श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

ग़ैर मुल्कों के तजरुबे।

भाग 16 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 16 · अध्याय 1 / 5

ग़ैर मुल्कों के तजरुबे।

"सत्यमेव जयते नानृतम्" ――――――――

सत्य की हमेशा जय होती है, झूठ की नहीं। पुराणों में लिखा है कि लक्ष्मी विष्णु की सेवा करती है, विष्णु के पाँव दावती रहती है, अर्थात् लक्ष्मी विष्णु की स्त्री है। लक्ष्मी विष्णु की छायावत् साथी है। विष्णु है, तो लक्ष्मी है, विष्णु नहीं, तो लक्ष्मी भी नहीं है। यह बात बहुत ठीक है। विष्णु के अर्थ सत्य और धर्म के हैं, लक्ष्मी के अर्थ धन और जय के हैं। सो जहां सत्य और धर्म है, वहीं धन और जय है। जहां सत्य और धर्म नहीं, वहां धन और जय नहीं। गीता में लिखा है "यतो धर्मस्ततो जयः"। अतएव यदि विष्णु

रूपी धर्म की ओर बढ़ोगे, तो लक्ष्मी रूपी जय और धन तुम्हारी छाया के समान तुम्हारे पीछे २ फिरा करेंगे। पर विष्णु रूपी धर्म से विमुख होने पर, यदि तुम चाहोगे कि लक्ष्मी रूपी जय और धन प्राप्त कर लें, तो ऐसा कभी नहीं हो सकता। सूर्य की ओर पीठ करने से अपनी छाया को कोई भी अपनी अनुगामिनी नहीं कर सकता। जितना ही दूर तुम भागते चले जाओगे, छाया सर्वदा आगे ही भागती चली जायगी और हाथ नहीं आवेगी। पर जिस समय सूर्य की ओर मुँह कर लोगे, तो उसी समय छाया (लक्ष्मी) तुम्हारे पीछे हो जावेगी और तुमको छोड़ नहीं सकेगी। सो जय और लक्ष्मी (धन) चाहनेवालों को सर्वदा सत्य और धर्म पर दृष्टि रखना चाहिये। हमारे हिन्दुस्तान की आज कल जैसी कुछ दशा है, वह सब पर विदित है। प्लेग राक्षस हज़ारों आदमियों का सफाया कर रहा है, अकाल लाखों आदमियों का खून चूस रहा है। हैज़ा चेचक आदि सैकड़ों बिमारियां करोड़ों आदमियों के प्राण ले रही हैं। कहां तक कहें, हिन्दुस्तान हर प्रकार से दुःखी है। हिन्दुस्तान की ऐसी शोकमयी दशा क्यों है ? इसके उत्तर में "राम" यही कहेगा कि सत्य और धर्म का ह्रास हुआ है। हिन्दुस्तानियों की सत्य और धर्म पर श्रद्धा नहीं। हिन्दुस्तान में धर्म केवल बोलने के लिये है, वर्ताव में लाने के लिये नहीं।

अब 'राम' हिन्दुस्तान और अमेरीका का मुकाबिला करता है। अमेरीका हिन्दुस्तान के पैर के नीचे है। हिन्दुस्तान में दाहिनी ओर से जाते हैं, अमेरिका में वाईं ओर से जाते हैं। हिन्दुस्तान में मन्दिरों या मकानों में जाने से पहिले जूता उतारते हैं, अमेरिका में टोपी उतारते हैं। हिन्दुस्तान में पुरुष

घर का मालिक होता है और स्त्री पर हुकूमत करता है, अमेरिका में स्त्री घर की मालिक होती है, पुरुष पर हुकूमत करती है। हिन्दुस्तान में कुत्ता सब से अपवित्र और गधा सब से बेवकूफ जानवर समझा जाता है, अमेरिका में कुत्ता सबसे पवित्र और गधा सबसे बुद्धिमान् (अक्लमन्द) समझा जाता है। वे गधे से बड़ी २ अक्ल सीखते हैं। हिन्दुस्तान में उस किताब की बिलकुल कद्र नहीं होती जिस में कुछ भी दूसरी किताब की नक़ल न हो, अमेरिका में उसी किताब की प्रतिष्ठा होती है जो बिलकुल नई होती है। हिन्दुस्तान में कोई आदमी ऐसा काम नहीं करता या करना चाहता, जिसका नतीजा वह अपनी आँखों के सामने न देख लेवे, यहां तक कि बूढ़े आदमी बग़ीचा लगाने में भी हिचकिचाते हैं, पर अमेरिका में यह बात नहीं है। वहां हर एक आदमी काम करता है और फल की इच्छा नहीं रखता। वे अपना फायदा नहीं देखते, किन्तु मुल्क का फायदा देखते हैं। जापान में एक अमेरिकन प्रोफ़ेसर था, वह बहुत बूढ़ा था, बारह भाषायें जानता था। इस आयु में रूसी भाषा पढ़ रहा था। 'राम' ने उस से पूछा कि "आप रूसी भाषा पढ़कर अब क्या करेंगे ?" उसने उत्तर दिया "मैं ने सुना है कि रूसी भाषा में भूगोल सब से उत्तम है, सो मैं रूसी भाषा को इस अभिप्राय से पढ़ रहा हूं कि मैं उस भूगोल को पढ़ूं और उसका अनुवाद अपनी भाषा में करूं ताकि हमारी जुवान में भी अच्छा भूगोल हो, और हमारे मुल्क को फ़ायदा पहुंचे"। वह फल की इच्छा नहीं रखता था, पर उस बुढ़ापे में जो वह दूसरी भाषा पढ़ने का कड़ा परिश्रम कर रहा था, वह केवल अपने मुल्क के उपकार व फ़ायदे के वास्ते था। क्या हिन्दुस्तानी कभी अपने मुल्क के लिये ऐसा परिश्रम करता है ? और फिर उस बुढ़ापे

में ? यहां तो मरने का बड़ा भय रहता है, इस मुल्क वालों को अक्सर यह कहते सुनते हैं "मरना है, किसके लिये करना है ?" तो भला हिन्दुस्तान की कैसे उन्नति होवे ?

हिन्दुस्तान में कोई आदमी अपने पूर्व पुरुषों से आगे बढ़ना नहीं चाहता, और जो आगे बढ़ता है वह नास्तिक समझा जाता है, अर्थात् लोगों में उस की प्रतिष्ठा नहीं होती है, अपने बाप दादाओं की लकीर का फकीर न रहने से कलंकित किया जाता है, पर अमरीका में उस आदमी की बिलकुल कद्र नहीं होती जो अपने बाप से दो कदम आगे न बढ़ा हो। वहां प्रत्येक आदमी के हृदय में यही प्रबल इच्छा रहती है कि हमारे बाप दादाओं ने जो कुछ किया है उस से हम को अधिक करना चाहिये, जो हम उस से कम या बराबर ही हुए, तो हम नालायक़ ही हुए। जब कि दिल में ऐसा ख्याल है, तब वह लोग उन्नति न करें, तो क्या हिन्दुस्तानी उन्नति करेंगे ?

हिन्दुस्तानी अन्य देशों को जाने से अपना धर्म खोया हुआ समझते हैं, और बिना दूसरे मुल्क जाये हुए उन्नति नहीं होती। यह बात सिद्ध ही है, क्योंकि अपने मुल्क की उन्नति के लिये यह ज़रूरी है कि दूसरे मुल्कों की रस्म, रिवाज, रीति, नीति, कला, कौशल, आचार, विचार, विद्या और वैभव मालूम हों; पर ये बातें तब तक मालूम नहीं होतीं जब तक कि उन मुल्कों में जाकर खुद न अनुभव करें। परन्तु जब दूसरे मुल्कों को जाना ही हिन्दुस्तानी पाप समझते हैं, तो उन बातों का कैसे अनुभव कर सकते हैं ? बिना अनुभव किये उन्नति कैसे हो सकती है ? अफ़सोस ! हिन्दुस्तानी के ख्याल में यह बात आ ही नहीं सकती है कि दुनिया में क्या हो रहा है ? हम लोग एक मकान के अन्दर बिलकुल

बन्द हैं। हम नहीं ख्याल कर सकते हैं कि मकान के बाहर कैसी सुगन्धित वायु चल रही है, कैसे विचित्र मनोहर पुष्प खिले हुए हैं ? प्रकृति का सौंदर्य कैसा सुख-प्रद है। इधर जब हिन्दुस्तान की ऐसी दशा है, तो अमेरीका वाले कभी घर पर नहीं रहते हैं। अमेरीका में उस आदमी का जन्म निष्फल समझा जाता है जिस ने कभी दूसरा मुल्क न देखा हो। यूरप के देशों की भी यही कैफ़ियत है। जर्मनी प्रवासियों का इस तरह का हिसाब है कि दस हज़ार मिश्र देश में, पेतालीस हज़ार परस में और आठ फी सैकड़ा दुनिया के और हिस्सों में बराबर आते जाते रहते हैं। कैसा ज़बरदस्त देशाटन है !

एक दफे "राम" जर्मन के जहाज़ में सफ़र कर रहा था। 'राम' जहाज़ के छत पर गया, और वहां कुछ ईश्वर के विषय में भजन गाने शुरू किये। ठंडी २ हवा चल रही थी, आसमान साफ़ था, प्रकृति की सुन्दरता देखने योग्य थी। एकान्त स्थान होने से "राम" ने ज़ोर २ से गाना शुरू किया। "राम" अति आनन्द दशा में था, कि "राम" का गाना सुनकर उस जहाज का कप्तान और कितने ही मुसाफिर जो कि प्रायः सब जरमनी के थे, "राम" के पास आये और "राम" के साथ बात चीत करने लगे। सिवाय कप्तान के और आदमी अंग्रेज़ी नहीं समझ सकते थे। "राम" अंग्रेज़ी में बात चीत करता था और कप्तान अपने साथियों को अपनी भाषा में समझाता था। वह कप्तान हिन्दू और हिन्दू धर्म के विषय में बात चीत करता था। उससे मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि उसको हिन्दू धर्म के विषय में इतना अनुभव कहां से प्राप्त हुआ ? पूछने से मालुम हुआ कि दुनियां भर के देशों के धर्म,

विद्या और रस्म, रवाज जानना वे अपना मुख्य कर्तव्य समझते हैं। और इसी अभिप्राय से वे लोग देशाटन करते हैं। "राम" ने उन से पूछा "इससे क्या लाभ होगा ?" उसने उत्तर दिया सब मुल्कों के रस्म रिवाज़ और धर्मों को जान कर जो २ रस्म रिवाज विद्या और धर्म हमारे मुल्क को लाभ पहुंचाने योग्य समझे जायेंगे, उनका अपने मुल्क में प्रचार करेंगे। विद्या का प्रकाश सब मुल्कों से लेना चाहिये, नहीं मालूम किस मुल्क में कौन सी विद्या है। सब देशों की विद्या का प्रकाश हम अपने मुल्क में ले जायेंगे तो हमारे मुल्क में महाप्रकाश हो जायगा। अहो ! अपने देश में प्रकाश फैलाने की अर्थात् अपने देश की उन्नति करने की यह कैसी नैसर्गिक विचार की भूमिका है। अहो ! हिन्दुस्तानियों ! तुम्हारी कैसी शोचनीय दशा है ? तुम्हारी आंख कब खुलेगी ? क्या कभी तुम्हारे हृदय में इन देव तुल्य मनुष्यों के समान अपने मुल्क (स्वदेश) की भलाई, उन्नति और उपकार का ख्याल पैदा होगा ? क्या कभी तुम लोग भी इन जर्मनों के समान अपने देश में विद्याओं का महाप्रकाश करने की इच्छा से इस प्रकार भिन्न २ देशों में जाकर वहां से विद्या का प्रकाश लाओगे ?

पहले जब हिन्दुस्तानियों को ग़ैर मुल्कों में जाने के लिये रोक नहीं होती थी और यहां प्रकाश था, तब हिन्दुस्तानी अपने मुल्क के प्रकाश से अन्य मुल्कों को प्रकाशित करते थे। पर जब से बाहर आने जाने का मार्ग बंद कर दिया गया, तब प्रकाश भी बंद हो गया और अंधेरा फैल गया। यहां से प्रकाश क्यों चला गया ? प्यारे ! एक मकान के भीतर जिसमें प्रकाश आने जाने के लिये खिड़की और दर्वाजे हों, जब बाहर

के प्रकाश (सूर्य की किरणों) से गृह प्रकाशित होगया हो, और इस अभिप्राय से तुम उसकी खिड़की और दर्वाज़े बंद करदो कि भीतर का प्रकाश बाहर न जाने पावे, तो क्या उस मकान के भीतर प्रकाश कभी ठहर सकता है ? कभी नहीं, ज्योंही मकान का दर्वाज़ा और खिड़कियां बन्द होंगी, मकान के अन्दर अंधेरा फैल जायगा, और बाहर से प्रकाश आना भी बन्द हो जायगा। बस हिन्दुस्तान की भी यही दशा हुई। बाहर आने जाने के सब दर्वाज़े बंद कर दिये गये, सो नतीजा यह हुआ कि यहां जो कुछ प्रकाश था, वह भी बंद हो गया, और बाहर से प्रकाश आना भी बन्द हुआ, और हिन्दुस्तान में अंधेरा फैल गया। शास्त्रों में लिखा है कि विद्या रत्न नीच से भी लेना चाहिये और सबको देना चाहिये। जितनी ही विद्या तुम दूसरों को दोगे, उतनी ही तुम्हारी विद्या बढ़ेगी और तरक़्क़ी पावेगी। किन्तु अफसोस है कि हिन्दुस्तानी दूसरों को विद्या देने में निहायत संकोच करते हैं और दूसरों से भी विद्या नहीं लेना चाहते। दूसरों की विद्या न सीखी जाय, इसके लिये समुद्र यात्रा का निषेध हुआ। इस दशा में विद्या रूपी प्रकाश का किस प्रकार प्रकाश रहता ? अहो ! खुदगर्ज़ी क्या किसी और चीज़ का नाम है ? वेद और शास्त्र जिनसे परमात्मा विषयक ज्ञान होता है, किसी अन्य देशी को न पढ़ाये जायं, ग़ैर मुल्कों में उनका प्रचार न किया जाय, क्या इससे परमेश्वर प्रसन्न होगा ? क्या अन्य देश निवासी परमेश्वर के बनाये मनुष्य नहीं हैं ? परमात्मा ने सच्चे ज्ञान के भंडार (वेदों) को आप लोगों के पास सौंपा, ताकि मनुष्यों को उसका यथार्थ ज्ञान हो, और तुम अपना कर्तव्य भूल कर उनको अपनी ही सम्पत्ति समझने लगे, तो बताइये कि ईश्वर का कोप तुम पर न हो तो क्या हो ? देखो,

ईसाई लोग बाईबिल को ईश्वरी ज्ञान मानते हैं, उनकी नज़र में बाइविल के अनुकूल न चलने से किसी को मुक्ति नहीं हो सकती, बाइविल ही उनकी समझ से संसार के परित्राण करने का एक मात्र अवलम्ब या उपाय है, तो देखिये, ये लोग इसके प्रचार के लिये कितनी तकलीफें उठाते हैं। कितनी जानें खोते हैं, कितने रुपये खर्च करते हैं। वे उदार मनुष्य संसार को भ्रष्ट करने के लिये ऐसा नहीं करते हैं, किन्तु संसार की भलाई की इच्छा से ही ऐसा करते हैं। ईश्वरीय ज्ञान का सर्वत्र प्रचार करना अपना परम कर्तव्य समझते हैं। अहो ! परमात्मा उन पर खुश न हो तो किस पर खुश हो ? क्योंकि ईश्वर ने जो कुछ जैसा और जितना ज्ञान उन को दिया है, वे उसको जैसे का तैसा दूसरों को देने में संकोच नहीं करते हैं, किन्तु तकलीफ़ उठाकर, उनको विद्या पढ़ा कर, रुपया खर्च कर यहां तक कि प्राण गँवाकर भी ज्ञान देते हैं। पर हिन्दुस्तानियों ! तुम्हारे पास जो कुछ सौंपा गया है, क्या तुम भी इन जगत हितैषी ईसाइयों के समान उसका संसार में प्रचार कर रहे हो ? यदि नहीं, तो क्या ईश्वर तुम पर खुश होता होगा ? यदि कहो कि क्या मालूम कि ईश्वर खुश होता है कि नहीं, तो क्या अभी तक तुम समझ नहीं सके, कि ईश्वर का तुम पर कितना कोप हो रहा है ? राज्य गया, लक्ष्मी गई, विद्या गई, प्रतिष्ठा गई, बल गया, पौरुष गया, और सर्वस्व गया, तौ भी न समझे, तो अकाल आया, प्लेग आया, हैज़ा आया, तो क्या अब भी समझ में नहीं आता कि ईश्वर हम पर कोप कर रहा है ? प्यारो ! सम्हलो, अभी सम्हलने का समय है।

