पत्र-मंजूषा।
( नोट—ये पत्र उर्दू रिसाला अलिफ़ के नं० 4 के अन्त में प्रकाशित हैं, और रिसाला अलिफ़ की प्रथम जिल्द के सब लेख तो ग्रन्थावली में छप चुके थे, केवल ये पत्र ही छपने रह गये थे, जिन का ठिकाना अब यहां दिया जाता है।)
मैनेजर रिसाला अलिफ़ की ओर से।
प्रिय पाठको ! अलिफ़ के तीन लेक्चरों के बाद जब चौथी बेर उपदेश आरंभ हुआ, तो वह अभी आधा समाप्त होन न पाया था कि "आनंद" जिसपर पहला लेक्चर था और जिसकी खोज में सारा संसार भटकता फिरता है, "राम" के सामने आकर हाथ जोड़े सेवा में खड़ा हो गया। और स्वीकार करने लगा कि "निस्संदेह मैं वही आपका अपना आप हूं, आप ही से प्रकट हुआ हूं, नहीं नहीं, आप ही में हूं।" और, "राम" से अभेद होकर इस प्रकार राग अलापने लगा—
जो सुख नित्य प्रकाश विभु नाम रूप आधार। मति न लखे जेहि मतिलखे, सो मैं शुद्ध अपार। अवधि अपार स्वरूप मम, लहरी विष्णु महेश। विधि, रवि, चंदा, वरुण, यम, शक्ति धनद गणेश ॥ जा कृपाल सर्वज्ञ को हिय धावत मुनि ध्यान। ताको होत उपाधि ते मो में मिथ्या भान ॥ है जेहि जाने बिन जगत् मन हु जेवरी सांप। नसे भुजंग जग जेहि लहे, सोऽहं आप ही आप ॥
जब यह दशा होगई, और चारों ओर आनंद तरंगायित हो गया, संसार सागर में दुःख के स्थान पर सुख की लहरें लहराने लगीं, समय ने पल्टा खाया; तो "राम" को यही भाया कि वन को सिधारे। "नारायण" "ओम्" की सुरीली
ध्वनि उच्चारण करते हुए, 'अलिफ़' का भंडा हाथ में लिये संग पधारे। संसार के रास-मंडल में कृष्ण की भांति जब "राम" लोगों की दृष्टि से एक दम अंतर्धान हुए, तो नाद हुआ कि प्रत्येक के हृदय में, प्रत्येक के मस्तिष्क में, प्रत्येक की आंखों में मेरा निवास है, अमीर और क्या फ़क़ीर-राजा और क्या रंक-के नाम, रूप और नाड़ी नाड़ी की विद्यमानता 'राम' ही के सहारे है। शरीरों की कोठरियों के भीतर बुरे या भले विचार परमाणुओं की भांति मुझही प्रकाशस्वरूप की (Stray beams) प्रविष्ट रश्मियों में निवास रखते हैं।
"नहनो अकरबो इलह मिन हबिलुल वरीद।"
अर्थ—शाह रग (कंठ) से भी प्रभु समीपस्थ है।
तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके । तदन्तरस्य सर्वस्य। तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥ (यजु० ईशा० मं० 5)
तात्पर्य—हम चल हैं, हम चल हैं नाहीं, हम नेढ़े, हम दूर। हम ही सब के अंदर चानन, हम ही बाहर नूर ॥ 1—पे तालिबाँ ! पे तालिबाँ ! मन वा शुमा हर जास्तम। हम जलवागर दर दीदहा, हम मज़मरे-दिलहास्तम॥ 2—ई दूरी-ओ-महजूरियम, अज़ वहमे-पिंदारे-शुमास्त। दर निस्वते-खुद वा शुमा, दरिया-व-मौज आसास्तम ॥ 3—वा गुस्ने-खुद वर वाख़्तम, मन नज़दे-इश्को-आशिक़ी। हम लैली औ मजनू मनम, हम वामिक़ो उज़रा स्तम ॥ 4—गाहे नियाज़ ईमाने-मन, गह वे नियाज़ी-शाने-मन। ईं हर दो मी ज़ेबद वमन, हम वंदा औ मौला स्तम ॥ 5—हम सूरते-नाख़ूतेम, हम मानी-ए-लाहूतेम्। पिनहाँ तर ज़ पिनहाँ व हम पैदा तर अज़ पैदा स्तम ॥
6—वर ख़फ़्से-रमएँ-ई जहाँ, दर पर्दा मीवाशम अयाँ । चंदाँ कि वे पर्दा शावम, दर पर्दा-ए-अज़फ़ा स्तम ॥
अर्थ—(1) ऐ जिज्ञासुओ ! ऐ जिज्ञासुओ ! मैं हर स्थान पर तुम्हारे साथ हूँ, तुम्हारी आँखों में मैं प्रकाशमान हूँ और तुम्हारे हृदयों में मैं छुपा हुआ हूँ ।
(2) यह मेरी भिन्नता और केवल जुदाई तुम्हारी समझ की भ्रांति से है । तुम्हारे साथ मेरा संबंध नद और तरंग की तरह है ।
(3) अपने सौंदर्य के साथ मैं प्रेम और प्रेमिकता की बाज़ी हारता हूँ, लैली और मजनूँ भी मैं हूँ और वामक और उज़रा भी मैं हूँ ।
(4) कभी प्रार्थना मेरा ईमान है, कभी उदारता मेरा गौरव है, ये दोनों मुझको शोभा देती हैं, क्योंकि बंदा (जीव) और मौला मैं ही हूँ ।
(5) जाग्रत अवस्था और स्वप्न अवस्था की सत्यंता में हूँ, क्योंकि गुप्त से गुप्त और प्रकट से प्रकट मैं हूँ ।
(6) इस संसार के चलन के विरुद्ध मैं परदे में भी प्रकट हूँ, जितना कि मैं बेपर्दा (प्रकट) हूँ, उतना ही छिपाव के पर्दों में (छिपा) हूँ ।
अहा ! "राम" के समक्ष क्या आनंद-भरे "ॐ" के सुरीले और मस्त राग गाए जा रहे हैं कि जहाँ दुःख और दर्द की आवाज़ की बिलकुल पहुँच नहीं । "राम" अपनी महिमा में मस्त है । आनंद ही आनंद चारों ओर से उमड़ा चला आ रहा है । अलबत्ता अपनी मस्ती उमड़ने के कारण या इधर का प्रेमपत्र जब कभी उधर पहुँचता है, उसके उत्तर में जो संक्षिप्त से उत्तर आते रहे हैं, वह नीचे क्रमानु- सार पाठकों के सम्मुख उपस्थित किए जाते हैं ।
पत्र-संख्या 1
रात का बहु है वियाबाँ है । खुशगवार पर्बतों में मैदाँ है ॥ आसमां का बताएँ क्या हम हाल । मोतियों से भरा हुआ है थाल ॥ चाँद है मोतियों में लाल धरा । अब है थाल पर रूमाल पड़ा ॥ सर पे अपने उठाके पेश थाल । रक़्स करती है नेचर-खुशहाल ॥
वाद का क्या मज़े की सूफ़ी है । रामके दिल की बात बूझी है ॥ पास जो वह रही है गंगा जी ।- अठखेरे उसके लदलदाते ही ॥ ला रही लपक कर है राम के पास । क्या ही ठंडक-भरी है गंगा-वास ॥ फ़ख्रे-खिदमत से बाद है खुरसंद । जा मिली बादलों से हो के बलंद ॥- अब तो अठखेलियाँ ही करती है । दामने-अब्र को उलटती है ॥
लो लड़ाया वह पर्दा-ओ-रूमाल । आसमां है दिखाया माला माल ॥ शाद नेचर है, जगमगाती है । आँख हर-चार सू फिरांती है ॥
क्या कहूं चांदनी में गंगा है । दूध हीरों के रंग रंगा है ॥ वाह ! जंगल में आज है मंगल । सैर कर इस तरफ़ की, चल चल चल ॥
ऐ जाँ ! क्या क्या कि है दुनियाये-दीगर अस्त । आबे-दिगर, हवाय-दिगर, जाय दीगर अस्त ॥
अर्थ—ऐ प्राण प्यारे ! इधर आ, इधर आ । यहां संसार ही और तरह का है, क्योंकि यहां का पानी निराला, हवा निराली और स्थान भी निराला है ।
पत्र-संख्या २
आ, देख ले बहार कि कैसी बहार है । टेक गंगा का है किनार अजब सन्ज़ाज़ार है । बादल की है बहार हवा खुशगवार है ॥ और खुशनुमा पहाड़ पै वह चश्मा सार है । गंगा-ध्वनी सुरीली है, क्या लुत्फ़दार है ॥ आ, देखले बहार कि कैसी बहार है !
