूँ, और मैं ही अविनाशी आत्मा हूँ।

तुम सच्चिदानंद घन हो, देह प्राण आदि क्यों बने फिरते हो ? असत्, जड़, दुःख रूप कहलाने में क्या स्वाद रक्खा है ? प्यारे ! इस आत्महत्या से क्या लाभ ? "रक्त, स्वेद, वीर्य, मूत्र और थूक" इन पँच जलों के कीचड़ ( पँच+आब = पंजाब, शरीर ) में क्यों फँसे हो ? विचित्र दिल्लगी है।

तो चुनी निहाँ दरेगे कि महे-बज़ेरे-मेरे। बदरां तो मेरे-तन रा कि मही व खुशलक़ाई॥

अर्थ - शोक ! तू ऐसा छुपा हुआ है जैसे कि चंद्रमा बादल के नीचे छुपा होता है। तू इस शरीर रूपी बादल को फाड़ डाल, क्योंकि तू चंद्रमा है और बहुत ही सुंदर है।

जिज्ञासु - कुछ समझ में नहीं आता, भला हम जीव ( पापी बंदे ) सत् चित् आनंद क्योंकर हो सकते हैं ? आहि आहि ! ऐसी नास्तिकता ! समस्त सृष्टि तो पुकारती है कि हम परतंत्र और अल्पज्ञ हैं, और आप ज़बरदस्ती हमें ब्रह्म ( शुद्ध परमात्मा ) बतलाते हैं। ईश्वर की दोहाई ! ईश्वर की दोहाई !

ज्ञानी - प्यारे ! महत् आश्चर्य है कि आप ब्रह्म के सिवाय और कुछ भी नहीं हो, सरासर ब्रह्म ही ब्रह्म हो, और फिर इनकार करते हो। प्रत्येक मनुष्य आकाश के कर्ण को बधिर ( बहेरा ) कर देनेवाले उच्च स्वर से पुकार रहा है कि "मैं पवित्र हूँ, सच्चिदानंद हूँ, अमर हूँ, एक ही हूँ, सर्वोपरि हूँ, चैतनघन हूँ, इत्यादि।" तिसपर भी आप इनकार करते ( भागते ) हैं।

राज़व करते हो ज़ालिम, आग पानी को लगाते हो।

जिज्ञासु - यह और भी अनूठी सुनो। औरों को तो रहने दीजिए, बंदा अपनी बात धर्मतः कह सकता है कि कभी भूले से भी न कहा होगा कि "मैं ब्रह्म हूँ"। बताइए तो सही कि आपके सामने कब ईश्वरीय दावा किया था, और किस भाषा में किया था ?

ज्ञानी - संसार के कुरुक्षेत्र में आप और शेष सब लोग

"शिवोऽहम् शिवोऽहम्" का गीत कर्म की भाषा से गा रहे हो, चाहे चर्म-जिह्वा से आप इनकार कर जाओ। पर मौखिक बक बक की अपेक्षा कर्म का ढिंढोरा अधिक विश्वास योग्य होता है। "Acts Speak louder than words"। एक नवयुवक मदिरा पीकर मस्त पड़ा था। उसके पिता ने आकर उसे धिक्कारना आरंभ किया। नवयुवक स्पष्ट मुकर गया और सोगंध खा खाकर बोला कि "मैंने मदिरा छुई तक भी नहीं"। परंतु मस्ती भी कहीं छुपी रह सकती है ? नशा आँखों में बोल रहा था, गंध अपने आप मदिरा की रिपोर्ट दे रही थी। नहीं-नहीं कर ही रहा था कि उलटी होगई, लो अब क्या छुपाओगे ?

नहीं छुपता मिसाले-बू छुपाए लाख पर्दों के। मज़ा पड़ता है जिस गुल पैरहन को बेहिजाबी का॥

जिह्वा से लाख-लाख छुपाना चाहा, पर कर्मों ने उसे प्रकट कर ही दिया। ऐ प्यारे ! चिदानंदघन तेरा आत्मा है, तू इस कस्तूरी को चाहे जितना छुपा, छुपेगी कभी नहीं।

( 1 ) युधिष्ठिर से प्रश्न किया गया कि "आश्चर्य क्या है ?" तो उसने उत्तर दिया -

अहन्यहनि भूतानि गच्छन्ति यममंदिरम्। शेषाः स्थातुमिच्छंति किमाश्चर्यमतः परम॥ (महाभारत)

अर्थ - दिन-दिन ( सहस्रों ) प्राणी यमराज के लोक को चले जा रहे हैं ( अर्थात् मर रहे हैं ), किंतु जो ( मृत्यु से ) बचे हुए हैं, वे यहाँ ( इस संसार में ) रहने की इच्छा करते हैं, इससे बढ़कर आश्चर्य की बात और क्या होगी ?

यह जानते भी हैं कि जो पैदा हुआ है, वह अवश्य मरेगा

ज़िंदगी मौत थी इक उम्र में साबित यह हुआ। मेरा होना था फ़क़त मेरे न होने के लिये॥

तिसपर भी किसी को अपनी मृत्यु का विश्वास नहीं आता। मुँह से यद्यपि प्रति समय मृत्यु की रागनियाँ पढ़े गाएँ - "यह दुनिया है चार दिहाड़े ( दिन ) एथे रहना नाहीं, इत्यादि" किंतु व्यावहारिक रीति पर इसके प्रतिवाद (रद्द करने) में ज़रा न्यूनता नहीं करते, उद्योग-धंधों का सिलसिला बराबर फैलाते जाते हैं, और अपने बुढ़ापे या त्याग ( निःसंबन्धता ) के खयाल को मिटाकर इस लापरवाही से मृत्यु-सागर में लोभ का लंगड़ डाल बैठते हैं कि मानो मृत्यु की आँधी कभी आनी ही नहीं। इससे बढ़कर विस्मय-आविष्ट और क्या हो सकता है ?

जीर्यति जीर्यतः केशा दंता जीर्यन्ति जीर्यतः। जीवनाशा धनाशा च जीर्यतोऽपि न जीर्यति॥

अर्थ - बूढ़े मनुष्य के बाल और दाँत तो मुर्झा जाते हैं, किंतु द्रव्य और जीवन की चाह फिर भी नहीं मिटती।

बफ़िकरे-नेस्ती हरगिज़ नमी उफ़तंद मग़रूराँ। अगर्चिः सूरते-मिक्राज़े-ला दारद गिरेबांहाँ॥

अर्थ - घमंडी लोग नास्ति (मृत्यु) की चिंता में कदापि नहीं पड़ते यद्यपि उनकी गर्दन ला ( ﻻ = नास्ति, ) जैसी कैंची का स्वरूप रखती है।

आख़िर इसमें भेद क्या है ? एक दिन शरीर के नाश हो जाने में तो कुछ संदेह ही नहीं, फिर मरने का क्यों विश्वास नहीं आता ? प्यारे ! इसके सीधे-सीधे यह अर्थ है कि तुम्हारे स्वरूप में "मरना" नाम को भी नहीं, तुम्हारा आत्मा अमर है, अकाल है, तुम्हारा असली अपना आप सत्स्वरूप है।

न हन्यते हन्यमाने शरीरे। ( गीता )

शरीर के मारे जाने से (आत्मा) का नाश नहीं होता ॥

"Death hath not touched it at all Dead though the house of it seems!"

अर्थ—मृत्यु ने कभी उस आत्मा को स्पर्श नहीं किया,यद्यपि शरीर या उसका निवास (मंदिर) मृतक प्रतीत होता है ।

ब पोशंदए-जामा जानस्त नाम । ख़याले-फ़ना गश्तनश हस्त ख़ाम ॥

कपड़े ( शरीर रूपी वस्त्र ) पहननेवाली आत्मा है, उसके विनाश होने का ख़याल ख़ाम (कच्चा) है । तुमको मरना तो कभी है नहीं । मृत्यु की तर्क-वितर्क (प्रश्नोत्तर) में व्यावहारिक विश्वास क्यों कर जमे ? इस लिये तुम्हारा प्रत्येक काम यह ढफ़ बजा रहा है ।

सब्त अस्त बर जरीदए-आलम दवामे-मा । संसार के दफ़्तर पर हमारी ही सदैवता लिखी है ।

(2) और सुनिए, मुँह से तो "मैं पापी, मैं पापी" की गप हांकते नहीं लज्जित होते, वरन् कभी-कभी इस निठुर विचार को feeling (प्रेम) के पवित्र वस्त्रों में सजाते हैं । जैसे—

चार चीज़ आवुर्दाअम शाहा कि दर पेशे-तो नेस्त ।* आजिज़ी ओ बेकसी उज़रो-गुनाह आवुर्दा अम ॥

अर्थ - ऐ बादशाह ! मैं चार वस्तुएँ ऐसी लाया हूँ जो तेरे पास नहीं हैं; अर्थात् अधीनता, मित्र हीनता, क्षमा-प्रार्थना और अपराध ।

________________________ * यह याद रहे कि इस अधीनता पूर्ण पद्य में आनन्द का हिस्सा वही है, जहाँ लेखक ने साकार ईश्वर ( personal god ) पर अपनी श्रेष्ठता ( अधिकता ) जतलाई है ।

किंतु व्यावहारिक रीति पर बराबर इसके विरुद्ध यह जतलाने वाले व्याख्यान दिए जाते हैं कि "मैं निर्लेप हूँ, शुद्ध हूँ, असंग हूँ, पवित्र हूँ ।" आखिर सत्यता को कोई कहां तक धोका देगा ?

