श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

( साधारण ) बातचीत ।

भाग 15 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 15 · अध्याय 4 / 5

( साधारण ) बातचीत ।

गोल्डेन गेट हाल, बृहस्पतिवार, 22 जनवरी 1903

प्रश्न—"हम स्वाधीन होंगे" स्वामी के इस कहने का क्या अर्थ है ?

उत्तर—"हम स्वाधीन होंगे," यह वाक्य यथार्थ में भ्रान्त है। हमारा स्वाधीन होना भ्रान्तिमय नहीं है, क्योंकि हम इस समय भी स्वाधीन हैं, हम आदि से ही स्वाधीन हैं, हम कभी भी बन्धन या दास्यता में नहीं थे। इस प्रकार, "हम स्वाधीन होंगे", यह कहना असलियत में गलत है। साधारण वातचीत में ज्ञान या ज्ञान प्राप्त करने के अर्थ में यह वाक्य बोला जाता है। आप जानते हैं कि गुलामी की कैद, जिससे इस संसार के लोग छूटते या उठते हैं, वास्तविक कैद या दास्यता वा बन्धन नहीं है, यह केवल भ्रान्त विचार, अज्ञान, और मिथ्या ज्ञानार्जन का फल है। वास्तविक दास्यता या बन्धन नहीं है, और सच्चे ज्ञान की प्राप्ति, सच्चे निज स्वरूप या आत्मा का अनुभव आप को तुरन्त स्वाधीन, सदा के लिये स्वाधीन कर देता है। वह स्वाधीनता कभी भी गई नहीं थी। इस लिये भविष्य में आनेवाली स्वाधीनता का विचार नहीं करना है, बल्कि उस स्वाधीनता का विचार करना है कि जो सदा आप की रही है, जो आपका जन्मजात स्वत्व है, जो आपका अपना स्वभाव है।

एक आदमी के गले में एक लम्बा बहु मूल्य हार था। एक समय वह उसे बिलकुल भूल गया। अपने गले में हार

न पाकर उसे बड़ा रंज हुआ। उसकी खोज में वह इधर-उधर भटकने लगा, पर वह न मिला। किसी ने उससे कहा कि हार तो तुम्हारे ही पास है, और वह बड़ा खुश हुआ। यथार्थ में हार मिला नहीं था, क्योंकि वह तो बराबर वहीं था। वह खोया नहीं था बल्कि भूल गया था। इसी तरह आप का सच्चा आत्मा, "मैं हूँ", कल, आज, सदा एकसा रहा है और रहेगा; किन्तु मन या बुद्धि को केवल अज्ञान पर विजय पाना है। मन जब, विश्वास करता है कि मूल्यवान हार मिलगया, तब इस अर्थ में हम कह सकते है कि आप को अपनी स्वाधीनता फिर मिल गयी। आप को अपना रुचिर हार मिल गया, जो यथार्थ में कभी खोया ही नहीं था।

प्रश्न—क्या हमारी आत्मा का व्यक्तित्व निरन्तर बना रहता है ?

उत्तर—आप समझ सकते हैं कि इस प्रश्न का उत्तर "आत्मा" शब्द के अर्थ पर निर्भर है। यदि रूह (सोल Soul) का अर्थ आत्मा माना जाय तो, वह न कभी जन्मा था और न मरेगा। जब जन्म और मृत्यु ही नहीं है, तो निरन्तरता कहाँ से आसकती है। यदि "आत्मा" को आप आने जाने वाला शरीर या सूक्ष्म शरीर समझते हैं, तो जीवन की धारा अविच्छिन्न वा निरन्तर है।

याज्ञवल्क्य के दो स्त्रियां थीं, मैत्रेयी और कात्यायनी। वे बड़े धनी थे। वे भारत के अत्यन्त सम्पत्तिशाली राजा के गुरु थे। दोनों स्त्रियों में अपना धन बांट कर वनगमन (एकान्त सेवन) को उनकी इच्छा हुई। मैत्रेयी ने अपना

हिस्सा लेना नामंजूर किया। उसने कहा, यदि धनसे अमरता मिल सकती होती, तो मेरे पति उसका त्याग न करते।

आप देखते हैं कि मैत्रेयी के दिल में यह ख़याल पैदा हुआ कि "मेरे प्रिय पति, जो भारत के एक बहुत बड़े धनी हैं, इस दौलत को छोड़ कर दूसरी तरह का जीवन क्यों अपना रहे हैं। अवश्य ही एक तरह का जीवन छोड़कर दूसरी तरह का जीवन कोई भी मनुष्य तब तक नहीं ग्रहण करता जब तक नये जीवन में पुराने की अपेक्षा अधिक सुख, अधिक चैन नहीं समझ पड़ता। इससे स्पष्ट है, अपने वर्तमान जीवन की अपेक्षा मेरे पति को उस जीवन में अधिक सुख चैन होगा जिसे वह ग्रहण करने वाला है।" उसने सोचा और अपने पति से पूछा। क्या "सांसारिक सम्पत्ति की अपेक्षा आध्यात्मिक सम्पत्ति में अधिक सुख है, अथवा इसके विपरीत है?"

याज्ञवल्क्य ने जवाब दिया। "अमीरों की ज़िन्दगी जो कुछ है सो है, परन्तु उसमें असली सुख, सच्चा आनन्द, वास्तविक स्वाधीनता नहीं है।" तब मैत्रेयी ने कहा, "वह कौन सी चीज़ है जिसकी प्राप्ति मनुष्य को स्वतंत्र बना देती है, जिसकी प्राप्ति मनुष्य को लौकिक लोभ और तृष्णा से मुक्त कर देती है? वह जीवन-सूत्र मुझे बताओ, मैं उसे चाहती हूँ"।

याज्ञवल्क्य का सब धन और दौलत तो कात्यायनी के हाथ लगा, और मैत्रेयी को उनकी सब आध्यात्मिक सम्पत्ति मिली। वह आध्यात्मिक सम्पत्ति क्या थी?

