गृहस्थाश्रम और आत्मानुभव।
(ता० 1 फरवरी 1903, रविवार, सन्ध्या-समय)
"क्या कोई विवाहित मनुष्य (गृहस्थी) आत्म साक्षात्कार की अभिलाषा कर सकता है?"* यह प्रश्न कुछ समय पहिले "राम" से पूछा गया था और उसका पूर्ण उत्तर भी उस समय दिया गया था।
राम आज उस विषय को नहीं छेड़ेगा, किन्तु उसी के समान अन्य विषय पर बोलेगा।
उस प्रश्न के उत्तर में कामनाओं के स्वरूप का उदाहरण दिया गया था। अर्थात् "कामना क्या वस्तु है; और मनोगत मनुष्य के स्वभाव पर क्या प्रभाव डालते हैं? कामनाओं की पूर्ति से क्योंकर सुख और अपूर्ति से क्यों कर दुःख होता है?" आदि प्रश्नों का विचार किया गया था। यह प्रश्न बहुत बड़ा और जटिल है और इस पर "राम" ने बहुत गंभीरतापूर्वक विचार भी किया है। राम के अनुसंधानों का फल "मनोवेग शास्त्र (Dynamics of mind)" नामी ग्रन्थ में प्रस्तुत किया जावेगा।
"क्या अपने पुत्र, कलत्र, स्नेही सम्बन्धियों में रहने वाला गृहस्थ वा दूसरे शब्दों में एक साधारण सांसारिक मनुष्य
*यह विषय गतभाग 15 के 'निश्चल चित्त' नामी व्याख्यान में दर्ज है।
†मनोवेग शास्त्र नाम का ग्रन्थ 'राम' ने आरंभ ही किया था कि शरीर ने साथ न दिया। इस नाम तले कुछ नोट दो चार पृष्ठ पर लिखने के बाद 'राम' ब्रह्मलीन हो गए। अतएव अब इस ग्रंथ का केवल नाम तो रह गया आकार बनने नहीं पाया।
तत्त्व (आत्मा) का साक्षात्कार कर सकता है"? यही प्रश्न है।
हम इस प्रश्न के एक अंग पर विचार करेंगे। वेदान्त केवल इतना पूछता है "क्या तलवार तुम्हारे शत्रुओं का नाश कर सकती है?"
यदि इस प्रश्न के उत्तर में 'हां' कहा जासकता है, तो "क्या कोई सांसारिक गृहस्थ तत्व का साक्षात्कार कर सकता है?" इस प्रश्न के उत्तर में भी 'हां' कहा जासकता है। यह सब केवल उस तलवार अथवा गृहस्थ-बन्धन के उपयोग पर निर्भर है। उसी एक तलवार से हम अपना नाश कर सकते हैं, और उसी से हम बाहरी आक्रमणों से अपने को बचा सकते हैं। इसी प्रकार मनुष्य अपने गृहस्थ के बन्धनों वा सम्बन्धों के दुरुपयोग से अपना विनाश कर सकता है, वा अपनी आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है, और अपने में साक्षात्कार कर सकता है। अतः यह प्रश्न भी उसी प्रकार हल होता है।
हमारा टहलना, घूमना, स्वास्थ सम्बन्धी हमारा दैनिक नित्य-कर्म हमारे सुख और आनन्द का कारण होसकते हैं—वे हमारे लाभ तथा सुधार का कारण हो सकते हैं, यदि उचित रीति से हम उन्हें करें। परन्तु उन के दुरुपयोग से वही सैर-सपाटे क्लेश अशान्ति एवं व्याधि का कारण बन सकते हैं।
इसी तरह हमारे पारिवारिक सम्बन्ध, हमें उन्नत कर सकते हैं वा हमारी रक्षा कर सकते हैं, और हमारा समूल नाश भी कर सकते हैं।
एक बड़ा सज्जन पुरुष था जिसके पास एक बहुत लुच्चा और बदमाश नौकर था। वह प्रत्येक काम को उल्टा ही किया करता था। अपने मालिक की आज्ञाओं के पालन करने का
उस का ढंग ही निराला था। वस्तुतः उस के कार्य करने की शैली ऐसी थी कि गंभीर से गंभीर मनुष्य भी उससे खीझ उठता। पर वह धर्मात्मा मालिक उस नौकर पर कभी क्रुद्ध न होता, उल्टे वह उस दुष्ट के साथ अति प्रेम का बर्ताव करता। एक समय उसके एक अतिथि ने उस नौकर के विरुद्ध बहुत सी शिकायत की। वह उसके कामों से बहुत खिन्न और क्रुद्ध हुआ था, और उस के मालिक को उसे निकाल देने को कहा। पर मालिक ने उत्तर दिया- "आपकी सलाह अत्युत्तम है, और आपने शुभेच्छा-पूर्वक यह सम्मति दी है। मैं जानता हूं कि आप मेरे शुभ-चिन्तक हैं और मेरे कार्य की वृद्धि चाहते हैं जिससे मुझे यह सम्मति देते हैं। पर मैं इस बात को अधिक जानता हूं। मैं जानता हूं कि मेरा काम काज खराब होरहा है। इस से मेरे व्यापार को हानि पहुँच रही है। किन्तु मैं उसे इसी लिये रखता हूं कि वह इतना अनाज्ञाकारी है। यह उसका दुष्ट आचरण और खराब स्वभाव है, जिससे वह मुझे इतना प्रिय हो रहा है। वह पापी, दुष्ट और नमक हराम है, इसी से मैं उसे अधिक प्यार करता हूं" उसका ऐसा कहना बड़ा ही आश्चर्य-जनक था।
वह मालिक बोला "दुनिया में जितने लोगों से मेरा वास्ता पड़ा है उन सब में से एक यह ही मनुष्य ऐसा है जो मेरी आज्ञा का उल्लंघन करता है, जो निन्दामय (अप्रिय-वादी), अकीर्तिकर और हानिकर काम करता है; और जितनों से मेरा वास्ता पड़ा वे सब के सब इतने कोमल स्वभाव, इतने अच्छे और इतने प्रेमी हैं कि वह मुझे रुष्ट करने का कभी साहस नहीं करते। इस लिये यह नौकर असाधारण है।
यह एक तरह का मुगदल (Dumb-bell) है जो मेरी आध्यात्मिक शिक्षा का उत्तम साधन है। जिस प्रकार बहुत से लोग अपना शारीरिक बल बढ़ाने के लिए मुगदल आदि फेरते हैं उसी प्रकार यह नौकर मेरे आत्मिक बल की वृद्धि निमित्त मुगदल का काम देता है। और इससे मेरा आध्यात्मिक शरीर पुष्टि पाता है। इस नौकर द्वारा मुझे आध्यात्मिक बल प्राप्त होता है। इस लिए इस नौकर के साथ मुझे एक प्रकार की कुश्ती लड़नी पडती है जिस से मुझे शक्ति प्राप्त होती है।"
अतः राम इस तथ्य को तुम्हारे सामने उपस्थित करता है, और इसकी ओर तुम्हारा ध्यान इस लिए दिलाता है कि यदि तुम्हें गृहस्थ-बन्धन तुम्हारी उन्नति के मार्ग में विघ्न रूप अथवा अड़चिल पत्थर मालूम पड़ें तो भी तुम्हें खिन्न होने की आवश्यकता नहीं। ठीक उसी धर्मात्मा मालिक का अनुकरण करो। भेद भाव और कठिनाइयों को शक्ति और बल का नवीन स्रोत बनालो।
ग्रीस देश में सुक़रात (Socrates) नाम का एक महान तत्ववेत्ता हुआ है। उस की स्त्री दुनिया भर में बड़ी कलह-कारिणी थी। एक दिन सुक़रात बड़ी गंभीर वृति से किसी तत्व का चिन्तन कर रहा था। उसी समय उसकी स्त्री अपनी आदत के अनुसार उसके पास आई और अपशब्द बोली। उसने सुक़रात को लानतान की और उसका अपमान किया, नाना नामों से उसे पुकारा। उसकी वृत्ति अपने ओर खींचने का आग्रह किया। अपनी टहल उस से चाही और "यह कर" "वह कर" की आज्ञा हांकने लगी। पर सुक़रात अपने तत्व-चिन्तन में लगा रहा। किसी भी समस्या को तय तक नहीं छोड़ता था जब तक वह हल न
होले। यही उसकी परिपाटी थी।
स्त्री ने गरज गरज कर तूफ़ान मचा दिया, परन्तु सुक़रात ने तब भी न सुना, तब गुस्से में भर कर स्त्री ने गन्दे पानी से भरा बर्तन बिचारे के सर पर उलट दिया। क्या सुक़रात उस समय भी क्षुब्ध वा क्रुद्ध हुआ? किञ्चित मात्र भी नहीं। वह मुसकराया और हँसते हुए बोला, "आज यह समस्या (लोकोक्ति) ठीक सिद्ध हुई कि प्रायः (मेघ) जब गरजता है, तब बरसता है।"
पहिले जब कभी वह गरजी, बर्षा नहीं हुई। किन्तु आज जब उसने गरज गरज कर तूफ़ान मचाया तो पानी भी बरस पड़ा। उपरोक्त व्यंग वचन के बाद सुक़रात फिर अपने तत्व चिन्तन में मग्न हो गया।