परमेश्वर की दृष्टि में सब बराबर हैं, क्योंकि परमेश्वर ने

सब को बनाया है। और यदि हम परमेश्वर को खुश करना चाहें, तो हम को चाहिये कि हम प्राणी मात्र से प्रेम करें। भाई के मारने या उसके साथ बैर करने या उसको नफरत करने से बाप कभी खुश नहीं हो सकता, तब क्या किसी मनुष्य को नफ़रत करने से या नीच समझने से परमेश्वर जो सब का पिता है, कभी खुश हो सकता है ? कदापि नहीं ? खाली मुँह से यह बात कहते जाना कि हम परमेश्वर को मानते हैं, उस से प्रेम करते हैं, काफी नहीं है। तुमको चाहिये कर्म द्वारा इस का सबूत दो। सबूत यही है कि तुम मनुष्य मात्र से प्रेम करो, प्राणी मात्र से प्रेम करो, जगत मात्र से प्रेम करो, सबको बराबर और अपने ही बराबर समझो, अर्थात् यह ख्याल रक्खो कि जो कुछ मैं हूं वह वे हैं, और जो कुछ वे हैं वह मैं हूं, अर्थात् मैं और वह अलग २ कुछ नहीं किन्तु एक ही हैं। चाहे कोई किसी जात का हो, किसी देश का हो, किसी रंग का हो, इसकी परवाह मत करो। जाति धर्म, मज़हब, देश और रंग से कुछ मतलब नहीं, तुमको तो ईश्वर को खुश करने से मतलब है, अर्थात् अपना कर्तव्य पालन करना है। हाथ शरीर के सब अंग और प्रत्यंगों को सहायता पहुंचाता है। पैरों को, उपस्थ इन्द्रिय को, या और किसी अंग को जब तकलीफ होती है, तब फौरन हाथ उनकी सहायता के लिये पहुंच जाता है। हाथ यह कभी विचार नहीं करता है कि पैर मुझ से नीचा है, गुदा आदि इंद्रियां अपवित्र हैं, मुँह में थूक है, नाक में सींड है, कान के अन्दर मैल है, वह सम-दृष्टि से सबको सहायता पहुंचाता है, और सब की तकलीफों को दूर करने का प्रयत्न करता है। यह कभी ख्याल नहीं करना चाहिये कि यह मुझ से नीच है या भिन्न मज़हब का है। अमेरिका में रविवार के दिन एक

साहब से 'राम' की मुलाकात हुई। उस की मेम दूसरे मज़हब की थी और वह दूसरे मज़हब का था (ईसाईयों के भी कई मज़हब हैं, कोई रोमनकैथोलिक और कोई प्रोटेस्टैंट कहलाते हैं), अर्थात् उसकी मेम (स्त्री) रोमन कैथोलिक थी और वह प्रोटेस्टैंट था। वह अपने २ गिर्जों में तो गये, पर साहब पहले अपनी मेम को उसके गिर्जे में पहुँचा आया, तब अपने गिर्जे में गया, फिर अपने गिर्जे से अपनी मेम के लेने के लिये उसके गिर्जे में गया, और तब वह साथ २ घर आये। 'राम' ने उस साहब से पूछा कि तुम स्त्री-पुरुष भिन्न मज़हब के हो, कैसे एक दूसरे से प्रेम करते हो ? उसने उत्तर दिया "मज़हब का ईश्वर के साथ सम्बन्ध है और इसका (मेरी मेम का) और मेरा इस दुनियां का सम्बन्ध है। ईश्वर के सामने अपने कर्मों का उत्तर दाता मैं हूं और वह अपने कर्मों की उत्तरदाता है, सो हमको विवाद करने से क्या मतलब है ? हम दुनियां के संबन्ध से आपस में प्रेम करते हैं। साहब ने ठीक उत्तर दिया। ऐसा ही होना चाहिये। परन्तु हिन्दुस्तान में यदि स्त्री वैष्णव है और पुरुष शैव, तो उनके बीच कभी प्रेम नहीं होता है। अहो कैसा अनर्थ है !

तुम लोग (हिन्दुस्तानी) अन्य देश वासियों को नीच, म्लेच्छ आदि नामों से संबोधन करते हो और उनसे नफ़रत करते हो, पर राम कहता है कि जिनको तुम नीच समझते हो वह उत्तम हैं, जिनको म्लेच्छ कहते हो, उन का हृदय पवित्र है, और वह तुम से प्रेम रखते हैं। उन लोगों में और भी इतना विशेष गुण है कि उनका देशानुराग इतना प्रबल है कि वे अपने देश के लिये खून बहा देने को हर समय तैय्यार रहते हैं। एक जापानी जहाज़ में कुछ हिन्दुस्तानी

लड़के सफर कर रहे थे, वे लोग चौथे दर्जे में थे। चौथे दर्जे वाले मुसाफिरों के लिये हिन्दुस्तानियों के मुताफ़िक़ खाने का उचित सामान न था। वे लोग भूखे ही रह गये। इतने में एक जापानी लड़के की नज़र उन पर पड़ गई, उसको मालुम हुआ कि यह बेचारे हिन्दुस्तानी भूखे हैं। उस उदार दयालु जापानी लड़के से न रहा गया, वह फौरन फर्स्ट क्लास (पहिले दर्जे के) कमरे में गया और वहां से फल और मेवे अपने पैसे लगाकर लाया, और उन भूखे हिन्दुस्तानियों के हवाले कर दिये। वह हिन्दुस्तानी लड़के बड़े खुश हुए और उस कृपालु जापानी लड़के को कीमत देने लगे, परन्तु जापानी लड़के ने उचित आश्वासन और मधुर वचन द्वारा सब का सत्कार करके कीमत लेने से इन्कार किया, और फिर उसी तरह चार पाँच रोज़ तक उनको बराबर मेवे और फल देता गया, और कीमत लेने से बराबर इन्कार करता गया। जब उनके जुदा होने का वक्त आया, तो हिन्दुस्तानी लड़के उसका शुक्रिया अदा (धन्यवाद) करने लगे और फिर कीमत देने लगे, उस जापानी लड़के ने फिर इन्कार किया और नम्रता पूर्वक उन हिन्दुस्तानी लड़कों से कहने लगा कि "प्यारे मैं दाम तो नहीं लेता, मगर एक शर्त करता हूं, यदि तुम इसको स्वीकार करो तो"। हिन्दुस्तानी लड़कों ने कहा "आप फ़र्माइये तो"। जापानी लड़के ने कहा कि "मेरी यही प्रार्थना है कि जब तुम लोग हिन्दुस्तान को जाओ, तो यह बात न कहना कि जापानी जहाज में हम को कष्ट हुआ था, वहां खाने का प्रबन्ध ठीक नहीं था; क्योंकि तुम लोग ऐसा कहोगे, तो हमारे मुल्क की बदनामी होगी।" अहो ! कैसी मुहब्बत है ! कैसा विमल देशानुराग है ! वह लड़का न उस जहाज़ का मालिक था, और न उस जहाज में नौकर था। पर वह जहाज़

जिस देश का था वह भी उसी देश का रहने वाला था, इसी सम्बन्ध से उस जहाज़ की बदनामी को वह अपनी और अपने देश की बदनामी समझता था। यही सच्चा वेदान्त है, इसी को सच्ची "ब्रह्म विद्या" कहते हैं। क्या कोई हिन्दुस्तानी कभी ऐसा करता है? क्या किसी हिन्दुस्तानी ने ऐसा वेदान्त सीखा? क्या तुम में से किसी को इस सच्ची ब्रह्म विद्या की प्राप्ति हुई? अहो! यहां का वेदान्त, यहां की ब्रह्म विद्या तो केवल वाद-विवाद करने के लिये हैं, अमल में लाने के लिये नहीं। पर याद रक्खो जब तक ऐसी ब्रह्म विद्या अमल में नहीं लाते, तब तक तुम्हारे देश की उन्नति नहीं हो सकती। अफ़सोस! वेदान्त और ब्रह्म विद्या तो हिन्दुस्तान में पढ़ी जायें और जापान और अमेरिका वाले उसको अमल में लावें। अभी रूस जापान के वर्तमान युद्ध में जापान वालों को अपने किसी जहाज़ के डुबाने की ज़रूरत पड़ी। यह निश्चय था कि जो इस जहाज़ को डुबाने जायेंगे वह भी डूबेंगे, क्योंकि उसके बचाने के लिये कोई उपाय नहीं था, तो भी जहाज़ के कप्तान ने एक नोटिस अपनी पल्टन में फिराया कि "हम अपने जहाज़ को डुबाना चाहते हैं, मगर जो उसको डुबाने को जायेगा उसके बचने का उपाय नहीं, सो इस पर भी जिसको वहां जाना मंजूर हो, वह दरख्वास्त करे"। कप्तान का दफ़तर का दफ़तर दरख्वास्तों से भर गया। ऐसा कोई जापानी नहीं था जिसने दरख्वास्त न दी हो। बाज़े २ जापानी ने अपनी अंगुली को काट कर खून से अर्ज़ी लिखी, बाज़ों ने ऐसी धमकी की अर्ज़ी दी कि "यदि हम को न भेजोगे, तो हम फांसी लगा कर मर जावेंगे।" अहो! मरने के लिये ऐसी उत्कंठा क्यों? प्यारो! उस जहाज़ को डुबाने से जापान को लाभ पहुँचता था, मुल्क के

लाभ के मुकाविले में वे अपने प्राण बिलकुल कुछ नहीं समझते हैं। इधर हिन्दुस्तान में "आप मरा तो जग मरा" की कहावत है। अगर किसी हिन्दुस्तानी से यह कहा जावे कि तुम्हारे मरने से हिन्दुस्तानियों को राज्य मिलता है, तुम मरना स्वीकार करोगे? तो क्या जवाब मिलेगा? यह कि हम मर ही जाएंगे, तो राज्य आने से फ़ायदा ही क्या होगा? उफ (हा शोक)! कैसा घृणित स्वार्थ भरा हुआ है? प्लेग से दो लाख से ऊपर आदमी हर एक महिने में मर रहे हैं, हैज़ा आदि अन्य बीमारियों का हिसाब अलग है, पर हिंदुस्तान में ऐसा कोई माई का लाल नहीं है, जो अपने इस क्षणभंगुर शरीर को अपने देशोपकार रूपी यज्ञ में हवन करदे, अर्थात् देश की भलाई में अपने प्राण न्योछावर करदे, या पसीना ही बहावे, या थोड़ी तकलीफ उठाए। अपने मुल्क के लिये प्राण न्योछावर करना एक तरफ, पसीना बहाना एक तरफ, थोड़ी तकलीफ उठाना एक तरफ रहा, पर हम लोगों से देश की बुराई न हो, तो उतना ही ग़नीमत है। अभी एक हिन्दुस्तानी लड़का जापान में पढ़ रहा था। एक दिन वह स्कूल-लायब्रेरी (पुस्तकालय) से एक किताब अपने घर पढ़ने को लाया। उस किताब में एक नक्शा था जिसका बनाना उसको अत्यंत आवश्यक था। पर उस लड़के ने उस नक्शे के बनाने की तकलीफ उठानी पसंद नहीं की और उस किताब से वह वर्क जिस पर नक्शा बना हुआ था, फाड़ कर अपने पास रख लिया। कितने दिन के पश्चात् एक जापानी लड़के ने वह फटा हुआ वर्क देख लिया। उसने प्रिंसिपल से रिपोर्ट करदी और यह कानून पास होगया कि किसी हिन्दुस्तानी लड़के को लायब्रेरी से कोई किताब घर पर पढ़ने के लिये न दी जावे! अफ़सोस! अपने ज़रा स्वार्थ के लिये, या ज़रा

अपनी तकलीफ को बचाने के लिये उस हिन्दुस्तानी लड़के ने अपने मुल्क के लिये कितना भारी नुक्सान पहुंचाया है? तुम लोगों से भी यह ग़लती होनी संभव थी। अहो कैसे शोक की बात है, कि हम लोग अपने तनिक स्वार्थ के लिये या ज़रा तकलीफ से बचने के लिये अपने मुल्क को भारी नुक्सान पहुँचा देते हैं, और फिर आप भी तकलीफ उठाते हैं और नुक्सान सहते हैं। देखिये, हांगकांग में अंग्रेज़ों की एक मुसलमानी पल्टन थी। उस पल्टन के सिपाहियों की 45) रु० माहवारी तनख्वाह थी। दो सिक्ख सिपाहियों ने जो 8), 10) रुपया माहवारी यहां पाते थे एक अर्ज़ी सरकार को इस मज़मून की दी, कि यदि हम लोगों की 15) रु० माहवारी तनख्वाह की जाय तो हम लोग खुशी से हांगकांग चले जायेंगे। सरकार का तो इस में लाभ ही था, सो सरकार ने उनकी अर्ज़ी मंजूर की और मुसलमानी पल्टन को नोटिस दे दिया कि जो सिपाही 15) रु. में रहना चाहें तो रहें अन्यथा अपना नाम कटा देवें। उस मुसलमानी पल्टन के किसी सिपाही ने 15) रु० माहवारी में रहना मंजूर नहीं किया और सब ने अपने नाम कटा दिये। पश्चात् उन्होंने विलायत तक इस बात की लिखा पढ़ी की, मगर नतीजा कुछ भी नहीं हुआ। भला सरकार को भारी खर्च करने से क्या मतलब था, जब कि थोड़े से खर्च में सरकार का काम चल जाता था। मज़बूत और बहादुर सिपाही भी मिल गये, खर्च भी कम हुआ, तो सरकार ऐसी बेवकूफ क्यों बनती, जो उन मुसलमान सिपाहियों की अर्ज़ी पर ध्यान देती? गरज़ यहां सिक्ख सिपाही भर्ती हुए और मुसलमान सिपाही सब बर्खास्त हुए। नाउम्मेद (हताश) होकर वह मुसलमान सिपाही आफ्रिका में मुल्लां के देश में चले गये, और उसकी पल्टन में भर्ती होकर उसको अंग्रेज़ों के विरुद्ध