न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति।

न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भव ॥

बृह॰ उपनिषद्।

इस पंक्ति के कई अर्थ हैं। मैक्समूलर ने इसका कुछ और ही अर्थ किया है। बहुतेरे हिन्दू एक दूसरा ही अर्थ करते हैं। दोनों अर्थ ठीक हैं।

एक अर्थ के अनुसार, "पति के प्रिय होने का कारण यह नहीं है कि उस में कुछ गुण हैं या उसमें कोई विशेषता है जो प्यार के योग्य है. उस के प्रिय होने का सबब यह है कि वह स्त्री के दर्पण का काम देता है। जिस तरह से हमें शीशे में अपना प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है, उसी तरह अपने पति रूपी दर्पण में स्त्री अपने आप को देखती है, और इसी लिये वह पति को प्यार करती है, इसी से पति उसे प्यारा है।"

दूसरा अर्थ यह है कि "स्त्री पति को पति के लिये नहीं प्यार करती, बल्कि इस लिये कि उस पति में सच्चे तत्व, परमेश्वर, सच्चे परमात्मा के दर्शन होने चाहिये।"

आप जानते हैं कि यदि प्रेम के बदले में प्रेम नहीं मिलता, तो कोई प्रेम नहीं करता। इस से जाहिर होता है कि दूसरे में प्रतिबिम्बित केवल अपने आप ही को हम प्यार करते हैं। हम अपने सच्चे आप (आत्मा) को, भीतरी ईश्वर को देखा चाहते हैं, और कभी किसी वस्तु को हम उसी के लिये प्यार नहीं करते।

यह एक कल्पना है। इसे जाँचिये, इस की छान-बीन कीजिये, और आपको यह मालूम होगा कि वस्तुओं के प्यारी होने का कारण सच्चा अपना आप है। सम्पूर्ण मधुरता आप

के भीतर के सच्चे अपने आप (आत्मा) में है। ऐसे भावों का दुरुपयोग न करो। जो सीढ़ी सदा तुम्हारे चढ़ने के लिये लगी है उसे अपने को अज्ञान या संकट में गिराने या उतारने वाली न बनाओ। इस मामले को जाँचो और देखोगे कि सच्चा माधुरी, सच्चा आनन्द, सच्चा सुख कहाँ है। जानोगे कि वह केवल तुम्हारे अपने आप, सच्ची आत्मा, ईश्वर में है। इसे देखो और स्वतंत्र (मुक्त) हो जाओ। इसे जानो और सब सांसारिक आकांक्षाओं से ऊपर उठो। अपने को उठाओ, इन सब नीची, तुच्छ इच्छाओं से अपने को ऊपर उठाओ। ईश्वर से एक होजाओ।

न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति।

बृ॰ उपनिषद्।

"सचमुच, लड़के के लिये लड़के प्यारे नहीं हैं, किन्तु अपने (आत्मा) लिये लड़के प्यारे हैं"।

"लड़के सच्चे अपने आप, सच्ची आत्मा के लिये प्यार हैं"। जब तुम्हारे लड़के तुम्हारे विरुद्ध हो जाते हैं, तब तुम खिन्न होते हो, उन्हें भगा देते हो, अपने पास से हटा देते हो। अरे, तब तो तुम देख सकते हो कि लड़के किस के लिये प्यारे थे।

उदाहरण के लिये, तुम्हें अपने लड़के के लिये कुछ कपड़ों की जरूरत पड़ती है। तुम्हें कपड़े बहुत अच्छे लगते हैं, परन्तु कपड़े कपड़ों के लिये तुम्हें प्यारे नहीं हैं बल्कि लड़के के लिये प्यारे हैं। लड़का कपड़ों से अधिक प्यारा है। इस तरह हम देखते हैं कि लड़का अपने निजआत्मा

आत्मा के लिये प्यारा लगता है। आत्मा में, सच्चे अपने आप में अवश्य ही लड़के से अधिक सुख, अधिक आनन्द है।

न वा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति ॥ 5 ॥

( वृहदारण्यक उपनिषद्, दूसरा अध्याय, 4 ब्राह्मण )

"सचमुच, सम्पत्ति के लिये सम्पत्ति प्यारी नहीं है, किन्तु अपने आप के लिये सम्पत्ति प्यारी है"।

तुम इस देवता और उस देवता से विनय करते हो, और कहते हो कि "हे देव! आप बड़े श्रेष्ठ हैं, आप बड़े कृपालु और दयालु हैं, आप बड़े सुन्दर हैं, आप ही सब कुछ करते हैं" इत्यादि। ऐसा आप क्यों कहते हैं ? इसलिये कि देवता आपकी जरूरतों को पूरा करता है, इसी कारण से कि देवता आप के अपने आप की, आप में असली सच्चे अपने आप की सेवा करता है। देवता के लिये आप देवता की विनय नहीं करते, बल्कि अपने लिये करते हैं। इस पर ध्यान दो। सच्चा अपना आप सब सुखों का, आनन्द का, मूल है। इसे जानो और इसे अनुभव करो।

हिन्दुस्तानी कठपुतली के तमाशे में एक आदमी परदे के पीछे बैठा रहता है, और उसके हाथ में बहुत से महीन तार होते हैं। ये तार पुतलियों की स्थूल देह से जुड़े रहते हैं। जो लोग पुतलियों का नाच देखने आते हैं, उन्हें ये महीन तार नहीं दिखाई पड़ता, और न उन तारों का खींचने वाला ही परदे के पीछे बैठा देख पड़ता है। इसी तरह, इस संसार में, ये सब स्थूल शरीर, स्थूल कठपुतलियों के तुल्य हैं। आम तौरसे लोग इन्हीं स्थूल शरीरों को वास्तविक रूप से करने

वाला, स्वतंत्र, और कर्ता मानते हैं, और वाह्य देह-दृष्टि अथात् परिच्छिन्नात्मा की ही दृष्टिसे सब वात चीत करते हैं। वे शरीर को स्वतंत्र कर्ता समझते हैं, और यदि उनके मित्र तथा नातेदार उनके अनुकूल कुछ करते हैं या उनकी सेवा शुश्रूषा करते हैं, तो वे प्रसन्न होते हैं। पर यदि मित्र और नातेदार आपके विपरीत काम कर बैठते हैं तो घृणा, निराशा, फूट और बेचैनी पैदा हो जाती है, और मित्रों तथा नातेदारों को चाहने के बदले आप उनसे नफरत करने लगजाते हैं। ये एक प्रकार के लोग हैं। दूसरी प्रकार के लोग जो उच्च श्रेणी के हैं, महीन तार, डोरों पर बड़ा ज़ोर देते हैं। ये लोग अधिक बुद्धिमान्, अधिक तत्वज्ञ, और अधिक आध्यात्मिक हैं। ये लोग महीन तार, महीन डोरे की सारी महिमा बताते हैं। स्थूल शरीर रहित और स्वतंत्र भौतिक वस्तु वा भूत प्रेत को ये लोग प्रत्येक कर्म का सच्चा कारण समझते हैं। भूत प्रेत से अभिप्राय इनका निज आत्मा नहीं बल्कि सूक्ष्म शरीरधारी निशाचर वा प्रेतनर होता है। अपनी हद तक ये लोग ठीक हैं। वे एक कारण और कार्य की दृष्टि रखते हैं। वे सूक्ष्म तार और स्थूल शरीर पर उसके प्रभाव को देखते हैं, परन्तु हम जानते हैं कि, मनुष्य से सम्बन्ध रखने वाली शक्ति, पर्दे के पीछे असली तत्व वा वस्तु, इन महीन तागों या तारों को खींचनेवाली असली शक्ति, सब को भान करने वाली शक्ति, ये सब के सब यथार्थ में उसी अवर्णनीय शक्ति या आत्मा से नियंत्रित होते हैं जो देश, काल या वस्तु से परिच्छिन्न नहीं है। यही सच्ची अमरता, यथार्थ सुख, आनन्द और प्रसन्नता है। यही सब कुछ है। यही आत्मा है।

