श्री — मांस खाने की वेदान्तिक कल्पना।
प्रश्न—मांस खाने के विषय में (वेदान्त का मत) क्या है?
उत्तर—मांस के सम्बन्ध में लोग समझते हैं कि भारत के लोग पशुओं के प्रति दया-भाव के कारण मांस नहीं खाते थे। यह ठीक हो सकता है, क्योंकि कुछ दल (मत के लोग) ऐसे हैं कि जो इसी कारण से मांस खाने से परहेज़ करते हैं। किन्तु कम से कम वेदान्ती लोग इस लिये ऐसा नहीं करते।
वेदान्त इस भित्ती पर तुम से मांस-भक्षण से परहेज़ करने को नहीं कहता। कदापि नहीं, वेदान्ती लोग और साधारणतः स्वामी लोग मांस नहीं खाते, किन्तु उन में मांस न खाने का कारण पशुओं पर निर्दयता न करना नहीं है। यह युक्ति वा तर्क ठीक नहीं है।
वेदान्त के अनुसार दया मात्र दुर्बलता है। आप चाहे इस से चौंक पड़ें, पर बात है ऐसी ही। दया की इस पद्धति को जो दूसरों को प्रसन्न करने की इच्छा है, या यों कहिये, कि दूसरों की इच्छाओं और तरंगों की सेवा है, तत्वज्ञानी ऐसा ही समझते हैं। अपने सहचरों की यह अनुकूलता करना नर-नारियों के मिथ्याभिमान के सिवाय और कुछ नहीं है, प्रतिमापूजन और दुर्बलता का एक प्रकार है। यह दया या मिथ्याभिमान, दूसरों को प्रसन्न करने की यह इच्छा, क्या समाज की प्रशंसा की बात है? नहीं। ये सब अज्ञान के
गुण हैं, और कुछ नहीं।
कितने पाप और भूलें करुणा के नाम में की जाती हैं? संगति में समानशीलता (Congeniality) की इच्छा से कितनी भूलें हुआ करती हैं?
एक मनुष्य की कुछ ऐसे नवयुवकों की संगति होगई, कि जो खाना, पीना, और मौज उड़ाना पसन्द करते हैं।
अच्छा, नौजवानों की टोली में से एक कहता है कि मद्य पी जाय। दूसरे साथी राज़ी हो जाते हैं, और यह नया (अजनवी) आदमी अच्छा साथी (संगी) होने की इच्छा का शिकार होता है, और केवल उन्हें (अपने साथियों को) खुश करने के लिए शराब पीना शुरू करता है। उसकी अपनी इच्छा मद्य-पान की नहीं है, किन्तु अपने सहचरों (संगियों) को खुश करने के लिए वह उनका अनुकरण करता है। उस में दूसरों को प्रसन्न करने की अभिलाषा है, और यह इच्छा ही उसे शराब पिलाती है। दूसरी बार यही सजन वैसी ही संगति में पड़ जाता है, और दूसरों को केवल प्रसन्न करने की इच्छा से शराब पीने को फिर प्रलोभित होता है। और समय समय पर ऐसा ही करते करते एक वह समय आजाता है कि जब मद्यपान के व्यसन का तुच्छ दास बन जाता है।
इसी तरह, केवल दूसरों को प्रसन्न करने के अभिप्राय से नारियां भी वह काम करती हैं जो धीरे धीरे उन्हें किन्हीं दुर्व्यसनों की दासी बना देता है। इस लिए वेदान्त कहता है कि दूसरों को प्रसन्न करने की यह इच्छा वास्तव में अज्ञान, दुर्बलता और मिथ्याभिमान के योग के सिवाय और कुछ नहीं है। दूसरों को प्रसन्न करने की नियत (उद्देश्य) से कभी कुछ मत करो। जो 'नहीं' कह सकता है, वह वीर है। "नहीं"
कहने की तुम्हारी सामर्थ्य से तुम्हारा चरित्र-बल और बहादुरी प्रगट होती है।
अब दया के सम्बन्ध में लीजिये। केवल यह समझते हुए कि दूसरों के भावों का उन्हें आदर करना चाहिए, कितने लोग अपने को नरक में रखते हैं? राम जो कह रहा है, उसे आप चाहे दारुण वा घोर पापिष्ठ कानून कह लें वा मानलें, किन्तु यह वह कानून है जिसका गुण आप एक दिन अनुभव करेंगे।
ज़रा ख़याल तो कीजिए कि इस संसार में कितने लोग केवल इसी लिए नरक-भोग कर रहे हैं कि वे दयावान हैं; सम्बन्धियों या सुहृदजनों के विरुद्ध होने के कारण अथवा किसी मनुष्य का हृदय टूट जाने के भय से वे सत्य का अनुसरण करना या सत्य की आज्ञानुसार बर्ताव करना निष्ठुरता वा निर्दयता समझते हैं।
वेदान्त कहता है, यदि तुम सत्य पर इसी लिए आपत्ति करते हो कि उससे किसी का दिल टूट जायगा, तो सत्य की हत्या होने की अपेक्षा किसी व्यक्ति की मृत्यु बेहतर है। वेदान्त कहता है, "इस या उस व्यक्ति के भावों की अपेक्षा सत्य का अधिक आदर करो", क्योंकि सत्य का आदर करना वास्तव में मित्र की क़दर करना है। उसके मिथ्याभिमान या इच्छाओं का जितना ही अधिक आदर या ध्यान तुम करोगे, उतनी ही अधिक चेष्टा तुम कर रहे हो उसके सच्चे आत्मा के वध की, जो "सत्य" स्वरूप है। "उसके बाह्य शरीर की अपेक्षा "सत्य" का अधिक आदर करो"।
पुनः, कितने लोग ऐसे हैं जो आत्म-सम्मान की इस कल्पना के कारण अपने लिए नरक की सृष्टि रच रहे हैं? कैसा घोर अनर्थ समझा जाता है। "आत्म-सम्मान" से लोग
इस तुच्छ शरीर का, इस क्षुद्र व्यक्तित्व का, "आत्म-सम्मान" समझते हैं।
माताओं, बहनों, पिताओं, भाइयों और बच्चों के रूप में परमात्मा! अरे परमेश्वर! तू देखले कि आत्म-सम्मान का अर्थ इन तुच्छ शरीरों या व्यक्तित्व का सम्मान नहीं है, समझले कि आत्म-सम्मान का अर्थ है "सत्य" का सम्मान, सच्चे स्वरूप (आत्मा) का सम्मान। जिस प्रकार के "आत्म-सम्मान" को तुम उत्तेजन दे रहे हो, उससे "आत्म-सम्मान" की ओट में तुम अपने सच्चे "आत्मा" का अपमान करते हो।
जब तुम ईश्वरानुभव से परिपूर्ण हो जाते हो, तब तुम अपने आत्मा (स्वरूप) का सम्मान करते हो; जव तुम अन्तर्गत ईश्वर के ध्यान से परिपूर्ण होते हो, तब तुम आत्म सम्मान से परिपूर्ण हो। देह की पूजा के द्वारा तुम आत्म-हत्या कर रहे हो, तुम अपने लिए गढ़ा खोद रहे हो।
मांस के विषय में वेदान्त कहता है, "अपने शरीरों से लग्न न लगाओ, अपने शरीर के मरने या जीने की चिन्ता न करो, तुम्हारे शरीर की लोग पूजा करते हैं या उस पर ढेले मारते हैं, इसकी परवाह न करो। इससे ऊपर उठो"।
एक मनुष्य इस शरीर को वस्त्र पहराता है और दूसरा उन्हें फाड़ डालता है, इसकी कोई परवाह (फिक्र) न होनी चाहिये।
"जब कि स्तुतिकर्ता और स्तुत्य, या निंदक और निंद्य एक ही (अभिन्न) हैं, तो न निन्दा है न स्तुति"।
इस दशा में, यदि तुम अपने सच्चे स्वरूप (आत्मा) का अनुभव करो, यदि इस क्षुद्र शरीर का ज्ञान तुम्हारे लिए मिथ्या होजाय, तो जहां तक तुम्हारा सम्बन्ध है, दूसरों के