भड़काने लगे। मुल्ला उनकी पत्ती में आ गया और उसने अंग्रेज़ों के विरुद्ध लड़ाई शुरू कर दी। अंग्रेज़ों ने हांगकांग से यही पल्टन सिक्खों की उनके साथ लड़ने के लिये भेजी। उन मुसलमान सिपाहियों को मालुम होगया, कि उनके मुकाबले में वही सिक्ख पल्टन आई है, सो पुराना बैर लेने के जोश में, उन्हों ने खूब बहादुरी से लड़ना शुरू किया। उस सिक्ख पल्टन के कितने ही सिपाही मारे गये, कितने ही ज़ख़मी हुए, कितने ही उस रेगिस्तान की गर्मी को न सह सकने के सबब मरे, कितने ही बीमार हुए। मतलब यह कि प्रायः सब ही तबाह हुए। प्यारो! देखो, जो जैसा करता है, वैसा फल पाता है। इन सिक्ख सिपाहियों ने अपने 5) रु० के स्वार्थ से उन मुसलमान सिपाहियों का 45) रु० का नुक्सान किया था, उसका इनको यह फल हुआ कि मारे गये, मर गये, ज़ख़मी हुए, बीमार हुए और तबाह हुए। उफ (हा शोक)! स्वार्थ कैसी बुरी बला है! यह पहले तो दूसरों को नुक्सान पहुँचाती है, और फिर उसका अपना नाश करती है, जो इससे काम लेता है। प्यारो! जैसे इस शरीर के जीवन के लिये हाथ, पैर, नाक, आँख, कान, दाँत, जिह्वा आदि सब ही इंद्रियों की आवश्यकता है, वैसे ही इस संसार के जीवन के लिये भिन्न २ जाति के सब ही मनुष्यों की चाहे वह हिन्दू हैं, या मुसलमान हैं, या ईसाई हैं, या यहूदी अथवा पारसी हैं आवश्यकता है, तब हम दुःख पहुंचावें तो किस को पहुंचावें? नीच समझें तो किस को समझें? स्वार्थ करें तो किससे करें? देखो, यदि आँख यह कहे कि देखती तो मैं हूं और लाभ हाथ वगैरह का होता है, इस लिये देखना बंद करदूं; हाथ कहे कि काम तो मैं करता हूं और मज़ा मुँह उठाता है, इस लिये मैं काम करना छोड़ दूं,

पैर यह कहे कि सारे शरीर का बोझ मैं लिये फिरता हूं, और ये सब मज़े में रहते हैं, इस लिये फिरना छोड़ दूं, इसी प्रकार अन्य सब इन्द्रियां कहें और अपना २ काम छोड़ दें; तो कहो प्यारो! कैसा जुल्म हो जाय? क्या तब यह शरीर एक मिनट भी रह सकता है? कभी नहीं। देखो अगर आँख यह कहे, कि जिस चीज़ को मैं सुन्दर देखती हूं, उसको मैं अपने ही पास रक्खूं, और वह अपने ही पास रखने की कोशिश करे, तो क्या होगा? पहले तो आँख के अन्दर वह समा ही नहीं सकेगी, यदि कोई छोटी चीज़ हुई तो उस से आँख फूट जावेगी। हाथ यह कहे कि जो चीज़ मैं कमाता हूं, उसको मैं अपने ही पास रहने दूं और अपने को चीर कर या छेद कर उस में रखदूं, तो क्या होगा? वह पक जायगा, सड़ जायगा, और उस में कीड़े पड़ जायेंगे। इसी प्रकार और इंद्रियां भी तकलीफ उठावेंगी। जब यह बात बिलकुल सिद्ध है कि स्वार्थ स्वार्थी को ही कालान्तर में अधिक नुक्सान पहुँचाता है, तो स्वार्थ से काम क्यों लेना चाहिये? हिन्दुस्तानी लड़के ने स्वार्थ से किताब का वर्क (पत्रा) फाड़ा था, उसने खुद नुक्सान उठाया और अपने मुल्क को नुक्सान पहुंचाया। सिक्ख पल्टन ने अपने स्वार्थ के लिये मुसलमान सिपाहियों को नुक्सान पहुंचाया था, वे खुद तबाह हुए। कहां तक कहें, स्वार्थियों ने अपने स्वार्थ के लिये खुद नुक्सान उठाया और मुल्क को कितना नुक्सान पहुंचाया है। इस बात की सैकड़ों मिसालें हिन्दुस्तान के इतहास में मौजूद हैं। कौरव पांडवों का सत्यानाशी युद्ध होना, मुसलमानों का हिन्दुस्तान में राज्य होना, शाहजहां के लड़कों का आपस में लड़ना, मुसलमानी बादशाहत का नाश होना, अंग्रेज़ों का हिन्दुस्तान में राज्य की जड़ जमाना, मरहठों का

चय, सिक्खों का नाश, अंग्रेज़ों का तमाम हिन्दुस्तान का बादशाह होना, आदि इन सब बातों पर यदि नज़र डालोगे, तो मालुम होजावेगा, कि हम हिन्दुस्तानी लोगों के स्वार्थ से यह सब कुछ हुआ है। अगर हम लोगों में स्वार्थ न भरा हुआ होता, तो हिन्दुस्तान आज परदेशियों के पाँव पर न लोटता! ओह! स्वार्थ ने तुमको किस दशा से किस दशा को पहुंचा दिया है? स्वर्ग से तुमको रसातल में फेंक दिया, इन्सान से तुमको हैवान (पशु) बना दिया, शेर से तुम को गीदड़ बना दिया है। तो क्या प्यारो! अब भी तुम उस को नहीं छोड़ोगे?

हिन्दुस्तान में स्वार्थ का हमेशा से घर नहीं है। यदि तुम अपने पूर्व पुरुषों के जीवन-चरित्र पर एक बार दृष्टि डालोगे, तो मालुम हो जावेगा कि जिन ऋषियों की तुम औलाद (सन्तान) हो, वे कैसे निस्वार्थी होते थे। दूसरे की भलाई, के लिये, दूसरे के उपकार के लिये, वे महात्मा कैसे तन मन धन न्योछावर करते थे? और अपनी जान की परवाह नहीं करते थे। शरीर का मांस, शरीर की हड्डी तक दूसरे की भलाई के लिये देदेते थे। जब तक हिन्दुस्तान में ऐसे पुरुष होते रहे, तबतक हिन्दुस्तानी लोग चक्रवर्ती राज्य भोगते रहे, तब तक हिन्दुस्तान संसार में शिरोमणि गिना जाता रहा। पर जब से इस स्वार्थ रूपी बला ने हिन्दुस्तान को घेरा है, तब से हिन्दुस्तान का पलड़ा उलट गया! सो यदि तुम फिर सम्हलना चाहते हो, तो एक दम से इस स्वार्थ को हिन्दुस्तान से निकाल दो। मरते तो सब हैं, किन्तु हम लोग सिर्फ काल वश ही मरते हैं, और प्रकार से हम मरना नहीं जानते। मरना जानते हैं जापान वाले, अमेरिका वाले और यूरोप वाले, सो हम लोगों को भी उनसे मरना

सीखना चाहिये। अमेरिका में एक दफ़े सायंस की तरक्की के लिये आवश्यकता हुई कि एक आदमी ज़िन्दा चीरा जाय, ताकि यह मालूम हो कि खून की हरकत किस वक्त किस नस में कैसी होती है। मरे हुए आदमी को चीरने से यह बात मालुम नहीं हो सकती थी, क्योंकि मरे हुए आदमी में खून की हरकत नहीं होती। सो एक आदमी इस बात के लिये तैयार हो गया और वह चीरा गया! एक दफ़ा आँख के अन्दर के पड़दों के विषय में जानने की ज़रूरत हुई, एक आदमी ने अपनी आँख चिरवाई। तो क्या प्यारो! उन लोगों ने अपने फ़ायदे के लिये अपने शरीर व आँख को ज़िन्दा चिरवाया था? नहीं, सिर्फ मुल्क के फ़ायदे के लिये। उनका सिर्फ यह उच्च ख्याल था, कि हमारा यह नाशमान् शरीर मुल्क के काम आवेगा, तो इससे उत्तम सद्गति और क्या हो सकती है? हमारा शरीर व आँख चीरी जायगी, तो यह डाक्टर लोग इस बात को सीख जाएंगे, जिसको बिना सीखे यह लोग दूसरे के शरीर व आँख को पूरा २ फ़ायदा नहीं पहुंचा सकते हैं, तब यह लोग पूरा २ फ़ायदा पहुंचा सकेंगे, और हमारा शरीर और आँख जिनसे अभी तक केवल हमारा ही फायदा हुआ है, अब से प्रत्येक आदमी के शरीर और आँख के फायदे के लिये होंगे, अर्थात् हमारा शरीर और आँख सब के शरीर और आँख के साथ मिल जाएंगे। अहो! क्या ही उत्तम ज्ञान है। प्यारो! तुम को भी यह ज्ञान सीखना चाहिये। जब तक तुम को ऐसा ज्ञान नहीं होता, तुम्हारी हरगिज़ तरक्की नहीं हो सकती।

यह बात भी नहीं है, कि वे लोग आदमियों को ही मुहब्बत करते हैं, किन्तु मांसाहारी होने पर भी वे प्राणी मात्र को मुहब्बत करते हैं। अमेरिका का प्रेसीडेन्ट (राष्ट्रपति) एक

दफ़े दर्बार को जाता था। रास्ते में उसने देखा कि एक सूअर कीचड़ में फँसा हुआ है। वह सूअर निकलने की जितनी ही ज़्यादा कोशिश करता था, उतना ही वह अधिक कीचड़ में फँसा जाता था। प्रसिडेन्ट से न रहा गया, वह दर्बारी कपड़ों सहित, जिनको वह पहरे हुए था, कीचड़ में कूद पड़ा और सूअर को निकाल लाया। पश्चात् वह कीचड़ से भरे हुए कपड़ों को पहिने हुए ही दर्बार में चला गया। राष्ट्रपति की यह कैफ़ियत देखकर दर्बारियों को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे राष्ट्रपति से नम्रता पूर्वक इस विषय में दर्याफ़त करने लगे। राष्ट्रपति ने सारा क़िस्सा वयान किया। दरवारी लोग बड़े खुश हुए और हज़ार मुखसे प्रेसिडेन्ट साहिब की प्रशंसा करने लगे। कुछ कहने लगे, कि हमारे प्रेसिडेन्ट साहिब ऐसे मेहरवान (कृपालु) हैं, कि सूअर पर भी महरवानी (कृपा) करते हैं। और कोई कुछ कहने लगा और कोई कुछ। प्रेसिडेन्ट ने कहा कि मेरी झूठमूठ प्रशंसा क्यों करते हो? मैं ने सूअर पर दया नहीं की, किन्तु उसको कीचड़ में बेतरह फँसा हुआ देखकर मुझे दर्द हुआ था, मैं ने उस दर्द को मिटाया है, मैं ने सूअर के साथ भलाई नहीं की है, किन्तु अपने साथ भलाई की है क्योंकि उसके फँसने पर जो दुःख मुझे हुआ था वह उसको निकालने से निकल गया अर्थात् दूर होगया। अहा! सच्चा वेदान्त का यह क्या ही जीवित नमूना है, कि प्राणीमात्र के दुःख को अपना दुःख समझना, और प्राणीमात्र पर दया करने से अपने ऊपर दया होती समझना और प्राणी मात्र का दुःख दूर करने से अपना ही दुःख दूर समझना। क्या कोई हिन्दुस्तानी राजा, रईस, अमीर होता, तो वह उस सूअर को कीचड़ से निकालता? कभी नहीं। तो विचार करो कि "प्राणी मात्र पर दया करना" जो तुम्हारा मुख्य धर्म है, सो तुम अपने इस उदार धर्म से

कितना भ्रष्ट हुए हो? धर्म भ्रष्ट तो हुए। पर धर्म भ्रष्ट होने से जो सज़ा मिलती है वह प्यारो! तुमको मिल रही है। और तब तक इस सज़ा से वरियत (खुटकारा) नहीं पा सकते हो, जब तक कि फिर उस उदार धर्म (प्राणी मात्र पर दया करना) के अनुसार अपना आचरण नहीं बनाते।

मुसलमानी बादशाही के ज़माने में अंग्रेज़ लोग जव हिन्दुस्तान में केवल सौदागर थे, फर्रुख़सियर बादशाह की लड़की बीमार हुई। हिन्दुस्तानी वैद्य, हकीम इलाज करते २ थक गये, परन्तु शाहज़ादी को आराम न हुआ। इत्तिफ़ाक से अंग्रेज़ डाक्टर आया हुआ था, उसने दवा की, और दवाई से वह अच्छी होगई। बादशाह बड़ा खुश हुआ, और डाक्टर को बड़ा भारी इनाम, खिलत और जागीर देने लगा। डाक्टर ने अर्ज़ की, कि जहाँपनाह! मैं कुछ नहीं लेना चाहता; मगर हज़ूर खुश हैं, तो अंग्रेज़ सौदागरों के माल पर महसूल मुआफ़ फ़रमाया जाय। ऐसा ही हुआ। अंग्रेज सौदागरों के माल पर महसूल मुआफ़ हुआ। अंग्रेज़ डाक्टर ने अपने फ़ायदे पर ख्याल न किया, किन्तु अपने मुल्क के फ़ायदे पर किया। यदि वह अपने फ़ायदे पर ख्याल करता और बादशाह के भारी इनाम को ले लेता, तो थोड़े दिनों के लिये वह अमीर हो जाता, पर जब उसने मुल्क का ख्याल किया, तो उसका सारा मुल्क ही अमीर होगया। क्या हिन्दुस्तानी से कभी यह उम्मेद हो सकती है? ओह उन लोगों में कैसा प्राकृतिक वेदान्त है। तब वे लोग तरक्की न करेंगे तो कौन करेगा? इधर हिन्दुस्तानियों पर तो ठीक यह मिसाल चरितार्थ होती है, कि एक साधु ने किसी आदमी को एक चीज़ दी। उस चीज़ का यह गुण था कि वह आदमी उस

चीज़ से जो कुछ मांगे, वह उसको मिल जायगा, मगर उस के पड़ोसी को उससे दूना मिला करेगा। उस आदमी ने धन मांगा, हाथी घोड़े मांगे, गाय भैंस मांगी, और जो कुछ मांगा वह सब उसको मिलगया, मगर उसके पड़ोसी को उससे दूना मिला। पड़ोसी को दूना मिलने पर वह बहुत जलता रहा। एक दिन वह यह बात सोचता रहा कि इस चीज़ से क्या मांगे जो पड़ोसी को दूना मिलने पर उसका अधिक नुक्सान हो। सोचते २ उसके ख्याल में यह बात आई कि अपनी एक आँख फूट जाय, इस लिये यही मांगना चाहिये कि मेरी एक आँख फूट जाय, क्योंकि तब पड़ोसी की दोनों आँख फूट जायंगी। उसने ऐसा ही किया। उसकी एक आँख और पड़ोसी की दोनों आँख फूट गई, फिर उसने अपने एक हाथ और एक पाँव टूटने के लिये उस चीज़ से अर्ज़ करी। उसका एक हाथ और पाँव टूट गया और उसके पड़ोसी के दोनों हाथ और पाँव टूट गये। इत्तफ़ाक़ से उसको लकवा हुआ, और उसके रहे सहे हाथ पैर भी टूट गये, और आँख भी फूट गई। तब उसने उस चीज़ से दोनों हाथ, पैर, और आँख मांगी, पर यह प्रार्थना अस्वीकार हुई, क्योंकि पड़ौसी को उससे दूना मिलना था, मगर उसके चार हाथ, पाँव और आँख नहीं थीं। तब उसने लाचार होकर अपनी एक आँख, हाथ पाँव के अच्छे होजाने की प्रार्थना की, यह स्वीकर हुई। उसके एक हाथ पाँव और आँख अच्छे हो गये और पड़ौसी के दोनों। पड़ोसी जैसा का तैसा होगया, मगर उस कमबखत (दुर्भागी) के एक आँख फूटी की फूटी रहगई, और एक हाथ पाँव टूटे के टूटे ही रह गये। सो प्यारो! विचार करो जो अपने पड़ोसी की बुराई करता है, उसके लिये खुद बुरा होता है। पड़ोसी अपने मुल्क वालों

