श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

निश्चलचित्त ।

भाग 15 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 15 · अध्याय 2 / 5

निश्चलचित्त ।

वा स्थिरबुधी ।

( क्लास लैक्चर, फरवरी 15, सं० 1903 )

जिस दिन प्रश्न किया गया था कि "क्या कोई मनुष्य इस युग में वेदान्त-तत्व का अनुभव कर सकता है ? और उस पर किसी ने यह सुझाया था कि वेदान्त-तत्व के अनुभव करने के लिये मनुष्य को अमुक पदार्थ का त्याग करना ज़रूरी है । इसके लिये उसे अवश्य हिमालय के जंगलों में जाना चाहिये, किन्तु राम कहता है, नहीं, आपको इस निमित्त जंगलों में जाने की कुछ ज़रूरत नहीं ।

आजकल प्रायः समयाभाव की शिकायत बहुत सुनी जाती है । लोग कहते हैं " हमारे पास ( ईश्वर-भजन निमित्त) कोई समय नहीं है, हमको तरह तरह के काम देखने पड़ते हैं; हमारे बंधु-मित्र हमारा समय ले लेते हैं" । एक प्रार्थना है कि "हे ईश्वर ! मुझे अपने शत्रुओं से बचा," किन्तु आधुनिक काल के मनुष्यों को जो प्रार्थना करना चाहिये वह ठीक यह होगी- "हे प्रभो ! मुझे अपने मित्रों से बचा ।" मित्रगण हमारा सारा समय छीन लेते हैं; उधर चिन्ता शोक और दुःख हमारा समय ले लेते हैं । हमें अपने वाल वच्चों और सहकारियों की भी देख भाल करनी पड़ती है, मिलने वालों का स्वागत करना और दूसरों से मिलने जाना पड़ता है,कुछ पढ़ना भी तो पड़ता है, ऐसी दशा में हम किस तरह आध्यात्मिक उन्नति के लिये समय निकाल सकते हैं ? होह कर्त्तव्य (फर्ज़,

duties) ! लोगों का समय ले लेते हैं । आराम से भोजन करने का समय भी तो लोगों को इनसे नहीं मिलता । ( इस प्रकार ) कर्त्तव्य के नाम आप की सारी ज़िन्दगी विदीप्त हुए रहती है । परन्तु हमें यह अपने से पूछना चाहिये, कि ये कर्त्तव्य (duties) कहां से आते हैं ? कौन हम पर यह कर्त्तव्य आ डालता है ? हम स्वयं । वास्तव में आप ही हो जो अपने कर्त्तव्य निर्माण कर लेते हो । क्रूर स्वामी के समान कर्त्तव्यों को आप पर न आ पड़ना चाहिये । दफ्तर के काम की देखभाल करना आप अपना कर्त्तव्य समझते हैं, पर दफ्तर का काम आप पर कौन डालता है ? आप स्वयं । इस प्रकार यदि आप कर्त्तव्यों के स्वरूप को अन्ततः विचारोगे (या देखोगे), तो आप को पता लग जायगा कि आप अपने स्वामी आप हो. और ये सव कर्त्तव्य जो आप को पूर्ण अपना गुलाम ( दास ) बनाये हुए हैं, आप ने स्वयं रचे हुए हैं । यदि एक वार भी आप ऐसा भान ( वा निश्चय ) करलें कि "संसार में कोई पदार्थ नहीं जो मुझे वांध सके, प्रत्येक वस्तु वास्तव में मुझ से उत्पन्न होती है," तो आप बड़े सुखी हो सकते हैं, अपनी स्थिति को बड़े मज़े से ठीक कर सकते हैं ।

डाक्टर जोहनसन के पास एक मनुष्य आकर बोलाः-" डाक्टर ! डाक्टर !! मैं नाश हुआ, मैं गया गुज़रा, मैं किसी काम के योग्य नहीं रहा, मैं कुछ भी नहीं कर सकता । इस दुनियां में मनुष्य क्या कर सकताहै ? डाक्टर जोहनसन ने उस से पूछा कि क्या हुआ, मामला क्या है ? अपनी शिकायत के लिये सवव ( कारण ) तो वताने चाहियें । वह मनुष्य इस प्रकार अपनी दलीलें पेश करने लगा । मनुष्य इस संसार में अधिक से अधिक सौ वर्ष जीता है । और इस अपार व

अनन्त काल के सामने भला सौ वर्ष क्या हैं ? इस पर आधी आयु तो निद्रा में वीत जातीहै। आप जानते हो कि हम लोग प्रतिदिन सोते हैं, हमारा वाल्य-काल एक लम्बी निद्रा है। और हमारी वृद्धावस्था का काल भी शिथिलता ( debility ) और असमर्थता का काल है जवकि हम कुछ भी नहीं कर सकते; फिर हमारा यौवन-काल दुर्विचारों, भाँति भाँति के प्रलोभनों में और दुरुपयोग में ख़र्च हो जाता है। इस से जो कुछ समय वच निकलता है वह क्रीड़ा कलोल में ख़र्च होजाता है; हम लोग बहुत खेलते हैं; इस से जो कुछ समय वच निकलता है वह शौच क्रिया करने में, खाने पीने इत्यादिमें नष्ट होजाताहै; और उससे जो कुछ वच निकलता है, वह समय क्रोध, ईर्ष्या, शोक चिन्ता, दुःख और पीड़ा में चला जाता है। यह सब हर एक मनुष्य के लिये स्वाभाविक ही हैं। इससे भी जो वचा रहता है, जो किञ्चित सा समय इसके वाद हमें मिलता है, वह वालवच्चों, भित्रों और वन्धुओं के मिलने मिलाने वा देख भाल में चला जाता है। ( ऐसी दशा में ) मनुष्य इस संसार में भला क्या कर सकता है ? जो मरते हैं उनके लिये हमें रोना पीटना पड़ता है, और नवागतों के जन्म पर खुशी मनानी पड़ती है। इस प्रकार हमारा सारा समय नष्ट जाता है, और ( ऐसी हालत में ) मनुष्य कोई पक्का और यथार्थ काम भला कैसे कर सकता है ? अपने ईश्वरत्व को अनुभव करने के लिये कैसे समय निकाल सकता है ? हम तो निकाल नहीं सकते। परे हटाओ इन गिरजाघरों को, दूर करो इन धार्मिक गुरुओं और उपदेशकों को, इनको कह दो कि लोग धर्म ( ईश्वर-भजन ) के लिये कोई समय नहीं निकाल सकते; अपने ईश्वरत्व को अनुभव करने के लिये उनके पास कोई समय नहीं है। यह हम लोगों के सामर्थ्य से वाहिर है।" डाक्टर

