श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

राम

भाग 14 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 14 · अध्याय 4 / 4

राम

(यह स्वामी राम का तीसरा लेख है जो पूर्वोक्त उर्दू मासिक पत्र "रिसाला अलिफ़" में सन् 1900 में प्रकाशित हुआ था, और जिस को लिखते २ स्वामी जी वनों में सहित परिवार पधार गये।)

धीराः प्रेत्यास्माँल्लोकादमृता भवंति। (साम० केनो० मं० 3)

अर्थ—ज्ञानवान् पुरुष इस संसार से मुख मोड़कर अमृत- पद लाभ करते हैं।

प्रेम सुराही सो पिये जो सीस दक्षिणा देत। लोभी सीस न दे सके नाम प्रेम का लेत॥

ता शाना सिफ़त सर न नही दर तेह-अरां। हरगिज़ व सरे-जुल्फे-निगारे नरसी॥1॥

ता सुमी सिफ़त सूदा न गरदी तेह-संग। हरगिज़ व सफ़ा चश्मे-निगारे नरसी॥2॥

ता हम चो दुरे सुफ़ता न गरदी बा तार। हरगिज़ व वना गोशे-निगारे नरसी॥3॥

ता गुल शुदा वबरीदा न गरदी अज़ शाख़। हरगिज़ व गुले-हुस्ने-निगारे नरसी॥4॥

ता ख़ाके तुरा कूज़ा न सज़ंद कुलालां। हरगिज़ व लबे-लाले-निगारे नरसी॥5॥

ता हम चो क़लम सर न नही दर तेह-कारद। हरगिज़ व सर अंगुश्ते-निगारे नरसी॥6॥

ता हम चो हिना सूदा न गरदी तेह-संग। हरगिज़ व कफ़े-पाए-निगारे नरसी॥7॥

अर्थ-(1) जब तक कंघी की तरह तू ओर के नीचे शिर न रक्खेगा, तब तक अपने प्यारे के केशपाश तक न पहुंच सकेगा।

(2) जब तक कि तू (अर्थात् तेरा व्यक्ति गत अहंकार) सुरमे की तरह (ज्ञान रूपी) पत्थर के नीचे घिस नहीं जायगा, तब तक तू अपने प्यारे की आँख तक भी नहीं पहुँच सकेगा।

(3) जब तक कि तू मोती की तरह तार से न छेदा जायगा, तब तक अपने प्यारे के कान तक भी नहीं पहुँच सकेगा।

(4) जब तक कि तू फूल होकर टहनी से नहीं काटा जायगा, तब तक तू अपने प्यारे की सुंदरता रूपी सुमन तक नहीं पहुँच सकेगा।

(5) जब तक कि प्रेम-मद्यविक्रेता रूपी कुम्भार लोग तेरी मिट्टी को पानपात्र न बनालें, तब तक तू अपने प्यारे के लालवत् अधरों तक भी नहीं पहुँच सकेगा।

(6) जब तक लेखनी की भाँति तू चाकू के नीचे शिर नहीं रक्खेगा, तब तक तू अपने प्यारे की अँगुलियों के सिरों तक (अर्थात् पोरों तक) नहीं पहुँच सकेगा।

(7) जब तक कि मेंहदी की तरह तू पत्थर के नीचे न पीसा जायगा, तब तक तू अपने प्यारे के पावों के तलवे तक नहीं पहुँच सकेगा।

ख़ाक दर चश्मे कि आँ न शिनाख़्त हुस्ने-ख्वेश रा। मुर्दा आँ दिल को बला गर्दां नशुद दरवेश रा॥

अर्थ—उस आँख में धूलि पड़े कि जिसने अपने सौंदर्य को नहीं पहचाना, और वह दिल मुर्दा है जो साधु (त्यागी) पर न्योछावर होने वाला न हो।

इश्क करन तलवार दी धार कप्पन। नहीं कम एह भुक्खयाँ नंगियां दा॥ एथे थाँ नहीं अड़बंगियाँ दा। एह ता कम्म है सिराँ थीं लंघियाँ दा॥

