श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

दुःख में ईश्वर।

भाग 15 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 15 · अध्याय 3 / 5

दुःख में ईश्वर।

[ता॰ 8 फरवरी 1903, रविवार के अपरान्ह का भाषण।]

मनुष्यों को दुःख क्यों होता है? जगत् में दुःख का क्या कारण है? इस प्रश्न पर आज विचार होगा।

इतिहास की, अथवा पौराणिक ग्रंथों में जो कुछ पढ़ा है उसकी दृष्टि से, वा महात्माओं की (उक्तियों) वचनों एवं बुद्धि मान् पुरुषों की सम्मति की दृष्टि से, राम इस प्रश्न पर विचार नहीं करेगा। यह ठीक है कि इन बड़े २ विद्वानों, लेखकों महान् विचारकों तथा ग्रन्थ कर्ताओं ने सत्य ही कहा है, परम सत्य का जैसा रूप उन के अनुभव में आया वैसा ही उन्हों ने प्रकट किया है। परन्तु जब तक आप स्वयं पूरी छान बीन न करो और स्वयं अनुभव कर न देखो, तब तक दुनियां के सब लेखकों की सारी रचनाओं को एकठा करने से भी विशेष लाभ न होगा। राम केवल वही कहेगा जो उस ने निज अनुभव द्वारा देखा है, और जो प्रत्येक व्यक्ति अपने आप अनुभव द्वारा देख सकता है।

आज कल लोगों में, बड़े बड़े सज्जनों, इतिहासज्ञों वा बड़े वैज्ञानिकों के प्रमाण देने की बहुत रुचि है। और जो वक्ता उन महान पुरुषों का प्रमाण दे सकता है, वही अधिक सम्मा- नित होता है। यह प्रवृत्ति आत्मघातिनी है। राम आप को अपने अनुभव की बातें कहेगा और यह बतलावेगा कि आप अपने अनुभव से क्या क्या सीख सकते हैं।

जगत में दुख का यह प्रधान कारण है कि हम आन्तरिक अवलोकन नहीं करते, हम स्वयं अपनी सम्मति स्थिर नहीं करते, बहुत सी बातों को हम यों ही मान लेते हैं, हम अपने लिये सोचने का काम बाह्य शक्तियों के भरोसे छोड़ते हैं।

हम लोग भीतर बैठकर नहीं देखते, अपने बलपर भरोसा नहीं रखते; दूसरे जो कुछ कह देते हैं उस ही स्वयं-सिद्ध मान लेते हैं। मुहम्मद, बुद्ध और कृष्ण में विश्वास रखने के अतिरिक्त हम लोगों ने बेहिसाब अपूज्य देवताओं को गढ़ रखा है जिनके आगे हम सिर झुकाते हैं। एक बालक ही यदि हमारे आचरण की टीका टिप्पणी कर डालता है, तो बस, उतना ही हमारी शान्ति को भंग करने के लिये; हमें क्लेश पहुंचाने के लिये पर्याप्त है। हम दूसरों के विचारों दूसरों, की आलोचनाओं की हद से ज्यादा परवाह करते हैं और उन की कृपा संपादन करने में बेहिसाब समय बर्वाद करते हैं। यह अपने आप को अड़ोस पड़ोस के लोगों की ही आंखों से देखना, अपने सच्चे रूप पर स्वयं ध्यान न देना बल्कि दूसरों की ही दृष्टि से अपना निरीक्षण करना-यह जो भाव है, यही हमारे सारे दुखों का कारण है। दूसरों की दृष्टि से अपने को देखने की जो आदत है उसे ही वृथा अभिमान आत्म-सिद्ध (Self aggrandisement) कहते हैं। हम दूसरों की नज़रों में अति भला जंचना चाहते हैं, यही समाज का सामाजिक दोप है, सब भ्रमों का प्रधान अवगुण है।

हिन्दुस्तान के एक ग्राम में एक आधा पागल (नीमपागल) रहता था। जैसे यहां, अमेरिका में अप्रैल महीने में दूसरों को उल्लू बनाने की रीति है, वैसे ही भारतवर्ष में मार्च के महीनें में लोग अपने यार-दोस्तों के साथ तरह तरह के मज़ाक किया

करते हैं। उस ग्राम के आनन्दी युवकों ने उस नीम पागल से मज़ाक उड़ाने का अच्छा अवसर समझा। बस, उन सबोंने उसे कुछ शराब पिलाकर मस्त बना डाला, और बाद उसके परम विश्वस्त, परम हार्दिक मित्रको उसके पास भेज दिया। उस पगले मनुष्य के नज़दीक आते ही उसका मित्र गला फाड़ २ कर चिल्लाने लगा, आंखों से दिखावे आंसुओं की धारा बहाने लगा, रोने धोने लगा, और बोला, "भाई, मैं तुम्हारे घर से अभी आ रहा हूं. वहां मैंने देखा कि तुम्हारी स्त्री विधवा हो गई है, मैंने उसे विधवा पाया।" इस पर वह पागल भी अपनी पत्नी के वैधव्य (widowhood) पर रोने चिल्लाने और विलाप करने लगा, अश्रु बहाने लगा। अन्तमें दूसरे लोग आकर पूछने लगे, "तुम रोते क्यों हो?" पगले न उत्तर दिया, "मेरी स्त्री विधवा हो गई है, इस से रोता हूं।" वे बोले, "यह हो कैसे सकता है? तुम जिते हो और कहते हो मेरी स्त्री विधवा है; जब तक उनके पति तुम नहीं मरते, वह विधवा कैसे हो सकती है? तुम मरे नहीं, तुम स्वयं अपनी स्त्री के वैधव्य पर शोक कर रहे हो, यह तो बिलकुल बेतुकी बात है।" पर वह पागल कहने लगा, "अरे, जाओ। तुम नहीं जानते, तुम नहीं समझते-हमारे इस अत्यन्त विश्वस्त मित्र ने कहा है कि वह अभी हमारे घर में आरहा है, उसने हमारी स्त्री को वहां विधवा पाया है। वह इस बात के साक्षी हैं; यह देख आये हैं कि वह विधवा हो गई!" (हंसी)। अब हम इस मूढ़ की कहानी पर हंस रहे हैं कि वह अपनी स्त्री के वैधव्य पर गे रहा था और लोगों की बात नहीं मानता था कि उसके जीवित होने के कारण उसकी स्त्री विधवा नहीं हुई, बल्कि अपने व्यवहार से वह यह कह रहा है कि

"तुम तो कहते हो सच मेरे भाई! पर बर से आया है मोतबर नाई"।

किंतु याद रहे, जगत के मत और धर्म तथा सांग दंभी अभिमानी और 'फैशेनबुल' लोग ऐसी ही विकट असंभव बातों को कर रहे हैं। न तो वे अपने नेत्रों से देखते हैं और न अपने दिमाग से सोचते हैं। यहां ही देखिये. आपका अपना आत्मा आपका सत्य स्वरूप, प्रकाशों का प्रकाश, निरंजन, परमपवित्र, स्वर्गों का स्वर्ग, आप के भीतर विद्यमान है। आपका अपना आप, आप का आत्मा सर्वदा जीवित. अजर. अमर, नित्य उपास्थित है, फिर भी आप रो रो कर आंसू ढारते हुये कहते हो, "अरे, हमें सुख कब प्राप्त होगा?" और देवताओं का आवाहन करते हो कि वे आकर तुम्हें विपत्ति से उबार दें। उन देवताओं के आगे प्रणिपात् होते हो. नीचे प्रकृति (sneeking habits) का अवलंबन करते हो और स्वयं अपने को तुच्छ समझते हो क्योंकि अमुक लेखक, अमुक उपदेशक. वा महात्मा अपने को पापी कह गये हैं और वह हमें कीड़े कह कर पुकारते हैं, इसलिये हमें भी वही करना चाहिये, इसलिये अपने को मृतक समझने में ही हमारी मुक्ति है। इसी तरीके से लोग सब चीज़ों पर दृष्टि डालते हैं; पर इससे काम चलने का नहीं। अपने निज-जीवन का अनुभव करने लग जाओ; अपने निजात्मा को. भान करना आरम्भ कर दो। इस नशे की हालत को [unclear] करो कि जो आप को अपनी मृत्यु पर डाला रहा है। अपने पैरों पर आप खड़े हो जाओ चाहे आप छोटे हो वा बड़े; चाहे आप उच्च पद पर हो वा नीच पद पर, इसका तनिक परवाह न करो। अपनी प्रभुता का, अपनी दिव्यता का साक्षात्कार करो। चाहे कोई हो उसकी ओर निशंक