बाहरी मांस और खून का आदर गायब होजायगा।
आज राम तुम्हारे कुछ अतिप्रिय अन्ध-विश्वासों को चकनाचूर करदेगा।
वेदान्त कहता है, 'यह कानून है:—"दूसरी मूर्तियों को तुम उसी अंश तक सच्ची समझ सकते हो जिस अंश तक तुम अपनी देह रूपी प्रतिमा को असली समझते हो"। यह नियम है। दूसरों के शरीर या व्यक्तित्व को आप ठीक उसी मात्रा में असली समझ या ग्रहण कर सकते हो जिस मात्रा में तुम अपने व्यक्तित्व या शरीर को असली समझते हो। यह कानून (नियम) है।
जब तुम व्यक्ति और देह से ऊपर उठोगे, तब दूसरों के शरीर या व्यक्तित्व का भाव तुम्हारे लिए मिट जायगा, वे आत्मा-मय और अति सूक्ष्म बन जावेंगे, वे पहल के से स्थूल न रह जायेंगे। इस दशा में, जिस मनुष्य ने 'सत्य' का अनुभव कर लिया है, उसके लिए दूसरी बात यह है कि चाहे कोटियों सूर्य और नक्षत्र शून्यता में फैंक दिये जांय, पर उसकी वलाय से। उसके लिए बकरों, भेड़ियों या बैलों के मरने से क्या आता-जाता है। कुछ नहीं, कुछ नहीं, उसके लिए इससे कोई भेद नहीं पड़ता, वह इससे ऊपर है।
दुनिया के अत्यन्त विकराल युद्ध में कृष्ण अर्जुन के सारथी थे। वहां अर्जुन विषाद तथा अवसाद को प्राप्त हुआ। दया और करुणा की वृत्ति ने उसे विह्वल कर दिया। तब तो यह वीर (अर्जुन) कांपने और थर्राने लगा; दया के विचार ने उसे दबा लिया। भगवान के अवतार कृष्ण ने, दुनिया भर के सर्वश्रेष्ठ महापुरुष कृष्ण ने, केवल भारत के नहीं, किन्तु अखिल विश्व के ईसू मसीह कृष्ण ने, तब तो अर्जुन से कहा, "तुम यह शरीर नहीं हो, यह व्यक्ति तुम नहीं हो,
सच्चा कर्ता परमेश्वर है"। कृष्ण ने उससे कहा "तुम्हारे शरीर के द्वारा परमात्मा काम कर रहा है"। कृष्ण ने उसे उपदेश देकर उसमें परमेश्वरानुभव जाग्रत कर दिया, उससे साफ साफ कह दिया कि "असलियत में वह क्या है", उसे भय से निकाल लिया, उसे चिन्ता और दुर्बलता से छुटा दिया। उन्हों ने उससे कहा कि तुम्हारा वास्तविक स्वरूप (आत्मा) अविनाशी है; कल, आज, और सदा एकसां है, उसमें विकार हो ही नहीं सकता, वह निर्विकार और निर्विकल्प है। और उन्हों ने उससे कहा, "अर्जुन तू मर नहीं सकता। इन देहों में से किसी को भी हटा दे, और वे स्वयं कमी नहीं मरते। तुम कभी नहीं मरते। और यदि तुम्हें पूर्ण सत्य का बोध भी नहीं तथा आवा-गमन की चार दीवारों में क़ैद हो, तब भी अनुभव करो कि अपना या उनका व्यक्तित्व सत्य नहीं है, सच्चे स्वरूप (आत्मा) का अनुभव करो, जो परमेश्वर है, और जो अमर है। तुम कांपते और थर्राते क्यों हो? अपने उपस्थित कर्तव्य को देखो। यदि इस समय तुम्हारा सांसारिक धर्म इन सब मनुष्यों का बध करना है, तो इन्हें मार डालो"। भगवान् कृष्ण उससे कहते हैं, "मैं देवों का 'परम देव' हूँ, प्रकाशों का 'प्रकाश' हूँ, और क्या प्रति क्षण मैं कोटियों पत्तियों तथा पशुओं का नाश नहीं कर रहा हूँ? उन्हें शून्यता में नहीं फेंक रहा हूँ? मैं—'प्रकृति', परमेश्वर, जगन्नियन्ता—सदा ये काम कर रहा हूँ, फिर भी मैं सदा निर्लिप्त और निर्मल हूँ। ईश्वर नाश करता है तो क्या ईश्वर दोषी है? नहीं, ईश्वर फिर भी शुद्ध है"। फिर भगवान् कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, "यदि तुम सत्य का अनुभव करो, यदि तुम परमेश्वर से अभेद हो जाओ, यदि तुम अपने शुद्ध स्वरूप का अनुभव
करो, तो तुम्हारी देह परमात्मा का यंत्र मात्र बन जाय। यदि न्याय, धर्म, सत्य और अधिकार के लिए तुम्हारा शरीर लाखों और करोड़ों का संहार भी करदे, तो भी तुम शुद्ध, अविकल, और निष्कलंक होते हो"।
यह सत्य लोगों को अनुभव करना होगा। किन्तु तुम इसका अनुभव करो या न करो, राम को सत्य कहने से रुकना उचित नहीं।
वह वेदान्त था जिसने नर संहार करने में, बल्कि अर्जुन के अपने बहुत नगीची और प्रियतम संबन्धियों का नाश करने में कोई आगा पीछा नहीं किया। जो अपने गुरु, चचा, भाई बन्धु थे, उन सब का अर्जुन ने वध करना था। वेदान्त कहता है इन के वध करने से अर्जुन दूषित नहीं हुआ। तो फिर बकरों, या भेड़ियों, बैलों या, कोई भी पशुओं को मारने में वेदान्त कैसे संकोच कर सकता है? पर फिर भी वेदान्त तुम से मांस से परहेज़ करने को कहता है, पर बिल्कुल अन्य कारणों से।
मांसाहार तुम्हें उस दशा या अवस्था में पहुंचा देता है, जिस में तुम चित्त को आसानी से एकाग्र नहीं कर सकते। यदि मांस भक्षण तुम छोड़ नहीं सकते, यदि इस आदत को तुम जीत नहीं सकते, तो वेदान्त कहता है, "खाओ, मत छोड़ो"। विभिन्न खाद्य पदार्थ भिन्न भिन्न असर पैदा करते हैं। मद्य पीने से मनुष्य को नशा होता है। अफीम खाई जाने पर क्या एक खास तरह का असर नहीं पैदा होता? एक मनुष्य संखिया खाता है और उसका एक विशेष प्रभाव होता है। इसी तरह भोजन विशेष भी अपना खास असर पैदा करता है। और मांस भी ऐसा ही करता है। मांस शरीर पर जो असर डालता है, उस असर की धर्म के विद्यार्थियों
को आवश्यकता नहीं है।
यदि तुम सैनिक हो, अथवा उद्योग साध्य कृत्यों के पुरुष हो, तो वेदान्त कहता है तुम्हें मांस खाना चाहिए, क्योंकि तुम्हें उसकी ज़रूरत है, और तुम्हें केवल शाक आदि भोजन पर न बसर करना चाहिए। दूसरी वृत्तियों के लोगों के बारे में, राम कहता है, अपनी अपनी प्रकृतियों पर उसे आज़मा कर देखो। कुछ लोगों के लिए वह हितकारी है, और कुछ के लिए हानिकर। प्रकृति की योजना (plan) है कि योग्यतम व्यक्ति अवश्य जीयेगा। यहां हम हैल (whales तिमिंगिल) मछलियों को बढ़ते देखते हैं, वे जीती बचती हैं; और उन्हें बचाने के लिए प्रकृति चाहती है कि वे छोटी मछलियों पर निर्वाह करें। हज़ारों छोटी मछलियां अवश्य नष्ट हो जांय, पर बड़ी मछली जीती रहे। यह प्रकृति की व्यवस्था है। इसी तरह हम खनिज संसार में देखते हैं कि मट्टी, भूमि, नष्ट होजाती है और उद्भिद संसार अर्थात् वनस्पतिवर्ग की रचा होती है। उद्भिजों की खाद्य वस्तु मट्टी है। फिर पशुओं की रचा के लिए उद्भिज पदार्थों का नष्ट होना पड़ता है, काम आना पड़ता है। पशु उद्भिज पदार्थों को खा कर जीयें, यह प्रकृति की योजना है। यह प्रकृति की व्यवस्था है कि मनुष्य (सर्वोच्च वर्ग) पशुओं पर गुज़ारा करे और वे उसका काम दें, यही प्रकृति की योजना है। राम का इससे अभिप्राय पशुओं को खाना नहीं, केवल उन्हें काम में लाना है। पशुओं को मनुष्य की सेवा करनी होगी। तत्पश्चात् दुनिया के साधारण मनुष्य में भी हम देखते हैं कि उच्चतर लोग स्वभावतः बढ़ते चले जाते हैं। जब अतिव्यापी समर, संक्षोभ (राज द्रोह) और महामारियां आती हैं, तब निम्नतर और दुर्बलतर प्रकृतिवाले उच्चतरों के लिए मर जाते हैं। यह
