आप अपने घर आनन्दमय कैसे बना सकते हैं।
30 दिसम्बर 1922 को एकेडेमी आफ साइंसेज में दिया हुआ व्यख्यान।
महिलाओं तथा भद्र पुरुषों के रूप में मेरे ही आत्मन्।
आज हमारे पास लोगों के बहुत से प्रश्न पत्र हैं। जब एक वकील किसी अदालत को आता है, तब शायद वह इतने ही कागज़ात अपने साथ लाता है, किन्तु वे सब नहीं सुने जाते। इन प्रश्नों की विपुल संख्या ही इन सब को न सुनाये जाने, और इनका उत्तर न देने का अवसर देती है। एक दूसरा कारण है जिससे हम इनमें से बहुत से कागज़ात को हाथ में न लेंगे। इन में से अधिकांश का सम्बन्ध प्रेत-लोक या परलोक से है। अभी तुम इस लोक में हो, और जिस विषय से वर्तमान में तुम्हारा कोई सरोकार नहीं है, उस पर कुछ कहने की अपेक्षा से यह बेहतर होगा कि तुम्हारे हृदय और व्यवसाय से अधिक सम्पर्क रखनेवाले विषय की कुछ चर्चा की जाय।
पिछली बार जो विषय उठाया गया था, उसी को हम जारी रखेंगे। वह विषय बड़ा महत्त्वपूर्ण है। "आत्मानुभव प्राप्त करने की आकांक्षा करना, क्या किसी विवाहित मनुष्य के लिये युक्ति सङ्गत होगा"? यह विषय है। यह विषय लम्बा है और आजकी वक्तृता में ही इसकी पुरी व्याख्या नहीं की जा सकती। फिर भी, आओ, देखें कि आज इसके बारे में हम क्या जान सकते हैं।
भारत में एक बड़ा ही निर्दयी और हास जनक (रंगी) मालिक था। वह अपने नौकरों को बड़े ही मज़ेदार ढंग से घोर पीड़ा दिया करता था। एक बार नौकर ने एक अत्यन्त स्वादिष्ट व्यंजन (खाने की चीज़) मालिक के लिये तैयार किया। मालिक चाहता था कि नौकर उसे न खाय। वह चीज़ रात को पकाई गयी थी। मालिक ने कहा, "हम इसे अभी न खाएंगे, सबेरे खालेंगे। इस समय लेटो जाकर, सबेरे हम लोग इसे चखेंगे"। मालिक का असल इरादा इसे खबेरे खाने का इस लिये था कि उस समय तक उसे खूब भूख लग जावेगी। रात को कुछ भी न खाने के कारण वह सबेरे चाट पोछ कर खाजायगा, और नौकर के लिये कुछ भी न बचेगा। यह मालिक का असली इरादा था। वह चाहता था कि नौकर छिलके और टुकड़े खाय, परन्तु इस अभिप्राय को नौकर से साफ नहीं कह सकता था। उसने नौकर से कहा, "जाओ, आराम करो, और सबेरे हम में से वह मनुष्य इसे खायगा जो बड़े ही सुन्दर और सुखकर स्वप्न देखेगा। यदि सबेरे तक अत्युत्तम स्वप्न तू देख लेगा, तो सारा हिस्सा तेरा होगा, अन्यथा सब मैं लूँगा और खाऊँगा, और तुम्हें अपने को छिलकें और टुकड़ों से संतुष्ट करना पड़ेगा"। सबेरा हुआ और मालिक तथा नौकर एक दूसरे के सामने बैठे। मालिक ने नौकर से कहा कि अपने स्वप्न को बयान करो। नौकर ने कहा, "जनाब आप मालिक हैं, आगे आप को चलना चाहिये। आप अपने स्वप्नों को पहले बतावें, बाद को मैं अपने बयान करूँगा"। मालिक ने अपने मन में सोचा कि, यह गरीब नौकर, यह जाहिल, अपढ़ मनुष्य अति मनोहर स्वप्न नहीं गढ़ सकता। वह कहने लगा, "मैं अपने स्वप्न में हिन्दुस्तान का महाराजा
हुआ। मैंने अपने स्वप्न में देखा कि यूरोप और अमेरिका की सब शक्तियां भारत के राजा के अधीन आगईं, और भारत के सम्राट की हैसियत से मैं सारे संसार पर हुकूमत करने लगा"। आप जानते हैं कि यह स्वप्न निष्ठुर मालिक का था। सच्चे भारत निवासी, बादशाह कहलाने वाले मांस के लोथड़ों को अपने सामने रखकर उनकी उपासना करने की बच्चेपन की रीति को जारी नहीं रखना चाहते। अच्छा, यह उस मनुष्य का स्वप्न था। उसने अपने को भारत के सिंहासन पर बैठा और सारे संसार पर हुकूमत करता हुआ समझा, और वहाँ उसे सारे संसार के सब सम्राट अपने सामने खड़े और वंदना करते मिले। इसके सिवाय, उसने देखा कि सब देवता और साधु-महात्मा उसके दरवार में लाये गये, और उसके दहने या बांये [राम भूल गया कि दहने या बांये] पर बैठे हैं। अपना स्वप्न सुना चुकने के बाद उसने नौकर से अपनी कहानी, अपना स्वप्न, सुनाने को कहा।
बिचारा नौकर, सिर से पांव तक कांपता हुआ बोला, "हुज़ूर, हुज़ूर, मैंने इस तरह का कोई स्वप्न नहीं देखा"। मालिक फूल उठा और बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने समझा कि सब स्वादिष्ट भोजन अब मेरे ही पल्ले पड़ेगा। नौकर कहने लगा कि "स्वप्न में मुझे एक विराट दानव दिखाई पड़ा, बड़ा बिकराल, महा भयङ्कर दैत्य मुझे अपनी ओर आता दिखाई पड़ा। उसके हाथ में एक लपलपाती तलवार थी"। मालिक पूछने लगा, "फिर क्या हुआ, फिर क्या हुआ"? तब उसने कहा, "सरकार! वह मेरे पीछे दौड़ा, वह मुझे मार डालने ही को था"। मालिक मुसकराया कि यह तो अच्छा लक्षण
है। "वह मुझे मारने लगा, वह मेरा बध करने की चेष्टा कर रहा था"। "और तुमने क्या किया? तुम्हें क़त्ल करने में उसका क्या अभिप्राय था"? नौकर ने कहा, "उसने मुझसे वह स्वादिष्ट भोजन खा जाने को या मर जाने को कहा"। "और तब तुम ने क्या किया"? उस ने कहा, "मैं चुपके से रसोई घर में चला गया और हरेक पदार्थ खा गया"। मालिक ने कहा, "तुमने मुझे क्यों नहीं जगाया"? नौकर ने जवाब दिया, "जनाब, आप तो सारी दुनिया के बादशाह थे। आप के दरवार में बड़े लोगों का, बहुत ही शानदार जमाव था, और लोग तलवारें निकाले तथा तोपें बन्दूकें लिये हुए थे। यदि मैं आप महाराजाधिराज के पास पहुँचने का यत्न करता, तो वे मुझे मार डालते। मैं आपके पास पहुँच कर न बता सका कि मैं किस संकट में था। इस लिये वह स्वादिष्ट भोजन खा जाने को मैं लाचार हुआ, मुझे अकेले ही उसे चखना पड़ा"।
राम कहता है कि तुम वचन-दत्त स्वर्ग (promised paradise). वचन-दत्त वैकुण्ठ व प्रतिज्ञात परलोकों का स्वप्न देख रहे हो। तुम इन्हीं चीज़ों का स्वप्न देख रहे हो, और ये रोचक स्वप्न हैं, ये मधुर स्वप्न हैं. और इन स्वप्नों में तुम आकाश में महल बना रहे हो, शायद बालु पर ही बना रहे हो। तुम आकाश में महल बना रहे हो, और सोच रहे हो कि "हमें यह करना चाहिए और वह करना चाहिए। हमें शैतान से डरना चाहिए और हमें ईश्वर से डरना चाहिए। हमें इस तरह बर्ताव करना चाहिए, अथवा अमुक अमुक देवदूत हमें नरक से स्वर्ग न जाने देगा"। तुम इन चीज़ों का स्वप्न देख रहे हो, किन्तु राम कहता है कि वह नौकर होना बेहतर
है जिसने दैत्य के डर से उपस्थित स्वादिष्ट भोजन खालिया था। वैसा करना अच्छा है। वह एक ऐसी बात थी जिसका सम्बन्ध वर्तमान से था। वह एक ऐसी बात थी जो उस समय सत्य थी। जो मामले तुम्हारे हृदय से निकट हैं, जिनका सम्पर्क तुम्हारे व्यापार और चित्त से है, पहले उन पर ध्यान देना अधिक वाञ्छनीय है, और परलोक, स्वप्नों का वह लोक, अपनी फिक्र आप कर लेगा। उदारता का आरम्भ घर से होता है। पहले घर से आरम्भ करो।