दृष्टि से देखो, हटो मत। अपने आपको औरों की दृष्टि से अवलोकन मत करो, बल्कि अपने आप में देखो। आपका अपना आप आपको बारंबार यह उपदेश देगा कि "सारे संसार में आप सब से महान् (आत्मा) हो"।

इसी प्रकार लोग कहते हैं कि वेदान्त, बौद्ध मतादि हमें ऐसा समझने को कहते हैं, किन्तु राम कहता है कि आप के अन्तः स्थित स्वर्ग से यह वाणी निकल रही है कि आप अपने को दीन, जीर्ण और पापिष्ठ कभी मत समझो। अपने भीतर के दिव्य स्वरूप का अनुभव करो।

" The mountain and the squirrel Had a quarrel. And the former called the latter 'Little Prig' Bun (squirrel) replied :— "You are doubtless very big; But all sorts of things and weather Must be taken in together, To make up a year And a sphere. And I think it no disgrace To occupy my place. If I'm not as large as you You are not so small as I, And not half so spry, I'll not deny you make As very pretty squirrel track, Talents differ; all's well and wisely put.

'If I cannot carry forests on my back Neither can you crack a nut."

एक वार पर्वत पक्षी में हुई लड़ाई; "तुच्छ जीव—पक्षी!" कह, गिरि ने अकड़ दिखाई पक्षी बोला, तुम महान हो,—यह तो सच है; किन्तु वरस भर में सब ही ऋतु आवश्यक है। "त्यों छोटी औ बड़ी चीज़ मिल 'ग्रह' है बनता, मैं जैसा हूं, उस श्रत: मैं बुरा न गिनता। "यदि मैं तुमसा बड़ा नहीं, तो लघुता को मम, तुम भी पाते नहीं; न हो चंचल मेरे सम। "बात नहीं ऐसी कि कुछ मुझे अस्विकार हो— वन मृगादि के सहते तुम संपूर्ण भार हो। "बुद्धि भिन्न है, वाह्य भेद भी दुनियां में है, किन्तु सुभग उपयुक्त सभी निज निज थल में हैं। "हम न वनों को अपने पीठ उठा यदि सकते, तो वृक्षों से, भला, तोड़ फल क्या तुम सकते?"

इसी प्रकार, आप का शरीर उस चुद्र पक्षी के समान छोटा हो सकता है और आप से भिन्न कोई दूसरा शरीर पर्वताकार हो सकता है, पर इस से अपने को आप कनिष्ठ मत समझो। उस पक्षी (चमर पूच्छ, गुलेहरी) के समान बुद्धिमान बनो। याद रक्खो, यदि आप का शरीर अत्यन्त छोटा भी हो तथापि इस संसार में आपको कोई ऐसा विशेष कार्य करना है जो विशाल शरीर से संपादित हो नहीं सकता। तब आप अपने आप को तुच्छ क्यों समझें? आनन्दित और प्रसन्न चित्त हो।

एक सज्जन राम के पास आये और कहने लगे कि मेरा बड़ा अफ़सर मेरे साथ बुरा वर्ताव करता है। राम ने उसे कहा कि आप का अफ़सर आप को इस लिये नीच दृष्टि से देखता है कि आप स्वयं अपने को नीच दृष्टि से देखते हो। यदि हम अपना सम्मान स्वयं करें तो प्रत्येक मनुष्य अवश्य हमारा सत्कार करेगा। यदि इस छोटी सी पुस्तक पर एक आना मूल्य लिखा हो तो इसके लिये कोई दो आने नहीं देगा। पर इस छोटी पुस्तक का मूल्य 1) रु० रखा गया है तो इसके लिये 1) देने को सभी राज़ी हैं।

इसी तरह तुम अपना मूल्य कम कर दो और देखो, कोई भी तुम्हारा अधिक मूल्य नहीं समझेगा। स्वयं अपना अधिक से अधिक मूल्य निर्धारित करो, आत्म-सन्मान करो, अपने दैवत्व (divinity), अपने ईश्वरत्व (godhead) को भान करो और प्रत्येक मनुष्य को वह मूल्य देना ही पड़ेगा।

लोग कहते हैं कि विश्वास आप का उद्धार करेगा, परन्तु वाह्य सिद्धान्तों (Principles) पर विश्वास आप का उद्धार नहीं करेगा, किन्तु अपने निजी स्वरूप (दैवत्व) में विश्वास आप का उद्धार करेगा। (आत्म-देव) अपने दिव्य स्वरूप में निश्चय रखते हुए विश्वास करो, आत्म-सम्मान करो, तब प्रत्येक मनुष्य आप का सम्मान करेगा।

जिस सद्गृहस्थ ने राम से अपने अफ़सर की शिकायत की थी, उसने राम के उपदेशानुसार, अपने समय को अपने आत्म-देव के अनुभव में बिताना शुरू किया। वह नित्य प्रार्थना करने लगा। पर प्रार्थना का यह अर्थ नहीं कि किसी शब्द को बरावर दुहराते रहना, बल्कि अपने आत्मदैव का भान (प्रतीति) करना और अनुभव करना ही प्रार्थना है। वह

इस प्रकार प्रार्थना करने लगा। इसका फल उसने देखा कि उसके अफ़सर को उसका सम्मान और उसके साथ सद्व्यव- हार करना ही पड़ता था। एक दिन उसका अफ़सर आकर बहुत खिफ़ कर बोला, पर उस सज्जन ने अति मधुर स्वर से मनोहर रीति से उत्तर दिया और कहा भगवन्! अवश्य ही आप की तनख़ाह मेरी तनख़्वाह से बहुत बड़ी है और मैं जानता हूं कि आप जो विशेष काम करते हैं वह मुझसे नहीं होने का। और आप से मुझे सदा काम रहता है यह सत्य है, पर इसके साथ यह भी सत्य है कि आप को भी मेरी आवश्यकता है। क्या मेरी जगह पर बिना किसी को रखे आप काम चला सकते हैं? नहीं, आप नहीं कर सकते। अतः जैसी मुझे आप की अत्यन्त आवश्यकता है, वैसी ही आपको मेरी अत्यन्त आवश्यकता है, और वस्तुतः आप को पहले मेरी ज़रूरत हुई। आप को इस जगह पर किसी के रखने की ज़रूरत हुई और इस लिये मुझे आप ने बुला भेजा। मैं आप की सेवा नहीं करता, यदि मैं किसी का सेवक हूं तो अपनी ज़रूरतों और आवश्यकताओं का सेवक हूं। मैं आप का नौकर नहीं, बल्कि अपना नौकर हूं। मैं किसी का दास नहीं (उत्तम अर्थ में सेवा करना ठीक है)।"

ऐसी अवस्था में आप जगत् में किसी के अधीन नहीं हो यदि कोई अपनी ही इच्छाओं के अधीन है तो ऐसी अवस्था में आप जगत् में किसी और के अधीन नहीं। वाह्य अधीनता तो केवल भ्रम है। वास्तव में तो हम केवल अपने ही अधीन हैं। अतः आप अपनी स्वतंत्रता का अनुभव करो, उसे प्राप्त करो, तुम्हें अपने को किसी देवता वा ईशु, मुहम्मद वा कृष्ण अथवा संसार के किसी महात्मा के अधीन क्यों समझना

चाहिये? तुम सब के सब स्वतंत्र हो, मुक्त हो। मुक्ति के भाव को ग्रहण करते ही वह तुम्हें सुखी बना देगा।