बाहर निगाह कीजिये तो गुलज़ार है खिला, अंदर सुरूर की तो भला हद कहां ? दिला ! कालिज क़दीम का यह सरे-मू नहीं हिला । पढ़ाता मारफ़त का सबक़ मेरा यार है ॥ आ, देख ले बहार कि कैसी बहार है !
वक़्ते-सवाहे-र्रद तमाशा तयार है । गुलगूना मुँह पै मल के खड़ा गुल अज़ार है ॥ शाहे-फ़लक से या जो हुर आँख चार है ।
नारे शरम के चेहरा बना मुख नार है ॥ आ, देखले बहार कि कैसी बहार है !
क़तरे हैं ओस के कि दुरों की क़तार है । किरणों की उनमें बल से मज़ाफ़त यह तार है ॥ मुर्ग़ाने-खुशनवा, तुम्हें फांते की आर है ? गाशो बजाओ, शव का मिटा दिल से यार है ॥ आ, देखले बहार कि कैसी बहार है !
साक़ी वह मै पिलाता है तुरशी को हार है । हर यक अपना यार भी अपने फ़नार है ॥ वाह ! क्या मज़े का खाने को गमका शिकार है । दर्शन शराबे-नाच, सखुन दिल के पार है ॥ आ, देखले बहार कि कैसी बहार है !
मस्ती मुदाम कार यही रोज़गार है । गुलयाँ निगाह पड़ते ही फिर किसका ख़ार है । क्यों ग़म से तू नज़ार है, क्यों दिल फ़िगार है ॥ जब राम राज्य में तेरे खुद यारे-गार है । आ, देखले बहार कि कैसी बहार है !
पत्र-संख्या 3
दसवां गृह अध्यास है नौ गृह का जो मूल । जव लग देह-अभिमान है तव लग मिटे न शूल ॥ तव लग मिटे न शूल करे केती चतुराई । देव यज्ञे, जप यज्ञे, न सुर कोइ होत सहाई ॥ कहे गिरिधर कविराय ज्ञान दृढ़ देवे चश्मा । मूल अविद्या नाश होय गृह रहे न दसवां ॥
देनी दमड़ी एक नहिं, लेन को न छदाम ।
गाँठ बांच नहिं चालंत, फूटा एक बदाम ॥ फूटा एक बदाम न गावे दुखेर दिन का । बिना अपन आप मरोसा और न जिनको ॥ कहँ गिरिवर कविराय रही न शाकी लर्म । कीनो जर्मा हिसाव न निकसी कौड़ी देनी ॥
In no way can the overflowing joy of Rama be described. Peace reigns supreme here. Bliss fills the mind. There is heavenly cheer- fulness, shedding its divine sun-shine all the time. The mental horizon is growing more and more clear every day. This betokens some- thing very good and grand for India, nay, for the world at large.
While seeing a theatrical performance, people are apt to be deluded by the drama and they would be inclined to weep with the actors and laugh with them while looking at the stage if they had not the firm ground of reality, always beneath their feet, reminding them of what they actualy are. Just so while seeing the great tragedy of the world enacted, let the sublime Truth on which you stand always, put you in mind of your High Self and not allow you to be deceived.
Rama.
अर्थ—राम के भीतर से उमड़ते हुए आनंद का वर्णन किसी प्रकार से भी वस्तुतः नहीं किया जा सकता । हृदय में
शांति सब से बढ़कर राज्य कर रही है (अर्थात् अंतःकरण शांति से लवालब भरपूर है); मन आनंद से भरा हुआ है । 'राम' के भीतर ईश्वरीय (स्वर्गीय) आनंद उमंग मार रहा है, जिसकी ईश्वरीय किरणें (प्रकाश) प्रति समय चमक दमक रही हैं, हृदय का आकाश प्रति दिन अधिक से अधिक शुद्ध निर्मल हो रहा है । यह सारी अवस्था हिंदुस्तान वरन् समस्त संसार के लिये किसी अच्छे और उच्च शकुन को दिखलाती है ।
थिएटर (नाटक) का अभिनय देखते समय यह संभव है कि लोग उस नाटक से धोखा खा जायँ और नाटक करने वालों के साथ रोने और हसने लग पड़ें, विशेषतः उस समय जबकि वह इस बात को बिलकुल भूल जायँ कि यह जो कुछ सामने हो रहा है, केवल तमाशा या खेल है, इससे अधिक और कुछ नहीं । ठीक इसी तरह संसार की विपत्ति का नाटक देखते समय धोखा खाया जाना संभव है, इसालिये उस उच्चतम तत्त्व (सच्चाई) को जिसके आश्रय तुम खड़े हो, हृदय में दृढ़ रूप से स्थिर रक्खो, और अपने स्वरूप को प्रति समय दृष्टि में रक्खो । इस प्रकार अपने आपको धोके में न पड़ने दो ।
जामे ज़ मय बाक़ी अज़ दस्ते-खुश साक़ी । बा कसरते-मुश्ताक़ी मय जोयमो मय रक्ससम ॥ फ़ाश मीगोयमो अज़ गुफ़्ताए खुद दिल शादम । साह्बे-इश्क़मो अज़ हर दो जहाँ आज़ादम् ॥ मस्तो खराब भीरवम फ़िकरे-जहाँ न मी ब्रम । वीम नृदारम अज़ बला तन तलमला तला तला ।
अर्थ—अमृत रूपी सुरा का प्याला शाक़िक (पूर्ण गुरु)
के हाथ से मैं अत्यंत प्रीति के साथ लेने की खोज में हूँ, और उसके प्रेम में नाचता हूँ। खुल्लम खुल्ला मैं यह कहता हूँ और अपने इस कहने से मैं प्रसन्न हूँ कि "मैं प्रेम-संपन्न (प्रेमी-रसिक) हूँ और दोनों लोक (लोक परलोक) से विनिमुक्त हूँ।
