श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

नित्य-जीवन का विधान ( नियम )

भाग 15 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 15 · अध्याय 1 / 5

नित्य-जीवन का विधान ( नियम )

( पूर्व में कुछ एक पत्र अंग्रेजी भाषा में श्री स्वामी नारायण को लिखे गये थे, जिन को तत्पश्चात् स्वयं स्वामी राम ने प्रकाशनार्थ एक उत्तम शृंखला में विस्तार देकर संपादित कर दिया, और जो फिर अंग्रेजी जिल्द प्रथम के तीसरे भाग के आरम्भ में उक्त नाम से प्रकाशित हुए )

राम किसी मिशन ( mission, खुदाई पैग़ाम वा पंथ इत्यादि ) का दावा नहीं करता। यह कर्म सम्पूर्ण परमात्मा का ही है। हमें भगवान बुद्ध तथा अन्य लोगों के आदर्श और उदाहरणों से क्या करना है, हमारे मनों को तो दैवी-विधान (Law) की प्रत्यक्ष आज्ञाओं का पालन करना चाहिये। किन्तु भगवान बुद्ध और ईसा मसीह भी अपने अनुयायियों और मित्रों से त्यागे गये। इस प्रकार सातवर्ष

के वनवास में से पिछले दो वर्ष बुद्ध भगवान ने नितान्त एकान्त में व्यतीत किये, और तब एक दीप्तमान ज्योति प्राप्त हुई ( अनुभव हुई ), जिसके बाद शिष्य लोग बुद्ध भगवान के पास एकत्र होने लगे और बुद्ध भगवान ने भी आनन्द से उन्हें अपने पास आने दिया। प्यारे ! सदाशयवान ( शुभेच्छु ) माननीय सम्मतिदाताओं के मत और विचारों से प्रभावित मत हो। यदि इन के विचार ईश्वरीय नियमानुकूल होते तो आज तक इन्हों ने हज़ारों बुद्ध भगवान उत्पन्न कर दिये होते।

धीरे धीरे किन्तु दृढ़ता पूर्वक जिस प्रकार मधु में फंसी हुई मक्खी अपनी टांगें मधु से निकाल लेती है, इसी प्रकार रूप और व्यक्ति गत आसक्ति के एक एक कण को हमें अवश्य दूर करना होगा। सब सम्बन्ध एक दूसरे के बाद छिन्न भिन्न करने होंगे,सब बन्धन चट से तोड़ने होंगे,जब तक कि अन्तिम ईश्वरकृपा मृत्यु के रूप में आकर सारे अनिच्छित त्यागों की पूर्णाहुति न करदे।

दैवी-विधान (Law) का चक्र बड़ी निर्दयता से घूमता फिरता है। जो इस विधान (नियम) को आचरण में लाता है, वही उस पर आरूढ़ होता है, अर्थात् वही उस पर अनुशासन रखता है। और जो अपनी इच्छा को दैवेच्छा ( अर्थात् दैवी- विधान ) के विरुद्ध खड़ा करता है, वह अवश्य कुचला जाता है, और दारुण पीड़ाएं ( Promethean tortures ). भोगता है।

दैवी-विधान त्रिशूल है, यह क्षुद्र अहंकार ( अहंभाव ) को छेद देता है। जो जान बूझ कर इस त्रिशूल रूपी सूली पर चढ़ता है, उस के लिये यह जगत् स्वर्गवाटिका हो जाता है।

अन्य सब के लिये यह ( जगत् ) अघ-स्वर्ग है। यह दैवी- विधान अग्नि है, जो सब के सांसारिक स्नेह को भस्म कर देती है, मूढ़ मन को झुलसा देती है, और इस से बढ़कर अन्तः करण को शुद्ध करती तथा आध्यात्मिक-रोग के सर्व प्रकार के कीड़ों को नष्ट कर देती है।

धर्म इतना विश्वव्यापक ( सार्वलौकिक ) है और हमारे जीवन से इतना मार्मिक संबन्ध रखता है जितना कि भोजन- क्रिया। सफल नास्तिक मनुष्य मानो अपने ही भीतर की इस पाचन विधि को नहीं जानता है। दैवी-विधान हमें छुरे की नोक के ज़ोर से धार्मिक बनाता है, कोड़े लगाकर हमें जगाता है। इस विधान से निस्तारा ( छुटकारा ) नहीं। दैवी-विधान सत्य है और अन्य सब मिथ्या है। समस्त रूप और व्यक्तियां दैवी-विधान के सागर में केवल बुलबुले से हैं। सत्य की व्याख्या ऐसे की गई है कि "सत्य वह है जो ( एक रूप, एक रस ) निरन्तर रहे, अथवा रहने का आग्रह करे" अब इस नाम-रूपमय संसार में ये सब सम्बन्ध, देहें वा पदार्थ, संस्थायें और सभायें कोई भी ऐसा नहीं जो इस त्रिशूल के विधान के समान सदा एक रस रह सके।

ये मूढ़ और अदूरदर्शी जीव इस आदर्श रूप विधान की अपेक्षा बाह्यरूपों ( व्यक्तियों ) को क्यों अधिक प्यार करते हैं ? इस लिये कि अज्ञान के कारण उन को ये व्यक्तियां वा बाह्यरूप निरन्तर एक रस रहने वाले सत्य पदार्थ दिखाई देते हैं, और दैवी-विधान एक अस्पर्श्य क्षणिक मेघ ( intangible evanescent cloud ) भान होता है।

कठोर प्रहार और कष्टप्रद धक्कों द्वारा उनकी रक्षा हो सकती है, यदि वे उस पाठ को पढ़ने लग पड़ें कि जो प्रकृति

माता उन्हें पढ़ाना चाहती है; अर्थात् "त्रिशूल ( cross, सूली ) या त्रिशूली ( शिव ) ही केवल सत्य है, और अन्य सब व्यक्तियां व प्रीति के पदार्थ क्षणिक, आभास रूप छाया मात्र, तथा मिथ्या प्रेत हैं। ये वाह्य प्रिय-अप्रिय, मधुर-कटु रस, भासमान सौंदर्य्य और अद्भुतता तो केवल नक़ाब ( बुर्क़ो वा ऊपर का पर्दा ) है जिन्हें बिहारी जी ( चिलासी स्वरूप ) ने हमारी आँखों को अन्ततः अपनी महिमा दर्शाने के लिये अपने मुख पर डाल रक्खा है" ।

जब शत्रुमित्र के रूपों को हम सत्य मानते हैं, तब वे हमें धोखा देते और ठगते वा विश्वासघात करते हैं। किन्तु जब हम उन से बदला लेना शुरू करते हैं, तथा उन में नीच स्वभाव और निकृष्ट प्रयोजन ( उद्देश ) आरोपित करते हैं, तब हम दशा को पहिले से भी अधिक बिगाड़ देते हैं। जो सत्यता केवल परमात्मा में है, उसे जब हम मोह के कारण अपने मित्रों में आरोपित करते हैं, तो यह उनके प्रथम विश्वासघात का कारण होता है। फिर जब हम क्रुद्ध होते हैं, तो इस घृणा से हम उन ( शत्रु मित्रों के ) रूपों में और अधिक सत्यता आरोपित करते हैं, जिससे अपनी पहिली भूल को हम और भी दृढ़ कर लेते हैं, और इस प्रकार अधिक दुःखों को अपने ऊपर बुला लेते हैं। खबरदार ( सावधान ) ! यह त्रिशूल ( संपूर्ण त्याग, शिव ) जीवन का अन्तिम उद्देश्य वा ध्येय है। यह जीती जागती सच्चाई है, पत्थरों ( स्थूल पदार्थों ) से भी अधिक ठोस ( concrete, प्रत्यक्ष वस्तु ) है, और बहुत ठीक ही यह पापाणालिंग से निरूपित वा प्रति- पादित की जा सकती है। प्रमादी मन को सुधारने के लिये यह ( त्रिशूल ) पत्थर से भी कठोरतर चोट लगाता है। इस- लिये इसे निरन्तर स्मरण रखना नितान्त आवश्यक है।