प्रकृति की योजना है। यह कानून विश्व का शासन करता है।
इस लिए 'राम' कहता है, यदि मांस खा कर तुम विश्व-कार्य को अधिक लाभ पहुँचा सकते हो, तो मांस खाओ; यदि मांस से विरत रह कर तुम उच्चतर सत्य की वृद्धि कर सकते हो, तो उससे परहेज रक्खो।
हरेक व्यक्ति को अपने परिच्छिन्न-आत्मा को परमेश्वर का स्वरूप समझना चाहिए। वेदान्त के अनुसार, सब को सब काम निःस्वार्थ और अकर्तृम भाव से करना चाहिए। तुम्हें सब काम इस तरह पर करना चाहिए कि मानो तुम नहीं कर रहे, अर्थात् इस तुच्छ अहंकार के साथ अभिलाषाओं और अहंकार की दृष्टि से कुछ नहीं कर रहे। अभिलाषा और अहंभाव की यह दृष्टि तुम्हें त्याग देनी चाहिए। जब आपका शरीर संसार में प्रकृति की तरह काम करता है, 'सर्व' के लिए काम वितरण करता, काम का निरूपण करता, और काम को समाप्त करता है, बिना किसी स्वार्थमय अहंभावपूर्ण इच्छा के, बल्कि केवल 'अखिल' के लिए, समग्र के लिए, काम करता है। और यदि अखिल विश्व की उद्देश्य-वृद्धि निमित्त इस शरीर-यंत्र के लिए मांस खाना उतना ही आवश्यक हो, जितना एक पुतली घर में कुछ पहियों के लिए तेल से चिकनाया जाना; यदि तुम्हारे शरीर के लिए मांसाहार से आँगा जाना उतना ही ज़रूरी है, जितना उन कुछ पहियों का तेल से आँगा जाना; तब तुम मांस खाने से न भिक्को। किन्तु जब केवल जुबान के मज़े के लिए तुम मांस खाते हो, तब वह पाप हो जाता है। यदि अपनी इच्छाओं की तृप्ति के विचार से तुम मांस-भक्षण करते हो, तो वह और सब अन्य पापकर्मों के समान पाप
हो जायगा। तब वह पाप होजाता है।
भारत में ऐसे लोग हैं जो रास्ते से गुज़रते हुए दुकानों में पशु के मृतक शरीर को लटकता देखकर मूर्छित होजाते हैं। खाना तो दूर रहा, वे उसे देख भी नहीं सकते।
अपने स्वार्थी ज़ायकों की तृप्ति के लिए जब तुम मांस खाते हो, तब मांस खाना पाप होजाता है, किन्तु यदि तुम उसे दवा की तरह व्यवहार करते हो, यदि तुम केवल उपयोगी कार्य करने और अपने शरीर को मानव-जाति का हित करने की योग्यतम अवस्था में रखने के लिए उसे ग्रहण करते हो, तो मांस-भक्षण कुछ भी पाप नहीं है।
लोगों का मुख्य अभिप्राय स्वाद होता है। यदि कोई चीज़ स्वादिष्ट है, और सत्य के पत्त को भी प्रबल करने में सहायक होती है, तो उसे ग्रहण कर लो। किन्तु केवल मधुरता के लिए किसी चीज़ को ग्रहण करने से काम नहीं चलेगा। सामान्यतः सुस्वादु चीज़ें उपयोगी भी होती हैं, किन्तु सदा ऐसा नहीं होता।
अब एक दूसरा प्रश्न उठता है। कितना प्रायः धर्म-ग्रन्थों का विपरीतार्थ ग्रहण किया जाता है, कितनी प्रायः पुस्तकों की अनर्गल व्याख्या की जाती है? समाज के लिए यह बड़ी भारी व्याधि है—धर्मग्रन्थों का यह अनर्थ ग्रहण किया जाना और नाम मात्र पवित्र धर्मग्रन्थों वा पुस्तकों का दुरुपयोग।
कहा जाता है कि मिल्टन (कृत पुस्तक) को पढ़ने के लिए दूसरे मिल्टन की ही ज़रूरत है। बहुत ठीक है। इसी तरह एक सिद्ध को भी समझने के लिए दूसरे सिद्ध की ज़रूरत है। और इस्यूमसीह को समझने के लिए तुम्हें इस्यू-मसीह हो जाना चाहिए। वेदों को समझने के लिए तुम्हें वेद बनना चाहिए। वेदान्ती लेखकों ने, जिनके लेखों का तो
उपयोग किया जाता है, पर जिनके नाम नहीं लिए जाते, इस कल्पना को बड़ी उत्तमता से लिखा है। इन लोगों ने इस दर्जे तक अनुभव किया कि पाठक का शरीर मानो उन्हीं का शरीर है। वेदों में हमें ऐसे वाक्य मिलते हैं, "ऐ लोगों! वेदों से ऊपर उठो, शिन्नाओं का उपयोग करो, और उनसे लाभ उठाओ"। "देवताओं और देवदूतों (फरिश्तों) से ऊपर उठो, देखो तुम क्या हो। तुम सब कुछ हो"। यही हज़रत ईसा कहते हैं। इंजील से हम ऐसे वाक्य चुन सकते हैं, जिनका अर्थ इस प्रकार का है। "स्वर्ग का साम्राज्य तुम्हारे भीतर है"। लोग इसका बिलकुल ग़लत इस्तेमाल करते हैं। वे अर्थ का अनर्थ करते हैं। यह बात राम को एक कहानी की याद दिलाती है।
एक बार एक गुरू बहुत थक कर एक पलंग पर पड़ रहा और अपने चेले से कहा कि अपने पैरों से लताड़ दो, अर्थात् मेरी देह को दाब दो। भारत में इस तरह से देह दबवाने की चाल बहुत अधिक है। इस लिए गुरू ने लड़के से अपनी देह दाब देने को कहा, किन्तु लड़का बोलाः-"नहीं, नहीं, गुरुदेव! मैं ऐसा कभी न करूँगा। तुम्हारा शरीर अति पवित्र है, तुम्हारा व्यक्तित्व अत्यन्त पूत है। तुम्हारी देह पर अपने पैर मैं नहीं रख सकता, यह तो अधर्म होगा। मैं ऐसा घोर पाप न करूँगा। मैं आप के लिए सब कुछ कर सकता हूँ, मैं आपके लिए अपनी जान तक दे सकता हूँ, किन्तु आपकी देह तो पैरों से न रौंदूँगा"। गुरु ने कहा, "ऐ बेटे! आ, मैं बहुत थका हूँ, आ, आ, और मेरी देह दाब दे"। लड़का रोने लगा, परन्तु यह अधर्म करने को न राज़ी किया जासका। गुरू ने कहा "ऐ मूर्ख लड़के! तुम मेरे निचले अंगों को पैरों से नहीं रौंदना चाहते, तुम मेरे शरीर का अनादर नहीं करना
चाहते, किन्तु तुम मेरे पवित्र ओठों को कुचलते हो, तुम मेरे पवित्र चेहरे को रौंदते हो। इनमें अधिक अधर्म क्या है? गुरू की आज्ञा का उल्लंघन अधिक पापमय है, या उसकी देह दावना?"