उन्मत्त हुआ मैं फिरता हूँ और विश्व की चिंता नहीं करता हूँ, और विपत्ति से बिलकुल नहीं घबराता हूँ, और यह स्वर "तन तलमला तला तला" गाता रहता हूँ।
पत्र-संख्या 4
सरोदे रक्सो शादी दम वदम है। तख्मकुर दूर है और ग़म को रम है॥ मज़व खूवी है, वेहँ अज़ रक्तम है। यक़ीनन जान, तेरी ही रसम है॥ मुवारक हो तवीयत का यह खिलना। यह रसभीनी अवस्था जामे-जम है॥ मुवारक दे रहा है चाँद मुसकर। सलामों स कमर में उसकी खम है॥ पिए आशो दमादम जाम भरकर। तुम्हारा आज लाखों पर क़लम है॥ गुलों से पुर हुआ है दामने-शौक़। फ़लक ख़मा है. कैचाँ पर अलम है॥ तेरे दीदों पै भूले से हो न शवनम। कभी देखा सुना "सूरज पै नम है?"॥ रखें आगे को क्या क्या हम न उम्मेद। कि मारा गुर्गे-ग़म, पहला क़दम है॥ दिखाया प्रकृति ने नाच पूरा। सितेल में उड़ गई, पे है ! सितम है॥
ग़लत गुफ़्तम, शिकायत की नहीं जा। मिली आ पुरुष में; बदलो-करम है॥ न कहता था तुम्हें क्या "राम" पहले। मयारे-ईद आई; रात कम है ?॥
लोग कहते हैं कि मैदानों में रहना ख़ूब है। कौन जाये "राम" अव गंगा की लहरें छोड़कर॥
हर चे दर दुनियास्त वर आज़ादगाँ आमद हराम। ख़ातिरे-जमास्त दर ज़ेरे-फ़लक सामाने-मा॥
अर्थ—जो कुछ संसार में है (अर्थात् सांसारिक वस्तु) मुक्त पुरुषों के लिये हराम है (निषिद्ध है); हमारा सामान इस आकाश के नीचे केवल चित्त की शांति (ख़ातिरजमा) ही है।
पत्र-संख्या 5
जिज्ञासु—(1) हम यह कैसे कह सकते हैं कि "इस शरीर ने यह काम किया जब कि किसी बुरा-भला सुनने से हम यह विचार करते हैं कि मैंने ही यह अपने आप को कहा है, अर्थात् दूसरे के किए हुए काम को अपना ही ख्याल करते हैं ?
(2) सूर्य के प्रकाश में हम सब काम करते हैं किंतु सूर्य अपने आप कुछ काम नहीं करता। इसी प्रकार आत्मा के प्रकाश में हमारा स्थूल या सूक्ष्म शरीर सब काम करता है, आत्मा स्वयं कुछ काम नहीं करता, वरन् केवल देखता है, जैसे सूर्य समस्त संसार के कामों को देखता है, मगर अपने आप कुछ काम नहीं करता। किंतु जब हम दूसरे के काम
को अपना किया हुआ ख्याल कर लेते हैं, तो यह किस प्रकार संभव है कि देखनेवाला काम करनेवाला है ?
(3) जब हम यह कहते हैं कि इस शरीर ने यह काम किया तो स्पष्ट विदित है कि शरीर काम का करनेवाला है; परन्तु वास्तव में शरीर काम करनेवाला नहीं है, क्योंकि मरने के बाद शरीर वैसा ही रहता है; किंतु करनेवाली कोई दूसरी शक्ति उसके भीतर से निकल जाती है जिससे यह कहना भ्रमपूर्ण होगा कि इस शरीर ने यह काम किया।
ज्ञानी—सूर्य के उदाहरण में भी विज्ञान की दृष्टि से सूर्य न केवल कौतुक दर्शक है वरन् स्वयं कौतुक भी है।
स्वप्नावस्था में अपने व्यष्टि रूप से तू रंक या राव आदि बनकर देखनेवाला बना हुआ है, और अपने समष्टि रूप से सब स्वप्न का कौतुक रूप हुआ है। जाग्रत होकर जब अपने आपको ज्यों का त्यों पाता है, तो सब का सब स्वप्न अपना ही प्रकाश (ज़हूरा) दृष्टिगोचर होता है।
सूर्य आदि के उदाहरण थोड़ी दूर तक काम देते हैं, और बस। अद्वितीय स्वरूप को केवल आत्मिक अनुभव ही दिखा सकता है।
लड़का बी॰ ए॰ पास करता है। माता प्रसन्नता के कारण भूमि से दो दो हाथ ऊपर होकर चलती है, मानो उसने तो उपाधि प्राप्त की है। यह क्योंकर? प्रेमके कारण, यद्यपि माता का प्रेम भी प्रथम श्रेणी का नहीं होता। अब ज्ञान जो प्रथम श्रेणी का प्रेम है (एक प्रकार से वह प्रेमकी अति उत्तम अवस्था है) मनुष्य को इस योग्य कर देता है कि पृथिवी भर के व्यापार उसे अपने ही कर्तृत्व ज्ञात हों।
दो प्रकार की भ्रांतियों ने मनुष्य को घेर लिया है—प्रथम संसर्गाभ्यास, द्वितीय स्वरूपाभ्यास। पहले अध्यासको दूर करने के लिये इस रूप में "अहंग्रह" उपासना की आवश्य- कता होती है कि मैं नाम रूप से पृथक हूँ, मैं असंग हूँ, मैं कुछ नहीं करता। शरीर रूपी गंगा की चंचल तरंगों पर अपने प्रतिबिंब के कारण में चंचल दृष्टिगोचर होता हूँ, किंतु मैं वास्तव में डाँवा डोल होनेवाला नहीं।
इस अवसर पर बोल चाल में "इस शरीर ने अमुक काम किया, उस शरीर से यह काम हुआ" इस प्रकार के मुहाविरे चरते जांयगे। तात्पर्य यह कि "शरीर में नहीं हूँ और न कर्मों का कर्ता हूँ।" इसके बाद स्वरूपाभ्यास का दमन करते समय "अहंग्रह" उपासना का यह रूप होता है कि न कोई शरीर है और न कोई काम काज आदि ही है। न यह है और न वह है। न कर्ता है और न कर्म ही है। मेरे शुद्ध स्वरूप में यह सब लोक और परलोक का सिलसिला रस्सी में सर्प के समान भ्रांति पूर्ण है। या यों कहो कि एक मैं ही मैं हूँ, कहाँ की जाति और कहां की विजाति, आदि।
संदली रंगों में माना दिल लगा। दर्दे-सर की किसके माथे जायगी ?