राम अब उस प्रश्न पर आता है जिसका वास्ता तुम सब से है। वह प्रश्न यह है, "विवाहित जोड़ा किस तरह रहे कि उनके विवाह का परिणाम संकट, चिन्ता, पीड़ा और रंज न हो"? वे कहते हैं, "ऐ ईश्वर! तू हमारी तकलीफों को दूर कर दे। हे ईसा! तू मेरे क्लेशों को हटा दे। हे कृष्ण और बुद्ध! मेरे दुःखों को हर ले"। किन्तु राम कहता है कि मृत्यु के बाद वे तुम्हारी तकलीफों को दूर करें या न करें, पर इस जीवन में तुम्हारे कष्टों को कौन हरे? इस जीवन में पति को स्त्री का ईसामसीह होना चाहिए, और स्त्री को अपने पति का ईसामसीह। पर हालत यह है कि हरेक स्त्री अपने पति के लिए और हरेक पति अपनी स्त्री के लिये जुडास *इसकैरियट (Judas Iscariot) हो रहा है। मामला कैसे सुधरे, बात ठीक हालत में क्यों कर आवे? प्रत्येक पति और प्रत्येक स्त्री को संन्यास का आलिङ्गन करना होगा। आप जानते हैं कि हज़रत ईसा, इसाई संसार के अनुसार, त्याग या संन्यास की मूर्ति था। इसी तरह हरेक स्त्री यदि
* हज़रत ईसा के उस शिष्य का नाम है जिसने ईसा को समय पर धोखा दिया था। इसलिये धोकेबाज वा दगाबाज से अभिप्राय है।
त्याग की मूर्ति हो जाय, तो वह अपने पति की त्राता हो सकती है। संन्यास एक ऐसा शब्द है जिससे हरेक कांपता और थर्राता है। हरेक इस शब्द से थर्राता है, किन्तु बिना त्याग के तुम्हारे परिवार में कोई स्वर्ग लाने की ज़रा सी भी सम्भावना नहीं है। त्याग शब्द के सम्बन्ध में बड़ी भ्रान्ति है। पिछले व्याख्यानों में यह शब्द इतनी बार वर्ता गया है कि इसके असली अर्थ समझा देना अब बहुत ज़रूरी है। त्याग यह नहीं चाहता कि तुम हिमालय के घने जंगलों में चले जाओ; संन्यास यह नहीं चाहता कि आप सब कपड़े खोल कर नंगे हो जाओ; संन्यास तुम से नंगे सिर और नंगे पैर चलने को नहीं कहता। यह त्याग नहीं है। यदि त्याग का यही अर्थ होता तो विवाहित जोड़े के लिये त्याग का अभ्यास कैसे संभव हो सकता था? वे दोनों स्त्री और पति की तरह रहते हैं, उनके परिवार है, उनके सम्पत्ति है। वे लोग त्यागी कैसे हो सकते हैं? हिन्दू धर्मग्रन्थों में त्याग का जो चित्र खींचा गया है वह है एक साथ बैठे हुए भगवान् शिव और भगवती पार्बती का, और उनका परिवार उनके आसपास है। भगवान् शिव और उनकी स्त्री पार्बती, एक साथ स्त्री-पुरुष की तरह रहते हैं, अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं। हिन्दू धर्म-ग्रन्थों में वे त्याग की मूर्ति कहे गये हैं। लोग समझते हैं कि त्याग शब्द से हिन्दुओं का अभिप्राय है बन को चले जाना, समाज से अलग रहना, हरेक वस्तु से दूर भागना, हरेक चीज़ से नफ़रत करना। पर हिन्दुओं के अनुसार त्याग शब्द के ये अर्थ नहीं हैं। अपने गार्हस्थ्य जीवन में भी हिन्दुओं को "संन्यास" का चित्र खींचना पड़ता है। यदि यह वेदान्त, यदि यह तत्वज्ञान या सत्य केवल बन को चले जाने वाले थोड़े से लोगों के लिये
होता, तो यह किस काम का है? हमें इसकी ज़रूरत नहीं। इसे गंगा नदी में फेंक दो, हमें यह न चाहिए। यह त्याग, जिसका हिन्दू प्रचार करते हैं, सब के काम का है। जिस तरह के त्याग की हिन्दू शिक्षा देते हैं, वह सफलता की एक मात्र कुंजी है। कोई वीर अपने को विख्यात नहीं कर सकता, यदि वह त्यागी पुरुष नहीं है। कोई भी कवि आप को कोई कविता नहीं दे सकता, यदि वह त्यागी पुरुष नहीं है। आप बाइरन (Byron) का नाम लेंगे, जो इंग्लैंड से निकाल बाहर किया गया था, क्योंकि वह बड़ा ही दुराचारी समझा जाता था। वेदान्त कहता है कि बाइरन की भी मेधा-शक्ति (genius) का कारण संन्यास ही था। संन्यास की जो कल्पना राम तुम्हारे सामने रक्खेगा, वह अति विलक्षण है। वाशिंगटन त्यागी पुरुष है। यदि उस में त्याग न होता तो सभा में वह विजयी न होता। यह बड़ी ही अद्भुत बात है। क्या तुम यह नहीं समझते कि हरेक नायक को, चाहे वह नेपोलियन बोनापार्ट हो चाहे वाशिंटन वा वेलिंगटन हो, चाहे एलिक्ज़ेंडर वा सीज़र हो, चाहे कोई भी हो, विजयी होने के लिये, राष्ट्रों का स्वामी बनने के लिए, सेनाओं का सञ्चालन करने की शक्ति पाने के लिए, अपने को व्यवहारतः सब संसार से, सब सम्बन्धों से पर रखना पड़ता है। उसका चित्त संक्षोभ-हीन, शान्त, सौम्य, उद्वेग रहित और अचंचल अवश्य होना चाहिए, और एक ही विन्दु पर उसे अपनी सब शक्तियां लगा देनी चाहिये। दूसरी हालतों से उसे क्षुब्ध न होना चाहिए। और इसका क्या मतलब है? इसका अर्थ मानो सब पदार्थों का त्याग कहा जा सकता है। इस त्याग की मात्रा जितनी ही अधिक किसी मनुष्य में होती है, उतना ही वह श्रेष्ठ है। नेपोलियन समर-भूमि में आता है, और केवल एक शब्द "ठहरो" से
उन हज़ारों आदमियों को रोक लेता है जो उसे परास्त करने आये थे। यह कैसे? यह शक्ति कहां से आई? सच्चे असली तत्व में, भीतर के परमात्मदेव में, अन्तरात्मा में नेपोलियन के लीन होजाने से यह शक्ति मिली। यह शक्ति वहां से आती है। उसे चाहे इसकी खबर हो या न हो। वह शरीर से, चित्त से, हरेक वस्तु से परे खड़ा हुआ है; संसार उसके लिए संसार ही नहीं है। इसी प्रकार, सर आइज़क न्यूटन जैसे श्रेष्ठतम मेधावी (genius) को भी, अपने तत्वज्ञान और विज्ञान से दुनिया का वैभव बढ़ाने के लिए, प्रत्यक्ष इस त्याग का अनुभव करना पड़ा है। वह देह, चित्त और हरेक चीज़ से ऊपर उठ जाता है। वह घर में बैठा हुआ है, किन्तु घर उसके लिए घर नहीं है, मित्र उसके लिए मित्र नहीं हैं। कैसी समाधि की अवस्था है! लोग कहते हैं कि वह कुछ नहीं कर रहा है। लेकिन जब तुम कहते हो कि वह कुछ नहीं कर रहा है, तभी वह अपनी सर्वोत्तम अवस्था में है। ज़ाहिरा वह निस्तब्ध है, उसने हरेक वस्तु त्याग दी है, किन्तु वह अपनी परमोच्च दशा में है। ये लोग, ये वीर, ये नायक, ये अलौकिक-बुद्धि महापुरुष अज्ञाततः त्याग पर पहुँच जाते हैं। जिस सत्य को वे अनजाने अमल में लाते हैं, और जिसके द्वारा वे उन्नत होते और अपने को विख्यात करते हैं, उसी को आपके सामने विधिवत रखना हिन्दू तत्वज्ञान का उद्देश्य है। उस (सत्य) तक ठीक रास्ते से आपको पहुँचाना, उसे एक विज्ञानका रूप देना और उन क़ानून, नियम तथा तरीक़ों को जो उस तक आप को लेजाते हैं, आपको समझाना इस हिन्दू तत्वज्ञान का उद्देश्य है।
यह त्याग हिन्दुओं में ज्ञान कहा गया है, जिसका अर्थ विद्या है, अर्थात् त्याग और ज्ञान एक ही और
अभिन्न वस्तु हैं। त्याग शब्द ज्ञानका पर्यायवाची है. किन्तु यह प्रचलित ज्ञान नहीं, भौतिक पदार्थों का ज्ञान नहीं; हाँ, ठीक, इस (भौतिक ज्ञान) से भी आपको बड़ी सहायता मिलती है, किन्तु यह असली ज्ञान नहीं है, यह अकेला आपको कदापि कोई शान्ति नहीं देसकता। जो ज्ञान त्याग का पर्यायवाची है वह सत्य का ज्ञान है, असली आत्मा का ज्ञान है; आप जो वास्तव में हैं, उसका ज्ञान है। अच्छा. आप जो कुछ हैं, उसका ज्ञान आपको बुद्धि द्वारा मिल सकता है। क्या वह यथेष्ट होगा? किसी हद तक, किन्तु पूरी तरह नहीं। इसलिये कि आप ज्ञानी हो सकें, आप जीवन्मुक्त हो सकें, यह विशाल संसार आप के लिये स्वर्ग हो जाय, आपको इस दिव्य ज्ञानका अनुभव करना होगा—इस ज्ञान का कि "आप परमात्मा हैं, आप दैवी-विधान हैं, आप विदेह, परम शक्ति या तेज हैं, अथवा जो कोई भी नाम देना पसन्द करें, वह वस्तु आप हैं, या यह ज्ञान कि आप परमेश्वर हैं।" यह ज्ञान केवल बुद्धि द्वारा प्राप्त हुआ २ नहीं, बल्कि भाव की भाषा में भावित, आप के आचरण में आचरित, आप के रक्त में रंजित आपकी नसों में दौड़ता हुआ, आप की नाड़ी के साथ फड़कता हुआ, आप में भिद कर और व्याप्त होकर आपको जीवन्मुक्त बना सकता है। यह ज्ञान त्याग है। यह ज्ञान प्राप्त करो, और आप त्यागी पुरुष हैं।