जोह्नसन इन शब्दों पर हंसा नहीं, उस ने इस आदमी को तिर- स्कारा व धिक्कारी नहीं, वह केवल रोने लग पड़ा और उसके साथ सहानुभूति करते हुए बोला-"मनुष्यों को आत्मघात कर लेना चाहिये, क्योंकि उन के पास परमार्थ के लिये कोई समय नहीं। भाई! आपकी इस शिकायत के साथ मुझे एक और शिकायत है, मुझे इस से भी बुरी शिकायत करनी है"। इस मनुष्य ने डाक्टर जोह्नसन से कहा कि आप अपनी शिकायत कहिये। डाक्टर जोह्नसन रोने लगा, दिखावटी रुदन करते हुए बोला - "यह देखो, मेरे लिये कोई ज़मीन वा भूमि नहीं रही, कोई ऐसी भूमि वची नहीं जो मेरे खाने भर को अन्न उत्पन्न कर सके, मैं तो गया गुज़रा और मरा।" वह ( आदमी ) बोला, "अजी डाक्टर साहिब! यह हो कैसे सकता है ? मैं ने माना कि आप बहुत अधिक खाते हैं, दस मनुष्यों जितना खाते हैं. फिर भी इस पृथिवी पर इतनी भूमि है कि जो आपके उदर के लिये अन्न उपजा सके; आप के शरीर के लिये अन्न या शाक ( तरकारी ) उत्पन्न करने को काफी भूमि है। आप शिकायत क्यों करते हैं ?" डाक्टर जोहसन ने उत्तर दिया "अरे देखो तो, आप की यह पृथिवी ही क्या चीज़ है ? यह भूमि कुछ चीज़ नहीं। ज्योतिर्गणित में यह पृथिवी एक विन्दु मात्र मानी जाती है। जब हम तारों और सूर्यों के अन्तर का हिसाव लगाने वैठते हैं, तो हम इस पृथिवी को कुछ भी नहीं अर्थात् शून्यवत् मानते हैं; फिर इस शून्य रूप पृथिवी की तीन चौथाई तो जल से पारेपूर्ण है, और इस पर वचता ही क्या है ? ज़रा ध्यान दो! एक बहुत बड़ा भाग तो ऊसर वालू से भरा पड़ा है; एक बड़ा भाग ऊसर पर्वतों और पत्थरों ने ले रक्खा है; एक बड़ा भाग तो झील और नदियों ने दवा रक्खा है; फिर इस भूमि का बहुत सा भाग लन्दन

जैसे बड़े २ नगरों से घिरा पड़ा है; उस पर सड़कें, रेलें, गली कूचे इस पृथिवी का एक बहुत बड़ा भाग ले लेते हैं। ( अव बतलाइये, ) इस पृथिवी का कौन सा भाग मनुष्य के लिये छूट रहा है ? ( अर्थात् कोई नहीं ) । तो भी हम मान लेते हैं कि इन सब से कुछ अवश्य मनुष्य के लिये वचा है। परन्तु कितने ऐसे प्राणी हैं जो इस वचे हुए तुच्छ पृथिवी-तल से लाभ उठाना चाहते हैं ? इसमें बहुत से पक्षी, बहुत से कीड़े मकौड़े, और बहुत से हाथी घोड़े हैं जो सब के सब इस वचे हुए उपजाऊ भूमि के भाग पर अपने को जीते रखना चाहते हैं, निर्वाह करना चाहते हैं; बहुत ही थोड़ा भाग मनुष्य के हिस्से में आता है। फिर संसार में मनुष्य भी कितने हैं ? एक लन्दन को देखो, लाखों करोड़ों आदमी भरे पड़े हैं, ज़रा इस भारी जन-संख्या को तो देखो, ये सव के सब इस संसार वा वड़े शून्य ( विन्दु ) के तुच्छ ( अत्यन्त अल्प ) भाग पर निर्वाह करना चाहते हैं। तव मेरी तृप्ति के लिये भूमि कैसे ( व कहां से ) अन्न उपजा सकती है ? मेरा तर्क तो मुझे इस निराशा और शोक भरे निष्कर्ष पर पहुंचाता है कि मुझे मर जाना उचित है, क्योंकि मेरी उदरपूर्ति निमित्त अन्न उपजाने योग्य भूमि मुझे नहीं मिल सकती।" इस पर वह मनुष्य बोला-"डाक्टर साहिब! आपकी दलील (युक्ति) ठीक नहीं, आपका तर्क तो ठीक जान पड़ता है, परन्तु आप के इस तर्क के होते हुए भी यह पृथिवी आपको धारण कर सकती है।" तव डाक्टर जोहसन ने उत्तर दिया-"अजी महाराज! यदि मेरी यह शिकायत वे बुन्याद ( वा युक्तिहीन ) है, तो आप की शिकायत भी-कि आध्यात्मिक आहार पाने के लिये समय नहीं मिलता-युक्तिहीन है। यदि मुझे भौतिक भोजन देने को यह भूमि काफी ( पर्याप्त ) है, तो आपके

मन्तव्य के लिये समय भी पर्याप्त है, यह भूमि आप को आध्यात्मिक भोजन दे सकती है"। इस प्रकार राम भी इस प्रश्न का कि "वर्तमान सभ्यता हमें कोई आध्यात्मिक भोजन पाने का समय नहीं देती" यही उत्तर देता है। इस प्रश्न का उत्तर राम उसी प्रकार देता है जिस प्रकार वर्षों पहिले डाक्टर जोहसन ने दिया था। और वर्तमान दशा में भी आध्यात्मिक उन्नति करने को काफी समय आपके पास है। आपके पास काफी समय है यदि आप उसका ठीक उपयोग करें।

एक वार ( भारत वर्ष में ) एक आदमी घोड़े पर सवार हुए कहीं दूर जा रहा था। मार्ग में उसे एक रहट (Persian wheel) मिला। आप जानते हैं कि भारत वर्ष में पृथिवी से पानी निकालने के लिये एक प्रकार की रहट होती है जिसे हम फारस की चक्की (Persian wheel) कहते हैं। जब रहट द्वारा पानी कुऐं से निकाला जाता है, तव एक प्रकार का शब्द होता है। जब रहट द्वारा पानी कुएँ से निकल रहा था, तव यह मनुष्य अपना घोड़ा वहां पानी पिलाने को ले गया। घोड़े को उस प्रकार के शब्द सुनने का अभ्यास न था, इस लिये वह उसे सुन कर चमका और उस ने पानी न पीया। जो किसान उस रहट को चला रहे थे, उनको उस घुड़सवार ने वह शब्द वन्द करने को कहा। किसानों ने रहट को वन्द कर शब्द वन्द कर दिया। शब्द तो वन्द होगया, पर शब्द वन्द होने के साथ २ जल का "आना भी वन्द होगया। अव पीने को घोड़े के लिये जल ही न था। घोड़ा पानी के कुंड की ओर बढ़ा, पर वहां पानी विलकुल था ही नहीं। इस पर यह घुड़सवार उन किसानों से यों मुखातब होकर बोला-"ऐ