मुसलमान और ईसाई जब इस देवी-विधान वा परमात्मा को 'ग़य्यूर' ( ईर्षालु, Jealous, [unclear] ) और क़हार ( क्रूर वा कराल, Terrible, [unclear] ) कहते हैं,तो कोई गलती नहीं करते। निःसन्देह यह नियम किसी व्यक्ति विशेषका पक्ष करने वाला ( वा लिहाज़ करने वाला ) नहीं है। किसी मनुष्य को संसार की किसी वस्तु से चित्त लगाने दो और त्रिशूल रूपी प्रकृति का अनिवार्यतः क्रोध उस पर अवश्य ही घटित होगा। यदि लोग इस 'सत्य' के ग्रहण करने में सुस्त हैं, इसलिये कि उनमें ठीक २ अवलोकन की शक्ति थोड़ी है, तो वे प्रायः अपने व्यक्तित्व-सम्बन्धी बातों में उसी घटना में कारण को ढूँढना पसन्द नहीं करते,बल्कि अपने दोषोंके लिये दूसरों को दोष झट पट देने लग जाते हैं,और एक निष्पक्ष साक्षी की भाँति अपनी कोपवृत्तियों और भावनाओं तथा उनसे उत्पन्न होने वाले परिणामों पर बिचार पूर्वक दृष्टि डालना जानते ही नहीं। धोखा हमें अवश्य मिलेगा जब हम इन वाह्य रूपों पर विश्वास करेंगे, या जब हम अपने अन्तः हृदय में इन मिथ्या पदार्थों और व्यक्तियोंको वह स्थान देंगे जो केवल एक मात्र सत्यके लिये उपयोगी है, या जब ईश्वर के स्थान पर हम मूर्तियों ( बुतों, idols ) को अपने हृदय-सिंहासन पर विठलायेंगे। अध्यारोप अपवाद-न्याय (Method of agreement & difference) तो अनीश्वरीय असत्यता के नियम को बिना किसी अपेक्षा के स्थिर करता है।

कितनी वार ऐसा नहीं होता कि हम पूर्ण भद्र पुरुषों के वाक्यों ( इक़रारों ) पर चित्त लगाने से और उनमें ईश्वर से भी बढ़कर विश्वास रखने से उनको उनके वाक्यों के समान भी भद्र नहीं बने रहने देते ? कितनी वार हम दैवी-विधान

को भुला देने वाला मोह अपने वच्चों के साथ करके उनकी मृत्यु वा नाश को निमन्त्रित नहीं करते ? कितनी वार हम अन्तः हृदयस्थ श्रद्धाको जो केवल ईश्वर (ईर्पालु, दैवी-विधान) के अर्पण करने योग्य है, अपने मित्रों के शरीरों में अर्पण कर के और उन ( मित्रों ) पर ही आश्रित होते हुए उन्हें विश्वास घातक नहीं वना देते ? जहां दैवी-विधान यह चाहता है कि प्रभात से पहिले ( before the cock crows )* हम तीन वार से भी अधिक अपने गुरुओं को ( ईश्वर से अतिरिक्त अन्य किसी ऊँच नीच सम्बन्ध से ) अंगीकार न करें, वहां उनको अपने पर और ( उनमें ) अपनी श्रद्धा पर भरोसा दिला कर कितनी वार हम अपने जीवित गुरुओं को आध्यात्मिक उन्नति के शिखर से नीचे नहीं गिरा देते ?

कितनी वार अपनी स्त्रियोंपर हमारी हृदयासक्ति (heart dependence) गृहकलह और उससे भी वुरे २ दृश्यों का कारण नहीं होती ? किसी भी वस्तु को आप ईश्वर से अधिक सत्य ( महान्, serious ) मानिये, और वस, दिव्य-प्रेम ( ईश्वर भक्ति ) अपने तीक्ष्ण कटाक्ष से आपको वेध देगा ।

निन्दनीय ( अनुचित, unworthy ) प्रेम की वात तो अलग रहे, उन गोपिकाओं का दृष्टान्त लीजिये जिन्होंने अव- तरित भगवान् की मोहनी आकृति पर अपना हृदय निछावर कर दिया था, किन्तु इतने पर भी उन्हें अपनी भूल निमित्त खून के भारी आंसू वहाने पड़े । शुद्ध प्रेम की मूर्ति सीता जी ने भगवान् राम के तेजस्वी रूप की सत्यता में निश्चय किया, तो उन्हें भी, अरे सीता जी को भी, अपनी भूल के लिये, अपने स्वामी (ईर्पालु, अमूर्त भगवान् राम, अर्थात् सत्य राम, सब के प्रभु ) द्वारा घोर कानन में भटकाय जाकर प्रायश्चित करना पड़ा ।

_______________ * ( सेंट ल्यूकस की गोस्पल का अध्याय 22 देखो )

ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद् । क्षत्रं तं परादाद्योऽ न्यत्रात्मनोः क्षत्रं वेद् । लोकास्तं परादुर्यों अ न्यत्रात्मनो लोकान्वेद् । देवास्तं परादुर्यों अ न्यत्रात्मनो देवान्वेद् । वेदास्तं परादुर्यों अन्यत्रात्मनो वेदान् वेद् । भूतानि तं परादुर्यों अ न्यत्रात्मनो भूतानि वेद् । सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद् । इदं ब्रह्म, इदं क्षत्रम्, इमे लोकाः, इमे देवाः, इमे वेदाः, इमानि भूतानि, इदं सर्वम्, यदयमात्मा ॥ 7 ॥ ( वृहद० उप० अ० 4 ब्रा० 5 मं० 7 )

अर्थः—ब्राह्मणत्व उसको परे हटा देता है, जो आत्मा से अन्यत्र ( किसी दूसरे के आश्रय ) ब्राह्मणत्व को समझता है । क्षत्रियत्व उसे परे हटा देता है, जो आत्मा से अन्यत्र क्षत्रियत्व को देखता है । लोक उसको परे हटा देते हैं, जो आत्मा से अन्यत्र लोकों को जानता है । देवता उसको परे हटा देते हैं, जो आत्मा से अन्यत्र देवताओं को जानता है । वेद उसको परे हटा देते हैं, जो आत्मा से अन्यत्र वेदों को जानता है । प्राणधारी उसको परे हटा देते हैं, जो प्राणियों को आत्मा से अन्यत्र देखता है । प्रत्येक वस्तु उसको परे हटा देती है, जो वस्तु को आत्मा से अन्यत्र जानता है । यह ब्राह्मणत्व, यह क्षत्रियत्व, ये लोक, ये देव, ये वेद, ये प्राण- धारी, यह प्रत्येक वस्तु, जो है, यह सव आत्मा ही है । (श्रुति)

ये भासमान् पदार्थ जो भोले प्राणियों को आकर्षण करते हैं, देखने में तो भगवान् कृष्ण की भोली मूर्ति के समान हैं ! मन रूपी सर्प उनको भट्ट निगलता जाता है; परन्तु भीतर पहुंचते ही वे पदार्थ अन्दर से छुरा चुभो देते हैं, मन रूपी

सर्प के उदर को फाड़ डालते हैं; और तव लोग चिल्लाते हैं—"अरे ! मेरा कलेजा फट गया ! मैं मरा, मैं मरा ! मेरा सर्वनाश होगया !!!" पर आप ने अपने को नामरूपों से ठगा जाने क्यों दिया ! आप केवल सत्य को प्यार ( अंगीकार ) कीजिये, केवल ईश्वर से लगन लगाइये, भीतर ( रोम २ में ) उसे खूव वसाइये, ईश्वर को अपनाइये, ईश्वर के साथ ही रमण कीजिये, ईश्वर स्वयं हो जाइये, ईश्वर जैसा व्यवहार कीजिये । यही जीवन है । जो कुछ विश्वस्तता (faithfulness) और प्रेम इस संसार में है, उसे तव तक आप देख नहीं सकते जव तक उन्हें त्याग नहीं चुकते । ऐ मेरे प्यारों ! ( निश्चय करो कि ) एक मात्र ईश्वर सत्य है और अन्य सव मिथ्या है ।

"ला इलह इल लिल्लाह ।"