बन को चला जाना तो उद्देश्य प्राप्ति का एक साधन मात्र है, विश्वविद्यालय को जाने के समान है। महाविद्यालय में हम विद्योपार्जन करते हैं, परन्तु यह कभी नहीं समझा जाता कि हम वहां सदा सर्वदा रहना है। इसी तरह यह ज्ञान पाने के लिए आप कुछ काल के लिए भले ही जंगल को चले जाँय, किन्तु वेदान्त-दर्शन यह कभी नहीं सिखाता कि
बनवास का नाम त्याग है। त्याग का तुम्हारे स्थान, स्थिति, या शारीरिक कार्य से कुछ भी प्रयोजन नहीं है। उसे इन बातों से कोई मतलब नहीं। त्याग तो आप को केवल आपकी परमोच्च दशा प्राप्त कराता है, आपको आपके श्रेष्ठपद पर ला विठाता है। त्याग केवल आप की शक्तियां बढ़ाता है, आपके तेज की वृद्धि कराता है, आपका बल पुष्टतर करता है, और आपको ईश्वर बना देता है। वह आप का सब रंज हर लेता है, वह आपकी सम्पूर्ण चिन्ता और भय भगा देता है। आप निर्भय और सुखी होजाते हैं।
एक विवाहित पुरुष इस त्याग को कैसे पा सकता है? यदि स्त्री और पुरुष एक दूसरे को सुखी करने की ठान लें, तो आज ही मामला निपट सकता है। सब इंजीलें तब तक कुछ भी भला नहीं कर सकतीं, जबतक कि स्त्रियां और पति एक दूसरे के रक्षक और ईसामसीह होना न ठान लें। देखिये, जब लोग धार्मिक व्याख्यानों में आते हैं, तब उनसे हरेक चीज़ त्यागने को कहा जाता है, अपने शरीर और सम्पत्ति को ईश्वर का समझने के लिये कहा जाता है, और अपने को यह देह न मान कर ईश्वर मानने को कहा जाता है। उन्हें ऐसा उपदेश किया जाता है। उन्हें कुछ ज्ञान मिलता है। किन्तु जब वे घर लौटते हैं, तब क्या होता है? स्त्री आकर कहती है, "हे भगवन्! मुझे एक बड़ा गौन (gown, साया) चाहिए", और वह कहता है कि मेरे पास पैसा नहीं है। इसका क्या अर्थ है? बच्चा आता है और कहता है, "दादा! प्यारे दादा!! भीतर आओ"। हो मेरा पुत्र! मेरी स्त्री!! मेरी लड़की! मेरी बहन!! ऐसा कहने लगते हैं।
वही लड़की, बहन, सम्पत्ति, घर और परिवार, यह सब गिर्जा-घर में ईश्वर को दे दिया गया था। घर पहुँचते ही
ईश्वर से सब लौटा लिया गया। वह "मेरा", "मेरा", होगया। अब वह ईश्वर का नहीं रहा। वह क्षणिक और चंचल भाव जिसने चित्त पर क़ब्ज़ा कर लिया था, "ऐ ईश्वर! मैं तेरा हूं, मैं तेरा हूँ, सब कुछ तेरा है, मैं सर्वस्व तेरे अर्पण करता हूँ", स्त्री और बच्चों का मुख दिखाई पड़ते ही एक पल में वह भाव ग़ायब होगया।
आप देखते हैं कि आध्यात्मिक उन्नति और अपनी वर्तमान स्थिति में पारिवारिक जीवन एक दूसरे के विपरीत हैं, परस्पर-विरोधी हैं। गिरजाघर में जो कुछ किया गया था, वह घर में उलट दिया गया, बल्कि शायद उससे भी कुछ अधिक किया गया। यह तो पेनीलोपीज़ (Penelopese)* की सी बात हुई। वह दिन भर सूत लपेटा या बटा करती थी और रात आते ही लपेटे या बटे हुए सून को फिर उधेड़ देती थी, अर्थात् जैसा का तैसा कर डालती थी। इसी तरह से तुम सब के सब गिर्जाघरों में, अपनी अपनी प्रार्थनाओं और उपदेशों में आध्यात्मिक उन्नति रूपी सूत बटते हो और घर में आकर सब बटा हुआ उधेड़ देते अर्थात् खोल देते हो, किया-धरा मिटा देते हो। यदि यही हालत बनी रही, तो कोई आशा नहीं है। यदि तुम ईश्वर से मज़ाक़ नहीं कर रहे हो, यदि अपनी प्रार्थनाओं को तुम पाखंड नहीं बनाना चाहते हो, तो ठीक ढँग से तुम्हें मामले पर ध्यान देना होगा। तुम्हें वह कारण हटाना होगा जो तुम्हारी आध्यात्मिक उन्नति को रोकता है। तुम्हें घर की हालत सुधारना पड़ेगी। प्रत्येक स्त्री को अपने पति का ईसामसीह बनना होगा, और प्रत्येक पति को अपनी स्त्री का त्राता। लोग कहते हैं, "अह! मैं तुम्हें
*ओढेसीज़्न की पत्नि का नाम है जो दिन में जितना बुनती थी, रात को उधेड़ देती थी।
चाहता हूँ, मैं तुम्हें प्यार करता हूँ"। कैसा गपौड़ा है! यदि बस्तुतः तुम अपनी स्त्री या पति को प्यार करते होते, तो उसके लिए कुछ स्वार्थ त्याग करने की भी सामर्थ्य तुममें होती। यदि तुम सचमुच उसे प्यार करती या करते हो, तो उस पर कुछ निछावर भी तुम्हें करना चाहिए। पर क्या तुम कुछ स्वार्थत्याग करते हो? नहीं करते, नहीं करते। स्त्री पति को अधिकार में रखना चाहती है, और पति स्त्री का अधिकारी बनना चाहता है, मानो वह कोई जड़ पदार्थ है जिसका वह अधिकारी हो सकता है, जो उसकी सम्पत्ति हो सकती है। एक दूसरे को अपने अधीन करना चाहता है। यदि सचमुच तुम एक दूसरे से प्रेम करते हो, तो तुम्हें एक दूसरे के हितकी वृद्धि करने की चेष्टा करनी चाहिए। क्या सचमुच तुम ऐसा करते हो? तुम समझते हो कि मैं ऐसा करता हूं, पर तुम्हारी समझ में भूल है। भाई, स्त्री या पति की इन्द्रिय-वासनाओं की तृप्ति करना उसे सुख पहुँचाना नहीं है, उसे सच्चा सुख देना नहीं है, कदापि नहीं। यदि सुख पैदा करने का यही एक उपाय होता, तो सभी परिवार सुखी होते। क्या ऐसा है? क्या ये परिवार सुखी हैं? हज़ारों में एक भी नहीं। वे सुखी क्यों नहीं हैं? क्योंकि वे यह नहीं जानते कि एक दूसरे का सुख क्योंकर बढ़ावें और एक दूसरे के हितकी वृद्धि कैसे करें? वे यह नहीं जानते। वे समझते हैं कि केवल पाशविक वासनाओं की तृप्ति करना ही सुख बढ़ाना है। एक दूसरे का मिथ्याभिमान पोषण करना, यह वास्तविक हित करना नहीं है। किसी ने कहा है, कि "प्रेम करना तो रंज से संधि करना है" (To love is to make a compact with sorrow)। और अधिकांश उपन्यासकासें, ऐतिहा-
सिकों, और इस संसार के लोगों का यही अनुभव है — "प्रेम करना शोक से नाता जोड़ना है"। किन्तु क्या इसमें प्रेम का कोई दोष है, जो वह रंज पैदा करता है? नहीं। प्रेम का तुम जो उपयोग करते हो, वह दूषित है और वही अपने साथ रंज लाता है।
हिन्दू-धर्मग्रन्थ में एक कथा है कि. भारत के प्रसिद्ध देवता, भारत के प्रभु इसामसीह, भगवान् कृष्ण को एक बड़ा दैत्य खाये जाता था। उन्हों ने अपने हाथ में एक खंजर ले लिया। वे खा लिये और निगल लिये गये। अपने को अज़दहे (अजगर) के पेट में देख कर उन्हों ने अज़दहे का हृदय बेध दिया। हृदय फट गया, अज़दहा घाव से मर गया, और भगवान् कृष्णचन्द्र बाहर निकल आये। ठीक यही मामला है। प्रेम क्या है? प्रेम कृष्ण है, अर्थात् प्रेम परमेश्वर है, प्रेम ईश्वर है, और वह हृदय में प्रवेश करता है, विषय-लोलुप मनुष्य के आन्तरिक चित्त में वह पैठ जाता है, वह हृदय में घुस जाता है, और जब आसन जमा लेता है, जब हृदय के अन्तर में उसे स्थान मिल जाता है, तब वह वार करता है। और परिणाम क्या होता है? हृदय टूट जाता है, हृदय घायल होजाते हैं। फल स्वरूप व्यथा और शोक हाथ लगते हैं। सांसारिक प्रेम के हरेक मामले में रोना और दाँतों का पीसना ही होता है। यही रीति है। यही दैवी-विधान है। यही घटना है। किसी भी सांसारिक पदार्थ से ज्यों ही तुम ने दिल लगाया, किसी भी लौकिक वस्तु को ज्यों ही तुम उस के लिए प्यार करने लगे, त्यों ही कृष्ण भगवान् तुम में प्रवेश करते हैं और तुम्हें घायल करते हैं, हृदय कट जाता है, तुम शोक-पीड़ित हो जाते हो, तुम विलाप और रोदन करने लगते हो; "अरे, यह प्रेम बड़ा निष्ठुर है, इसने