ईसा या मोहम्मद के पवित्र ग्रन्थों, अथवा वेदों को तो बात की बात में लोग कुचल डालते हैं, किन्तु इस रक्त और मांस को लोग पूज्य और पवित्र समझते हैं, उसी रक्त और मांस को जिसे खाने को लोगों से ईसा ने कहा था। क्या ईसा ने अन्तिम-भोज में अपना मांस खाने और पीने को लोगों से नहीं कहा था? जब रोटी तोड़ी गई थी, उसने कहा "यह मेरा मांस है, यह मेरा रुधिर है"। सभी सिद्ध पुरुष यही समझते हैं। सब व्यक्तियों में, सब देहों में, वे परमेश्वर को देखते हैं, और उन पर प्रभुता पाने की इच्छा करते हैं। वे (सिद्ध) उनके (देहधारियों के) शरीरों से ऊपर उठने को कहते हैं, वे उनसे अपने शरीर कुचलने को कहते हैं, किन्तु तुम उनके शरीर न दाबोगे, चाहे उनके पवित्र सम्वाद भले ही कुचल डालो।
व्यक्तित्व से ऊपर उठो, भीतर के परमेश्वर को ढूँढो। यदि ईसा कभी इस संसार में रहा था, तो वह तुम्हारे शरीरों में रहता है। ईसा को अपने धर्म का उद्गम-बिन्दु (Stand point) बनाओ, उसे अपनी अग्र गति का प्रस्थान बिन्दु (Stand point) बनाओ, उसे अपनी सीमान्तरेखा बनाओ, और उसे अपने इर्द-गिर्द कएटक न होने दो। उसे अपने धर्म का, अपनी उन्नति का, उद्गम स्थान होने दो। खुद ईसा बनो, और ईसा का अर्थ समझो।
अच्छा, आज कल क्या हो रहा है? जो लोग इस तुच्छ मिथ्या, शैतानी अहंकार (अहंभाव) से छुटकारा नहीं पाना
चाहते, वे ईसा को पाञ्चभौतिक बनाना चाहते हैं, और वे परमेश्वर को घूँघट की ओट में भी रखना चाहते हैं। वे ईश्वर को साकार और वाह्य वस्तु ही बनाये रखना चाहते हैं। अपने को उठा कर ईश्वर बनाने के बदले वे ईश्वर को नीचे उतार कर अपने बराबर करना चाहते हैं। इंजील में दो हासजनक शब्दों से इसका दृष्टान्त दिया गया है, अर्थात् "परमेश्वर की आत्मा जल पर बहुत काल तक चिन्ताकुल रही"।
हिन्दुस्तान में एक लड़का था, किसी कलवार (मद्य विक्रेता) का पुत्र था। वह स्कूल में भर्ती किया गया और अंग्रेज़ी पढ़ने लगा।
भारतवर्ष में, खास कर ईसाई प्रचारकों के स्कूलों (Missionary Schools) में पहले इंजील पढ़ाई जाती है। अंग्रेज़ी पाठ का सम्बन्ध इंजील से था। जब लड़का इस वाक्य पर पहुँचा, "परमेश्वरकी आत्मा जल पर बहुत काल तक चिन्ताकुल रही", तब वह बहुत घबराया। लड़का "स्पिरिट" (Spirit, सार, भूत, शराब, आदि) शब्द जानता था, और वह "ब्रूडिड" (brooded, बहुत काल तक चिन्ताकुल रही, जन्म दिया) शब्द तथा "वाटर (जल)" शब्द भी जानता था, किन्तु वह God (ईश्वर) शब्द नहीं जानता था। और उसने कहा "गाड (ईश्वर) की आत्मा ने जन्म दिया (brood ब्रूड का अर्थ जन्म देना या अंडे सेना भी है)"। क्या "गाड" का अर्थ जौ है, या गल्ला अथवा अंगूर? मैं जानता हूं कि जौ और गल्ले से या अंगूर इत्यादि से शराब निकलती है। और उसने सोचा कि यह विलक्षण प्रकार की मदिरा थी जो समुद्र में रक्खी गई, उसका पिता तेज़ शराबों में पानी मिलाया करता था और
वह वैसी शराबों से परिचित था, किन्तु यह तो अजीब तरह का मिश्रण था।
और, इसी तरह लोग धर्मग्रन्थों का अनर्थ करते हैं, क्योंकि वे कलवारियों (wine shops) में बहुत अधिक रहते हैं, क्योंकि वे स्थूल भौतिक पदार्थों में बहुत अधिक रहते हैं। और इस लिये उन उत्कृष्ट तथा पवित्र धर्म पुस्तकों का स्थूलार्थ ग्रहण किया जाता है, और वे भौतिक बनाई जाती है।
एक मनुष्य सेना में नियुक्त था। वह एक रमणी को चाहता था, उसका बड़ा अफसर भी उसी युवती को प्यार करता था। इस रमणी ने एक मातहत कर्मचारी को अपना दिल दे दिया था। मातहत पदाधिकारी छुट्टी लेकर घर गया। रमणी भी मौक़े से लाभ उठाकर उसके घर पहुँची। विवाह की ठहर गई, और इस लिये उसने अपनी छुट्टी बढ़वाना ज़रूरी समझा। छुट्टी बढ़ाने को उसने अपने उच्च अधिकारी को तार दिया। ऊँचे अफसर को सब हाल मालूम होगया और वह जान गया कि रमणी से व्याह करने के लिए छुट्टी मांगी गई है। ऊंचा अफसर ईर्ष्यालु था और छुट्टी नहीं देना चाहता था। जवाब में, उसने जल्दी से दुटप्पी (संक्षिप्त) भाषा में, यह संदेश भेजा, "तुरन्त मिल जाओ (Join at once)। उसका मतलब था कि मातहत पदाधिकारी तुरन्त आकर सेवा में मिले। यह मनुष्य वह संदेश पढ़ रहा था जिसमें कहा गया था "तुरन्त सम्मिलित हो" और वह बहुत चाहता था कि घर पर ठहरूं, किन्तु सन्देश कहता था "तुरन्त संमेल करो"। उसे इस बातसे बड़ा निराशा और व्यग्रता हुई। जब उसके चित्त की यह हालत थी, तब रमणी आई और उसे इतना निराश देख कर कारण
पूछ्ने लगी। उसने उसे तार दिखाया। रमणी की चपल मति ने संदेश का अपने अनुकूल अर्थ लगाने में उसे सहायता दी, और उसने संदेश का बड़ा ही प्रसन्नकारी अर्थ लग या, तथा खुशी से नाचने लगी। उसने उस (प्रेमी) से पूछा कि इतने उदास क्यों हो, तुम्हें तो मेरी समझ से प्रफुल्लित होना चाहिए। वह कमरे से निकलने को थी, तब उसने [पुरुषने] पूछा, जाने की इतनी जल्दी क्यों है? उसने उत्तर दिया, "जल्दी से विवाह होने की तैयारी करने के लिए"। इस तरह लोग धर्मग्रन्थों से अपना मतलब निकाल लिया करते हैं। ऐसा अर्थ विवाह करने को उत्सुक महिला के लिए ठीक हो सकता है, परन्तु धर्मग्रन्थों का ऐसा
अर्थ करने से काम न चलेगा।
धर्मग्रन्थ हमें बतलाते हैं, "शरीर परमेश्वर का मन्दिर है। इस वचन का बड़ा ही दुरुपयोग किया जाता है। निस्सन्देह देह परमेश्वर का मन्दिर है, किन्तु क्या इस वचन का यह अभिप्राय था कि मन्दिर ही सब कुछ है और भीतर के परमेश्वर को भूल जाओ? मन्दिर का अभिप्राय वही नहीं था जो आज कल में रोमन कैथोलिक सम्प्रदाय के मन्दिरों का है। लोग भीतर के परमेश्वर को भूल जाते हैं और मन्दिर ही को सब कुछ बना देते हैं।
उस वाक्य का मतलब यही था कि भीतर के परमेश्वर की, परमात्मा की पूजा की जाय, और मन्दिर की नहीं।
लोग मन्दिर में प्रवेश करते हैं, और अन्तरस्थ ईश्वर को भूल जाते हैं। इस लिए जब वे पढ़ते हैं कि "शरीर ईश्वर का मन्दिर है", तब वे अर्थ का अनर्थ करते हैं, और वाक्य का दुरुपयोग करते हैं, और शरीर को परिपुष्ट करते हैं।