यह ठीक है कि मुहम्मद को लोगों ने गलत समझा है, और प्रायः उसका अनुसरण भी गलत किया है । किन्तु जो कोई सत्य ( तत्त्व ) को देख लेता है, वह सन्मान पूर्वक इस मत के आगे अवश्य सिर झुकाता है । यद्यपि यह मत एक पत्ती है, क्योंकि जो लोग इस सत्य (तत्त्व) में कि "ईश्वर से अतिरिक्त और कोई सत्य वस्तु नहीं" पक्का निश्चय न रखने के कारण सिसक सिसक कर मर रहे हैं, उनकी चिरस्थाई (चिरकालीन) और दुस्साध्य व्यथाओं का एक दम (तल्वार से) अन्त कर देता है । वास्तव में हज़रत ईसामसीह भी यही शिक्षा देते हैं, बुद्ध भगवान् भी यही सिखलाते हैं, और निस्सन्देह हमारा, अपना प्रत्येक ऋषि एक न एक रूप में इसी वस्तु का उपदेश करता है । परन्तु इस से क्या ! उनकी शिक्षा और उपदेश अभी तक भी जीते न रहते, यदि वे श्रोतागण के निज-अनु- भव में आकर उनका हार्दिक समर्थन न पाते, और यदि सव

गुणों में ज्ञान के अनुरागियों, निष्कपट, सच्चे वा शुद्धात्माओं ने समय समय पर अपने अनुभव में लाकर उनकी साक्षी न दी होती, वा उनका स्पष्टीकरण और समर्थन न किया होता।

त्याग का नियम ( विधान ) एक पक्की सचाई है। कोई सारहीन (काल्पनिक) कल्पना (flimsy phantom) नहीं। राष्ट्रों के इन पैगम्बरों, अवतारों, और नेताओं के केवल काल्पनिक भ्रमों से मोहित नहीं हो सकते थे। शताब्दियों की शताब्दियाँ विचार बुद्धि-भ्रष्टों की केवल कल्पना से ही नहीं बीत सकती थीं।

अपने दुःखों के असली कारण को न जान कर-जो कि दैवी-विधान के प्रतिकूल चलना है-लोग अपने रोग के बाह्य लक्षणों को अर्थात् बाह्य दशाओं को रोगी ठहराने लग जाते हैं। जिस प्रकार अस्पष्ट स्वप्न (misty dreams) विस्मृति के अर्पण कर दिये जाते हैं ( अर्थात् नितान्त भुला दिये जाते हैं ), उसी प्रकार लोगों के अच्छे बुरे आचरणों और संवादों ( शब्दों ) को अपने चित्त से नितान्त धो डालना चाहिये। स्वप्न चाहे भयंकर हों, चाहे मधुर, हम उनके साथ लड़ने या उनके समाधान करने का यत्न नहीं करते, वल्कि उल्टे हम अपने पेट को ही ठीक करते हैं। इसी प्रकार अच्छे बुरे लोग जो भी मिलें, उनकी हमें पूर्ण उपेक्षा करनी चाहिये, और अपनी आध्यात्मिक दशा उन्नत करनी चाहिये। अपने और ईश्वर के वीच में इन भासमान् अनिष्टों वा भाग्यों को खड़ा न होने दीजिये। कोई अपमान और दोष इतने भारी नहीं कि जिनको क्षमा प्रदान करने से मुझे सन्तोप मिले।

किसी वस्तु को ईश्वर से बढ़कर मत समझो, ईश्वर के बरावर भी किसी का मूल्य मत करो। निन्दा-स्तुति और

व्याधि सव के सव एक समान घातक हैं, यदि हम अपने को इनके अधीन समझें । अपने को ईश्वर मान(निश्चय)करो, और अपने ईश्वर भाव में आनन्द के गीत गाओ । निन्दा-स्तुति दोनों को इस प्रकार देखो जिस प्रकार राम अपने शारीरिक रोगों को ईश्वर के दरवार के केवल किंकर समझता है, जो ( किंकर )सर्वोच्च शासन के अधिकार से कहते हैं "इस घर ( देहाभ्यास ) से एक दम वाहिर निकल जाओ ।" वे ( किंकर ) हमारी आज्ञा पालन करते हैं जव हम निज स्वरूप के राज-सिंहासन पर बैठते हैं, और वे कोड़े लगाते वे पेट में छुरा भोंकते हैं जव हम इस अन्ध-कूप ( देहाभ्यास ) में प्रवेश करते हैं ।

वे शासन भी जिनके नाम मात्र के नियम ( क़ानून ) त्रिशूल ( खुला ) के ईश्वरीय नियम के अनुकूल नहीं हैं, अपना नाश करलेते हैं । शाइलॉक ( shylock ) के समान व्यक्ति गत अधिकार पर ज़ोर देना, इस वा उस पदार्थ को अपना समझना, स्वत्व वा अधिकार का भाव रखना, "कानून हमें यह दिलाता है" (the law grants it) ऐसा कह कर उस दैवी-विधान ( ईश्वरीय नियम ) के विरुद्ध चलना है कि जिसके अनुसार जो कुछ हक़ ( अधिकार ) हम लोगों का है वह केवल 'सत्य' ( ईश्वर ) है, और अन्य सर्व अधिकार व्यर्थ (wrong) हैं । यदि कोई अन्य व्यक्ति इस सिद्धान्त (principle) को नहीं मानता है, तो कम से कम सन्न्यासी को तो अवश्य इसे अपने आचरण में लाना चाहिये ।

दैवी-विधान ( ईश्वरीय नियम ) सर्व व्यापी है, प्रत्येक का परम आत्मा है, और इस अर्थ में राम है । तथापि यह

लघु आत्मा (व्यक्तित्व) को अवश्य ठोकरें मार कर निकाल देता और नष्ट कर देता है । यह ( विधान ) वड़ा निर्दयी है, परन्तु इसकी निर्दयता प्रेम का सार है, क्योंकि इस लघु-आत्मा ( तुच्छ अहंकार ) की मृत्यु में ही असली अपने आप (परमात्मा) का और नित्य जीवन का पुनरुत्थान है । जो कोई तुच्छ अहंकार को रखकर निज स्वरूप (king self, परमात्मा) के विशेष अधिकारों को चाहता है, वह मानो वृथाभिमान (vanity) के शिखर पर गिद्धों का भदय हो जाता है । वेदान्त की स्वतंत्रता (मुक्ति) कुछ इस परिच्छिन्न देहात्मा (व्यक्तित्व और देह) के लिये दैवी-विधान से छुट- कारा नहीं है । यह तो God (ईश्वर) को ठीक उलटा देना, अर्थात् dog (श्वान) वनाना है*। लाखों प्राणी इस भूल के कारण प्रति घड़ी नाश होते हैं । इस दैवी-विधान के क्रम को मूर्खता पूर्वक उलटा देने से हज़ारों मस्तिष्क निराशा में डूव रहे हैं और लाखों हृदय प्रत्येक मिनट टुकड़े २ हो रहे हैं । स्वयं दैवी-विधान ही हो जाने से विधान से छुटकारा मिलता है, यही शिवोऽहं का अनुभव (साक्षात्कार) है ।

जो वाह्य रूपों (आकारों) की नींव पर विश्राम करता और घटनाओं तथा अलंकारों (facts and figures) के भरोसे रहता है, ऐसा मूढ़मति फेन पर घर वनाता है, और स्वयं उसके साथ डूवता है । पर वह व्यक्ति उस अचल शिला (पर्वत) पर अपना स्थान वनाता है जिस के हृदय की तह में "ब्रह्म सत्य, जगत् मिथ्या (ब्रह्म सत्य है, जगत् मिथ्या है)"

_______________ *GOD ( गॉड ) का अर्थ है ईश्वर । इस अंग्रेजी शब्द के अक्षरों का क्रम उलटा देने से शब्द Dog ( डॉग ) बन जाता है जिसका अर्थ है कुत्ता, कूकर वा श्वान ।

और दैवी-विधान एक जीती जागती शक्ति है ।" जमा पड़ा है।

लोग इस शरीर को पौलिसी-वाज़, स्वार्थी, गर्वपूर्ण, मदोन्मत, अथवा अन्य जो कुछ चाहें आनन्द से कहें; चाहे जिसे लोग अपमानित, पद्दलित और मृतक हुआ कहते हैं वैसा इस को करदें, मुझ (सर्व के आत्मा) को इस से क्या ?