एक बार पेशिया के एक राजा ने एक आदमी को अप- राधी समझा, उस को अपराधी इस लिये समझा कि उसने राजा को सलाम नहीं किया था। इस बूढ़े राजा को जब कोई सलाम न करता तो वह बहुत क्रोधित होता। उस अपराधी से राजा ने कहा—"तू नहीं जानता कि मैं कितना प्रतापी और कठोर शासक हूं? तू इतना धृष्ट है! तुझे मालूम नहीं कि मैं तुझे मार डालूंगा?" उस मनुष्य ने इसके मुंह पर थूक दिया और इतनी कड़ी नज़र से उसकी ओर देखा कि वह राजा घबड़ा गया। फिर वह बोला "अरे मूर्ख पुतले। यह तेरी शक्ति, तेरे अधिकार में नहीं कि तू मुझे मार सके। मैं आप अपना स्वामी हूं। तेरा अपमान करना मेरी शक्ति में है, यह मेरे अधिकार में है कि मैं तेरे मुंह पर थूक दूं, और यह भी मेरे अधिकार में है कि इस शरीर को सूली पर चढ़ा देखूं, अपने शरीर का मैं आप स्वामी हूं। तेरा अधिकार छोटा (पीछे) है, मेरा अधिकार पहले (सबसे बड़ा) है।" इसी प्रकार महसूस करो, अनुभव करो कि सदा आप अपने स्वामी हो। निज आत्मा की दृष्टि से सब चीज़ों को देखो— दूसरों की आंखों से नहीं। अपनी स्वतंत्रता का अनुभव करो, अनुभव करो कि आप ईश्वरों के ईश्वर, स्वामियों के स्वामी हो, क्योंकि आप वही हो 'तत्वमसि'।

लोग क्यों दुःख सहते हैं? वे दुःख भोगते हैं निज आत्मा की अज्ञानता के कारण, जिससे उनको अपना सत्य स्वरूप भूल जाता है, और जो कुछ दूसरे उन को कहते हैं वही वे अपने को समझ लेते हैं। और यह दुःख तब तक

बराबर रहेगा जब तक मनुष्य आत्मा का साक्षात्कार नहीं करता, जब तक यह अज्ञान दूर नहीं होता।

अज्ञान ही अन्धकार है। यदि किसी अंधेरे घर में तुम जाओ, तो दीवार अथवा किसी और चीज़ से तुम अवश्य टक्कर खाओगे, अवश्य किसी प्रकार चोट खाओगे। यह अनिवार्य है, तुम इससे बच नहीं सकते। कहीं कहीं पूर्वी हिन्दुस्तान में झोंपड़ियों में रहने वाले कुछ लोग इतने अकिंचन हैं कि घर में एक दीपक भी वे नहीं जला सकते। राम ने गलियों में आते जाते समय अक्सर देखा है कि घर का स्वामी अंधेरे घर में जाने पर अवश्य अपनी स्त्री वा अन्य गृहवासियों को दोष देता है। वह कहता है—"अरे तुमने यह टेबुल यहां क्यों डाल रखा है, अभी मेरा घुटना टूट चुका था?" अथवा "इस कुरसी को यहां क्यों रखा है, अभी मेरा हाथ टूट जाता?" अथवा इसी तरह की कुछ और शिकायत करता है। क्या इसकी कोई दवा है? नहीं, बिलकुल नहीं, क्योंकि यदि वह टेबुल वा कुरसी घर के दूसरे कोने में रखी जाय, तो उसे अंधेरे में वहां जाना होगा और वहां वह चोट खायगा। जब तक अंधकार है, तब तक हाथ पांव गर्दन, वा सिर अवश्य टूटेगा, अवश्य ही कभी सिर दीवाल से टकरा उठेगा, यह बचाया जा नहीं सकता। यदि घर में सिर्फ चिराग जला दो, तो फिर तुम्हें परेशान होने की ज़रूरत नहीं, जो जहां है, उसे वहीं रहने दो, तुम एक जगह से दूसरी जगह बिना चोट खाये जा सकते हो।

संसार की भी यही दशा है। यदि आप अपने दुःखों का अन्त करना चाहो तो आप को इसके लिये अपनी वाह्य परि- स्थिति पर वा अपने सामाजिक पद (ओहदे) के समाधान वा

संघटन पर भरोसा नहीं करना चाहिये, वरं अन्तरास्थित सूर्य के विकास के उपाय पर भरोसा रखना चाहिये। सब कोई, माना फ़र्नीचर (furniture, सामान) को यहां से वहां हटा कर, वा सांसारिक पदार्थों को इधर से उधर फिर कर, द्रव्य इकट्ठा कर, वा बड़े बड़े महल बनवा कर, अथवा दूसरों की ज़मीन मोल लेकर, दुःख से पीछा छुड़ाना चाहते हैं। अपनी परिस्थित के सुधारने, वा चीज़ों को इस तरह वा उस तरह सजाने से आप कभी दुःख से नहीं बच सकते। केवल अपने घर में दीपक जलाने से, प्रकाश प्रकाशित करने से, केवल अपने हृदय की अंधेरी कोठरी में ज्ञान का प्रवेश करने से ही दुःख छूट सकता है, हटाया जा सकता और दूर किया जा सकता है। अंधकार दूर होने दो, फिर कोई आप को हानि नहीं पहुंचा सकता।

हिमालय के किसी भाग में कुछ ऐसे जंगली लोग रहते थे, जिन्हों ने आग कभी जलाई ही न थी। पहले के जंगली लोग आग जलाते न थे-आग जलाना उन्हें मालूम न था। मछली को सुखा और अन्न को सूर्य की किरणों में पका कर वे खाते थे। वे संध्या होते ही सो जाते और सूर्योदय के बाद उठा करते थे। इस प्रकार उन्हें अंधेरे से कभी काम नहीं पड़ता था। उन के निवास स्थान के निकट ही एक बड़ी भारी गुहा (गुफा) थी। वे जंगली समझते थे कि हमारे पितर लोग इसी में रहते हैं। वस्तुतः बात यह थी कि किसी समय उन के कोई पूर्वज उस गुफा में गये थे और दलदल में फंसकर वा किसी नुकीली चट्टान से टकरा कर मर गये थे। अतः वे जंगली उस गुफा को पवित्र और पूज्य मानने लगे थे, पर उन विचारों को अंधेर का ज्ञान न होने से वे उस गुफा के अंधकार

को बड़ा भारी राक्षस समझते थे और उसे दूर करना चाहते थे (हंसी)। आप लोग इस मूर्खता पर हंसते हैं, पर आज कल के लोग इस से कहीं बड़ी वज़ मूर्खता कर रहे हैं। अस्तु। किसी ने कहा कि उस अन्धकार रूपी राक्षस की पूजा करो तो वह गुफा त्याग कर चला जावेगा। बस, वे सब के सब गुफा के नज़दीक जाकर वर्षों उसे दण्डवत प्रणाम करने लगे, पर अन्धकार इस भक्ति भाव से दूर नहीं हुआ। इस के बाद किसी ने सम्मति दी, "अंधेर को धमकाओ व उस के साथ युद्ध करो, तो यह भाग जायगा।" फिर क्या था, सब अपना अपना तीर कमान, भाला, लकड़ी फेंकने लगे, पर अन्धेरा उस से भी दूर न हुआ, किंचित् विचलित न हुआ। तीसरे ने कहा, "उपवास करो, उपवास! उपवास करने से अन्धकार हटेगा, अब तक तुम लोग उलटी चाल कर रहे थे, उपवास की आवश्यकता असल में है।" विचारे उपवास करने लगे, परन्तु वह राक्षस गुफा से न हटा, अन्धकार दूर न हुआ। तब अन्य किसी ने कहा "दान करने से अंधेरा दूर होगा"। इस पर जो कुछ उनके पास था, सब को दान में देने लगे। पर पिशाच ने इस पर भी गुफा न त्यागी। अन्त में एक आदमी आया, उसने कहा कि "मेरी बात मानो तो अन्धकार दूर हो जायगा। कुछ वांस की लकड़ियां लाओ, थोड़ी सी घास उन्हें बांधने के लिये और थोड़ा मछली का तेल लाओ।" फिर उसने कुछ चिथड़े, खर वा कोई और चीज़ जलाने के लिये मांगी। इन सबों को वांस के किनारे लपेट कर, चकमक पत्थर से आग फाड़ी और उस घास को जलाया।