इस से स्पष्ट है कि अपने स्वभाव को वश में करने की शक्ति से मनुष्य को कभी निराशा न होना चाहिये। यदि एक मनुष्य (सुक़रात) ने अपने स्वभाव को इतना वश में कर लिया, तो फिर सब कोई कर सकता है। आज भी क्या दुनिया में ऐसे लोग नहीं हैं कि जिनकी आदत वा स्वभाव उनके आधीन हों? अवश्य ही ऐसे मनुष्य हैं, और उद्योग से तुम भी ऐसा कर सकते हो।
यदि तुम चाहो तो तत्व-साक्षात्कार वा परमात्मा से एकता अथवा सब से अभेदता, या समस्त विश्व के साथ तुम्हारी समता एवं इस आत्म-साक्षात्कार का मार्ग तुम्हारे गृहस्थ सम्बन्ध द्वारा विशेष सुगम बनाया जा सकता है।
जगत के प्रत्येक मनुष्य का उद्देश्य तथा लक्ष्य और आध्यात्मिक विकास का परिणाम यही है कि प्रत्येक प्राणी अपने अन्तरात्मा का अनुभव करे, और यह परिच्छिन्न आत्मा जब तक ईश्वर के साथ अभेदता वा परमात्मा से एकता
का अनुभव न करले, तब तक बोध प्रतिबोध वा परिचय पर परिचय का उपार्जन करता रहे। नहीं तो तलवार की धार पर तो इसका अनुभव करना ही होगा।
यही उद्देश्य है। यदि साधारण मनुष्य को गृहस्थ के सम्बन्ध विघ्नरूप जान पड़ते हैं, तो (इसके विपरीत) "राम" कहता है कि पुत्र और कलत्र तुम्हारे सहायक बन सकते हैं।
पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है। पृथ्वी को अवश्य परिक्रमा करना है। चन्द्रमा पृथ्वी से चिमटना चाहता है। अब बताओ, पृथ्वी बिचारी क्या करे? चन्द्रमा और उपग्रहों को पृथ्वी साथ लेकर सूर्य की प्रदक्षिणा कर सकती है।
इसी प्रकार से, हे पुरुषो वा स्त्रियो! यदि तुमने सूर्यों के सूर्य की ओर खिंच जाना निश्चय किया है, तो जिस प्रकार पृथ्वी चन्द्रमा को साथ रखती है, उसी प्रकार तुम भी अपने साथी को साथ रक्खो, और तब अपने साथी के साथ सूर्यों के सूर्य तथा प्रकाशों के प्रकाश के इर्द गिर्द चन्द्रमावत् परिक्रमा करते जाओ। ऐसा करने से अकेले अपने इस तुच्छ शरीर को ही उस 'सूर्यों के सूर्य' की प्रभा, कान्ति एवं शोभा का भागी बनाने की जगह तुम अपने साथ अपने साथी (पत्नी इत्यादि) को भी उसी सूर्य की प्रभा, कान्ति और शोभा का उपभोग करा सकते हो। इस प्रकार एक ही व्यक्ति की जगह तुम अनेक आत्माओं को अपने साथ खींच लेजा सकते हो। केवल एक शरीर द्वारा काम करने के बदले तुम अनेक शरीरों द्वारा कार्य कर सकते हो। ये सभी तुम्हारे शरीर हैं। जिस प्रकार एक शरीर तुम्हारा है, उसी प्रकार यह सब शरीर ईश्वर के हो सकते हैं, और उसका गुणानुवाद कर सकते हैं। जैसे जब कोई मनुष्य किसी स्थान पर जाता है और अपने साथ
एक ही देह (शरीर) लेजाता है, तो वह अपने हाथ, पैर, आँख, कान, नाक आदि को पीछे छोड़ नहीं जाता, यह सब उसके साथ ही जाते हैं; उसी प्रकार वेदान्त कहता है कि जब तुम स्वर्गीय ज्ञान प्राप्त करने जाते हो, जब तुम सत्य का अनुभव करने जाते हो, तब तुम अपने आध शरीर मात्र को स्वर्गीय ज्ञान की ओर लेजाने के स्थान पर सम्पूर्ण शरीर को अपने साथ लेजा सकते हो। तुम अपने पुत्र कलत्र को, मानो अपने दिल दिमाग़ और हाथ पैरों को, साथ लेजा सकते हो।
इस तरह परमात्मा के साथ अभेदता और एकता अनुभव करने के पूर्व तुम अपनी स्त्री और पुत्र के साथ एकता अनुभव करो। जिस मनुष्य ने अपनी अर्धांगी और पुत्र कलत्र के साथ एकता अनुभव नहीं की, वह सब के साथ अपनी एकता का अनुभव कैसे कर सकता है?
वेदान्त की दृष्टि में स्वाभाविक मार्ग तो यही है कि जिस के साथ तुम्हारा सम्बन्ध हो, उन के साथ एकता अनुभव करना आरंभ करो। तुम्हारे जो प्रियतम हों, उन्हीं में तुम अपने को लीन करदो। अपने हित को उनके हित में लीन करदो। सब शरीरों को मिला कर एक करदो। सबों को मिलकर एक धारा प्रवाह बन जाने दो, और फिर परिचय पर परिचय प्राप्त करते जाओ। तदनन्तर दूसरे परिवारों को लो, और क्रमशः उन्नति करते हुए सब परिवारों को अपना शरीर बना लो। जब तुम सब व्यक्तियों को अपना शरीर समझ लोगे, तब तुम परमात्मा के साथ एकता अनुभव कर सकोगे, तब तुम प्रत्येक को अपने साथ लेजा सकोगे।
ईसाइयों की धर्म पुस्तक (बाइबिल) में शिष्य सेंटजोह्न (Saint John) के सम्बन्ध में हम पढ़ते हैं कि उससे
हज़रत ईसा प्रेम करते थे। ईसा समस्त संसार से प्रेम करता था। "शिष्य से ईसा ने प्रेम किया" इस कथन को थोड़ा बदल देने से यों हो जाता है कि शिष्य ने ईसा से प्रेम किया। इससे ईसाई सिद्धान्त (ईसा द्वारा मुक्ति) का मूल सूत्र मिल जाता है।
"आघात प्रत्याघात बराबर और परस्पर विरोधी होते हैं।" (Action and reaction are equal and opposite)। यदि ईसा अपने शिष्य से प्रेम करता था, तो शिष्य ने भी ईसा से अवश्य प्रेम किया होगा। जोह्न को यदि ईसा के प्रति भक्ति न होती तो "आघात और प्रत्याघात बराबर और परस्पर विरोधी" होने वाले अनिवार्य नियम के अनुसार ईसा सदा उसे प्रेम नहीं कर सकता था। ईसा तत्वदर्शी था। वह जगत-पिता और 'सर्व'* से अभेद था। वह एक ऐसा मनुष्य था जिसने अपने मन बुद्धि और अहंकार को परमात्मा में लीन कर दिया था।
जोह्न, पीटर, पाल अथवा अन्य कोई शिष्य ईसा के साथ अपना सम्बन्ध जोड़, ईसा की भक्ति कर (क्योंकि भक्ति और प्रेम द्वारा ही सम्बन्ध होता है) एवं उसके साथ एकता का अनुभव करके स्वभावतः ही ईसा का ईशत्व भोगता है।
कल्पना करो, कि हमारे पास एक पदार्थ है, जिसमें बिजली भरी है। यदि इस विद्युन्मय पदार्थ के साथ कोई दूसरा पदार्थ लगा दिया जाय, तो इस विद्युन्मय (electrified) पदार्थ से विद्युत-हीन पदार्थ में सहज ही बिजली चली जायगा।
इसी प्रकार उस समय के शिष्यों को ईसा के द्वारा ईसा
*सर्वे समाप्नोऽपि तत्रैऽसि 'सर्वः'। [गीता अ० 11-40]
की प्रकृति प्राप्त होना अवश्य है। और इस प्रकार यदि ईसा अपना उद्धार करता है, तो उसकी भक्ति द्वारा दूसरे का उद्धार अवश्य होता है।
वेदान्त के अनुसार तब तक कोई प्राणी ईश्वरानुभव नहीं कर सकता, जब तक उसका अपना आप पूर्णतया विश्व-प्रेम में परिणित न हो, और जब तक समस्त विश्व को ही वह अपना शरीर न समझ ले।
तुम को याद होगा कि एक दिन "राम" ने अपने व्याख्यान में दो प्रकार के अध्यासों का वर्णन किया था-एक स्वरूपाध्यास और दूसरा संसर्गाध्यास।
स्वरूपाध्यास के कारण नाना व्यक्तित्व एवं उन में परस्पर भेदभाव की कल्पना उत्पन्न हो आती है, और इसी से वह अन्धा-पन व अन्धकार उत्पन्न हो आता है कि जिससे मनुष्य को प्रत्येक में ईश्वर देखना नहीं मिलता। यही उस मानसिक व्याप्ति का हेतु है जो आपको विश्व के सब पदार्थों में एकत्व का अनुभव करने नहीं देती। संसर्गाध्यास बाह्य-विषमता है, नाम रूप का भ्रम है।