विचित्र किसानों! तुम अजीव आदमी हो! मैं ने तो तुम्हें शब्द वन्द करने को कहा था, पानी वन्द करने को नहीं; तुम लोग परदेशी पर इतनी कृपा भी नहीं करते जिससे वह अपने घोड़े को पानी पिला सके ?" किसान बोले:-"महाराज! हम लोग हृदय से आप की सेवा सुश्रुपा करना चाहते हैं और आप के घोड़े को पानी देना चाहते हैं, किन्तु आप का कहना मानना हमारे सामर्थ्य से वाहिर है। यदि आप पानी चाहते हैं, यदि आप अपने घोड़े को पानी पिलाया चाहते हैं, तो शब्द के होते हुए ही आप अपने घोड़े को पानी पीने को मजबूर कीजिये, क्योंकि जब हम शब्द वन्द करते हैं, तो पानी भी वहीं रुक जाता है, अर्थात् पानी भी प्राप्त होने से रह जाता है, पानी तो नित्य इस शब्द के साथ २ ही आता है।" इसी प्रकार राम कहता है कि अगर आप वेदान्त का अनुभव करना चाहते हैं, तो सव प्रकार के शब्दों ( कोलाहल ) के वीच में, भाँति भाँति के कष्टों ( भंभटों ) के वीच में ही उसे कीजिये। इस जगत में आप कभी भी ऐसी स्थिति में अपने को नहीं पा सकते जहां वाहिर से कोई शब्द ( खट खट ) या दुःख भंभंट न हों। चाहे आप हिमालय की शिखरों पर जाकर रहें, वहां भी अपने गिर्द आप भंभटें पायेंगे। चाहे आप असभ्य ( जंगली ) पुरुषों के समान रहें, वहां भी अपने गिर्द आप भंभटें पायेंगे। जहां जी चाहे आप जायं, दुःख भंभट आप को नहीं छोड़ेंगे, ये आप का पीछा कभी नहीं छोड़ेंगे, वे सदा आपके साथ होंगे। यदि आप वेदान्त को अनुभव करना चाहते हैं, तो जब आप के इर्द गिर्द भंभट रूपी रहट का शब्द खूब जारी हो रहा हो, तभी उसे कीजिये। जितने महापुरुष हुए हैं, वे सव के सव अपमान कारी ( वा तुच्छ निराशा जनक ) परिस्थिति और दशा के होते हुए ही

हुए हैं: वास्तव में जितनी अधिक कष्टभरी दशा होती है और जितनी अधिक कठिन ( वा कष्ट-साध्य ) परिस्थिति होती है, उतने ही प्रवल मनुष्य और उतने ही अधिक वलवान् लोग हो जाते हैं जो उन अवस्थाओं में से निकलते हैं। अतः इन वाह्य दुःखों और चिन्ताओं को आनन्द से आने दो। ऐसे अड़ोस पड़ोस में ही वेदान्त को व्यवहार में लाओ। और जब वेदान्त तत्व में रहने लगोगे, अर्थात् जब वेदान्त आप के आचरण में आजावेगा, तो आप देखोगे कि ये अड़ोस पड़ोस और अवस्थायें आप से हार मानेंगी, आप के आगे सिर झुकायेंगी, आप के अधीन हो जायंगी, और आप उन के स्वामी वन जाओगे। क्या यह समाज है जो हमें नीचे गिराती है ? क्या यह दुनियां है जो हमें नीचे दवाय रखती है ? नहीं, आप तो इस दुनियां में रहते ही नहीं। प्रत्येक व्यक्ति तो अपनी रचित चुद्र दुनियाँ में रहता है। कितने थोड़े ऐसे पुरुष हैं जो इस संसार में रहते हैं; इस विशाल संसार में बहुत ही थोड़े मनुष्य रहते हैं; आप तो अपनी रचित छोटी सी दुनियाँ में रहते हैं। आप लोगों ने अपनी २ तुच्छ व्यक्ति के चारों ओर अपनी २ दुनियाँ वनाली है। कितने ऐसे लोग हैं जो अपने छोटे से घरेलू-वृत से परे कुछ नहीं जानते, कितने ऐसे लोग हैं जो अपनी जाति की सृष्टि के वाहिर कुछ नहीं जानते। कितने ऐसे लोग हैं जिनको अपने पति पत्नी या वाल वच्चों की रचित छोटी सृष्टि के वाहिर कुछ मालूम नहीं। कम से कम आप इस विशाल संसार में तो रहिये; इन छोटी सी तुच्छ दुनियाँओं से तो ऊपर उठिये। यह विशाल ( विस्तृत ) सृष्टि तो आप को नीचे नहीं दवाय रखती; ये आप की अपनी रचित छोटी छोटी सृष्टियां हैं जो आपको नीचे दवाय रखती हैं; यदि आप इस ( छोटी सृष्टि )

से ऊपर उठ सकते हैं, तो सारी दुनियाँ आप के अधीन हो जायगी, आप के आगे हार मान लगी।

वस्तुतः कर्म क्या है, इसको विचारने से हमारे निज निर्मित चुद्र संसार का उदाहरण मिल जायगा। आप कहते हैं कि हम अति प्रवृत्त रहने हैं, और राम ने इस देश में लोगों को समयाभाव की शिकायत करते देखा है, यद्यपि राम यह देखकर विलास को प्राप्त (amused) हो रहा है कि लोग अपनी सारी ज़िन्दगी तो समय का खून करते ( वक्त काटते ) फिरते हैं और तिस पर समयाभाव की शिकायत करते हैं। उन्हें वक्त तो इतना काफी मिलता है कि उनके सिर और भुजा पर वह भारू हो जाता है, और फिर भी वे कहते हैं-"हमारे पास समय नहीं।"-आप अपने संकल्पों से समय निकाल रहे हो, (you are driving out time from your desires); आप समय पर शासन कर रहे हो, और फिर भी कहते हो कि "समय नहीं है"। यह कैसी वात है ? कर्म के रूप के विषय में जो भ्रम आपको हो रहा है, वही आप की शिकायत का कारण है। आप 'कर्म' उसको कहते हो जो वास्तव में 'कर्म' नहीं है। भिन्न २ लोग कर्म की भिन्न २ परिभाषा करते हैं। विज्ञान या यन्त्र-विद्या (mechanics) के लेखक कर्म की एक प्रकार परिभाषा करते हैं, और हम लोग दूसरी प्रकार उनके मतानुसार आप यदि समधरातल पर चल रहे हो, तो कोई कर्म ( वास्तव में ) नहीं कर रहे; अथवा गेंद यदि चिकनी ( साफ ) समतल भूमि पर लुढ़क रहा हो तो वह (वास्तव में) कोई कर्म नहीं कर रहा है। आप जभी कर्म करते हो जव चढ़ाई पर ऊपर चढ़ते हो; जव आप समधरातल पर चलते हो, तव कोई कर्म ( वास्तव में ) नहीं करते, यह विचित्र ढँग

कर्म की परिभाषा करने का है। अध्यात्म-शास्त्र कर्म की परिभाषा दूसरी रीति से करता है। अध्यात्म-शास्त्र के अनु- सार आप तभी कर्म करते हो जव आपका मन उस कर्म में प्रवृत्त है: पर यदि आप कोई कर्म ( हाथ से तो ) कर रहे हो और आप का मन उस में लगा नहीं है, तो आप वास्तव में कर्म नहीं कर रहे। आप श्वास लेते हो, किन्तु अध्यात्म- शास्त्रानुसार श्वास लेना कोई कर्म नहीं है; खून आप की नाड़ियों में वह रहा है, यह एक हिसाव से तो कर्म है, किन्तु अध्यात्म-शास्त्रों के मतानुसार यह कर्म नहीं। अध्यात्म- शास्त्रवेत्ता "कर्म वास्तव में क्या है" इसके दिखलाने के लिये एक वड़े मार्के का उदाहरण देते हैं:-