मुझे तबाह कर दिया"।
यह एक दैवी-विधान है कि "इस दुनिया में जो कोई आदमी किसी व्यक्ति या दुनयावी चीज़ से अपना दिल लगावेगा, उसे तकलीफ़ उठानी पड़ेगी। या तो वह प्रियजन अथवा पदार्थ उससे ले लिया जायगा," या उनमें से एक मर जायगा, या उनमें कलह होजायगी। यह अनिवार्य नियम है। इसे बेपरवाही से न सुनो, अपने हृदयों में इसे (इस सत्य को) गहरा उतर जाने दो, अपने अपने चित्तों में इसे प्रवेश करने दो। जब कभी कोई मनुष्य किसी सांसारिक पदार्थ से अनुराग करता है, जब कभी कोई मनुष्य उस वस्तु में सुखान्वेषण की चेष्टा करता है, तब उसे धोखा होता है, वह केवल इन्द्रियों द्वारा ठगा जाता है। लौकिक पदार्थों से अपना दिल लगाकर तुम सुख और आनन्द नहीं पा सकते। यह क़ानून है। तुम्हारे सब सांसारिक प्रेमों की परिसमाप्ति हृदयों के टूटने में होगी, अन्यथा कुछ न होगा। शक्तिशाली मुद्रा (रुपया) पर भरोसा न करो, ईश्वर पर भरोसा करो। इस चीज़ या उस चीज़ पर भरोसा न करो, ईश्वर पर भरोसा रक्खो, अपनी आत्मा या अपने आप पर भरोसा करो। सब सांसारिक स्नेह अपने साथ में दुःख लाते हैं, क्योंकि सांसारिक अनुराग मात्र बुतपरस्ती (आकार पूजा) है। सुन्दर प्रतिमायें सुन्दर मूर्तियां इत्यादि बनादी जाती हैं, वे सब शरीर भी मूर्ति, प्रातिमा हैं, वे सब पुतले, चित्र, प्रतिमूर्ति हैं। तुम एक चित्र को ही प्यार करने लगते हो, और जिस व्यक्ति का वह चित्र है, उसकी उपेक्षा करते हो। क्या इससे तुम बुतपरस्ती नहीं कर रहे? कल्पना करो कि तुम्हारे पास तुम्हारे एक मित्र का चित्र है, और उसे तुम अपने साथ रखते हो, तुम्हें उससे प्रेम है, उसे चूमते-चाटते हो, वह तुम्हारा पूर्ण प्रेम-पात्र
है, यहां तक कि वह मनुष्य, जिसका वह चित्र है, जब तुम्हारे घर में आता है, तब तुम उसकी चिन्ता नहीं करते, उसका अनादर करते हो। क्या यह ठीक है? क्या यह उचित है? क्या वह मित्र अपना चित्र तुम्हारे पास छोड़ेगा? नहीं, नहीं। उसने अपनी तसवीर तुम्हें इस लिए दी थी कि तुम उसे याद रक्खो। उसने अपनी तसवीर तुम्हें इस लिए नहीं दी थी कि तुम उसे भूल जाओ। वह चित्र तुम्हारा पूज्य नहीं होना चाहिए था। चित्र को चित्र की खातिर ही प्यार करने लगना बुतपरस्ती थी। तुम्हें ईश्वर को प्यार करना था, तुम्हें मालिक को, चित्र के स्वामी को प्यार करना था। इसी तरह, इस संसार में सब चीज़ें ईश्वर का चित्र, चिन्ह मात्र हैं। स्त्रियां और पति इन चित्रों के शिकार होते हैं। वे बुतपरस्ती का शिकार बनते हैं, और मूर्ति के गुलाम हो जाते हैं। तुम्हारी इंजील तुम्हें बताती है कि तुम्हें कोई मूर्ति न स्थापित करना चाहिए, ईश्वर की प्रतिमा न बनाना चाहिए, और तुम्हें मूर्ति पूजा न करना चाहिए। "मूर्ति पूजा" शब्द से यह मतलब नहीं था कि तुम्हें इन प्रतिमाओं की उपासना न करना चाहिए। मतलब यह था कि ये जीती-जागती मूर्तियां हैं, मूर्ति के फेर में पड़ कर असली को न भूल जाओ, यह अभिप्राय था।
भारत में एक क्रब्रिस्तान में राम ने एक क़ब्र पर एक अभिलेख देखा, जो इस प्रकार था:—
"Here lies the babe that now is gone, "An idol to my heart. If so, the wise God has justly done ,T was needful we should part."
"यहां वह बच्चा लेटा हुआ है जो अब चला गया है,
जो मेरे हृदय (मन्दिर) की प्रतिमा था। यदि ऐसा था, तो बुद्धिमान ईश्वर ने ठीक ही किया है, हमारा जुदा होजाना ज़रूरी था"।
यह एक महिला से लिखा गया था। वह उस बच्चे को बेहद चाहती थी। वह मूल से, उस असली से, जिसका चित्र मात्र बच्चा था, बच्चे को अधिक मानने लगी थी, और इस लिए बच्चे का हरण उचित ही था। यही दैवी-विधान है, यही नियम है। यदि तुम चित्रों का ठीक उपयोग करोगे, तो वे तुम्हारे पास रहेंगे, यदि उनका दुरुपयोग करोगे, तो विच्छेद, रंज, चिन्ता, और भय होगा। ठीक उपयोग करो। हम चित्र अपने पास रख सकते हैं, किन्तु तभी, जब हम असली को अधिक प्यार करें, उसको चित्र से अधिक प्यार करें। केवल तभी हम चित्र अपने पास रख सकते हैं, अन्यथा कदापि नहीं। यही दैवी-विधान है। यही त्याग है।
इस ढंग से हरेक घर में संन्यास का अभ्यास किया जाना चाहिए।
और अच्छी तरह यह समझाया जायगा, देखिये। पुरुष या नारी, सज्जन या महिला, देवता या देवी, आप यहां हैं। वहां आपका प्रेम-पात्र है। कौनसी चीज़ आपको मोहती है, आपको खींचती है, आपको प्रेमपाश में बांधती है? क्या उसकी देह, उसकी त्वचा, उस के नेत्र, नाक, कान इत्यादि? नहीं, नहीं, कदापि नहीं। आप कवियों की अपेक्षा अधिक युक्तिसंगत और विवेकी, यथार्थवादी (rational) बनो। वास्तव में ये चीज़ें तुम्हें नहीं आकर्षित करतीं। यदि ये प्रेम की पात्र होतीं, यदि इन में कोई मोहनी शक्ति होती, तो वे देह के प्राण रहित होजाने पर भी चित्ता-कर्षक बनी रहतीं। जब प्राणी मर जाता है, उस दशा में भी
तुम शरीर से आकर्षित हुए होते, किन्तु उस समय तुम नहीं आकर्षित होते। तो फिर जादू किस में था? किस ने यह मोहनी बल अर्थात् आकर्ष और जादू उत्पन्न किया था? यह तो काम भीतरी तत्व का था, अन्तर्गत "जीवन" का था, आन्तरिक शक्ति का था, भीतर की 'आत्मा' का था, और किसी का नहीं। यह भीतर का परमेश्वर है जो हरेक के नेत्रों के द्वारा तुमसे बातचीत कर रहा है। शरीर भीतरी परमेश्वर का चित्र, प्रतिमूर्ति, या पोशाक है। पोशाक को पहनने वाल व्यक्ति (देही) से, भीतरी असलियत से अधिक न प्यार करो। अपने भीतर विचार करो और तुम समझ जाओगे।
कुछ लोग दूसरों की अपेक्षा अधिक चित्ताकर्षक होते हैं, उनमें शोभा अधिक होती है। जिस विषय की चर्चा करने की चाल नहीं है, उस पर यदि "राम" कुछ कहता है, तो क्षमा करियेगा। यह एक विचित्र बात है कि हम उन बातों को नहीं सुनते जो हमारे चित्त को बहुत ही अधिक भाती हैं। साधारणतः इस विषय की चर्चा करने की चाल नहीं है। किन्तु चूँकि यह विषय अत्यन्त महत्वपूर्ण है और वास्तव में तुमसे वास्ता रखता है, और दूसरे लोग भी इस विषय पर नहीं बोलते, इसी कारण से "राम" इस पर बोलता है।