इस प्रकार सांसारिक मनुष्य में इन दोनों प्रकार के अध्यासों को दूर करना होगा। सबसे पहिले तो समस्त वस्तुओं (व्यक्तियों) में एकता का अनुभव करना आवश्यक है। जिस मनुष्य को इन दोनों प्रकार के अध्यासों को जीतना व दूर करना होता है, उसे पहिले अपने को ही समस्त विश्व के प्रत्येक पदार्थ का आत्मा अनुभव करना होता है। वह अपनी आत्मा को ही जगत् के सारे मनुष्यवर्ग, सारे वनस्पतिवर्ग, समस्त बृक्ष, सरिता, कीट, पतंग, आदि की आत्मा समझता और अनुभव करता है। अनुभव की यह एक अवस्था है। ऐसे मनुष्य को आरंभिक अवस्था में अपने पुत्र कलत्र के साथ
एकता अनुभव करने से सहायता मिलती है। जब वह सारे संसार के साथ अपनी एकता (अभेदता) अनुभव करता है, तो यह अनुभव की पहिली अवस्था है। दूसरी अवस्था वह है जब कि सभी बाह्य नाम रूप और आकार अन्तर्धान हो जाते हैं, जहां यह माया समूल नष्ट होजाती है। और तब सारे संसार का, जो शरीर रूप था, बाध किया जाता है, और वह आत्मा में विलीन हो जाता है।
आरंभ में हम को समस्त विश्व अपना शरीर अनुभव करना होता है। तब जिस विश्व को अपना शरीर अनुभव किया होता है, उस विश्व का बाध किया जाता है, अर्थात् वह रद्द किया जाता है, और उस सत्य स्वरूप आत्मा में कि जो मेरा अपना आप है वह विलीन हो जाता है।
आत्मानुभवी मनुष्य पहिले समस्त जगत् बनता है। और तब जगत् का उद्धार करता है; इस प्रकार वह समस्त विश्व का उद्धारक (Saviour) बन जाता है। अतः तुम अपने उद्धारक आप हो, ऐसा वेदान्त का तात्पर्य है।
"ईसा द्वारा हम ईश्वरानुभव करते हैं" इस कथन का अर्थ यह है कि सर्व जगदात्मैक दृष्टि की जो अवस्था है, उस अवस्था द्वारा ही, उस 'ईसा' की अवस्था को पार करने पर ही तुम वर्णनातीत, अच्चर ब्रह्म में लीन हो सकते वा गोता लगा सकते हो। अतः जो शाश्वत है, जिस के वर्णन में वाचा कुण्ठित होती है, जो वाणी मात्र के परे है, उस तत्व के अनुभव के पूर्व, उस सत्यस्वरूप को प्राप्त करने से पहले-जहां नाम, रूप, भेद भाव का अस्तित्व नहीं, उस परमात्म-अवस्था में पहुंचने से पहले, तुमको वह अवस्था प्राप्त करना होगी, जहां अपना सत्य स्वरूप ही तुम को सब नाम रूपों में ओत प्रोत और व्याप्त दीखता है;
यही अवस्था 'ईसा' की अवस्था है। इस प्रकार ईसा की अवस्था को लांघ कर तुम ईश्वर तक पहुंच सकते हो; और यह अवस्था प्रत्येक के साथ क्रमशः ऐक्यबुद्धि करने से प्राप्त होती है। जिन पाठों के द्वारा इस की व्यावहारिक शिक्षा मिलती है, उन का आरंभ तब होता है, जब तुम अपनी माता पिता, पत्नी बालकों और स्नेहियों के साथ अपनी एकता अनुभव करने लगते हो, और फिर धीरे धीरे समस्त देश के साथ एवं समस्त जगत् तथा विश्व के साथ उत्तरोत्तर एकता अनुभव करते हो। यह बहुत कठिन काम ज्ञात होता है, पर वास्तव में यह बहुत कठिन नहीं है। आरंभ करना कठिन है, पर कुछ ही काल बाद प्रगति (progress) तीव्र होजाती है। जब एक वार कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के साथ अपनी अभेदता अनुभव कर लेता है, तथा दूसरे में मानो विलीन होजाता है, तब वह प्रत्येक के साथ अपनी एकता अनुभव करने लगता है। अनुभव से यहां स्पष्ट होता है कि प्रकृति के अटल नियमानुसार जगत में जो कुछ प्रीति है, वह हम को बलात्कार ऐसी स्थिति में लेजाती है कि जहां हमारा प्रेम-पात्र बाह्य जगत का विषय नहीं रहता, जहां हमारा प्रेम बाह्य रंग रूप आकृति वा लिंग चिन्हों पर नहीं रहता, वरन् जहां प्रेम अधिकाधिक अन्तरात्मा, सर्वाधार सत्ता पर ही होता है।
प्रत्येक मनुष्य इस कथन की सच्चाई के विषय में निज अनुभव से कुछ न कुछ कह सकता है। जैसे जैसे हम वयोवृद्ध होते जाते हैं, वैसे वैसे हम देखते हैं कि हमारा प्रेम-पात्र अधिकाधिक विशुद्ध होता जाता है-हमारी प्रीति का केन्द्र विशेष सरल, विशेष इन्द्रियातीत और अधिक सूक्ष्म होता जाता है।
क्या जगत के सब मनुष्यों को अपने जीवन में इस रहस्य का थोड़ा बहुत अनुभव नहीं हुआ है? एक समय आता है कि जन हम अपने प्रेम-पात्र के मुँह के काट (वज़ा क़ता) वा चेहरे के भद्दापन पर या त्वचा की झुर्रियों पर, तथा बाह्य चिन्हों व विकारों पर रंचक मात्र भी ध्यान नहीं देते। तब हम केवल अन्तरात्मा को, भीतरी प्रीति को, अन्तः हृदय को, वा भीतरी पवित्रता को तथा भीतरी प्रेम-पात्र को प्यार करते हैं! क्या इसको सबों ने देखा व अनुभव नहीं किया है? क्या सब ने यह नहीं देखा है कि प्रायः हम अपने प्रेम-पात्र के बाह्य दोषों, शारीरिक विकारों को देखते तक नहीं? हम केवल सौन्दर्य देखते हैं, कुरूपता की ओर से अन्धे हुए होते हैं। यदि उस प्रेम में, अथवा उस व्यक्ति में वा हमारे उस प्रेम-पात्र में, वास्तविक प्रीति होती है, तो हमारा हृदय द्रवित हो जाता है-उस की ओर आकर्षित हो जाता है। तदनन्तर ऐसा समय आता है जब हमारे प्रेम का केन्द्र, इन बाह्य एवं स्थूल रंग रूप, आकार और चिन्ह से अधिक सूक्ष्म अर्थात् दूर और विशेष विशुद्ध होता है। बस यहां पहुंचते ही हम एक सीढ़ी ऊपर आ जाते हैं। पहिले से ऊंचे उठ आते हैं। यहां तुम बाह्य चिन्हों और स्थूल शरीरों से उठ कर सूक्ष्म मनोवृत्तियों में पहुंच जाते हो।
अब इस से परे दूसरी और उच्चतर स्थिति है, जहां हमारे प्रेम का केन्द्र भीतरी भाव, मनोवृति वा चित्त (अन्तःकरण) की शुद्धि, अथवा अपने प्रेम-पात्र के दर्शन नहीं, बल्कि वहां हम परमात्मा या अन्तर्यामी को प्यार करते हैं, तथा अपने शुद्ध स्वरूप अन्तरात्मा का दर्शन करते हैं। बस एक बार जिस समय यह स्थिति प्राप्त हो जाती है, जिस समय जगत के सारे पदार्थ चित्र वा चिह्न मात्र बन जाते हैं; जिस समय
हम पदार्थों को पदार्थ भाव से नहीं देखते, बल्कि उनके पीछे उनके आधार रूप निर्विकार आत्मा को देखते हैं; जिस समय हमारी दृष्टि इस वा उस पदार्थ पर पात होते ही उसमें हमारा हृदय-नेत्र शुद्ध स्वरूप परमात्मा को देखता है; जिस समय ऐसी स्थिति प्राप्त होती है; तब समस्त विश्व के साथ एकता, अभेदता अनुभव करना मनुष्य के लिए सुगम हो जाता है। यही 'क्राइस्ट की स्थिति' अथवा ईसा-दशा है। इस क्राइस्ट की अवस्था में कुछ काल रहने के बाद दूसरी इससे भी उच्चतर स्थिति आती है। तब तुम परमात्मा में पूर्णतया लीन हो जाते हो। जब हम इस तरह समाधि, पूर्णतया एकता, निमग्नता, वा लय की अवस्था में होते हैं, तो वह परमात्म अवस्था है। इस को हम निर्वाण या समाधि अवस्था कहते हैं, ऐसी अवस्था में अन्तःकरण में न कोई स्फुरण होता है, न क्षोभ और न विरोध।
उस स्थिति में क्रमशः पहुंचने के लिए हम अपने सांसारिक कुटुम्बियों तथा संबन्धियों से किस प्रकार सहायता वा साहाय्य प्राप्त कर सकते हैं?