को कहते हैं, सो अपने मुल्क की बुराई नहीं करनी चाहिये। वाइबिल में लिखा है कि अपने पड़ोसी को अपने बराबर प्यार करो, यद्यपि तुम्हारे शास्त्रों में और भी उदारता पाई जाती है, क्योंकि उनमें सारे जगत् को अपने बराबर प्यार करना लिखा है। बाइबिल के मानने वाले तो बाइबिल में लिखी हुई बात को अत्तर २ मानते हैं, और तुम लोग अपने शास्त्रों में की लिखी हुई इस बात को कि जगत् को अपने बराबर प्यार करो, एक हिस्सा नहीं मानते! यह कितनी लज्जा की बात है? प्यारो! जगत् को अपने बराबर प्यार नहीं कर सकते हो तो अपने मुल्क को तो अपने बराबर प्यार किया करो। मुल्क को नहीं कर सकते हो तो अपने कुटुंब को तो प्यार करो। यह क्या बात है कि तुमने अपने कुटुम्ब ही में भेद कर रक्खा है। अपने कुटुम्ब से भी अगर तुम भेद न रखते, तो तुम एक दम इतना नीचे न गिरते और तुम्हारी दशा का चक्र यकायक ऐसा पलटा न खाता।

भेद भाव (द्वैत भाव) उन्नति के मार्ग में बड़ा ही अनिवार्य तीक्ष्ण काँटा है। क्योंकि परमेश्वर ने इस दुनिया में जितने पदार्थ बनाए हैं, उनसे यथार्थ लाभ उठाना ही मनुष्य की पूरी २ उन्नति की अन्तिम सीमा है, परन्तु यह भेद (द्वैत भाव) का काँटा मार्ग में आ पड़ता है, और उस अन्तिम सीमा तक पहुँचने नहीं देता। यह किसी चीज़ को अग्राह्य, किसी को स्पर्शनीय, किसी को घृणित किसी को नीच और किसी को आदर्शनीय समझता है। पर ऐसा समझना सर्वथा अज्ञान है, क्योंकि ऐसा समझने से उन चीज़ों से हम परहेज़ करने लगते हैं। फिर उनसे कोई न कोई होनेवाला लाभ, जो हमारी उन्नति का सहायक होता, नहीं हो सकता। इसलिये हमारी

उन्नति में उतनी कमी पड़ती है, और यह कमी हमको उन्नति की अन्तिम सीमा तक नहीं पहुँचने देती। यह कमी किसी और प्रकार से भी पूर्ण नहीं हो सकती, चाहे उसमें कितना ही सादृश हो। गाय के दूध से हम को जो लाभ होता है, वह भैंस या बकरी के दूध से नहीं होता, और बकरी के दूध से जो लाभ होता है, वह गाय के दूध से नहीं होता; अतएव हम को अपनी पूरी २ उन्नति करने के लिये, ईश्वर रचित हर एक पदार्थ की सहायता की अत्यन्त आवश्यकता है। और वह सहायता हम तब ही प्राप्त कर सकते हैं जब भेद भाव का सर्वथा नाश होजाय। हिन्दुस्तान में भेद की बड़ी प्रबलता पाई जाती है, अमेरिका, जापान आदि में उतना भेद नहीं पाया जाता। यह कारण है कि हिन्दुस्तान उन्नति में इतना पीछे पड़ा हुआ है। और अमेरिका जापान आदि इतना आगे बढ़े हुए हैं। हिन्दुस्तान में जिन चीज़ों की क़दर नहीं होती, जिन चीज़ों से कोई लाभ होने की आशा नहीं समझी जाती, अथवा जिन चीज़ो को छूने तक का इतना परहेज़ होता है, कि गंगा-स्नान की ज़रूरत पड़ती है, उन चीज़ों से अमेरिका आदि मुल्कों वाले आशातीत लाभ उठाते हैं। गधा और सूअर जो हिन्दुस्तान की नज़र से बिलकुल घृणित हैं, अमेरिका में बड़े काम आते हैं। मैला, जिसकी तरफ नज़र पड़ने से ही कै (वमन वा उलटी) होजाती है, अमेरिका में अच्छी व्यापारिक चीज़ है। हड्डी जिसके छू जाने मात्र से स्नान की ज़रूरत होती है इतने फायदे की चीज़ है कि सारी दुनियां को लाभ पहुंच रहा है। इसकी खाद जिस खेत में पड़ती है, वहां चौगनी फसल पैदा होती है; इससे जो फास्फोरस निकलता है, वह संसार को लाभ पहुंचा रहा है। दियासलाई इसकी बनती हैं, और पुष्टि कारक उत्तम

दवा भी इसी से बनती हैं। बाल जिसको तुम तुच्छ (नाचीज़) समझकर फैंक देते हो, उस से अमेरिका में खूव पैसा पैदा होता है। इसी प्रकार सब चीज़ें, जो हिन्दुस्तान की नज़र से घृणित, अपवित्र और अयोग्य समझी जाती हैं, उनसे दूसरे मुल्क वाले खूब फायदा उठाते हैं, और उनसे खूब कमा लेते हैं। उन मुल्कों में जव ऐसी २ चीज़ों से भी फ़ायदा उठाते हैं और काम लेते हैं, अफ़सोस, हिन्दुस्तानी तो साधू लोगों से भी काम लेना नहीं जानते! हज़ारों, लाखों साधू पड़े हुए हैं, यदि उनसे काम लेते, अथवा उनसे फ़ायदा उठाने की बुद्धि हिन्दुस्तान को होती, तो हिन्दुस्तान का बड़ा भारी उपकार होजाता।

एक समय था जब हिन्दुस्तानी लोग मनुष्यों के अलावा जानवरों से भी मनुष्य का काम ले लेते थे। भगवान् रामचन्द्र जी ने बन्दरों की सेना बनाई थी, और ऐसी कामयाबी हासिल की थी कि आज कल के हिन्दुस्थान के मनुष्यों की सेना से भी वह कामयाबी हासिल नहीं होती। यदि रामचन्द्र जी बंदरों को बन्दर कहकर ही ख्याल न करते और उन से भेद भाव रखते, तो रामचन्द्र जी को कितनी कठिनता उपस्थित होती। एक बलवान शत्रु के साथ मुकाबला था, जिस की असंख्य सेना थी, जिसकी धाप सुन कर ही तमाम भू-मंडल कलेजा थाम कर रह जाता था। रामचन्द्र जी के साथ सिवाय भाई लक्ष्मण के न सैना थी और न खज़ाना था। यदि आदमियों की पल्टन भर्ती करते, तो इतना धन कहाँ से आता? वह तो राज-भ्रष्ट और तिस पर बन वासी, सेना को तनख्वाह देनी पड़ती, कमसरियेट का बन्दोबस्त करना पड़ता; तीर, कमान, गोला बारूद का सामान करना

पड़ता। पर प्यारो! इनकी ज़रूरत तो उनके लिये है, जिनकी दृष्टि में भेद है। रामचन्द्र जी को तो सच्ची ब्रह्म-विद्या की प्राप्ति हुई २ थी, भेद-भाव का सर्वथा अभाव था। उनकी नज़र में आदमी और बंदरों में भेद नहीं था। और यह कुदरत का क़ानून है कि जिस में भेद-भाव (द्वैत भाव) का अभाव हो जाता है, उस के साथ सारी कुदरत भी भेद नहीं रखती, अर्थात् उसको अपना मित्र समझती है, और हर प्रकार उसकी सहायता करती है। सुतरां बन्दर रामचंद्र के मित्र हो गये, और बंदरों की एक बड़ी भारी सेना रामचंद्र जी के लिये मरने मारने को खड़ी हो गई। उनको न तनख्वाह की ज़रूरत, न कपड़ों की ज़रूरत, न अन्न की ज़रूरत, न तीर कमान की ज़रूरत हुई। ऐसी सेना तैयार करके चढ़ाई करदी गई, और फ़तेह पाई। ओह! ब्रह्म-विद्या में कैसा जादू का असर है कि पशुओं और पत्थरों से भी वह काम लिया जा सकता है जो असंभव प्रतीत होता है। अतः तुम भी सच्ची ब्रह्म-विद्या के प्राप्त करने का प्रयत्न करो, क्योंकि अपनी पूरी २ उन्नति के लिये हर एक चीज़ की सहायता की आवश्यकता है। और तब तक तुम हर एक चीज़ से सहायता नहीं ले सकते, जब तक कि उन से भेद रखते हो, या प्रेम नहीं करते, अर्थात् उनको अपने ही बराबर नहीं समझते। और तब तक तुम्हारा भेद दूर नहीं होगा, उन से प्रेम नहीं होगा, और उन सब को अपने बराबर समझना नहीं होगा, जब तक कि ब्रह्म-विद्या का प्रकाश तुम्हारे हृदय में नहीं होता। सच्ची ब्रह्मविद्या के प्रकाश होने से तुम हर एक चीज़ से मुहव्वत (प्रेम) करने लगोगे, और उन में जो गुण हैं, जिनके बिना तुम्हारी उन्नति का मार्ग अगम्य हो रहा है, उन को लेने में संकोच नहीं करोगे, और तब तुम्हारी

उन्नति बेरोक टोक होती चली जायगी, और तुम जो कुछ अपना खो चुके हो, वह सब कुछ तुमको मिल जायगा, और तुम्हारी उस शोचनीय दशा का पलड़ा एक दम पलट जायगा।

हम लोग गुण नहीं देखते, और गुण सबसे लेना चाहिये, चाहे आर्य हो, हिन्दू हो, मुसलमान हो, ब्राह्म हो, या और कोई हो, क्योंकि गुणों की कमी सब को है। क्या कोई आर्य, हिन्दू, मुसलमान, ब्राह्म या और कोई मज़हब वाला यह कह सकता है कि हम सर्व गुण सम्पन्न हैं? हम को किसी से किसी गुण के सीखने की आवश्यकता नहीं है? यदि कोई ऐसा कहता है, तो वह भूठ कहता है, क्योंकि सब गुण सम्पन्न जाति कभी ऐसी बुरी दशा में नहीं रह सकती है। और तुम में से प्रत्येक व्यक्ति की जैसी बुरी दशा है, वह छिपी हुई नहीं है। सुतरां तुम में एक नहीं वरन् कितने ही ऐसे बुरे दोप भरे हुप हैं, कि जिनसे तुम्हारी उन्नति रुकी हुई है।

हां बिलकुल गुण रहित जाति भी कोई नहीं होगी, कम से कम कोई न कोई गुण प्रत्येक जाती में ऐसा है, कि जो दूसरी जाति को सर्वथा अनुकरणीय है। सो परस्पर एक दूसरों के गुणों को ग्रहण करने में त्रुटि नहीं करनी चाहिये। उन्नति का सब से उत्तम तरीक़ा यही है कि गुण सब से लेवे। अफ़सोस! हिन्दुस्तानी लोग इस तरीक़े को नहीं वर्तते, निरर्थक झगड़े, फ़साद और वादविवाद में अपना समय खोते हैं। आज शास्त्रार्थ हुआ, आज आर्यों की खूब पोल खोली गई, आज मुबाहिसा हुआ, आज हिन्दू धर्म

का पक्का खण्डन हुआ, आज मुसलमानों के खूब धुरे उड़ाये गये, आज जैनियों का परदा फाश हुआ। वाह भाई, वाह! कैसी उम्दा दलीलों से अमुक साहिब ने आज अमुक मज़हब का खण्डन किया? प्यारो! इन व्यर्थ के वाद विवादों से क्या फ़ायदा हुआ और होगा, सिवाय इसके कि आपस में रंज पैदा हो, दुश्मनी बढ़े, और लोगों के दिलों पर बुरा असर पैदा हो। ओह! कैसे रंज की बात है कि तुम लोग मज़हब को खण्डन करने की नियत से तो उस मज़हब की किताबों को खूब ध्यान देकर पढ़ते हो, ताकि उन किताबों में जो कुछ दोष हो, वह तुम को मालूम हो जाय, और तुम उन दोषों को सरे-आम कह कर उस मज़हब वालों को मियाआ कर जाओ, पर कभी दूसरे मज़हब की किताबें उस नियत से नहीं पढ़ते कि उनमें से जो अच्छी बातें हैं उनको सीखो, और अपनी उन्नति करो। तुम लोग जोंक की तरह हो गये हो, जो स्तनों पर लगा देने पर भी दूध को छोड़ देती हैं, या कभी नहीं पीती, और हमेशा खून को पीआ करती हैं। यह मज़हबी झगड़ा हिन्दुस्तान में यक क़लम (तत्काल) बन्द होना चाहिए। यह तुम्हारी उन्नति का बड़ा ज़बरदस्त दुश्मन है, क्योंकि इन झगड़ों से आपस में रंज पैदा होता है, रंज के होने से दुश्मनी पैदा होती है। जब दुश्मनी हुई, तो आपसमें प्रेम कहां! और जब प्रेम नहीं, तो प्यारो! आपसमें एक दूसरे की सहायता नहीं होती, विना परस्पर की सहायता के किसी की उन्नति न हुई, न होगी। यदि अपनी उन्नति चाहते हो, तो पहले अपना एक दिल करो, अथवा अपना वह दिल बनाओ, जो उन्नति पाने वालों ने बनाया है। यदि लैला पाने की इच्छा रखते हो, तो मजनूं बनो, अथाैत् मजनूं का सा दिल बनाओ। खाली जुबान से यह कह देना कि मैं मजनूं हूं, मुझे

लैला मिल जाय, काफ़ी नहीं है। तुमको सबूत देना होगा कि तुम में और मजनूं में कोई फ़र्क़ नहीं है, तात्पर्य मजनूं ने लैला के लिये जितनी तकलीफें उठाईं, वह सब तकलीफ उसी के माफ़िक तुमको उठानी होंगी। लैला का लोभ देकर चाहे तुम्हारा शरीर चीरने के लिये कहा जाय, तो तुमको खुशी से शरीर चिराना होगा; यदि तुमको नदी में डूब मरने को कहा जाय, तो तुमको नदी में डूब मरना होगा; यदि आग में जल मरने के लिये कहा जाय, तो तुमको आग में जल मरना होगा; तुमको लैला के लिये जँगल, पहाड़, रेगिस्तान में घूमने के लिये कहा जाय, या न कहा जाय, घूमना होगा; तुमको ऊँच नीच का बिचार न करना होगा; ग़र्ज़ यह है कि जब तक तुम्हें लैला नहीं मिलती, तब तक हज़ारों तकलीफें उठानी पड़ेंगी, और उन तकलीफों पर ध्यान न देना होगा। इसी तरह पर प्यारो! तुमको अपने मुलक की उन्नति के लिये क्या नहीं करना होगा, तकलीफें उठानी पड़ेंगी; दुःख सहना होगा; जंगल, जंगल, पहाड़, पहाड़ में भटकना होगा; ऊंच नीच का बिचार नहीं करना होगा; और अपने शरीर को होम कर देना होगा। जब ऐसा करने के लायक होंगे, अथवा तैय्यार होंगे, तो स्वतः ही तुम्हारी उन्नति होगी। तुम्हारे मुलक की उन्नति होगी और सारे संसार की होगी, क्योंकि ऐसा करना ही सच्ची ब्रह्म-विद्या है, और सच्ची ब्रह्मविद्या ही से अपनी और संसार की उन्नति होती है।

जब अपनी जाति का ख्याल दृढ़ हो जाता है, तब किसी बात की कमी नहीं रहती है। यह कहने का मौका नहीं रहता है कि हमारे पास रुपया नहीं है, हम कुछ नहीं कर सकते। जापान वालों ने बिना रुपये खर्च किये ही परदेशों में जाकर