अच्छा, यह सौन्दर्य वा शोभा है, और सौंदर्य वा शोभा कहां से आती है? शोभा, चेष्टा और उद्योगिता (उत्साह) क्या वस्तु है? वह क्या है? क्या वह आँख, कान, या नाक के कारण से है? नहीं, नेत्र, कान, इत्यादि में तो वह प्रगट होती है। तुमने क्लियोपैट्रा, (Cleopatra) उस मिस्री युवती, आफ्रिका-वाली क्लियोपैट्रा, उस हबशी वाला का वृत्तान्त सुना होगा।
उसने उस सम्राट (ध्यान रहे) ऐंटोनी को मोह लिया, लुभा लिया, और तसवीर बना दिया। यह सब सुन्दरता के द्वारा हुआ। सुन्दरता वा शोभा तुम्हारे भीतर के परमेश्वर से मिलती है, और किसी दूसरी चीज़ से नहीं। वह कर्मण्यता (activity) है। कर्मण्यता, उद्योग शक्ति या गति किस के कारण से है? देखिये। तुम मार्ग चल सकते हो, ढालू पहाड़ों पर चढ़ सकते हो, तुम इधर उधर विचर सकते हो, जहां चाहो जा सकते हो। किन्तु देहान्त होने पर क्या होजाता है? प्राणान्त होने पर, वह उद्योगिता वा कर्मण्यता, तुम्हारे भीतर का वह ईश्वर, जो तुम्हें ऐसी ऐसी उँचाइयों पर उठा ले जा सकता था, पहले जैसी सहायता किया करता था वैसी अब नहीं करता। तो फिर इस शरीर के अन्दर कौन है जिसके कारण नसें डोलती हैं, बाल बढ़ते हैं, आपकी नाड़ियों में रक्त का सञ्चार होता है? वह कौन है?" शरीर के अंगों को यह सब चाल, शक्ति, फुर्ती देने वाला कौन है? वह कौन है? वह एक "विश्वव्यापी शक्ति" है, एक "विश्वेश्वर" है, जो तुम वस्तुतः हो, वह "आत्मा" है। जब कोई मनुष्य मर जाता है, तब कुछ आदमियों को उसे शमशान या क्रब्रिस्तान उठा कर ले जाना पड़ता है। और जब वह ज़िन्दा था तब वह कौन चीज़ थी जो उसका मनों भारी बोझ बड़ी बड़ी उंचाइयों पर, ऐसे पहाड़ों पर उठा ले जाती थी? वह कोई अदृश्य, अवर्णनीय वस्तु है, परन्तु है अवश्य। वह तुम्हारे अन्दर आत्म-देव है, वह हरेक शरीर में परमात्मा है, और वही परमेश्वर हरेक वस्तुको शक्ति और कर्मण्यता प्रदान करता है। प्रत्येक व्यक्ति की गति वा चेष्टा में शोभा का कारण भी वही परमेश्वर है। जब कोई मनुष्य सोया होता है, तब उसके नेत्र नहीं देखते; जब वह सोया होता है, तब
उसके कान नहीं सुनते। जब मनुष्य मर जाता है, तब भी उसके नेत्र जहाँ के तहाँ रहते हैं, पर वह देखता नहीं, उसके कान ज्यों के त्यों रहते हैं, पर वह सुनता नहीं। क्यों? क्योंकि भीतर का वह ईश्वर या आत्मदेव अब उसी तरह सहायता नहीं करता जैसे पहिले करता था। वह भीतर का ईश्वर ही है जो नेत्रों के द्वारा देखता है, वह भीतर का ईश्वर ही है जो कानों को सुनवाता है, वह भीतर का ईश्वर ही है जो नाक को सूंघने की शक्ति देता है, और सब रगों का शक्तिदाता भी वही भीतरी ईश्वर परमात्मा ही है। अन्तर्गत ईश्वर ही समस्त वाह्य शोभा या सौन्दर्य का सारांश तत्व है। यह सब अन्तर्गत परमेश्वर है। इसे याद रक्खो। इस पर ध्यान दो। तुम्हारे सामने कौन है? जब तुम किसी व्यक्ति की ओर देखते हो, तब तुमसे नज़र कौन मिलाता है? वही भीतर का ईश्वर। बाहरी नेत्र, त्वचा, कान, इत्यादि आवरण मात्र हैं। वे केवल बाहरी वस्त्र हैं, और कुछ नहीं।
इस दुनियां में जब लोग पदार्थों को प्यार और उनकी इच्छा करने लगते हैं, तब वे भीतर की असलियत की अपेक्षा पोशाक को, वस्त्र को अधिक प्यार करने लगते हैं, जिस पोशाक के द्वारा कि वह (भीतर की असलियत) चमकती है। इस प्रकार वे भीतर के सत्य, मूल, और तत्वकी अपेक्षा वस्त्रों, वाह्य रूपों वा आकारों को अधिक प्यार और पूजा करते हैं। इसी से लोग दुःख उठाते हैं और इस पाप के कुफल को भोगते हैं। यह बात है। इससे ऊपर उठो, इससे ऊपर उठो। प्रत्येक स्त्री और पति को एक दूसरे में परमेश्वर को देखने का यत्न करना चाहिए। भीतरी ईश्वर को देखो, भीतर के ईश्वर की पूजा करो।
हरेक वस्तु तुम्हारे लिए ईश्वर बन जानी चाहिए। नरक
का खुला फाटक (द्वार) होने के बदले स्त्री को पति के लिए दर्पण के समान होना चाहिए, जिस में वह परमेश्वर के दर्शन कर सके। पति को भी नरक का खुला द्वार होने के बदले स्त्री के लिए दर्पण के समान होना चाहिए जिसमें वह भी परमेश्वर को देख सके।
कोई स्त्री अपने पति को, या पति अपनी स्त्री को, यह अनुभव, यह ईश्वरत्व, सब शक्तियों की यह वेदान्तिक एकाग्रता, कैसे प्राप्त करा सकती है? यह वे कैसे कर सकते हैं?
यदि किसी स्त्री को अपने पति का उद्धार करना है, तो पहले उसे अपने पति को सब बाहरी गन्दगियों से बचाना होगा। यदि पति अविवाहित है, तो वह सब तरह के प्रलोभनों का शिकार बन सकता है। वह बेपतवार की नौका की तरह है, जो सब पवनों और तूफानों के वश में है, चाहे वे किसी दिशा से भी चलें। जब तक कोई मनुष्य अविवाहित है, बिना आत्मिक ज्ञान के है; जब तक वह अविवाहित है, तब तक सब ओर से उसे सर्व प्रकार की गन्दगियां भोगना पड़ती हैं, और स्त्री को पहले इन प्रलोभनों से अपने पति को बचाना चाहिए। पर अब होता क्या है? साधारणतः स्त्रियां इन प्रलोभनों से अपने पतियों को नहीं बचातीं, किन्तु वे (स्त्रियां) स्वयं उनके कंधों पर भारी बोझ हो जाती हैं। यह तो ठीक ऐसा ही है कि कोई मनुष्य अपने सब रूपये देकर बड़ी रक़म का एक नोट खरीद ले! वह दूसरे प्रलोभनों के बोझ से छूट गया है, परन्तु अब की यह आधीनता पिछली सब आधीनताओं (Humiliations) से अधिक बोझल है। अब वह पहले के से प्रलोभनों के अधीन नहीं है, किन्तु अब यह एक ही प्रलोभन या अधीनता उस के लिए काफ़ी है।
यह हाल ठीक उस घोड़े का सा है जो बचाव के लिए एक मनुष्य के पास गया था। आप जानते हैं कि एक समय था जब मनुष्य भी वन में रहता था, घोड़ा भी जंगल में रहता था। हिरन और वारहसिंगे भी जंगल में रहते थे, जैसे कि आज-कल। एक बार एक घोड़ा लड़ाई में वारहसिंगे से हार गया। वारहसिंगे ने अपने सींगों से घोड़े को घायल कर दिया। घोड़ा सहायता के लिये मनुष्य की शरण में गया। मनुष्य ने कहा, "बहुत अच्छा, मैं तुम्हारी मदद करूंगा। मेरे हाथ में तीर हैं। तुम मुझे अपनी पीठ पर चढ़ालो, और मैं जाकर तुम्हारे दुश्मनों को मार दूंगा"। आदमी घोड़े की पीठ पर सवार हुआ, जंगल में गया और वारहसिंगे का वध किया। वे विजयी होकर घर लौटे। घोड़ा बड़ा खुश था। अब घोड़े ने जाना चाहा। घोड़े ने मनुष्य को धन्यवाद दिया और कहा, "जनाब! मैं आपको धन्यवाद देता हूं। अब मैं विदा होना चाहता हूं"। आदमी आया और बोला, "ऐ घोड़े!! ऐ घोड़े!! तुम कहां जाओगे? चूँकि अब मुझे मालूम होगया है कि तुम बड़े काम की चीज़ हो, मैं तुम्हें जाने न दूंगा। तुम्हें मेरा चाकर होना पड़ेगा. तुम्हें मेरा गुलाम बनना होगा"। घोड़ा वारहसिंगे, हिरन, और दन के अन्य पशुओं से बच गया, किन्तु उसकी स्वाधीनता जाती रही। और गुलामी, जो उसकी बाहरी सफलता का नतीजा थी, उसकी स्वाधीनता की हानि की पूर्ति नहीं करती थी।
यही हाल मनुष्य का है। विवाह के बाद वह बहुतेरे प्रलोभनों से बच जाता है, किन्तु एक प्रलोभन, गुलामी या पराधीनता जो स्त्री के सम्बन्ध से प्राप्त हुई है, ठीक उसी बर्ताव के तुल्य है जो मनुष्य ने घोड़े के साथ किया था।
अच्छा, अब स्त्री पुरुष को बचानेवाली कैसे हो?