I am Truth, the inevitable. I am Law, the inexorable. To know Me is to obey me. To obey Me is to prosper. Oppose Me, it will not annoy Me. Ignore Me, I cannot be anxious. But will calmly destroy him who slights.

मैं अनिवार्य सत्य हूं, मैं अनम्य ( कठोर चित्त ) विधान हूं, मुझे जानना मेरी आज्ञा का पालना है, मेरी आज्ञा का पालना समृद्धि द्वार है, मेरा विरोध करो, मैं क्षुब्ध न हूंगा, मेरी उपेक्षा करो, मैं उत्कंठित न हूंगा, किन्तु शान्ति से अपमानकारी का नाश कर दूंगा, यह खाली धमकी ( गीदड़भभकी ) नहीं है । यह अत्यंत भयंकर ( भीषण ) सत्य है ।

हमें कम से कम उतना खयाल और सत्कार तो सत्य (ईश्वर, ईश्वरीय नियम, God, Law,) के लिये अवश्य रखना चाहिये जितना कि हम लोगों के भावों वा विचारों के लिये रखते हैं ! यदि दैवी-विधान के प्रति विश्वासनीय सच्ची और निष्कपट भक्ति के कारण लोगों के हृदय दूट्टे ( चोट खाते )

हैं, तो उस के लिये हम ज़िम्मेवार नहीं होसकते । हमारे लिये तो सर्व प्रकार से ईश्वरीय नियम का भंग न करना कहीं गुणा अधिक चिन्तनीय होना चाहिये । जिन को हम अपना वनिष्ठ सम्बन्धी वा प्यारा कहते हैं, उन लोगों के भ्रम के अधीन होकर दैवी-विधान के विरुद्ध होना अपने और उन के सिर पर आफ़त बुलाना है । ईश्वर से अधिक निकटतर कोई वस्तु नहीं है, और ईश्वर (सत्य, दैवी-विधान) से बढ़कर प्रिय कोई होना न चाहिये ।

त्वं सोम व्रते तव मनस्तनुपु विभ्रतः ( यजु० वेद ) अनु०—For Thee, for Thee alone, O Lord! O Law! I was keeping the mind in my body.

तव हेतु, एक मात्र तव हेतु— हे भगवान्, हे विधान !! इस निज मन को मैं निज शरीर में रखता हूं ।

वैदिक काल में विशेष अवसरों पर, कुमारियां प्रज्वलित अग्नि की चारों ओर कर जोड़े एकत्र होकर प्रदक्षिणा करती हुई यह गीत गाया करती थीं ।

त्र्यम्वकं यजामहे सुगन्धिं पतिं वेदनम् । उर्वारुकमिव वन्धनादितो मुच्ीय मामुतः ॥

अनुवाद—उस सुगन्धिमय, सर्व-दृष्टा, पति-वेदन ( पति को जानने वाले ) की पूजा में आओ हम सव निमग्न हों । भूसी के ( भीतर से ) दाने की तरह हम लोग यहां के वन्धन ( पितृ गृह ) से मुक्त हों, किन्तु वहां ( पति गृह ) से कभी न कभी न (मुक्त हों) ।

विछुड़ती दुल्हन वतन से है जव । खड़े हैं रोम और गला रुके हैं ॥ कि फिर न आने की है कोई ढव । खड़े हैं रोम और गला रुके हैं ॥

प्राचीन आर्य कुमारीयों की वह प्रार्थना राम के हृदय पटल से गम्भीरता पूर्वक निकल रही है, और उस के साथ अश्रु, अरे अश्रु, झड़ी वांधे वह रहे हैं ।

हे भगवान् ! हे दैवी-विधान हे ! सत्यस्वरूप ! हमारे इस हृदय और मस्तिष्क (दिल और दमाग) में आप से अतिरिक्त यदि कोई सम्बन्ध घर करता हो, तो इन दोनों (दिल और दमाग) को तत्क्षण विदीर्ण कर दो । यदि आप से अतिरिक्त कोई और भाव (ख्याल) इन नसों और नाड़ियों में प्रवाहित हो, तो उसी क्षण रुधिर को वहीं जम जाने दो ।

और श्रुति—

अहम् जानि गर्भ धमा । त्वम् जासि गर्भ धम् ॥

भावार्थ-हे भगवन् ! स्त्री जैसे पुरुष का ज्ञान प्राप्त करती है, वैसे मैं ज्ञान प्राप्त करूंगा, मैं तुम्हें अधिकतर निकट आकर्पित करूंगा, मैं तुम्हारे शरीर (तन) का गुह्य रस (Secret juice) और तुम्हारा अधर पान करूंगा । ऐ स्वतंत्रते ! ऐ दैवी- विधान !! मैं तुम्हें अपने भीतर खूव धारण करूंगा ।

क्या राम का विवाह त्रिशूल, सत्य (तत्त्व) और दैवी- विधान से नहीं हो चुका, जो उस से वंध्या के समान और सम्बन्धों और स्नेहों की आशा की जाती है ?

मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरा न कोई ।

यह कोई अन्ध वेग (आवेश) नहीं है, और न किसी को हानि पहुंचाने की स्वार्थमयी पौलिसी (नीति) है, क्यों ? भला निदोंष राम ने क्या विगाड़ा है जो तुम उसे व्यक्ति गत सम्बन्धों की परिच्छुन्न सीमा के भीतर खींचना चाहते हो ? उसे छोड़ दो, कृपया छोड़ दो (Spare him), अपने कुशल के लिये उसे छोड़ दो, उसे अकेला रहने दो (Leave him alone) । इसी में तुम्हारे देश का और मानव जाति का कल्याण है । क्या तुम यह अनुमान करते हो कि राम के शरीर की यदि तुम आदर पूर्वक हिफाज़त (रक्षा) न करोगे, तो वह एकान्त में मृत्यु को प्राप्त हो जायगा ! नहीं, ईश्वर सत्य है, और ईश्वर में निमग्न जीवन (Life in God) कोई कष्ट भान नहीं करता; और यह शरीर जव तक ईश्वर का कार्य पूरा न कर लेगा, तव तक इस का पात नहीं हो सकता ।

किसी के पवित्र व्रत में छेड़ छाड़ (हस्तांक्षेप) करना अच्छा नहीं है । वह अपने और अपने व्रत (मनोभाव, ideal) के वीच किसी को, नहीं नहीं, वल्कि मृत्यु तक को भी नहीं खड़ा होने देगा । नास्तिकता की दृष्टि से अधीत इतिहास द्वारा प्राप्त भये भावों वा विचारों (notions) के अनुसार कोई उस (राम) के चरित्र को खेंचने वा घटानेका यत्न न करे । इस भासमान् राम के प्रति अपने सत्कार, सन्मान और प्रीति (भक्ति) को परे रक्खो । इनसे असली राम (जो सवको अपना आप वा आत्मा है)का अपमान है । परे हटो । नामरूपों के स्वप्न से जागो । जिस प्रकार दैवी-विधानानु- सार जीवन द्वारा राम ने उदर के अजीर्ण (dyspepsia) को दूर कर दिया है, इसी प्रकार देहाभ्यास और व्यक्तित्व के भ्रम को दूर करो । निज स्वरूप के तीक्ष्ण तेज़ को विष्या

शक्ति (इन्द्रियानुराग) पर केन्द्रीभूत (focus, एकत्र) कर के उनको जला डालो । अपने चित में सांसारिक संस्कारों को किंचित् जगह मत दो ! और उसे सदा असली (वास्तविक) राम से पूर्ण रक्खो ।

वर हरचिः जुज़ दिलवर वुवद् । अज़ शहेर-दिल वेरूं कुनम ॥

अर्थः—और अपने प्यारे के सिवा जो भी कोई ख्याल होता है उसे मैं अपने दिल के नगर से वाहिर करता हूं ।

क्या ईश्वर कम से कम उतना मधुर नहीं, जितना कि विषयाभोग (इन्द्रिय-विषय) ?