इल्म हासिल किया है, और अपने मुलक की तरक्क़ी की है। उन लोगों ने यह तरीक़ा अख्तयार किया है। जब वे दूसरे मुलकों को विद्या हासिल करने के लिये जाते हैं, तो अपने साथ कुछ इस लिये नहीं ले जाते, कि अपना रुपया परदेश में नहीं जाना चाहिये, अपने मुलक में ही रहना चाहिये। जब राम जापान से अमेरिका जाने के लिये जहाज़ में सवार हुआ, तो राम ने देखा कि 40 जापानी लड़के भी अमेरिका जाने के लिये जहाज़ में सवार हुए हैं। उन लड़कों के पास न कुछ खर्च था और न जहाज़ का किराया। उन लड़कों में बहुत से तो अमीर घर के थे, और बहुत से गरीब घर के। पर खर्च किसी के पास नहीं था। धन्य जापान! तुम लोगों में कितना स्वदेशानुराग है? तुम लोगों में कैसी बुद्धी है? "अपने देश का रुपया परदेश में न जाय" इस बात का तुमको कितना ख्याल रहता है, और इस लिये तुम कितनी तकलीफ उठाते हो, खर्च न ले जाने की वजह से उन लोगों ने जहाज़ की नौकरी करली। कोई मशालची हुआ, कोई भिस्ती हुआ, कोई भाड़ू देने वाला हुआ, कोई कोयला झोंकने वाला हुआ, ग़र्ज़ सबके सब लड़के जहाज़ में नौकर हो गये, और इस तरह सब लोग जहाज के किराये से बच गये। अमेरिका पहुंच कर उन्होंने जहाज़ की नौकरी छोड़ दी और 4 डालर देकर अमेरिका में रहने का पास ले लिया। अमेरिका में यह दस्तूर है, कि गैरमुलक वाला जो वहां उन के देश में जाता है, उस को वह जहाज से तब उतरने देते हैं जब कि उस के पास 40 डालर देख लेते हैं। वह लड़के वहां इल्म सीखने गये थे, पर खर्चा तो वह ले ही नहीं गये थे, कालेजों में वह किस तरह भरती होते? सो उन्होंने वहां मज़दूरी करनी शुरू की। किसी ने हल लगाना शुरू किया,

किसी ने और मज़दूरी अख्तयार की। वहां मज़दूरों को छः रुपया रोज तक मज़दूरी के मिलते हैं। अतः वह लड़के मज़दूरी करके खूब रुपया पैदा करने लगे। अमेरिका में मज़दूरों के पढ़ने के लिये रात के स्कूल (night schools) हैं, क्योंकि जो आदमी गरीव हैं और वह दिन के स्कूल में नहीं पढ़ सकते हैं, उन्हीं के उपकार के लिये रात के स्कूल का प्रबन्ध है, ताकि अपने गुज़ारे के लिये दिन में मज़दूरी करें, और रात में पढ़ें। बहादुर जापानी लड़के भी उन्हीं रात के स्कूलों में भरती हुए। सो वह रात को इल्म हासिल करने लगे, और दिन में रुपया कमाने लगे। जब उनके पास कुछ रुपया जमा होगया, और अंग्रेजी भी वह बोलने समझने लगे, तब कालेज में भरती होगये। जापानी लोग जिस मुलक में जाते हैं, उस मुलक की भाषा वह उसी मुलक में जाकर पढ़ते हैं। सो वह मुख्तलिफ क़िस्म के इल्म पढ़ने लगे। पश्चात् पास होकर अपने देश को आये, और इल्म के साथ साथ रुपया पैदा करके लाये। यह देखो, जापानियों की बुद्धि, स्वदेशानुराग, और कष्ट-सहिष्णुता कैसी अनुपम है! स्वदेशानुराग, कि अपने देश का धन अपने ही देश में रहे, यहां तक कि अपने फ़ायदे के लिये भी यदि दूसरे मुलक में जाना पड़े, तो भी जहाज़ रेल के किराये में भी अपना रुपया परदेश में न जाय, और कालेजों की पढ़ाई का खर्च तो अलग रहा, वरन् अपने देश के पैसे से एक किताब तक भी न खरीदी जाय; खाने पीने में अपना पैसा खर्च करना तो अलग रहा, उलटा वहीं से पैदा करके अपने मुलक को रुपया एकत्र करके लाया जाय; और अपने मुलक की भलाई के लिये सब से बड़ी बात यह की जाय कि दूसरे मुलकों से वह "आला इल्म" (उत्तम विद्या) सीख कर आय कि जिसकी

मुल्क में निहायत जरूरत है, और जिस पर अपने देश की उन्नति निर्भर है। बुद्धि, कि वह लोग कैसे जल्दी उस तरीके को सोच लेते हैं जिससे उनकी उन्नति हो। किराया से बचने के लिये ही उन्हों ने कैसा अनोखा कौशल किया था कि सफ़र भी होगया, किराया भी न पड़ा, उलटा कुछ रुपया हाथ आगया ! हम को संदेह है कि दुनियां के किसी और मुल्क के आदमियों की ऐसी बुद्धि हो। भला दुनियां में ऐसा कौन मुल्क है जिसने पचास वर्ष के अन्दर ऐसी आशातीत उन्नति की हो, जैसे जापान ने की है? यही उनकी विचित्र बुद्धि का अनुपम दृष्टांत है। यह उनके असली वेदान्ती होने का सुखद सुधामय मधुर फल है। कष्ट-सहिष्णुता, कि अमीरों के लड़के भी झाड़ू वगैरा नीच, और खेती वगैरः मुश्किल काम करने में न शर्मिन्दा हों, और न तकलीफ़ समझें, किन्तु दिन में खेती वगैरा की कठिन मेहनत करें और रात में करें गंभीर पढ़ाई, यानी शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के परिश्रम करें, और कभी न थकें ! प्यारो ! जापान में ऐसा देशानुराग है, ऐसी विचित्र बुद्धि है, ऐसी कष्ट-सहिष्णुता है, तब जापान जैसी और जितनी चाहे, वह वैसी और उतनी ही तरक्क़ी कर सकता है। उधर जब जापान के लोग अपने मुल्क की उन्नति के लिये ऐसे २ यत्न और विचारों से काम ले रहे हैं, इधर तब हिन्दुस्तान के लोगों की अजब कैफ़ियत है। पहले तो दूसरे मुल्कों को जाना ही हिन्दुस्तान की नज़र में पाप है, तिस पर भी यदि किसी ने हिम्मत की और उसको पाप न समझा, तो उसको आला दर्जे का सामान चाहिये। वह जापानियों की तरह मज़दूर होकर कभी दूसरे मुल्क नहीं जायगा। उसके लिये जहाज़ में अव्वल नम्बर का कमरा और

सामान चाहिये। वह जापानियों की तरह दिन में खेती कर के और रात को पढ़कर इल्म हासिल नहीं करेगा। किन्तु उसके लिये फ़ीस, खाने पीने के खर्च के लिये कम से कम 15 हज़ार रुपया चाहिये। वह जापानियों की तरह उस मुल्क से इल्म के साथ २ रुपया पैदा करके तो नहीं लावेगा किन्तु पहले तो इल्म भी अधूरा लावेगा, यानी उसमें पास नहीं होगा, और पन्द्रह हज़ार रुपये के अलावा और कई हज़ार क़र्ज़ करके भी लावेगा। वह जापानियों की तरह उस मुल्क से वह इल्म पढ़कर न लावेगा जिसकी अपने मुल्क में निहायत ज़रूरत है जिस से अपने मुल्क के गरीव व अमीर को फायदा पहुंचे, किन्तु वह इल्म सीख कर लावेगा जिस की अपने मुल्क के लिये कोई ज़रूरत नहीं, और जिस से अपने मुल्क के अमीर और गरीव सब तवाह हों ! यानी वहां से बारेस्टर बनकर आवेगा और गरीव अमीरों को लड़ा कर उनका रुपया खूब उड़ावेगा ! उन रुपयों को यदि अपने ही घर में जमा रखता, तो कुछ न कुछ अच्छा ही था; पर वह उन रुपयों को अपने साहिवाना ठाट रखने में खर्च करेगा और साहिवाना ठाट के लिये बिलकुल विलायती चीज़ की ज़रूरत है, कमरा सजाने के लिये विलायती सामान, पहरने के लिये विलायती कपड़ा, खाने के लिये विलायती खाना, बोलने के लिये विलायती भाषा, कहां तक कहें जूता विलायती, कुर्ता विलायती, चाल चलन विलायती. सो सब रुपया जो वह कमाता है, वह विलायती हो जाता है। इस तरह पर जो हिन्दुस्तानी विलायत गया भी, तो उससे विलायत का ही फायदा होता है हिन्दुस्थान का तो नुकसान ही है। इसके अतिरिक्त वह विलायत से लौट कर जापान वालों की तरह कभी मुल्क वालों को प्यार नहीं करेगा वल्कि अपने

मुल्क वालों को असभ्य, वेवकूफ और जंगली ख्याल करेगा और उनके साथ उठने बैठने व बोलने चालने में भी शरम मानेगा, तो कहिये हिन्दुस्तान की किस तरह तरक्क़ी हो ?

हिन्दुस्तान की तरक्क़ी के लिये इस बात की जरूरत नहीं है, कि हिन्दुस्तान के लोग विलायत में जाकर बैरिस्टरी पास करके आवें, किन्तु इस बात की ज़रूरत है कि वे लोग कृषी विद्या सीख कर आवें और हो सके तो और हुनर भी सीख करके आवें, जिससे अपने मुल्क को फ़ायदा हो, अपने मुल्क का पैसा अपने मुल्क ही में रहे, और दूसरे मुल्क का भी रुपया अपने मुल्क में आवे। दूसरे मुल्क का रुपया इस मुल्क में तबही अधिक आवेगा जब कृषी विद्या की तरक्क़ी होगी। और २ हुनरों में हिन्दुस्तान दूसरे मुल्क की बराबरी नहीं कर सकता, क्योंकि दूसरे मुल्कवाले उन बातों में बहुत बढ़ गये हैं, कृषी विद्या से हिन्दुस्तान की आमदनी का सिलसिला बढ़ सकता है, सो हिन्दुस्तान के लिये कृषी विद्या की ओर विशेष ध्यान देने की अत्यंत आवश्यकता है। इस विद्या की तरक्क़ी के लिये अमेरिका जाना होगा। वहां सब विद्या पढ़ाई जाती हैं। इंगलैंड में कृषी विद्या की ओर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता, क्योंकि वहां और २ हुनरों की अधिकता है, और आवादी बढ़ जाने के सबब से खेती भी कम है। हिन्दुस्तान में कृषी विद्या की पाठशाला पहले तो है ही नहीं, अगर कहीं है भी, तो ठीक नहीं है। यहां पढ़ाई का कुछ और ही ढंग है, किताबों में जो कुछ पढ़ाया जाता है वह अमल में नहीं लाया जाता। यहां पढ़ाना कुछ और, अमल में कुछ और। वहां स्कूल में जो कुछ पढ़ाया जाता है, वह अच्छी तरह अमल में भी लाना सिखाया जाता है।

अमेरिका में सब प्रकार की पढ़ाई का एक विचित्र ढंग है। चाहे किसी कला कौशल की पाठशाला को देखिये, अमली कार्यवाही उनका मुख्य उद्देश्य होगा, और वीररस का सर्वदा समावेश रहेगा, यहां तक कि मज़हबी स्कूलों में भी वीरता भरी शिक्षा दी जाती है। "राम" का निमन्त्रण एक वार मज़हबी स्कूल में हुआ। जब "राम" वहां गया, तो पहले लड़कों ने "हुर्रा हुर्रा" के शब्दों से आदर किया। फिर "राम" का व्याख्यान आरंभ हुआ। जब व्याख्यान खतम हुआ, तो लड़कों ने परेड दिखाई जो बिलकुल जंगी क़वायद के समान थी। "राम" को शंका हुई और प्रिंसिपल से दर्याफ्त किया, कि मज़हबी स्कूल में जंगी क़वायद का क्या काम है? उसने जवाब दिया, कि मौत का सामना तो सव से पहिले हम को ही करना पड़ता है। जब हम किसी मुलक में उपदेश करने के लिये जाते हैं, तो हम लोगों पर ही सव से पहले मौत का क़हर बरसता है। हम लोगों की जान ही पहले बरबाद होती है। यदि इनके दिलों में वीरता न भरी जाय, तो वे लोग किस तरह दूसरे मुलक में धर्मोपदेश करने के लिये जा सकते हैं। इसलिये इनके दिलों से मौत का खटका निकाल दिया जाता है, जिससे असभ्य (जंगली) मुलकों में जाने के लिये ये लोग संकोच (पशोपेश) न करें, उनको बहादुरी के साथ धर्मोपदेश करें, यदि मारे जांय तो परवाह न करें। सच्चे धर्म के प्रचार करने में जान चली जाय, परवा नहीं, परन्तु धर्म का प्रचार सर्वत्र करना चाहिये। प्रिंसिपल साहिब के इस उत्तर से हमको कैसा अच्छा सबक़ मिलता है, "कि हम को धर्म प्रचार करने के लिये अपनी जान का ख्याल नहीं रखना चाहिये, और सर्वत्र धर्म का प्रचार करना चाहिये"। अफसोस जब दूसरे

मुलक वाले धर्म के प्रचार करने में जान की वाज़ी लगा रहे हैं, तब हिन्दुस्तानी अपने भाई को भी धर्मोपदेश करने से जी चुराते हैं, तो क्यों न धर्म का हास हो, क्यों न धर्म की हानि हो, क्यों न धर्म की ग्लानि हो?

इस लिये हिन्दुस्तान धर्म-भ्रष्ट होने से मान-भ्रष्ट भी हुआ है। कैसे रंज की बात है, कि हिन्दुस्तान अपने उस सच्चे धर्म (वेदान्त) को भूल गया है, जो संसार की एकता को सिखाता है, जिस धर्म ने उसको उस ऊँचे आसन तक पहुँचा दिया था, कि जहां तक पहुँचने की बात सुन कर इस ज़माने के पंडित दाँतों तले उंगली दबाते हैं। वह भी समय था, कि हिन्दुस्तान में धर्म का ऐसा प्रभाव था, कि बिना धर्म विचार के हिन्दुस्तानी कोई काम नहीं करते थे। उनका खाना धर्म के लिये, सोना धर्म के लिये, पहरना धर्म के लिये, उठना बैठना धर्म के लिये, ब्याह-शादी धर्म के लिये होती थीं, अर्थात् विना धर्म के हिन्दुस्तानी कोई काम नहीं करते थे। जिस काम का धर्म से वास्ता नहीं, उस काम से हिन्दुस्तानियों को भी वास्ता नहीं होता था। वे लोग धर्म के लिये जंगल जंगल फिरने, भूख प्यासे मरने, पहाड़ों पहाड़ों में टकराने, गरमी सरदी को सहने और भारी भारी कष्ट उठाने ही में आनन्द समझते थे। धर्म के सिवा वह स्वर्ग के सुख को नरक की सामग्री समझते थे। मछली के जीवन के साथ पानी का जैसा संबन्ध है, उन के जीवन के साथ भी धर्म का वैसा ही सम्बन्ध था, अर्थात् धर्म ही उन का जीवन वा धर्म ही उन का आधार था, धर्म ही उन का उद्देश्य था। वे धर्म वीर थे और भीरु थे। धर्म वीर इस लिये कि वे धर्म के लिये अपने शरीर को भी कुछ नहीं समझते

थे, और धर्म-भीरु इस लिये कि सर्वदा प्रत्येक काम के करने में डरते रहते थे कि कहीं धर्म की हानि न हो। अपने शरीर के साथ वह जैसा वर्ताव करते थे, दूसरे के शरीर के साथ भी उनका वैसाही वर्ताब होता था। वह अपने में और दूसरे में भेद नहीं समझते थे। उनकी नज़र में संसार के सब ही प्राणी बराबर थे। सब को ही धर्मात्मा होना, सब को ही धर्मोपदेश देना, वह चाहते थे। सब की ही भलाई करना उनका नित्य कर्म था। पर अब ज़माना (समय) पलट गया। हिन्दुस्तानियों का धर्म अब केवल किताबों में रह गया है। हिन्दुस्तानियों का धर्म अब सिर्फ़ विवाद में काम आता है, हिन्दुस्तानियों का धर्म अब सिर्फ बातूनी जमा-खर्च का रह गया।