एक पुराना अभ्यासवृद्ध योधा था, जो सैनिक शिक्षा और कवायद में इतना अभ्यस्त था कि ड्रिल ( कवायद ) की क्रियाएं उसके लिये स्वाभाविक हो गई थीं, अर्थात् वह कवायद की क्रियाएं यन्त्र वत् किया करता था। दूध का भारी मटका या कुछ और खाद्य वस्तुएं हाथ में लिये यह ( योधा ) वाज़ार में जा रहा था। वह अपने हाथों में या कन्धों पर भारी घड़ा ( दूध का ) ले जा रहा था। वहां वाज़ार में एक पक्का मसखरा (practical joker) आ पहुंचा। उसने चाहा कि यह सब दूध या अन्य स्वादिष्ट खाद्यपदार्थ ( उसके हाथ वा कंधे पर से ) नाली वा परनाली में गिर जायं। अतः यह मनुष्य एक किनारे खड़ा हो गया, और वहीं बोल उठा "अटेनशन! अटेनशन!! (attention, attention सावधान हो! सावधान हो)।" आप को मालूम है कि जव हम अटेनशन (attention) कहते हैं, तो हाथों को नीचे गिरजाना चाहिये। इस अभ्यासवृद्ध योधा ने यों ही कि वह

शब्द 'अटेनशन' सुना, वों ही उसके हाथ स्वतः नीचे गिर गये, और सब दूध या अन्य वस्तुएं, जो उसके पास थीं, नाली में गिर गई। वाज़ार में सभी राही और दुकान्दार इससे पेट भर हंसे। आप देखते हैं कि जव उसने अटेनशन (सावधान) का शब्द सुना, तत्काल उसने हाथ नीचे गिरा दिये, अध्यात्म- शास्त्र के कथनानुसार उसने कुछ काम नहीं किया, इसको तो प्रति-क्रिया (reflex action) कहते हैं। प्रति-क्रिया कोई कर्म नहीं है, क्योंकि मन उसमें नहीं लगा होता।

अव राम आप से पूछता है कि "कृपा करके वताइये, आप चौवीस घंटे में कितना 'काम' करते हैं ?" जव आप खाना खाते हैं तो क्या यह 'कर्म' है ? नहीं। जव आप और वीसियों काम करते हैं, तो जिस अर्थ में अध्यात्म-शास्त्र कर्म की परिभाषा करता है आप उसी अर्थ में क्या 'कर्म' करते हैं ? जव आप टहल रहे हैं, तो क्या कर्म कर रहे हैं ? और भी अनेक काम, जिनके नाम लेने की राम को आवश्यकता नहीं, जव आप करते हैं, तो क्या आप कर्म करते हैं ? नहीं, कदापि नहीं। आपका मन वा ध्यान ( उस काम में ) लगा नहीं था। जो काम आपके हाथ में है यदि आपका मन वा ध्यान उस में नहीं है, तो आप कर्म नहीं कर रहे। आप केवल आलस्य में समय काट रहे हैं। क्या आप उस समय को नहीं वचा सकते ? क्या आप उस का उपयोग नहीं कर सकते ? किन्हीं कामों में हमारा मन पूर्ण लग जाता है, और कुछ काम करते समय हमारा मन आधा लगता है। जिस काम में आप का मन वा ध्यान आधा लगता है, आप आधा कर्म कर रहे हैं, अपना वाकी आधा ध्यान आप उपयोग में लासकते हैं; और जव आपका ध्यान नितान्त अप्रवृत्त ( कर्म-कार्य शून्य ) है,

तव आप अपने पूर्ण ध्यान को काम में लगा सकते हैं। इस प्रकार अपने मन के ध्यान ( अर्थात् चित्तवृत्ति ) का उपयोग कर आप अपने जीवन की उन्नति कर सकते हैं। अपने अयुक्त ( अप्रवृत्त-unengaged ) ध्यान का उपयोग न कर जितना काम आप दिन भर में कर सकते हैं, उस की अपेक्षा अधिक 'कर्म' ( आप ध्यान के उपयोग से ) कर सकते हैं

इसे अव एक दूसरे उदाहरण से स्पष्ट किया जाता है।

दो लड़के, जो आपस में मित्र थे, एक चार रास्ते में परस्पर मिले। एक ने अपने मित्र से आग्रह किया कि वह उस के साथ चर्च ( गिरजा घर ) चले और वहां उपदेश अर्थात् कोई गान अथवा और कुछ सुने। दूसरे ने खेलने का गैसे अनुरोध किया। "गिरजाघर जाने और वहां शुष्क स्वर भरा उपदेश सुनने में समय नष्ट करने की क्या आवश्यकता? हम लोगों के लिये खेलना कहीं अच्छा होगा।" वे दोनों सहमत न हुए, इसलिये एक तो गिरजे को चला गया, और दूसरा खेलने की धुन में निकला। परन्तु जो लड़का गिरजा घर को गया, जव पादरी साहिव के सामने उपस्थित हुआ और पादरी साहिव का उपदेश न समझ सका, उस उपदेश के एक वाक्य से भी आनन्द न उठा सका; तव वह गिरजे में आने से पछताया और चीण चित्त हुआ; तव वह खेल-भूमि की याद करने लगा। वह सोचने लगा कि दूसरे लड़के के साथ कितने और लड़के खेल में शामिल हुए होंगे और खेल रहे होंगे। पूरे दो घंटे वह गिरजे में रहा, परंतु वरावर उसका मन खेल-भूमि (play-ground) में ही था। उधर दूसरा लड़का जो खेल-भूमि को गया, उसे अपने मन के लायक ( अपनी रुचि का ) साथी न मिला, कोई ऐसा लड़का उसे