इन जंगलियों ने आग पहले कभी देखी न थी, इस लिये

यह जलती हुई आग उनके लिये एक अनोखा दृश्य था। अब उस मनुष्य ने उन सबों से कहा कि इस मशाल को ले गुफा में जाओ और जहां वह अन्धकार-राक्षस मिले, वहां से उसे कान पकड़कर बाहर घसीट लाओ। पहले उन्हें इस पर विश्वास न हुआ। वे कहने लगे " यह कैसे ठीक हो सकता है। हमारे पूर्वजों ने उपवास करना, दान देना, पूजा आदि बतलाया था। वह सब करने पर भी यह राक्षस दूर नहीं हुआ, अब इस अनजाने आदमी पर कैसे विश्वास करलें, हम तो इस को नहीं मानेंगे?" उन लोगों ने आग बुझा दी, पर कुछ दूसरे थे, वे इनसे पक्षपात पूर्ण नहीं थे। वे रोशनी लेकर गुफा में गये, पर वहां तो वह पिशाच था ही नहीं! वे उस लम्बे खोह में आगे बढ़ते गये. फिर भी राक्षस दिखाई न पड़ा। तब उन लोगों ने सोचा कि राक्षस कहीं सुराख वा दरार में छिपा होगा. इस लिये कोने कोने रोशनी ले गये, पर राक्षस कहीं नहीं मिला. मानो वह कभी उस में था ही नहीं।

ठीक वैसे ही. आपके अन्तःकरण की गुहा में अज्ञानांधकार रूपी राक्षस घुसा हुआ है। वही दुःख और डर उत्पन्न कर इस सृष्टि को नरक तुल्य बनाता है। सारी चिन्तायें, सारे दुःख दर्द आपके भीतर ही रहते हैं, कभी बाहर नहीं। जब कोई आपको गालियां देता है वा अपशब्द कहताहै, तब मानो वह आपके लिये ऐसा भोजन तैयार करता है जो ग्रहण करने में हानि करेगा। इस प्रकार कोई भी वस्तु तब तक आप को क्षुब्ध वा क्रुद्ध नहीं कर सकती जब तक आप उसे लेकर हृदय में धारण न करलें। राम कभी किसी विषय को अपने भीतर नहीं रखता। राह चलते समय राम पर कितने लोग टीका करते हैं. पर ऐसे शब्दों का तनिक तक कोई असर नहीं

होता, जब तक उन्हें सत्य मानकर हृदय में न रखा जाय ! वेदान्त की दृष्टि में वह मनुष्य साक्षात्कार पाया हुआ है, जो ऐसे विषैले भोजन को जरा भी ग्रहण वा स्वीकार करने का कष्ट नहीं उठाता। ऐसा स्थित-प्रज्ञ पुरुष अपनी वृत्ति में कभी विक्षेप वा क्षोभ होने नहीं देता।

अपने सत्य स्वरूप, अपने ईश्वरत्व में स्थित रहो। दूसरों की निन्दा, दूसरों पर दोषारोपण करने वालों पर दया करो। अपने को अपमानित, पद दलित वा पतित कभी मत समझो। अपने 'ऐश्वर्य' की प्रतीति करो, अपने दिव्य स्वरूप में निष्ठा रक्खो; अन्यथा सब अज्ञान है, और सब कुछ अन्धकार है। आपके अन्तःकरण का अज्ञान ही है जो आपके लिये (संसार को) नरक बनाता है। इस अन्धकार को दूर करने के लिये आप (ज्ञान से अतिरिक्त) सब, कुछ उपाय भले ही करो, पर किसी से कुछ न सरेगा।

जब तक आप अपने अन्तःकरण के अन्धकार को दूर करने पर न तुलोगे, तब तक तीन सौ तैंतीस कोटि क्राइस्ट क्यों न अवतार लें, पर तौ भी कुछ लाभ न होगा। परावलम्बी मत बनो। जब तक आप के हृदय में अज्ञान है, तब तक इस देव-मन्दिर से उस मन्दिर में जाना, वा इस समाज से उस समाज में सम्मिलित होना, तथा क्राइस्ट वा कृष्ण के आगे प्रार्थना करना, यह पूजा, यह पदार्थ-पूजा या वह पदार्थ पूजा, सब बेकार है। जा मन माने करो, किन्तु कुछ होने का नहीं इस का एक मात्र उपाय है प्रकाश, और वह प्रकाश है अपने दिव्य स्वरूपका ज्वलन्त ज्ञान और उसमें जीवन्त विश्वास। यही एक मात्र उपाय है, और दूसरी राह नहीं- ( नान्याः पन्था विद्यतेऽयनाय। " ).

ऐ महिलाओं और भद्र पुरुषों के रूप में विराजमान देव ! ऐ प्रति-व्यक्ति-रूप में मेरे आत्मन् ! इन सब शरीरों के रूप में ऐ मेरे प्रिय शुद्ध अपना आप ! ऐ सर्व-देह-रूपिणी जगज्जननि ! ऐ सर्व रूप धारी आनन्दमय आत्मन् ! प्रकाश का तात्पर्य है सत्य का इतना अधिक अनुभव, कि सब दृश्यमात्र देह और रूप शून्य में परिणत हो जावे। भीतरी प्रकाश वा सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव, वस्तु मात्र को स्फाटिक (पार दर्शक) बना देता और सब नाम रूप व्यक्तियों को वायु का बुदबुदा सा बना देता है। अनुभवी पुरुष के सामने कैसी ही व्यक्ति आ जाय, वह उस व्यक्ति के तुच्छ अहंकार या वाह्य शरीर को नहीं देखेगा, वह केवल (उस में) ईश्वरत्व देखेगा है। उसके लिये तो वाह्य रूप या शरीर एक मिथ्या भ्रम, अन्धकार और अज्ञान है।

अज्ञान के दूर होने का तात्पर्य है ईश्वर-दर्शन, अपने यथार्थ स्वरूप का दर्शन, तत्व मात्र का साक्षात्कार, आत्मा का अनुभव और सब भय तथा चिन्ता से छुटकारा।

ऐ दिव्य स्वरूप ! ऐ परमात्म देव !! इन सब शरीरों में विद्यमान, ऐ मेरे परम प्रिय परमेश्वर !!! औरों की दृष्टि में जो लोग मेरे शत्रु कहलाते हैं, वे सब के सब वस्तुतः मेरे निजात्मा हैं, और जो लोग दूसरों की दृष्टि में मेरे मित्र कह- लाते हैं, वे सब के सब भी वस्तुतः मेरे निजात्मा हैं। क्षुद्र अहंभाव को मत देखो, वाह्य व्यक्तित्व पर ध्यान न दो। (अन्य) सब शरीरों में ही नहीं, अपितु अपने शरीर में भी ईश्वर दर्शन करना ही प्रकाश है, जिससे निज आत्मा और ईश्वर बिलकुल . एक जैसा दीखने लगता है। 'ईश्वर' मेरे सत्य-आत्मा ( वास्तविक रूप ) का पर्याय वाची शब्द है। वह वास्तविक

स्वरूप 'मैं' सब जगह है। उस 'मैं' का अनुभव करो, उस का निदिध्यासन करो, उसका अनुष्ठान करो; सब दीवारें, सब कठिनाइयां, सब विघ्न और सब बाधायें हवा हो जायेंगी। कैसा अद्भुत दर्शन है ! कैसा सुन्दर सत्य है !! कितना भव्य तत्व है !!! दुःख है कि इसका वर्णन नहीं होसकता, कष्ट है कि किसी शब्द की वहां पहुंच नहीं, यह दुःख है कि कोई भाषा इसे चित्रित नहीं कर सकती। यह एक तत्व है, यदि आपको इस की इच्छा भर हो, यदि आप में इसके लिये उत्कट अभिलाषा हो, तो आप उसे अवश्य पा लेंगे।

जब हम लोग विद्या का अध्ययन करते हैं, तब हम वहां ज्योतिष सम्बन्धी गणना पाते हैं, तब भिन्न भिन्न तारागणों के बीच के अन्तर को नापते समय वा उन ( तारों ) के परिमाण का हिसाब लगाते समय हम लोग इतने विशाल क्षेत्रों को पाते हैं कि जिनके सामने गणित की दृष्टि से यह पृथ्वी शून्यवत् बिन्दु मात्र होती है।

इसी प्रकार, जब आप परम तत्व का साक्षात्कार करने लगते हैं, जब आप को यह प्रतीत होने लगता है कि प्रकाशों का प्रकाश, देवों का अधिदेव, ईश्वरों का ईश्वर स्वयं मैं ही हूं, तब यह विराट् आकाशगंगायें, ये सब खगोलीय तारे एक उपेक्षणीय स्वल्प बिन्दु मात्र होते हैं।-जब आप ऐसा अनुभव करते हैं, ऐसा निदिध्यासन करते हैं, ऐसा विचार करते हैं—अर्थात्, तब यह कैसे संभव है कि संसार के महाभयास्पद ( Bug bears [unclear] ) आप पर कोई प्रभाव डाल सकें?