हिन्दुस्तानी अब न धर्मवीर रहे, न धर्मभीरु, क्योंकि धर्म के लिये अपने शरीर की परवा न करना तो एक तरफ़ रहा, जो कोई उनके घर में आकर उनके धर्म की निन्दा करने लगे, तो भी कान नहीं हिलाते हैं; और यदि आप बड़े बड़े अनर्थ भी कर बैठें, तौ भी न डरें, कि कैसे हम धर्म-हीन हो रहे हैं, हम धर्म पर कैसे लात मार रहे हैं? प्यारे हिन्दुस्तानियों! हिन्दुस्तानी अपने वे नज़ीर शास्त्रों की ओर ध्यान नहीं देते, विचार नहीं करते, मनन नहीं करते। ओह! तुमको मालुम नहीं है, कि तुम्हारे पूर्वजों ने तुम्हारे लिये कैसे अक्षय खज़ाने का संग्रह रख छोड़ा है। ऐसे ख़ज़ाने के पास होने पर भी प्यारो! भूखे मत मरो, ठोकर मत खाओ, इधर उधर मत भटको। इस खज़ाने का उचित व्यवहार करो, उचित रीति से खर्च करो, देखो और विचारो कि इस दौलत पर सारी दुनियां का हक़ है। तुम केवल इस बात

के एजेन्ट हो, कि इस ख़ज़ाने की बाबत सारी दुनियां को सूचित कर दो कि हमारे पास हम तुम सब के लिये ख़ज़ाना सौंपा गया है, आओ हम सब मिलकर उससे लाभ उठावें, और आप भी उस दौलत से फ़ायदा उठाओ, और दुनियां को भी उठाने दो, किसी से भी उस ख़ज़ाने को मत छिपाओ, नहीं तो विश्वासघात के दोष में पकड़े जाओगे। और ख़ज़ाना भी तुम्हारे पास नहीं रहेगा, क्योंकि उस ख़ज़ानेकी यही तासीर है कि जो उसको छिपा रखता है, उसके पास से वह निकल जाता है। केवल संदूक रह जाता है, माल चला जाता है। शरीर रह जाता है, प्राण चला जाता है। सो तुम देख ही रहे हो कि तुम्हारे पास सिर्फ़ नक़ल बाक़ी रह गई है और असल का पता नहीं है। तुम्हारे धर्म की असलियत जापान अमेरिका आदि मुल्कों को चली गई है। तुम्हारे पास सिर्फ़ नक़ल बाक़ी है। तुम्हारा धर्म का वृक्ष खोखला हो गया है। अब भी अगर बहुत जल्दी उसका उपचार नहीं करोगे, उपाय नहीं करोगे, विचार नहीं करोगे तो जो संदूक तुम्हारे पास है वह टूट फूट जायगा, शरीर भी सड़ गल जायगा, वृक्ष भी गिर जायगा, नक़ल भी उड़ जावेगी। और तुम मधुमक्खी की तरह हाथ मलते और सिर पटकते रह जाओगे।

इस ख़ज़ाने को बहुत दिनों छिपाकर तुम सैंकड़ों तकलीफ़ें सह चुके हो, हज़ारों नुक़सान उठा चुके हो, अपनी इज़्ज़त और आबरू खो चुके हो, अपनी स्वतंत्रता और राज-पाट खो चुके हो, अर्थात् अपना सब कुछ खो चुके हो, तो प्यारो! अब तुम और क्या खोना चाहते हो, जो फिर भी इसके छिपाने की कोशिश करते हो? क्या तुम यह चाहते

हो, कि तुम्हारा नाम निशान तक इस दुनियां में न रहे? नाम के लिये तुम्हारा नाम किसी क़दर अभी तक है, सो उसका मलियामेट होना चाहता है, क्योंकि तुमने इस धर्म (ख़ज़ाने) को इस क़दर छिपा रक्खा है, कि आप भी उस को नहीं देखना चाहते हो, कि उस में कैसे २ अमूल्य रत्न भरे पड़े हैं जिससे तुम को, अपनी असलियत मालूम होती और तुमको अभिमान होता कि हमारा ख़ज़ाना दुनियां के और ख़ज़ानों से बढ़िया है। पर ऐसा न करके तुम दूसरों के कांच पर लुभाये चले जाते हो। और अगर तुम्हारी फिर भी यही हरक़त रही, तो तुम सबके सब कांच पर लुभाये चले जाओगे और तुम्हारा नामो-निशान दुनियां में नहीं रहेगा। यह भी याद रक्खो कि यह अमूल्य ख़ज़ाना अब छिपाने से भी छिपता नहीं है। लोगों को उसका पता लग चुका है और अमूल्य जवाहिरातों को वे लोग निकालने लग गये हैं। तुम्हारे ख़ज़ाने के अमूल्य रत्नों में से, सत्य, शौच, संयम, विद्या, बुद्धि, धृति क्षमा नाम के रत्न और सब ही रत्नों से बना हुआ समदर्शिता रूप महारत्न, जिसका दूसरा नाम ब्रह्मविद्या या वेदान्त है, उस का नाम नहीं दिखाई देता है, वह सब के सब अमेरिका, जापान आदि दूसरे मुल्कों में चले गये हैं, ऐसा ही मालूम होता है। देखो अमेरिका, जापान आदि मुल्कों में जो अद्भुत प्रकाश का सौन्दर्य दिखलाई देता है ऐसा प्रतीत होता है कि यह उन्हीं महारत्नों की विमल ज्योति, छटा का प्राकृतिक गुण है, उन्हीं का प्रभाव है और उन्हीं का महत्व है। जापान, अमेरिका को देखकर कृष्ण के ज़माने का स्मरण होता है। उस ज़माने में हिन्दुस्तान में जिस दर्जे का धर्म था, उन मुल्कों में इस समय उस दर्जे का धर्म पाया जाता है, तब हिन्दुस्तान की

उस ज़माने में जो हालत थी, वह हालत जापान अमेरिका की इस वक़्त हो, तो आश्चर्य क्या है।

एक दफ़े राम के लिये एक धनवान स्त्री के यहां से न्योता आया, जो विपुल धन की अधिकारिणी थी जिसने 45 लाख रुपया अपने मुल्क की उन्नति के लिये ही दान दिये थे। जब "राम" वहां गया, तो वह धनी स्त्री जूता भांड़ने के लिये तैयार थी। राम ने आश्चर्य से पूछा, कि तुम इतने नौकरों के मौजूद होने पर भी, ऐसा काम स्वयं क्यों करना चाहती हो? उसने उत्तर दिया, कि इस काम के करने में लज्जा ही क्या है, यह शारीरिक काम करने में हम अपनी इज़्ज़त समझते हैं, और उसने अपने ही हाथों से यह काम किया। क्या कोई हिन्दुस्तानी रईस, या मामूली आदमी भी ऐसा काम कर सकता था? कभी नहीं। हिन्दुस्तानी आदमी अगर यह सम्भव हो तो अपनी आँखों से भी देखा नहीं चाहता है। पर कृष्ण के ज़माने में ऐसा आतिथ्य-सत्कार बड़े आदमी स्वयं करते थे। कृष्ण तथा कृष्ण की पटरानियों ने स्वयं ऐसा आतिथ्य-सत्कार सुदामा आदि ब्राह्मणों और अतिथियों का किया। युधिष्ठिर के यज्ञ में अर्जुन और कृष्ण ने जूठी पत्तल उठाने और पैर धोने का काम अपने ज़िम्मे लिया था, पर अब अमेरिका में यह बातें पाई जाती हैं, हिन्दुस्तान में नहीं।

कृष्ण के ही ज़माने में हिन्दुस्तान में ब्रह्मचर्य की जो अवस्था थी वह अमेरिका में अब पाई जाती है। वहां 20 वर्ष तक न कोई व्याह करता है और न किसी को व्याह का ख़्याल ही होता है, यहां तक कि 20 वर्ष तक तो लड़के और लड़कियां एक ही पाठशाला में पढ़ते हैं और भाई बहिन

की सी प्रीती रखते हैं। उनके विषय में चाहे कोई कुछ कहे, पर इस बात का हम को दृढ़ विश्वास है, कि उनके दिलों में कभी नापाक ख्याल पैदा नहीं होता है। यह कैसे गज़ब का ब्रह्मचर्य्य है ? वह स्त्री और पुरुष को बराबर की शिक्षा देते हैं, उनकी पढ़ाई में वह कुछ भेद नहीं रखते हैं। मर्दों के बल को बढ़ाने की जैसी आवश्यकता है, स्त्री के बल को बढ़ाने की भी वैसी ही आवश्यकता समझते हैं, और है भी। वह लोग स्त्री के बल को कम नहीं करते, हम लोग बलहीन कर देते हैं। यही कारण है कि हिन्दुस्तान की स्त्रियां बलहीन होती हैं, निर्बल संतान जनती हैं, और घर के कामों को भी यथा रीति सम्पादन नहीं कर सकती हैं। अमेरिका की स्त्रियां वीर होती हैं, वीर संतान जनती हैं, और घर के कामों में बड़ी प्रवीण होती हैं। वहां की स्त्रियों की वीर कहानी देख कर आश्चर्य होता है। जवान स्त्रियों की बात जुदी है, वहां लड़कियां ही सितम कर जाती हैं। एक दफ़े एक लड़की ने जिसकी आयु अठारह वर्ष की थी, एक भील को जिसका वर्ग (दायरा) तीन मील था, तैरने की इच्छा जाहिर की। इसके लिये दिन नियत कर दिया गया, नोटिस बांटे गये। लड़की की कठिन प्रतिज्ञा को सुन कर लोगों को आश्चर्य होता था। मुक़र्रर दिन पर बड़ी भारी भीड़ इकठी हुई। लड़की तैरने की तैयारी करने लगी, किश्तियों को उसके दोनों तरफ तय्यार रहने की इजाज़त हुई, ताकि लड़की थक जाय तो किश्ती जावे और डूबने न पावे। लड़की ने तैरना शुरू भी साथ २ चलती गई, पर तअज्जुब है, कि बड़ी भील को साफ तैर गई और थकी भी यह काम होना संभव नहीं है, ऐसे

ब्रह्मचर्य्य के हो नहीं सकता है। कृष्ण के ज़माने में स्त्रियां ब्रह्मचर्य्य में रहती थीं और बड़े २ कठिन काम संपादन करती थीं। सत्यभामा कृष्ण के साथ स्वयं लड़ाई में गई थीं। उस ज़माने में स्त्रियों को खूब शिक्षा दी जाती थी। रुक्मणी सत्यभामा आदि खूब लिखी पढ़ी हुई थीं। द्रोपदी ऐसी पंडिता थी, कि उसने सभा में जो प्रश्न किये थे उनका उत्तर देना भीष्म पितामह के लिये भी कठिन होगया था। अब हिन्दुस्तान में स्त्री-शिक्षा बंद कर दी गई, जिसका फल भी खूब मिल रहा है। अमेरिका आदि मुल्कों में स्त्री-शिक्षा का खूब प्रचार है। एक समय राम अमेरिका के जंगलों में रहता था, एक अमेरिकन लड़की अपने पिता के साथ उपदेश सुनने आई। उपदेश पूरा होने के पश्चात् उस लड़की ने जो कुछ सुना था, वह कविता में लिख डाला। इन सब बातों पर विचार करने से मालूम होता है कि स्त्री और पुरुषों की शिक्षा में न पहिले भेद था और न इसलिये उनकी दिमागी ताक़त में फ़र्क़ होता था। तब हम कोई कारण नहीं समझते, कि स्त्रियों की शिक्षा क्यों बन्द हुई और उनकी ताक़त क्यों रोक दी गई है। मुल्क की उन्नति के लिये स्त्री-शिक्षा की अत्यंत आवश्यकता है, अर्थात् बिना स्त्री-शिक्षा के मुल्कों की उन्नति हो ही नहीं सकती है। लड़कपन में बालकों को जो उपदेश दिया जाता है, उसका असर बहुत जल्द होता है, और कभी खाली नहीं जाता है, और बालकों को माता ही के साथ रहने का अवसर मिलता है। सो लड़कपन में बालकों को शिक्षित माता की आवश्यकता होती है। पर यदि स्त्री पढ़ाई ही नहीं जायगी, तो शिक्षित माताएं कहां से होंगी; और जब शिक्षित माता ही नहीं, तो बालकों को सदुपदेश ही कहां से दे सकती हैं। और जब बालक बाल्यावस्था ही में सदुपदेश

द्वारा सुयोग्य न बना दिये गये, तो मुल्क की कैसे उन्नति हो सकती है। अतः प्यारो! स्त्री-शिक्षा को फैलाओ, तुम्हारे पूर्व पुरुषों स्त्री-शिक्षा के पक्ष-पाती थे, तुम क्यों विपक्षी बन कर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारते हो ? लड़कों को बाल्यवस्था में यह ज़रूरी है, कि उनके नसनाड़ी में देशोन्नति का ख्याल घसा दिया जाय, ताकि बड़े होने पर वह ख्याल दृढ़ हो जाय, और देशोन्नति करना ही उनका कर्तव्य मुख्य हो जाय। तब तुम्हारे देश में कोई वाधा उपस्थित नहीं होगी। तुम बराबर उन्नति करते जाओगे।

उन्नति के मार्ग में सफलता प्राप्त करने के लिये स्त्री-शिक्षा जैसी परम आवश्यक है, वैसे ही सत्य व्योपार है। बिना व्योपार की तरक्क़ी के देश की तरक्क़ी नहीं हो सकती। चाहे जिस उन्नत मुल्क की ओर दृष्टि डालो, व्यापार ही उसका मूल कारण दिखलाई देगा। हिन्दुस्तान में व्यापार बड़ी बुरी दशा में है। हिन्दुस्तानी व्यापार करना नहीं जानते। उद्योग और पुरुषार्थ को काम में न लाकर क्षुद्र व्याज के लोभ में हिन्दुस्तानी अपनी पूंजी लगा देते हैं, और आप सुस्त आलस्य-ग्रस्त होकर चारपाई पर पड़े २ मक्खी हांका करते हैं। दूसरे देश वाले अपने उद्योग, पुरुषार्थ और सत्य व्यापार से गरीब से धनी, और धनी से कुबेर हो रहे हैं, और हिन्दुस्तानी इसके ठीक विपरीत। दूसरे मुल्क वालों के व्यापार के फैलाव को देखकर मन को आश्चर्य होता है। शिकागो में मार्शल फील्ड की एक दुकान है। यह 20 मंजिल ऊंची और एक मील लंबी चौड़ी है। यहां नित्य क़ोड़ों रुपयों का सौदा होता है। इतनी भारी और आला दर्जे की दूकान होने से इतना तअज्जुब नहीं होता, जितना

कि ग्राहकों के साथ इनका सद्व्यवहार देख कर होता है। लाखों रुपयों का माल खरीदने वाले से और एक पैसे की दियासलाइयां खरीदने वाले से एकसा बर्ताव करते हैं। चाहे कोई कितने ही का खरीदार हो, जब वह दुकान के फाटक पर जावेगा, तो शीघ्र ही एक दर्वान कुछ आगे बढ़कर उसकी अगवानी करेगा, और बड़ी नम्रता से उस से विनय करेगा, कि क्या हुक्म है। जब वह कहेगा, कि मुझे फलानी चीज़ दरकार है, या मैं अमुक वस्तु केवल देखना चाहता हूं, तो वह दर्वान उसको उस कोठरी में, जहां उसके लायक़ सौदा है, या जहां २ वह देखना चाहता है, ले जायगा; पश्चात् फाटक से कुछ दूर तक उसको पहुंचा कर अदब से सलाम करके वापिस होगा। यह बराबरी का सलूक, यह सच्चाई, यह प्रेम ही व्यापार की उन्नति के मुख्य अंश हैं। वह इनका पूर्ण व्यवहार करते हैं, और इस लिये ही वह व्यापार में इतना बढ़े चढ़े हैं, कि उनकी बराबरी करनी मुश्किल जान पड़ती है। यहां हिन्दुस्तानियों की अजब कैफ़ियत है। यहां ग्राहकों के साथ एकसा वर्ताव नहीं होता। बड़ी दुकानों से थोड़ा सौदा खरीदने का किसी को हौसला नहीं होता। इसका कारण यह है कि बड़ी दुकान वाले थोड़ा सौदा खरीदने वाले के साथ अच्छा बर्ताव नहीं करते। छोटी छोटी दुकान वाले अक्सर झूठ कहा करते हैं। इन लोगों का यह ख्याल है कि बिना झूठ के व्यापार चल ही नहीं सकता। एक पैसे का सौदा खरीदने में घंटे भर तक मगज़ मारना पड़ता है। मुफ्त में तकरार बढ़ती और समय नष्ट होता है। यदि सच्चाई के साथ व्यवहार किया जाय, तो क्यों न व्यापार में तरक्क़ी हो ?