भारतवर्ष में ऐसे लोग हैं जो रोमनकैथोलिकों की तरह ईश्वरोपासना करते हैं, जो ईश्वर-पूजन प्रतिमाओं द्वारा करते हैं। ईश्वर, राम, वा कृष्ण की प्रतिमा को (अधिकतर) पूजते हैं। राम और कृष्ण भारत के ईसा मसीह हैं।
भारतवर्ष में एक बार एक वृद्धा स्त्री ने एक महात्मा के पास जाकर पूछा-"यदि उचित हो, तो मैं अपने गृहस्थ और कुटुम्ब को त्याग कर कृष्ण की जन्म भूमि वृन्दाबन में निवास करूं?" अपने कौटुम्बिक बन्धनों को छोड़ और प्रत्येक से अपना सम्बन्ध तोड़कर उस परम रमणीय नगर-हिन्दुस्तान के जरूसलम-वृन्दावन का सेवन करना, क्या उसके लिए
उचित था?
उस स्त्री के साथ उसका शिशु पौत्र था। महात्मा ने उत्तर दिया "ज़रा ध्यान दो, ज़रा बिचारो तो, इस छोटे शिशु के नेत्रों में से तुम्हारी ओर कौन देख रहा है? इस बालक के शरीर में कौनसी शक्ति, कौनसी चेतनता, तथा कौनसी प्रभुता है जो इसके रोम रोम से तुम्हारी ओर देख रही है?" स्त्री ने उत्तर दिया 'यह अवश्य ईश्वर ही होगा। इस प्यारे छोटे से शिशु के चित्त में लोभ या दुष्टता का लेश मात्र भी नहीं है। यह प्यारा शिशु बिलकुल निष्पाप और पवित्र है। जब यह रोता है, तो इसके रुदन में परमात्मा का स्वर होता है, और कुछ नहीं।" फिर महात्मा ने कहा-"जब तुम वृन्दावन जाओगी, तब भारत के उस जेरूसलम में तुम्हें कृष्ण की एक प्रतिमा से लगन लगानी होगी, भगवान् की उस प्रतिमा में तुम्हें भगवान् को पूजना होगा। जिस प्रतिमा का तुम्हें भारत के जेरूसलम रूपी वृन्दावन में दर्शन होगा, क्या इस बालक की देह उतनी ही अच्छी कृष्ण की मूर्ति नहीं है?" वृद्धा कुछ चकित होगई, और विचार तथा मनन करने के बाद वह इस परिणाम पर पहुंची कि "बिना किसी हानि के उस बालक को कृष्ण का अवतार मान कर मैं उसके शरीर द्वारा ईश्वर की पूजा कर सकती हूं, क्योंकि ईश्वर ही वह है, जो उस बालक के नेत्रों में से देखता है, ईश्वर ही वह है जो उस बालक को शक्ति वा बल देता है, ईश्वर ही वह है जो बालक के कान में से सुनता है, ईश्वर ही वह है जो बालक के केशों को बढ़ाता है, ईश्वर ही वह है जो उस बालक के शरीर के प्रत्येक रोम में से व्यापार करता है; यह बालक स्वयं प्रभु है।"
महात्मा के उपदेशानुसार वृद्धा को यह बालक
अपना पौत्र नहीं समझना चाहिये, किसी रीति से अपना सम्बन्धी नहीं बल्कि ईश्वर समझना चाहिये। और इस प्रकार उसके साथ सब पारिवारिक तथा सांसारिक सम्बन्ध तोड़ डालने चाहियें, केवल ईश्वराय वा ईश्वत्व का सम्बन्ध बनाए रखना चाहिये। यही त्याग की विधि है।
त्याग का अर्थ वैराग्य वा कापुरुष नहीं है। त्याग का अर्थ प्रत्येक वस्तु को पवित्र बनाना है। बालक-त्याग का अर्थ बालक वा पौत्र के साथ सभी सम्बन्धों का तोड़ना नहीं बल्कि उसे ईश्वर समझना है। प्रत्येक वस्तु में परमात्म-दर्शन करना ही वेदान्त के अनुसार त्याग है।
ईशावास्यमिदꣳ सर्वे यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मागृधः कस्यस्विद्धनम् ॥ 1॥ (ईशावास्योपनिषद् 1)
भवार्थः- जो कुछ दीखे जगत में, सब ईश्वर से ढाँप। करो चैन इस त्याग से, धन-लालच से कांप ॥ 1॥
वेदान्त तुम को पति, पत्नि, तथा अन्य सम्बन्धियों को त्यागने को कहता है। वेदान्त कहता है कि पत्नी से पत्नी का नाता तोड़ दो, उससे पत्नी भाव त्याग दो, किन्तु उस में अपना शुद्ध आत्मा वा परमात्मा देखो। शत्रुओं को शत्रु रूप से त्याग दो, उन में ईश्वर देखो; मित्रों को मित्र रूप से त्याग दो, और उन में ईश्वरत्व वा ब्रह्मत्व का अनुभव करो।
स्वार्थपूर्ण व्यक्तित्व के सभी बन्धनों का त्याग करो। प्रत्येक प्राणी व पदार्थ में ईश्वरत्व का अनुभव करो, सब में विभु का दर्शन करो। प्रत्येक हिन्दु दम्पति (स्त्री-पुरुष) को धर्म-शास्त्र यों ही रहने की आज्ञा देता है। धर्म-शास्त्र के नियमानुसार, जिनको "राम" अपने गृहस्थ-आश्रम में व्यवहार में लाता था, पत्नी नित्य प्रातःकाल सबेरे जागती
थी। और जव "राम" ध्यान में लीन होता, जब "राम" परमात्मा का अनुभव व साक्षात्कार करता, जब वह परमात्मा में निमग्न होता, वा जव वह शरीर और मन के परे होता, जब वह मधुर अमृतत्व—सुधा का पान करता होता, तव पत्नी निकट आती, और जिस प्रकार रोमन कैथोलिक अपनी मूर्तियों की पूजा करते हैं, उसी प्रकार देह विस्मरण कर वह पत्नी "राम" पर दृष्टि डालती। यहां जैसे "राम" अपने शरीर को भूल जाता है, इस भौतिकता के परे जा पहुंचता है, और ईश्वर में लीन हो जाता है, वैसे ही पत्नी "राम" में ईश्वर और उसकी विभूति का दर्शन करती, और कुछ नहीं। इस प्रकार "राम" के शरीर से कुछ दूर बैठकर वह "राम" के ललाट पर अपनी दृष्टि जमाती। अधिक उन्नत न होने के कारण वह "राम" के शरीर का ध्यान करती, और इस प्रकार 'ॐ' का उच्चारण करती हुई अपने ध्यान में "राम" की प्रतिमा को ऐसे ज़ोर से रखती कि अन्य सब विचार निर्मूल होजाते, और अपनी देह की सुध भी नितान्त वह भूल जाती। वह अपने को "राम" के शरीर में निमग्न वा परिणत हुई अनुभव करती, पर उसके आत्मा के विषय क्या ? उसे स्पष्ट ऐसा प्रतीत और अनुभव होता कि उस का आत्मा "राम" का आत्मा है। वह यही अनुभव करती कि "राम" समाधिस्थ और ब्रह्माकार वृत्ति में लीन नहीं वरन् मैं ही ब्रह्माकार वृत्ति में निमग्न हूं। "राम" का ध्यान उसका ध्यान होता, और वह समस्त विश्व के साथ तादात्म्य अनुभव करती; उस समय उसे ऐसा प्रतीत और अनुभव होता कि मैं ही सारे संसार की सार और आत्मा हूं। इस रीति से मानो वह "राम" की सहायक और "राम" उस का सहायक होता। (अब यदि आप पूछें कि) स्त्री किस प्रकार