न मिला जो उस के साथ खेल सके। वह अकेला रह गया, इससे उदास होगया। वह गिरजा जाने की सोचने लगा। फिर चित्त में सोचने लगा कि गिरजा जाने का अव समय नहीं रहा। वह ( चाहे शरीर से ) खेल-भूमि में रहा, किन्तु उस का मन वरावर गिरजा घर में था, ( इस लिये चित्त से ) वह उतने समय वरावर गिरजा घर में था। दो घंटे के वाद दोनों लड़के परस्पर रास्ते में पुनः मिले। एक ने कहा "मुझे गिरजा न जाने का अफसोस है", दूसरे ने कहा "मुझे खेल-भूमि में न जाने का खेद है"। यही प्रतिदिन हर जगह मनुष्यों के साथ होता है। जहां आपके शरीर होते हैं, वहां आपका मन नहीं रहता। कितने ऐसे लोग यहां हैं जिन्होंने आज व्याख्यान सुना है ? बहुत ही थोड़े अपने आप को ( चित्तसे ) इस हाल ( कमरे ) में रख सकते हैं; मन तो उड़ भागता है; मन या तो वच्चे के साथ या किसी अन्य मित्रों के साथ होता है; मन एक जगह से दूसरी जगह, एक विषय से दूसरे विषय में भटकता फिरता है। अध्यात्म शास्त्र के अनुसार आप जभी काम करते हो, जव मन उसे करता है। प्रायः आप का शरीर ही जव कोई कार्य विशेष कर रहा है, तव आप ने वह काम नहीं किया होता। अकसर जव आप का तन तो गिरजाघर में होता है, जव आप ( मुँह से तो ) प्रार्थना करते होते हो, जव आप ( कानों से तो ) व्याख्यान सुन रहे होते हो, पर ( वास्तव में ) न आप व्याख्यान सुनते हो, न प्रार्थना करते हो और न गिरजे में ही रहते हो। अकसर ऐसा होता है कि आप शरीर से तो वाज़ार में हो, आप शरीर से तो टहल रहे हो, पर ( चित्त से ) वास्तव में आप ईश्वर से युक्त हो रहे हो। आप का मन ईश्वर के साथ वा पास होता है। अकसर ऐसा हुआ है कि जो लोग दुष्कर्म और पाप ( अपराधों ) के

अपराधी ठहराये गये, वे वास्तव में धार्मिक ( ईश्वर भक्त ) और पवित्रात्मा थे. उन का मन ईश्वर से तन्मय था। अकसर ऐसा होता है कि जो लोग पवित्रात्मा और शुद्ध ( साधु ) समझे जाते हैं, उनके मन मलीन होते हैं। अकसर हम दुष्टों की उन्नति होती देखते हैं। वेदान्त कहता है कि उन लोगों की यह दुष्टता नहीं है जो उनकी उन्नति वा वृद्धि करा रही है, किन्तु वे चिन से ईश्वर में वास किये होते हैं, इस लिये लोगों के केवल वाह्य कर्मों से आप कोई परिणाम मत निकालें। यदि कोई मनुष्य चोरी वा खून करता है, तो उसे आपको घृणा की दृष्टि से नहीं देखना चाहिये।

राम अव आप को भारत वर्ष के एक बड़े नामी चोर की अपने मुख से कही कहानी सुनाता है। राम उस समय निरा वच्चा था, और उस ने उस नामी चोर को अपने मित्रों से यह कहानी कहते सुना था, किन्तु राम उस मौके पर वहां स्वयं मौजूद ( उपस्थित ) था, राम उस समय अपने शाम के जंगल में था, वह तव बहुत छोटासा था। छोटे लड़के को कुछ न समझ कर चोर ने इस छोटे वालक की मौजूदगी में ( अपने मित्र से कहने में ) कुछ न छिपाया, और खुले दिल से सारी कहानी कह डाली। इस कहानी से आप पर इस सारे विषय का रहस्य खुल जायगा। जिस प्रकार एक वार वह धनिक के घर में घुसा और वहां से जवाहिरात चुरा कर भागा था, उसे उस चोर ने वर्णन किया। चोर ने कहा कि "जो जवाहिरात उस धनिक ने हाल ही में लाकर अपने घर में रक्खे थे, उस का किसी प्रकार से मुझको पता लग गया। उसके घर में मैं घुसने को तो चला, किन्तु इसका कोई उपाय वा तरीका न सूझ पड़ा। वार वार सोचने पर

मैं ने राह निकाल ली। मैंने देखा कि घर के पास ही एक वड़ा भारी वृत्त है, और वह वृत्त घर की तीसरी मंज़ल की खिड़की के ठीक सामने है, तव मैं ने रात को अन्धेरे के समय उस पेड़ पर एक भूला डालने की युक्ति सोची, उस पेड़ की चोटी पर एक रस्सी डाली, और एक प्रकार का भूला वना लिया, और उस भूले पर मैं भूलने लगा, इस प्रकार उस गरम देश में मैं कुछ काल तक लगातार भूलता गया। गरमी की ऋतु थी, और यह मुझे मालूम था कि घर के लोग पाँचवीं छत पर सोये हुए हैं, वे तीसरी छत पर नहीं हैं। जव भूला ( भूलते २ ) खिड़की के पास पहुँचा, तो मैं ने चटाक एक लात मारी, फिर दूसरी लात मारी, और तीसरी लात पर खिड़की के किवाड़ फट से खुल गये। इस प्रकार सातवें, आठवें प्रयत्न के वाद जव खिड़की के किवाड़ या द्वार खुल कर पीछे गिर गये तव मैं घर में जा घुसा। मेरे पास वहां कुछ रस्से थे, मैं ने उन रस्सों को नीचे लटका कर अपने दो या तीन साथियों को ऊपर खैंच लिया। तव मैं अपने चित्त में सोचने लगा कि कहां जवाहिरात के मिलने की संभावना हो सकती है। मैं ने मन को एकाग्र किया; उस एकाग्रता में मेरा मन नितान्त निमग्न होगथा। उस समय मैं ने मन में कहा कि लोग अपने जवाहिरात ऐसी जगह पर नहीं रखते जहां चोरों को उस के मिल जाने की सम्भावना हो सके। लोग जवाहिरात को ऐसे स्थान पर रखते हैं जहां से दूसरों को उन्हें पासकने की सम्भावना न हो सके। वहां मैं एक ऐसी जगह खोदने लगा, जहां उनके पा लेने की किञ्चित संभावना थी। जवाहिरात ज़मीन में गड़े थे। उन दिनों भारतवर्ष में यही तरीका था और कुछ लोग आज कल भी वहां ऐसाही करते हैं, परन्तु अव बहुत अपने रुपये को वंकों में रखने लग पड़े हैं। लोग अपने धन

को भूमि में गाड़ रखते थे। मैंने वह द्रव्य पा लिया और तब मैंने सीड़ियों से एक आवाज़ सुनी।" उस समय अपने मन की हालत को वर्णन जो चोर ने किया वह राम भूल नहीं सकता। चोर ने कहा कि "जव मैं और मेरे साथियों ने धन पाते ही आवाज़ सुनी, तो उस आवाज़ ने हमारे शरीर में एक कपकपी सी डाल दी। हम लोगों की सारी देह कांपती, थर- थराती, भयभीत होती और चूर चुर हुए जाती थी; हम लोग सिर से पैर तक थरथरा रहे थे। तव मैंने कहा कि ( जान पड़ता है ) शायद यह मृत्यु की घड़ी है। हम ने अपने आप को मृतवत् पाया और उस समय हम कह रहे थे कि अव एक नन्हा सा मूसा आकर भी हमारा खातमा कर सकताहै।" वह आवाज़ वास्तव में केवल मूसों की आवाज़ थी। तव चोर ने कहा कि "मैं उस समय पछताया, ईश्वर से प्रार्थना की, और अपने शरीर का ध्यान छोड़ ईश्वर के आगे नितान्त आत्म समर्पण कर दिया। तव मैंने आत्म-समर्पण किया, पश्चाताप कर ईश्वर से चमा प्रार्थना की, और उस समय मैं समाधि अवस्था में था, जहां मन मन नहीं था, जहां सव स्वार्थ दूर होगये हुए थे। उस समय मैं और मेरे साथी एक अति विचित्र और बहुत आश्चर्य जनक मानसिक स्थिति में थे। उस समय मैंने प्रार्थना की 'हे भगवान्! मेरी रक्षा करो, मैं योगी हो जाऊँगा, मैं सन्यास ले लूंगा, मैं साधु वन जाऊंगा, मैं अपना सारा जीवन आपकी सेवामें अर्पण कर दूंगा, हे प्रभो! मुझे वचाओ, मेरी रक्षा करो। यह वड़ी ही उत्सुकता-पूर्ण मार्मिक प्रार्थना थी, वड़ी ही सच्ची विनय थी जो मेरे हृदय की तह और अन्तः करण से निकल रही थी। वह प्रार्थना मेरे सारे तन के भीतर से वा रोम २ के भीतर से गूंज रही थी, मैं उस समय ईश्वर- ध्यान में निमग्न था, फल क्या हुआ ? सव आवाज़ ठएडी पड़