सत्यमेव जयति नानृतं = सदैव सत्य जीतता है, मिथ्या नहीं। कूड़ा निखुट्टे नानका ओड़क सच्च सही ।

जब कोई छोटी सी भूल भी दिखला दी जाय, तो बुरा लगता है, सहा नहीं जाता; कोई अपराध प्रकट कर दिया जाय तो बुरा मानने को तैयार हैं-"हाय, हमारी इज्ज़त में फ़र्क़ आगया"; जब किसी प्रकार के अप्रिय वाक्य अपने विषय में सुने जायँ तो वक्ता को चट नोटिस दिया जाता है कि अपने वाक्यों को वापस ले लो ( withdraw your statement ), अन्यथा अभियोग चलाया जायगा । एक छोटे से बच्चे को अपराधी ठहराया जाय तो वड़वड़ाने लगेगा; एक सामान्य नौकर को दोष लगाया जाय तो अप्रसन्न हो जायगा ।

इस प्रकार के ढंग से साफ़-साफ़ यह अर्थ टपकते हैं कि हर कोई अपने स्वरूप की दृष्टि से शुद्ध है, निर्लेप है, शरीर या बुद्धि के अपराधों और पापों से कभी उस पर दोष नहीं आ सकता । मुर्ग़ाबी (पक्षी विशेष) चाहे गँदले पानी में रहे, चाहे गंगाजल में, कभी भीगती नहीं, वैसे ही आत्मा चाहे पवित्र बुद्धि, शरीर में देखा जाय, चाहे अपवित्र में, सदा शुद्ध और असंग है ।

किं गंगांबुनि बिंबितेऽम्बरमणौ चांडालवाटी पयः । पूरे वांतरमस्ति कांचन घटि मृत्कुंभयोर् वांबरे ॥

प्रत्यग्वस्तुनि निस्तरंग सहजानंदावबोधां बुधौ । विप्रोऽयं श्वपचोऽयमित्यपि महान् कोऽयं विभेदभ्रमः ॥ ( शांकर मनीषा पंचक )

अर्थ—गंगाजल में या चांडाल की गली के गड्ढे में, या सोने के वर्तन में, या मिट्टी के घड़े में जब सूर्य अपना प्रतिबिंब डालता है, तो उस प्रतिविम्बित सूर्य में भला क्या भेद हो सकता है ? अर्थात् प्रतिबिंब में कोई विभेद नहीं हो जाता, चाहे पानी किसी प्रकार का क्यों न हो । फिर उस सहजानंद और ज्ञान के समुद्र रूप प्रत्यगात्मा में तुझे ऐसी भ्रांति और भ्रम क्यों कि यह ब्राह्मण है और यह चांडाल है ?।

सूर्य गंगाजल में प्रतिबिंबित होने से अधिक पवित्र नहीं हो जाता और मदिरा में चमकने से अपवित्र नहीं हो जाता; वैसे ही आत्मा (अर्थात् अपना वास्तविक स्वरूप) शरीर और बुद्धि के ख़राब होने से ख़राब नहीं होता है और उनके गुणों से लाभान्वित होकर उन्नति नहीं पकड़ता । वह पुरुष जिसने इस तत्त्व को जाना है और अपने निज स्वरूप में इस प्रकार आरूढ़ होगया है जैसे सर्व-साधारण लोग अपने आप बुद्धि या शरीर में घर कर बैठते हैं, वह पुरुष अमर है, वह पुरुष सर्वोपरि वा सर्वोत्तम स्थानवाला है ।

जहां जाते हुए हिंस्र ओ हवा के होश उड़ते हैं ।

क्यों नहीं अपने इस राज्य को सँभालते ? औरों के लेख और व्याख्यान पढ़ते सुनते जीवन बीत गए, ज़रा अपने जादू भरे लेक्चर को भी प्रेम के कानों से सुनो जो हर समय दे रहे हो, और दे भी रहे हो वर्तमान भाषा में । ज़रा सोचो, कोई व्यक्ति अपने ऊपर दोष आने देता है ? खुल्लम खुल्ला

अपराधी सिद्ध हो चुका हो तो भी अपने अपराध का धब्बा किसी अन्य के मत्थे लगाने का यत्न करेगा । अपने तेवरों से, आवेश से, अंतःकरण से और जिह्वा से चिल्ला २ कर पुकारेगा कि मैं बेदाग़ हूँ, मैं अपाप हूँ । सरकारी न्यायालयों में जहां भलाई बुराई को देखने वाले न्यायाधीश विराजमान हों, वहां ऐ सत्य ( Truth ) के परखने वाले साक्षी ! ज़रा प्रकट होकर देख ले; जज पूछता है—"तुमने अमुक अपराध किया ?" अपराधी बोलेगा—"श्रीमन् ! कभी नहीं, बिलकुल नहीं, कदापि नहीं ।" यदि अपराधी के विरुद्ध पर्याप्त प्रमाण और साक्षी मिल जायँ और उस पर चार्जशीट ( अपराधानिश्चय- पत्र ) लगाया जाय, तो भी अपराधी अभियुक्त तो वास्तव में सच्चा ही है, उस न्यायाधीश का विवेक अभियोग की वास्तविकता से लड़ा नहीं, अपील दायर हो; किंतु अपील- वाले ने भी अपराधी ठहराया, तो "पक्षपात हुआ है, उत्कोच ( रिश्वत ) और एकांगता ( लिहाज ) चल गई है ।" बंदीघर में भेज दिया गया, तो इसका कारण यह नहीं था कि अपराधी दोष-संयुक्त था, बरन् "सरकार के घर में न्याय नहीं, अदालत अंधी है ।" संसार बुरा कहता है तो सारा संसार (hydra- headed mob) पागल है, किंतु मैं निष्कलंक हूँ ।

हाँ, ऐ कलंकित मनुष्य ! तू वस्तुतः निष्कलंक है, बिल- कुल निर्दोष है । सूर्य के साथ उल्लू तो कदाचित् कभी आँख लड़ा भी ले, किंतु तेरे पवित्र स्वरूप के समक्ष दोष बिलकुल नहीं ठहर सकता । हाँ, यदि तेरे यहाँ चूक है तो यह है कि लापरवाही से अपने शुद्ध और अनंत स्वरूप को भूलकर तू अपने आपको अपवित्र शरीर और बुद्धि आदि ठान बैठा है, बरन् अपने भीतर की पवित्र वाणी को (जो तुझे यह

जतलाती है कि तू अमर और शुद्ध है) बिगाड़कर उसे उल्टे अर्थ दे रहा है, जैसे एक बीमार मित्र को देखने के लिए आए हुए एक बधिर (बहरे) ने किया था ।*

________________________ * एक बहरे को खबर मिली कि उसका मित्र बहुत बीमार है । उसकी कुशल-क्षेम लेने को जाने का संकल्प किया । तत्काल यह विचार आया कि रोगी बेचारा धीमी आवाज़ से बोलेगा और हमें पहले ही ऊँचा सुनाई देता है, उसकी धीमी आवाज़ समझने में बड़ी कठिनता होगी, बार बार "हूँ ? हायँ" किया तो बुरा मालूम देगा; सब कहेंगे, कहाँ से मग़ज़ खाने आ गया । इस से अच्छा होगा, थोड़ी सी बात चीत करके रोगी को प्रसन्न कर आएँ ।

मन में यह कहकर उठ खड़े हुए और रास्ते में चलते-चलते बातचीत करने का प्रोग्राम तैयार किया जो इस प्रकार था । पहली बात हम पूछेंगे - "अब आपकी प्रकृति की क्या दशा है ?" इसका उत्तर नियमानुसार यह होगा कि "अब तो कुछ आराम है, आपकी कृपा से ।" हमारी ओर से दूसरा प्रश्न यह होगा - "कौन सी औषधि का सेवन है ?" इसके उत्तर में वह किसी न किसी औषधि का नाम अवश्य लेंगे । फिर तीसरा प्रश्न यह किया जायगा कि "आप कौन से डाक्टर की चिकित्सा करते हैं ?" इसके उत्तर में भी रोगी किसी न किसी डाक्टर का नाम अवश्य ही लेगा । हम उसे प्रसन्न करने के लिये रोगी की प्रत्येक बात पर "बहुत ठीक, बहुत ठीक" कहकर चले आएँगे । ऐसे चकमे देंगे कि कोई जान ही न सके कि हम बहरे हैं ।

इधर प्रोग्राम तैयार हुआ, उधर रोगी के घर पर भी आ

उपस्थित हुए । रोगी की दशा अत्यंत भयानक थी, किंतु यह अपने प्रोग्राम के अनुसार काम करने लगे ।

बधिर—( रोगी से ) अस्सलाम अलैकुम किबला ! ( नमस्कार भगवन् ! ) कहिए, क्या हाल है ? अब तो कुछ आराम है न ? ज्योंही यह खबर सुनी कि जनाब की तबीयत अच्छी नहीं है, चित्त व्याकुल होगया । खुदा आपको शीघ्र आरोग्यता प्रदान करे ।

रोगी—हाय मरता हूँ । प्राण निकलने ही को हैं । हाय हाय !

बधिर—( रोगी के ओष्ठ हिलते देखकर ) अलहम्द लिल्लाह ! आपका स्वास्थ्य लाभ होना सुनकर जान में जान आ गई । धन्यबाद है बारी ताला ( परमात्मा ) का, धन्यवाद है । आप औषधि कौन सी सेवन करते हैं ?

रोगी - ( व्याकुल होकर ) विष सेवन करता हूँ, विष ।

बधिर—यह औषधि तो रामवाण है, अमृत है । आपके रोग के लिये तो 'आबेहयात' ( अमृत ) है । बहुत ठीक । श्रीमान् कौन स चिकित्सक की चिकित्सा करते हैं ?