इन सब उपद्रवों से स्पष्ट होता है कि लोगों के ये सकल सम्बन्ध और सम्पर्क (connections) मानो मानवजाति

के लिये उपदेश हैं, वे मनुष्यों के लिये एक प्रकार की शिक्षा हैं। तुम्हारे सांसारिक सम्बन्ध और सांसारिक काम आगे चलकर जिस महान् अवस्था में तुम्हें खींच ले जाते हैं, वह अपने निजस्वरूप का अनुभव है, जो तार खींचनेवाला या पर्दों की ओट में असली तत्व है। ये उपद्रव आप पर स्पष्ट करते हैं कि आप को अपने आप का अनुभव करना चाहिये, आप को अपने स्वरूप की असलियत का बोध होना चाहिये, जो सब के पीछे है, जो मनुष्य के मन और शरीर का भी शासक और नियन्ता है। लोगों क मन और शरीर भी इस परम शक्ति, इस वास्तविक प्रेम, इस उत्कृष्ट तत्व के शासन के अधीन हैं

इस तरह यह देखना और समझना है कि जब आप किसी सुहृद का अवलोकन करते हो, तब आप उसकी ओट में स्वयं अपने शुद्ध स्वरूप का अवलोकन करते हो; जब आप उसे वातचीत करते सुनते हो, तब सुनने की क्रिया का नियमन आप के भीतर के निज स्वरूप द्वारा होरहा है; जब किसी मित्र की शक्ति तुम्हारे ध्यान में आती है, तब उसके भीतर परमेश्वर पर तुम्हारा ध्यान जाता है। जब तुम्हें इस शक्ति का परिज्ञान होजाता है, तब तुम धोखे में नहीं होते, तुम्हें क्लेश नहीं होता, तुम क्षुभित नहीं होते।

ठीक जैसे लोग जड़ पुतलियों को देखते हैं, उसी तरह वे जानते हैं कि इस सब के पीछे शक्ति मेरा सच्चा स्वरूप है।

लोगों के कामों के पीछे की ताकत को देखो। उसका अनुभव करो, और जानो कि तुम वही हो। उसे भी उसी उग्रता या गंभीरता से जानो जिस उग्रता से तुम रूप और रंग को जानते हो।

ब्रह्म तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद। क्षत्रं तं परादात् योऽन्यत्रात्मनो क्षत्रं वेद। लोकास्तं परादुर्यो अन्यत्रात्मनो लोकान् वेद। देवास्तं परादुर्यो अन्यत्रात्मनो देवान् वेद। भूतानि तं परादुर्यो अन्यत्रात्मनो भूतानि वेद। सर्वं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद। इदं ब्रह्म, इदं क्षत्रम्, इमे लोकाः, इमे देवाः। इमानि भूतानि, इदं सर्वं, यदयमात्म ॥ 6 ॥

बृ. उपनिषद्।

"जिस किसी ने ब्राह्मणत्व को अपने आत्मा से अन्यत्र देखा, उसे ब्राह्मणत्व ने त्याग दिया। जिस किसी ने क्षत्रियत्व को अपने आत्मा से अन्यत्र देखा, उसी को क्षत्रियत्व ने त्याग दिया। जिस किसी ने लोकों को आत्मा के सिवाय कहीं अन्यत्र समझा, उसी को लोकों ने त्याग दिया। जिस किसी ने देवताओं को आत्मा के सिवाय कहीं अन्यत्र जाना, उसको देवताओं ने दूर कर दिया। जिस किसी ने प्राणियों को आत्मा के सिवाय कहीं अन्यत्र देखा, उसी को प्राणियों ने त्याग दिया। जिस किसी ने भी किसी भी वस्तु को आत्मा के सिवाय कहीं अन्यत्र देखा, उसी को हरेक वस्तु ने त्याग दिया। यह ब्राह्मणत्व, यह क्षत्रियत्व, ये लोक, ये देव, ये प्राणी, यह सब वही आत्मा है' यह आत्मदेव की स्पष्ट और सरल व्याख्या हुई है।

इसे अपने दिलों में उतर आने दो, और तब आप अनुभव करोगे कि आप स्वाधीन हैं, तब आप अपना जन्मस्वत्व लौटा पाओगे।

"ये ब्राह्मण वर्ग, वेद, सब कुछ वही आत्मा है", वह ईश्वरीय नियम है। यदि किसी भौतिक पदार्थ पर आप उसी

के लिये भरोसा या निर्भर करोगे, तो वेद और विधि (दैवी-विधान) के कथनानुसार आपको परास्त होना पड़ेगा। आपको अपनी दृष्टिगत वस्तुओं से पर होना चाहिये। यही विधान है। जब किसी महान् पुरुष या किसी अति शक्तिशाली शासक के सामने आप पहुंचते हो और उसके शरीर या उसके व्यक्तित्व पर आप भरोसा करने लगते हो, तब, वेद का कथन है, तुम बहुत ही निर्बल नरकुल का सहारा लेते हो और आप गिर पड़ेंगे। आप पाप करते हो, क्योंकि उस की सच्ची वास्तविकता या आत्मा की अपेक्षा आप उसके शरीर को अधिक महत्व देते हो। सत्य वस्तु के स्थान पर आप भूठ रूपरंग को बैठाते हो। आप अन्तर्गत परमेश्वर को, भीतर के आत्मतत्व को भूठा करते हो। आप प्रतिमा पूजते हो, आप शरीर की आकृति की उपासना करते हो, आप की पूजा केवल मूर्ति पूजा है, न कि परमात्मा या ईश्वर पूजा, और आपको इसका परिणाम-स्वरूप व्यथा और पीड़ा भोगना पड़ेगी। यही दैवी-विधान है। वेद कहते हैं कि अपने सांसारिक कामों क करने में भी भीतर के परमेश्वर या आत्मा पर दृष्टि रक्खो। लोगों को चाहिये कि सांसारिक कामों को कम महत्व का माने, उसे स्वप्न मात्र समझें, न कि अन्तर्निहित सत्य या आत्माके समान महत्वपूर्ण समझें। तत्व को व्यक्तित्व से अधिक समझो। मित्र का चित्र उसी चित्र की खातिर नहीं बल्कि मित्र की खातिर प्यारा होता है। मित्र चित्र से अधिक प्यारा है। पदार्थों के सम्बन्ध में स्वयं पदार्थ की अपेक्षा तत्व को ही अधिक देखना चाहिये। ऐसा करने स सांसारिक सम्बन्ध और सांसारिक काम बड़ी मधुरता से, सरलता से, अविषमता से चलेंगे। अन्यथा संघर्ष, दिक्कत और क्लेश होगा। यही विधान है।