अज़ खुदी बेज़ार गश्तन दोस्त रा जुस्तन ज़ जाँ। तर्के-दरमाँ कर्दनो व दर्दे-इश्क़श साख़्तन॥ ऐ पिसर इश्क़ अस्त जानत ख्वेशतन रा इश्क़ दाँ। ई चुनीं बाशद व मानी ख्वेश रा ब शिनाख़्तन॥

अर्थ—ऐ बेटा! तेरा प्राण तो स्वयं प्रेम है, इसलिए तू अपने आप को प्रेम स्वरूप समझ। अपने (वैयक्तिक) अहंकार से विरत होना, प्यारे को मन-प्राण से ढूँढ़ना, (प्यारे के मिलने में जो दुःख मिलें उनकी) चिकित्सा का त्याग करना, और अपने प्यारे के प्रेम के साथ अनुकूलता करना, यह वे अर्थ हैं जिनसे अपना स्वरूप पहचाना जाता है (अथवा अपने आप को पहचानने के ये अर्थ हैं)।

Whosoever shall save his life shall lose it, and whosoever shall lose his life shall save it,

अर्थ—जो कोई भी अपना जीवन (प्राण) बचाएगा, वह उसे खोएगा; और जो कोई उसे खोवेगा, वह उसको बचायगा। तात्पर्य यह कि अपने प्राण को भगवान् या सर्वसाधारण की सेवा में निछावर करने से अमर जीवन प्राप्त होता है; और यदि वह स्वार्थपरता से दूसरों की सेवा में अपने जीवन का उपयोग नहीं करता, बरन समस्त आयु पेट-पालू की भाँति केवल पेट के धंधों में व्यतीत करता है, वह वस्तुतः अपने आपको हर प्रकार से नाश करता है, न इस संसार में उसे सुख और मानवी जीवन प्राप्त होता है, और न परलोक में।

प्राण दे,प्राण-प्यारे से मिल। सर त्याग,सरदार बन। सूली पर चढ़,मंसूर (विजेता) बन। अपने दीप्यवान मुखसे आवरण उठा, चंद्र और सूर्य को छिपा-

कुमरियाँ आशिक़ हैं तेरी सरो वंदा है तेरा। वुलवुल तुझ पर फ़िदा हैं, गुल तेरा दीवानाहै॥

खुदी ( अहंकार ) छोड़, खुदा ( ईश्वर ) हो।

आपत्ति—बूँद भी कभी नदी हो सकती हैं? अंश क्योंकर पूर्ण बन सकता है? हम ईश्वर कभी नहीं हो सकते।

उत्तर—प्रथम तो तुम अपने आपको और का और मान रहे हो। आत्महत्या कर रहे हो,और दूसरे ईश्वर को कुछ का कुछ जान रहे हो। उसे परिच्छिन्न बना रहे हो,कलंक लगा रहे हो। ऐसी दशा में सच्चाई आप पर कभी प्रकट नहीं हो सकती। अलबत्ता "मैं" ( त्वम् ) का लक्ष्यार्थ जानो और ईश्वर ( तत् ) के स्वरूप को पहचानो, तो अभी आनंद का वह माधुर्य प्राप्त हो कि चूँ और चरा के श्रोष्ठ मिल जायँ। "मैं अमुक डिगरी पाया हुआ, अमुक जाति, अमुक वृत्ति, अमुक स्थान,-निवासी, इत्यादि" तुम नहीं हो, इसका नाम वेदांतवालों ने 'अहंकार' रक्खा है। यह अहंकार तुम नहीं हो। यह 'अहंकार' आत्मा नहीं है, यह 'अहंकार' ईश्वर नहीं है। जब ज्ञानवान् से यह वाक्य सुनाई देता है "मैं ब्रह्म हूँ" ( मन खुदायेम ), तो न 'मैं' से उसका तात्पर्य अहंकार होता है, और न ब्रह्म से तात्पर्य गुणोंवाला परिमित ईश्वर (personal god) होता है। इस वाक्य के तत्वार्थ को न समझ कर साधारण मनुष्य इस प्रेमानंद को अपनी

नासमझी से आकस्मिक विपत्ति समझ बैठता है। अहंकार ( व्यक्तित्व ) तेरा स्वरूप नहीं है। इस अहंकार को वेदांत निकालना चाहता है। अहंकार का अभाव करवाता है।