रोगी—(अत्यंत खिन्न होकर) मलकुलमौत (यमराज)की

बधिर—उक्त डाक्टर साहब तो हकीम हाज़िक है । वह तो अफ़लातून और जालीनूस है । उसके हाथों में यश है । वह हुक्मी इलाज करता है । मैं अभी उसी के यहाँ से आ रहा हूँ ।

इधर रोगी तो बहरे के उत्तरों से जलभुन कर कोयला हो रहा था; उधर बधिर अपनी दूरदार्शिता और बुद्धिमत्त पर अभिमान कर रहा था, क्या खूब ?

तुम्हारा अंतरात्मा इस विचार को नहीं सह सकता (rebels against it) कि "तुम अशुद्ध हो ।" प्रत्येक व्यक्ति को छोटा बनने से स्वाभाविक घृणा वा संकोच (natural repugnance) है । इस जिह्वा का उपदेश तो यह है कि "शुद्धम् अपापविद्धम् = तुम शुद्ध और पाप से मुक्त हो । तुम शरीर और शारीरिक कदापि नहीं हो । शरीर ( मल और विष्टा का थैला ) तो किसी का भी शुद्ध नहीं हो सकता, चाहे कोई हज़ारों वर्ष उसे गंगा में धोया करे ।"

कभी न होवे शुद्ध कुबुध यह जल में धोए । प्याज़ न केसर होय जाय कशमीरें बोए ॥

तुम्हारे भीतर से आवेश (impulse) के साथ एक शुभ संवाद (gospel) सुनाई देती है कि "शुद्ध स्वरूप जो है सो ही तुम हो, शरीर नहीं हो; अशुद्ध और परिच्छिन्न शरीर तथा बुद्धि के ख्याल को त्यागो, और अपने शुद्ध स्वरूप में जागो । मगर वाह रे उल्लू समझवाले बहरों के बहरे ! तुम पर इस अंतरावेश का यह प्रभाव होता है कि तुम अपने साढ़े तीन हाथ के पैंडमन टापू को शुद्ध और निर्दोष दिखाया चाहते हो, शरीर और बुद्धि को निरपराधी सिद्ध करने का प्रयत्न करते हो, देहाभिमानी रहकर दोषों से भागते हो । तुम्हारे अंतरात्मा से निरन्तर यह लेक्चर निकलता है कि मंसूर की तरह सिर से परे होकर लोक परलोक के स्वामी हो जाओ । अपने आत्माभिमान ( महत्व ) को सँभाल लो । किंतु विचित्र बधिर हो कि फ़रऊन और नमरूद के समान धन-धरती से परिच्छिन्न होकर बड़ा बनना चाहते हो । घमंड में फँसते हो ।

नमरूद शुद मर्दूद चूँ ? बूदश निगाह महदूद चूँ ।

मारा तकब्बूर कै सज़द ? चूँ किब्रिया हरजास्तम ॥ अर्थ—नमरूद क्यों लज्जित वा चुद्र हुआ ? इसलिये कि उसकी दृष्टि परिच्छिन्न थी । भला मुझे ऐसा चुद्र अहंकार कब शोभा देता है, जबकि मैं ब्रह्म भाँति सब जगह समाया हुआ हूँ ? ( अथवा भला मुझे अहंकार क्यों हो जबकि मैं ही हर जगह सब से बड़ा हूँ ?)।

तुम्हारे व्यवहार पर प्रकाशस्वरूप से यह नाद आ रहा है कि चमड़े की जूतियाँ ( शरीर-भाव ) उतार डालो । क्योंकि जहाँ तुम खड़े हो, अत्यंत पवित्र भूमि है । पर आश्चर्य ! ऐ बधिर ( बहरे ) मूसा ! तुम यह जूतियाँ ( शरीर ) पवित्रात्मा पर रक्खा चाहते हो ।

( 3 ) चाटुकारिता ( खुशामद ) चींटी से लेकर ईश्वर तक को भाती है ।

खुशामद हर किरा करदी खुश आमद । जिस व्यक्ति की खुशामद की, उसे अच्छी मालूम दी ।

आखिर क्यों ? कारण क्या है ? केवल यही कि खुशामद हमें प्राणप्रिय-सुमन की सुगंध पहुँचाती है । हमारे घर ( निजधाम ) से संदेशा लाती है । मैं आत्मदेव, बहुत बड़ा हूँ, यह पता बताती है । और यह आनंद-संवाद सुनाती है कि।

तूर पर चश्मे-कलीम अल्ला का तारा है तू । मानिए-यासीन है तू मफ़हूमे-"ऐ अदना" है तू ॥

शोक ! पत्र ( संदेशा ) को लेकर तुम अविद्या रूपी मद्य में डिबो देते हो कि ।

हैं दफ़्तरे बेमानी गर्के-मए नाब आला ।

या उसके ऊपर के सुंदर लिफ़ाफ़े पर कुछ देर मस्त होते हो, फिर बिना पढ़े उसे शरीर रूपी रद्दी के टोकरे ( waste paper basket) में डाल देते हो ( अर्थात् वह बड़ाई शरीर को दे देते हो )।

यदि इस खुशामद के लिफ़ाफ़े को फाड़कर संदेश के लेख को देखा होता जिसमें स्वयं परमात्मा स्वरूप आनंदघन तुम्हें लिखता है किः—

"हाय दरदिया ! दरद वंडा मेरा, करां मिन्नतां ते भरां मुट्ठियाँ में । काहनूँ नाल जुदाई जलावना है, खुत्ती कदों तेरे नालों उट्ठियाँ में ॥"

तो बाछें खिल जातीं, आनंद की अधिकता के कारण लिफ़ाफ़ा हाथ से गिर जाता ( अर्थात् खुशामद का स्वभाव छूट जाता ) । खुशामद की चिट्ठी में प्रियतम का चित्र है—

आ जाय अगर हाथ तो क्या चैन से रहिए । सीने से लगाए तेरी तस्वीर हमेशा ॥

प्रियतम का चित्र ही नहीं, बरन् स्वयं प्रियतम मानो कह रहा है—

नज़दीके-मनी मरा मबीं दूर । पहलूए-मनी मबाश महज़ूर ॥ अर्थ - तू मेरे निकट है, मुझको दूर मत देख । तू मेरे पार्श्व में है, मुझसे अलग मत हो ।

( 4 ) विद्यार्थियों ! सरकारी नौकरो ! शपथ ( सौगंद ) से कहना, कैसा प्रिय है तुमको यह मीठा नाम "छुट्टी" ! हाय स्वतंत्रता ! सारा संसार तड़पता है स्वतंत्रता के लिये—

O Liberty! Thou huntress swifter than the moon! thou terror Of the world's wolves! thou bearer of the quiver, Whose sunlike shafts pierce tempest-winged error, As light may pierce the clouds when they dissever— In the calm regions of the orient day!

The voices of thy bards and sages thunder With an earth-awakening blast Through the caverns of the past; Religion veils her eyes; oppression shrinks aghast, A winged sound of Joy, and love, and wonder, Which soars where expectation never flew, Rending the veil of space and time asunder (Shelly)

अर्थ-ऐ स्वतंत्रते ! तू चंद्रमा की अपेक्षा भी अधिक तीव्र ( लोगों का ) शिकार करनेवाली है ( अर्थात् सर्व-साधारण का मन तेरे फंदे में फँस जाता है ), और संसार के भेड़िये ( अर्थात् दूसरों को अपने अधिकार में रखनेवाले ) तुझ से बहुत डरते हैं (क्योंकि यदि प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र होगया तो

दूसरों के जीवन पर आयु व्यतीत करनेवालों को दिन काटने कठिन हो जायँगे); तू इस प्रकार का तरकश अपने पास रखती है कि जिसके सूर्य के समान तीर आँधी चला देने- वाली भूल ( अज्ञान ) को ऐसे छेद देते हैं, जैसे प्रकाश बादलों को छेद देता है, जब कि उजेले ( या पौर्वात्य देशों के भीतर ) दिन के शांत आकाश मंडल में वह ( बादल ) बिखरे होते हैं .......... ........... तेरे गायक(कवियों) और अपियों की आवाज़ें भूतकाल की तह से भूमंडल को जगा देनेवाले ( वायु के ) भक्कड़ की तरह गरजती हैं । धर्म ( मत मतान्तर ) उसकी आँखों पर पर्दा डालता है; अत्याचार डरकर भागता है; जहाँ कभी आशा दूर नहीं हुई, वहाँ हर्ष, प्रीति, और आश्चर्य की आवाज़ पत्त ( पर ) लगाकर ऐसी ऊपर उठती है, मानो देश काल के आवरण को छिन्न भिन्न कर देती है । ( शैले )

स्वतंत्रता तुम्हारी यथाक्रम अवस्था (Normal state) है । तुम पहले ही नित्य मुक्त हो । छुट्टी, त्योहार, उत्सव, मेल आदि क्यों न अच्छे प्रतीत हों ? वह लुप्त यूसुफ़ का वस्त्र सुंघाते हैं, परिच्छिन्नता की पीड़ा में फँसे हुए, अज्ञान के बिछौने पर करवट लेने वालों को ज़रा मीठी नींद सुलाते हैं, और दासता के दुख से ज़रा छुटकारा दिलाते हैं; पर अज्ञान की शय्या तो काँटों की शय्या है, जब तक उस पर लेटते हो, काँटे चुभेंगे, स्वतंत्रता का सुख नहीं मिलने का । आमोद- प्रमोद और छुट्टी एवं शादी आदे की निद्रा-जननी अफ़ीम (Narcotic) खाकर थोड़ी देर शूलों की नोकों को भुला देने की नीति ठीक नहीं ।

मल्के बूदम व फ़रदोसे-बरीं जायेम बूद । आदम आवर्द दरीं दैरे-खराब आबादम् ॥

अर्थ – मैं एक फ़रिश्ता ( देवदूत ) था, और सुंदर स्वर्ग मेरे रहने का स्थान था; लेकिन हज़रत आदम मुझको इस खराब आबाद मन्दिर ( जगत् ) में ले आया ।

क्या हँसी आती है मुझको हज़रते-इंसान पर । फ़ेले-बद तो खुद करे लानत करे शैतान पर ॥

Fill the bright goblet, spread the festive board, Summon the gay, the noble and the fair; Through the loud hall in joyous concert pour'd Let mirth and music sound the dirge of care, But ask thou not if happiness be there,— If the loud laugh disguise convulsive throe, Or if the brow the hearts true livery wear; Lift not the festal mask;—enough to know, No scene of mortal life but teems with mortal woe.