जब इन महान तारागणों के सामने यह पृथ्वी शून्यत्व को प्राप्त हो जाती है, तब उस सूर्यों के सूर्य, प्रकाशों के

प्रकाश की उपस्थिति में—मेरे सत्य स्वरूप आत्मा के सम्मुख यह विचारी लौकिक बाधाओं और चिन्ताओं की, भला, कैसे कुछ गिनती हो सकती है ?

तत्व का साक्षात्कार करो, उसका अनुभव करो, उसे अपना जीवन बनाओ, और जब आप उसकी पराकाष्ठा सत्ता का अनुभव करलोगे, तब कोई भी, कुछ भी, आप को विच- लित नहीं कर सकेगा। चाहे करोड़ों सूर्यों का प्रलय होजाय, अगणित चन्द्रमा भले ही गल कर नष्ट होजांय, पर अनुभवी ज्ञानी पुरुष मेरु की तरह अटल वा अचल रहता है। उसे क्या हानि हो सकती है,? भला संसार में ऐसा है ही क्या जो उसे कष्ट दे सके ?

अहो, आश्चर्य ! महदाश्चर्य !! ऐसा महान, ऐसा असीम अवर्णनीय उत्कर्ष ! वह आपका सत्य स्वरूप है और (फिर भी लोग) इसे भूल जाते हैं।

वह सूर्य, वह अनन्त सूर्य, आंखों पर के एक छोटे से परदे से छिपा है। और परदा आंखों के इतना निकट है कि सारा संसार उस से ढका हुआ है। ऐसा तेजोमय उज्ज्वल तत्व और ऐसे तुच्छ अज्ञान से ढका है। अरे, दूर करो ऐसे दुर्बल कारी व अशक्तकारी अज्ञान को, परे करो उसे। अनु- भव करो कि "मैं परमेश्वर ज्योतिषां ज्योति, अक्षय, वर्णनातीत हूं।" "तत्वमसि, तत्वमसि" ( तुम वही हो, वही तुम हो ! ) अहा ! उस सत्व को जब आप भान करने लगते हैं, तब सभी चीजें कितनी सरल व कितनी साफ होजाती हैं।

राम कोई बात इतिहास से वा महात्माओं के जीवन से लेकर नहीं कहता है। राम तो वही कहता है, जो उसके

निजी अनुभव की बातें हैं, और जिसको आप स्वयं अनुभव कर सकते हैं।

राम कहता है, जिस समय हम सत्यका अनुभव करते हैं, और तत्व को भान ( प्रतीत ) करने लगते हैं, उस समय यह जगत वास्तव में स्वर्ग बन जाता है। और तब, न कोई शत्रु रहता है, न भय, न किसी प्रकार का दुखदर्द रहता है, और न चिन्ता। अवश्य, अवश्य यह तत्व ऐसा ही है।

जब हम किसी बहुत ऊंचे स्थान पर हों, तब नीचे की चीज़ों के बीच की ऊंचाई निचाई का लोप हो जाता है। पर नीचे से एक घर बहुत ऊंचा दीखता है तो दूसरा घर बहुत नीचा, वा कोई सड़क ऊंची नज़र आती है तो दूसरी नीची।. पर जब हम उन्हीं चीज़ों को किसी खूब ऊंचे टीले पर चढ़ कर देखते हैं, तो वह भेद मालूम ही नहीं पड़ता। इसी प्रकार जब आप आध्यात्मिक वैभव के शिखर पर चढ़ेगे, जब आप निज सत्य स्वरूप को भान (महसूस करने लगोगे, एवं जब आप भीतर के तत्व का अनुभव कर लोगे, तब आप के लिये शत्रु मित्र अपकारी और उपकारी का तुच्छ भेद सब मिट जायगा। इन तुच्छ भेद भावों की यह प्रतीति ही है, जो हम लोगों को अशान्त बनाती है, और असुखकर परिणाम उत्पन्न करती है। इसके परे पहुंच जाओ, ताकि जो तत्व है वही सत्य प्रत्यक्ष हो जाय, और सब भेद भाव लुप्त हो जाय ! इसे ही वेदान्त 'एकत्वम्' कहता है। ईश्वर परम सत्य है, जगत वा वाह्य दृश्य तो 'माया' है।

इस लिये आत्मा का, अपने निज स्वरूप का, इस दर्जे तक अनुभव करो कि यह जगत असत्य भान हो, और ईश्वर वा'

वास्तविक परमदेव प्रत्यक्ष ( Real सत्य ) हो जावे। जब आप अपने भाई को मनुष्य कहकर पुकारते हैं और उसके भीतर परमात्मत्व का अनुभव नहीं करते, अरे, तब आप कितना घोरतर पाप करते हैं। अपने इस कृत्य से आप उसके भीतर का आत्मदेव की हत्या करते हैं।

मातृ-हत्या, स्त्री-हत्या, मनुष्य-हत्या आदि अनेक प्रकार की हत्यायें घोरित हैं, पर प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वर का अनुभव नहीं करके आप ईश्वर-हत्या वा देव-हत्या नामक घोर पाप करते हैं। जब आप किसी मनुष्य को पिता, भाई, पुत्र दोस्त वा दुश्मन कह कर संबोधन करते हैं और उसके अन्तरस्थ देव का अनुभव नहीं करते, तब आप शब्दों का कुछ ऐसा प्रयोग करते हैं कि अन्तरस्थ देव की हत्या हो जाती है। जब शरीर, आकार, अथवा वाह्य मायाविक रूप इतना प्रधान हो जाता है कि जिससे भीतर का ईश्वर विस्मृत होजाय, तब आपकी अधोगति होती है। जब जब आप अपने हृदयस्थ देवता की हत्या करने का यत्न करते हैं, तब तब, (कहना चाहेये कि) इस संसार में आप का सर्व नाश होता है। यह ईश्वर- हत्या, यह देव-हिंसा ही अज्ञान है, और यही अज्ञान संसार के दुःखों का मूल है। यह तत्व स्वप्नमात्र रह जायगा यदि लोग इसे व्यवहार में नहीं लावेंगे। यह एक तथ्य है, इसे अनुभव करो और अपने को सुखी बनाओ। इसकी (प्रतीति) करो, अर्थात् इस का निदिध्यासन करो, इसे आचरण में लाओ, और तब आप देखेंगे कि आप अद्भुत संसार में वास कर रहे हैं, आप देखेंगे कि सब शक्तियां (ऋद्धि सिद्धियां) आप की सेवा कर रही हैं, इसका निदिध्यासन करो, फिर सारे सूर्य चन्द्र और तारे आप का हुक्म बजायेंगे।

निरन्तर प्रयोगों द्वारा आप इसे (इस अवस्था को वा इस कथन की सत्यता को) ठीक पायेंगे।

सुखी है वह मनुष्य, जो सतत अपने आत्मदेव को अनुभव कर सकता है, जो सदा सब के साथ एकतानुभव कर सकता है।