वह उसे कुछ प्रलोभनों से बचाती है। इस बात की जहांतक दौड़ है, यह बहुत अच्छी है, बहुत ठीक है। अब दूसरी बात यह है कि उसे मनुष्य को गुलामी में न जकड़ना चाहिए। (अमेरिका वाले कहते हैं कि उन्हों ने फिलीपाइन (Philippines) निवासियों को जीता है, किन्तु यदि वे सावधान न रहे, तो वे गुलामी में फँस जाँयगे।) यह कैसे हो सकता है? स्त्री को अपने पति को गुलाम बनाने का यत्न न करना चाहिए, और पतिको स्त्री अपने अधीन न करनी चाहिए। यह अब दूसरा क़दम है। यदि यह किया जासके तो आशा है, अन्यथा कोई आशा नहीं। यह एक ऐसी बात है जो कभी नहीं या बहुत कम तुम्हारे ध्यान में लाई जाती है, परन्तु है यह एक तथ्य। आप जानते हैं कि हज़रत ईसा मानवजातिका उद्धारकर्ता माना गया था, और यह कहा गया था कि वह सारे विश्व का उद्धार करेगा, सारा पोप धो डालेगा, और स्वर्ग का साम्राज्य भूमि पर ले आवेगा, किन्तु आप की सब इंजीलों, कुरानों, और वेदों के होते हुए भी, इन सब के होते हुए भी, दुनियाको हम वैसी ही अधार्मिक अब भी पाते हैं, जैसी पहले थी। कारण क्या है? कारण यह है कि दोष के असली मूल का उच्छेद नहीं किया गया है। वास्तविक कठिनता आपके परिवार-मण्डल में है। जब तक स्त्री पतिका सच्चा हित करने की न ठान लेगी, और पति स्त्रीका हित करने को न ठान लेगा, तब तक धर्मका अभ्युदय नहीं होसकता, धर्म के लिए कोई आशा नहीं है।
आप जानते हैं कि यह भाफ और बिजली का ज़माना (समय) है। धर्म को गठरी बाँध कर चल देना चाहिए। ऐ ईसाइयो! ऐ हिन्दुओ! ऐ मुसलमानों! यदि तुम सचमुच यह चाहते हो कि संसार की मुसीबत निर्मूल होजाय,
यदि तुम चाहते हो कि मानव जाति की व्यथा दूर हो जाय, तो तुम्हें इस पर ध्यान देना चाहिए, वैवाहिक सम्बन्धों को सद्भावों पर स्थापित करना चाहिए, तुम्हें हरेक महिला और भद्र पुरुष के हृदय में यह उतार देना चाहिए कि अपनी स्त्री वा अपने पति के लिये इसामसीह बनना उसका अपना कर्त्तव्य है। यह हमारा अवश्य कर्त्तव्य है, ईसा बनने को हम बाध्य हैं। और यह कैसे हो सकता है? यदि स्त्री पति को दास न बनाना चाहे और पति स्त्री को अपने अधीन न करना चाहे, तो यह हो सकता है। सब को अपने आप से मुक्त करो, तो तुम स्वाधीन हो जाओगे। यही दैवी-विधान है। "क्रिया और प्रति क्रिया-बराबर और आमने सामने (उलटी) होती हैं" स्त्री को अपने अधीन बनाओ, उसे अपना गुलाम बनाओ, और तुम भी गुलाम हो जाओगे। अह! अत्यन्त विकट वक्रता है। सत्य सदैव अप्रिय है, विकट है। हज़रत ईसा ने यह विकट सत्य सिखाया था, और उसे पीड़ा पहुँचाई गयी, अर्थात् उसे सूली मिला। सुक़रात आया और उसे विष दिया गया। सत्य को प्रसन्नता से लोग कभी नहीं ग्रहण करते। यह कथन दारुण मालूम होता है, पर है ऐसा ही। ज़रा ध्यान दो।
एक आदमी ने एक बैल के गले में एक रस्सी डाल रक्खी है, वह बैल के सींगों में बंधी हुई है, और रस्सी का दूसरा सिरा वह अपने हाथ में पकड़े है। वह समझता है कि बैल उसका नौकर है, उसका गुलाम है, किन्तु वह भी बैल का ठीक उतना ही गुलाम है जितना बैल उसका। किस कारण से वह बैल को अपने अधिकार में बतलाता है? इस लिए, कि बैल उसे छोड़ नहीं सकता। अब ख़याल करो, यदि यही एक कारण है कि बैल उसे छोड़ नहीं सकता, तो हम
कहते हैं कि वह भी तो बैल को छोड़ कर नहीं जा सकता। क्योंकि वह बैल को नहीं छोड़ सकता इस लिए बैल उसे नहीं छोड़ सकता। यदि वह बैल को छोड़ सकता, यदि वह आज़ाद होता, यदि वह बैल का गुलाम न होता, तो बैल उसका गुलाम न होता। यही दैवी-विधान है।
क्या तुम यह नहीं देखते कि सब कुटुम्ब कष्ट भोग रहे हैं? क्या यह तथ्य नहीं है? क्या यह तथ्य नहीं है कि सब परिवार इस संसार में, यूरोप में, अमेरिका में, भारतवर्ष में, जापान में, सब कहीं, कष्ट भोग रहे हैं? लोग कहते हैं, "सुखी घर, सुखी घर"। कैसी प्रवञ्चना (humbug) है! कैसा ज़बानी जमाखर्च है! कोरी बात चीत, केवल स्वप्न है!! यह क्या बात है कि लोग कष्ट पा रहे हैं, और घर सुखी नहीं हैं? और क्या तुम अपने अन्तः हृदय से नहीं चाहते कि परिवार सुखी हों? यदि तुम सुख चाहते हो, तो उत्सुक बनो, घर को एक बड़ा मज़ाक न बनाओ! उत्सुक बनो, सच्चे बनो, कारण का पता लगाने की चेष्टा करो। उसे जाँचो, उस की छान-बीन करो, उसका अनुसन्धान करो, और तुम देखोगे कि परिवारों में फूट और सद्भाव के अभाव का केवल यही एक कारण है कि वे प्रकृति के क़ानूनों को नहीं जानते हैं, और मूढ़ हैं। वे अज्ञान रूपी दैत्य के पञ्जे में हैं। वे नहीं जानते कि प्रकृति की योजना (Plan of Nature) क्या है, विकास का पंथ किधर है। वे यह नहीं जानते। "राम" तुमसे कहता है कि जिस रास्ते से विकास चलता है और यह सारी प्रकृति काम करती है, वह यह है कि हरेक क़दम ब क़दम, धीरे धीरे, अपने भीतर के ईश्वर की प्राप्ति के निकट पहुँचता जाय। यही पंथ है, यही रेखा है जिस पर इस संसार के सब चमत्कार चल रहे हैं। हरेक
को अपने भीतर के परमेश्वर का अनुभव करना चाहिए। भीतर के ईश्वर का अनुभव प्राप्त करके हरेक को पूर्ण आत्मा, पूर्ण ईश्वर हो जाना चाहिए। लोग इसे हृदयंगम नहीं करते, इसी लिए यह सब जीवन-संग्राम है।
अपनी स्त्री या पति से अपना सम्बन्ध ऐसा स्थापित करो कि ठीक मार्ग पर उन्नति हो; कि तुम प्रकृति की योजना (Plan) के अनुकूल काम कर सको। प्रकृति की कल्पना (Plan) है "स्वाधीनता! स्वाधीनता!! स्वाधीनता!!!" अपनी स्त्री को अपने से मुक्त कर दो, और तुम उससे (उसके बन्धन से) मुक्त हो जाओगे। इसका अर्थ क्या है? क्या इसका यह अर्थ है कि सब बन्धन तुरन्त तोड़ दिये जांय, फ़ौरन काट दिये जांय, गार्डियन ग्रन्थि (Gordian Knot)* की तरह काट दिये जांय? क्या यही अभिप्राय है? क्या इसका यह अर्थ है कि हरेक नर इस संसार में खुल्ला छोड़ दिया जाय और प्रत्येक नारी नितान्त निरंकुश हो जाय? नहीं, कदापि नहीं। इस तरह से स्वाधीनता नहीं मिल सकती, यह तो दासता हुई, गुलामी है। संगी को "स्वतंत्र" बनाने से यह मतलब है कि तुम उसे ऐसा बनादो कि वह तुम्हारे अन्तर्गत ईश्वर पर विश्वास या भरोसा करे, न कि तुम्हारी देह पर। जब तुम उसे प्यार करो या वह तुम्हें प्यार करे, तब तुम उसके अन्तर्गत ईश्वर से प्रेम करो और उसे अपने अन्तर्गत