अर्थ ऐ शौंडिक (सुरा पिलानेवाले) ! इस चमकीले प्याले को भर दे और आह्लाद का आसन बिछादे; प्रसन्न बदनों, सज्जनों और सुरूपवालों को बुलादे; हर्षित करनेवाली और सुरीली रागध्वनि द्वारा दालान के गूँज जाने से ( अर्थात् राग-रंग से ) इस प्रफुल्लता और हर्ष पूर्ण ध्वनि को चिंता का करुणगीत ( रुदन ) दबाने दे (अर्थात् इस राग और रंग के प्रभाव से यदि चिंता और शोक दबने लगे तो दबने दे ), किंतु

यह कदापि मत पूछ कि वहाँ ( उस राग रंग आदि में ) आनंद वास्तव में है भी या नहीं । यद्यपि वह ज़ोर के अट्टाहास ( क़हक़हे ) ऊपर से कुछ और ही दिखलाते हैं ( और वास्तव में शोक और पीड़ा के देनेवाले हैं ), या यद्यपि यह ललाट ( सुरा पान के समय जो त्योरी चढ़ी ललाट होती है, वह ) हृदय की सच्ची चपड़ास पहने हुए है ( अर्थात् हृदय की पूर्ण दासता कर रही है, या हृदय की दशा का चित्र खींचकर दिखला रही है);तथापि तू ऐसी आमोद- प्रमोद की गोष्ठी का पर्दा मत खोल । इतना जानना काफी है कि मानवी जीवन का कोई दृश्य ऐसा नहीं जो असाध्य दुःख और शोक से परिपूर्ण न हो ।

शूलों और काँटों से पीछा छुड़ाना हो तो अज्ञान-शय्या ( अविद्या ) को त्याग दो, स्वतंत्रता और आनंद को अपना ही स्वरूप पाओगे, और आनंद तक गति लाभ करने के लिये opiates ( निद्राजननी वस्तु, कंचन, कामिनी आदि ) की सहायता के दीन न रहोगे ।

पंजा दर पंजए-खुदा दारम । मन चिः परवाय-मुस्तफ़ा दारम ?

अर्थ – मैं अपना हाथ खुदा के साथ मिलाए हुए हूँ । मुझे रसूल ( मुस्तफ़ा ) की क्या परवाह है ?

नित फ़रहत है, नित राहत है, खुश साक़ी है आज़ादी है । खुश खंदा है रंगीं गुल का, खुश शादी शाद मुरादी है ॥ जब उमड़ा दरिया उल्फ़त का,

हर चार तरफ़ आबादी है । हर रात नई इक शादी है, हर रोज़ मुबारकवादी है ॥

मेरी जान ! "दाम के नीचे फड़कने का तमाशा" बहुत देख लिया, अब आज़ादी (जीवनमुक्ति) के "लाखों मज़े" चक्खो और अपनी जिह्वा से यह गीत गाना छोड़ दो कि:—

यों तो ऐ सय्याद ! आज़ादी में हैं लाखों मज़े । पर दाम के नीचे फड़कने का तमाशा और है ॥

बहुत ज़ख्मी हुए, अब छोड़ दो यह दिल्लगी । छोड़ो, छोड़ो । रेशम के कीड़े की तरह आप ही कोया (कोष, Cocoon) बनाकर उसमें मत फँसो । अविद्या को दाया (परिचारिका वा पालका) बनाकर उसकी गोद में मत बैठो । यह पूतना राक्षसी है । इसके विषवाले दूध को क्यों तरसते हो ? तुम्हारी सुखशय्या तो क्षीर-समुद्र (the ocean of knowledge) है, जहाँ विष और काँटोंवाला शेषनाग भी नरम-नरम बिस्तर का काम देता है और चँवर झुलाता है, जहाँ संसार भर को मोह लेनेवाली लक्ष्मी तुम्हारे चरण दबाती है ।

(5)व्याख्यानदाता और उपदेशक लोगों के अनुशासनों और उपदेशों भरे व्याख्यानों को नित सुनते रहने पर भी (instinctively) शुद्ध मन वा चित्त से कोई भी मनुष्य "अपने जैसे" को देखने की सहनशीलता नहीं रखता । प्रत्येक व्यक्ति ग़य्यूर (ईर्ष्या करने वाला) है, रकीब (प्रतिद्वंद्वी) और "साथी" का नाम नहीं सह सकता । रेल पर सवार होते समय देख लो, जो व्यक्ति जिस कमरे में बैठ गया, मन से यही चाहेगा कि "और कोई न आए, मैं ही मैं रहूँ, " और की

गुंजायश नहीं है । ईश्वर (personal god) भी यदि किसी विषय में रकीब ( प्रति द्वंद्वी ) हो तो सहन नहीं हो सकता । विचार करो—

ब वक्ते-अलविदा उस महलक्षा को । न सौंपा बदगुमानी से खुदा को ॥

वह दिन खुदा करे कि खुदा भी यहाँ न हो । मैं हूँ, सनम हो, और कोई दरमियाँ न हो ॥

छोड़ा न रश्क ने कि तेरे घर का नाम लूँ । हर इक से पूछता हूँ कि जाऊँ किधर को मैं ॥

ऐ मूसा (मनुष्य) ! तेरे तेजस्वरूप से उदात्त स्वर से यह आवाज़ आ रही है कि हाँ ! हाथ बढ़ा और शिवोऽहं रूपी सर्प (मारे-अनलहक़) को पकड़ ले । डर मत ! यह डरावना साँप (शेष) विषैला नहीं है, अमृतवाला है; तेरे छूते ही काट खाले के स्थान पर सीधी (तत्व की) लाठी "।" हो जायगा । यह वह लाठी है जिसे शुष्क पत्थरों पर मार तेरे लिये मधुर जल फ़िरेगा; आकाश की ओर उठा ! मन्ना (Manna देवदूतों का भोजन) बरसेगा ; संसार-सागर से छुआ ! फट जायगा तेरे पार होने के लिये ।

आ ! अपने असल (वास्तविक स्वरूप) की ओर आ । तेरा अज्ञान ही शैतान है । इस अज्ञान के कारण तू शरीर को अपना गौरव देना चाहता है । तवे से सूर्य का काम लेने की करता है (अर्थात् 'शरीर' को अद्वितीय और अप्रति-द्वंद्वी करने पर तुला है ) ।

ता चंद तो पस रवी ब पेश आ । दर कुफ्र मरौ व सूए केश आ ॥

दर नेशे तो नोशबीं ब पेश आ । आख़िर तो ब असल ! असले-खेश आ ॥ 1 ॥

उमरेस्त कासीरे—गुर्बती तो । पा बस्तए–दामे-मेहनती तो ॥ चूँ-गौहरे-कान दौलती तो । आख़िर तो ब असल ! असले-ख्वेश आ ॥ 2 ॥

बिशकन हला बंदे-कालबुद रा । आज़ाद कुन अज़ ज़माना खुद रा ॥ रौ तर्क बगोय नेको-बद रा । आख़िर तो ब असल ! असले-ख्वेश आ ॥ 3 ॥

हर चंद तिलस्मेई जहानी । दर बातिने-ख्वेशतन तो कानी ॥ बिकुशाय दो दीदाए-निहानी । आख़िर तो ब असल ! असले-ख्वेश आ ॥ 4 ॥

लाली बमियाने-संग खारा । ता चंद शलत दिही तो मारा ॥ दर चश्मे-तो ज़ाहिरस्त यारा । आख़िर तो ब असल ! असले-ख्वेश आ ॥ 5 ॥

हक्का कि ज़े परतवे-हक़्क़ी तो । वज़ जौहरे-फ़क़्रे मुतलक़्क़ी तो ॥ वज़ बादए-रूह रावक़ी तो । आख़िर तो ब असल ! असले-ख्वेश आ ॥ 6 ॥

दुनिया जूएस्त जूद बिगुज़र । ज़ आँसूए जहाने-ताज़ा बिनगर ॥

हीं ! अहदे-क़दीम याद-आवर । आख़िर तो ब असल ! असले-ख्वेश आ ॥ 7 ॥

हरचंद ब सूरत अज़ ज़िमीनी । बसरिश्तए-गौहरे-यक़ीनी ॥ बर मख़ज़ने-नूरे-हक़ अमीनी । आख़िर तो ब असल ! असले-ख्वेश आ ॥ 8 ॥

चूँ ज़ादए-परतवे-जलाली । वज़ तालए साद नेक फ़ाली ॥ अज़ बहरे-अदम तो चंदनाली ? आख़िर तो ब असल ! असले ख्वेश आ ॥ 6 ॥

खुद रा चो बेखुदी ब बस्ती । मी दाँ कि तो अज़ खुदी बरस्ती ॥ वज़ बंदे-हज़ार दाम जस्ती । आख़िर तो ब असल ! असले ख्वेश आ ॥ 10 ॥