एक संस्कृत श्लोक है, जिस का शब्दार्थ है कि "जैसे किसी गुहा में सैकड़ों वर्षों के अन्धकार को, प्रकाश लाने पर, निकलते देर नहीं लगती, वैसे ही उस मनुष्य का हाल है जिसने अपने में जन्म से ही अज्ञानान्धकार जुटा रखा है। पर जब यह तत्व, यह आत्म ज्योति, उस के हृदय मन्दिर में, दमकती है, तो यह सबका सब भ्रम भाग जाता है।"

बस विषय में राम का यह प्रतिदिन का अनुभव है कि जब वह प्रत्येक विद्यमान मनुष्य वा व्यक्ति में आत्मा का दर्शन करता है, जब वह प्रत्येक मनुष्य की देह को ईश्वर के (शरीर) तुल्य मानता है, वा यों कहो कि जब वह मनुष्य के व्यक्तित्व की जगह उस के भीतर के आत्मतत्व को देखता है, तब वह दुःख नहीं पाता; किन्तु जब वह केवल शरीर को देखता है, जब वह किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व मात्र पर ही दृष्टि डालता है, तब राम अवश्य दुःख उठाता है; किन्तु पहले की सब न्यूनताओं और गत सफलताओं के अनुभव से अब राम इतना होशियार तो हो गया है कि किसी व्यक्ति को परमात्मा से भिन्न किसी अन्य भाव से देखने की कभी भी, बल्कि स्वप्न में भी कोई संभावना उसे नहीं रही। राम प्रत्यक्ष देखता है कि आप को सत्स्वरूप मानने से, आप को निज आत्मा अनुभव करने से, और ऐसा अनुभव करने से कि यह सब शरीर मेरे ही हैं, यह सब

देह मेरी ही देह समान हैं, (दूसरे) लोग भी वैसा ही समझने लग जाते हैं।

'मजनूं' नामक एक मनुष्य होगया है। लोग उसे 'प्रेमियों का राजा' कहा करते हैं। उस के समान किसी ने प्रेम नहीं किया। किन्तु उस का प्रेम था अपनी प्रेम-पात्री के शरीर पर, उस के व्यक्तित्व पर। इसी से वह जन्म भर में उसे न देख सका।

राम कहता है कि यदि आप अपनी इच्छाओं को पूर्ण करना चाहते हैं, तो आप को उन इच्छाओं को त्यागना चाहिये, उन से परे हो जाना चाहिये। पर उस (मजनूं) विचारे को यह रहस्य मालूम नहीं था। फिर भी संसार भर में वह आदर्श प्रेमी था। कहते हैं कि भारी निराशा के कारण उसका दिमाग बिगड़ गया, वह उन्मत्त हो गया। और विचारा यह पागल शाहज़ादा अपने मात-पिता घरद्वार को छोड़ वन २ में भटकने लगा। यदि यह कोई गुलाब का फूल देखता, तो उसे अपनी प्रिया समझ, उसके पास दौड़ जाता, इसी तरह वह (cypress) सरु वृक्ष को माशूका (प्रिया) समझ प्यार करता। हरिन को देख वह उसे अपनी माशूका समझता और उस के पास जाता। ऐसा ही उसका भाव था; वह हर जगह उसे देखता और इन तुच्छ वस्तुओं को अपनी माशूका के रूप में परिणतकर डालता। किन्तु उस के प्रेम का विषय भौतिक था, इसी से उसे इतना कष्ट भोगना पड़ा।

राम कहता है, प्रेम करो और मजनूं की तरह प्रेम करो, किन्तु ईश्वर को, आत्मा को, उस परमात्मदेव को अपना प्रेम- पात्र बनाओ। क्या सारा संसार ही सुख के पीछे पागल,

उन्मत्त नहीं हो रहा है? और सुख 'ईश्वर' का ही पर्याय वाचक शब्द है। मजनूं विचारा जानता ही न था कि कहां परम सुख वा ईश्वर मिलता है। वृक्षों में, पशुपक्षियों में जिस 'मजनूं' ने अपनी प्रियतमा का दर्शन किया था, उस 'मजनूं' के समान जिस मनुष्य ने तत्व का दर्शन किया है, वही मनुष्य धन्य है! एक दिन 'मजनूं' उसी वन में मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। उसी समय उसका पिता उसकी खोज में वहां आ पहुंचा। वह 'मजनूं' को धूल से उठाकर, झाड़ पोंछ कर कहने लगा, "प्यारे बेटा! क्या तू मुझे पहचानता है?" 'मजनूं' चेखुद देखता रहा। माशूका बिना उसकी दृष्टि में समस्त जगत शून्यवत् था। उसके रोम रोम से यही ध्वनि निकल रही थी, "कौन पिता, पिता कौन है?" पिता ने फिर कहा, "मेरे प्यारे बेटा! क्या तू मुझे नहीं पहचानता, मैं तेरा पिता हूं?" उसने उत्तर दिया, "पिता कौन?" तात्पर्य यह कि क्या दुनियां में मेरी माशूका के सिवा और भी कोई चीज है?

जैसा प्रेम 'मजनूं' को उस भौतिक पदार्थ, उस मांस और त्वचा के लिये था, वैसा ही तत्व के साथ प्रेम रखना तत्वानुभव है। दिव्य प्रेम की इस उच्च भूमि में जब आप पहुंच गये, जब आप इतनी ऊंचाई पर चढ़ गये कि आप पिता में, माता में, प्रत्येक व्यक्ति में और किसी का भी नहीं; केवल ईश्वर का ही दर्शन पाते हैं, जब आप पत्नी में पत्नी का नहीं, किन्तु केवल उस परम प्रिय ईश्वर का दर्शन करते हैं, तब अवश्य आप स्वयंमेव ईश्वर हो गये। हां, तब आप वास्तव में ईश्वर के समझ होगये।

जब तक 'मजनूं' जीवित रहा, तब तक वह अपनी माशूका

(lady love) को न देख सका। कवि आगे लिखता है कि (मरने पर जब) वह खुदा के सामने लाया गया, तो खुदा ने कहा - "अरे मूढ़! तूने एक भौतिक सांसारिक पदार्थ को इतना क्यों प्यार किया? जितना प्रेम तूने अपनी प्रियतमा पर व्यर्थ किया यदि तूने उसका कोट्यंश भी मुझे अर्पण किया होता, तो आज तुझे मैं बहिश्त का फ़िरशता (स्वर्ग का देवता) बना देता।" कहा जाता है, 'मजनूं' ने उत्तर दिया, "ऐ खुदा, मैं तुझे इस (धृष्टता) के लिये माफ कर देता हूं। पर यदि सचमुच ही तुझे मेरे इश्क की इतनी चाह थी, तो तू स्वयं मेरी माशूका बन कर मेरे पास क्यों न आया? यदि तू मेरे मुहब्बत का भूखा था तो तुझे मेरी माशूका, मेरे प्रेम का विषय बनना था।" इस मजनूं ने तो खेल ही उलटा दिया, किन्तु राम कहता है कि आप को सत्य स्वरूप के साथ ऐसा ही उत्कट प्रेम रखना चाहिये, अपने आत्मा को अवश्य प्यार करना चाहिये, उसे ही अपना प्रेमपात्र समझना चाहिए। उसे प्यार करो, अनुभव करो, 'मजनूं' की तरह अनुभव करो ताकि और कोई वस्तु आप के पास न आने पावे, जब तक वह प्रियतम सत्य स्वरूप के ही रूप में उपस्थित न हो, उस में आप केवल प्रियतम देव को देखो और कुछ नहीं।

इस पर शायद तुम कहो, "क्या ज़रूरत है? हम इस अनुभव करना नहीं चाहते। हमतो अपने इस नरक में ही सुखी हैं" तो राम कहता है, सम्भव है कि आप सुखी हों, किन्तु आप का ध्येयम वही है, अतः सड़क पर गैर घसीटते चलने में समय नष्ट करने से क्या लाभ? यहां [unclear] को आना ही पड़ेगा; पर कीचड़ में चलकर परेशानी तो न उठाओ! रेलकी ऊंची सड़क पकड़ो, बिजली की गाड़ी, नहीं, नहीं, विमान,