यहाँ पर हम एक कहानी कहेंगे:—

एक छोटे गाँव में एक दीवानी औरत रहती थी। उसके पास मुर्गा था। गाँव के लोग उसे छेड़ा करते थे, उसके नाम धरा करते थे, और उसे बहुत परेशान करते और क्लेश पहुँचाते थे। अपने पास रहने वाले अपने गाँव के लोगों से उसने कहा, " तुम मुझे तंग करते हो, तुम मुझे हैरान और दुःखी करते हो; देखो, अब मैं तुमसे बदला लूंगी।" पहले लोगों ने उसके कहने पर कोई ध्यान नहीं दिया। वह चीखी, "गाँव वालो, खबरदार ! सावधान ! मैं तुम पर बड़ी सख्ती करूँगी"। उन्होंने उससे पूछा कि तू क्या करने वाली है। उसने कहा, "मैं इस गाँव में सूर्य न उदय होने दूँगी"। उन्होंने उससे पूछा, कि किस तरह वह ऐसा करेगी। उसने उत्तर दिया, "जब मेरा मुर्गा बाँग देता है, तब सूर्य उदय होता है। यदि तुम मुझे इसी तरह दिक करते रहोगे, तो मैं अपना मुर्गा लेकर दूसरे गाँव को चली जाऊँगी, और तब इस गाँव में सूर्य न उदय होगा"।

यह सही है कि जब मुर्गा बाँग देता था तब सूर्य उदय होता था, किन्तु मुर्गे की बाँग सूर्योदय का कारण न थी। कदापि नहीं। उस बड़ा क्रोध था, उसने गाँव छोड़ दिया और दूसरे गाँव को चली गयी। जिस गाँव में वह गयी, वहाँ मुर्गा बोला और उस गाँव में सूर्योदय हुआ। किन्तु जिस गाँव को वह छोड़ आई थी उसमें भी सूर्य उदय हुआ। इसी प्रकार मुर्गे का बाँग देना आपकी अभिलाषाओं की मँगनी और चाह भरी प्रकृति है। आपकी अभिलाषायें मुर्गे की बाँग की तरह हैं, और आपकी इच्छित वस्तुओं का आपके सामने आना सूर्योदय के समान है। इच्छित वस्तुओं की चाह या उत्कट अभि-

लाषा का उत्थान, शासन नियंत्रण और नियमन एक अनन्त वा शुद्ध आत्मा रूप सूर्य के द्वारा होता है। सच्चा स्वरूप वा शासक सूर्य ही है, जो सुबह या शाम, दिन या रात को उत्पन्न किया करता है। इसी शुद्ध आत्मा, रूप अनन्त वस्तु द्वारा सब सांसारिक व्यवहार परिचलित और अनुशासित होते हैं। यह इन्द्रियों में प्रवेश कर जाता है। यह तार खींचने वाला उन्हीं सूर्यों के सूर्य और प्रकाशों के प्रकाश स्वरूपसे नियंत्रित होता है। यह याद रक्खो।

साधारणतः लोग ये सब बातें तुच्छ, भिखारी, मुखड़, स्वार्थी अपने आप पर आरोपित करते हैं। यह भूल न करो, कृपया इससे बचो। जाँचो तो। जो सूर्य मुर्गे की आँख में प्रवेश करता है, और उसका गला खोल कर उससे बाँग दिलवाता है, प्रातःकाल को सुशोभित करने वाला भी वही सूर्य है। किन्तु मुर्गे की बाँग और सवेरे का होना वास्तव में सूर्य की सुख-प्रद गर्मी और शक्ति द्वारा शासित या सम्पादित होता है। एक ओर इन जीवित पदार्थों को, और दूसरी ओर अपने विचारों को देखो, ये सब उसी सूर्यों के सूर्य, प्रकाशों के प्रकाश, वास्तविक स्वरूप, आत्मा, शुद्ध अपने आप से शासित, नियंत्रित और व्याप्त होते हैं। इस तत्व को जानो और स्वाधीन बनो। मिथ्या आरोपण मत करो। गलत अर्थ न निकालो। पदार्थों को ही सच्चा मत समझो। जब हम वस्तुओं को ही पीड़ा और रंज का असली कारण समझते हैं, तब हमारा विश्वास भ्रान्त है। ऐसा समझो, ऐसा अनुभव करो, और सब चीज़ों को एक गहरा मज़ाक, महान नाटकीय अभिनय (खेल) माना। कोई क्लियोपैट्रा (Cleopatra) या मैकबेथ (Macbeth) का अभिनय (खेल) भले ही करे, किन्तु अस-

लियत में वह आत्मघाती या नरघाती नहीं है। वह राजा या रानी नहीं है। वह केवल अभिनेता (Actor) है। और वह अमुक अमुक भलामानुस है।

इसी तरह, आप कोई भी काम करो, पर यह न भूलो कि आपका सच्चा स्वरूप परमेश्वर है। जान लो कि "मैं हूँ" निर्विकार है, वही सम्पूर्ण आनन्द है, समग्र सुख है। इसे न भूलो। इसे समझो और मुक्त वा स्वतंत्र हो जाओ।

स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न वाह्याञ् शब्दाञ् शक्नुयाद् ग्रहणाय, दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ 7 ॥

( वृह॰ उप॰ अ २ ब्रा॰ 4 मं॰ 7 )

"अब जिस तरह ढोल का शब्द, जब वह पीटा जाय, बाहर से नहीं पकड़ा जा सकता, किन्तु शब्द तभी पकड़ा जाता है जब ढोल या ढोल का पीटने वाला पकड़ा जाता है"।

(इसी प्रकार) इच्छा के सब भौतिक पदार्थ तभी पकड़े जा सकते हैं जब कि वह, जो उनकी उत्पत्ति का मूल है और जिससे वे निकलते हैं, पकड़ा जाय।

स यथा शंखस्य ध्मायमानस्य न वाह्याञ् शब्दाञ् शक्नुयाद् ग्रहणाय, शंखस्य तु ग्रहणेन शंखध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ = ॥