अर्थ-(1) तू पिछे कब तक जायगा,आगे बढ़ (अर्थात् अव- नति को तू कब तक करेगा, उन्नति कर) । नास्तिकता (कुफ्र) की ओर मत जा, अपने स्वरूप की ओर आ (अर्थात् नास्तिक मत बन, केवल अपने स्वरूप को पहचान) । डंक में तू शहद देख और आगे बढ़ । प्रयोजन यह कि ऐ शुद्ध स्वरूप ! तू अपने स्वरूप की ओर आ, और इस ज्ञान के कठिन मार्ग पर चलते समय तुझे जब कठिन कष्ट और दुःख सामने आवें, तो उन में तू सुख समझ, क्योंकि इस मार्ग में यह दुःख और कष्ट नित्यानंद दिलाने वाले होते हैं, और इन चोटों और दुःखों से किसी प्रकार साहस हीन मत हो, बरन् आगे

बढ़ता चल, और जब तक तू अपने सत्य स्वरूप को भली भांति न जान ले, कदापि मत ठहर ।

(2) एक आयु बीत गई, तू नानत्व (ग़ैरियत) का दास बना रहा और कष्टों के जाल में फँसा रहा । जब तू कुबेर भण्डार का मोती है (अर्थात् अद्वय कोष या रत्न है), तो फिर अंततः तू अपने स्वरूप की ओर आ (अर्थात् अपनी यथार्थ सत्यता का अनुभव कर) ।

(3) होशियार हो, शरीर के बन्धन को तोड़ और अपने आप को देशकाल से स्वतंत्र कर । जा, बुराई और भलाई दोनों को छोड़ दे, और अन्त को अपने स्वरूप की ओर, ऐ सत्यस्वरूप ! तू आ ।

(4) यद्यपि तू इस जगत् में एक अद्भुत पदार्थ है और अपने भीतर में तू जगत् की खानि है, तो भी तू दोनों भीतरी आंखें खोल और ऐ सत्यस्वरूप ! तू अपने स्वरूप की ओर आ ।

(5) नीले पत्थर (खनिज) में तू लाल है, मगर हम को कव तक तू धोका देता रहेगा ? तेरे दिव्य नेत्र में तो बल (शक्ति) प्रत्यक्ष है,इस लिये ऐ सत्यस्वरूप ! तू अपने वास्तविक स्वरूप की ओर मुँह मोड़ ।

(6) ईश्वर की सौगंध कि तू परमार्थ की प्रभा है और पूर्ण त्याग का एक जौहर (रत्न) है, और अद्वय आनन्द की निष्कुष्ट मद्य तू है, फिर ऐ सत्य स्वरूप ! तू अपने शुद्ध स्वरूप की ओर आ ।

(7) संसार एक नदी है, इसे जल्द पार कर, और उस पार से नूतन जगत् को देख, अर्थात् मृत्युलोक को छोड़ और

सत्यलोक की ओर मुखकर । खबरदार (सुबोध) हो और अपनी प्रतिज्ञा स्मरण कर (वह प्रतिज्ञा जो सृष्टि क आदि काल में तुझसे हुई थी, या जो प्रतिज्ञा तू ने माता के उदर में ईश्वर के साथ की थी, उसको स्मरण कर), और अंत को ऐ सत्स्वरूप ! तू अपने वास्तविक स्वरूप की ओर आ ।

(8) यद्यपि देखने में तू मिट्टी का पुतला (भू मंडल वासी) है,किंतु वास्तव में (वास्तविक रूप से) तू निश्चय पूर्वक मोती है, और सच्चे प्रकाश के स्रोत पर तू अमीन (धरोहर रखने वाला) है, इस लिये, ऐ सत्स्वरूप ! तू अंततः अपने वास्त- विक स्वरूप की ओर आ ।

(9) जब तू दिव्य तेज से उत्पन्न है,और शुभ नक्षत्र में उत्पन्न होने के कारण शुभ शकुन वाला है, तो नाश (अदम) के लिये तू फिर कब तक रोता रहेगा । ऐ सत्स्वरूप ! अंततः तू अपनी वास्तविक सत्ता को पहचान ।

(10) जब अपने आपको तू ने निरहंकारता से बाँध लिया, तब तू समझ ले अहं मम-भाव तुझसे छूट गया और सहस्रों पाशों के बंधनों से तू कूद गया, इस लिये ऐ सत्स्वरूप ! तू अपने वास्तविक स्वरूप की ओर आ (अर्थात् आत्मानुभव कर)।

—o—

(6) एक भोला विद्यार्थी स्कूल जाने से जी चुराता था । एक दिन उसके जी में आया कि चाहे कुछ ही हो, आज स्कूल नहीं जायँगे, घुटने पर पट्टी बांध ली और बहाना किया कि बड़ी भारी चोट आई है, चला नहीं जाता । हेड- मास्टर के नाम अर्ज़ी लिखी कि "श्रीमन् ! आज मुझ अनुचर को क्षमा कीजिएगा, चोट लग जाने के कारण चल नहीं सकता, स्कूल किस प्रकार आऊँ ?" अस्तु । अर्ज़ी तो लिखी गई,

अब उसे मास्टर साहब तक पहुँचावे कौन ? स्वयं ही स्कूल जाकर विद्यार्थी ने अर्ज़ी मास्टर साहब के हाथ में दी और कहा—"आज स्कूल तक पहुँचना दुस्तर है ।" यह सुनकर सब विद्यार्थी और मास्टर साहब खिलखिला कर हँस पड़े कि ऐ भोले ! तेरा यह अर्ज़ी यहां तक लाना ही तेरी बात का खंडन करता है । तुम स्कूल तक तो पहले ही पहुँचे हुए हो, "आना कठिन है" के क्या अर्थ ?

प्यारे ! चेतनघन तेरा स्वरूप है । यदि वाणी से तू स्वीकार भी करले, तो भी तू ज्ञान स्वरूप है । यदि वाणी से न, माने तो न मानने का कार्य ही तेरा ज्ञानस्वरूप होना सिद्ध करता है । यह कहना कि "राम ने जो कुछ लिखा है, मिथ्या है, मेरी समझ ठीक है" । (हर कसे रा अक़्ले-खुद बकमाल नुमायद= अर्थात्-प्रत्येक व्यक्ति को अपनी बुद्धि पूर्ण प्रतीत होती है) स्पष्ट सिद्ध कर देगा कि तेरे स्वरूप में ज्ञान की न्यूनता का ख़याल कदापि नहीं ठहर सकता । चेतनघन तू है—

बहर रंगे कि ख्वाही जामा मी पोश । मन आँ क़दे-मौज़ूँ मी शिनासम ॥

अर्थ—जिस रंग का तू चाहे वस्त्र पहन, किंतु मैं तो तेरा वही असली स्वरूप पहचानता हूँ ।

अपनी जिह्वा से तो सब समय यही पुकारते हो कि "मैं अमर हूँ, शुद्ध हूँ,नित्य मुक्त हूँ", और वाणी से अपने आपको "दास, सेवक, बंदा" बनाते हो, शरीर की भावना में गिराते हो । यह जुलाहगिरी का धंधा कि "नीम तन दर गोर दारम, नीम तन दर ज़िंदगी=आधा शरीर समाधि में और आधा

जीवन में" छोड़ो—"बखुदा ! कि खुदायेद"=खुदा की क़सम कि तुम खुदा हो ।

संसार भर के विज्ञान, तत्त्वज्ञान, काव्य और गणित तेरे आत्मा से निकले हैं और निकलते रहेंगे—

I am owner of the sphere, Of the seven stars and the solar year, Of Caesar's hand, and Plato's brain Of Lord Christ's heart and shakespear's strain

अर्थ—मैं भूमंडल, सातों नक्षत्रों का और द्यौलोक का स्वामी हूँ, ऐसेही कैसर का हाथ, अफ़लातून का मस्तिष्क, भगवान् ईसा का मन, शेक्सपीयर की तुकबंदी,इन सब का मैं ही स्वामी हूँ (अर्थात् सब नाम रूप मेरे ही आश्रय हैं) ।

संसार में प्रथा है कि जब किसी गणितशास्त्री से कठिन गुत्थी (प्रहेलिका Conundrum) हल हो जाती है, या कवि से फड़कती हुई कविता लिखी जाती है, तो घमंड से कहा करते हैं कि यह (विषय) सिद्धान्त में (अमुक नामवाले, अमुक स्थानवासी) ने सिद्ध किया, ये पद्य मैं (उपनाम अमुक, शिष्य अमुक) ने लिखे, किंतु प्रश्न यह है कि कोई गणितशास्त्रज्ञ या कोई कवि यह बतला दे कि गुत्थी के हल होते समय या प्रबंध के बनते समय उसकी वृत्ति निरोध नहीं थी, उसका चित्त एकाग्र न था, और नाम रूपात्मक भावना तिरोहित न थी ? भोजन करना भूल जाना, घर की उलझनों से बेखबर होना, सेना सामने से निकल गई है पता न होना, नगर में विप्लव मचा है उससे अनजान होना, नंगी तलवार हाथ में लिए घातक सामने खड़ा है उसे न देखना, ऐसी-

ऐसी कई कथाएँ उन तत्त्ववेत्ताओं के संबंध में प्रसिद्ध हैं जो नाना रचनाओं और शास्त्रों के धनी (कर्त्ता) माने गए हैं । थोड़ा विचार करने से ज्ञात होगा कि उच्च विचार और गंभीर चिंता किसी व्यक्ति में उस समय प्रकट होते हैं जब उसमें अहंकार और घमंड दूर हुए होते हैं ।

"मैं ने यह विषय (सिद्धान्त) सिद्ध किया ।"