गई अर्थात् सब शब्द बन्द हो गया, और मैं और मेरे साथी घर से साफ बाहिर निकल आये और घर से सकुशल बाहिर आ गये।" अब ध्यान दीजिये, बाह्य कर्मों से ही किसी के विषय विचार स्थिर मत कीजिये; मनुष्य वह नहीं है जो उसके बाह्य कर्म हैं, मनुष्य वह है जो उसके भीतर विचार हैं। यह सम्भव है कि वेश्या के घर में रहने वाला मनुष्य भी भीतर से साधु हो। हम जानते हैं कि भगवान् बुद्ध एक वेश्या के घर में रहे थे, किन्तु वे निष्पाप थे। हम जानते हैं कि हज़रत ईसा रहे थे मेरी मैग्डेलेन के घर, जिस स्त्री को लोग पत्थर से मारने जा रहे थे, किन्तु हज़रत ईसा ईश्वर थे। हमें मालूम है कि भारत में भी क्राइस्ट के समान लोक-उद्धारक बहुत से हुए हैं, वे निन्दित जनों के साथ रहा करते थे; पर वास्तव में वे ईश्वर स्वरूप थे। आदमी को उसकी संगत से मत जानिये, किसी मनुष्य पर केवल उसके कर्मों से ही निर्णय मत दीजिये। किसी पर अपना विचार स्थिर (शीघ्र) मत करें। मनुष्य वह है जो उसके विचार हैं। अक्सर जेलमें रहने वाले लोग स्वर्ग में रहते हैं । बनियन (Bunyon) ने जेलमें ही अपनी पुस्तक (Pilgrim of progress) लिखी; मिल्टन (milton) जब जेल में था और अन्धा होगया था तब उस की महती रचना निकली; डेनीयल डी फो (Daniel De Foe) ने जेल में ही रौविन्सन क्रूसो लिखा; सर वाल्टर रैली (Sir walter Raleigh) ने जेल में ही अपने संसार के इतिहास (The History of the world) की रचना की। हम चाहते हैं कि हमारा अड़ोस-पड़ोस (इर्द गिर्द स्थिति) अमुक अमुक प्रकार का हो, पर हम रहते वहां हैं जहां हमारे ख्याल रहते हैं। अब हम मृत्यु अर्थात् जीवन में मृत्यु की कथा की व्या- ख्या करते हैं। ध्यान से सुनिये। राम कहता है कि आपको

सफलता आप की सब से अभेदता का फल स्वरूप प्राप्त होती है। सफलता सदा आपके सद्गुणों का फल है, परमा- त्मा में लीन और निमग्न होने का परिणाम है। यही बराबर होताहै। चोर भी जब उस अवस्था को प्राप्त हुआ, तो सफल हुआ। (इस प्रकार) आप लोग भी सफल होंगे। उस चोर की सफलता उसकी वास्तविक, सच्ची और हार्दिक विनय सम्पन्न स्थिति (वृत्ति) का परिणाम थी, जिस स्थितिमें कि वह उस समय था। परमात्मदेव वा सर्व रूप में लीन व निमग्न होनेसे उसने जान लिया कि धन कहां है। चोर सफल हुआ, पर चोर की सफलता भी वेदान्त को व्यवहार में लाने के कारण से हुई। इस से प्रत्येक मनुष्य की सफलता सदा उसी कारण से होती है। हम लोग देखते हैं कि वह चोर था, उस ने चोरी की जो बहुत बुरा था, क्योंकि दूसरों को लूटना पाप है, दूसरों को लूटना निःसन्देह समय पर उसे दण्ड देगा, उस के ऊपर आफत लायगा; और जो धन कि वह चोरी से पाता है, और जो पाप कर्म कि वह करता है, जो आध्यात्मिक समता (harmony) कि वह तोड़ता है, वह सब के सब अवश्य उस का नाश करेंगे; परन्तु हम देखते हैं कि चोर की भी सफलता सर्व रूप के साथ एकता और अभेदता तथा परमा- त्मदेव में उस की लीनता का ही परिणाम है, अर्थात् अपने शरीर-भाव के त्यागने का, क्षणभर के लिये शरीर से ऊपर उठने का (अर्थात् देह-अध्यास छोड़ने का), शरीर को सूली पर चढ़ाने का, चर्म-दृष्टि (मांस पिण्ड) को पद्दलित करने का ही परिणाम है। शारीरिक स्वार्थ पर विजय पाने से ही उसे सफलता मिली है, किन्तु चोरी की वृत्ति, जिस का वहां उपयोग किया गया, वह उस पर दंडभय, त्रास वा कपकपी और चकित वा विस्मित अवस्था लाई। हम भूल करते हैं जब

हम किसी मनुष्य को नितान्त बुरा समझ लेते हैं। यहां तक कि चोर में भी कुछ प्रार्थना शील वा विनय संपन्न वृत्ति और दिव्यभाव वा ईश्वर-भाव होते हैं। क्रूसेडों (धर्म निमित्त प्राण त्यागने वालों), धर्म-प्रचारकों (missionaries), स्वामियों वा गुरुओं (उपदेशकों) में भी कुछ न कुछ बुरी वृत्तियें होती हैं। प्रत्येक मनुष्य में (इन गुण दोष का) विचित्र मिश्रण (queer mixture) है। हम व्यक्ति विशेषों की पूजा करने में बड़ी भूल करते हैं जबकि उन के सद्गुणों के साथ उन में दुर्गुणों का होना ही स्वीकार नहीं करते; इस लिये भ्रान्ति के बीच से सत्य को छांट निकालने का प्रयत्न कीजिये।