किसी राजा के पास एक कवि कविता करके लाया, जिसका आरंभ इस प्रकार था -

"ऐ ताजे-दौलत बर सरत अज़ इब्तिदा ता इंतिहा।"

अर्थ - हे राजन्! आदमी का मुकुट तेरे शीश पर आदि से अंत तक ( सदैव ) सुशोभित रहे।

राजा साहब फ़ारसी-भाषा से अनभिज्ञ थे, किंतु नियमा- नुसार अपनी अज्ञता प्रकट करना न चाहते थे। कविता निस्संदेह बड़ी उत्तम थी। राजा साहब ने गुणग्राहकता दिखाने के लिये उस कवि को पारितोषिक पुरस्कार द्वारा धन-संपन्न कर देने की आज्ञा प्रदान की। इसपर दरबार के कवि को बड़ी ईर्षा हुई। राजा साहब के सम्मुख उस नवागत कवि से कहा कि अपनी कविता के पदों की ज़रा तक़तीय कीजिए। नवागत कवि तक़तीय करने लगा -

"ऐ ताजे-दौ" ···मुस्तफ़ालन,· "लत बर सरत" ··· मुस्तफ़ालन ··· आदि।

बेचारा कवि "लत बर सरत" कह ही रहा था कि दरबार के कवि ने उसकी जुबान रोक ली कि अरे नीच! हमारे महाराज को "लत बर सरत" ( अर्थात् "लात तेरे शिर पर" ) ऐसा अपमान का वाक्य बोल रहा है! बस चुप रह। राजा साहब भी क्रोध से भर गए, और ओंठ दांतों में काटकर बोले - "अरे! यह बात है?" वह गरीब हक्का बक्का रह गया कि लेने के देने पड़ गए, इत्यादि।

ठीक इसी तरह हे राज-राजेश्वर मनुष्य! वेद भगवान् ( कवि ) तेरी प्रशंसा के गीत यह कहकर लाया है - "अयं आत्मा ब्रह्म" = यह आत्मा ब्रह्म है, "तत् त्वमसि" = वह तू है, आदि। तू अपने अहंकार से उस पवित्र वाक्य को मत विगाड़।

"दामे-तज़वीर मकुन चूँ दिगरां कुरआँ रा" अर्थात् औरों की भाँति कुरान को छल कपट का फंदा ( जाल ) मत बना। इस कविता को रद्द करने से न वेदभगवान् का अपमान कर, और न अपने शिर पर लात खा।

उपरोक्त दृष्टांत इस प्रकार भी सुनने में आया है कि नवागत कवि तक़तीय करते समय जब बोला " ऐ ताजे-दौ. मुस्तफ़ालन", तब दरबारी कवि बड़ी तांछणता से चिल्लाया - "आगे भी तो कहो। आगे! आगे!!, नवागत कवि अपने शत्रु के दुष्ट संकल्प को समझ गया और तत्काल दरबारी कवि की ओर मुख करके ज़ोर से बोला - "लत बर सरत - मुस्तफ़ालन", जिसके अर्थ यह हैं कि " ऐ छिन्द्रान्वेषी! तुमको फटकार है।"

प्यारे! तेरे मूढ़, स्तुति करता अहंकार की वेदभगवान् निंदा करता है -

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहंकार विमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥ गीता 3.27 अर्थ - माया के गुण करत हैं, सभी करम यह जान। अहंकार आत्म विमूढ़, लेत आपन को मान॥

ज़ हक़ बेख़बर ग़ाफ़िल अज़ ख़्वेशतन। शिनासद कि हर कार आयद ज़ मन॥ गिरफ़्तारे-जह्लस्त ख़ब्तश रसासत। बर अहवाले-ओ हैफ़ ख़ुर्दन रवासत॥

अर्थ - ईश्वर से अपरिचित और आत्मविस्मृत मनुष्य यह समझता है कि जो कुछ काम होता है, वह मेरे से होता है; वह मूढ़ता में फँसा हुआ है और उस का खब्त (पागलपन) उन्नति पर है, उसकी ऐसी दशा पर शोक करना चाहिए।

"One By egoism demented, thinks oneself The doer of those acts which are performed Throughout by nature's qualities."