"जिस प्रकार शंख की ध्वनि, बजते समय, बाहर से नहीं पकड़ी जा सकती, किन्तु ध्वनि तभी पकड़ी जा सकती है जब शंख या शंखका बजाने वाला पकड़ लिया जाय"।

(इसी प्रकार) जिसकी ब्रह्म से पकता है, उसकी सब इच्छायें परिपूर्ण हो जाती हैं। उसे कभी कोई धोखा न देगा। उसे कभी कोई पीड़ा या कष्ट प्राप्त न होगा।

स यथा सर्वा साम्प्नां समुद्र एकायनमेवं सर्वेषां स्पर्शानां त्वगेकायनम्, एवं सर्वेषां गन्धानां नासिके एकायनम्, एवं सर्वेषां रसानां जिह्वैकायनम्, एवं सर्वेषां रूपाणां चक्षुरेकायनम्, एवं सर्वेषां शब्दानां श्रोत्रमेकायनम्, एवं सर्वेषां संकल्पानां मन एकायनम्, एवं सर्वासां विद्यानाम् हृदयमेकायनम्, एवं सर्वेषां कर्मणां हस्तावेकायनम्, एवं सर्वेषामानन्दाना- मुपस्थ एकायनम्, एवं सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनम्, एवं सर्वेषामध्वनां पादावेकायनम्, एवं सर्वेषां वेदानां वागेकायनम् ॥ 11 ॥

"जिस तरह जल मात्र का केन्द्र समुद्र है, इसी प्रकार सब स्पर्शों की त्वचा, सब रसों (स्वादुओं) की जिह्वा, सब गन्धों की नाक, सब रंगों का नेत्र, सब शब्दों का कान, सब संकल्पों का मन, सब विद्या का हृदय, सब कर्मों का हाथ, सब गतियों का पैर, और सब वेदों की वाणी केन्द्र वा गति है।

उसी तरह सम्पूर्ण संसार और संसार के सब पदार्थों का केन्द्र निज स्वरूप, पवित्र आत्मा में है। सब रंगों का केन्द्र भी उसी में है। सब शब्दों, रंगों, रसों, इन्द्रियों द्वारा कर्मों का अपना केन्द्र केवल आत्मा या निजस्वरूप में मिलता है। उसी से हरेक वस्तु निकलती है।

स यथा सैन्धवखिल्य उदके प्रास्त उदकमेवानुविलीयते, न हास्योद्ग्रहणायेव स्यात्। यतो यतस्त्वाददीत लवणमेव। एवं वा अर इदं महद्भूत मनन्तमपारं विज्ञानघन एव, एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य संज्ञास्तीत्येर अब्रवीमि, इति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ 12 ॥

"पानी में डाला जाने पर नमक का ढेला जिस तरह गल जाता है और फिर निकाला नहीं जा सकता, किन्तु सब

खारी (पानी) में नमक का ही स्वादु मिलता है, उसी तरह सचमुच, हे मैत्रेयी. यह अनन्त, निःसीम, महाभूत, जो विज्ञान स्वरूप मात्र है, इन तत्त्वों से आविर्भूत होता है और फिर इन्हीं में विलीन हो जाता है। हे मैत्रेयी. मैं कहता हूं, जब वह चला जाता है, तब कोई संज्ञा नहीं रहती"। यह याज्ञवल्क्य ने कहा। इन तत्त्वों का अनुभव हो जाने पर मनुष्य की उससे एकता हो जाती है, तब वह नाम और रूप के आश्रित नहीं रहता।

न होवाच मैत्रेयी, अत्रैवमा भगवान् मोहान्तं 'न प्रेत्य संज्ञास्ति', इति।

तब मैत्रेयी ने कहा, यह कह कर आपने मुझे भ्रम में डाल दिया है कि "जब वह चला जाता है, तब उस (प्रेत) की संज्ञा नहीं रहती"।

मैत्रेयी के मन में सन्देह हुआ कि यदि यह आप ही सब क्लेशों का ज्ञान चला है, यदि यही कष्ट और रंज तथा प्रत्येक उत्पत्ति का कारण है, यदि हमारा मन कुछ भी नहीं है, यदि हमारा व्यक्तित्व जब विनष्ट हो जाता है, तब तो अवश्य हमारा पूर्ण लोप है। इसलिये उसने कहा, "मैं लोप नहीं चाहती। आप का यह अपना आप किस काम का जबकि वह विलोप, मृत्यु, विनाश रूप है? मैं इसे नहीं चाहती, यदि सर्वस्व खोना पड़ेगा, तो भी मैं इसे नहीं चाहती"।

स होवाच, न वा अरेऽहं मोहं ब्रवीम्यलं वा, अर इदं विज्ञानाय ॥ 13 ॥

यत्राहि द्वैतामिव भवति, तदितर इतरं जिघ्रति, तदितर इतरं पश्यति, तदितर इतरं शृणोति, तदितर इतरमभिवदति, तदितर इतरं मनुते, तदितर इतरं विजानाति; यत्र वा अस्य

सर्वमात्मैवाभूत, तत् केन कं जिघ्रेत्, तत् केन कं पश्येत्, तत् केन कं शृणुयात्, तत केन कमभिवदेत्; तत केन कं मन्वीत, तत केन कं विजानीयात्? येनेदं सर्व विजानाति, तं केन विजानीयात्? विज्ञातारमरे केन विजानीयात्? ॥ 14 ॥

याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया—"हे मैत्रेयी, मैंने भ्रम में डालनेवाली कोई बात नहीं कही। प्रिय! जानने के लिये यह काफी है।

क्योंकि जहां यह द्वैत सा होता है, वहीं एक दूसरे को सूंघता है, एक दूसरे को देखता है, एक दूसरे को सुनता है, एक दूसरे का अभिवादन करता है, एक दूसरे को मनन करता है, एक दूसरे को जानता है। किन्तु जब इसका आत्मा ही यह सब कुछ हो गया, तो कौन किस को सूंघे, कौन किस को देखे, वह किससे किस को सुने, कैसे वह किसी का अभिवादन करे, किस से किस को मन में लावे, किस से किस को जाने? जिस से यह सब वह जानता है उसको वह किससे जाने? प्रिय, वह विज्ञाता (अपने) को किस से जाने?"