वर्तमान दशा (स्थत) में मनुष्य अपने आत्मा का अनुभव कैसे कर सकता है? इसका उत्तर स्वयं मनुष्य की प्रकृति पर निर्भर है। मनुष्यों का इस संसार में साधारण रूप से तीन प्रकार के स्वभाव वा चित्त वालों में विभाग किया जासकता है। कुछ ऐसे हैं जिन के चित्तों की दशा अस्थिर वा चंचल-स्वभाव (unstable equilibrium) है। कुछ ऐसे हैं जिनके चित्तों की एकाग्रता, जिन के चित्तों की शान्ति स्थिर-स्वभाव (stable equilibrium) वाली है। कुछ ऐसे हैं जो नित्य उभयसामान्य अर्थात् सम स्वभाव हैं। अस्थिर-स्वभाव वा अस्थिर-स्थिति क्या है? अपनी हथेली पर पेंसिल को इस प्रकार रक्खो, यह कभी नहीं ठहरेगी (खड़ी रहेगी), (यहां स्वामी जी ने अपनी हथेली पर पेंसिल को ऊपर की ओर सीधा खड़ा किया), एक आध पल यह शायद ठहरी रहे (खड़ी रह जाय), नहीं तो पवन का हर एक भकोरा इस को नीचे गिरा देगा। इस अस्थिर- स्थिति कहते हैं। पेंसिल को उस प्रकार रक्खो (यहां पर

स्वामी जी ने पेंसिल को अपनी अंगुलियों के बीच पकड़ा और उस लोलदंड—पेंडुलम pendulum—के समान लटकाय रक्खा), यह ठहरी हुई वा स्थिर है; किंतु पेंडुलम (लटकती हुई) होने के कारण यह कुछ काल तक हिलती रहेगी, फिर कुछ काल के बाद ठहर जायगी। स्थिरता चाहे भंग होजाय, किन्तु पुनः स्थिरता प्राप्त हो सकती है। पर उस पूर्व दशा में स्थिरता पुनः प्राप्त हो नहीं सकती। किन्तु इस के समान तीसरी स्थिति एक और होती है। पेंसिल को इस प्रकार रक्खो (यहां स्वामी जी ने पेंसिल को टेवल पर रख दिया) यह स्थिर है। इसे उस प्रकार से (टेवल पर) रक्खो, यह स्थिर है। यहां (टेवल पर) जहां कहीं तुम पेंसिल को रक्खो, यह स्थिर है। यह सदा स्थिरता की दशा में है। ठीक ऐसे ही कुछ लोग हैं जिन के चित्त लगातार क्षुभित और हर वक्त विक्षिप्त हैं, वे कभी स्थिर नहीं हो सकते, कभी स्थिर दशा में नहीं रह सकते। बाह्य स्थिति उन को स्थिर करदेती है, वे पुनः विक्षिप्त (अस्थिर) होजाते हैं। कुछ और लोग हैं जिन के चित्त प्रायः शान्त, स्थिर (एकाग्र वा ध्यानावस्थित) और निश्चल रहते हैं, पर एक बार विक्षिप्त होने पर घंटों बहुत देर तक क्षुभित वा भ्रमित रहते हैं। और इस जगत् में बहुत से लोग इसी स्वभाव के हैं। आप बाज़ार में टहल रहे हैं, कोई आदमी आता है, आप से हाथ मिलाता है अर्थात् राम राम करता है, और कुछ ऐसे वचन कह जाता है जो स्तुतिमय वा प्रिय नहीं हैं, किन्तु कटाक्ष और निन्दा भरे हैं। वह तो चला जाता है, किन्तु अपना काम कर जाता है, और रीमार्क पास करके चल बनता है। उस विक्षेप का प्रभाव घंटों रहता है, बल्कि कभी २ तो दिनो, हफ्तों और महीनो और वर्षों तक बना

रहता है। उस रीमार्क (वचन) का असर तो बना रहता है और मन डांवाडोल भ्रमित रहता है, एक वार विक्षिप्त होने पर बराबर हिले जाता और इधर उधर भटकता फिरता है, और मन की यह अवस्था, मन की यह डांवाडोल स्थिति आप का जीवन नष्ट करती है, और आपका सारा समय हर लेती है। अब ज़रा ध्यान दीजिये, कामों या बातों ने तो बहुत समय न लिया, कर्म तो प्रथम किया वा चेष्टा थी जो मन को दी गई, किन्तु उस के उत्तरफल, या यों कहो कि आपके अपने मन की डांवाडोल स्थिति ही आप के जीवन को हर लेती है। यदि आप मन की ये विचित्र चंचलता रोक सको, यदि आप भीतर के विक्षेप पर विजय पासको, यदि आप मन की लगातार भ्रान्ति, स्फुरण वा धड़कन और संशय विपर्य्य को वश में कर सको वा उन का निग्रह कर सको, यदि आप इस मन को अधीन कर सको, तो आपका जीवन लाखों मनुष्यों के जीवन के बराबर हो जाय। आप के जीवन के तीस वर्ष भी सहस्रों वर्ष के तुल्य हो सकते हैं। आप अपने मन वा चित्त के रोग की ओर, वा उस आध्यात्मिक रोग की ओर जिससे कि आप हानि उठा रहे हैं, ध्यान दीजिये। आप के मन का रोग चंचल-स्वभाव है, जब कोई (ऐसी वैसी) बात होजाती है, मन भय और प्रसन्नता के बीच बीच डांवाडोल फिरता रहता है, अर्थात् मन भ्रम और भय के चंगुल में व्यर्थ फंसा रहता है, न प्रसन्न होने पाता है और न निर्भय। ऐसे लोग-पेंडुलम स्वभाव मनुष्य होते हैं। अब तीसरी प्रकार के लीजिये, वे मनुष्य वीर और मुक्त पुरुष होते हैं। ये वे लोग हैं जिन के चित्त किसी प्रकार की परिस्थिति से विक्षिप्त नहीं होत, चाहे कोई ही बात उन के सामने हो, वे शान्त और निश्चल रहते हैं, चाहे घूरते हुए सागर की

उछलती हुई लहरों (तरंगों) में उन्हें रख दो, वे वैसे के वैसे रहेंगे, चाहे उन्हें युद्ध में रख दो, तब भी वैसे के वैसे ही रहेंगे। आप उनके मित्र हैं, आजन्म से आप बात चीत करें और उन्हें सब प्रकार की बात कह डालें (अर्थात् कटाक्ष वा उपालंभ लगा लें), वे उन का प्रत्युत्तर नहीं देंगे। जिस क्षण आप उन से अलग होते हैं, उन का चित्त पूर्ववत् वैसा का वैसा ही शुद्ध पवित्र और हराभरा है। एक निःसंग वा मुक्त पुरुष के साथ आप हज़ारों वर्ष रहें और चले जांय, इससे आप उनके चित्त में किंचित् विक्षेप न डाल सकेंगे। वे ठीक दर्पणवत् होते हैं, जैसे दर्पण आप का मुखड़ा आप को वापिस दिखलाता है। आप जानते हैं कि दर्पण आप के मुख का ठीक २ चित्र तो नहीं खींचता। यदि कुंडल आप के वायें कान में हैं तो दर्पण में दायीं ओर के कर्ण में आप उसे पायंगे। इसी प्रकार दायां वायां होजाता है, वायां दायां होता है। आप सैकड़ों वर्ष दर्पण के सामने रहें, दर्पण सैकड़ों वर्ष तक आप को वैसा ही दर्शाता रहेगा। दर्पण को अलग कर दें, दर्पण तब भी वैसा का वैसा ही है; ऐसा ही ज्ञान वान् मुक्त पुरुष का हाल है। वह ऐसा है जिसपर बाहिर के दर्पण अपना चिन्ह नहीं छोड़ सकते (अर्थात् उसे दूषित नहीं कर सकते), जिस को कोई भी दूषित वा कलङ्कित नहीं कर सकता, और जो नित्य स्वतंत्र वा असंग रहता है। आप आयें और चाहे सारा समय उस की स्तुति करके चले जायं, तो आप के पीछे उस का चित्त उस स्तुति की जुगाली नहीं करता रहेगा (अर्थात् चित्त उस स्तुति को पुनः २ ध्यान में लाकर फूलता नहीं रहेगा)। आप आयें और चाहे गुणदोष विवेचक दृष्टि से और चाहे छिद्रान्वेषी वा कुटिल दृष्टि से इस पर दोप लगा जायं; आप के चले जाने के बाद वह आप