अर्थ - अहंकार और घमंड के प्रमाद से उन्मत्त पुरुष ( अर्थात् अज्ञानी और स्वार्थी मनुष्य ) जो काम कि उसके स्वभाव से अपने आप होते हैं वह ( अज्ञान के कारण ) उनका कर्ता अपने आप को मानता है।

अहंकार को अपने संग में मत रख, अहंकार का अभाव कर। अहंकार के कारण न स्वयं छोटा बन और न ईश्वर को परिच्छिन्न ( finite ) समझकर अपने से भिन्न बना। बड़ी भारी भूल संसार में यह फैली हुई है कि आत्मा ( अपना आप-self ) जो विचार और बुद्धि से परे है, उसको ज्ञात पदार्थों के समुदाय में लाया चाहते हैं, वह निर्गुण है, उसको गुणवाला किया चाहते हैं।

जैसे सूर्य से समस्त पशु पक्षी और मनुष्यादि प्रतिपालित होते हैं; आँख देखती है सूर्य की कृपा से, हाथ काम करते हैं सूर्य से चेतनता ( Energy ) लेकर, भूमि स्थिर है तो सूर्य के कारण, समस्त कामधंधे का क्रम सूर्य की सहायता से चलता है, लोगों के लिये अहार सूर्य की कृपा से उत्पन्न होता है, चंद्रमा की चंद्रिका बस्तुतः सूर्य ही का प्रकाश होती है,

तैल प्रकाश को सूर्य ही से प्राप्त करता है, और ईंधन ताप को सूर्य ही से पाकर आता है। संसार में भला बुरा जो होता है, सूर्य ही की करतूत होती है।

आदित्येनैव ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्यतीति।

अर्थ - "सूर्य के प्रकाश से मनुष्य बैठता है, चलता-फिरता है, काम काज करता है और घर लौट आता है।" किसी अच्छे या बुरे काम को करते समय प्रत्येक अंग और अवयव की गति का कारण सूर्य ही होता है, किंतु कभी न देखा या सुना कि किसी न्यायालय ( कचहरी ) में सूर्य को प्रति बादी स्थिर करके नालिश दायर हुई हो।

ऐ प्रकाश के स्रोत! तुमने यह क्या अंधेर मचा रक्खा है कि प्रत्येक बात के करने कराने वाले भी हो और अनुसर- दायी भी बनते हो! हे सूर्य! आप ही तो अपराधी हो और आप ही सब काम धंधों के देखने वाले साक्षी बन बैठते हो। कहां तक चकमे दोगे। आज महान मनुष्य के न्यायालय में बयान दो -

ख़ाके-पस्ती से अगर दामन तिरा हमदम नहीं। यह बड़ाई का निशाँ ऐ नय्यरे-आज़म नहीं॥ अपनी हस्ती से कभी तू अगर महरम नहीं। हमदम यक ज़र्रए ख़ाके-दरे-आदम नहीं॥ तू सदा मिन्नत पिज़ीरे सुबहो फ़रदा ही रहा। नूरे मसजूदे-मलक ज़ेबे-तमाशा ही रहा॥

सूर्य के इज़हार - (शुभ प्रतिज्ञा के साथ) ऐ शासकों के शासक मनुष्य! सब कुछ मुझसे प्रकट होता भी है और मैं किसी कार्य का कर्ता भी नहीं होता। पर आप ज़रा अपने

गिरेबान में मुँह डाल कर तो देखिए, मेरे कुल और उद्भव- स्थिति का तो पता लगाइए! मैं तो केवल आपका द्योतक हूँ, आपकी छाया हूँ। जो कुछ आप वस्तुतः हो, मैं उसका प्रतिबिम्ब हूँ। मेरी क्या मजाल कि आपके आत्मा को और का और वर्णन कर सकूँ। उल्टा मुझे अपराधी ठहराते हो। क्या खूब -