न सुनने के दो कारण हो सकते हैं। एक तो यह कि कोई मनुष्य बहरा और गूंगा हो, और दूसरा यह कि आप से बाहर (परे या पृथक) कोई शब्द ही न हो। (ऐसे ही) न देखने के दो हेतु हो सकते हैं। एक तो आप का अन्धापन, और दूसरे आप के सिवाय किसी और वस्तु का न होना जिसे आप देखें। न सूंघने के भी दो ही कारण हो सकते हैं। एक तो आप में सूंघने की इन्द्रिय का न होना, दूसरे आप से बाहर सूंघी जाने वाली किसी वस्तु ही का न होना। इस तरह यहां मैत्रेयी ने यह शंका की है कि यदि

(अद्वैत अवस्था में) वास्तविक वा शुद्ध आत्मा से ही हमें सुनना, देखना, सूंघना, रसास्वादन करना पड़ता है, तो (ऐसी अवस्था में) वस्तुतः क्या हम बहरे और गूंगे या अंधे तो नहीं हो जाते? इस शंका का समाधान यह कह कर किया गया है कि अपने भीतर शुद्ध-आत्मा में देखने के कारण ऐसा नहीं है, बल्कि इस लिये है कि अनन्त स्वरूप (आत्मा) के सिवाय कोई और वस्तु है ही नहीं, जिसे आप देखें। यह बात नहीं है कि सुनने की शक्ति न रहने के कारण आप कुछ नहीं सुनते. बल्कि कारण यह है कि सुनने को कुछ है ही नहीं। न कोई द्वैत है, न अन्त है। ऐसे ही न कोई पदार्थ है जिनका आप मनन करें; वहां आप कुछ नहीं विचारते, इसका कारण यह नहीं है कि आपकी विचार-शक्ति जाती रही, बल्कि इस लिये कि आत्मा के सिवाय कोई अन्य, पदार्थ है ही नहीं। फिर, यह दिखलाया गया है कि वहां केवल अनन्त आत्मा होने से वही अनन्त आत्मा कानों के सुनने और नाक के सूंघने का कारण है। यह सब कुछ आत्मा की ही शक्ति के कारण से है। नेत्र देखते हैं तो आत्मा के ही प्रताप और प्रकाश के कारण। एक अनन्त आत्मा ही सकल इन्द्रियों के अस्तित्व का हेतु है।

मन जब उस अनन्त अवस्था में, उस अवर्णनीय लोक में पहुंच जाता है, तब (अपने से भिन्न कुछ और) वह अनुभव नहीं कर सकता; क्योंकि विचार वहां प्रवेश नहीं कर सकता। विचार शक्ति उसे कैसे वेध सकती है जिसके द्वारा उसका शासन होता हो?

कल्पना करो कि हमारे पास दो फलटों वाला एक चिमटा है। यह चिमटा आपकी अंगुलियों के अधिकार में होता है।

चिमटे के फलटे आप की अंगुलियों के मज़बूत चुंगल में हैं, और इन फलटों से आप जो चीज़ चाहें पकड़ सकते हैं। किन्तु फलटों में यह ताकत नहीं है कि पलट कर आप की, उन अंगुलियों को पकड़ लें जो इन फलटों को पकड़ कर चलाती हैं।

इसी तरह आप की चेतना या बुद्धि, मन या दिमाग, चिमटे के फलटों की तरह हैं, किन्तु यह चिमटा विलक्षण प्रकार का है। साधारणतः चिमटों में दो फल या फलटे होते हैं, किन्तु इस चिमटे के तीन फलटे वा चंगुल हैं। एक चुंगल तो 'क्यों' का है, दूसरा चुंगल 'कब' का है, और तीसरा फलटा (चुंगल) 'कहां' का है, अर्थात् देश, काल और वस्तु क्या है।

किसी बात या तथ्य को पूरी तरह समझने का क्या अर्थ है?

पूरी तरह से किसी चीज़ को समझने का अर्थ उसे इन चुंगलों से, इन फलटों से मज़बूती के साथ पकड़ना है। जब किसी चीज़ का "क्यों", "कब", और "कहां" आप जान लेते हैं, तब आप उसे समझ जाते हैं, उसका बोध हो जाता है। यों कह सकते हैं कि तब वह आपके, बुद्धि के, अधीन स्थित है। आपकी बुद्धि उसमें और उसके मध्य में होकर स्थित है, और वह बुद्धि के अधीन स्थित है।

बुद्धि, समझ, तीन चुंगलवाले विचित्र चिमटे के समान, है। बुद्धि से सब चीजें समझी जा सकती हैं, किन्तु इसके साथ ही यह बुद्धि, आपका यह चित्त, खुद चिमटे की तरह शरीर रूपी "राज्य" के इस विचित्र "शासक" व विचार कर्ता के शासनाधीन है। समझ इस विचित्र शक्ति (आत्मा) के शासन के अधीन है, उसके प्रभुत्व में है।

क्या आपकी बुद्धि, आपका चित्त स्वतंत्र है? यदि हां, तो यह सुसुप्ति की दशा में, गाढ़ निद्रा की अवस्था में, क्यों नहीं है? यदि वह स्वतंत्र होती तो सब दशाओं में ऐसी ही रहती। वह स्वाधीन नहीं है। बुद्धि, समझ, एक उच्चतर शक्ति के वश में है। बुद्धि में यह बल नहीं है कि वह उलट कर अनन्त, वा शुद्ध आत्मा को पकड़ ले, जिसके अधीन कि वह स्वयं है। वह आप से यह प्रश्न नहीं कर सकती, "क्यों, कब और कहां तुम थे?" बुद्धि "असली" व शुद्ध "आत्मा" से प्रश्न करने की शक्ति नहीं रखती। बुद्धि आत्मा को समझ या ग्रहण नहीं कर सकती। आत्मा बुद्धि से ऊपर है, परे है।

बुद्धि यद्यपि आत्मा को ग्रहण नहीं कर सकती, तथापि वह अपने को उसमें वैसे ही निमज्जित कर सकती है जैसे बुलबुले समुद्र में। बुद्बुदे समुद्र से बाहर नहीं निकल सकते. किन्तु वे फूट कर उसमें डूब सकते हैं। इसी प्रकार बुद्धि आत्मा को ग्रहण नहीं कर सकती किन्तु वह अपने को आत्मा में लीन कर सकती है। और वस्तुतः माया का यही सारांश और तात्पर्य है। बुद्धि आत्मा या परमेश्वर से यह नहीं पूछ सकती, "क्यों, कब और कहां तुमने दुनिया की सृष्टि की?" साहसपूर्वक वह प्रश्न नहीं कर सकती।

यह आत्मा, तत्व का सच्चा समुद्र, यह शासक और परिचालक स्वरूप, यह अनुभव करने योग्य, निदिध्यासन करने योग्य, देखने योग्य और जानने योग्य है जिससे अनन्त के साथ एक होजाय। यह सच्चा स्वरूप या आत्मा "मैं हूं" कहलाता है। यह सच्चा स्वरूप वा पूर्ण "अहं" देश, काल वस्तु से परे है। इस पूर्ण, सच्चे स्वरूप का निरूपण ॐ से किया जाता है। ॐ का अर्थ है 'मैं हूं', और ॐ को