चलो, - सड़क के किनारे अपना वक्त बरबाद मत करो।"

आप प्रतिदिन अपने अड़ोस पड़ोस का अवलोकन करो, क्या होता मालूम पड़ता है? आप देखोगे कि प्रकृति का ऐसा ही प्रबन्ध है कि आप उस लक्ष्य तक पहुंच जांय। यह एक नैसर्गिक घटना है। जब कोई मनुष्य शान्ति, और आनन्द की वृत्ति में होता है, तब कुछ देर तक उस शान्त सुस्थावस्था में रहने से वह देखता है कि उस अवस्था के साथ २ कोई अच्छी खबर आती है, वा कोई शुभ परिवर्तन होता है, वा कोई उत्तम घटना घटती है, निश्चयवाद ऐसा होता ही है।

उस साम्यावस्था में, उस शान्त अचंचल दशा में रहो, और आप देखोगे कि कोई मित्र मिलने आता है वा कोई प्रिय वस्तु मिलती है, अथवा आप के लिये कोई गौरव जनक बात होती है। जब साधारण मनुष्य इस सफलता पर फूल उठते हैं, वा उस को आत्मिक महत्व देते हैं (तब उन्हें दुःख भोगना ही पड़ता है)। यदि आप उस भौतिक रूप को हृदय में स्थान दोगे, यदि आप उससे आसक्त हो जाओगे और उसे जकड़ रखोगे, उसे बहुत प्यार करने लगोगे, तो आप देखोगे कि अवश्यमेव कुछ अकथ घटना घट जायगी और वह उस वस्तु को हर लेगी वा उसमें कोई नवीन (अवांछित) परिवर्तन पैदा कर देगी। यह दैवी विधान है, यह टाला नहीं जा सकता।

यदि इस विषय पर पुस्तकें नहीं लिखी गईं हैं तथापि दैवी-विधान यही है। इसी प्रकार जब आप किसी वस्तु में आसक्ति रख, उसके मोह में अत्यन्त फंस जाते हो जिस से कोई प्रसंग उत्पन्न हो कर वस्तु को हर लेता है और आप

दुःखी एवं निकृष्टतम होते हो, तब दो प्रकार की घटनायें घटती हैं। कुछ लोग इस प्रकार मुँह की खा (निकृष्ट- तव होने पर) बाह्य दशा को दोष देना, हाथ पैर पटकना और बाह्य स्थिति की समालोचना करना आरंभ करते हैं। ऐसे लोगों पर और भी कड़ी उलझनें आती हैं, तब वे चिल्ला उठते हैं "अरे विपत्तियां कभी अकेली नहीं आतीं"। ऐसा एक बार दुःख उठाने के बाद भी जो लोग अपने चित्त की समता प्राप्त नहीं करते, बल्कि दूसरों की समालोचना करते और उन पर दोष लगाते रहते हैं, वे क्षणभंगुर अवलंब (आश्रय) के पीछे छटपटाते फिरते हैं, क्योंकि बुरे दिन अकेल नहीं आते; परन्तु कुछ काल तक कष्ट भेलने पर उन के चित्त की स्थिति ऐसी हो जाती है कि जिस में अदृश्य बल प्राप्त हो जाता है। तब साम्य अवस्था आती है 'यद् भाव्यं तद् भवतु' भाव का उदय होता है, तब उन वासनाओं के त्याग की वृत्ति चित्त-प्रसन्नता तथा विश्व व्यापक शान्ति की दशा उपस्थित होती है, तब दुःख के बादल दूर हो जाते हैं, और फिर बाहिर से भी अच्छी अवस्था प्राप्त होती है। वे पुनः सत्पथभ्रष्ट होते केवल बाह्य रूपों वा व्यक्तियों पर निर्भर रहने लग जाते हैं, जिस से फिर कठिनाइयों में जा फंसते हैं, और तब। कुछ काल के बाद वे धर्म की शरण में आते हैं। कहते भी हैं कि विपत्तियां मनुष्य को धर्ममुख करती हैं "(Misfor- tunes lead to religion")

इसी तरह आप के दैनिक जीवन में दिन रात हुआ करती है, प्रत्येक दुःख की रात्रि के बाद सुख की प्रभात आती है, और प्रत्येक सुख के दिवस के बाद दुःख की निशा होती है। जब तक आप बाह्य रूपों में आसक्ति रखेंगे, तब तक यह उत्थान

और पतन होता ही रहेगा, एक के बाद दूसरे का आना जारी रहेगा। पर इस आन्तरिक उत्थान पतन का उद्देश्य क्या है? आपको अपने भीतर के सूर्य का अनुभव कराना ही इस आन्तरिक पतनोत्थान का उद्देश्य है।

पृथ्वी पर रात्रि और दिवस होता है। पर सूर्य में सर्वदा दिन ही दिन रहता है। पृथ्वी के घूमने से ही दिवारात्रि होती है, पर सूर्य में रात होती ही नहीं, वहां सदा दिव्य प्रकाश, सदा दिन रहता है।

आप पर आपत्ति दुःख और चिन्तायें इसी लिये आती हैं कि आप भीतर के वैकुंठ का अनुभव करें। इनका काम आप को यही सुझाने का है कि आप हृदयस्थ सूर्यों के सूर्य, प्रकाशों के प्रकाश का अनुभव करें, और जिस समय आप ने अनुभव कर लिया, उसी समय आप सारे सांसारिक दुःख दर्दों से, परिवर्तनों से परे होगये।

अच्छा, हम लोगों को उन्नत करना ही इन दुःख आदि का उद्देश्य किस प्रकार है? सुख का प्रथमागमन हमें यह बतलाता है कि सुख सदा उसी समय मिलता है जिस समय हम अपने भीतर के आत्म-देव से संलग्न वा निमग्न रहते हैं, अथवा जिस समय हम विश्व के साथ अपनी एकता (Har- mony) भान करते हैं। इस प्रकार यह हमें बतलाता है कि जब हमारी विश्व के साथ चित्त से एकता है, तब सब सुख हमारे हो जाते हैं; तब वे हमें अवश्य मिलेंगे ही, यही दैवी- विधान है। विपत्ति जो है वह हमें बतलाती है कि भौतिक भ्रममय वा मायिक विषयों में आसक्ति वा मोह का अनुसरण [unclear] करती है। वे कष्ट हमें बतलाते हैं कि भौतिक [unclear]

में आसक्ति रखना एवं इन भौतिक विषयों को सत्य समझना ही दुःख दर्द एवं चिन्ता का लाना है। इस प्रकार ये दुःख हमें सूचित करते हैं कि भौतिक-पदार्थ मिथ्या हैं अतएव वाह्य सांसारिक नाम रूपों पर हमें अपना समय और शक्ति नष्ट न करने चाहियें। सभी विपत्तियां यही शिक्षा देती हैं। राम सारे जगतके इतिहास को लेकर इसी दैवी-विधान से प्रतिपादित कर सकता है। 'शेक्सपियर' के 'मर्चेन्ट आफ वेनिस' (Merchant of venice) † नामक नाटक में आप ने देखा होगा कि जब तक 'पोर्शिया' के शरीर में ऐन्टोन्यों आसक्त था, तब तक वह पतित वा पापी था, सफल मनोरथ न हो सका। और वक्सों को चुनते समय उसकी दशा अवर्णनीय थी, वह शून्यावस्था में था; वह वही ही भव्य स्थिति में था। वहां ईश्वर, देवता वा किसी स्वर्गीय दूत का उल्लेख नहीं है, पर ध्यान पूर्वक पढ़ने से पता मिलेगा कि जब उसका चित साम्यावस्था में था, जब वह ईश्वर से अभिन्न हो रहा था, उसी समय वह सफल हुआ। भले ही 'शेक्सपियर' ने इसे स्पष्ट न किया हो। कवि लोग इसका स्पष्ट चित्रण नहीं करते। पर यह एक तथ्य है जो प्रति दिन अनुभव सिद्ध होता है। सच सुखों का यही उपदेश है कि आप सदा साम्यावस्था में रहें। वे यही बतलाते हैं कि आपकी समस्त विश्व और प्रकृतिके साथ एकता होनी चाहिये। दुःख निषेधात्मक शिक्षा देते हैं। वे कहते हैं कि आप जगत के पदार्थों से ममता कभी मत जोड़ो और उन्हें कभी सत्य मत समझो। वे उपदेश देते हैं कि आप सर्वगत ईश्वर का उच्छेदन मत करो और न आप नाम रूप पर आसक्त होकर ईश्वर को ही भुला दो। सभी दुःख ───────────── † इसका बड़ा ही उत्तम अनुवाद भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र के 'दुर्लभ बंधु' नाम से किया है। अनु॰