कभी कभी देखा जाता है कि लोग शरीर का बहुत ख़याल रखना चाहते हैं, और अपने मिथ्याभिमानों तथा चित्त-तरंगों का बहुत दुलार करते हैं, तथा अपने इन कार्यों के समर्थन में इस वाक्य (शरीर ईश्वर का मन्दिर है) का हवाला देते हैं। अपने मिथ्याभिमान, दुर्बलता और अज्ञान की रक्षा के लिए यह एक गढ़ बना लिया जाता है।
मूल वचनों (मंत्रों) का यह एक दुरुपयोग है। यही कुशल है कि वे "मन्दिर" शब्द का और भी अधिक स्थूल प्रयोग नहीं करते। जब किसी एक विद्यार्थी ने यह वचन पढ़ा कि "शरीर ईश्वर का मन्दिर (temple टेम्पुल* है," तो उसने प्रश्न किया "ईश्वर के कान कहां हैं"? यही खैरियत है, वे इस वचन की और भी अधिक स्थूल व्याख्या नहीं करते, जो व्याख्या की जा चुकी है, वही काफी स्थूल है।
यदि देह ईश्वर का आलय (मन्दिर) है, तो तुम्हें उसे भूल जाना चाहिए, वह भूल जाने ही के लिए है। मन्दिर का अच्छा उपयोग उसे भुला देना ही है, न कि सब तरह की निधियों से उसे परितृप्त करना और लादना। अन्दर के ईश्वर का अनुभव करो, मन्दिर अपनी चिन्ता आप करे लगा।
क्या ईश्वर सर्वव्यापी नहीं है? क्या ईश्वर का मन्दिर सर्वत्र नहीं है? सूर्य परमेश्वर का मन्दिर है। क्या सब नत्थ परमेश्वर के मन्दिर नहीं? हरेक वस्तु परमेश्वर का मन्दिर है। राम कहता है, प्रत्येक पदार्थ ईश्वर का मन्दिर है। देह ईश्वर का मन्दिर इस लिए है कि वह तुम से अत्यन्त निकट है।
*temple (टेम्पुल) शब्द का एक अर्थ "कनपटी" भी है।
प्रत्येक पदार्थ तुम्हें परमेश्वर की शिक्षा देता है। प्रत्येक पदार्थ का मूल परमेश्वर है। इस सम्बन्ध में राम तुम से एक बात कहना चाहता है; मानसिक पीड़ा, आन्तारिक शूल, चिन्ता, या क्लेश से व्यथित सब लोगों को वह बैकुण्ठ का एक संदेह देना चाहता है।
सम्पूर्ण विश्व के इतिहास के पन्नों में ईश्वर ने यह सन्देश भेजा है। ईश्वर यह सन्देश तुम्हारी नाड़ियों में, तुम्हारी स्नायुओं में, तुम्हारे मस्तिष्क में, भेजता है। प्रत्येक कुटुम्ब में, हरेक परिवार में, भगवान् इस सन्देश का प्रचार कर रहा है। इस सन्देश को सुनो, इस पर ध्यान दो, और अपना उद्धार करलो। यदि इस सन्देश पर ध्यान न दिया, इसका अनादर किया, तो अपने को फाँसी पर चढ़ा लोगे, मरोगे, नष्ट होगे। कोई विकल्प (alternative) नहीं है।
मनुष्य दिन में कितनी बार मरता है? जब तुम भय भीत या बहुत परेशान होते हो, जब कभी तुम ऐसी भयङ्कर अवस्था में होते हो, तभी मृत्यु है; तब तुम अन्तरस्थ परमेश्वर को भूल जाते हो। उस की ओर ध्यान दो, और अपनेको बचाओ। उसका निरादर करोगे तो तुरन्त विनष्ट हो जाओगे।
यही कानून (दैवी विधान) है-निष्ठुर (unrelenting), अलंघ्य (inviolable), बहुत सख्त, और बड़ा कठोर। यह दैवी-विधान है। सन्देश क्या है? उसे सुनो "जो पूज्य होना चाहते हैं, वे शूली पर लटकने की यातना भोगें"। ईसा ने पहले सूली चढ़ने की तकलीफ उठाई, और बाद को पूजा गया। भगवान् बुद्ध ने सूली (अति पीड़ा) का कष्ट पहिले उठाया, और फिर पूजा गया। सुकरात सूली चढ़ा और आज उसका
शरीर पूजा जाता है। व्रनो पहले मरा और उस का सम्मान पीछे हुआ। भारत में हज़ारों सिद्ध (महापुरुष) बलिदान पहिले हुए और पीछे वे पुजे। इन लोगों ने पहले मूल्य दिया, और पीछे पुरस्कार पाया।
यह तथ्य है कि इन सब सिद्धों ने पहले कीमत दी, और पीछे अपना इनाम पाया। किन्तु संसार के दूसरे लोगों का क्या हाल है? इस संसार के नर नारियों की क्या बात है! वे पहले खरीदना चाहते हैं, किन्तु मूल्य देने से हटते हैं। परन्तु मूल्य देना होगा।
हरेक चाहता है कि वह पूजा जाय। पूजा के अर्थ हैं प्रेम और आदर तथा सत्कार। हरेक प्रेम, आदर, और सत्कार पाना चाहता है, और लोग चारों ओर भक्ति पाना चाहते हैं। वे अपने इर्द-गिर्द खुशामदों को चाहते हैं। सांसारिकता के इस रोग से, मिथ्याभिमान के इस रोग से, देह पर प्रेम के इस रोग से, दूसरों की देह के लिए इस प्रेम से, इस बद्धमूल रोग से, इस अज्ञान से जो तुम्हें शरीर में आत्मा का विश्वास कराता है और जिस के कारण तुम देह को अपने अन्दर का सार पदार्थ समझने की भूल करते हो, इस अज्ञान से जो अपने को पूजाजाने की लालसा में बदल लेता है, संसार में हरेक व्यक्ति व्यथा पा रहा है। बिना उचित मूल्य दिये इस रोग का, पूज्य होने की इस कल्पना का, आनन्द नहीं लूटा जा सकता। परमेश्वर का यह दैवी-कानून किसी को माफ नहीं करता, न तो ईसा को छोड़ता है और न कृष्ण को। ईसा को क़ीमत देना पड़ी थी, पहले सूली मिली और पीछे को वह पूजा गया। कानून के अनुसार सुकरात ने पहले मूल्य दिया, और पीछे वह पूजा गया।
सब सिद्धों ने पहले मूल्य दिया और पीछे वे पूजे गये।
तुम्हारे नेपोलियन, वाशिंगटन, और दूसरे महापुरुषों ने पहले मूल्य दिया और पीछे पूजे गये। निउटन और अन्य महापुरुष अब्र में जी रहे हैं, अब वे अब्रों में उन जीवनों को बिता रहे हैं, जो पहले बलिदान (crucifixion) के जीवन थे। वे शरीर से (अर्थात् देह-दृष्टि से) ऊपर हैं, भूख और प्यास की पीड़ाओं से परे हैं।
निउटन का जीवन-चरित्र पढ़ो, और तुम देखोगे कि अनेक बार वह भोजन करना भूल गया। इन लोगों ने पहले मूल्य दिया और पीछे पूजा पाई।
क़ानून (दैवी-विधान) किसी को नहीं छोड़ता, वह व्याक्तियों का आदर नहीं करता, वह तुम्हारे पापियों या पुण्यवानों (साधुओं), तुम्हारे सिद्धों या तत्त्वज्ञानियों का लिहाज़ (पक्ष) नहीं करता। यह दारुण, निष्ठुर कानून (विधान) है। तुम्हें अपने मामले में किसी विशेष व्यवस्था की आशा करने का क्या हक है? अपने शरीरों के लिए विशिष्ट आदर की आशा करने वाले तुम कौन हो? यदि दूसरों के प्रिय, पूज्य, या सम्मान्य होने की तुम आशा करते हो, यदि दूसरों से तुम आदर पाने और बहुत कुछ समझे जाने की इच्छा रखते हो, तो पहले तुम्हें कीतम देनी हागी।