सहायक हो सकती है ? जब स्त्री अपने पति को ईश्वर समभती है, जब ऐसे विचार और ऐसे विचारों के प्रवाह उसके पति को ईश्वर बनाने लगते हैं, तब क्या उसकी मानसिक शक्ति और सामर्थ्य जो इस ओर प्रवाहित हैं उस के पति को साक्षात् ईश्वर नहीं वनाएंगे ? क्या इस रीति से पतिको सहायता न मिलेगी कि वह अपने शुद्ध आत्मा को परमात्मा अनुभव कर सके ? अवश्य मिलेगी।
सभी ईसाई वैज्ञानिक लोग अपने अनुभव से जानते हैं कि जैसा हम चाहें, वैसा अनुभव हम किसी भी मनुष्य को करा सकते हैं।
कल्पना करो कि यहां एक स्त्री (पत्नी) है, जो सदा ऐसे दिव्य विचार भेजती रहती है, जो सदा ऐसा विचार करती है कि "मेरा पति परमेश्वर है।" उसके यह विचार, आत्म-साक्षात्कार करने में पति के सहायक होते हैं। इसी प्रकार जब पति परमात्मा के साथ अपनी एकता अनुभव कर लेता है, तो पत्नी को सहायता मिलती है। अहा! कैसा आध्यात्मिक विवाह है! अहा! कैसा उत्तम मिलाप है!! दोनों परस्पर सहायता करते और सहायता पाते हैं। ऐसे आध्यात्मिक मिलाप पर निर्बंधित विवाह और प्रीति जगत् में अत्यंत सुखमय होते हैं। मुख के वर्ण पर, मुख रेखा पर, आकार पर वा शारीरिक लावण्यता पर आसक्ति के कारण से होने वाले वैवाहिक सम्बन्ध अन्त में बड़े हानिकारक और बड़े दुःखभाज होते हैं। ऐसे विवाह हृदय-वेदना, शोक-चिन्ता और अन्ततः दुःख उतपन्न करते हैं।
जिस विवाह में शारीरिक सुन्दरता वा मुँह के रूप रंग की कोई गिनती नहीं, अपितु जो अन्तरात्मा को ही देखता
है, और जो केवल आध्यात्मिक मिलाप जन्य है, वही विवाह निरापद (आपद-भय मुक्त) और चिर-स्थाई होता है। केवल पैसे ही विवाह सुख एवं आनन्द देने वाले हो सकते हैं।
एक बार एक स्त्री ने महात्मा के पास जाकर पूछा:— "महाराज! कुछ मास हुए मेरा पति मर गया है। बतलाइये उसके उद्धार के लिए मैं क्या करूं?" एक दूसरे सज्जन ने आकर बोला कि "मेरा इकलौता पुत्र मर गया है। उसका वियोग असह्य है; और इसी लिए मैं आत्म-घात करने जा रहा हूं।" तीसरे ने कहा-"मेरी स्त्री मुझ से सदा के लिए विलुड़ गई है, अब मैं जीना व्यर्थ समझता हूं।" महात्मा ने इन सब को क्या उत्तर दिया?
वह स्त्री बहुत ही हताश थी और अपने पति का उद्धार करने के लिए भी अतीव उत्सुक थी। (अतः) महात्मा ने कहा, "तुम अपने पति का उद्धार कर सकती हो, तुम्हें हताश होने की आवश्यकता नहीं। तुम मेरे उपदेशानुसार चल सकती हो। प्रति दिन जब तुम्हारे हृदय में निराशा उतपन्न होने लगे, अथवा जिस समय तुमको अपने पति देव का ध्यान उतपन्न हो आवे, उसी समय तुम भट बैठ जाओ, अपनी आँखें वन्द करलो, और अपने मन में पति के शरीर की कल्पना करो। तुम जानती हो कि मनुष्य की प्रिय वस्तु उसके ध्यान में तुरन्त उपस्थित होआती है। जब वह चित्र वा उसका शरीर तुम्हारे मन के सामने आजावे, तब तुम ज़रा भी चिन्तित वा दुःखित न होना, ज़रा भी रोना धोना नहीं। रो रो कर आँसू वहाने से तुम्हारा पति पृथ्वी की ममता में पड़ जावेगा, (इस प्रकार) तुम उसे संसार के मोह-बन्धन में बान्ध दोगी, और तुम्हारा कृत्य नीच और बिल्कुल उल्टा हो जायगा। तुम्हें उसकी अवनति का प्रयत्न नहीं करना चाहिये। तुम
अपने पति के अन्य लोक का चिन्तन कर सकती हो; तुम उन्हें मृतक नहीं समझ सकती हो, क्योंकि नेत्र वन्द करने से तुम्हारे पति का चित्र तुम्हें स्पष्टतया दीखता है, मानो जीवित है। जब वह चित्र उपस्थित होजाय, तब बारंबार यही भावना करो, यही निश्चय करो, यही अनुभव करो कि "वह ईश्वर है।" उसको ऐसा कहो, समझाओ, उपदेश दो, बारंबार कहो, उसके प्रति यही विचार प्रवाहित करो, कि "तुम ईश्वर हो, प्रभू हो, जगदीश हो; तुम्हारे चित्र में, तुम्हारे शरीर में, तुम्हारी मूर्ति में यह परमात्मा ही मुझे भासित हो रहा है।"
"जिस प्रकार जब हम टेलीफोन यन्त्र के पास जाते हैं, और उससे कान लगाते हैं, तब हम कुछ सुनते हैं, उस समय हमें जो कुछ आवाज़ सुनाई देती है, वह हम जानते हैं कि उस लोहे के यन्त्र की नहीं वरन् उस दृश्य के पीछे वा यन्त्र की दूसरी ओर पर खड़े अपने मित्र की होती है। इसी प्रकार जब तुम अपने सामने अपने स्वर्गीय पति के चित्र को देखो, तो यह निश्चय करो कि उस चित्र के पीछे (अन्तर्गत) परमात्मा ही है। उसे सम्बोधन कर कहो, "तुम प्रभु हो, परमेश्वर हो।" इसी रीति से तुम अपने स्वर्गीय पति का उद्धार कर सकती हो।"
जब हम अपने परलोकगत सम्बन्धियों का उद्धार कर सकते हैं, उनकी उन्नति और सहायता कर सकते हैं, तो उसी तरीके से निस्सन्देह हम अपने जीवित मित्रों का भी उद्धार, उन्नति और सहायता कर सकते हैं।
जब पति पत्नी अपने जीवन को इस प्रकार व्यतीत करते हैं, तब उनका मिलाप (संयोग) केवल आध्यात्मिक उन्नति का साधन और एक दूसरे के सुख का कारण हो जाता है।
(कदाचित्) तुम कहो कि हर जगह ही पति अपनी स्त्री के सुख को बढ़ाना चाहता है; जिससे उसे सुख हो वह सब कुछ उसके लिए प्रस्तुत करना चाहता है; और लोग अज्ञान के कारण समझते हैं कि हमने ठीक राह पकड़ी है; वे समझते हैं कि विषय-तृष्णा को पूरी करना और इस प्रकार लोगों को सुखी बनाना ही उपयुक्त मार्ग है; पर ऐसी बात नहीं है। इन तरीक़ों से तुम अपने को और दूसरों को केवल नीचा गिराते हो। प्रकृति का नियम है कि जो मुझे सुखी करता है, वह तुम्हें अवश्य सुखी बनाएगा। जो मेरे लिए अच्छा है, वह तुम्हारे लिए भी अच्छा है। यदि मैं आगे बढ़ता हूं, तो तुम भी आगे बढ़ोगे ही, मेरा उत्कर्ष तुहारा उत्कर्ष है। बिना सारे संसार को बीमार डाले मैं स्वयं बीमार नहीं पड़ सकता। अपने शरीर को स्वस्थ रखने से मैं समस्त विश्व को स्वस्थ रखता हूं। आघात और प्रत्याघात बराबर और परस्पर विरोधी होते हैं।
Action and Reaction are equal and opposite.