और सभी सुख आप को वेदान्त का पाठ पढ़ाते हैं। जब सब लोग इस पर विश्वास नहीं करते, तो क्या इससे कुछ और सिद्ध होजाता है? नहीं, इससे केवल यही सिद्ध होता है कि इस सत्य को दुनियां नहीं समझ पाती, इसी से दुनियां दुःखी है। सत्य का अनुभव आप करो फिर आप सुखी हो।

भारत में मिट्टी के वर्तन बनाने के लिये अमेरिका के समान मेशीन (कला) नहीं है। वहां कुंभार चाक पर वर्तन गढ़ते हैं। चरणों से एक गहरे भांडे में मिट्टी गूंधी जाती है। और दोहरी रीति बरती जाती है। भीतर की ओर से किसी वस्तुका आधार देकर वाहर से उसे थप थपाते हैं, जिससे मिट्टी को वर्तन में घड़ लेते हैं।

वैसे ही वे वाहरी थपेड़े आपकी उन्नति करा रहे हैं, आप को ईश्वर बना रहे हैं। यह दोहरा तरीका है। भीतरका आधार बनाये रखिये, दुःख कठोर आघात हैं, और सुख अन्तर का आश्रय है। सुख दुःख के ज़ोर से चरित्र संगठित होता है। दुःख जो वाहिर से कठोर आघात तुल्य है और सुख जो अन्तर आधार तुल्यहै-दोनों का ही उद्देश्य आपका अन्त- र्निहित ईश्वरत्व का प्रकट करना, अन्तरस्थ ईश्वर को व्यक्त करना एवं आपकी दिव्य प्रकृति को प्रस्फुटित करना है। यह प्रकृति का नियम है कि (उसकी) तलवार के ज़ोर के आगे आप को अपना ईश्वरत्व प्राप्त करना ही होगा। और यदि आप ऐसा नहीं करते तो तमाचे पर तमाचे, लात पर लात ही नसीब होंगे। यदि आप इससे बचना वा छुटना चाहते हैं, तो कृपया आत्मा का, निज सत्य स्वरूप का अनुभव करिये। यही ध्येय है।

O, happy, happy, happy Rama, Serene & peaceful, tranquil, calm.

My joy can nothing, nothing mar, My course can nothing, nothing bar.

My livery wear gods, men, & birds, My bliss supreme, transcendeth words.

Here, there and every where, There, where's no more a "where"?

Now, ever, anon, and then, Then when's no more a "when"?

This, that, and which, and what, That, that's above a "what"?

First, last, and mid, and high, The one beyond a "why"?

One, five and hundred. All, Transcending number one & all.

The subject, object, knowledge, sight, E'en that description is not right.

Was, is, and e'er shall be, Confounder of the verb "to be"

The sweetest Self, the truest Me, No Me, no Thee, no He.

राम आनन्द समुद्र लीन, अविचल, सुशान्त विकंप हीन। मेरा आनन्द अति विशाल; कोई सके हि न विघ्न डाल। मेरे रथ की गति अविरोध; कौन करेगा उसका रोध। मेरा दिया हुआ चपरास; देवादिक पहने सहुलास। मेरा शब्दातीतानन्द, दिव्य,-करे वाचा को मन्द। यहां वहां और जहां तहां— 'कहां?' जहां पर है नहिं वहां; भूत, भविष्य, सभी काल में— अथवा 'काल'-हीन काल में! सब से अतीत, सब वस्तु में। प्रारंभ अन्त औ मध्य में॥ प्रश्नों औ कारण से परे। जो है संख्या से भी परे॥ 'कर्ता' 'कर्म' 'दृश्य' औ 'ज्ञान'। जिस का उचित नहीं अभिधान॥ 'अस्ति', 'नास्ति', 'है', 'था', का जाल। बस, देता है भ्रम में डाल॥ सब से सच्ची 'अपनी' सत्ता। बस वह प्रियतम आत्मा एक॥ जिसे त्याग कर 'हम' 'तुम' 'वह'। इन सब का कोई नहीं विवेक॥

यही 'सर्व' है, परम आत्मा है, जो (सब कुछ होते हुये भी) अवर्णनीय है; वही तुम हो-'तत्त्वमसि'।

इस तत्त्व का अनुभव करो। जब लोग आकर राम के शरीर की पूजा करते हैं, तब राम अप्रसन्न होता है। राम के भीतर में इतना काफ़ी आनन्द, 'सुख', मोद भरा है कि प्रशंसा वा धन द्वारा प्राप्त होने वाले सुख से वह मुक्त है।

मेरा सुख अवर्णनीय और असीम है। आन्तरिक (आनन्द का) दिव्य मूल इतना पर्य्याप्त है कि उसने राम को नाम, कीर्ति वा द्रव्य के दरवाज़े पर सुख के लिये हाथ पसारने की आवश्यकता से मुक्त कर दिया है। मेरे भीतर पर्य्याप्त सुख है।

अरे अनुभव करो, अनुभव करो, उसे प्राप्त करो। वही मुक्त करेगा आप को उस याचक-प्रवृत्ति से, जी लोगों को सांसारिक सुख की खोज में प्रवृत्त करती है।

भारत में एक स्त्री को नौ पुत्र थे। एक दिन उस के द्वारे एक भिछुक आया और उस (स्त्री) ने उसे कुछ भिच्छा दी। वह भिछुक इतना प्रसन्न हुआ कि उसने उस को आशीर्वाद दी और भगवान् से ऐसे प्रार्थना की "हे प्रभो! इस देवी को तू सात बच्चों की माता बना"। जब उस सच्चे साधु ने उसे सात बच्चों की मां बनाने की प्रार्थना की तो वह रुष्ट होगई, क्योंकि यह उस के लिये शाप होगया, क्योंकि उस के पहिल ही से नौ लड़के थे, इस से उस के दो लड़कों की हानि होती थी। उस ने फिर से आशीर्वाद देने की उस भिछुक से प्रार्थना की और पुनः साधु ने वही आशीर्वाद दिया। वह स्त्री क्रोधित होगई और बहुत से लोग वहां इकठे होगये, और उस के क्रोध का कारण पूछने लगे। यह सुनकर उन लोगों

को हंसी छूटी कि आशीर्वाद आशीर्वाद न होकर शाप होगई। इसी प्रकार राम के अन्दर अकथनीय आनन्द भरा है, सबों को उस आनन्द का उपभोग करने दो। वही हम सबोंको मुक्त, इस संसार के सभी विषयों से मुक्त, करेगा।

हिमालय की बर्फ़ानी नदियों के कमलों के समान शरीर को, व्यक्तित्व को, बिना किसी की दृष्टि और ज्ञान के ही विकसित होने दो। चाहे वह शरीर शूली पर चढ़ जावे वा कैद में रखा जावे, चाहे महा सागर की विशाल तरंगें इसे निगल जावें, वा (Torrid zone उष्ण कटिबन्ध की गर्मी इसे भुलसा दे-अथवा और कुछ ही भले ही आपड़े, पर उस भीतर के निजानन्द का रंग भंग नहीं हो सकता। उसी आनन्द का, उसी परात्पर आन्तर सुख का, आप अनुभव करो, और जगत के सब दंभ और मूढ़ता एवं अन्धकार से परे हो जावो।

ईश्वरों के अर्धीश्वर, देवों के अधिदेव बनो। "तत्त्वमसि! तत्त्वमसि!!" (वही तुम हो! वही तुम हो!!)

ॐ ! ॐ !! ॐ !!!