लोग ईश्वर को प्रेम करने में हिचकते हैं, क्योंकि वे समझते हैं कि संसार की प्राप्ति के भूठे पदार्थों के समान ईश्वर स (प्रेम का) कोई उत्तर प्राप्त नहीं होता । यही मूर्खताभरा अज्ञान है जो उन्हें भ्रम में डालता है । ऐ प्यारे ! तत्क्षण ही, नहीं, नहीं तुम्हारी छाती के साथ साथ ही उस (परमात्मा) की छाती प्रति-संवदन में (in responsive impulse) धड़कती है ।

इन वाहिर के शत्रु-मित्रों में उनके आचरण का कारण मत ढूंढो । वास्तविक कारण तो एक मात्र तुम्हारे निज स्वरूप के आश्रित है (अर्थात् ठीक २ कारण उसका तुम्हारे भीतर होता है) । वहां देखो ।

जिस प्रकार एक नन्हा पत्ती, जो अभी उड़ना सीख ही रहा हो एक पत्थर वा टहनी को छोड़कर वैसे ही दूसरे आ- धार पर जा बैठता है, फिर उस भी छोड़ तीसरे पर, तीसरे से चौथे पर जा टिकता है, किन्तु भूमक इन पदार्थों (आश्रयों)

को नितान्त त्याग कर ऊँची वायुमें उड़ता नहीं है; इसी प्रकार ब्रह्मज्ञान में नव प्रवृत्त पुरुष ( नवीन जिज्ञासु ) जव अपने चित्त को एक वस्तु से निरासक्त, या किसी व्यक्ति विशेष से उपराम करता है, तो तत्काल किसी दूसरी वस्तु के आश्रित हो जाना है, उसके बाद किसी अन्य वैसी ही वस्तु में आ- सक्त हो जाता है, किन्तु कोमल कांच और तिनका (क्षणभंगुर पदार्थों) का आश्रय नहीं छोड़ना, और अपने हृदय से सारे संसार का त्याग नहीं करता है । अनुभवी ज्ञानी किसी सांसारिक पदार्थ की प्रत्यक्ष वेवफाई (निस्सारता, विश्वासभंग) को अपने अनन्त स्वरूप में कूद पड़ने का सोपानशिला वना लेता है । वाह्य अनुभव के प्रत्येक अंश को अनन्तस्वरूप में कूद जाने का अवसर बनाना ही धर्म की निपुणता ( कौशल, साधन, art ) है । ये भासमान पदार्थ सभी एक ही प्रकार के हैं, इस कारण जहां वह एक पदार्थ का वाहिर में त्याग करना है, वहां तो उस त्याग को वह सव पदार्थों के आन्तरिक त्याग का चिन्ह वा संकेत वना लेता है।

शोचनीय और वज्रवत् मूढ़ वह अवश्य होगा जो हृदयवेधी तत्व को ऐसा नहीं पहचानता कि त्रिशूल—स्वार्थपरता व्यक्तित्व की मृत्यु ही - एक मात्र जीवन का नियम (नित्यजीता रहने का विधान) है । त्रिशूल सब व्यक्तित्व को परे हटा देता है । व्यक्तित्व (अहंकार) का दूर करना ही नित्य जीवन का पुनरुत्थान (प्रादुर्भाव) है । चिरञ्जीव रहो, आशीर्वादि ।

जीवन में मृत्यु—जव राम लाहौर से चला, उन दिनों विष्णु पुराण, जो अद्वैत वेदान्त का एक वड़ा ही (खुस्पष्ट) ग्रंथ है, उस का फारसी भाषान्तर वह पढ़ रहा था।

विष्णु पुराण के इसी फारसी भाषान्तर का लैटिन अनुवाद है जिस का उल्लेख एमर्सन, थोरो और उन के ही जोड़ तथा प्रवृत्ति के अन्य लोगों ने अपने लेखों वा ग्रन्थों में भारी उत्साह के साथ किया है । पञ्जावी विष्णु पुराण भी इसी फारसी रचना का भाषान्तर है । वावा काली कम्बली वाले का अनुभव-प्रकाश भी इसी पञ्जावी विष्णु पुराण का संशोधन वा परिवर्धन है । यह वह ग्रंथ है जो स्पष्ट करता है कि मनुष्य कितनेक उच्च शिखरों पर रहा करता था । और इस के पृष्ठों में हम उस (वावा काली कम्बली वाले, पुस्तक कर्त्ता) के अन्तर जीवन की भी झलक पाते हैं । यह उन कोड़ों दाम वाले कामों का रहस्य है कि जो काम आज उस एक के नाम से चुप चाप हो रहे हैं, जिस के समस्त वल और वर केवल एक काला कम्बल था, जो न तो वड़ा पण्डित (विद्वान) ही था, और जो इस डर से कि मैं किसी एक परिवार पर भार न जान पड़ूं द्वार २ से मधुकरी मांग कर खाया करता था । आज वावा काली कम्बली वाले के नाम पर प्रचण्ड वेग वाली (tem- pestuous) नदियों के ऊपर पुल वांधे जारहे हैं, सड़कें निकाली जारही हैं, धर्मशालायें वनाई जारही हैं । अन्न और वस्त्र ( गरीवों में ) वांटे जारहे हैं, विद्या दान दिया जारहा है, और मैदानों की जलती भुनती वालु पर तथा हिमालय की ऊंची शिखरों पर वक़ारों को काम दिया जारहा है ।

मनसूवों और पौलिसियों ( plans & policies-युक्तियों व कल्पनाओं ) से धुंव और धुंवे से वढ़कर और कुछ नहीं सिद्ध होता । सच्चा काम सांसारिक उपायों ( व चिन्ताओं ) से नहीं होता; ईश्वरीय जीवन द्वारा ही होता है । कुछ लोगों के लिये भीड़ के वीच अति प्रवृत-जीवन दिव्य जीवन

बनाने का अज्ञात (unconscious) सहायक होता है; कुछ के लिये एकान्त-सेवन ज्ञात (conscious) साहाय्य (साधन) है; कुछ के लिये विपत्तियां वड़ी सामयिक आशीर्वाद वत् होती हैं; कुछ सज्जन का हृदय पुस्तकें लिखते समय प्रभू की लेखनी से प्रभावित होता है ( वा हृदय पर प्रभू की लेखनी चुटकी भरने लग जाती है ); कुछ लोग व्याख्यान देते देते अपनी भीतरी अस्वच्छता ( कालुष्य ) को खो देते हैं, और प्रभु का प्रकाश उनके भीतर से चमकने लगता है; कुछ लोग घमसान-युद्ध में जुटे अपनी छाती को गोलीयों का निशाना वनाते हुए देह-अभ्यास त्याग देते हैं, और संसार में वीर पुरुष प्रसिद्ध होते हैं; कुछ लोग कला-कौशल में निरत हो अद्भुय सौन्दर्य को प्राप्त होते हैं । यहाँ तक कि चोर भी घर में सेंध लगाते समय यदि सफल होता है तो याद रखो (Mark ye!) उसे जितनी कुछ सफलता मिलती है वह सव उसके उसी सकंप, अकथ्य, शब्दविहीन (wordless) और विना विचारे आत्मसमर्पण की अवस्था को प्राप्त होने से और ऐसे ही अज्ञात अनन्त स्वरूप में पूर्ण निष्ठा और स्थिरांत (Suspense) पाने के कारण से होती है । और जो उसके कर्म की दुष्टता है, अर्थात् भासमान सम्पत्ति को जो सत्य मानना है, ऐसे दुस्साहस के लिये वह अवश्य अपने शिर पर दैवी-विधान का कोप वुलाता है ।

जिस परिमाण से हम जीवित हैं, अर्थात् सर्व रूप ( परमात्मा ) में मृतक ( निमग्न, dead in the all) हैं, उसी परिमाण से कार्य्य पूर्ण होता है । यह जीवन अर्थात् ( तुच्छ अहंकार की ) मृत्यु ही काम पूर्ण करती है न कि हमारा एकान्त सेवन, समाज, उपाय और युक्ति । मूर्ख

जीवनी-लेखक (biographers) वाह्य विशेषणों व आडम्बरों को ही देखते हैं, और सफलता के असली तत्त्व (मूलकारण) की उपेक्षा करके पूर्णकार्य ( निष्पत्ति ) का श्रेय कभी लेखन-शैली को देते हैं, तो कभी अनुयायियों की संख्या को, मानो जिस वृक्ष के तले बैठे मैं लिख रहा हूं, उस पर जो जो पक्षी बैठे हैं उनके आधीन मेरे कार्य की सफलता वा असफलता है । हमारे सुखचयर और स्थितियां कोई चीज़ नहीं हैं । वह प्राचीन ऋषि ठीक देखता है, जब योवा की विजय का कारण केवल आन्तर ( इन्द्र ) और वाह्य ( वरुण ) देवता को वतलाता है ।