*एक पेचीदा गांठ जिसको फ़ारिगया के बादशाह गार्डियन ने अपनी गाड़ी के एक सिरे में लगाई हुई थी और यह घोषणा दे रक्खी थी कि जो कोई इसे खोलेगा वह एशिया का बादशाह हो जायगा। सिकन्दर ने इसका हाथ से खोलना कठिन देख कर इसे तलवार से काट दिया, जिससे इसका नाम गार्डियन सर से प्रसिद्ध हो गया। अभिप्राय अति कठिन वा पेचीदा गांठ से है।
ईश्वर का प्रेमी बनाओ। लोग कहते हैं कि "हम सब के सब ईसामसीह पर विश्वास करते हैं।" "राम" कहता है कि तुम्हें अपनी स्त्रियों और पतियों पर विश्वास करना चाहिए। "राम" कहता है, "अपने संगी के मांस पिंड पर विश्वास न करो, अन्तर्गत ईश्वर पर विश्वास करो।" इस बाहरी खाल और मांस को पर्दे के तुल्य जानो और इसे आप अपने लिए पारदर्शी बनालो, तथा पर्दे के पार भीतर के ईश्वर को देखो।
हम को पक्षी की तरह होना चाहिए जो एक मुहूर्त में उस झूलती हुई फुनगी (शाखा) पर उतर पड़ता है। उसे फुनगी (डाली) के झुकने का बोध होता है, किन्तु निर्भय गाता रहता है, यह जानता हुआ कि उसके पँख हैं। फुनगी ऊपर नीच झूलती है, पर पक्षी भयभीत नहीं होता, क्योंकि यद्यपि वह फुनगी (डाली) पर बैठा हुआ है, तथापि अपने परों के भरोसे है, ऐसा समझो। पक्षी जानता है कि वह डाली पर भरोसा नहीं कर रहा है, बल्कि अपने परों पर। यही ढंग है। उसका भरोसा उस डाली पर नहीं है जिस पर वह बैठा हुआ है; वह अपने पंखों पर भरोसा करता है।
इसी तरह जहां कहीं तुम हो, अपनी स्त्री और बच्चों से कितनेही अनुरक्त क्यों न हो, किन्तु उन में दिल न लगाओ। हृदय को परमेश्वर के साथ रक्खो, दिल की अपने भीतर के परमात्मा से लौ लगाये रहो। यही उपाय है। तुम स्वयं ऐसा बर्ताव करो, और अपनी स्त्री तथा बच्चों से भी ऐसाही बर्ताव करवाओ। तुम उन से मुक्त होजाओगे, और वे तुमसे मुक्त होंगे। पराधीनता का नाम नहीं, स्वाधीनता! स्वतंत्रता!! इस तरह हरेक अमेरिका-निवासी स्वाधीन
हो सकता है। व्याख्यान का रोचक अंश अब आता है।
एक स्थान पर एक अत्यंत सुन्दर चित्र देखा गया। उस चित्र या तसवीर में एक बड़ा अच्छा कौच (आसन; couch) था। उस आसन पर बड़े उज्ज्वल शाही गद्दे और तकिए थे। एक बड़ी सुन्दर रानी उस आसन पर लेटी हुई थी, एक ओर कौच के बच्चे थे, और राजा एक कुर्सी पर बैठा था। तसवीर बड़ी अच्छी थी, बड़ी मनोहर थी, अति शोभित थी। रानी बहुत बीमार थी। मरणासन्न थी। उसका पति, राजा, आंसू गिरा रहा था, और उसका बेटा तथा बेटी रो रहे थे। यह एक सुन्दर चित्र था। क्या आप इस तसवीर के अधिकारी होना पसन्द करेंगे। अहा! अवश्य, हरेक तुममें से पसन्द करेगा। यह चित्र इतना मनोहर था कि यदि आप इसे देखते तो आप ख़रीद लेते। क्यों आप इस चित्र के अधिकारी होना चाहेंगे? इसमें एक ऐसी मनोहरता थी जो आपको मंत्र-मुग्ध सा बना देती। किन्तु क्या वह मरणप्राय रानी होना आप पसन्द करते? उत्तर दीजिये। वह रानी होना क्या आप पसन्द करते? वह बड़ी अमीर थी, किन्तु मरणासन्न थी। और क्या वह रोता हुआ पति या बिलखते हुए बच्चे होना आप पसन्द करते? नहीं।
वेदान्त चाहता है कि तुम अपने घरों में, अपने परिवारों में ईश्वर की तरह रहो; अपने मकानों में गवाह की तरह, निर्विकार ईश्वर की तरह, अनासक्त रहो, किसी तरह से मिले या उलझे हुए न रहो। अपने मन को सदा स्थिर रक्खो, सदा अनासक्त रक्खो, अपने चित्त और हृदय को सदा अन्तर्गत परमेश्वर पर जमाये रहो, और सब घरेलू मामलों को उसी तरह देखो जिस तरह तुम उस चित्र को देखते। आप जानते हैं कि जब आप साक्षी की तरह इसे देखते हैं
तब यह सुख का कारण होता है; जब आप इस में उलझ जाते वा आसक्त होते हैं, तब यह मुसीबत का सामान बन जाता है। यदि इस संसार के व्यापार में हम फँस जाते हैं तो हमारी बड़ी दुर्दशा होती है। जब निर्विकार स्थिति-बिन्दु से साक्षीवत् हम इसे देखते हैं, तब हमें आनन्द आता है, तब यह अति रुचिर होजाता है। इसी तरह, अन्तर्गत परमेश्वर को प्राप्त करो। राम के सब व्याख्यान सुनो, धीरे धीरे उन्नति करते हुए तुम्हें विश्वास होजायगा। राम ज़िम्मा लेता है कि इस संसार का कोई भी व्यक्ति यदि राम के सब व्याख्यान सुन लेगा तो उसके संशय दूर हो जांयगे, अपनी ईश्वरता में उसे अवश्य विश्वास होजायगा। पहले अपनी दिव्यता तथा ईश्वरत्व में गहरा विश्वास (पक्का निश्चय) प्राप्त करो। इसे पालो, फिर उस विधि से, वा उन उपायों से, जो बताये जांयगे, तुम उस परमेश्वर में अपना केन्द्र जमाओ, वही होजाओ, शाश्वत और सर्वशक्तिमान परमेश्वर अपनेको अनुभव करो। "वही मैं हूँ, वही"। यह अनुभव करो और अपने सब घरेलू संबन्धों तथा इन सब मामलों को इस तरह देखो कि मानो वे वह तसवीर हैं, मानो तुमसे कोई लगाव ही नहीं है। यह विपरीत और स्वतः विरुद्ध जान पड़ता है। लोग कहते हैं कि यदि हम इन मामलों में न उलभें तो कोई उन्नति करही नहीं सकते। अरे! तुम भ्रान्त हो। उन मामलों में फँसते ही तुम्हारी उन्नति रुक जाती है। जब तुम लिखते हो, तब लिखना अव्यक्ति (अकर्तृक) भाव से होता है। उस समय तुम्हारा अहं-भाव, तुम्हारा तुच्छ अहंकार, मिथ्या अहं बिलकुल ग़ैरहाज़िर होता है; और अनायास, यंत्र-भाव से काम किया जा रहा है। यह एक प्रकार से प्रतिक्रिया रूप कर्म है, हाथ अपने आप लिखता
जारहा है। क्यों? क्यों कि तुम अपने तुच्छ अहंकार को, स्वार्थी अहं को, मामले में नहीं घुसेड़ते। ज्यों ही तुम अपने चित्त में विचारने लगोगे, "अहः मैंने ख़ूब ही लिखा है, मैंने कमाल किया है," त्यों ही तुम भूल कर बैठोगे।
इस तरह हम देखते हैं कि काम केवल तभी होता है, जब हम तुच्छ स्वार्थी अहं से छुटकारा पा जाते हैं। जिस क्षण तुमने स्वार्थी अहं का रंग जमाया, उसी क्षण काम बिगड़ा। सर्वोत्तम काम वही काम होता है जो अकर्तृत्व-भाव से किया जाता है त्याग का अर्थ है इस छोटे व्यक्तिगत, स्वार्थी अहं से छुटकारा पाना, जीव की इस मिथ्या कल्पना को दूर करना। सूर्य चमकता है। सूर्य में यह भाव नहीं है कि वह काम कर रहा है। परन्तु सूर्य अहंकार [वैयक्तिक भाव] से रहित है, इसी से वह इतना मनोहर और चित्ताकर्षक है। नदियां बहती हैं। उनके बहने में कोई तुच्छ वैयक्तिक अहं-भाव नहीं है, किन्तु काम हो रहा है। दीपक जलता है, किन्तु व्यक्तिगत अहं-भाव—"मैं महान् हूँ, मैं जल रहा हूँ, मैं प्रकाश कर रहा हूँ"—जलने का काम नहीं कर रहा है। फूल खिलते हैं और चारों ओर मधुर सुगंधि फैलाते हैं, किन्तु उनमें इस भाव का लेश भी नहीं है कि वे बड़े मधुर हैं, बड़े रुचिर हैं।