किसने किया ? क्या अमुक महाशय, अमुक स्थानवासी ने किया ? कदापि नहीं । जब विषय सिद्ध हुआ, तब यद्यपि लोगों को आपका शरीर दृष्टिगोचर हो रहा था, किंतु आपके यहाँ तो ऐसी एकाग्रता थी कि शरीर और नाम का ख़याल बिलकुल लुप्त था । अहंकार (little self) की अनुपस्थिति में ज्ञान का (प्रकाश प्रादुर्भाव) हुआ । अतः सो अविद्या रूप देहाहंकार (अर्थात् अमुक में, अमुक पुत्र आदि) तुम सिद्धान्त के ज्ञात होने पर या प्रबंध के आगमन पर घमंड किस बात का करते हो ? "किस बिरते पर तत्ता पानी"? सिद्धान्त और प्रबंध तो ज्ञानस्वरूप अद्वैतसत्ता (राम) से निकलते हैं । यह अद्वैत सत्ता,जहाँ से समस्त संसार का ज्ञान सूर्य की किरणों की तरह अवतीर्ण होता है, तुम्हारा असली स्वरूप है । यही तुम हो, परिच्छिन्न बुद्धि और शरीर आदि नहीं हो । न्यूटन के मस्तिष्क में तुम्हारा ही प्रकाश था, भगवद्गीता तुम्हारी ही एक pencil of light (रश्मि-समुदाय) है, कुरान और इंजील तुम्हारे ही स्वरूप सागर की तरंगें हैं ।

अणोरणीयानहमेव तद्वत् महानहं विश्वमहं विचित्रम् । पुरातनोऽहं पुरुषोऽहमीशो हिरण्यमयोऽहं शिवरूपमस्मि ॥ अपाणिपादोऽहमचिंत्यशक्तिः पश्यामयचक्षुः स श्रृणोम्यकर्णः । अहंविजानामि विविक्तरूपो न चास्ति वेत्ता मम चित्सदाऽहं ॥

वेदैरनेकैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥ 25 न पुण्यपापे मम नास्ति नाशो न जन्म देहेंद्रिय बुद्धिरस्ति । न भूमिरापो न च वह्निरस्ति न चानिलो मेऽस्ति न चांबरं च ॥ (कैवल्योपनिषद मं॰ 23, 24, 25, 26)

मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । हेतुनानेन कौंतेय जगद्धिपरिवर्तते ॥ (गी॰ 6।10)

अर्थ-मैं सूक्ष्म से भी सूक्ष्म हूं और ऐसे ही बड़े से भी बड़ा हूँ । यह नाम रूप विचित्र विश्व में हूँ । मैं सब से पुरातन पुरुष हूँ, और बलवान् प्रकाशस्वरूप (वा आनंदमय) और कल्याण स्वरूप ईश्वर हूँ । मैं हाथ-पाँव से रहित हूँ, और मेरी शक्ति अचिंत्य है । मैं बिना आँख के देखता हूँ और बिना कान के सुनता हूँ । मैं नानारूप (अर्थात् विविध नाम रूप) पदार्थों से भिन्न अपने आप को विशेषतः जानता हूँ, और अन्य मेरा जाननेवाला कोई नहीं है । मैं सदैव चेतनस्वरूप हूँ । सब वेदों से मैं ही जानने योग्य हूँ, और वेदांतशास्त्र का बनाने वाला और वेदों का जाननेवाला मैं ही हूँ । मुझको पुण्य और पाप कोई नहीं है, और न मेरा नाश, जन्म, देह, इंद्रिय और बुद्धि है, और न भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश ही मेरा है । (कैवल्योपनिषद्)

मुझ साक्षी की सहायता से यह प्रकृति समस्त संसार को उत्पन्न करती है । इस प्रकार यह संसार चल रहा है । अर्थात् संसार के समस्त काम मुझ जगत् के अध्यक्ष के सहारे हो रहे हैं । (श्री मद्भगवद्गीता)

जिज्ञासु—यदि सब एक ही हो तो लोगों में बुद्ध और शरीर का अंतर क्यों हो ? कोई लार्ड कर्ज़न है, कोई खिल-

कुल उजड़ू है, कोई मख़मल के गद्दों पर भी नख़रे से पैर रखता है, किसी को नागरिक लोक अपनी दुकान के सम्मुख भूमि पर भी नहीं बैठने देते, कोई संसार का भीमसेन है, और कोई जन्मरोगी होकर बिछौने से भी नहीं उठ सकता । विचित्र अनर्थ हो रहा है ! कैसा अंधेर मचा है ! अत्याचार है ! अन्याय है !

ज्ञानी—प्यारे ! अंधेर करते हो तुम जो यह अंतर देखते हो । ऐसी अव्यवस्थित छोटाई-बड़ाई सत्य स्वरूप परमात्मा से यदि कभी भी सचमुच पैदा हुई होती, तो अनर्थ था, उपद्रव था; किंतु सत्य तो यह है कि छोटाई-बड़ाई है ही नहीं । जो इधर रंक दृष्टिगोचर होता है, वही उधर राजा है; जिसे यहां रोगी देखते हो, वही वहाँ पहलवान (Sandowe) है; जो यहाँ मूढ़ समझा जाता है, वही उस जगह वेदव्यास है । इस कारण कि सब का वास्तविक स्वरूप एक ही है, इस लिये अनर्थ और अत्याचार कैसा ?

हस्ती च्यूँटी तृण ले आदिंग । एक अखंडित बसै अनादिंग ॥ मैं ही जो यहां भूखा हूँ, वहाँ कश्मीर के मेवे खा रहा हूँ । यहां मूढ़ हूँ, वहां याज्ञवल्क्य हूँ ।

इति तत्त्वमसि प्रभृति श्रुतिभिः । प्रतिपादितममात्मनि तत्त्वमसि ॥ त्वमुपाधिविवर्जित सर्व समम् । किमुरोदिषि मानसि सर्व समम् ॥ 1 ॥ न हि बध विवध समागमनम् । नहि योग वियोग समागमनम् ॥ नहि तर्क वितर्क समागमनम् । किमुरोदिषि मानसि सर्व समम् ॥ 2 ॥

सुख-दुःख-विवर्जित सर्व समम् । इह शोक-विशोक-विहीन परम् ॥ गुरु शिष्य विवर्जित तत्त्व परम् । किमुरोदिषि मानसि सर्व समम् ॥ 3 ॥

नहि मोक्षपदं नहि बंधपदम् । नहि पुण्यपदं नहिं पापपदम् ॥ नहि पूर्ण पदं नहि रिक्त पदम् । किमुरोदिषि मानसि सर्व समम् ॥ 4 ॥

बहुधा श्रुत्यः प्रवदंति यतो । विपदादिरिदं मृगतोय समम् ॥ यदि चैकनिरंतर सर्व समम् । किमुरोदिषि मानसि सर्व समम् ॥ 5 ॥

(अवधूतगीता अध्याय 5)

अर्थ-(1) "तू वही ब्रह्म है," ऐसा श्रुति-वाक्यों से आत्मा को वर्णन किया गया है । अतः आत्मा की दृष्टि से तू वही शुद्ध स्वरूप है और उपाधि के दूर करने से तू सब में सम है । जब तू सर्वत्र सम रूप (सर्व व्यापक) है, तो ऐ प्यारे ! फिर तू किस लिये रोता है ?

(2) तुझ में बंध और मोक्ष का प्रवेश नहीं,योग और वियोग का प्रवेश नहीं, ऐसे ही तर्क-वितर्क का भी प्रवेश नहीं, तो फिर प्यारे ! तू किस लिये रोता है ?

(3) यह तत्त्व सर्वत्र सम है, सुख-दुःख से रहित है,शोक- विशोक से परे है, गुरु-शिष्य के विचार से भी वह परमतत्त्व दूर है, ऐसा होते हुप भी फिर तू क्यों रोता है ?

(4) उस सत्यस्वरूप में न बंध का पद है और न मोक्ष का,

न पुण्य है और न पाप है, न पूर्ण है और न रिक्त (खाली) है, ऐसी दशा को जानते हुए फिर तू क्यों रोता है ?

(5) अनेक श्रुतियों ने यह बात कही है कि आकाश आदि ये सब नाम रूप मृगतृष्णा के समान हैं । और जब वह सब स्थान पर एक और समान है, तो फिर भला तू किस लिये (और क्यों) रोता है ? (अवधूतगीता)

आदम न बूदो मन बुदम, हव्वा न बूदो मन बुदम । आलम न बूदो मन बुदम, मन आशिक़े-देरीनाअम ॥ 1 ॥

बा नूह दर कश्ती बुदम, वा यूनस अंदर क़अ्रे-चाह । अंदर दमे-ईसा बुदम, मन आशिक़े-देरीनाअम ॥ 2 ॥

आदम फ़रऊने-लई, दर आबे-दरिया शक़्क़ शुद । दर हर्फ़े-मूसा मन बुदम, मन आशिक़े-देरीनाअम ॥ 3 ॥

आँजा कि अहमद बर गुज़श्त, अज़ चारो पंजो हफ्तो हश्त । बर हश्तमीनश मन बुदम, मन आशिक़े-देरीना अम ॥ 4 ॥

ऐ आफ़ताब ! ऐ आफ़ताब ! गरमी मकुन,गरमी मकुन । खुद यक ज़ुबाँ ख़ामोश कुन, मन आशिक़े-देरीनाअम ॥ 5 ॥

शाहे-हक़ीक़त बूदा अम, दरियाये-हिकमत बूदाअम । मौला कि बाशद पेश-मन ? मन आशिक़े-देरीना अम ॥ 6 ॥

अर्थ-(1) ऐ मुसलमानो ! जिस समय हज़रत आदम नहीं थे, उस समय मैं था । जब हव्वा भी नहीं थीं, उस समय भी मैं विद्यमान था (अर्थात् संसार के अस्तित्व के पहले भी मैं था) । मैं तो सब से पुराना आशिक़ (प्रेमी) हूँ ।