चंदन तो शिर-पीड़ा को हटाता है, किंतु संदली रंगों (चन्दन के रंग) के प्रेम में शिर-पीड़ा उत्पन्न होगई, यह क्यां बना, यह गुत्थी किस प्रकार सुलझे ? शरीर तो पहले ही जड़ था और मैं हुआ आत्मा, शुद्ध चेतन, किंतु असंग। मैं सव कामों से इनकार करता हूँ, परों पर पानी नहीं ठहरने देता, कर्तृत्व का मुझमें प्रवेश नहीं और गरीब बेवस जड़ शरीर के माथे समस्त कर्मों का ढब्बा जड़ना भी अत्याचार
है। अब शिर पीड़ा की (बात) अर्थात् कारोवार (व्यवहार) किसके मत्थे जायँ ?
प्रश्न—अमुक चीज़ कौन ले गया ? उत्तर—हौवा ले गया। प्र॰—अमुक काम किसने किया ? उ॰—फ़रिश्तों ने। प्र॰—अमुक मनुष्य कहां है ? उ॰—अंध कुएँ में। प्र॰—रोटी कहां खाई ? उ॰—ड्यूक हम्फ़रे (Duke Humphrey) के हां। प्र॰—अमुक वस्तु क्या हुई ? उ॰—फ़ना (लुप्त) हो गई। इत्यादि
ख़्वाजा ख़िज़र का गवाह मेंढक।
सारबानों की गति के अनुसार एक ऊँट के गले में लकड़ी का छोटा सा टुकड़ा बँधा हुआ लटकता जाता था। उसे देख गाम की एक लड़की ने अपनी माता से पूछा। माँ माँ ! इस के गले में क्या है ?
माँ बेचारी ने लकड़ी का वैसा टुकड़ा तो एक और रहा, ऊँट भी नहीं देखा था, प्यार और आश्चर्य से बोली—"बच्ची! ऊँसों के गले में ऐसे ही हुआ करते हैं।"
शरीर और बुद्धि जड़ और आत्मा असंग। पति (पुरुष या ब्रह्म) नपुंसक और वहू जी (माया) वाँझ !
प्यारे जब यह हाल है तो अंधेर करता है वह जो जगत् और जगत् के व्यापार को सत्य मानता है। जिस दृष्टि से आत्मा असंग है और शरीर जड़ है (इन दोनों में से एक भी
काम करने के योग्य नहीं), उस दृष्टि से काम काज ही नहीं है। "संसार ही कहाँ ? इस शरीर ने यह काम किया है" इस के यह अर्थ है कि जिस (Category) को शरीर belong करता है (अर्थात् जिस वर्ग या अवस्था में शरीर सम्मिलित है) उसी (category) में काम काज आदि भी सम्मिलित हैं। तात्पर्य यह कि न काम काज ही real (सत्) और न शरीर ही सत् (real), काम काज पोपलियाना और शरीर साटकी। (पैसों के लिये वैसे)। ज्ञान वान् रूपी सूर्य ने न कभी अंधेरा ही देखा है और न कभी उल्लू चमगादड़ ही उसे देखते हैं।
कच्चे वेदांत और सांख्य शास्त्र के अनुसार काम-धंधे की यह व्याख्या और विवरण (explanation) किया गया है कि यद्यपि धूप और Lens (आतशी शीशा, अग्नि उत्पादक कांच) अलग-अलग कपड़ें को आग लगाने योग्य नहीं हैं, किंतु दोनों मिलकर अग्नि उत्पन्न कर सकते हैं, या जैसे अधा मनुष्य (प्रकृति, शरीर, बुद्धि) अकेला यदि चाहे तो बाटिका के वृक्षों पर से फल नहीं तोड़ सकता है, और लँगड़ा या लुंजा पुरुष (आत्मा) अकेला यदि चाहे तो वह भी वृक्ष पर चढ़कर फल नहीं खा सकता है, पर हां यदि दोनों मिलजायं और अंधे की पीठ पर लुंजा सवार हो ले, तो फल उतार सकते हैं और आनंद से खा सकते हैं, वैसे ही दोनों के संग (कुचक्र) से संसार के व्यापार का क्रम चल रहा है। पर कोई पूछे कि सूर्य और अंधकार भी परस्पर मिले हैं ? हवा और मच्छरों का मेल कैसा ? आत्मा से भिन्न कुछ है ही नहीं, मेल मिलाप किससे ?—
वहदत अंदर डेरा लाया। औथे गैर न आया जाया। न कोई ईश्वर न कोई माया। आपे आप न खोया पाया॥
वे शुभा जलवागर है सब जा "राम", माहो-चादल हुआ है उसका धाम। बल्कि है ठीक ठीक बात तो यह, उसमें है वूदो-वाशे-आलमे-सेह॥ वह अमूरत है, मूरती उसकी, किस तरह हो सक ? कहाँ ? कैसी ? कुल्ले-शयन मुहीत है आकाश, मूरती में न आसके परकाश। जो है उस एक ही की मूरत है, जिस तरफ़ भांके उसकी सूरत है। माहो-खुरशेदो-चरख़ो-अंजुमो-नार, जान करते हैं 'राम' पर ही निसार। क्या है यह ? किस तरह हुए मौजूद ? इक निगह पर है सब की हस्ती ओ बूद। ख़्वाब मेरा ख़याल मेरा है, जो ज़मीनो-ज़मां ने घेरा है। ख़्वाब में हैं ख़याल की दो शान, जुज़्वी, कुल्ली, "यह एक में", "यह जहाँ" "मैं हूँ इक मर्द" शाने-जुज़्वी है, "जुम्ला आलम" यह शाने-कुल्ली है। मैं ही शाहिद बना हूँ, मैं मशहूद, शान मेरी है, आसमाने कबूद। जलवा मेरा यह अंचसाती है, बीज माया ही फैल जाती है। लैक माया यह आ गई क्योंकर ? रूए-आलम सजा गई क्योंकर। जूँ रसन में पिदीदे-सूरते-मार,
मुझ में माया नमूद है तुमार। यह स्वरूपाभ्यास है इज़हार, ज्ञान मुझको रहे न माया यार। फ़ितनागर आईना में चश्मे-निगार, भूठ है, गो है यार से दो चार। यह जो संसर्ग से हुआ अध्यास, सानी यकता को ला दिखाया पास। माया आईना कैसी खुरसंद है, मज़हरे-'राम' सच्चिदानन्द है। मिहर शाहिद कहीं न हिलता है, शीशे हिलते हैं, यूँ वह फिरता है। कुछ नहीं काम रात दिन आराम, काम करता है फिर भी सब में 'राम' दाना ख़शख़श का एक बोया था। माया आदम ने इत्तिदा में ला। एक दाने में ज़ोर यह देखा, बढ़ गया इस क़दर, नहीं लेखा। इस क़दर बढ़ गया, फला फैला, जमा करने को न मिला थैला॥ एक दाना हक़ीर छोटा सा, अपनी ताक़त में क्या बला निकला। आज बोने को दाना लाते हैं, उस की ताक़त भी आज़माते हैं। यह भी ख़शख़श ही का दाना है, यह भी ताक़त में क्या थगाना है। हू वही है वही तो इस में भी, शक्ति आदम के बीज में जो थी।
सब बताएँ है यह वही दाना, न यह फैला हुआ न दो गाना। और से देखिए हक़ीक़त को, नज़र आता है बीज क्या तुमको। मेरे प्यारे ! तू ज़ात-वाहिद है, तेरी क़ुदरत अगरचे बेहद है। जान नहीं का जबकि साँइसदाँ, तजह्हुव का है कादरा यकसाँ। जिस्म गो हो गया हो दो टुकड़े, एक मरत नहीं वह यूँ कीड़े। पेश्तर काटने क एक ही था, जब दिया काट, दो हुए पैदा। दोनों वैसा ही ज़ोर रखते हैं, जैसे वह कीड़े जिस से काटे हैं। क्या दिखाता है खोलकर यह बात, काटने में नहीं है आती ज़ात। एक शीशे में एक ही रू था, शीशा टूटा अदद बढ़ा रू का। ज़ुद हो, बकर हो, उमर ही हो, मज़हरे-"आदमी" है कोई भी हो। गो है नक़्श का मारफ़ों में ज़हूर, नाम रूपों में है यही भरपूर। पर यह नक़ला बज़ाते-ख़ुद क्या है ? इस में हिस्सों का दख़्ल बेजा है। इस्म फ़रज़ी शक्ल बदलती है, पर जो तू है सो एक रस ही है। तू ही आदम बना था तू हव्वा।
ज़ात तेरी ही एक थी उस जा। तू ही था 'राम' तू ही था 'रावन' तू ही था वह गडड़िया वृंदावन। झूठ तुमको सनम न ज़ेवा है, तू ही मीला है, छोड़ दे "है है", सीमवर का वह चाँद सा मुखड़ा, तेरा मज़हर है, नूर का टुकड़ा। दिल जिगर सब का हाथ में हैं तेरे. नूर-मोफ़ूर साथ में है तेरे।
पत्र-संख्या 6
मेरे अपना आप !