इसी तरह तुम्हारा काम स्वार्थमय अहंकार (अहम्मन्यता) के दूषण से निर्मुक्त होना चाहिए। आप अपना काम ठीक नक्षत्रों और सूर्य के काम के समान होने दो, अपना काम चन्द्रमा का सा होने दो। तभी तुम्हारा काम सफल हो सकता है। केवल तभी तुम इस संसार में कुछ वस्तुतः कर सकते हो। सब नायक, सब धीसम्पन्न पुरुष यह रहस्य रखते थे, सब तालों में लगने वाली यह पर ताली (master key)
उनके अधिकार में थी। उन्हों ने अपने को अकर्तृत्व दशा में डाल दिया, और तभी उनका कार्य इतना फल फूल सका। यही नियम है। इस भ्रान्त-विचार को त्याग दो कि जब तक किसी मामले में तुम अपने को आसक्त न कर लो तब तक तुम्हारा अभ्युदय कदापि न होगा। ऐसा विश्वास करना तुम्हारी भूल है।
दैवी-विधान यह है कि मनुष्य तो शान्त, स्थिर, और अचञ्चल हो, और शरीर सदा कर्मण्य रहे। चित्त स्थिति-शास्त्र [स्टेटिक्स; Statics] के नियमाधीन रहे और देह गति-शास्त्र [डाइनेमिक्स; Dynamics] के नियमाधीन हो। वाह्य शरीर काम करता रहे और भीतरी अपना आप सदा स्थिर रहे, यही दैवी-विधान है। स्वाधीन बनो। वस्तुओं को ठीक उसी तरह कोमलता से स्थित रहने दो जिस तरह नयनगोचरी भूत भूप्रदेश [Landscape] नयनों पर स्थित रहा करता है। दृष्टि गोचर प्रदेश नेत्रों पर सचमुच, पूरी तरह, समग्रता से, अवस्थान करता है, किन्तु अति कोमलता से। वह नेत्रों पर बोझ नहीं डालता। सम्पूर्ण भूभाग [landscapes] का अवस्थान नेत्रों पर है, किन्तु नेत्र स्वाधीन हैं, भार से दबे नहीं हैं। तुम्हारे घरेलू मामलों में, तुम्हारे पारिवारिक या सांसारिक जीवन में तुम्हारी स्थिति भी ठीक ऐसी ही होनी चाहिए। तुम इन सब व्यापारों को देखो और निर्लिप्त बने रहो, स्वतंत्र रहो। और यह स्वाधीनता मिल सकती है केवल सच्चे आत्म-ज्ञान के द्वारा, पूर्ण तत्त्व के अनुभव द्वारा, जिसे वेदान्त कहते हैं। सच्चे आत्मदेव का अनुभव करो, और सब नक्षत्र तथा तारागण तुम्हारी आज्ञा पालेंगे।
Roll on, ye suns and stars, roll on, Ye motes in dazzling Light of lights, In me, the Sun of suns, roll on.
O orbs and globes, mere eddies, waves In me the surging oceans wide Do rise and fall, vibrate, roll on.
O worlds, my planets, spindles turn; Expose me all your parts and sides, And dancing, bask in light of life.
Do suns and stars or earths and seas Revolve the shadows of my dream? I move, I turn, I come, I go.
The motion, moved and mover I, No rest, no motion, mine or thine. No words can ever me describe.
Twinkle, twinkle, little stars, Twinkling, winking, beckon, call me. Answer first, O lovely stars! whither do you sign and call me? I'm the sparkle in your eyes, I'm the life that in you lies.
तात्पर्यः—
बढ़े चलो, तुम सूर्यों और नक्षत्रो, लुढ़कते रहो, प्रकाशों के चमत्कृतकारी प्रकाश में तुम कणो (अर्थात् कण मात्र हो) मुझ सूर्यों के सूर्य में, लुढ़कते रहो। भँवर मात्र ए ग्रह-मण्डलों और भूगोलो, तरंगाकुल विशाल समुद्रो लहरो (की तरह) मुझमें उठो और गिरो, आन्दोलित हो, लुढ़कते चलो। ए लोको, मेरे ग्रहो, धुरों पर घूमो; अपने सब अंग और पार्श्व मुझे दिखाओ, और नाचते हुए, जीवन के प्रकाश में तपो।
सूर्यो और नक्षत्रो या भूमियो और समुद्रो चक्कर देते रहो मेरे स्वप्न की प्रतिच्छाया को, मैं चलता हूँ, मैं फिरता हूँ, मैं आता हूँ, मैं जाता हूँ।
गति, गतिमान् और गतिकारक मैं (हूँ)। न विश्राम, न गति है मेरी या तेरी। कोई शब्द मुझे कदापि वर्णन नहीं सकता।
चमको, चमको, छोटे तारो! चमकते हुए, पलकते हुए, संकेत करो, मुझे पुकारो। उत्तर पहले दो, ऐ सुन्दर तारो! कहाँ के लिए संकेत तुम्हारा, कहां मुझे बुलाते हो? तुम्हारे नयनों की प्रभा हूँ, तुम में जो जीवन वह मैं हूँ।
यह है तुम्हारा सच्चा अपना आप। तुम वास्तव में जो कुछ हो वह यह है। यह अनुभव करो और मुक्त हो। यह अनुभव करो और तुम विश्व के स्वामी हो। यह अनुभव करो और तुम देखोगे कि तुम्हारे उद्यम के सब मामले, तुम्हारे सब व्यापार आप से आप, अत्यन्त वांछनीय रूप में तुम्हारे सामने आ खड़े होंगे। तुम देखोगे कि सफलता को तुम्हें खोजना पड़ेगा, और तुम सफलता को ढूंढ़ते न फिरोगे। तुम देखोगे कि भीतर के परमेश्वर पर यह विश्वास, भीतर के परमेश्वर की यह अनुभूति, सारे विश्व को तुम्हारा क्षुद्र दास बना देगी, इस संसार की प्रत्येक वस्तु को तुम्हारा अधीन बना देगी। तुम देखोगे कि सफलता और अभ्युदय तुम्हें ढूंढ़ेंगे, और तुम्हें उनको न ढूंढ़ना पड़ेगा। "यदि पहाड़ मोहम्मद के पास नहीं आता तो मोहम्मद पहाड़ के पास जायगा।" जिस क्षण तुम इन सांसारिक पदार्थों में सुख ढूँढ़ना छोड़ दोगे और स्वाधीन हो जाओगे, अपने भीतर के परमेश्वर का अनुभव करोगे, उसी क्षण तुम्हें मोहम्मद के पास न जाना पड़ेगा, मोहम्मद तुम्हारे पास आवेगा। यही दैवी विधान है। यही रहस्य है, यही गुह्य भेद संसार का शासन कर रहा है। यही सिद्धान्त तुम स्वयं हो। यह अनुभव करो, अपनी स्त्री और बच्चों को यह अनुभव कराओ। खुद स्वाधीन हो और उन्हें स्वाधीन बनाओ। इस तरह तुम साक्षात् अधःकूप या कारागार को बैकुण्ठ बनादोगे, तुम अपने घरों में अपने लिए स्वर्ग बनाओगे, तुम अपने अत्यन्त भगड़ालू घरों को सुखी घर बना सकते हो। दूसरा कोई उपाय नहीं है! इस अनिवार्य निर्दयी क़ानून से तुम बच नहीं सकते। यही एक रास्ता है, यही एक मात्र [unclear] है; यही एक पर्ताली (Master Key)
है जो संसार के सब खज़ानों को खोल देती है। यदि तुम अपने भीतर के परमेश्वर का अनुभव करो, तो तुम मुक्त हो। यह अनुभव करने में दूसरों की सहायता करो।
ॐ। ॐ।