जादू वह जो सर पर चढ़के बोले।

पाठक! अब ज़रा विचार करो और देखो कि आपका आत्मा बुद्धि या अहंकार नहीं है, और न वह कभी कहता है कि "मैंने अमुक काम किया, मैंने यह बनाया, वह बनाया, कैसे-कैसे आनंद उठाए, क्या क्या न कर दिखलाया, इत्यादि"। आत्मा ऐसा ओछा नहीं कि उस पर यह पद लागू हो सके -

इतना भी चाहिए हौसला फ़व्वारा सां न तंग। चुल्लू ही भर जो पानी में गज़ भर उछल पड़े॥

आत्मा तो सूर्य के समान है। उससे भिन्न भी कुछ नहीं, और वह कर्ता भोक्ता भी नहीं। अस्तित्व के विशाल मंदिर में आत्मा से सत्ता पाकर पाँचों प्राणों ( प्राण अपान व्यान उदान समान ) से अपना-अपना काम होता है।

यः प्राणेन प्राणिति स त आत्मा सर्वान्तरः। योऽपानेनापानीति स त आत्मा सर्वान्तरः। यो व्यानेन व्यानीति स त आत्मा सर्वान्तरः। यो उदानेनोदानिति स त आत्मा सर्वान्तरः। एष त आत्मा सर्वान्तरः। ( बृहदारण्यकोपनिषद् 3—4—1 )

अर्थ - वह जो प्राणवायु के द्वारा श्वास लेता है, तेरा

आत्मा है, सब में रहने वाला; वह जो अपान वायु के साथ नीचे को जाता है, तेरा आत्मा है, सब में रहने वाला; वह जो व्यान से प्रत्येक स्थान पर पहुंचता है, तेरा आत्मा है, सब में रहने वाला; वह जो उदान से ऊपर को चढ़ता है, तेरा आत्मा है, सब में रहने वाला; यह तेरा आत्मा सब में रहने वाला है।

आत्मा के प्रकाश में सब इंद्रिय रहते-सहते हैं। मस्तिष्क रूपी हारमोनियम ( बाजा ) से बुद्धि और अहंकार रूपी स्वर आत्मा के कारण से निकलते हैं, किंतु यह आत्मदेव इस ख़याल से भिन्न और परे है कि "मैं करता हूँ"। आत्म कभी नहीं कहता कि " मैंने खून बनाया, मैंने हड्डियाँ और पट्ठे तैयार किए, मैंने बाल बढ़ाए,आदि"। सब कुछ होता भी उसी से है और वह आप करने का नाम भी नहीं लेता। करने कराने की विवेचना ( Consciousness ) से परे है आत्मा। विवेचना और बुद्धि (Consciousness) तो उसका एक खेल है। जहाँ सैकड़ों काम उसकी सत्ता से अपने आप हो रहे हैं:- जैसे श्वास-प्रश्वास, रक्त-संचलन, लाल ( थूक ) उत्पादन, अन्न-पाचन आदि। वहां मस्तिष्क का सोच-विचार भी उसी के प्रकाश के कारण देखने में आता है। बुद्धि ( intellect ) एक ( tongs ) चिमटे की तरह है, जो संसार के सब पदार्थों को पकड़ सकता है, किंतु इस चिमटे में यह सामर्थ्य नहीं कि उन अंगुलियों को पकड़ सके जिनके वश में खुद है, और जिनके वश में आकर वस्तुओं पर अधिकार पाता है। दूसरे शब्दों में,बुद्धि ( Consciousness-विवेचना ) अनुभव में आनेवाली वस्तुओं पर यद्यपि अधिकार प्राप्त कर सकती है, किंतु आत्मा को नहीं पकड़ सकती,क्योंकि आत्मा उन अंगु- लियों की तरह है जिन्होंने चिमटे को वश में कर लिया है -

यो मनसि तिष्ठन्मनसोऽन्तरः, यं मनो न वेद, यस्य मनः शरीरं। यो मनोऽन्तरो यमयति एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः॥ ( वृ० उ० अ० 3 ब्रा० 7 मं० 20 )

अर्थ - वह जो मन (बुद्धि-अहंकार) में रहता है, मन से अंतर (पृथक) है,जिसको मन नहीं जानता, मन जिस के लिये शरीर ( वा बस्त्र की भाँति ) है,जो भीतर से मन को चलाता है, वह तेरा आत्मा अंतर्यामी, अमृत है।