क्या ठीक लिखा है—'ज़रा अपने शीशए-दिल में तो झाँक लिया होता।"
वस्तुतः यही बात है। सच पूछो तो दिखावे का पत्र- व्यवहार एक निकम्मी लीला है। हज़ारों कोसों पर बैठे हुए महाशयों के हृदयों की दशा हस्तामलक की तरह दृष्टिगोचर हो जाती है।
बख़्वाबे-ख़ुद दर आ, ता क़िवलए-रूहानियां चीनी।
अर्थ—तू अपनी नींद में आ (अर्थात् अपने भीतर देख) जिसमें तू रूहानियों का क़िवला (देवलोक) देखे।
दिल के आईने में है तसवीरे-यार। जब ज़रा गर्दन झुकाई देख ली॥
पीतम पतियाँ तब लिखूँ जब तुम बसो विदेश। मन में तन में जान में वाको क्या संदेश।
ह्वाग्वोह-तो अम जानाँ व मेदानम कि मेदानी। कि हम ना दीदा मेदानी व हम ननादिश्ता मेखवानी॥ 2 गचें दूरेम व यादे-तो क़दह मे नोशेम। वोदे-मंज़िल न बुवद दर सफ़रे-रूहानी॥
अर्थ-(1) ऐ प्यारे ! मैं तेरा शुभचिंतक हूँ और मैं यह भी जानता हूँ कि तू इस बात को जानना है, क्योंकि तू विना देखे क जान लेता है और बिना लिखे के पढ़ लेता है।
2 यद्यपि हम दूर हैं किन्तु तेरे स्मरण में प्रेम का प्याला पीते हैं, क्योंकि इससे आत्मिक यात्रा में विश्राम की दूरी मालूम नहीं होती।
पत्र-संख्या 7
अभ्यास के संबन्ध में
बिलकुल एकांत में बैठकर 'ॐ' गाते जाओ और हृदय- दर्पण में एक-एक करके उन सब महाशयों को उतारो जो आप से किसी प्रकार की शत्रुता रखते हों, या थोड़े बहुत रुष्ट रहते हों। उनको अपने अंतःकरण के गम्भीरतल से आशीर्वाद दो, उनका भला चाहो, और अत्यन्त प्रेमसे अपनी परम प्रिय वस्तुएँ उनकी सेवा में उपस्थित कर देनेको तत्पर हो जाओ। उनके साथ "मन तो शुदम तो मन शुदी=मैं तू हुआ और तू मैं हुआ=यूयं वयं वयं यूयम्" का भाव कर दो, क्रोध और गिल्ला बिलकुल क्षमा। रूठे मनाये गप्।
गर ज़ दस्ते-ज़ुल्फ़े-मुश्कीनत ख़ताए रफ़्त रफ़्त। वर ज़ हिंदूए-शुमा वर मा जफ़ाए रफ़्त रफ़्त॥ गर दिले अज़ ग़मज़ए-दिलदार ख़ारे बुर्दे बुर्दे। दरमियाने जानो जानाँ माजराए रफ़्त रफ़्त॥
अर्थ-यदि तेरी मुश्की जुल्फ़ (माया) से कोई अपराध हुआ, तो क्षमा किया गया और यदि मेरे (मुक्तिमंडल के काले) तिल से हमारे ऊपर कोई अत्याचार हुआ, तो वह भी भुलाया गया। यदि हृदय ने प्रियतम के संकेत से कुछ बोझ उठाया तो सह लिया गया; प्रेमी और प्रेमपात्र के बीच में यदि कोई भी बात हुई, तो वह भुलाई गई, भुला दी गई।
नखों से मांस पृथक नहीं हो सकता। यद्यपि ऊपर से वह क्लेश देते हों, किंतु हैं तो तुम्हारा ख़ास अपना आप। वह इस बात से अनजान है तो क्या ? आप तो सच्चे संबंध से अनजान नहीं। जैसे अपने बच्चों को लोग बिना किसी बदले की दृष्टि से प्यार करते हैं, वैसे ही तुम भारतवर्ष की मिट्टी तक को प्यार किए बिना रह न सको। प्रत्येक के देहों का उसी दृष्टि से देखो जैसे अपने छोटे बच्चों के खेलों को देखते हो। बंदरों से अधिक तंग करने वाला बेसमझ और कष्ट पहुँचाने वाला भी किसी ने होना है ? किंतु प्रीति के बल से "राम" ने उनको अपनी सेना बना लिया। पुराणोंमें लिखा है, जो मनुष्य भगवान् से वैर और घोर शत्रुता करने की राह पर चले थे उनका अपेक्षाकृत बहुत शीघ्र कल्याण हुआ और वे मुक्त हुए। प्यारे ! निस्संदेह वह व्यक्ति अवतार ही है जो शत्रुओं को सब से पहले अपना धाम आदि देने को उपस्थित रहा है। प्यारे ! सच्ची प्रीति और प्रेम (जिससे सर्वत्र अपना आप ही दृष्टिगोचर होता है) जब आता है, तो अंधे को आँखें मिल जाने की तरह होता है। संसार ही और हो जाता है। चहुँ ओर पुष्पोद्यान खिल जाते हैं। स्वर्ग ही स्वर्ग हो जाता है।
नेकी सदा किया कर उसकी बदी के बदले। क़तले-अदू के क़ाबिल शमशेर है तो यह है॥
मुवारक वाद्त ऐ दिल ! गश्त वीना दीदए-कोरत। नुमायाँ शुद, व हरसू सूरते-यारे-निको सीरत॥
अर्थ-ऐ दिल ! तुझको मुवारक (धन्यवाद) हो कि तेरी अंधी आँख देखनेवाली होगई, और अब शुद्ध अन्तःकरण सुहृद् (मित्र) का स्वरूप चहुँ ओर प्रकट होने लग पड़ा है।