(2) किश्ती (नौका) में हज़रत नूह के साथ जो रत्तक बैठा हुआ था, वह मैं ही था । कुएँ की तह में हज़रत यूनिस के साथ (उनकी रत्ता करनेवाला) मैं था, और हज़रत ईसा के

प्राणप्रद श्वास में भी मैं ही विद्यमान था। मैं तो सब से पुराना आशिक़ हूं। ॐ

(3) जिस समय हज़रत मूसा की लड़ाई में दुरात्मा फ़रऊन नदी में डूब गया, उस समय भी मैं था। मैं तो ऐ प्यारों! सब से पहले का पुराना आशिक़ हूँ।

(4) जिस स्थान पर कि हज़रत अहमद चौथे, पाँचवें, सातवें और आठवें आकाश से गुज़रे, उस आठवें आकाश पर भी मैं ही मौजूद था। मैं तो ऐ लोगो! सब से पुराना आशिक़ हूँ।

(5) ऐ सूर्य! ऐ सूर्य! बहुत तेजी (गरमी) मत कर, गरमी मत कर। चुपके हो जा। मैं तेरे से भी पहले का आशिक़ हूँ।

(6) सच्चाई का मैं बादशाह हूँ (अर्थात् सच्चा बादशाह मैं हूँ), और बुद्धिमत्ता का मैं नद हूँ (अर्थात् अनंत ज्ञान में हूं), मौला मेरे आगे क्या सामर्थ्य रखता है। मैं तो सब से पहले का (पुराना) आशिक़ हूँ

जिज्ञासु—मैं तो परिच्छिन्न शक्तिवाला हूं; ईश्वर सर्वशक्तिमान है। मेरी गति तो धरती के छोटे खंड तक है; ईश्वर सर्वव्यापक है। मुझ बंदे (जीव) को उस सर्वेश्वर के साथ क्या निसबत (तुलना)?

चे निसबत ख़ाक रा बा आलमे-पाक।

अर्थ – शुद्ध (पवित्र) लोक को भला धूलि (अर्थात् पृथिवी लोक) से क्या तुलना? अर्थात् शुद्ध स्वरूप की परिच्छिन्त जीव से क्या तुलना?

ज्ञानी—तू परिच्छिन्न शक्तिवाला भला क्योंकर है?

अनंतः कुछ तो करने की शक्ति तुझ में है? जो कुछ तू करता है, वही बता। उससे हम अनुमान कर लेंगे कि तेरी शक्ति परि- च्छिन्न है या अपरिच्छिन्न।

जिज्ञासु—मैं सबेरे प्रातःकाल उठता हूं। आवश्यक- ताओं से निवृत्त होकर व्यायाम करता हूं। इसके बाद कुछ लिखता हूं, कुछ पढ़ता हूं। भोजन करके दफ्तर जाता हूं। वहां से आकर दूध पीकर सैर को जाता हूं, या मित्रों से मिलता हूं। कोई समाचारपत्र आया हो, तो उसे देखता हूं। इस तरह दिन कट जाता है। रात को सो रहता हूं।

ज्ञानी—कुछ और भी तो अवश्य करते हो?

जिज्ञासु—यही साधारण कार्य करता हूं। कोई निज का काम हो, तो उसे भी भुगता लेता हूं। कुछ दिन से रिसाला अलिफ़ ( ! ) की प्रतीक्षा कर रहा था। इसके अतिरिक्त अपने स्मरण में तो मैं और कुछ नहीं करता।

ज्ञानी—बदलते क्यों हो? इसके अतिरिक्त अगणित काम नित्य करते रहते हो। उनका नाम ही नहीं लेते, ऐसे भोले बन बैठे हैं कहीं के! "यारां नाल पंज" ठीक नहीं।

जिज्ञासु—"अगणित काम"! कदापि नहीं। आप ऐसे महात्मा होकर यह क्या कह रहे हैं?

ज्ञानी—सुनिएगा। यह शरीर तो आप ही का है न?

जिज्ञासु—हाँ, क्यों नहीं? और किसका है?

ज्ञानी—प्रातः इस शरीर से भोजन आप ही ने पाया था न? और श्वास आप ही ले रहे हो, देख भी आप ही रहे हो, संध्या को खेत में जाकर कल का खाया हुआ त्यागोगे भी आप, और सोते भी आप हो, सच है न?

जिज्ञासु—ठीक है। बिलकुल ठीक है।

ज्ञानी—आमाशय के द्वारा भोजन कौन पचाता है?

जिज्ञासु—मैं।

ज्ञानी—और भूल न जाओ कि अपने शरीर की नाड़ियों में खून भी तुम ही चलाते हो। मुख में थूकें भी तुम ही बनाते हो। वृक्क (गुरदा) में मूत्र उत्पन्न करनेवाले भी तुम हो। बालों को बढ़ानेवाले भी तुम हो। फेफड़े में श्वास तुम्हारा है। तुम्हारे लीवर (liver, यकृत) में बाइल (bile, पित्त) बाहर से कोई भूत आकर नहीं डाल जाता। जब तुम आँख से देखते हो, तो तत्क्षण कई स्नायुओं (nerves पट्टों) का हिलना आवश्यक है, उनको भी तुम ही हिलाते हो। cerebrum (सेरिब्रम, मस्तिष्क) को गति अर्थात् बुद्धि को प्रकाश तुम ही देते हो। इसके अतिरिक्त स्वाभाविक क्रियाओं के तुम ही कारण हो। तुम क्योंकर कुछ कामों का नाम लेकर हठ कर बैठे थे कि "इनके सिवा मुझसे और कुछ भी नहीं होता"? स्वप्नावस्था की दशा में जब मन और बुद्धि आदिक (तुम्हारे शस्त्रास्त्र) व्यवहृत नहीं होते, तुम्हारा काम बंद नहीं होता। उस समय भी भोजन पचाय जाते हो, बालों, नखों को बढ़ाए जाते हो। तुम्हें नींद कहाँ? सदा जागते हो। "कहाँ ख्वाबे-ग़फ़लत सदा जागता हूँ।"

जब तुम्हारा यह शरीर नन्हा सा था, उस समय बुद्धि और विवेक से यद्यपि काम नहीं लेते थे, किंतु तुम वही थे जो इस समय हो। स्वप्न में भी तुम वही होते हो जो जाग्रत् में हो। जिस प्रकार तुम एक शरीर में बुद्धि की कारस्तानियाँ, रक्त का संचालन, और वृद्धिकरण कराते हो, वैसे ही अन्य शरीरों में भी तुम ही सब कारीगरियाँ कर रहे हो। पत्ते पत्ते में तुम्हारा प्रकाश है। तुम किस प्रकार कहते थे कि तुम्हारी शक्ति परिच्छिन्न है?

विज्ञानात्मा सहदेवैश्च सर्वैः प्राणाभूतानि संप्रतिष्ठंति यत्र। तद्क्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशति॥ (प्रश्नोपनिषद् प्र० 4 मं० 11)

अर्थ – तात्पर्य – "ऐ सौम्य! जिसने इस ज्ञानस्वरूप, अक्षय स्वरूप को पहचाना कि जो समस्त इंद्रियों की, जीवन की और परमाणुओं की चट्टान है, वह सब कुछ जान गया, वह सब में धँस गया।" The onething needful (एक आवश्यक वस्तु) यही है –

इक्को अलिफ़ तेरे दरकार। बहुता इल्म अज़ाज़ील पढ़िया, भुग्गा आंभा उसदा सड़िया। उम्मीं जा अरशां ते चढ़िया, पूरां दे पूर लँघाए सो पार॥ इल्मो बस करीं ओ यार। इक्को अलिफ़ तेरे दरकार॥

अब अपने जीव (परिच्छिन्न) कहलाने का कारण सुनोः–

एक राजा जी के पुत्र को (साधारण बालकों के अनुसार) एक छोटी सी चितरीली थाली के साथ प्रीति होगई। जब

उसके लिये खाने को कोई वस्तु लाई जाती, तो बड़े हठ और आग्रह के साथ कहता कि "मेरी थाली में लाओ, तब खाऊंगा" यदि किसी बड़े थाल में भोजन परोस कर लाते, तो पैरों से दूर ठुकरा देता, अड़ियलपन दिखाता और चिल्लाकर डराता। अब कोई पूछे "भैया, सोने चांदी के थाल, कटोरे आदि बहु- तायत से यहां मौजूद हैं, क्या उनका स्वामी कोई और है?" मगर बच्चा किसकी सुनता है? अपना ही हठ पाले जाता है। ठीक इसी तरह से ऐ सच्चे राजकुमार (आत्य)! तुम अनंत सम्पत्ति वाले हो, मगर जो कुछ इस "छोटी सी चित- रीली थाली" अर्थात् बुद्धि (intellect) में धरा हुआ तुम्हारे सामने उपस्थित हो, उसे स्वीकार करते हो, उसे अपना समझते हो, शेष सब संपत्ति (स्वत्व) को जवाब देते हो, लात मारते हो। यदि बताया जाय कि यह सब अगणित और अपरिमित जायदाद तुम्हारी ही है, अपने तई क़ैदी न बनाओ, तो उल्टा बुरा मानते हो।

जो कुछ तुम्हारी बुद्धि और इंद्रियों द्वारा स्पष्ट* होता है, केवल उसे ही स्वीकार करना और शेष सब कर्तूतों से इन- कार करना (अर्थात् केवल बुद्धि और इंद्रियों के साथ ही