ख़िरद रा दोश मे गुफ़्तम कि ऐ अकसीरे-दानाई। हमत बेमग़्ज़ हुशियारी हमत बेदीदा बीनाई॥ चे गोई दर वजूद आँ कीस्त की शायस्तगी दारद। कि तो बा आबरूए-ख़्वेश ख़ाके-पाए-ओसाई॥

अर्थ - कल रात मैं बुद्धि से कहता था कि ऐ समझ की रसायन! तेरा चातुर्य बिना मस्तिष्क के है, और तेरा समस्त दर्शन बिना आँखों के है। तू बतला कि इस शरीर में वह कौन है जो ऐसी योग्यता रखता है कि तू अपने मुखमंडल की कांति पर उसके पैरों की धूलि मलती है (या घिसती है)?

आपत्ति - संसार में तो दो ही प्रकार की बस्तुएं होती हैं - जड़ ( बुद्धि-रहित, Unconscious ) और चेतन ( बुद्धि- संपन्न,Conscious)। आपके कथन से यह सिद्ध होता है कि आत्मा चेतन नहीं है, क्योंकि आप कहते हैं कि आत्मा से कोई काम होते समय आत्मा में यह विचार नहीं होता कि "मैं कर रहा हूँ", अतः इस हेतु कि आत्मा 'चेतन' नहीं हैं, तो वह आपके तर्क शास्त्र की दृष्टि से 'जड़' अवश्य है।

बड़े आश्चर्य का स्थान है कि आपका वेदांत आत्मा को

जड़ मानता है। ऐसा जड़ आत्मा भला चेतन बुद्धि को शक्ति देने की क्या सामर्थ्य रख सकता है?

उत्तर - हाँ, संसार में तो दो ही प्रकार के पदार्थ होते हैं - जड़ और चेतन, किंतु आत्मा संसार की वस्तु नहीं है। यह माल इंद्रियों के गली कूचों में नहीं बिकता।

होश भी जिस पर फड़क जाएं वह सौदा और है।

पाए-ज़ाहिर रौ हमेशा राहे-ज़ाहिर पेरवद्। कतआ राहे-बातनी हा कारे-पाए दीगर अस्त॥

अर्थ - प्रत्यक्ष रीति पर चलनेवाला पग ( अर्थात् वह पग जो सदैव केवल दिखलावे अर्थात् असत्य मार्ग या धर्म पर चलता है ) सदैव दिखलावे के मार्ग पर चलता है, किंतु सच्चे रास्ते पर चलना किसी और पग का काम है।

आपके अर्थों में जड़ और चेतन को लिया जाय, तो आत्मा न जड़ है न चेतन, वह वर्णन में आ ही नहीं सकता। जब तक तुम जड़ और चेतन की बुद्धि रखते हो, आत्मा का साक्षात्कार नहीं हो सकता। जब आत्मसाक्षात्कार होगा,जड़ चेतन की बुद्धि उठ जायगी। यह तो बताओ, आत्मा सोचे तो क्या सोचे। सोचने के व्यवहार में किसी अन्य वस्तु का ज्ञान होना आवश्यक है। आत्मा से भिन्न कोई वस्तु ही नहीं, तो पहचान के क्या अर्थ? और सोचना कैसा?

जब मैं भी वह ( आत्मा ), यह भी वह ( आत्मा ), वह भी वह ( आत्मा ), और सब ही कुछ वह ( आत्मा ) है, तो उससे भिन्न शेष क्या रहा जिसके विषय में वह ( आत्मा ) सोचे। आत्मा में संसार कहाँ रहा? सूर्य की इतनी आयु हो गई, सूर्य ने अंधेरा कभी स्वप्न में भी नहीं देखा। दिन और

रात, अंधेरा-उजेला भूमि के लिये थे। सूर्य में कभी रात पड़ी है न दिन चढ़ा है। दिवाकर ने जहाँ दृष्टि डाली, अंधेरे ने आँख चुराली। प्यारे! सूर्यों के सूर्य आत्मदेव के लिये अज्ञान या संसार कहाँ? आत्मा को भला कैसा सोच विचार? सोच विचार तो देश-काल वस्तु आदि में फँसे हुए के लिए ठीक है। जो भूत, भविष्य वर्तमान, सब काल में प्रकाशमान हो, वह किस कल या परसों की चिंता करे। जो सब घरों में विद्यमान हो, वह किस लुप्त स्थान तक पहुँचने की चिंता करे? जो सर्वव्यापक हो, वह किस प्राप्तव्य पुष्प के पाने का उपाय करे?