"दी ज्योवेस" (The Jewess, यहूदिन) नामी नाटक में "ज्योवेस" ने जोज़ेफ की पूजा का पात्र बनना चाहा। अच्छा, पहले ही तुम्हारी पूजा सही; उसकी पहिले पूजा हुई, किन्तु उसे कीमत देनी पड़ी थी। यदि प्रकृति, विधान या परमेश्वर भी तुम्हारा कुछ आदर करता है, और तुम्हारे घर में कोई वस्तु भेजी जाती है, तो यह मतलब नहीं है, कि "वह" मूल्य न माँगेगा।
यदि हमने पहले ही मूल्य दे दिया होता, तो बहुत अच्छा
होता, किन्तु अब "उसने" किताब भेज दी है, और मूल्य का तगादा बड़ा कड़ा है।
ज्योवेस को जोज़ेफ ने पूजा और उसे मूल्य देना पड़ा। पाँच वर्ष तक वह प्रेमोन्मत रही, और वाचालपन में आय-बाय शाय बकती रही। अज्ञान को दण्ड, मूल्य, देना होगा।
हरेक उपन्यास या नाटक में जो हरेक नायक की दशा होती है, वही संसार के सम्पूर्ण इतिहास में संघटित होता है। इस परिच्छिन्नता से छुटकारा पाना ही 'कानून" (विधान) है। केवल तभी तुम्हारा समुचित प्यार किया जायगा, अन्यथा कदापि नहीं।
इच्छाओं की तृप्ति का उपाय यही है कि ये इच्छायें त्याग दी जायं। फारसी में एक सुन्दर शब्द है, जिसे 'मतलब' कहते हैं। इस शब्द का एक अर्थ तो "कामना" है, और दूसरा अर्थ है "कभी न मांगो"। यह एक विचित्र शब्द है। वास्तविक कामनायें, जो तुम में हैं, उनकी तृप्ति के अर्थ उन्हें दूर कर देना चाहिए। कामनाओं से ऊपर उठो; व्यक्तित्वसे, इस तुच्छ देह से ऊपर उठो।
यह एक दीपक है। पतंगों को दीपक भाता है, वे उसे प्यार करते हैं, और वे आते तथा अपनी देहों को उसके लिए भस्म कर देते हैं। एशिया में इस जल जाने को प्रेम का एक चिन्ह समझा जाता है, और लोग कहते हैं, "ये पतंगे दीपक से इतना प्रेम करते हैं कि अपने को जला देते हैं"।
वेदान्त कहता है, "नहीं, नहीं, पहले दीपक अपने को जलाता है, और तत्पश्चात् प्यार किया जाता है"।
इसी तरह शरीर से ऊपर उठो, अपने इस व्यक्तित्व को जला दो, इसका दाह करो, इसे नष्ट करो, इसे भस्म कर दो, केवल तभी तुम अपनी इच्छाओं को पूरा होते देखोगे; तब
तुम्हें पूजा जायगा; तब तुम्हारी कामना के पदार्थ तुम्हारी उपासना करेंगे। दूसरे शब्दों में, "अपना अहंकार त्यागो (वा निग्रह करो)"। यह कहना सहज है, किन्तु इसे अमल में लाना चाहिए।
गिर्जाघरों में ही तुम्हारा मामला ईश्वर से समाप्त नहीं होजाता; मन्दिरों में, तथा रीतियों को पूरा करके ही तुम ईश्वर से छुट्टी और स्वाधीनता नहीं पा सकते। ईश्वर का दरबार कर आन से काम न चलेगा। तुम्हें अपने जीवन के हरेक दिन अपना निग्रह करना होगा, वा अपना अहंकार भुला देना होगा। अपने मित्रजनों से अपने साधारण व्यवहारों में, बाज़ार में, चीज़ें खरीदने में, नातेदारों से अपने सम्बन्धों में, तुम्हें इसका अनुभव करना होगा।
ज़रब का पहाड़ा पढ़ने वाले लड़के को ज़रब के क़ायदे सिखाये जाते हैं। गुणके नियम लड़के के चित्त में जम जाते और उसे याद हो जाते हैं। किन्तु इतना ही काफी नहीं है। केवल उसकी बुद्धि ने त्रैराशिक सीख लिया है, उसे तब तक उसको अभ्यस्त और सिद्ध करना होगा जब तक उसका उससे मानो तादात्म्य न होजाय, जब तक वह उसमें पूरा दत्त न होजाय। जब तक तुम्हें कोई नियम केवल कण्ठाग्र है, तब तक वह केवल तुम्हारे दिमाग़ में है, और तुम प्रायः गलतियां (भूलें) करोगे। भूलों से तब तक बचाव नहीं हो सकता, जब तक आप सैकड़ों-हज़ारों सवाल न हल कर डालें और उन्हें हस्तामलक न करलें, केवल तभी तुम बिना भूलें किये सवाल हल करने के योग्य होगें।
ठीक यही बात, "आत्मनिग्रह करो" तुम्हें इंजील में पढ़ने को मिलती है, और तुम इसे उसी तरह पढ़ते हो जिस तरह एक लड़का त्रैराशिक सीखता है। किन्तु इतना काफ़ी
न होगा, तुम्हें अपने नित्य के सम्पूर्ण व्यवहारों में इसे प्रयुक्त करना होगा, तुम्हें अपना चित्त इस पर एकाग्र करना होगा, इसे बार बार लगाना और अभ्यास करना होगा, आत्म-निग्रह द्वारा सवाल लगाना होगा।
बच्चों से अपनी वातचीत में इस नियम को लागू करो। सड़क पर चलते समय आत्म-निग्रह करो। हँसी-दिल्लगी करते समय इस नियम को काम में लाओ। तुम्हें इस सवाल को लगाना चाहिए, इस सवाल को जाँचना चाहिए। वेदान्त सीखना सहल काम नहीं है। वेदान्त की पुस्तक का पाठ सुगमता से तुम्हें सुनाया जा सकता है, किन्तु वेदान्त अपने आपही तुम्हें सीखना होगा। निरन्तर अभ्यास, विवेक और वेदान्त में दत्तता प्राप्न करने से काम हलका होजाता है।
जब राम गणित विद्या का अध्यापक (professor) था, तब वह गणित के सवाल उतनी ही जल्दी हल कर लेता था, जितनी शीघ्रता से वह उन्हें लिखता था। वे बड़ी सरलता से हथियाये जाते अर्थात् विचार लिये जाते थे। क्यों? कारण यही था कि विभिन्न नियमों को राम ने यहां तक याद किया था कि वे उसकी उँगलियों के पोरों पर मौजूद रहते थे। राम का अभ्यास इतना बढ़ा चढ़ा था कि (उदाहरणार्थ) 18 अठारह अंकों के गुणयांक और 17 सत्रह अंकों के गुणक का गुणनफल राम तुरन्त एक क्षण में बता देता था। क्योंकर? अभ्यास की बदौलत। इस तरह तुम्हारा मन्दिर केवल तुम्हारे हृदय में तो न होना चाहिए। वेदान्त का मन्दिर दुकान में है, सड़क पर है, अपने विस्तर पर इस सत्य की प्रार्थना और अभ्यास करने में है, तुम्हारे अध्ययन में है, तुम्हारे भोजनागार में है, तुम्हारे बैठक खाने में है, और तुम्हारे बात चीत करने के कमरे में है। इन मन्दिरों में तुम्हें
रहना और सत्य का अनुभव करना होगा। ये स्थान हैं, जहां तुम्हें अपने सवाल हल करना होंगे।
जब राम लड़का था, एक दिन वह सड़क के किनारे एक किताब पढ़ता हुआ जा रहा था। एक भद्र पुरुष आया और उसने राम से दिल्लगी की। उसने कहा, "तुम यहाँ क्या कर रहे हो? युवक महोदय! यह पाठशाला नहीं है, किताब अपनी अलग करो"। राम ने उत्तर दिया, "सम्पूर्ण विश्व मेरा पाठशाला है"। अब राम समझता है कि तुम्हारी पाठशाला क्या होनी चाहिए।
यदि प्रतिदिन जीवन में वेदान्त पर अमल नहीं किया जाता, तो वह किस काम का? किताबों में छुपा हुआ और कीड़ों से खाये जाने के लिए अलमारी में रक्खा हुआ वेदान्त काम न आवेगा। तुम्हारा जीवन वेदान्त के अनुसार बीतना चाहिए।