जो व्यक्ति धन, तन और मन से हार्दिक संबंध तोड़ बैठता है, और जैसे पहले एक विशेष शरीर को अपना समझता था, वैसे ही अब प्रत्येक शरीरको बिलकुल (अपना आप) जानता है, वह धीरे-धीरे सब के हृदयों से जानकर होने की सिद्धि को प्राप्त होगा, आत्मप्रकाशता के लिये यह एक आवश्यक अंश है। प्रेम और आनन्द में सरत्ता और मग्नमत्ता फिरने वाले के मन और प्राण से इस प्रकार के गीत निकलते रहते हैं। दफ़्तर में, बाज़ार में, घर में और बाग़ बगीचे में जादूभरी प्रेम-दृष्टि वाला अपनी जिह्वा से यह गाता फिरता है।
न दुशमन है कोई अपना न साजन ही हमारे हैं। हमारी ज़ाते-मुतलक़ से हुए यह सब पसारे हैं॥ न हम हैं देह मन बुद्धी नहीं हम जीव न ईश्वर। वले इक "कुन" हमारी से बने यह रूप सारे हैं॥ हमारी ज़ाते-नूरानी रहे इक हाल पर दायम। कि जिसकी चमक से चमकें यह मिहरो-मह सितारे हैं॥ हर इक हस्ती की है हस्ती, हमारी ज़ात पर क़ायम। हमारी नज़र पड़ने से ही नज़र आते नज़ारे हैं॥ वरंगे-मुखतलिफ़ नामो-शकल जो दमक मारे है। हमारे तूर के शोले से उठते यह शरारे हैं॥
माशूक़ ऌद् दरख़्तों पै वेलों का हार है । नैं, नैं, ग़लत है जुल्फ़ का पेंचाँ यह मार है ॥ वाह वा सजे सजाए हैं कैसा शृंगार है । अशजार में चमकता है ख़ुश आवशार है ॥ आ, देख ले वहार कि कैसी वहार है ।
अशजार सर हिलाते हैं क्या मस्तवार हैं । हर रंग के गुलों से चमन लाला ज़ार है ॥ भौंरे जो गुंजते हैं पढ़े ज़र निगार है । आनंद से भरी यह सदा ओंकार है ॥ आ देख ले वहार कि कैसी वहार है !
गंगा के रू सफ़ा से फिसलती न गर नज़र । लहरों पै अफ़्स मिहर का क्यों बेकरार है ॥ विष्णु के शिव के घरका असासा यह ज़ंग है । याँ मौसमे-खिज़ां में भी फ़सले-वहार है ॥ आ, देख ले वहार कि कैसी वहार है !
Say peace to all from me no danger be To aught that lives. In those that dwell on high, In those that lowly creep. I am the Self of all. All life both here and there do I renounce, All heavens, earths and hells, all hopes & fears. Thus cut thy bonds, Sannyasin bold ! say, Om tat sat, om! अर्थ—सब को मेरी ओर से शांति कह दो । मुझसे
किसी को चाहे वह इस संसार के हों अथवा परलोक के हों, किसी प्रकार का भय नहीं, और न भूमि के कीड़ों-मकोड़ों को ही मुझसे भय है । मैं सबका अपना आप ( आत्मा ) हूँ । मैं यहां और वहां ( लोक और परलोक ) के समस्त जीवन को, स्वर्ग, नरक और संसार की समस्त उमंगों और चिंताओं को बिलकुल त्यागता हूँ । रे बहादुर संन्यासी ! इसी प्रकार से अपने बंधनों को तू काट डाल, और ॐ तत् सत् ॐ तत् सत् का जाप कर ।
जिस बात से कभी मनमें उदासीनता या अशांति आवे उस बात की कामना ही मिटा देना आनन्द का द्वार है ।
जब ओढ़नी नहीं ओढ़ें, तब क्या करेगा कोई ।
श्याम तन, श्याम मन, श्याम ही हमारो धन, ? श्याम बिन काम कोऊ कैस बन आवे है ?
हरि सँग व्याह रचो रंग रँगना ( टेक ) । आओरे बम्हना, बैठो मोरे अँगना । खोलो रे पोथी, देखो मोरे लगना ॥ हरि सँग व्याह, हरी सँग सँग ना । हरि सँग मँगनी, हरी सँग गमना ॥ हरि संग व्याह॰—
पत्र-संख्या 8 ।
आज प्रातः लगभग २ बजे के निकट असंप्रज्ञात समाधि के कैलाश से वासंती वायु का झोंका आया था । वह हर्षजनक शुभ समाचार के रूप में "कृष्ण" की मोहर के साथ गंगाजल से लिखकर रवाना किया गया । आज सायंकाल
रिम झिम वर्षा हो रही थी । "राम" के शुद्ध सतोगुणी मंदिर के आंगन में अग्निकुंड के चतुर्दिश "नारायण" "मदनमोहन" और "तुला-राम" बैठे नित्य-नियमानुसार उच्च स्वर से अंतःकरण से आँसू बहाते हुए यह वेदमंत्र बेर-बेर गा रहे थे—
तं त्वा भग प्रविशानि स्वाहा, स मा भग प्रविश स्वाहा । तस्मिन सहस्र शाखे निभगाहं त्वयि मृजे स्वाहा ॥ तात्पर्य—"हे ॐ ! हे परमात्मा ! तू हमें अपने स्वरूप में प्रविष्ट हो जाने दे, स्वाहा ! तू हमारे रोम-रोम में प्रविष्ट हो जा. स्वाहा ! दुःख देनेवाली भेद-बुद्धि हज़ारों जोखिमों में डालती है । मैं तेरे स्वरूप में मल-मल नहाता हूँ और यह मैल धो धो कर उतारता हूँ ! स्वाहा !