सुदा समिन्द्रावरुणंचंसावतम् । ( ऋग्वेद )

प्रति दिन हम अपनी आँखों के सामने इसे देखते हैं जैसा कि बुल्लाशाह ने कहा है कि चिड़ियाँ बाज़ों को निगलती हैं (Sparrows vanquishing eagles), अर्थात् हमारे अति-प्रिय और होनहार (आशा जनक) बुद्बुदे (असार आडम्बर) फटते हैं, और हज़रत ईसा के शब्दों में, हमारी फेंकी हुई (rejected) ईंटें विशाल भवनों ( उच्च महलों ) की नीव के पत्थर की जगह सुशोभित (glorified) होती हैं । भास-मान परिस्थिति पर किसी प्रकार की निर्भरता या सांसारिक चुद्धि ( चतुरता ) हमारी सफलता ( विजयों ) में किञ्चित भी कारण नहीं होती । हमारे समस्त संवन्ध, मित्रतायें, सम्पत्तियें, आशायें, प्रतिष्ठायें और अन्य साधन ( अर्थात् मानो हमारा जगत् ) केवल कोरा धोखा और मिथ्या गूढ़ा-भिमान मात्र हैं । उनके तुच्छ ( अकिञ्चिता ) दर्शाने के लिये श्री सुरेश्वराचार्य या श्री शंकराचार्य की सी सूक्ष्मबुद्धि की आवश्यकता नहीं । जिनकी आँखें हैं उनके लिये प्रत्येक थोड़ा

सा अनुभव भी भयंकर तोप के समान वेदान्त की गर्जना में यों गर्जता है ।

तत्त्वमस्यादि वाक्यानां स्वतः सिद्धार्थ वोधनात् । अर्थान्तरं न संदष्टुं शक्यंते त्रिदशैरपि ॥

अर्थः—तत्वमसि आदि वाक्यों के स्वतः सिद्ध अर्थ जो हैं उनके वोधन से अतिरिक्त अन्य अर्थ देवता लोग भी नहीं कर सकते । अर्थात् यदि देवता लोग भी अपने स्वार्थ में आकर तत्वमसि आदि वाक्यों के अर्थ मोड़ तोड़ से कुछ का कुछ करना चाहें तो वह नहीं हो सकता. क्योंकि इन वाक्यों के अर्थ स्वतः सिद्ध हैं ।

हमारे महात्मापन, सुधारकपन, सम्मान, पद, संबन्ध, सब के सब गतरात्रि के स्वप्नों, वीते हुए जन्मों, मेघाकारों, संध्या के प्रेतों और रोगी मस्तिष्क के विचारों के चेताल ( कल्पित भूत-पिशाच ) से अतिरिक्त कुछ भी नहीं हैं । जब हम राम ( ईश्वर ) से प्रतिकूल ( out of tune, विच्छिन्न) हो जाते हैं, तब हमें कोई मार्ग नहीं दीखता, हम दैवी-विधान से च्युत होते हैं, और हमें तब दुःख उठाना ही पड़ता है । जब हम ईश्वर में तन्मय होते हैं,तब ठीक उपाय, ठीक प्रवृत्ति ठीक प्रवाह आप ही आप हमारे हृदय में उठते हैं, और हमें विभवपूर्ण भूप्रदेशों (landscapes), पर्वत के दृश्यों, शान्ति, समृद्धि और पवित्रता के निर्भरों (स्रोतों) के पास पहुंचाते हैं । अथवा ( यों कहना चाहिये कि ) हमारे भीतर आनन्द-मय तेज (ज्ञान-प्रकाश) स्वयमेव जीवन और प्रेम को हमारी ओर आकर्षित करता है ।

यह अहंकार की वलि का पाठ वैदिक काल की जटिल, भव्य और प्रभाव शाली यज्ञ-विधियों की तैह में छिपा हुआ है । मृत्यु में जीवन का विधान (The Law of Life in Death) मुझे इतना ही कठोर और ठोस (संसार) सत्य जान पड़ता है, जितना कि प्राचीन ऋषियों को रुद्र । इस की तनिक उपेक्षा करो कि घायल करने वाले तीर तुम्हारी बगलों और छाती में जा चुभते हैं ।

नमस्ते रुद्रमन्यव उतोत इष्वेनमः । वाहुभ्यां उत ते नमः ॥

अर्थः—हे रुद्र ( अर्थात् दैवी-विधान ) ! प्रणाम है तुम्हारे कोप ( रोप ) को, प्रणाम है तुम्हारे अमोघ वाणों को; प्रणाम है तुम्हारी अथक वाहुओं को ।

हम लोगों के प्रत्येक छोटे २ अनुभव में सारा इतिहास छिपा पड़ा है । हम लोग उसे पढ़ते नहीं । यदि हम उचित मूल्य दें, अर्थात् देहाभिमान ( local self ) को दूर करके साक्षात् ईश्वर को अपने शरीर भीतर से कार्य करने दें, तो बुद्ध भगवान् या हज़रत ईसा होजाना उतना ही सहल है जितना कि निर्धन पाल (Paul) बने रहना । एक ही कोप (म्यान) में दो तलवार हम नहीं रख सकते । यदि हम लोग वाहर से प्राप्त भय निन्दा-स्तुति में विश्वास न करने की शक्ति अपने भीतर उपार्जित करलें, यदि हम कार्य करने के ज्वर से मुक्त हो जांय, यदि जीतना व विजय प्राप्त करना हमारा उद्देश्य न हो, यदि सत्य के उपदेश की अपेक्षा स्वयं सत्य वनने में हम अपनी शक्ति अधिक लगायें, यदि हम ( अपने कार्यों के वीच ) उतना ही न्यून श्रेय ले कर कार्य किया करें जितना

कि सूर्य सर्वदा चमकने में लेता है, तो ईश्वरों के भी अधीश्वर ( स्वामियों के भी परम स्वामी ) हम हो सकते हैं । जिस क्षण हम लोग अपने विषय में दूसरों की बातों पर विश्वास करना आरम्भ करते हैं, उसी क्षण सब कुछ ( कर्म, किया इत्यादि ) निष्पन्द रूप हो जाता है । दुन्या नहीं है । संसार नहीं है । और सांसारिक जीवों की बातें भी कुछ नहीं है । ईश्वर ही एक मात्र सत्य है ।

कोई कोई समझते हैं कि दुःख दर्द ( Pain ) चारित्रो-न्नत्ति ( अर्थात् चित्त शुद्धि ) के लिये ऐसे ही आवश्यक हैं जैसे कि आग स्वर्ण की शुद्धि के लिये । विना प्रयास के प्रकृति आगे बढ़ने नहीं देती । शायद आज पर्यन्त बराबर ऐसा ही होता आया है । परन्तु क्या यह भी कोई युक्ति ( कारण ) है कि इसी से सदा ऐसा ही होता रहे । यह सत्य है कि कोई भी रसायन (chemical) बिना नवजात् अवस्था (Nascent state) में से गुज़रे के कार्य नहीं कर सकता । वीज अपने तत्व में परिघटित ( through reduction into the substance ) होकर उगता है । द्रव-दशा (melting point) में प्रवेश कर चुकने पर ही धातुओं को पीट कर जोड़ा जा सकता है । वाहरी दिखावट और भावों से युक्त मनुष्य प्रत्यक्ष आशाओं और उज्ज्वल भविष्य ( प्रत्याशाओं, prospects ) से उत्तेजित होकर व्यक्ति गत रूपों में अपना विश्वास जमाता आगे बढ़ता तो है, किन्तु तुरन्त ही वह अपने सिर पर कड़ी चोट या माथे पर भारी मुक्का ( घूंसा ) खाता है । चोट उस के चित्त को पिघला कर उसे पूर्व आरम्भिक अवस्था पर पहुंचा देती है, और इस प्रकार जीवन की शर्त पूरी होजाने पर सफलता उस के चरण छूने