हिन्दुस्तान में व्यापार की तरक्क़ी क्यों नहीं होती ? इस

का एक कारण यह है कि हिन्दुस्तानी लोग, जो लिख पढ़ सकते हैं वह केवल नौकरी किया करते हैं, व्यापार करना वह अपनी बेइज़्ज़ती समझते हैं, या उधर ध्यान नहीं देते। चाहे दुकानदारों की ही वह नौकरी करें, पर दुकानदारी कभी नहीं करेंगे। यह क्या ही मज़े की बात है, कि जिस पेशे को स्वयं नहीं करना चाहते उस पेशे वाले की नौकरी तो वह कर लेंगे, पर वह इज़्ज़त का पेशा न करेंगे। हिन्दुस्तानियों को व्यापार की ओर ध्यान देने की अत्यन्त आवश्यकता है। व्यापार नीति का रहस्य जानने के लिये सिर तोड़ परिश्रम तथा अनुभव करने की निहायत ज़रूरत है, कि किस प्रकार कौन से व्योपार से किस देश में कितना लाभ होगा, हमको ग्राहकों के साथ किस प्रकार वर्ताव करना चाहिये। इस बात की ओर पूरा २ ध्यान देना चाहिये, इस बात पर दृढ़ विश्वास करना चाहिये, कि सच्चाई के साथ व्योपार करने से जो लाभ होता है, वह कदापि झूठ व्यवहार से नहीं होता। झूठे व्यवहार से एक दफ़े रक़म आनी संभव है, पर पश्चात् वह चलता नहीं। काठ की हांडी दुसरी दफ़े आग पर नहीं रक्खी जाती, एक दफ़े चाहे उसमें बना भी लो। बरसाती नदी जैसे किनारों को तोड़ फोड़ कीचड़ तथा लकड़ी बहा कर सन सनाती हुई धूम धाम के साथ थोड़े दिनों तक अपना प्रवाह रखती है, और फिर उसमें पानी पीने को भी नहीं रहता, इसी प्रकार झूठा व्यवहार थोड़े दिनों तक दुनियां को ठग कर लोगों की नज़र में अपना वैभव दिखाता है, पश्चात् वह स्वयं नष्ट हो जाता है। और साथ ही इज़्ज़त और आबरू को भी अपने में लयकर देता है। पर सत्य व्यापार करने से धन की प्राप्ती होती है, प्रतिष्ठा बढ़ती है, धर्म होता है और मुक्ति मिलती है। यह

लोक और परलोक दोनों बनते हैं। महात्मा तुलाधार वैश्य का इतिहास किस को मालुम नहीं ? सत्य व्यापार करते २ यह उस दर्जे के धर्मात्मा और ज्ञानी हो गये थे, कि बड़े २ तपस्वियों को कितने ही वर्ष तपस्या करने पर भी वह ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था। एक तपस्वी एक दफ़े महात्मा तुलाधार की धर्म व ज्ञान-कीर्ति सुनकर उनके सत्संग की इच्छा से उनके पास आया। ज्योंही उस महात्मा का तुलाधार से मिलना हुआ, कि तुलाधार ने उनके आने का कारण ज्यों का त्यों कह सुनाया। तपस्वी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि मुझे जो ज्ञान कितने ही वर्ष तपस्या करने पर भी प्राप्त नहीं हुआ, इस नीच-वृत्ति से इसे कैसे प्राप्त हुआ। दर्याफ़्त करने पर महात्मा तुलाधार ने कहा "आप को आश्चर्य होगा, कि इस पेशे करने वाले को ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ! पर इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। मैं हमेशा सत्य का व्यवहार करता हूं। अपने ग्राहकों को ठगने की कभी इच्छा नहीं रहती। मामूली नफ़ा लेकर अपने ग्राहकों को सौदा देता हूं। मैं कभी कम या ज़्यादा किसी को नहीं देता और न किसी से लेता हूं। सब के साथ एकसा वर्ताव करता हूं, सब के साथ सच्चा व्यवहार करता हूं ! सत्य ही सब धर्मों में श्रेष्ठ है, और उसी का मैं सेवन करता हूं। छल कपट कभी नहीं करता। यही कारण है, कि मुझको यह ज्ञान प्राप्त हुआ है, जिससे आप जैसे महात्माओं का मुझे घर बैठे दर्शन मिलता रहता है"। अहा! सत्य का कैसा महात्म्य है! यदि हिन्दुस्तानी वैश्य लोग तुलाधार के इस पवित्र उपाख्यान की ओर दृष्टि दें, यदि वह तुलाधार की तरह सत्य व्यवहार करें, सत्य बोलें, सत्य तोलें, तो उनको तपस्या के लिये जंगल में जाने का क्या प्रयोजन है ? सत्संग

के लिये महात्माओं के ढूंढ़ने का क्या मतलब है ? दुकान पर बैठे हुए धन, धर्म, काम, मोक्ष, सत्संग वगैरा सब अपने आप चले आते हैं, क्योंकि अक्सर यह देखा गया है, कि जो भले आदमी होते हैं, वह बहुधा उसी दुकान से लेन देन रखते हैं, जो सत्य व्यवहार करते हैं। भले आदमियों के ही समागम को सत्संग कहते हैं, सत्संग ही से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति होती है। तो प्यारो! तुम सत्य व्यवहार, प्रेम का वर्ताव क्यों न करो। यह देखिये, आज कल ग़ैर मुल्क वाले तुलाधार की तरह सत्य व्यवहार से कैसे माला माल हो रहे हैं। यह देखिये, उनका कैसा ऐश्वर्य्य बढ़ रहा है। यह देखिये, इसी व्योपार की बदौलत सारी दुनिया उनकी हस्तगत हुई चली जारही है। तुम लोग भी सत्य व्यापार करो। व्यापार की वृद्धि करो। क्षुद्र व्याज के लोभ में पूंजी लगा कर आलसी मत बनो। देखो ग़ैर मुल्क वाले व्यापार में इतने रुपये लगा रहे हैं कि बुद्धि काम नहीं करती। उतना रुपया तुम्हारे पास है ही नहीं। मतलब यह है कि जितना भी रुपया तुम्हारे पास है, वह सब व्यापार के लिये बहुत कम है। व्याज में न लगाकर उन रुपयों को व्यापार में लगाने से तुम को आशातीत लाभ होगा, तुम्हारे मुल्क को फ़ायदा पहुंचेगा।

यह पहले कहा जा चुका है कि हिन्दुस्तानी लिखे पढ़े आदमी व्यापार करना नहीं चाहते, यह बड़े अफ़सोस की बात है, पर इससे भी ज़्यादा शोक इस बात पर है कि हिन्दुस्तानी व्यापारी लोग विद्या की ओर ध्यान नहीं देते। विद्या को वह कोई चीज़ नहीं समझते। उनका ख्याल है कि हमको किसी की नौकरी थोड़ी करनी है, जो पढ़ने में इतना

सिर मारें। यह उन लोगों का बड़ा ही बेहूदा ख्याल है। अनपढ़ आदमी जितना रुपया लगाकर जितना नफ़ा उठा सकेगा, लिखा पढ़ा आदमी उतने ही रुपयों से बीस गुना नफ़ा कर सकता है। व्यापार के लिये धन की जैसी ज़रूरत है, विद्या की भी वैसी ही ज़रूरत है। यह कैसी कठिन समस्या है, कि लिखे पढ़े आदमी तो व्यापार नहीं करते और व्यापारी लिखना पढ़ना नहीं चाहते। व्यापार के लिये नित्य नई नई तदबीरें सोचनी पड़ती हैं, और नई २ तदबीरों को सोचने के लिये विद्या चाहिये। पर व्यापारी लोग विद्या ही नहीं पढ़े हैं, तो वह कैसे नई २ तदबीरें सोच सकते हैं। यह कारण है कि हिन्दुस्तान का व्यापार तरक्क़ी में नहीं है। ग़ैर मुल्क वाले नित्य नई २ तदबीरें सोच कर नया २ कौशल रचकर व्यापार में आशातीत उन्नति कर रहे हैं।

जब ग़ैर मुल्क वालों की इस उन्नति का सवाल हिन्दुस्तानियों के सामने रक्खा जाता है, तब हिन्दुस्तानी अक्सर यह दलील पेश करते हैं कि उनका मुल्क ठंडा है, और हमारा गर्म। गर्म मुल्क होने की वजह से हम उनका मुक़ाबला नहीं कर सकते। यह ख्याल बिलकुल ग़लत है। ठंड और गर्म उन्नति के साधक और बाधक नहीं हैं। यह विलायत वालों की एक पालसी है, कि उन्होंने हिन्दुस्तानियों के दिलों में यह ख्याल जमा दिया है, ताकि हिन्दुस्तानी उनका मुक़ाबला करने की कोशिश न करें। आज कल हिन्दुस्तानी ऐसे सधे मिज़ाज के होगये हैं कि विलायत वालों की चटक मटक पर बिलकुल मोहित हो गये। उनके दिलों में यह ख्याल हो गया है कि विलायत वाले जैसे कहें व करें, वह ठीक है। "राम" इस बात को ज़ोर देकर कहता है, कि गर्मी के सबब

हिन्दुस्तान की उन्नति नहीं रुकी हुई है। हिन्दुस्तान की उन्नति अगर रुकी हुई है, तो इस लिये रुकी है, कि हिन्दुस्तानी लोग अपने सच्चे धर्म (वेदान्त अथवा सच्ची ब्रह्म विद्या) को अमल में लाना भूल गये हैं। तोता जैसे राम २ या और कोई वाक्य सिखाने से सीख जाता है, पर उसको समझ नहीं सकता, या अमल में नहीं लाता, वैसे ही हिन्दुस्तानी लोग, ब्रह्म विद्या, यानी वेदान्त, शब्दों को तो जानते हैं, पर उसको अमल में नहीं ला सकते हैं, बस यही अवनति की निशानी है और इसी से अवनति होती है। अमेरिका जापान आदि मुल्कों में, यद्यपि, 'ब्रह्म विद्या' शब्द को नहीं जानते हैं, अर्थात् 'ब्रह्मविद्या' उनकी बुद्धि में नहीं है, परन्तु उनके नस २ में और उनके अमल में ब्रह्म विद्या है। यह क़ुदरत का क़ानून है, कि कोई भी चीज़ उस के गुण जानने पर भी जब तक अमल में नहीं लाई जाती है, अपना गुण नहीं दिखाती है। मिश्री का गुण चाहे कोई भलाही समझता हो, पर जब तक खायेगा नहीं, कभी अपना गुण नहीं दिखायगी, या अमृत के गुण चाहे कोई भला ही जानता हो कि इसके खाने से आदमी अमर हो जाता है, पर जब तक खावेगा नहीं अमर नहीं हो सकता, चाहे वह अमृत उसके हाथ में हो। सो इसी तरह हिन्दुस्तानी ब्रह्म-विद्या के गुणों को समझते हैं, उसकी तारीफ़ करते हैं, पर उसको अमल में लाते नहीं हैं, तब कैसे ब्रह्मविद्या उनको अपना गुण दिखावेगी ? अमेरिका और जापान वालों ने ब्रह्म-विद्या का नाम नहीं सुना, तारीफ़ नहीं सुनी, पर वह उसको बेजाने ही अमल में लाते हैं, तब उन पर वह अपना गुण क्यों न दिखावे ? और क्यों न उनकी उन्नति हो ? अतः प्यारो! सर्दी और गर्मी उन्नति की साधक और बाधक नहीं हैं। अगर सर्दी उन्नति का कारण होती

तो तिब्बत आदि देशों की दशा भी अच्छी रहती। वह ब्रह्म विद्या है जिसका अमल में लाना और न लाना उन्नति का साधक तथा बाधक है। अमेरिका आदि मुल्कों के समान जब तुम भी शारीरिक परिश्रम के करने में अपनी प्रतिष्ठा समझने लगोगे, बीस पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य धारण करोगे, स्त्रियों को बराबर शिक्षित करोगे, सब के साथ बराबर का वर्ताव करोगे, सच्चाई से काम लोगे, एक दूसरे से मुहब्बत करना सीखोगे, तब ही तुम्हारी उन्नति निश्चित है, और इसी को असली वेदान्त कहते हैं। भला विचार करने की बात है, कि जब हिन्दुस्तानी चक्रवर्ती राज्य करते थे, क्या तब हिन्दुस्तान गर्म नहीं था ? जब हिन्दुस्तानियों ने बड़े २ दर्शन-शास्त्र रचे थे, क्या तब हिन्दुस्तान गर्म नहीं था ? जब हिन्दुस्तानियों ने विमान आदि भांति २ की कला निर्माण की थी, क्या तब हिन्दुस्तान गर्म नहीं था ? जब हिन्दुस्तानियों ने अपनी विद्या बुद्धि, बीरता से जग को जीत लिया था, क्या तब हिन्दुस्तान गर्म नहीं था ? यदि कहो कि, जी! अब तो कलियुग आगया है, वह तो सतयुग की बातें हैं, तो क्या अमेरिका जापान के लिये कलियुग नहीं आया ? यह दलील बड़ी पोच है। कलियुग कोई चीज़ नहीं है। कलियुग सिर्फ समय के एक हिस्से का नाम है। यह किसी का हाथ भले कर्म करने से नहीं खींचता है। हां बेशक, ब्रह्मविद्या के अमल में न लाने को कलियुग कहा जाय, तो ठीक है; और तब हक़ीक़त में मनुष्य से कुछ भी अच्छा काम नहीं हो सकता, क्योंकि कोई भी अच्छा काम ब्रह्मविद्या से भिन्न नहीं है। पर पैसा कोई ज़माना ही नहीं, समय नहीं, घंटा पल नहीं कि जब ब्रह्मविद्या से परहेज़ किया जाय, तो कलियुग कहां हा ? प्यारो! विचार तो करो, कहां तुम्हारे पूर्व पुरुष अड़तालीस वर्ष तक

ब्रह्मचर्य्य रखते थे, और कहां तुम दो चार वर्ष के लड़के भी शादी कर रहे हो। तुम विद्या को उपयोग में नहीं लाते, अर्थात् जो कुछ पढ़ते हो, वह अमल में नहीं लाते। रट २ कर बी० ए०, एम० ए० पास करते हो, पर उसका व्यवहार नहीं करते। खाली नौकरी कर लेने में अपने इल्म को सार्थक समझ लेते हो। तोता जैसे पढ़ाने से राम राम पढ़ लेता है, लेकिन समझता कुछ नहीं, यही हाल आजकल हिन्दुस्तानियों का है। सो हिन्दुस्तानियों का ब्रह्मचर्य्य न रखने से, बल-वीर्य्य और विद्या का उचित प्रयोग न करने से, बुद्धि कमज़ोर होती चली जा रही है। विलायत वाले कम से कम बीस वर्ष तक पूर्ण ब्रह्मचर्य्य रखते हैं, इसलिये वे मज़बूत होते हैं, और जो कुछ पढ़ते हैं उसको अमल में लाते हैं, और जहां तक हो सकता है एक न एक बात नई पैदा करने की फ़िक्र में रहते हैं, इसलिये उनकी बुद्धि रोज़ बरोज़ बढ़ती चली जाती है। ठंड (सर्दी) होने की वजह से उनकी ऐसी उन्नति नहीं हुई। जिस ज़माने में हिन्दुस्तानी उन्नति के ऊंचे शिखर पर चढ़े हुए थे, और विलायत वाले जंगल में रहा करते थे, उस ज़माने में भी वहां ठंड ही थी।