वेदान्त को अग्नि कहा जाता है। यदि वेदान्त हमारे संकट और पीड़ा को नहीं दूर करता, तो यह दैवी-अग्नि उस श्रेणी की भी नहीं है जिसकी एक भौतिक अग्नि, जो तुम्हारा भोजन पकाती है, जिससे तुम्हारी भूख बुझती है, और जिससे तुम्हारी सर्दी दूर होती है। यदि वेदान्त तुम्हारी सर्दी नहीं दूर करता, यदि वह तुमको सुखी नहीं करता, यदि वह तुम्हारे बोझों को नहीं दूर हटाता, तो उसे ठोकरा कर फेंक दो।
तुम तभी वेदान्त सीखते हो, तुम तभी उसे प्राप्त करते हो, जब तुम उसे अमल में लाते हो।
एक समय युधिष्ठिर नाम का एक मनुष्य था। वह भारत के सिंहासन का युवराज था। उसके बचपन की एक कहानी प्रचलित है।
अपने छोटे भाइयों के साथ वह पाठशाला में पढ़ता था। उस के बहुतेरे भाई थे। एक दिन बड़े गुरु, परीक्षक जी, उन लड़कों की परीक्षा लेने आये। इन आचार्य जी ने आकर पूछा कि उन्हों ने कहां तक पढ़ा है। और छोटे लड़कों ने जो कुछ पढ़ा था वह गुरु के सामने रख दिया। जब इस लड़के की बारी आई, तब फिर गुरु जी ने वही सामान्य प्रश्न किया, और लड़के ने पहली पुस्तक खोल कर सुखी स्वर में बिना ज़रा सा भी लज्जित हुए कहा, "मैंने तो वर्ण माला पढ़ी है, और पहला वाक्य पढ़ा है"। शिक्षक ने पहला वाक्य दिखा कर कहा, "बस, इतना ही"? गुरु ने कहा, "और भी कुछ तुमने पढ़ा है?"। लड़के ने हिचकते हुए कहा, "दूसरा वाक्य"। राज कुमार ने, प्यारे छोटे बालक ने, यह प्रसन्नता पूर्वक और सहर्ष कहा। किन्तु गुरु जी रुष्ट होगये, क्योंकि वे उस से उच्च विद्या और अधिक बुद्धि का अधिकारी होने की आशा करते थे, न कि बोंघे की सी सुस्ती। गुरु जी ने उससे अपने सामने खड़ होने को कहा। वह बड़ा निर्दयी था और उसने विचारा "छड़ी से काम न लेना लड़के को बिगाड़ना है"। तुम जानते हो कि अध्यापक समझते हैं कि लड़कों पर छड़ियां तोड़ डालने से उनका सुधार हो जाता है, और जितनी ही अधिक छड़ियां वे लड़कों को पीटने में तोड़ेंगे, उतना ही लड़के सुधरेंगे। मन की इस अवस्था ने गुरु को अत्यन्त निर्दयी बना दिया, और उस ने लड़के को ठोकना तथा मारना शुरु किया, किन्तु लड़का सावधान रहा। वह पहले की तरह प्रसन्न रहा, वह सदा की भांति खुश रहा। गुरु ने कई मिनटों तक उसे पीटा, किन्तु राजकुमार के सुन्दर मुख पर क्रोध या चिन्ता, भय या रंज का कोई चिह्न नहीं दिखाई दिया। तब तो लड़के का चेहरा देख कर गुरु जी को
तरस आगया, मानो पत्थर भी तो पिघल जाता है। गुरु ने विचार किया और अपने मन में कहा, यह मामला क्या है? यह बात क्या है कि यह लड़का, जो अपने एक शब्द से मुझे बर्खास्त करवा सकता है, और जो एक दिन मुझ पर और समग्र भारत पर हुकूमत करेगा, इतना शान्त है? मैंने उस पर इतनी कठोरता की और वह ज़रा सा भी नाराज़ नहीं हुआ। मैंने एक समय अन्य भाइयों पर सख्ती की थी और वे बिगड़ गये, और उन में से एक ने तो छड़ी पकड़ कर मुझे पीटा था, किन्तु इस लड़के ने अपना मिजाज़ ठीक रक्खा। वह प्रसन्न है, शान्ति और अविचलता उसके मुख पर विराज रही है। तब गुरु की दृष्टि पहले वाक्य पर पड़ी, जो लड़के ने पढ़ा था।
आप जानते हैं, भारत में प्रारम्भिक पुस्तकें कुत्तों और बिल्लियों (की कहानियों) से नहीं शुरू होतीं। भारत में प्रारम्भिक पुस्तकें ईश्वर से, और सदुपदेश से शुरू होती हैं। संस्कृत पुस्तक में वर्णमाला के बाद पहला वाक्य था, "कभी क्षुब्ध मत हो, कभी विकल मत हो, क्रोध न करो"। दूसरा वाक्य था, "सत्य बोलो, सदा सत्य बोलो"। लड़के ने कहा था कि उसने पहला जुमला पढ़ लिया है, किन्तु दूसरा जुमला पढ़ लेने की बात उसने हिचकते हुए कही थी। अब, गुरू की दृष्टि पहले जुमले "कभी क्षुब्ध मत हो, क्रोध न करो" पर पड़ी, और फिर उसने लड़के के मुख की ओर देखा। गुरू की एक आँख लड़के के चेहरे पर थी और दूसरी आँख पुस्तक के जुमले पर थी। तब तो वाक्य का अर्थ उसके चित्त में कौंध गया।
तब तो लड़के के चेहरे ने जुमले के मान कह किये। लड़के का चेहरा पुस्तक में लिखे हुए जुमले "कभी क्रोध न करो" का अवतार था। लड़के के शान्त, स्थिर, उज्ज्वल,
प्रसन्न, सहर्ष, और सुन्दर मुख ने "कभी क्रोध न करो" वाक्य का अर्थ गुरु के हृदय में जमा दिया।
अब तक तो गुरू (जुमले को केवल) लाँघ गया था, उसने वाक्य का सारांश पहले केवल ओठों से रट रक्खा था। अब गुरू ने जाना कि यह वाक्य केवल तोते की तरह कहने के लिए नहीं है, यह अमल में लाया जा सकता है, कार्य में परिणत किया जा सकता है, और तब उस (गुरु) ने अनुभव किया कि मेरी विद्या कितनी तुच्छ है। वह अपने मन में लज्जित हुआ कि मैं ने पहला वाक्य भी (वास्तव में) नहीं पढ़ा है, जब कि एक लड़के ने उस वास्तव में पढ़ लिया है। आप समझ सकते हैं कि लड़के के लिए कोई चीज़ का पढ़ना उसे केवल जिह्वाग्र कर लेना नहीं था, किन्तु पढ़ने का अर्थ अमल करना, कार्य में परिणत करना, अनुभव करना, बोध होना, और स्वयं उसका रूप बनजाना वह समझता था। लड़के के लिए पढ़ने का अर्थ यह था।
ज्यों ही गुरू ने पढ़ने का अर्थ समझा त्यों ही उसके हाथ से छड़ी गिर पड़ी, उसका हृदय कोमल होगया। उसने लड़के को पकड़ कर अपनी छाती से लगा लिया और उसका मस्तक चूमा। साथ ही उसे अपनी मूर्खता का और अपने में व्यावहारिक विद्या के अभाव का यहां तक बोध हुआ कि उसे अपने पर शर्म आई, और लड़के की पीठ ठोक कर उसने कहा, "पुत्र! प्रिय राजपुत्र! कम से कम एक वाक्य ठीक ठीक पढ़ लेने के लिए मैं तुम्हें बधाई देता हूँ। मैं तुम्हें बधाई देता हूँ कि कम से कम एक वाक्य तो धर्मग्रन्थों का तुमने यथार्थ में पढ़ लिया है। अरे! मैं तो एक वाक्य भी नहीं जानता, मैं ने तो एक जुमला भी नहीं पढ़ा है, क्योंकि मुझे क्रोध आ जाता है और मैं क्षुब्ध हो जाता हूँ, सड़ी सी