आजाती है । चाहें रपोर्टें ( पुस्तकों में वर्णन ) कुछ ही क्यों न हों, यदि दैवी-विधान वास्तव में दैवीविधान है, तो विना ईश्वरादर्श को किसी प्रकार भूले या 'जीवन में मृत्यु' के मार्ग से च्युत हुए के हज़रत ईसा को कदापि कष्ट उठाना नहीं पड़ सकता था । हां पीड़ा भरे अत्याचार ने उसे तुरन्त सावधान कर दिया, और प्रत्यक्ष शूली पर चढ़ने से पहले कुछ घंटों तक कालावच्छिन्न स्वरूप (Timeless All) में अहंभाव के विलीन ( self-crucifixion ) रहने ने उसे सदा के लिये जीवित ( अमर ) बना दिया । परन्तु यह ज़रूरी नहीं कि उक्त पीड़न और दुःख के अनन्तर सफलता और आनन्द का आगमन ही हो; प्रायः केवल एक दुःख ही विपत्तियों की पंक्ति ( ट्रेन ) के आने की घोषणा दे देता है, और इसीसे कहते हैं कि कोई दुःख अकेला नहीं आता (misfortunes never come singly)। अगर एक ही विपत्ति की चेतावनी से हम शुभ अवस्था में चेत जायें अर्थात् जग पड़ें, तो जीवन और ज्योति का प्रकाश ( उजाला ) तत्काल हम पर आ पड़ता है,किन्तु यदि प्रारम्भिक दुःख की सर्दी हमारे नियम-भंग ( विधान-प्रतिकूलता ) को और भी वढ़ा दे, तो हम कठोर तर विपत्तियों को बुला लेते हैं । अत्यन्त कठोर, एवं संभवतः गुह्य दैवी-विधान के न समझे जाने व पालन होने से यह कलह अवश्य जारी रहता है, और हमारे शिरों पर मुक्के और चोटें खूव वरसाता है । ( इन चोटों से ) केवल वही वच निकलते हैं जो योग्यता की एक मात्र शर्त—"अकथनीय प्रारम्भिक अवस्था (nascent state)"—में से खूव गुज़र जाते हैं । किसी समय इंजनों में नियामक-यन्त्र (governors) नहीं हुआ करते थे, और वाष्प का वेग अपने वश के वाहर था ।

परन्तु अव जव इंजनों के लिये नियामक-यन्त्र निर्मित हो चुके हैं, तव शक्ति का व्यर्थ दुर्व्यय क्यों हो ? इसी प्रकार जीवन-विधान रूपी नियामक ( governor ) के पा लेने पर कोई कारण नहीं दीखता कि पीड़ा और कलह पशुओं के समान मनुष्यों पर क्यों राज्य करने पायें ।

इस भौतिक व्यक्तित्व में आसक्त होकर कार्य करना परिच्छिन्न सांसारिक शासनों की दृष्टि में तो कोई पाप नहीं, परन्तु विश्व के सर्वोच्च शासन के सामने यही एक मात्र पाप है और दूसरे दोष तो इस पाप की विभिन्न शाखायें मात्र हैं । संसार में केवल एक रोग और उसकी केवल एक ही दवा है । "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या" इस वेदान्तिक नियम का भंग ही सव व्याधियों की जड़ है, जो कभी एक दुःख का रूप धारण करती है और कभी दूसरे का । और इस की औपधि है अपने वास्तविक ईश्वरत्व को प्राप्त करना । एक वार अपने आप को धोखा देना ( अर्थात् निज स्वरूप को भूलकर दूसरे को अपना आत्मा मान लेना ) ही अन्य सव धोखों को आप से आप दिन प्रति दिन अधिक उत्पन्न कर लेना है ।

क्या राम का कथन एक एकान्त-सेवी की केवल भावना मात्र ( reverie = कल्पना मात्र ) है और समाज के लोगों के किसी काम का नहीं ? जलाशय के पानी के आस पास कोई हरियाली नहीं होती, किन्तु क्या यह भी कोई युक्ति हो सकती है जिसके आधार पर खेत अपने में पैदावार पैदा करने के लिये उस जल से सींचा जाना इन्कार करें ? राम केवल दैवी-विधान वतलाता है जो प्रत्येक का निजी जीवन वा

प्राण है । संसार के जितने नियम हैं-रासायनिक,जीव-सम्बन्धी, मानसिक और ऐसे ही अन्य सव-उन की में इस एक दैवी-विधान (उपरोक्त नियमों के नियम) के विशेष उदाहरण(सूचक) पाता हूं; इस से इतर और कुछ नहीं। कार्य-कारण का नियम (Law of Causation-कारणतावाद ), सांसारिक संबन्ध, आशायें और कर्तव्य, ये सब के सब केवल परिवर्तन-शील चिह्न (transition points), विचार का तात्कालिक प्रमाण (passing standards of judgments), पथिकाश्रम (रास्ते की सिरायें) वालिकाओं की गुड़ियें ( खिलौने ), और जलहीन अरव देश का यतम्मम (yatamimum) है। एक वार जहां हमारी चेतना के मंडल अर्थात् विज्ञान कोप में (आत्म देव का) सूर्य चमका; एक वार जहां हम पदार्थों की वास्तविक अवस्था से परिचित होगये;वहां सव कारण-श्रृंखला और नियम ग्रहों (planets) और उपग्रहों (satellitics) की भाँति हमारी चारों ओर घूमेन लग जाते हैं; नहीं नहीं, वे हमारे निकट इस प्रकार आते हैं, जैसे भोजन के समय वालिक अपनी माता के समीप ।

यथेह चुधिता वाला मातारं पर्युपास्ते ॥ (साम वेद)

जिस प्रकार वच्चे को चलना सीखना होता है, ठीक उसी प्रकार सरलता और स्वाभविकता पूर्वक मनुष्य को मरना सीखना होता है । इस मृत्यु से अभिप्राय वह अवस्था है कि जहां सेवक व्यक्तिगत सेवक नहीं रहता,शिष्य शिष्य नहीं,राजा राजा नहीं,मित्र मित्र नहीं, शत्रु शत्रु नहीं,लोगों के वचन ( promises)वचन नहीं,धमकियां धमकियां नहीं,सामान सामान नहीं, अधिकार अधिकार नहीं रहते, वल्कि जहां सव ईश्वर रूप ही हुआ होता है । वहां केवल एक मात्र सत्य है । जब हृदय इस

(सद्घाई) के साथ स्पन्दित होता वा धड़कता है तब सारा संसार उस हृदय के साथ स्पन्दित होता वा धड़कता है ।जब मन इस (सत्य) से विच्छिन्न होता है ( अथवा जब मन इस दैवी-विधान के साथ तालबद्ध नहीं होता ), अर्थात् जब मन वाह्य दृश्य वा नाम रूपों पर ही आश्रय करता है, तब सारा संसार उस मन से विरुद्ध स्पन्दित वा अनुकम्पित होता है । जब तक हम लोगों में अपने देह की रक्षा करने और अपने व्यक्तित्व की ओर से "शठं शाठ्यम" वत् बदला लेने की भावना जान पड़ती ( वा महसूस होती ) है, (तब तक समझ लो कि ) हम मृत वा गतप्राण हैं । क्लेशकारी वा दर्पहारी तथा अपमान कारी शब्दों को बिना ध्यान दिये छोड़ देने की शक्ति से बढ़ कर उत्तम प्रमाण महत्ता का कोई नहीं है ।