के इस दोप-निरूपण वा छिद्रान्वेषण को वार २ ध्यान में नहीं लावेगा। असंग, निसंग हुआ वह अपने आत्मा में निश्चय रखता है। ॰

अब राम कहता है कि यदि आप वेदान्त को ठीक २ पढ़ो और उसकी शिक्षा को नित्य अपने सन्मुख रक्खो, प्रणव या अन्य कुछ चिन्हों द्वारा अपने भीतर के बोध के साथ, अपने भीतरी विचारों से ठीक और मैं लग कर आप अपने ईश्वरत्व का ध्यान करो और नित्य अपने सत्यस्वरूप को सन्मुख रक्खो, तो आप का चित्त यदि वह शुरू से अस्थिर वा चंचल स्वभाव है तो स्थिर स्वभाव होजायगा, और यदि वह (शुरू से) स्थिर व एकाग्र स्वभाव है तो वह दृढ़ व दृढ़ समता को प्राप्त कर लेगा; और यह वेदान्त. यह सच्चाई आपको हरदम अपने सन्मुख रखनी होगी। इस अवस्था में नित्य रहने के लिये राम अब आप को कुछ बाहिर के साधन व सहकारी उपाय बताता है। इसे आज़माओ और आप देखोगे कि यद्यपि लोग इस का उपदेश नहीं करते, तथापि यह एक विचित्र उपदेश है। आप इसे ध्यान में रक्खेंगे। जब लोग राम के पास आकर बात चीत करते हैं, कई समय दूसरों में छिद्रान्वेषण (कुटिल और दोष दृष्टि से छिद्रान्वेषण) करके चले जाते हैं। आप जानते हैं राम कैसे अपने आप को उन के विचारों वा उपदेशों से बचाय रखता है? इस में नाना रास्ते हैं। एक रास्ता यह है। आप उस छोटी पुस्तक को अपने सामने देखते हो, यह एक अद्भुत पुस्तक है, यह पुस्तक एक ऐसे मनुष्य से लिखी गई है जिस की बराबरी का मिलता नहीं है। यह मनुष्य प्रसिद्ध नहीं है। यह मनुष्य

भारतवर्प में पूजा नहीं जाता। यह पुस्तक श्रीमद्भगवद्गीता के समान प्रसिद्ध नहीं है, यह श्रीभगवान कृष्ण से नहीं लिखी गई; यह उस मनुष्य से लिखी गई जो नाम और कीर्ति से अपरिचित था। किन्तु यह एक मनुष्य है जो आप को समस्त क्राइस्टस, कृष्ण, बुद्ध, सारे के सारे दे देता है। राम इस पुस्तक को लेता है, आप जानते हैं यह संस्कृत में है, और जब इस पुस्तक में से एक पद राम पढ़ता है, तो जीवनों वा जीवनों के कलंक को तथा समस्त हृदय-तल को धोने और साफ करने में यह काफी होता है। वह तत्क्षण राम को हर्षोन्माद (ecstasy, अत्यानन्द) की अवस्था में डाल देता है। यह छोटी सी पुस्तक, इस पुस्तक का एक एक पद राम के हृदय को हिलाता है और उसे उन्नत कर उस में ईश्वरत्व का विकाश करता है। यह पुस्तक नीच स्वभाव को नाश कर देती है और तत्क्षण माया के पर्दे को फाड़ देती है। इस लिये राम आप को कहता है कि आप भी इसी प्रकार की पुस्तक अपने पास रक्खें आप अपने पास कुछ ऐसे स्तोत्र रक्खें कि जो आप को वा आपके विचारों को उन्नत कर सकें, आप में रूह फूंक सकें, अर्थात् आप को प्रबोधन कर सकें; आप अपने पास ऐसे भजन रक्खें जो आप को तत्काल प्रबोधन कर सकें; आप अपने पास ऐसी कविता रक्खें जो आप को चोट लगावें वा ईश्वर ओर प्रेरें, आप अपने पास बाइबल, सर्मन ओन दी माउंट (sermon on the mount) रक्खें। आप अपने प्रिय (रुचिकर) लेखकों के पदों (फिकरों) वा वचनों पर निशान लगायें, ऐसे पदों (फिकरों) पर कि

-------------------------------- * ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय स्वामी जी के पास अवधूत गीता थी।

जो आप को प्रबोधन कर सकें, या ऐसी किसी बात पर कि जो आप के विचारों को ऊंचा करे। आप अपने पास एक छोटी नोट बुक रक्खें जिसमें आप ऐसे वचनों को जमा कर रक्खें कि जो आप का प्रबोधन करें, आप को ऊपर उठायें, जो आप को प्रार्थना वा उपासना भाव से भरदें। आप इस पुस्तक को ले सकते हो, आप प्रसन्नता से इस पुस्तक के अन्त की लिखित कविता ले सकते हो। "Oh brimful is my cup of joy" =आ! मेरे हर्ष का प्याला ऊपर तक पूर्ण है, यह कविता या ऐसी कोई चीज़ जो सन्मार्ग में आप को उत्तेजित वा उत्साहित कर आप ले सकते हैं, उसे आप हर वक्त ठीक हाथ तले (समीप) रक्खें, और जब आप मित्रों से मिल कर हटें या जब आप भिन्न स्वभाव संगत को छोड़ें, तब अपने मन को भटकने, विक्षिप्त वा सारा काल भ्रमित अवस्था में रहने देने के स्थान पर तत्काल उस प्रबोधन करने वाले पद को लें और अपने चित्त को स्थिर वा सावधान करें।

अब आप जानते हैं कि राम ने आप का कारण अर्थात् मन का रोग बता दिया, राम ने साधारण रीति से मानुषी आध्यात्मिक रोग को आप के सामने रख दिया, साधारण रोग (मन का) यह चंचल स्वभाव है, और राम ने आप को बता दिया कि कैसे हम मन को स्थिर व अचल रख सकते हैं हम इस विषय को अब दूसरे समय शुरू करेंगे।

ॐ ! ॐ !! ॐ !!!