यदि मैं तुमको वास्तव में सुखी रख रहा हूं, तो मुझे भी सुखी अवश्य होना चाहिए। किन्तु लोग समझते हैं कि किसी मनुष्य की रुचि के अनुसार कार्य्य करने से उसे सुख मिलता है। पर ऐसा नहीं है। उलटा इससे निराशा और घृणा उत्पन्न होती है।
ऐसे कामों से दोनों दुःख उठाते हैं; दोनों ही अपने को हतभाग्य, हताश और दुःखित समझते हैं। उन के हृदय में चिन्ता और भय भरे रहते हैं।
परस्पर सुखी बनाने के मार्ग की यह अनभिज्ञता वा अज्ञानता ही है जो असल में इन चिन्ताओं और दुःखों की जड़ है। यदि तुम एक दूसरे को सुखी करना चाहते हो, तो
तुम्हें अपने चुद्र स्वार्थी भाव को विशाल बनाना होगा। तुम्हें अपने मित्र के सच्चे भावों का अनुभव करना होगा। अपनी पत्नी को प्रचण्डवल अर्पित करना होगा, प्रचण्डवल उसमें अवश्य प्रतिविम्बित होना चाहिए। परस्पर एक दूसरे को तुम्हें ज्ञान देना होगा, इस प्रकार तुम अपने साथियों को सुखी बना सकोगे और अन्त में स्वयं भी सुखी वनोगे। यदि तुम सच्चे हितैषी हो, तो तुम उन्हें ऐसी वस्तु ज़रूर दो, जो सब सुख की असल जड़ है। और वे वस्तुएं ज्ञान और आध्यात्मिक स्वतन्त्रता हैं। इन वस्तुओं को अपने संगियों को दो। प्रत्येक पति का यह धर्म है कि वह अपनी पत्नी को शिक्षा दे। जो पति अपनी स्त्री का शिक्षक नहीं, वा जो पत्नी अपने पति के उन्नत और शिक्षित होने में कारण नहीं बनती, और जिससे पति आत्म-स्वतंत्रता एवं ज्ञान नहीं प्राप्त करता, वह पत्नी पत्नी होने के योग्य बिलकुल नहीं। ऐसी स्त्री पापिनी है। इसी तरह वह पति भी पापी है, ऐसा पापी कि जो अपनी स्त्री के लिए अपने घर को विश्व विद्यालय (शिक्षा का स्थान) नहीं बनाता। एक दूसरे को सुखी बनाने का वास्तव में यही मार्ग है।
ईसा (क्राइस्ट) के अपौरुषेय गर्भाधान का राम यों समाधान करता है:– ईसा की माता 'मेरी' बड़ी शुद्ध, पवित्र और ईश्वर-भक्त थी। वह एक ऐसी स्त्री थी जो कुछ हद तक साक्षात्कार कर चुकी थी, जो दिव्य-दृष्टि युक्त थी, वह परमात्मा से अभेद हुई २ थी। और ज़करिया नाम का मनुष्य (तत्पश्चात् जोसेफ, उसको कलंक से बचाने के लिए ज़करिया की जगह जाखड़ा हुआ, अथवा ज़करिया का नाम लेना यदि तुम्हें नापसन्द हो, तो हम जोज़फ ही कहेंगे, जोज़फ भी अति शुद्ध और पवित्र पुरुष था, वह भी सब में आत्म-
साक्षात्कार कर चुका था। उसने परमात्मा का अनुभव किया हुआ था। दोनों नवयुवक और पक्की आयु के थे। ऐसा हुआ कि जब मेरी (अर्थात् मेरी का शरीर) और उस का पति दोनों आत्म-निमग्न थे, जब दोनों पूर्ण समाहित चित्त थे, उसी समय मेरी ने गर्भ धारण किया, उसी समय गर्भवती होगई। पश्चात वह इस घटना को बिल्कुल ही भूल गई।
प्रायः ऐसा होता है कि लड़के शाम को जगाए जाते हैं, और उन को दूध या मिठाई आदि खाने को दी जाती है। पर दूसरे दिन उन से यदि पूछा जाय कि गत रात को जो दूध या मिठाई तुम्हें दी गई थी, वह तुम ने पाई या कि न पाई? तो वह प्रायः यही कहेगा "अो मैं ने कोई नहीं पाई, तुमने मुझे कोई ऐसी चीज नहीं दी, तुमने सब बहन को दिया होगा"। यह सत्य है कि लड़के ने रात्रि में दूध या मिठाई पाई, बच्चा दूध पान करते समय या मिठाई खाते समय ज्ञानातीत अवस्था (एक प्रकार की तुरिया अवस्था में) था, उसका दिमाग किसी दूसरी जगह था। जैसे नींद में चलने वाले मनुष्य रात्रि में चलते फिरते हैं और अजीब अजीब काम भी कर लेते हैं, पर जब इस के विषय प्रातःकाल उनसे पूछा जाता है, तो उन्हें रात की बातों का ध्यान ही नहीं रहता। वैसे ही ईसा के अपौरुषेय जन्म के विषय में राम का यह कथन है कि जब "जोजफ़" और 'मेरी' दोनों तुर्यावस्था में, आत्म-साक्षात्कार की दशा में निमग्न थे — नींद में चलने वालों की अवस्था में नहीं — तब मेरी ज़करिया या जोज़फ से गर्भवती हुई। वह ऐसी अवस्था थी कि जिस में इस चुद्र देह का भान नहीं रहता, कि जब तुम दिव्य शरीर में रहते हो। उसी स्थिति में वे दोनों हम-बिस्तर हुए
(संभोग किया), और मेरी को गर्भ धारण हुआ; पर जब बाद में उस से गर्भ का कारण पूछा गया, तब वह कुछ भी न कह सकी, और ईसाई लोग कहने लग गए कि उसे पवित्र-आत्मा (Holy Ghost) द्वारा गर्भादान हुआ, जिस का तात्पर्य्य यह है कि ईश्वर ज्ञान-संपन्न होकर, "पवित्र आत्मा से व्याप्त होकर, एवं ब्रह्माकार वृत्ति में लीन हो जाने पर" उनने गर्भ धारण किया। और इस प्रकार क्राइस्ट "पवित्र-आत्मा" (Holy Ghost) का पुत्र अभिहित हुआ। प्रकृति के नियम जैसे आज हैं, वैसे उस समय भी थे, पर तौ भी हम लोग कह सकते हैं कि ईसा 'पवित्र-आत्मा' (Holy ghost) का पुत्र है।
इसी से 'राम' कहता है कि इसी आचरण के अनुकुल सारे संसार को चलना चाहिये ताकि ईसामसीह के समान अन्य अनेक लोग उतपन्न हो सकें। यदि तुम मिल्टन शेक्सपीयर, क्राइस्ट ऐसे महा पुरुषों को उतपन्न करने की इच्छा रखते हो, यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारी सन्तान सारे संसार अथवा अपने परिवार की हित करने वाली हो, तो अपने अन्तः करण को शुद्ध करो, उस की अधोगति न होने दो। 'राम' तुम्हें अपने पुत्र कलत्र के साथ इस प्रकार का जीवन बिताने को कहता है कि जो तुमको चुद्र, स्वार्थी भावनाओं से पर रखे, जो जीवन तुम्हें बराबर ईश्वर में, भगवान् में, पवित्र आत्मा में लीन करे, सर्व के साथ तुम्हें एक करे। यदि पति पत्नी दोनों ऐसे उच्च विचार, ऐसी पुण्यमयी शक्ति और उच्च भावों से संपन्न होंगे, तो उन की सन्तान, ऐसे पिता माता की सन्तति भी क्राइस्ट (जैसी) होगी। यदि तुम चाहो, तो इस ज़माने में भी ईसा-मसीह पैदा हो सकते हैं।
गृह प्रीति की हद नहीं, वल्कि प्रीति का केन्द्र बनाना
चाहिये। लोग अपने घर को प्रीति की सीमा बना लेते हैं ताकि उनका प्रेम और प्रण्य उस मर्य्यादा के बाहर न जा सके, गृह और पुत्र कलत्र को प्रीति का केन्द्र बनाना चाहिये जिस से प्रेम की किरणें सव दिशाओं में छिटक सकें। तुम्हारा प्रेम वहीं सीमावद्ध नहीं होना चाहिए। तुम्हें अपनी पत्नी को अपने प्रेम और प्रीति की सीमा ही नहीं बना देना चाहिए। तुम अपने स्वार्थी विचारों द्वारा अपने को और निज पत्नी को—दोनों को-नीचे गिराते हो, और इस प्रकार स्वयं दोनों का विनाश करते हो। पत्नी तुम को प्रीति करना सिखलाती है, और उस प्रीति को शुद्ध करने से, उस प्रीति को सारे विश्व की प्रीति बना देने से, उस बाह्य रूप, रंग चित्र और आकार की प्रीति को परम तत्त्व वा परमात्मा की प्रीति बनादेने से, यदि तुम उस प्रीति के साथ प्रत्येक पदार्थ के निकट जाते हो, और उसी से तृण, पुष्प, नदी, पहाड़ी और खाइयों पर दृष्टि डालते हो, तब (समझ लो कि) तुम सारे संसार के साथ अभेद हो चुके।