उच्चारण करते समय आपको किसी दूसरे के प्रति सम्बोधन नहीं करना पड़ता। ॐ का उच्चारण करते समय यह न समझो कि आप अपने से बाहरवाले किसी दूसरे को पुकार रहे हो। ॐ को उच्चारण करते वक्त आप अपने को इस सच्चे "मैं हूं" से एक समझो। ऐसे दृढ़ भाव से चित्त तत्व में निमग्न हो जाता है। इस पक्के विश्वास से, चित्त के इस सजीव ज्ञान से. चित्त मानो एक जल-बुदबुदा सा होजाता है, जो तत्व के अगाध "समुद्र" में फूट जाता है। आत्मानुभव का यही मार्ग है। मन के इस सजीव ज्ञान का तुम्हें पकड़ लेना, तुम्हारे मिथ्या अहंकार का हरे लेजाना, ही तुम्हें स्वाधीन कर देने वा तत्व की प्राप्ति का मार्ग है।

सच्चा "मैं हूं" इस शरीर में और उस शरीर में (अर्थात् प्रत्येक देह में) दिखाई देता है। सत्य स्वरूप "मैं हूं", शासक परिचालक. नियामक, अनन्त आत्मा इस नन्हे अणु में भी वैसा ही है जैसा विराट, शक्तिशाली समुद्र में। सब देश-काल-वस्तु में एकसा है। ठीक ऐसा समझो, अनुभव करो कि आप वह सत्य स्वरूप "मैं हूं" हो. अनुभव करो कि आप अनन्त, अविनाशी आत्मा हो और फिर देखो कि कैसा रूपान्तर होता है, आपकी स्थिति में कैसा महान परिवर्तन हो जाता है। यही विचारने को आप यावत् दिशा में व्याप्त हो, कि आप सब काल में हो. कि आप वह आत्मा हो जो समग्र दिशा का आश्रयदाता है, कि अनन्त देश आप पर निर्भर है, आप उसे उठाये हुए हो। अनन्त देश, अनन्त काल, अनन्त वस्तु, अनन्त शक्ति, अनन्त तेज, वला-यह मैं हूं। यह तथ्य अज्ञान का नहीं है। अपने को मैं जो कुछ भी समझता हूं उसका वास्तव में यह कारण है, और यही कारण सदा

आपका भी है। ऐसा विचार करो और आप ऊपर उठ जाते (उन्नत हो जाते) हो, आप सकल स्वार्थमय उद्देश्यों से मुक्त हो जाते हो। इस पर निश्चय करो, और यह (निश्चय) सब चिन्ताओं और रंजों को छिन्न-भिन्न कर देता है; सब द्वेषों, लोभों, दिक्कतों और उत्पातों से आप छूट जाते हो। अनुभव करो कि आप वह "मैं हूं" हो। वही आप हो।

आप की बुद्धि को अपने कारण से पूछने का कोई अधि- कार नहीं है, कारण से अपने को एक करने का कोई अधि- कार नहीं है।

यह दुपट्टा या उपरना लो। अगर यह किसी चीज़ से तद्रूप होता है, तो उसे अवश्य उस रेशम से ही तद्रूप होना चाहिये कि जिसका यह बना है, अथवा जिसमें इसका आविर्- भाव हुआ है। अपनी लम्बाई, चौड़ाई, या मोटाई से इसे अपने को तद्रूप करने का कोई अधिकार नहीं है।

इसी तरह, यदि बुद्धि को अपने को किसी से तद्रूप करना है तो अपने ही तत्व से, अपनी सत्य प्रकृति से ही (जिसकी कि वह बनी हुई है) उसे तद्रूप होना चाहिये। उसे बुदबुदा हो जाना चाहिये, और फूट कर महान समुद्र, आत्मा "मैं हूं" से एक हो जाना चाहिये। देह से उसकी एकता नहीं की जा सकती। देह तो केवल एक कार्य, परि- णाम है। और इसीलिये देह से अपने को एक करने का बुद्धि को कोई अधिकार नहीं है।

अरे! सत्य ईश्वर को, आत्मा को, इस श्रेष्ठ शक्ति को सांसारिक सम्बन्धों, दुनयवी मामलों से एक नहीं किया जा सकता। तुम वही श्रेष्ठ परमात्मा हो। सत्य तत्व हो। यह जानो, यह विचारो, यह अनुभव करो, और (इस तरह) सकल क्लेशों तथा शोकों से परे हो जाओ वा छूट जाओ।

I. The dear ones part, The foes depart, Relatives die, *Get snapped all ties Our systems gay May have their day And pass away, The trees decay ; Birds merrily play But fall a prey The flowers fade Light turns to shade, Our loves are changed, Beauties deranged, Names, fames do wane, All glory is vain ! Fickle, transient is all This show, it palls All objects sweet Attract but cheat, They treat, deceive, defeat II. Any thing the best We choose for rest ; The last, the first, That we choose to trust When it feels our toes

* (Get snapped the ties) alternate reading.

(नोट—इस भाग के प्रथम उपदेश-"नित्य जीवन का विधान-" में जो अंग्रेज़ी कविता थी उसका अनुवाद शीघ्र न होने के कारण उसे अब यहां दिया जाता है)

1. बिछुड़ते हैं प्रिय जन, अलग होते दुश्मन, मरे जाते हैं बन्धु, मिटते हैं बन्धन ॥ हमारी प्रणाली जो सुन्दर बनी है, भले ही रहे वा बिगड़ जावें इक दिन ॥ नशेंगे य कदप; औ कल रव मचाते ये पक्षी भी दुनियां से उठ जायं इकछन। मुरझ जायंगे फूल फूले हैं जो आज; छाया से उद्योति का होता परिवर्तन ॥ बदलतीं हमारी प्रणय प्रीतियां भी; घो सुन्दर स्वरूपों का होता विमर्दन ॥ नाम सम्मान होते दुनियां के नष्ट, सब दिखावट, विभव, हाट है व्यर्थ भ्रष्ट। क्षणिक हैं सभी, है न इनमें कोई बल, है दुनियां तमाशा जो लेती हमें छल ॥ ये सुन्दर मोहक वस्तु सभी थारी जो मन को लगती है पहले अपना, मन हाथ में कर, छल से फिर मार गिराती है

2 चाहे मद्दोन्नम कुछ होवे. जिसको आधार बनाते हैं, होवे वह प्रथम चाहे अन्तिम जिस पर विश्वास बढ़ाने हैं। जैसे हा निर्भर होते हम, वे धोखा दे दूर जाते हैं। हम जैसे प्यार लगें करने, प्रिय पात्र तुरत नस जाते हैं

Lo ! down it goes No sooner we love Than things dissolve Of confiding we think And in foam we sink.