क्या सोचे क्या समझे राम? तीन काल का वाँ क्या काम? क्या सोचे क्या समझे राम? तीन लोक नहिं उपजा धाम? नित्य तृप्त सुखसागर नाम? क्या सोचे क्या समझे राम? जहाँ राम तहाँ काम नाँह, जहाँ काम नहिं राम।

यत्र हि द्वैतमिव भवति, तदितर इतरं पश्यति, तदितर इतरं जिघ्रति, तदितर इतरं रसयते, तदितर इतरमभिवदति, तदितर इतरं शृणोति, तदितर इतरं मनुते, तदितर इतरं स्पृशति, तदितर इतरं विजानाति; यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्, तत्केन कं पश्येत्, तत्केन कं जिघ्रेत्, तत्केन कं रसयेत, तत्केन कमभिवदेत्, तत्केन कं शृणुयात्, तत्केन कं मन्वीत्, तत्केन कं स्पृशेत् तत्केन कं विजानीयात्,येनेदं सर्वं विजानाति, तं केन विजानीयात्,·····विज्ञातारमरे केन विजानीयादिति। ( बृह० अ० 4 ब्रा० 5 मं० 15 )

अर्थ - जहां भिन्नता दिखाई देती है, वहां एक दूसरे को

देखता है, वहां एक दूसरे को सूंघता है, वहां एक दूसरे का रस लेता है, वहां एक दूसरे की चर्चा करता है, वहां एक दूसरे को सुनता है, वहां एक दूसरे की चिंता करता है, वहां एक दूसरे को छूता है, वहां एक दूसरे को जानता है। किंतु जहां सब कुछ एक आत्मा ही आत्मा हो, वहां किसको किससे देखे? किसको किससे सूंघे? किसका किससे रस लेवे? किसकी किससे चर्चा करे? किस से किस की सुने? किससे किसकी चिंता करे? किस से किसको छुए? किस से किस को जाने? जिससे ये सब बस्तुएँ जानी जाती हैं, उस को किस से जाने?······हे ( प्रिये )! वह जानने वाला ( ज्ञान- स्वरूप ) किससे जाना जाय?

ऐ खुदा जोयाँ खुदा गुमकर्दाएद। गुम दरीं अमवाज कुलजुम कर्दाएद॥

अर्थ--ऐ खुदा के ढूंढ़ने वालो! तुमने अपनी खोज से खुदा को लुप्त कर दिया है, और उन (प्रयत्न रूपी) लहरों में तुमने उस समुद्र ( अनंत सामर्थ्य ) को छुपा दिया है।

कहीं यह न समझ बैठना कि आत्मा दीवाल की भांति जड़ (अर्थात् अज्ञान से आवृत अथवा तमसावृत) है। आत्मा तो ज्ञानस्वरूप है। श्रुति भगवती की आज्ञा सुनो--

यद्वैतन्न पश्यति, पश्यन्नेतन्न पश्यति, न हि द्रष्टुर्दृष्टेर् विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वाद्, न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽ न्यद्विभक्तं यत् पश्येत्॥ ( बृ० उ04-3-23 )

अर्थ--( यदि यों कहो कि ) आत्मा वहां ( सुषुप्ति में ) कुछ नहीं देखता, तो (यद्यपि नहीं देखता पर) देखता हुआ नहीं देखता है, क्योंकि द्रष्टा स्वरूप आत्मा में देखने की शक्ति

कभी नष्ट नहीं होती, क्योंकि वह अविनाशी है;किंतु वहां कोई दूसरा है नहीं, आत्मा से भिन्न का नाम और चिन्ह वहां लुप्त है। अतः आत्मा देखे किसको?