पत्नी तुम्हें अपनी स्थिति समस्त जगत के साथ एक समान स्थापन करने को सिखाने के लिए है; जगत से तुम्हारा समान सम्बन्ध तोड़ने के लिए वह नहीं है। अब "राम" तुम्हें कुछ आध्यात्मिक नियमों को बतलाता है। यह आध्यात्मिक नियम इस संसार की सर्व प्रकार की प्रीतियों का शासन करते हैं। यदि राम उन्हें न भी बतलाए, तौ भी तुम उनका अनुभव कर रहे हो और सदा करते रहोगे, किन्तु कहदेने से तुम सावधान हो जाओगे। जैसे गाड़ीवान् को यह विदित न होने से कि आगे रास्ते में क्या है और गाड़ी रुकावट (गति कुंठन स्थान, Stumbling block) को टपती है, तो सारी गाड़ी हिल जाती है, और बड़ा धक्का
लगता है; पर यदि उसे सावधान करदो, यदि उसे आने वाली रोक की सूचना दे दो, तो वह सावधानी से उस गाड़ी को रोक से बचा ले जाता है। वैसे ही तुम्हारे सांसारिक व्यवहारों में भी अनेक विघ्न बाधाएं, अनेक आपदाएं, अनेक असफलताएं और मानसी व्यथाएं आती हैं। पर इन मर्म वेदनाओं, इन विपत्तियों, असफलताओं एवं निराशाओं की सम्भावना कब समझनी चाहिए? यह "राम" तुम्हें बताता है। और जब तुम यह जान लोगे तो फिर तुम्हें दुःख न होगा। उपाय बहुत सरल है, और जहां तक हो सकेगा तुम उन विपत्तियों से बचोगे। गणित-शास्त्र के नियम के समान यह नियम भी सत्य है। किसी भी भौतिक तथ्य के समान भी यह कानून सत्य है। "जब कभी कोई स्त्री या पुरुष किसी व्यक्ति, मूर्ति वा किसी भौतिक पदार्थ से प्रीति करने लगता है, तब कुछ समय तक तो उस जड़ पदार्थ का उपभोग उसे करने मिलता है, पर जैसे हां वह वस्तु उसके अन्तः करण में घर कर जाती है, जैसे ही उसका जीवन तक उस से व्याप्त (रंजित) होजाता है; वैसे ही-ठीक उसी समय—वह वस्तु वहां से हटा दी जाती है"। यही नियम (विधान) है। कोई इससे बच नहीं सकता। ऐसी कोई शक्ति कोई सत्ता नहीं, जो ऐसी घटना को रोक सके, वा उस का निवारण कर सके। प्राचीनतम काल से लेकर आज तक इस नियम का कभी व्यतिक्रम हुआ ही नहीं है।
"जहां किसी वस्तु के साथ तुमने चित्त जोड़ा, किसी नाम या व्यक्ति से ममता की, किसी महान पुरुष का आश्रय लिया, उस पर विश्वास किया, उन पर भरोसा कर अपना भार डाला, तो झट वह आधार स्तम्भ खींच लिया गया और तुम धम्म से नीचे जा गिरे"। तुम एक टेवुल के सहरे खड़े
हा, यदि उस टेवुल को खींच लिया जाय, तो तुम गिर पड़ते हो, तुम्हें चोट लगती है। यह क्या शिक्षा देता है ? यह हमें शिक्षा देता है कि इन स्थूल भौतिक पदार्थों के आश्रय हमें अपनी प्रीति नहीं वनाए रखना चाहिये। इन जड़ पदार्थों को यद्यपि अपनी प्रीति का पात्र तो नहीं बनाना चाहिये, किन्तु तौ भी जड़ पदर्थों के विना हमारे हृदय में प्रेम का संचार भी नहीं हो सकता। इन जड़ पदार्थों के ही द्वारा हम प्रीति करना सीखते हैं। पर जब एकबार प्रीति का पाठ पढ़ चुकते हैं, तब प्रकृति हम को यही उपदेश देती है कि यह प्रीति जड़ वस्तुओं में बान्ध कर नहीं रखी जा सकती। उस प्रीति का प्रसार होना चाहिये, उसे अन्तरात्मा तक पहुंचाना चाहिये। पत्नी के चरणों में बैठ कर जिस प्रीति की शिक्षा पाई है, उसे जो अन्तरात्मा को अर्पण नहीं करता, उस मनुष्य को धिक्कार है। यदि तुम ऐसा नहीं करते तो तुम नरक-गामी होगे, और तुम्हें दुःख मिलेगा। पति पत्नी दोनों को एक साथ ही उन्नति करनी चाहिये। और जबकि पत्नी हमें प्रीति करना सिखलाती है, तो जो प्रीति हम सीखते हैं, उस प्रीति को इस शरीर में ही स्थापित न कर देना चाहिये किन्तु समस्त विश्व को, प्रत्येक प्राणी को, अर्पित करना चाहिये।
सांसारिक सुख रूपी क्षेत्र में बोए हुए बीज में आध्यात्मिक उन्नति अंकुरित नहीं होती। इस लिए जब तुम्हारी प्रीति का बीज पति या पत्नी के पार्थिव क्षेत्र (शरीर) में आरोपित होता है, तब वह भौतिक शरीर में आरोपित प्रीति का बीज, मानो ज़मीन में डाल कर, मिट्टी से ढक दिया होता है; पर जब वह प्रीति रूपी बीज नष्ट होकर बाहर प्रस्फुटित होता है और खुली वायु (निर्गत आकाश) में सुफल फलता है, तभी वह प्रीति श्रेयस्कर होती है; अतः पति वा
पत्नी में वा अन्य किसी भौतिक पदार्थ में आरोपित प्रीति रूपी बीज को अवश्य नष्ट होना चाहिये, और तव खुली वायु में उगकर फलना चाहिये। (अतएव) सांसारिक पदार्थ निमित्त जितनी कुछ प्रीति है, उसके सम्बन्ध में सदा प्रत्यक्ष असफलता ही दीख पड़ेगी। जब वह (भौतिक पदार्थ में) बोया हुआ (प्रीति) बीज नष्ट होता है, प्रकृति का नियम है, कि वही (प्रेम) बीज तुम्हें एक न एक दिन आत्मानुभव अवश्य करा देता है। यह सच है कि जिसने कभी प्रीति ही नहीं की, वह ईश्वर को नहीं पा सकता।
साधारणतः कहा जाता है कि धर्म को सांसारिक प्रीति से कुछ सरोकार है नहीं। पर 'राम' कहता है कि सरोकार है। सांसारिक प्रीति का सदुपयोग तुम्हें ईश्वरानुभव कराता है। "अन्य (वाह्य) सुख तो (आत्मानुभव के मार्ग में जो दर्द वा पीड़ा मिलती है) उस पीड़ा के भी बराबर नहीं"। वस्तुतः वही शुद्ध प्रीति जो तुम्हें ईश्वरानुराग कराती है, वह शुद्ध प्रेम ईश्वर का ही पर्याय (Synonym) है।
वैवाहिक बन्धन को उच्च बनाना ही पति का उद्देश्य होना चाहिये, न कि द्रव्योपार्जन, धनसंचय और पारिवारिक सम्बन्ध का दुरुपयोग। जो पदार्थ वास्तव में सुख का साधन थे, वही दुःख देने का परिणाम बनाए जाते हैं। जो साधन मात्र है, उसे साध्य मत बनाओ। धन दौलत तो केवल शीत, उष्ण से बचाने, चुधा, तृषा को निवारण करने और निर्विघ्न एकान्त स्थल में हिफ़ाजत से रहने का साधन मात्र होना चाहिए। अब विचारो कि चुधा पिपासा दूर करने के लिए, एवं सर्दी न हो इस के वास्ते कपड़े लाने के लिए, कितने थोड़े द्रव्य की आवश्यकता है।
लोग कहते हैं, "हमें सर्दी पकड़ती है"। पर सर्दी असल में