भी बात मुझे रुष्ट कर सकती है। ऐ मेरे पुत्र, मुझ पर दया कर, तू अधिक जानता है, तू मुझ से अधिक पठित है"। जब गुरू ने यह कहा, जब उसने लड़के को उत्साहित किया, तब लड़के ने कहा, "पिता! पिता जी! मैं ने अभी यह वाक्य अच्छी तरह से नहीं पढ़ा है, क्योंकि मुझे अपने हृदय में कोप और रोष के कुछ लक्षण जान पड़े थे। जब पाँच मिनट तक मुझे ताड़ना मिली, तब मुझे अपने हृदय में कोप के चिह्न मालूम हुए"। इस तरह पर उसने दूसरे वाक्य के अर्थ बतलाये, इस तरह पर वह सत्य बोला, जब कि अपनी आन्तरिक दुर्बलता छिपाने का उसके लिए प्रत्येक प्रलोभन था, ऐसे मौके पर जब कि उसकी खुशामद हो रही थी। अपने अन्तःकरण में गुप्त दुर्बलता को अपने ही कर्मों से प्रकट करके बच्चे ने सिद्ध कर दिया कि उसने दूसरा वाक्य "सत्य बोलो" भी पढ़ लिया है। अपने कार्यों से, अपने जीवन द्वारा, उसने दूसरे वाक्य पर भी अमल किया।
पढ़ने का यह तरीका है, वेदान्त सीखने की यह शैली है, वेदान्त पर अमल करो, वेदान्त का अभ्यास करो।
अब राम कहता है कि दूसरा कोई तुम्हारा उद्धार नहीं कर सकता, तुम्हें स्वयं अपना उद्धार करना होगा, अपने त्राता हम आप ही हैं। प्रातःकाल जब तुम ॐ का गान करते हो तब वेदान्त पर अमल करने का, वेदान्त के अभ्यास करने का दृढ़ और प्रबल निश्चय करो। जो कोई भी काम तुम अपने ऊपर लो, उसे प्रारम्भ करने से पहले सावधान हो जाओ। नदी में नहाने को जाते समय जिस तरह तुम तैरने के लिए अपने को तैयार करते हो, उसी तरह जब कोई काम तुम शुरू करो, जब तुम किसी मनुष्य से भेट करने जाओ, जब तुम किसी व्यक्ति से मिलने वाले हो, तब
पहले अपने को मार्ग के लिए तैयार करलो। जब तुम नदी में नहाने जाते हो, तब जिस तरह अपने कपड़े खोल डालते हो; उसी तरह तुम्हें अपने को इस मिथ्या अहंकार से, इस व्यक्तित्व से, ईश्वर के इस मन्दिर से, नग्न कर लेना चाहिए। अपने को मिथ्याभिमान मात्र से शून्य कर लो, अपने को ईश्वर जानो, और अपने सच्चे आत्मा का अनुभव करो, और हरेक शरीर में ईश्वर को देखने का दृढ़निश्चय करो। जब किसी मित्र के पास जाओ, या जब कहीं भी तुम जाओ, तब तैयार होकर जाओ। और जब तुम ऐसे करने को प्रस्तुत होगे, तब तुम असफल न होगे, तुम्हारा धड़ा ठीक रहेगा, तुम कुछ खोवोगे नहीं। जब कोई काम होजाय और तुम मित्र के घर से लौटो, या जिस किसी से भी मिल कर लौटो, तब फिर अपने को तैयार करो।
जब तुम्हारे हाथ मैले हो जाते हैं, तब तुम धो डालते हो। यदि कोई सज्जन या भद्र महिला कपड़े पर धब्बा देखनी है, तो तुरन्त उसे साफ करने का यत्न शुरू होता है। इसी तरह, ऐसी सोहबत में समय बिताने के बाद, जहां तुम्हारा व्यक्तित्व और अहंभाव उत्पन्न हुए थे, ऐसे संगियों से अलग होने के बाद तुरन्त ही पहला कर्त्तव्य यह है कि अपने हाथ धो डालो, और तब फिर ईश्वर होकर बैठो।
पुनः, जब तुम रुष्ट और पीड़ित हो, जब तुम्हारा धड़ा ठीक न रहे, तब तुम्हें क्या करना चाहिए? समानभार करने की उसी शैली का अनुसरण करो।
वैद्य का तराजू हवा के कारण जब हिलजाता है, तब पलड़े ऊपर नीचे लहराने लगते हैं। इसका वे (वैद्य) क्या इलाज करते हैं? वे उसे किसी निश्चल स्थान में रख देते हैं और फिर वह समय आजाता है जब धड़ा ठीक होजाता
है, और पलड़े अचल होजाते हैं। इसी तरह, जब तुम्हारा चित्त व्यग्र या रुष्ट होजाय, तब अपने को एक कमरे में बन्द करलो, मित्रों का साथ छोड़ कर एकान्त में चले जाओ। समय और एकान्त तुम्हें बलवान बना देंगे। ॐ का उच्चारण करो और वेदान्त का मनन करो, अपने ईश्वरत्व को, अपनी दिव्यता को सोचो और अनुभव करो, और तुम्हें शीघ्र ही अपनी पूर्वस्थिति पुनः प्राप्त होगी, तुम्हारा धड़ा बँध जायगा और तुम शान्त हो जाओगे।
यदि तुम समझो कि तुम्हारा अन्तःकरण उद्विग्न या कुपित है, यदि तुम्हारी समझ में आवे कि तुम्हारा चित्त खिन्न है, यदि क्रोध, वैर, चिन्ता या भय का भाव तुम्हारे चित्त में वर्तमान हो, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? अरे! तुम्हें किसी को अपना मुँह दिखाने का कोई अधिकार नहीं है। चेचक के दानों वाला मुख किसी को न दिखाया जाना चाहिए। तुम्हें अपने को गमनागमन-निषिद्ध स्थान (quarantine) में बन्द कर लेना चाहिए। तुम हैज़े से आक्रान्त हो, तुम प्लेग-पीड़ित हो, तुमको एक संक्रामक बीमारी (Contagious disease) हो गई है, और समाज में उपस्थित होनेका तुम्हें कोई अधिकार नहीं है। पहले अपने को चंगा करो, तब बाहर आओ।
अच्छा, यदि किसी महिला या भद्र पुरुष का चेहरा या पोशाक खराब होजाय, तो वह कभी समाज में न सम्मिलित होगा। इसी तरह, यदि तुम्हारा अन्तःकरण मलिन होगया है, यदि तुम्हें कोई संक्रामक बीमारी होगई है, या यों कहिये, यदि तुम्हारी वास्तविक प्रकृति हैज़े से पीड़ित है, तो समाज में कदापि न मिलो जुलो, अकेले बैठो, ॐ उच्चारण करो, ईश्वर का अनुभव करो, और जब तुम ईश्वर को विचारने
लगो, जब तुम ईश्वर का अनुभव करने लगो, तब बाहर आओ।
राम तुमसे कहता है कि जब तुम इस शक्ति का अनुभव करने लगोगे, तब तुम्हें अपने जीवन में एक विशेष अन्तर प्रतीत होगा।
लोग फल खाना चाहते हैं, किन्तु फलने वाले वृक्ष को ही वे काट डालना चाहते हैं। वे प्रसन्न होना और सुख-भोग चाहते हैं, किन्तु वे जीवन को सत्यव्रत नहीं बनाना चाहते। सुखभोग और आनन्द केवल तभी किसी व्यक्ति को मिलता है, जब वह अपनी ईश्वरता में रहता है, अपने परमेश्वरत्व में रहता है।
लोग चाहते हैं कि इन शरीरों की पूजा हो, वे इन क्षुद्र शरीरों के लिए सब आराम चाहते हैं, किन्तु वे मूल्य देने से भागते हैं। परन्तु इससे काम न चलेगा। तुम शहरों में रह सकते हो, यह भगीरथ-श्रम तुम अपने अन्दर कर सकते हो, यह सम्भव है, यह तुम्हारे अपने तेज पर निर्भर है।
राम तुमसे कहता है कि वह भय से, चिन्ता से, क्षोभ से परे है। किन्तु निरन्तर साधन से इसकी प्राप्ति हुई है। निर्बलता और अन्धविश्वास के अत्यन्त गहरे गढ़े से इसने रामको ऊपर निकाला है। एक समय राम अत्यन्त अन्ध-विश्वासी था, हवा का हरेक झकोरा राम के चित्त की समता को बिगाड़ देता था। पर अब सर्व अवस्था में चित्त अचल और सम रहता है। यदि एक आदमी ऐसा कर सकता है, तो तुम भी कर सकते हो।
ॐ! ॐ!! ॐ!!!