आगाह नियम अज़ शिबहे तो दानम कि नज़ादस्त। दो शिज़ए अज़ दूदहे-शिबहे-तो अदम रा॥

अर्थ मैं तेरी उपमा से परिचित नहीं हूं, क्योंकि मैं जानता हूं कि प्रकृति ने तेरा उदाहरण उत्पन्न नहीं किया है। नास्ति की कुमारी कन्या तेरी उपमा के वंश में से है, अर्थात् तेरी उपमा 'नहीं' रूप है।

यद्वैतन्न मनुते, मन्वानो वै तन्न मनुते। न हि मन्तुर्मतेर्वि- परिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वाद्, नतु तद्द्वितीयमस्ति, ततो अन्यद् विभक्तं यन्मन्वीत॥ ( वृह० 30-43-28 )॥

अर्थ-आत्मा कुछ नहीं सोचता और यद्यपि नहीं सोचता, पर सोचता हुआ नहीं सोचता है। आत्मा में सोचने की शक्ति कभी नष्ट नहीं होती, क्योंकि वह अविनश्वर है;किंतु वहां कोई दूसरा है नहीं, आत्मा से भिन्न का नाम और चिन्ह लुप्त है। अतः आत्मा किसको सोचे?"

सालिल रको द्रष्टाऽद्वैतो भवति। एष ब्रह्मलोकः········ एषास्य परमा गतिरेषास्य परमा संपदेषोऽस्य परमो लोक एषोऽस्य परम आनंदः। ( वृ० उ० 4—3—32 )

अर्थ-आत्मदर्शी ज्ञानी वह अनुपम सिंधु हो जाता है जिसकी तरंगें और बुद्बुदे आदि चित्र विचित्र प्रकार के हैं। ज्ञान ही ब्रह्मलोक है।······यही (आत्मज्ञान) उसकी परम गति है, यही उसकी बड़ी से बड़ी संपति ( विभूति ), यही उसके लिये उच्चतम पद वा लोक है, और यही उसको परम आनंद है।

प्रेयान्यः सदनधनात्मज प्रियादेर्यंप्रेम्ना प्रियमिति मन्यते पराचः। पराथ्यांवधित्वधीरि तैतराथ्यों विज्ञेयः स खलु सुखाब्धिरन्तरात्मा। ( स्वराज्यसिद्धि )

अर्थ - आत्मा जो सब का सहारा है; धन, धाम, स्त्री, पुत्र आदि सब से अधिक जिसकी चाह है; जिसके लिये अन्य वस्तुएँ प्रिय होती हैं; जो सब की कामनाओं का परिणाम है; जिसके लिये सब वस्तुएँ हैं; और जिसको कोई प्रयोजन नहीं है; ऐसे आत्मा को क्यों साक्षात्कार न किया जाय, ऐसे आत्मा का ज्ञान क्यों न प्राप्त किया जाय?

जिज्ञासु - अभी कुछ पल्ले नहीं पड़ा। गड़बड़ सी मच गई है।

ज्ञानी - आत्म-साक्षात्कार कोई खाला जी (मौसीजी) का घर नहीं है। यहां धैर्य और संतोष की आवश्यकता है। सरकार के यहां छोटी छोटी असामियों के लिये कई वर्ष आशा वान् रहना पड़ता है, और फिर भी नौकरी चाहे मिले न मिले; अनन्त ज्ञान के लिये इतना अधिक असंतोष! वाह, साहस मत हारो।

श्रवणायापि बहुभियौ न लभ्यः श्रृण्वन्तोऽपि बहवो यन्न- विद्युः। आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाऽऽश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः। (यजुर्वेद कठो० अ० 1 व० 2 मं० 7)

अर्थ-प्रायः लोग तो इस आत्मा की चर्चा सुनने ही नहीं पाते, सुन सुनकर भी लोग समझ नहीं सकते। धन्य है यह ज्ञान बताने वाला, और धन्य है उसका मिलना,और धन्य है उस विद्या का पाने वाला,और धन्य है उस सच्ची शिक्षा का पाना