*कर्म और चेष्टाएँ दो प्रकार की हुआ करती हैं—एक स्वाभाविक दूसरे संकल्पित। स्वाभाविक (अविज्ञात) तो वह हैं जिनके होते समय बुद्धि को खबर न हो, जैसे रक्त संचालन श्वास-प्रश्वास, अभिवृद्धि आदि। संकल्पित (विज्ञात) वह हैं जिनके होने के लिये बुद्धि का संबंध होना आवश्यक है, जैसे भोजन, पान, गमन, संभाषण, लेखन, पठन, आदि। जब किसी से पूछा जाता है कि तूने आज क्या काम किया? तो जो कर्म संकल्प द्वारा हुए होते हैं, उनका नाम ले लेता है, बहुसंख्यक स्वाभाविक चेष्टाओं का नाम तक नहीं लेता, मानो वे उसके द्वारा होते ही नहीं हैं।

अपने को अभेद–identify–करना), यही तुमको जीव (परि- च्छिन्न) बनाता है। ज़रा विचारो तो सही, तुम्हें इस आत्म- हत्या करने का क्या अधिकार है? एक तंग मुखवाली कुप्पी में भुने हुए चने पड़े थे और यह कुप्पी भूमि में गड़ी थी। बंदर ने आकर चनों के लिये कुप्पी में हाथ डाला और मुठी भर ली। चनों की भरी हुई मुठी मोटी और भारी हो गई, और कुप्पी का मुँह तंग था, इस कारण हाथ बाहर न निकाल सका। बहुत कुछ यत्न किया, एक न चली, वहीं क़ैद हो गया। चिल्लाता था, हल्ला मचाता था, किंतु मुठी के चने नहीं छोड़ता था, हाथ नहीं खाली करता था जिससे स्वतंत्रता प्राप्त हो।

अब बताओ, ऐसे का क्या उपाय? मेरे प्राणप्रिय! तुम्हें कोई क़ैद करनेवाला नहीं, तुम्हारे लिये बंध कहाँ? तुमने तो उस हनुमान के नातेदार की तरह इंद्रिय और बुद्धि को इस वेग से (अहंकार रूपी) मुठी में लिया है कि बंदी हो गये हो, परि- च्छिन्न हो गए हो, जीव कहलाते हो। क्या ही सच कहा है इमर्सन ने कि-Every man is god playing the fool= प्रत्येक मनुष्य वास्तव में तो ईश्वर है, किंतु मूर्खताएं करता है।

मरज़ी चेतन की जभी भूख मारन की होय; मृगतृष्णा के नीर में बह चलियो बिन तोय।

खोलो मुठी। मन और बुद्धि रूप कुसंग को छोड़ो। केवल एक शरीर में, एक मस्तिष्क में, एक बुद्धि में अपने आपको बद्ध क्यों मानते हो? तुम मुठी तो खोलो, सबके "यार पक्के हो"। "छुरी मारने और तलवार मारने" पर भी तुम्हारी यारी समस्त सृष्टि से नहीं छुट सकती। मुठी खोलो, ग्रंथि दूर करो, समस्त प्रकृति को अपनी दुलहिन बनालो।

दिया अपनी खुदी को जो हमने मिटा, वह जो पर्दा सा बीच में था न रहा। रहे पर्दे में अब न वह पर्दा निशीं, कोई दूसरा उसके सिवा न रहा॥

आँ कस कि ख़ाके-मारा गिल कर्दो ख़ाना साख़्त। खुद दरमियां दरामदो-मा रा बहाना साख़्त॥

अर्थ—जिसने हमारी मिट्टी का कीचड़ बनाकर अपना घर बनाया, वह स्वयं तो बीच में पड़ा और हमारा बहाना बना दिया (तात्पर्य यह कि करने-कराने वाला सब वह है, किंतु हमको मुफ्त में उसका भागी ठहराता है)।

भिद्यते हृदय ग्रन्थि छिद्यन्ते सर्व संशयाः। क्षीयंते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥ (मुंडको० अ० 2 ख० 2 मं० 8)

अर्थ – उस परम पुरुष के देख लेने पर मनकी समस्त गुत्थियां हल हो जाती हैं, और समस्त कर्म (फल देने वाले कर्म) नाश हो जाते हैं।

ज्ञानाग्नि में अपने मन-इंद्रियों की आहुति बनाकर डाल दो, उस आत्मदेव के लिये सोतों, जागतों (द्विपाद, चतुष्पाद) का केवल एक ही शासक है।

द्वैत-भाव का रुदन विलाप करनेवाली बुद्धि का बलिदान चढ़ाओ उस अद्वैत स्वरूप के आगे, जो समस्त इंद्रियों, जीवन और शक्ति की चट्टान (पराकाष्ठा) है।

परिच्छिन्न बनानेवाली बुद्धि को लय कर दो उस हिरण्य- गर्भ में, आकाश और धरती कांपते हुए जिसकी ओर देखते हैं और जिसमें उदित हुआ सूर्य प्रकाशमान है।

ज़रा भीतर की ओर मुँह मोड़कर देखो। तुम ही हो वह जिसका तेज हिमाचल पर्वत प्रकट करते हैं, जिसकी महिमा नील नभ (या सागर) जतलाता है।

यस्य मे हिमवंतो महित्वा यस्य समुद्रं रस्या सहाहु। (ऋग्वेद मं० 10)

अर्थ – बर्फ़ से लदे हुए पर्वत् अर्थात् हिमाचल पर्वत जिसकी महत्ता को जतलाते हैं और जिसकी महिमा को समुद्र प्रकट करता है (वह महान् तू है)।

साईं लोक पुकार दे, कर कर लंबे हाथ। तू परमातम देव है, तू तिरलोकीनाथ॥

गर्चे ख़ाकी दरीं जज़ीरा-ए-ख़ाक। लेक साक़ी तर अज़ जुलाल तुई॥ बिगुज़र ज़ि ख्वेश दर खुद आ यकबार। ता बदानी कि हिवल अज़लाल तुई॥

अर्थ – यद्यपि तू इस मृण्मयी भूमि में मिट्टी का पुतला है, किंतु बूँद-बूँद से टपके हुए पानी से भी अधिक स्वच्छ तू ही है। अपने से (अहंकार से) आगे बढ़ और एक बेर अपने आप में आ (अर्थात् आत्मानुभव कर) जिससे तू जान ले कि महान (ईश्वर) तू ही है।

जिज्ञासु—बस भगवन्, बस; अब सुनाते किसको हो? सुननेवाले होश तो आपने रहने नहीं दिए।

दिल गुफ़्त मरा इल्म लुदनी हवस अस्त। तालीमे-कुन अगर तुरा दस्तसे अस्त॥ गुफ़्तम कि अलिफ़, गुफ़्त, दिगर, गुफ़्तम हेच। दर ख़ाना अगर कस अस्त, यक हर्फ़ बस अस्त॥

अर्थ—दिल ने कहा कि मुझको रिद्धि सिद्धि की विद्या की चाह है, यदि तुझको इसमें योग्यता प्राप्त हो तो मुझको शिक्षा दे। मैंने कहा कि "अलिफ़"। उसने पूछा कि और आगे भी कुछ? मैंने कहा कि कुछ नहीं। दिल के घर में अगर कोई स्थान रखने को है, तो वहां एक अक्षर (ا=आकार) काफी है।

प्रजापति के उपदेश को इंद्र बत्तीस-बत्तीस वर्ष तक विचा- रता रहता था, आपके इस "ا" (अलिफ़) रूपी उपदेश को हम पूरे बत्तीस दिन तक एकांत में प्रतिदिन विचारेंगे, फिर और सुनने को उपस्थित हो जायँगे।

(जिज्ञासु प्रेम से चरण छूता है)

ज्ञानी—नारायण! यह क्या? यह क्या? अभी से उस सारे उपदेश को भूल गए। ईश्वर के लिये हमें शरीर रूप न समझो, और न अपने आपको इस शरीर में बद्ध मानो। अच्छे जिज्ञासु हो कि आते ही हमें परिच्छिन्न बनाने लगे। प्यारे! हम तो तेरे भीतर विद्यमान हैं, तेरे शरीर में प्रकाश- मान हैं, तेरे घर में पाहुने (मेहमान) हैं, वहीं हमसे अति प्रेम के साथ आलिंगन ही नहीं बरन् एकता लाभ करो। ऐ मेरे प्राण! घर में मेहमान छोड़ कर बाजार में फिरते रहना उसका अपमान करना है।

तालिब! मकुन तौहीने-मन दर ख़ाना अत राम अस्त बीं। रूताफ़ती अज़ मन चरा? दर कल्बे-तो पैदास्तम॥

अर्थ—ऐ जिज्ञासु! मेरा अपमान मत कर। तेरे घर में राम रहता है, वहां देख। ऐ प्यारे! तू मेरे से मुख क्यों फेरता है, मैं तो तेरे दिल में हर समय विद्यमान हूँ।

अपने शरीर और नाम, बुद्धि और देखने मात्र के पदों को उठाकर देखो, उसी दम राम से मिलाप होगा।

यार असाडे ने अंगिया खुलाया। असाँ खोल तनी गल ला लिया। असाँ घुट जानी गल लाय लिया॥

आपे रसिया, आप रस, आपे रावन हार। आपे ही गल चोलड़ा प्यारे, आपे सेज पधार॥

आपे माछी मछली प्यारे, आपे पानी जाल। आपे जाल मनक्कड़ा प्यारे! आपे सब दा काल॥

चार कोट चौदह भुवन, सर्व व्यापक राम। नानक ऊन न देखिए पूरन ताके काम॥

अलिफ़ ओही है ओही सुरूप सोहना, सही सच विचार खाँ ओही है तूँ।

जिन्हूँ बेद अभेद पुकारदे नी, होया चाम चमकड़ी चूही है तूँ।

तूं ही विष्णु विरंच सुरेश होया, कहीं काक तोता कहीं कुही है तूँ।

है तू ही, है तू ही, गोपाल सिंहा, कुल तूही है, तूही है, तूही है तूँ॥

ॐ! ॐ!! ॐ!!!