आप को नहीं पकड़ती। आप ही सर्दी को पकड़ते हैं। रोग आप के पास नहीं आता। आप ही रोग के पीछे पड़ कर उसे जा पकड़ते हैं, यह कहना बिल्कुल ठीक है। सर्दी से बचने के लिये वस्त्र अवश्य पहिनना चाहिए, पर (यह स्मरण रहे कि) वस्त्र केवल शरीर-रक्षा के लिये और अपने आप को सर्दी से वचाने के लिए हों। (इस लिए) इस काम के वास्ते गाढ़ा और सस्ता वस्त्र भी हो सकता है, उस के वहुमूल्य होने की आवश्यकता नहीं। आधुनिक चमकीले और आलीशान मकानों के बदले हम छोटे छोटे घरों में रह सकते हैं, अन्य लोगों अथवा जंगली जानवरों के हमले से बचने के लिये हमें साफ सुथरे छोटे छोटे मकान ही काफी हैं। ऐसे सुन्दर मकानों की कोई आवश्यकता नहीं है।
लोगों ने अपने घरों की शोभा और सौन्दर्य को स्वयमेव अपने जीवन का एक उच्च उद्देश्य बना लिया है, दूसरों को कपड़ा पहनाने की सुन्दस्ता, खाने पीने की चीज़ों की जटिलता, यह स्वयं एक उद्देश्य और इष्ट मान लिया है, नहीं नहीं, उद्देश्य और इष्ट ही नहीं वल्कि यही साधन और साध्य मात्र समझ लिए हैं।
संसार के इतिहास में, हम कुछ लोगों को झोपड़ों में, छोटे छोटे मकानों में रहते पाते हैं। उन के कपड़े बहुत ही मामूली थे, और भोजन भी उन्हें मामूली मिलता था। पर तो भी वे लोग जगत्-विख्यात शूर वीर थे।
तुम प्लेटो के विषय में जानते हो, प्लेटो के फारसी नाम का अर्थ "पीपा वा पेटी में रहने वाला" है। प्लेटो का घर 'पीपा' वा 'पेटी' था और संसार से उपरान्त (अलग) होकर वह इसी मकान में जाकर रहता था।
ज़रा सोचो तो, जो लोग ऐसी दरिद्रता में रहते थे,
ऐसे सादे ढंग से रहते थे, उन्हों ने संसार के लिए इतना (उपकार) किया है।
पवन नदी के तट पर स्ट्रैवफोर्ड (Strafford) ग्राम में शेक्सपीयर का गृह कोई भव्य भवन नहीं है। पहिले वह बहुत निर्धन था, पर पीछे उसने धन इकट्ठा किया। जीवन की प्रथम अवस्था में वह नाटक के दर्शकों की देख रेख तथा उनके घोड़ों की ख़बरदारी किया करता था।
'निउटन' भी निर्धन मनुष्य था। पुस्तक ख़रीदने के लिए या किसी दरिद्र को कुछ देने के लिए जब उसके पास पैसे न होते, तो वह बहुत उदास हो जाता था; परन्तु किसी अन्य अवसर पर वह अपनी ग़रीबी से कभी शोकित नहीं होता था। ज़रा देखिये, जिन्हें सदा मोटा खाना और मोटा पहनना पड़ता था, उन्हों ने ही संसार के लिये इतना उपकार किया है। भारतवर्ष के हिन्दू लोग पहिले जंगली कन्द मूल पर ही गुज़ारा करते थे, पर इन्हीं लोगों ने जगत को सर्वश्रेष्ठ तत्वज्ञान, वेदान्त-मोक्ष और भक्ति का दर्शन शास्त्र प्रदान किया है।
अपने को श्रेष्ठ और सत्पुरुष बनाने का प्रयत्न करो। भव्य भवन और सुन्दर सदन बनाने में अपनी शक्ति मत खर्चो। अपने विचार नष्ट न करो। बहुतेरे गृह बड़े, ऊंचे, और आलीशान हैं, पर उन में रहने वाले मनुष्य बिल्कुल ही ठिगने और क्षुद्र हैं। भारत में अनेक विशाल कब्रें हैं, पर (जानते हो) उन के भीतर क्या है? केवल सड़ी लाशें, रींगने वाले कीड़े और सांप।
बड़े बड़े मकान बनाने और उन में चमकदार चीज़ों के सजाने में अपनी शक्ति का नाश कर अपने को, अपनी पत्नी और अपने मित्रों को, बड़ा बनाने का यत्न मत करो। यदि
तुम इस विचार को ग्रहण कर लोगे, इसे हृदयंगम् कर लोगे, इसे जान और समझ लोगे कि जीवन का एक मात्र आदर्श और उद्देश्य शक्ति का दुरुपयोग और धन का संचय करना नहीं है, वरन् आन्तरिक शक्तियों का विकास करना, ईश्वरत्व और मोक्ष प्राप्ति के लिए आत्म-शिक्षण करना है। यदि तुम इस का अनुभव करके इसी ओर अपनी सारी शक्तियों को लगाओगे, तो पारिवारिक बन्धन कभी तुम्हारे लिए विघ्न रूप न होंगे।
कुछ लोग कहते हैं, हम तो सादी रीति से रह सकते हैं, पर हमारे मेहमान भी तो हैं। यदि हम लोग कमण्डल आदि धारण करें तो वे क्या कहेंगे।
अरे मेरे प्यारे! तुम अपने लिए जीते हो, वा दूसरों के लिए? अपने लिए जीओ। तुम्हारे जीवन में दूसरे को दख़ल देने की आवश्यकता नहीं है। अपना भोजन करते समय तुम भोजन करते हो या वे? तुम अपना खाना आप पचाते हो बा तुम्हारे लिये वे पचाते हैं? देखते समय तुम्हारी अपनी आँखों के स्नायु तुम्हें सहायता देते हैं, या उन की आँखों के? अपने गुरुत्वाकर्षण का केन्द्र (Centre of Gravity) तुम आप बनो। स्वाश्रयी हो। ज़रा अपने भीतर के आधार वा अधिष्ठान को पा लो और मेहमानों के मत वा विचारों की परवाह मत करो। भोजनों और बिछावनों को अतिथि-सत्कार का मूल-मंत्र न बनाओ। लोग समझते हैं कि मेहमानों को स्वादिष्ट भोजन और सुन्दर पलंग नहीं देंगे, तो हम पूरे अतिथि-सेवी न होंगे। इस प्रकार घर का स्वामी इन चीज़ों का एक अनुबंध (appendage) मात्र रह जाता है। कृपा कर के अपने को द्रव्य का उपकरण (appendage) न बनाओ, द्रव्य को ही अपना उपकरण
बनाओ, अपनी शक्तियों का अनुभव करो।
ऐसा करो कि जब तुम्हारा मेहमान (अतिथि) तुम्हारे यहां से अपने घर को जाने लगे, तो वह स्वच्छ चित्त, उदित और समुन्नत होकर जाए। यह योजना करो कि जैसा वह अपने घर से आया है, उससे अधिक बुद्धिमान बन कर जाए। अपने स्वजनों के प्रति अपना यही कर्तव्य समझो। अपने गृह संसार को सुखी करने का यही मार्ग है। इसी तरीके से गृहस्थी अपने गृहस्थ को विघ्न के पहाड़ की जगह उन्नति का सोपान बना सकता है। यदि तुम्हारा अतिथि पहिले की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान होकर लौटता है, तो उस के खाने पीने की अधिक परवाह न करो। उसे इन से कुछ श्रेष्ठतर चीज़ दो; उसे ज्ञान और बुद्धि दो। उसे आप की प्रीति का आन्नद लूटने दो। याद रखो कि यदि मैं तुम्हें एक कौड़ी भी न दूं, कुछ भी शारीरिक सेवा न करूं, केवल प्यार से, सच्चे और साफ़ दिल से तुम्हारे प्रति प्रसन्नता-भरी हंसी (Smile) दूं, तो तुम्हारा प्रफुल्लित होना, समुन्नत होना और उछलना अनिवार्य है। इतने से ही तुम्हारी बड़ी सेवा हो जाती है। किसी मनुष्य को धन देना कुछ नहीं है, यह वैसा है कि पहिले पत्नी को धन देकर पीछे से त्याग देना। पत्नी को धन नहीं चाहिये, उसे प्रीति चाहिये। किसी मनुष्य को धन देकर तुम पातकी का सा आचरण करते हो। तुम उसे धोखा देकर भुलाया चाहते हो। उसे प्रेम और ज्ञान दो, उसे स्वच्छ चित्त और समुन्नत बनाओ। यह भारी अतिथि-सत्कार है, और यही तुम्हें करना चाहिये। ऐसी ही प्रीति तुम्हें अपनी स्त्री और बच्चों के साथ रखनी चाहिये।