फिर "ॐ ॐ" की ध्वनि परमानंद के स्वर में कुछ देर होती रही । फिर अपने आप आँखें मिच गईं और सब प्रणव में लीन । बहुत देर यह शांति की अवस्था रही । इस के बाद गीता पढ़ाई गई ("चर और अचर दोनों से श्रेष्ठ मैं हूँ"-अध्याय 15 वां संमाप्त )
इस समय सब अपनी अपनी कुटिया में हैं । राम एकान्त बैठा है । पूर्णिमा की चाँदनी चटक रही है । यहाँ से बादलों के टुकड़े, घर की फुलवारी और सामना पर्वत ज्योत्सान में स्नान किये प्रतीत हो रहे हैं । गंगा-रानी का मधुर गायन कर्णी कुहरों में पवित्रता भर रहा है । गंगाजी क्या गा रही है ।
जाग मोहन जाग रे वल गई । उठो जागो, खाओ माखन, फेर डारों रई ॥ रात भारी गई सारी भोर अब तो भई । चिड़ी पंछी हैं बुलावत, खेल उन से सही ॥
तात्पर्य—रे प्यारे भारतवर्ष ( मोहन=कृष्ण=काला=हिंद ) अब जागो । अविद्या की नींद बहुत सोए । मैं बलिहार ! अब बैठे हो जाओ । होशियार बनो । संसार रूपी गाय का मक्खन ( सत्-सार ) खा लो, अपने भीतर प्रविष्ट कर लो; अथवा यों कहो कि श्रुति ( वेद ) रूपी कामधेनु का मक्खन अर्थात् महा वाक्य मुँह में डाल लो । यह शक्ति ( सत् ) भरा श्वेत श्वेत ( ज्ञान, चित् ) मीठा-मीठा ( आनंद स्वरूप ) मक्खन ( तत्त्व-ज्ञान ) चख लो, बड़ा बल आ जायगा, शक्ति भर जायगी ।
गोवर्धन ( संसार की कठिनाइयाँ-गुत्थियाँ ) उठाना कार्य हाथ का कर्तव्य नहीं, चटली अंगुली का खेल हो जायगा । हे दामोदर ! कमर की डोरियाँ, रस्सियाँ ( देश, काल, वस्तु- परिच्छेद ) को तोड़ना कुछ बात ही न रहेगी । काली नाग के समस्त फनों ( मन और अहंकार की समस्त वृत्तियों ) को पैर के तले कुचलना सरल हो जायगा । यह माखन ( वेदांत ) मव अवयवों ( पट्ठों ) को पुष्ट और हड्डियों को लोहे के समान कठोर और मुखमंडल को दीप्तमान कर देने वाला है । फुफ्फुसों ( फेफड़ों ) में बल भर देगा । जादू भरी वांसुरी बजाते बजाते कभी थकने ही न पाओगे ।
वह देखो, नन्हा कृष्ण ( भारत ) जाग पड़ा । ॐ ॐ ॐ नहीं, ॐ ! ॐ !! ॐ !!! मैया ( सतोगुण का प्रवाह=गंगा ) ने बिखेरते हुए अधरों को तनिक माखन लगा दिया ( सोऽहं ), मुँह में आहुत पड़ गई ( शिवोऽहं ) । पच-पच करते हुए माखन खाने लगे ( ब्रह्मास्मि ) । माता कुछ देर अपने हाथ से मक्खन खिलाकर. अपने बंधे में लगती है, वही बिलोना आरंभ करती है, रई डालती है अर्थात् नई शताब्दी आरंभ होती है । संकल्प की रई पड़ी है । काल ( समय ) का नेत्रा, ( रई की रस्सी ) है । कभी
इधर खिंच आता है ( दिन ), कभी उधर खिंच जाता है ( रात ) । बिलोना आरंभ होगया । रट्, रट्, रट् आरंभ हो गई । रे माता ! अब इस कृष्ण को माखन की चाट लग गई ।—
छुटती नहीं यह ज़ालिम मुँह को लगी हुई ।
"माखन भूख ( अहंग्रह उपासना ) घनेरी री मैया ! माखन भूख घनेरी", ऐ प्रकृति ( दुन्या ) यह माखन चोर तुझे कब चैन से बिलोने देगा ? रई तोड़ेगा और नाम रूप की मटकी फोड़ेगा । रात बीत चुकी, पौ फटने लगी, प्रकाश का प्रभात है । पक्षी कबूतर मयूर आदिक तो सब जाग पड़े, कृष्ण अभी सोया ही पड़ा है, कुछ हर्ज नहीं । पक्षी आदि तो सदैव पहले ही जागा करते हैं ।
रे मोहन ( भारत ) ! यह पक्षी गा गा कर तुझे जगाया चाहते हैं । कल की तरह ( प्राचीन कालानुसार ) अब भी तेरे हाथों दाना चाँचल तिल आदि खायेंगे । रे प्रेम भरे घाल गोपाल ! तेरे साथ खेलने को यह पक्षी जमा हो रहे हैं, तेरे मनो मोद ( दिललगी ) के सब सामान तैयार हैं । उठ ! खड़ा होजा ! चिड़ियां चूं चूं कर रही हैं । कौवे कायँ-कायँ छेड़ रहे हैं, मोर प्यों प्यों कूक रहे हैं [ कोई किसी बाहरी कला के पीछे पड़ा है, कोई किसी शारीरिक सुख में अड़ा है, कोई स्थूल विज्ञान में उलझा है । यह सब इन्द्रियों तक पहुँचने वाली रागनियां जारी हैं ।
हे 'भगवन् ( भारत ) ! यह सब केवल तेरे जगाने के समान हैं । नींद में भी विचित्र आनन्द था । पर अब तो खूब सो लिए । ताज़ह हो चुके । मचलते क्यों हो ? तुमभी गाओ ।
यह देखो तुम्हारी वांसुरी कौन चुरा ले गया ? नहीं-नहीं, तुम्हारे ही पास है ।
अहा हा हा ! वह भारत ने सूर्य के समान आँखे खोली । अधरों पर वांसुरी रफ्ली, और हृदय में समा जाने वाली आत्मिक ध्वनि वायु के पदें पर सवार हो चारों ओर गूँजने लगी, समस्त गोकुल ( समस्त संसार ) में फैलने लगी । आकाश की खवर लाने लगी । जय, जय, जय ।
अब चूँ चूँ, प्यों प्यों, कायँ कायँ किसको भाने की हैं ?
पत्र संख्या 6
विचार तो यह था कि "नंगे उमर विताएँगे, आनन्द की झलक दिखायेंगे । रूखी रोटी खायेंगे, मस्त पड़े रह जायेंगे । सूखे टुकड़े खायेंगे, 'सोऽहं' हम सो गायेंगे ।"
किंतु मेवे पेड़े पीछा ही नहीं छोड़ते । हर समय सेवा में उपस्थित खड़े रहते हैं । इन तीनों पथों के दूसरे पाद सब ठीक लेकिन पहले ग़लत निकले । जंगलों में भी मंगल ही मंगल देखे ।
आसन जमाए बैठे हैं दर से न जायँगे । मजनूँ बनेंगे हम तुम्हें लैली बनायँगे ॥ कफ़न बाँधे हुए सिर पर तिरे कूचे में आ बैठे । न उठेंगे सिवा तेरे उठा ले जिसका जी चाहे ॥ मुबारक है यह रुसवाई,अरे ! हट दूर हो शुहरत । हज़ारों ताने अब हम पर लगा ले जिसका जी चाहे ॥ बैठे हैं तेरे दर पै तो कुछ कर के उठेंगे । या वस्ल ही हो जायगी या मर के उठेंगे-॥ गर हमने दिल सनम को दिया फिर किसी को क्या ? इसलाम छोड़ कुफ्र लिया फिर किसी को क्या ?
हमने तो अपना आप गिरेवाँ किया है चाक ? आप ही सिया, सिया, न सिया फिर किसी को क्या ?