अतएव ठंड और गर्म की दलील बिलकुल बेहूदा है, यह कदापि उन्नति और अवनति के साधक व बाधक नहीं हैं। जापान पचास वर्ष पहले यदि गर्म था, तो वह ठंडा नहीं होगया। उसने ऐसी क्यों उन्नति की है ? प्यारो ! गुणों को ग्रहण करने और अवगुणों के त्यागने से, और अपनी विद्या-बुद्धि का उचित प्रयोग करने ही से जापान ने ऐसी तरक्क़ी की है। तुम भी ऐसा कर सकते हो। जो पढ़ते हो, उसका अमल में लाना सीखो, यही उन्नति का उपाय है। हिन्दुस्तानी

बी. ए. एम. ए. पास करके जो बात नहीं सीख सकते, विलायत वाले उस बात को बचपन में सीख जाते हैं। वहां बच्चों के लिये किंडर-गार्डन नाम का स्कूल है। इस स्कूल में बच्चे ऐसे प्रेम से सिखाये जाते हैं कि लड़के घर में रहना पसंद नहीं करते। वह घर में अपने मां बापों को स्कूल में जल्दी भेजने के लिये नाक में दम कर देते हैं। वह हमेशा यह चाहते हैं कि हम स्कूल में जांय। इसका कारण यही है कि उस्ताद लोग बच्चों के साथ ऐसी ऐसी मुहब्बत करते हैं कि उनके मां बाप भी वैसी नहीं करते। वह बच्चों के साथ बिलकुल बच्चे होजाते हैं। उनके साथ खेलते हैं, कूदते हैं, हँसते हैं, और साथ ही साथ उनको पढ़ाते जाते हैं। यहां रेल, जहाज़, तार और विविध भांति कलों के बनाने का सब सामान मौजूद रहता है। जब रेल का सबक़ पढ़ाया जाता है, तो उस्ताद लोग बच्चों को उस जगह लेजाते हैं, जहां रेल बनाने के कल पुर्ज़े रक्खे हुए रहते हैं। उस्ताद लोग इंजन बनाना सिखाते हैं, और लड़के बात की बात में हँसते खेलते इंजन बनाना सीख जाते हैं। जितनी देर में हिन्दुस्तानी बच्चे आर. ए. आइ. पेल. रेल, माने धुवांगाड़ी, याद करते हैं, उतनी देर में वह रेल बनाना भी सीख जाते हैं। यहां सिर्फ नाम मात्र जानते हैं, वहां नाम के साथ रेल बनाना भी सीख जाते हैं। हिन्दुस्तानी शब्द-समूह को दिमाग़ में भरते हैं, विलायत वाले दिमाग़ से निकालते हैं, अर्थात् उनको अच्छी तरह समझते हैं। यहां रटन करते हैं, वहां मनन करते हैं। वहां अव्वल से किसी बात को सोचते हैं, दिलमें उसको करने की इच्छा करते हैं, और हाथों से उसको करके दिखलाते हैं, यहां कुछ भी नहीं। खाली किताबें रट २ कर पंडित कहलाते हैं, यहां की विद्या पुस्तकों में है वहां, की विद्या

हर एक के हस्त-गत है। वहां कभी किसी विद्यार्थी को तब तक प्रमोशन (Promotion) नहीं मिलती, जब तक कि उसको उस दर्जे के लायक़, जिस में कि वह पढ़ता है, विचार करने तथा मनन करने की शक्ति नहीं होती। यहां इस बात पर विचार नहीं किया जाता। किताबें मुखाग्र करके अबोध बालक भी बड़ा दर्जा पास कर सकता है, कोई उसकी लियाक़त की ओर ध्यान नहीं देता। वहां सिर्फ लियाक़त देखते हैं। एक दफ़े एक लड़की ने मेरा लेकचर सुना। उसने उसको अपने तौर पर लिखा और अपने प्रिंसिपल को दिखाया। प्रिंसिपल बड़ा खुश हुआ, और उसने उस लड़की को छः महीने का प्रमोशन दिया। इसी प्रकार जब तक कि हिन्दुस्तान में भी लड़कों की लियाक़त तथा विचार शक्ति पर ध्यान नहीं दिया जावेगा, तब तक हिन्दुस्तानियों का आला दर्जा पास कर लेना भी किसी काम का नहीं। यहां भी किंडरगार्डन होने चाहियें, जिसमें बच्चे प्रैक्टिकल (व्यावहारिक) इल्म हासिल करें। उनकी विचार शक्ति बढ़े, अर्थात् युवा होने पर वह किसी काम के हों, और अपने मुल्क को फ़ायदा पहुंचा सकें। समय चला जा रहा है। एक एक लम्हा (पल) बहुमूल्य गुज़र रहा है। बहुत कुछ सो चुके, बहुत कुछ आराम ल चुके, बहुत कुछ समय नष्ट कर चुके, बहुत कुछ खो चुके। प्यारो! अब अपने कर्तव्य की ओर ध्यान दो। वह उपाय करो जिससे तुम्हारा मनुष्य जन्म सार्थक हो। असभ्यता का जामा उतार दो। थोड़ी देर के लिये इस बात पर विचार करो, कि तुम क्या थे और अब क्या होगये। अपने कर्तव्य की ओर ध्यान न देने से अब तुम धीरे २ रोटियों के भी मुहताज होते चले जारहे हो। यदि इसी प्रकार कुछ दिनों तक ऐसी ग़फ़लत की नींद में सोते हुए रहोगे, तो प्यारा! तुम्हारी जैसी दशा होगी, वह

तुम स्वयं विचार लो। कहने से दुख होता है। सावधान ! सावधान !! बहुत जल्द सावधान होना चाहिये।

अपनी उन्नति करने के लिये हिन्दुस्तानियों को ग़ैर मुल्क वालों से बहुत कुछ सीखना है। सब से पहली बात, जो उनसे सीखनी है, वह यह है, कि वह लोग बच्चों को किस प्रकार शिक्षा देते हैं। क्योंकि बच्चों की शिक्षा पर ही देश की उन्नति, अवनति का दारोमदार है। बच्चों को जिस प्रकार की शिक्षा दी जावेगी, उसी प्रकार का उनका आचरण, स्वभाव और ख्याल होगा। जापान में जब लड़का पहिले पहल स्कूल में भरती होता है, तो मास्टर उससे सवाल करता है "तुम्हारा शरीर काहे से जीवत है ?" लड़का कहता है "अन्न से"। मास्टर पूंछता है "कहां के अन्न से ?" लड़का जवाब देता है "जापान के अन्न से"। मास्टर फिर कहता है, तब यदि जापान में अन्न न होगा, तो तुम्हारा शरीर जीवत (जिन्दा) नहीं रह सकता ? लड़का जवाब देता है "नहीं, नहीं रह सकता"। तब मास्टर कहता है "जब तुम्हारा शरीर जापानी अन्न से बना है, तो क्या जापान को इख्तियार है, कि जब उसको ज़रूरत हो, तब वह तुम्हारा शरीर ले ले ?" लड़का बहादुरी से जवाब देता है "हां, जापान को इख्तियार है, जब चाहे हमारे शरीर को ले सकता है।" इस प्रकार अपने देश के लिये हर वख्त प्राण देने को तय्यार रहने की जापानी बालकों को पहिले ही शिक्षा दी जाती है। यह उसी शिक्षा का फल है, कि जापान ने रूस जैसे प्रबल राज्य को ऐसी भारी शिकिस्त (हार) दी है। हिन्दुस्तानियों को भी अपने बालकों को पहिले ही से ऐसी शिक्षा देनी चाहिये जिससे उनका देशानुराग, इनकी देश-भक्ति, ऐसी

प्रवल होजाय कि समय पड़ने पर वे अपने देश के लिये प्राण देने को तय्यार रहें। शिक्षा का यही पहिला सबसे पहिले पहल बालकों को देना चाहिये। पहिले देशवालों के साथ प्रेम तथा शान्ति-पूर्वक बर्ताव करना, यह उनकी दूसरी शिक्षा होनी चाहिये। स्कूलों ही में ऐसी शिक्षा देने का प्रबन्ध करना चाहिये। यदि स्कूलों में लड़के आपस में लड़ना नहीं सीखेंगे और प्रेम से रहेंगे, तो जवान होने पर वह यकायक अपने देश वालों से नहीं लड़ेंगे, और प्रेम पूर्वक बर्ताव करेंगे। अमेरिका में इस प्रकार की शिक्षा का बड़ा अच्छा प्रबन्ध है। अमेरिका में एक दफे एक स्कूल के लड़कों में आपस में लड़ाई हुई। बहुत कुछ मार-पीट हुई। उसी वक्त प्रिंसिपल को खबर दी गई। प्रिंसिपल आये। उन्होंने न किसी लड़के का इज़हार (बयान) लिया और न किसी को धमकाया। उन्होंने आते ही बाजे वजवाने शुरू किये, शांति के गीत गवाये। पश्चात् लड़कों को बुलाया, और झगड़े का कारण पूछा और यह भी दर्याफ्त किया, कि किसकी शरारत से यह झगड़ा पैदा हुआ। लेकिन आश्चर्य (ताअज्जुब) है, जिन लड़कों में थोड़ी देर पहिले लठ चले थे, उनकी ज़बान से अब किसी की भी शिकायत नहीं निकली। इसका कारण क्या था? प्यारो! इसका कारण वह बाजा और शान्ति के गीत थे। उनको जो पहिले क्रोध हुआ था, वह बाजा और गीत सुनकर शान्त होगया। यदि प्रिन्सिपल आते ही उनके इज़हार लेने शुरू करते, तो इस लड़ाई का नतीजा शांति में ख़तम न होता। एक लड़का दूसरे को क़सूरवार ठहराता, और अवश्य ही कुछ लड़के कसूरवार निकलते। और संभव है कि इसका नतीजा होता, कि कुछ लड़के स्कूल से निकाल दिये जाते। और जो लड़के स्कूल से निकाल दिये जाते, वह

उन लड़कों के हमेशा जानी, दुशमन (घोर शत्रु) होजाते, उनके विरुद्ध गवाही देते। ख्याल करने से इसका नतीजा बहुत बुरा पैदा हो सकता है। यहां तक कि देश में अशांति फैल सकती है।

तीसरी बात लड़कों को डराना धमकाना नहीं चाहिये लड़कों को डराना और धमकाना बड़ी बुरी बात है। इससे लड़के डरपोक और कमज़ोर होजाते हैं। हिन्दुस्तान में डराना धमकाना बुरे लड़कों को नेक बनाने की चेष्टा है, परन्तु ऐसा करना ठीक नहीं है। लड़कों को नेक बनाने के लिये सब से उम्दा मार्ग यह है, कि उनकी नज़रों से कोई बुरी बात नहीं गुज़रने देनी चाहिये। और वीर तथा पुष्ट बनाने के लिये उनको पूरी स्वतंत्रता देनी चाहिये। जापान में बालकों को ऐसी स्वतंत्रता है, कि वैसी स्वतंत्रता कहीं नहीं देखी गई। वहां बालकों को कहीं खेलने के लिये मुकर्रर जगह नहीं है। जहां उनकी खुशी होती है, वहां वह बेरोक टोक खेलते हैं। चाहे वह आम जगह हो, या ख़ास; बाज़ार हो, या गली, जहां उनकी मर्ज़ी हो, वहां उनको कोई नहीं रोक सकता है, यहां तक कि यदि वह बाज़ार में खेलते हों और कारण वशात वहां के बादशाह की गाड़ी उधर हो के निकलने वाली हो, तो मजाल नहीं है कि कोई उनसे कहदे, कि "खेल बन्द करो, बादशाह आते हैं"। जब तक वे स्वयं अपना खेल बंद नहीं करते, तब तक मिकाडो भी अपनी गाड़ी खड़ी रखेंगे। यह कारण है कि जापानियों के दिलों में भय का नाम निशान भी नहीं है।

चौथी बात यह है कि बालकों को जो कुछ पढ़ाया जाय, वह अमल में भी लाना सिखलाया जाय। हिन्दुस्तान में इस बात

की बड़ी कमी है। हिन्दुस्तानी स्कूलों में जो कुछ पढ़ाया जाता है, वह अमल में लाना नहीं सिखाया जाता है। इस लिये हिन्दुस्तानी बालक युवा होने पर बातूनी जमा खर्चे तो बहुत कर देते हैं, पर अमली कार्यवाही कुछ नहीं कर सकते।

पाँचवी बात यह है, कि जिस विषय की ओर बालक प्रवृत हो, वही विषय उसको विशेष रूप से पढ़ाया जाय, क्योंकि ऐसा करने से वह अधिक उन्नति कर सकेगा। हिन्दुस्तान में इस मुख्य प्रयोजनीय बात की ओर कोई ध्यान नहीं देता। यदि किसी बालक को वकालत प्रिय है, तो उस के मां बाप उसको इञ्जनीयरिंग पढ़ने का अनुरोध करेंगे; यदि गणित शास्त्र की ओर उसकी रुचि है, तो उसको इतिहास पढ़ने के लिये कहेंगे; यदि उसकी चित्त-वृत्ति साइंस की ओर है, तो उसे साहित्य पढ़ावेंगे; और यदि उसको संगीत प्रिय है, तो युद्ध-विद्या सिखावेंगे। अब यह विचार करने की बात है, कि जिस विषय की ओर बालक की रुचि ही नहीं है, उस विषय में वह क्यों कर तरक्की कर सकता है। सुतरां बालकों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देना चाहिये। बालकों पर ही देश की भावी भलाई का भरोसा है।

एक बात जो केवल हिन्दुस्तानियों में दूसरे देशों से बढ़ कर अभी तक पाई जाती है, वह योग-विद्या है। पर अब अमेरिका आदि देश इस में खूब उन्नती कर रहे हैं, और हिन्दुस्तानी भूल रहे हैं। अमेरिका में एफ ऐमरसन साहब ने जो जंगलों में रहता था योग-विद्या में इतनी उन्नति की है, कि आश्चर्य्य होता है। वह मोहन को बदल कर गोपाल कर सकता है, स्थल को जल; यह सब करामातें वह सब योग-विद्या से करता है, जादू से नहीं। और अब

आशा है कि वह लोग योग-विद्या में भी हिन्दुस्तानियों से बढ़ जायगे। सो प्यारे! हिन्दुस्तानियों!! तुमको संभलना चाहिये। पहिले पहल विद्या रूपी सूर्य्य का प्रकाश यहीं हुआ था। यहां से अब अरब, मिश्र, रूम, यूनान, होता हुआ इंगलैंड पहुँचा था। वहां से अमेरिका को होता हुआ अब जापान पहुंच गया। अब जापान से उसकी किरणें इधर झुकती हुई दिखलाई देती हैं। अब तुम सचेत हो जाओ। ऐसा न हो यह सूर्य्य पश्चिम को ढलक जाय और तुम सोये के सोये ही रह जाओ। उठो और उठाने का प्रयत्न करो। सब अपने अपने कर्तव्यों पर लगो, और अपने देश-वासियों को कर्तव्य बतलाओ। सूर्योदय पूर्व ही अपने दशोन्नति रूपी कर्तव्यों को स्थिर करलो। एक क्षण, एक पल भी व्यर्थ न खोओ। यदि सोच विचार में ही पड़े रहोगे, तो सूर्य्य पश्चिम को चला जायगा, फिर तुमसे कुछ करते धरते नहीं बनेगा।

ॐ ! ॐ !! ॐ !!!