III. Is all at last A dream of past ? Is nothing true He, I, or you ? Is all a myth This kin and kith ? Oh ! where shall I turn ? To whom return The heart that burns The breast that yearns ? Oh ! Unrequitted Love ! Oh ! innocent stricken Dove !

IV. See, in this scene of changing shows There is a changeless One that glows, In seeming death, decay, and pain It changes dress but comes again, Love That, nor dress ; love Him, nor things, He changes the dress and flings ; Old garments gone Fresh forms puts on

हम सोचा (करते) मन ही मन, 'इनपर विश्वास करें मनभर।' इतने में बुल्ला फूट पड़े, हम डूब चलें वस मौक्के पर ॥

3 क्या सचमुच मैं जो कुछ भी है— सब अतीत का स्वप्न है। क्या 'मैं', 'तुम.', 'वह' का भेद सभी, कुछ भी नहीं किञ्चित् सत्य है ॥ क्या प्रिय परिजन भी मिथ्या हैं? हा दैव ! किधर तब मैं जांऊ ? यह व्याकुल चित्त, हृदय विदग्ध— किसे समर्पित कर आऊ ? दुनियां में है प्रेम निरर्थक, कोई न प्रतिफल हाय ! 'हंस' विचारा दोप बिना ही, यों ही मारा जाय !!

दुनियां के सब नज़ारे कैसे बदल रहे हैं; पै इन में एक अविकल देखो चमक रहा है। इन भासमान मरने दुख और दर्द में वह पोशाक भर बदल कर फिर फिर प्रकट रहा है ॥ उस पर ही प्रेम रक्खो न कि वस्तु, आवरण पर नित आवरण बदल कर वह दूर कर रहा है ॥ प्राचीन वस्त्र छूटे; नित्य स्वच्छ सुन्दर पहने

He is neat and clean And whenever seen New Forms he wears Unthought of, rare. One order passed, another came, In both is He, the same. How sweet is loss, privation ! He bears Himself, 'tis Revelation. How sweet His stripping grace ! Still sweeter the new face ! The sky, the breeze, the river, rose Such veils of gauze for self He chose. Hide as Thou mayst, I feel Thee, Covers don't conceal but reveal Thee. The forms are chased by one another That we may see the One they cover.

V. O what a rosary ! This world, I see. One bead is told, You say it dies ; Another passes and another and another, Yet the thread survives

देखो अचिन्त्य अनुपम नव रूप धर रहा है ॥ पहले प्रपंच टूटे, नूतन प्रकट हुए हैं, दोनों ही वस्तुओं में वह एक सा वसा है ॥ दुःख, हानियों में कैसी माधुर्य की घटा है, इन में ही व्यक्त होता, यों ही वह खुल रहा है ॥ उसकी यह नग्नता की शोभा मनोहरा क्या ! पर नव वदन छटा तो। उस से मधुरतर है ॥ पर्दा उसने चुना है निज मुख ढकने को यह भिखरी द्वार। मन्द पवन, औ गगन, नदी, औ कुसुम आदि का सब विस्तार॥ चाहो जैसे, छिपो भले ही, मुझसे छिपना है दुश्वार। पर्दे तुम्हें नहीं छिपाते, उल्टे करते खूब उघार॥ एक रूप के बाद दूसरे इसी लिये वह आते हैं— देख सकें हम उसको जिसको वे इस तरह छिपाते हैं ॥

5 अहा, संसार एक माला है, भरा जिसमें अनेक दाना है ॥ इक दाने को देख तुम नसते, "नहीं कोई तत्त्व इनमें" कहते ॥ एक के बाद इक बिगड़ता है किन्तु धागा कभी न घटता है ॥

That thread Divine Is mine, is mine ! That golden thread I cherish ; Let pass the forms or perish.

VI. These fleeting forms — Mere morning charms ! They dawn and die — Mayavic lies ! These things that seem Are nothing but dreams, Of That Eternal Sun The changeless one.

VII. On foes and friends I won't depend I won't recline On shows divine. For bodily health Or earthly wealth, What care I ? My Love and I ! To the seeming things I will not cling These forms of dress— Mere pawns of chess I'll see them all Not moved at all,

कैसा-सुन्दर दिव्य धागा है, हमारा है, वही हमारा है ॥ है व स्वर्ण सूत्र पै मेरा दिल— क्यों न 'रूप' जाय मिट्टी मिल ॥ 6 प्रभात कालीन माधुरी ज्यों नाशिक सदा 'नाम रूप' ही त्यों। प्रपंच माया ये झूठ रचती— अभी बनी है, अभी विगड़ती ॥ अनन्त है जो रवि तेजवाला, है जो कभी न बदलने वाला। उस एक के ये स्वप्न भर हैं पदार्थ जो सर्व भासते हैं ॥

दोस्त दुश्मनों पै रक्खूंगा, मैं हरगिज़ विश्वास नहीं। दिव्य दर्शनों पर भी होगा, हरगिज़ मुझे भरोस नहीं ॥ शारीरिक नैरोग्य तथा, पाने को पार्थिव वैभव भी। मैं परवाह भला क्या करता ? मैं औ मेरा प्यारा भी !! जो हैं भासमान दुनियां में, उन पै कभी न भूलूंगा; इन शतरंज पियादों, गुड़ियों, को निर्मम हो देखूंगा ॥

There, that and this I will not miss. My Love is found, It's all around. Oh ! Him I trust Love Him I must. The One in plurality, The only Reality ! My all in all On Him I call ! My friend so true My chela, Guru, My father, child. My fireside ! My husband, wife Myself, my life My only right The Light of lights My storm, my calm, My balm, my Rama. Om !

मेरा प्यारा मिला मुझे, अब उसको कहीं न खोऊंगा; है सब ओर, उसे मानूं मैं, प्रेम में उसको दूंगा ॥ अनेकता में है 'एक' तत्त्व जो, केवल है जो सत्य वही। है सर्वस्व हमारा वैभव; टेर रहा हूं उसको ही ॥ ऐसा पक्का दोस्त वही है, चेला औ गुरू भी मेरा, जनक हमारा, प्यारा बच्चा, वही-वही घर भी मेरा ॥ प्राण-वल्लभा, अथवा पति मम, स्वयं, और जीवन मेरा * वही दीप्ति की दीप्ति अहो ! है केवल मात्र स्वत्व मेरा ॥ शमानिल और शान्ति हमारी, जीवन-मूर्ति हमारा 'राम' अनेकता में है "एक" तत्त्व जो वही, वही है जो सतनाम ॥

॥ श्रीप्रेम् ॥

________________________________ * (अथवा पाठान्तर से)—मैं औ जीवन धन मेरा।