बनागह, आँ शफ़रलय रा लये-शाहदश व बगज़ीदम । कि ता रोज़े-अवद नरगद हलावातश ज़ दंदानम ॥ (1)
गर तयीबे रा रसद ज़ी सां जुनूँ । दफ्तरे-तिब रा फ़रोशोयद ज़ खूँ ॥ ( 2 )
मन बेखुदो शैदायम अल्लाशम-व-रुसवायम । हर जां घ बेजायम हज़ा जनून उल आशक़ीन् ॥ (3)
अधे मैंने अचानक उस मधुर अधर वाले के मधु के समान मधुर अधरों का चुंबन किया ( दांतों से काटा ) जिसमें सदैव के लिये मेरे दाँतों से उनकी मिठास न चली जाय । 1
यदि हकीम हमारे इस तरह के ( सच्चे ) पागलपन से जानकार हो जाय, तो हिकमत के सारे दफ्तर को खून से धो देवे । 2
मैं बेखुद ( अहंभाव शून्य ) आशिक़ ( प्रेमी ) हूँ, कंगाल और बदनाम हूँ, घर और बेघर हूँ, और इसी तरह आशिक़ों का पागलपन हूँ ।
नोट—माशूक़ ( प्रेम पात्र ), लैली, ब्रह्माविद्या=अहंग्रह उपासना है । साधक लोगों के लिये ऐसे पद्य बहुत उपयोगी होते हैं ।
पत्र संख्या 10
जिज्ञासु—इस रिसाले के पृष्ठ (113) पर बुद्धि की निम्नलिखित प्रशंसा की गई है—
खिरद रा दोश मी गुफ्तम कि ऐ अकसीरे-दानाई । हमत बे मर्ज़ हुशियारी, हमत बेदीदा बीनाई ॥ (1) चे गोई दर बुजूद आँ कीस्त कां शायस्तगी दारद । कि तो वा आवे-रूए-नखेश खाके-पाए ओ साई ॥ (2)
अर्थ—कल रात में बुद्धि से कहता था कि ऐ ज्ञान की रसानय! तेरा समस्त चातुर्य विना मस्तिष्क के है, और तेरा समस्त देखना विना आँखों के है । (1)
तू बतला कि इस शरीर में वह कौन है कि जिस के पैरों, की धूल को तू अपने मुख मंडल की कांति पर मलती है ( वा घिसती है ) । (2)
किन्तु वहां बुद्धि की ओर से कोई उत्तर नहीं है ।
राम—बुद्धि का उत्तर यों है ।
बगुफ्ता "नूरे-मन कज़ बहरे-ओ पैवस्ता मे सोज़म चो रुख़ बिनमूद जाँ दर वाख़्तम, अकनूँ चे फ़रमाई ?"
अर्थ-उस ( बुद्धि ) ने कहा कि मेरा प्रकाश जिससे कि मैं सदैव जलती हूँ ( अर्थात् प्रकाशमान हूँ ) जब वह प्रकट हुआ, तो मैंने अपने प्राण ( अस्तित्व ) को उस पर वार डाला, अब तू क्या पूछता है ? ───────────────── *यहां पृष्ठ 113 से अभिप्राय उर्दू रिसाला अलिफ़ का पृष्ठ है जो खुम्ख़ाना-ए-राम अर्थात् कुल्यात-ए-राम की प्रथम जिल्द के अन्तर्गत है । पर यह विषय ग्रन्थावली के भाग चौदहवें के पृष्ठ 151 पर भी दर्ज है, वहां देखो ।
तात्पर्य—(1) रात्री रात शमा ( मोम बत्ती ) जलती है, किसके प्रकाश से ? सूर्य के ( क्योंकि तेल और लकड़ी आदि में सूर्य स मांगा हुआ तेज और प्रकाश होता है ), (2) जब तक सूर्य को शमा नहीं देखती. मानो उसके वियोग में जलती है । और दीप्तिमान दिवाकर के प्रेम में "जलना" ही "प्रकाशमान" होना है । किंतु आनंद यह कि जिसके प्रेम में जलती थी, जब उसके दर्शन होने हैं तो स्वयं नहीं रहती । देख लो, सूर्य के निकलने पर भी दीपक कभी जला करता है ? अब बुद्धि रूपी शमा यह कहती है कि जिसके विषय में तुम पूछते हो, उसे देखना तो मुझे नसीब नहीं होता, मैं बताऊँ क्या ! और तुम पूछते क्या हो, और प्रश्न किससे करते हो ।—
मन शमा जाँ गुदाज़म तो सुबहे-दिलकुशाई । सोज़म गरत न बीनम, मीरम चो रुखनुमाई ॥ 1 ॥ नज़दीकत ईं चुनीनम दूर आँ चुनाँ कि गुप्तम् । ने ताबे-वस्ल दारम, नै ताक़ते-जुदाई ॥ 2 ॥
अर्थ—मैं ज्ञान पिघलाने वाली ( अर्थात् अपने आपको न्यौछावर करनेवाली ) शमा हूँ, और तू दिल को खिलाने वाली ( अर्थात् दिल को खुश करनेवाली ) प्रभात है, यदि मैं तुझको न देखूँ तो जलती रहती हूँ, और जब तू अपनी सूरत दिखलाता है, तो मैं मर जाती हूँ ( अर्थात् प्रभात होते ही शमा बुझ जाती है, इस लिये मैं तेरे मुख दिखाने पर तत्काल लुप्त प्राय होती हूँ ) । ( 1 ) मैं इस तरह, तेरे निकट हूँ, और उस तरह पर जैसा कि मैंने कहा, मैं तुझसे दूर हूँ । न मैं तेरे मिलाप की शक्ति रखती हूँ और न वियोग की ही शक्ति है ।
अलीपुर सय्यदाँ, ज़िला स्यालकोट, साई दीनमोहम्मदजी को यह बातें लिख देना ।
( 1 ) संसर्गाभ्यास और स्वरूपाभ्यास के संबंध में गंगा-तरंग और कैलाशकूक में पर्याप्त ( काफी ) व्याख्या हो गई है ।
( 2 ) "जब भूख लगना, सो जाना आदि कर्म खुल्लम खुल्ला मालूम होते हैं, तो क्योंकर प्रतीति हो सकता है कि वे असत् हैं ?"
"यह कर्म किसको सत्य प्रतीत होते हैं ?" बुद्धि को । आप कौन हैं ? क्या आप बुद्धि हैं ? —कदापि नहीं ।
जब तक बुद्धि के साथ ऐसा जोड़ रहताहै कि मानो बुद्धि ही मैं हूँ,तब तक सब कर्म और कर्म-फलों को वह सच्चा मानता है । जैसे स्वप्न में स्वप्न-शरीर को जब तक अपना आप मानता है, तब तक स्वप्न की समस्त बातों को सच मानता है । ज्यों ही स्वप्नावस्था के अपने कल्पित शरीर से संबंध विच्छेद करता है और जागकर अपने अपेक्षाकृत सच्चे शरीर को देखता है, तो स्वप्न के कर्तृत्व और चेष्टाएँ, कर्म और कर्म- फल को भी असत् प्रतीत करता है । अन्वयव्यतिरेक की रीति से अपने असली स्वरूप में जागने वाला और बुद्धि तथा शरीर से संबंध तोड़ने वाला खुल्लम-खुल्ला सब कर्मों तथा कर्म-फलों को असत् देखता है । सप्ताहों के सप्ताह "राम" पर ऐसे आने लग पड़े हैं कि कई कर्म शरीर से हो जाते हैं, किंतु बिलकुल बेहोशी में । संसार का स्वप्न होना प्रत्यक्ष प्रतीत होता है ।