जब कोई सज्जन वकील के स्थान से जज की कुर्सी पर जा बैठता है, तब सारी कचहरी का भाव उसकी ओर वदल जाता है । इसी प्रकार जब हम वकील के स्थान से ऊपर उठकर निष्पत्त ईश्वरीय ज्योति की स्थिति में आते हैं, तब सारे संसार को हमारे साथ अपने संबन्ध पुनर्निर्धारित करने पड़ते हैं, और जिस प्रकार जहाज़ की गति के अनुसार दिग-दर्शक-यन्त्र (Compass) की सूई अपनी नोक को हटा लेती है, उसी प्रकार हमारे साथ उनके व्यवहार का ढँग भी बदलना ज़रूरी हो जाता है । क्या लोग आप को ठगते हैं ! तो इसलिये, कि आपने. अपने में से ईश्वर को ठग कर निकाल वाहिर किया है । प्रोफैसर ( अध्यापक ) जेम्स ने बहुत ही ठीक अवलोकन किया है:—"जीवन इसी वात पर अवलंभित है कि प्रत्यक्ष भौतिक संवेदनों का प्रभाव. हमारे कार्यों पर दूरस्थ बातों की भावनाओं के प्रभाव ideas of

remoters facts) की अपेक्षा नीचतर पड़े । पशु केवल भौतिक संवेदनाओं द्वारा ही संचलित वा प्रेरित होते हैं । किन्तु मनुष्य की दिव्यता (ईश्वर) का पुनरुद्धार तब होता है, जब अदृष्ट नियम-समूह (laws), नहीं नहीं, वह दैवी-विधान, जो पाशविक मनुष्य के लिये अन्धकार में ढका है, मनुष्य के लिये एक ठोस और कठोर तर तत्व हो जाता है, और दूसरी ओर भासमान, क्षणभंगुर रूप,नाम मात्र प्रत्यक्ष मुद्रा (hard cash) इत्यादि, जो मूर्खों के मार्ग दर्शक रूप नक्षत्र हैं, उस के लिये भगवत्-उपस्थिति के प्रकाश में विलुप्त हो जाते हैं ।

या निशा सर्व भूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥

(भगवद्गीता अ० 2 श्लोक० 69

अर्थः—जो सव प्राणियों के लिये रात्रि है,उसी में संयमी पुरुष जागता है, और जिस में सव प्राणी जागते हैं, वही ज्ञान-नेत्रयुक्त मुनी की रात्रि है ।

दिव्य विनय—दैवी-विधान

खलील आँ राज़ वा आतिश हमे गुप्त, अगर मूए-ज़ मन वाक्रीस्त दर सोज़ । वदो में गुप्त आँ आतिश कि ऐ शाह ! व पेशत मन व मीरम तो दर अफरोज़ ॥

भावार्थः—अब्राहीम जब जीते जी जलाया जाने लगा तो उस ने अग्नि देवता से ऐसे प्रार्थना कीः—"यदि मेरा

देह-अध्यास ( व्यक्तिगत अहंकार ) वाल वरावर भी इस देह में सटा रहा हो, तो मेरी निरन्तर यही विनय है कि "कृपया इसे कदापि न छोड़ो, अवश्य जला डालो" ! आग बुझ गई, मानो उसने भक्ति पूर्वक ( वा सत्कार पूर्वक ) यह उत्तर दिया कि "ऐ मेरे स्वामी ! आप जीते रहिये और मुझे आप के चरणों पर मर मिटने दो ।"

ऐसा दैवी-विधान है । शिष्टाचार में, विनय में, ईश्वर किसी से हारने वाला नहीं ।

ऋचं ब्राह्मं जनयन्तो देवा अग्रे तदब्रुवन । यस्त्वेवं ब्राह्मणो विद्यात्तस्य देवो असनवशे ॥ (यजु० संहिता)

सर्वाणयेनं भूतान्यभित्तरन्ति ॥ ( बृहदारण्यक उप० ) ॥ सर्वऽस्मैदेवा वलिमावहन्ति ॥ ( तै० उप ) ॥

अर्थः—आदि में ही सृष्टि-उत्पादक देवों ने ब्रह्म में रुचि रखने वालों ( तीव्र जिज्ञासुओं ) से बोलाः—"हे ब्रह्म से अभिन्न ब्राह्मणो ! जो कोई भी इस प्रकार ब्रह्म को जान लेगा, उसकी सेवा में हम देवताओं को आज्ञाकारी अनुचर की भाँति उपस्थित रहना होगा।" "उस के सिंहासन के आगे भूतमात्र उपहार ला अर्पित करते हैं ।"

उस की वेदी पर सव विधान (देव) भेंट चढ़ाते हैं ।

वेदान्त पर एक भारी आक्षेप । वेदान्त हृदय के भावों को मार डालता है और सौन्दर्यावलोकन की शक्ति को नष्ट कर डालता है; यह निठुरता (दया वा प्रेम-भाव की शून्यता), और जड़-प्रकृति के समान अटल वा सीधा

(rectilinear) आचरण सिखलाता है, और संबन्धियों का कोई ख्याल नहीं कराता है ।

हां, यह (वेदान्त) ऐसा करता है । इस के सच्चे भक्त के लिये सत्य, वास्तविक तत्व का इतना भारी विस्तार (विराट रूप) तो अवश्य होजाना चाहिये कि जिसके सामने पदार्थ, व्यक्तियां, कार्य-कारणत्व, लोगों के मत लुप्त प्राय (vanishing quantities) बन जायँ । परन्तु यदि मानव वा अधिक तर पाशव भावनायें सव खुल कर साफ हो जायँ, तो उनके स्थान पर दिव्य भावनायें ( विचार ) ज़ोर से प्रवाहित होने लगती हैं । नकली ज्योतियों के स्थान पर हास्यमुख (प्रफुल्लित) सूर्य ज्योति आ जाती है जो यद्यपि किसी व्यक्ति विशेष का पक्ष वा सत्कार तो नहीं करती,तथापि इदं सिद्धं सव को प्रसन्नता में भिगो डालती है ।

एक बहुत बड़ा आध्यात्मिक अनुभवी अंग्रेज़ कहता है कि "पहले मैं भी कभी नहीं मान सकता था, किन्तु अब इस सव को मैं स्वयं देख रहा अर्थात् अनुभव कर रहा हूं, कि जब अपने ( व्यक्तित्व ) विषय सोचना नितान्त त्याग दिया जाय, तो इस के समान कोई सुख नहीं, इस के समान कोई अवस्था नहीं । परन्तु आप को यह अंशतः न करना चाहिये । जब तक अहंकार ( देहाध्यास ) का किंचित् लेश ( अणु ) बना रहेगा, तब तक यह सव को नष्ट भ्रष्ट कर देगा । आय को यह सव ( देहाध्यास ) पीछे छोड़ना होगा, और अपने व्यक्तित्व ( अहंकार ) और मन के साथ उतनी ही सहानुभूति रखनी होगी जितनी कि किसी अज्ञात पुरुष के प्रति रक्खी जाती है, इस से न किंचित् न्यून न अधिक ।

वर्षों के अपने विचारों और मन्तव्यों (plans and purposes) को छोड़ कर यश, कीर्ति, एवं चिर परिचित स्वरों के नाद को त्याग दो; आलिंगन करने वाली प्यारी भुजाओं के आलिंगन से वियुक्त होकर अपने इस लालन-पालन किये हुए अहंकार को इस प्रकार पर रख दो जैसे हम अपने दस्तानों को खींच कर उतार देते हैं; रोग-भय को किनारे करके और "लोग हमारे मृत्यु को समझेंगे" इस भावना की आशा (hopes of appreciation)को निकाल वाहर कर दो; अपने आप से अशरीरी वन वाहर हो जाओ; दीर्घ काल से रचित आवरण अर्थात् वाहरी कोप को भूसी वत छोड़ दो; वैराग्य के द्वार से प्रभुत्व के प्रसाद में प्रवेश करो;ज्ञान के द्वार से मुक्ति के खुले उपवन में आओ;सव का संन्यास कर दो; जो कुछ अपना है उस से मन को निरासक्त करदो; निर्धन और निःस्वत्व वन जाओ;फिर देखो तुम सव वस्तुओं के प्रभु और अधिराज होजाते हो कि नहीं ।

श्रीश्चते लक्ष्मीश्च पत्न्या वहोरात्रे पार्श्व नक्षत्राणि रूपमश्वनौ व्यात्तम् । इष्णानिनपाणामुं ( यजुर )

अर्थः—जय (श्री) और सम्रृद्धि तुम्हारी दासियां हैं । दिन और रात तुम्हारे दक्षिण और वाम भाग ( पार्श्व ) हैं । नक्षत्रों में शोभा (कान्ति) तुम्हारी दृष्टि (दर्शन) है । स्वर्ग मर्त्य (पृथ्वी और आकाश) तुम्हारे खिले हुए ( अलग 2) अधर (ओष्ट) हैं !" यदि किसी वस्तु की तुम्हें इच्छा करनी है तो यह इच्छा करो ।

ॐ ! ॐ !! ॐ !!!