श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

सन् 1889 ईस्वी।

भाग 17-18 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 17-18 · अध्याय 10 / 15

सन् 1889 ईस्वी।

(इस समय गुसाईं तीर्थ राम जी की आयु लगभग 253/4 वर्ष के थी)

(253) मिशन कालेज का छोड़ना और ओरियंटल कालेज में नौकरी करना। 22 जनवरी 1889

संबोधन पूर्वोक्त, आनन्द, आनन्द, आनन्द,

मिशन कालेज में आज कल काम छोड़ दिया हुआ है। केवल एक घंटा अभी वहां काम किया जाता है। यह भी मास आधे तक छोड़ दिया जायगा। ओरियंटल कालेज में दो घंटा प्रति दिन काम आरम्भ कर दिया हुआ है। राम।

(254) समुद्र में एक और नदी आन पड़ी। 25 फरवरी 1889

संबोधन पूर्वोक्त, आप के एक पत्र से जो शाहजन (प्रायः) सरदार (स) जी के हाथ का लिखा हुआ था विदित हुआ कि लड़का *(पुत्र) उत्पन्न हुआ है। समुद्र में एक नदी आन पड़े तो कुछ अधिकता नहीं हो जाती, और यदि नदी कोई न गिरे तो कुछ न्यूनता नहीं होजाती। सूर्य का जहां प्रकाश हो, वहां एक दीपक रक्खा गया तो क्या और न रक्खा गया तो क्या। जो यथावत् ठीक है वह स्वतः पड़ा होगा। किसी प्रकार का शोक तथा चिंता हम क्यों करें? यह शोक या चिन्ता करना ही अनुचित है। हम ज्ञानी नहीं, ज्ञान हैं। देह से संबन्ध ही कुछ नहीं। देह और उस के संबन्धी जानें और उन की प्रारब्ध जाने। हमें क्या?

मनो बुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं। न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे। न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः। चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहं॥

अभिप्रायः - न मन हूं न बुद्धि न हूं चित्त अहंकार। नहीं करण जिह्वा न चक्षु निराकार॥ न हूं पृथिवी अप तेज नाकाश इव हूं। चिदानन्द हूं रूप शंकर हूं शिव हूं॥ राम।

* लड़के से अभिप्राय यहां गोस्वामी जी के दूसरे पुत्र गोस्वामी ब्रह्मानन्द जी से है जो आज कल वनारस हिन्दु विश्वविद्यालय में एम.ए. क्लास में पढ़ते हैं।

(255) गृहस्थियों की आवश्यकताओं से साधुओं की आवश्यकताओं की तुलना। 6 मार्च 1889

संबोधन पूर्वोक्त, सविनय प्रार्थना यह है कि यहां किसी प्रकार का अनुमान नहीं दौड़ाया गया। सत्तर से भी एक दो कम रुपये मास के मिले थे। उस में से कौड़ी तो संचय करनी नहीं। जो जो आवश्यकतायें दृष्टि में पड़ीं भुगत गयीं (पूर्ण की गयीं)। शेष अपेक्षाओं को साफ जवाब देना पड़ा (अर्थात् विना पूर्ण किये छोड़ना पड़ा)। केवल बारह रुपये घर भेजे गये, जहां आठ मनुष्य खाने वाले हैं। गृहस्थी स्त्रियों, बच्चों और बूढ़ों को अधिक आवश्यकता होती है साधुओं की अपेक्षा से कि जिन के लिये मधुकर की न्याईं अनेक पुष्पों (घरों) से माधूकारी (भिक्षा) लाना भूषण है; और गृहस्थी अत्यन्त अकिंचन (अथवा अपेक्षणीय) होते हैं। और जो हो रहा है वह अति उचित और ठीक हो रहा है। राम।

(256) प्रारब्ध और काल हाथ जोड़े दास (नौकर) हैं। 17 मार्च 1889

संबोधन पूर्वोक्त, विचारणीय विद्यार्थियों (Students under Consideration) के विषय में पूछना अभी उचित नहीं। कल परसों तक शायद सूचना दी जाये। प्रारब्ध और काल प्रत्येक

पुरुष के हाथ जोड़े दास (भृत्य) हैं। इस में संशय करना ही अज्ञान है। आप का राम।

(257) चेतन में फुरने (स्फुरण) का अभाव। 17 मार्च 1889

संबोधन पूर्वोक्त, कुटस्थ चेतन या साक्षी चेतन में फुरने अथवा संकल्प का नाम मात्र भी नहीं। उस से गिर कर (अर्थात् उस अवस्था से उतर कर) ही मनुष्य के चित्त में फुरणा भासता है।

जैसा चित्त चाहे सरनामा (शिरोनाम) लिखो। सब मंगल मय, आनन्द रूप, शुद्ध स्वरूप ही है। मिल गया माल तो क्या परवाह, उतर गयी खाल तो क्या परवाह। आप का राम।

(258) महानन्द आप का स्वरूप है। 18 जूलाई 1889

श्री महाराज जी, महात्मा तो आनन्द घन होते ही हैं। महानन्द आप का स्वरूप है। वहां चिन्ता और मलिनता का क्या काम?

सूरज में अहर्निश का नाश। अहं प्रकाश, प्रकाश, प्रकाश॥

कहूं क्या हाल इस दिल का कि शादी मौज मारे है। है इक उमड़ा हुआ दरया, अहाहा-अहाहा॥ आप का राम।

(259) पत्र लिखना बन्द होने का कारण। 22 नवम्बर 1889

प्रीतम पत्तियां तब लिखूं जब तुम होवो विदेश। तन में, मन में, नैन में, वाको क्या संदेश*?

(260) राम सर्वत्र। 28 नवम्बर 1889

मनम खुदाय-बर्वांगे-चलन्द मे गोयम। हराँ कि परतौ दिहद् मिहरो-माह रा श्रोयम॥

भावार्थः - 'मैं ब्रह्म हूं', यह गर्ज कर मैं कहता हूं। और जो इस सूर्य और चन्द्र को प्रकाश देता है, वह प्रकाश स्वरूप परमात्मा में हूं।

ईशावास्योपनिषद के मंत्र = में ज्ञानवान की उपमा में वेद ऐसे कहता है :-

सपर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्। कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथा तथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः। (ईश॰ उप॰ मं॰ 8)

भावार्थः-(1) है मुहीतो-मनउज्जहो-चे अवदां। रगो-पै है कहां, हमः वीं, हमः दां॥ (2) वह वरी है गुनाहों से रिंदे-जमां। वदो नेक का उस में नहीं है निशां॥ (3) वह बजुर्गे-बजुर्गां है राहते-जां। वह है वाला से वाला, व नूरे-जहां॥ (4) वहां खुद है जनाँ व बूं ज़ वियां दिये उस ने अजल में हैं रँगतो-शाँ॥

*इस पत्र में केवल यह पंक्ति ही लिखी हुई थी, इस से अतिरिक्त और कुछ नहीं।

(5) यही राम है दीदों में सब के निहां। यही राम है बहर में बर में अयां॥

मन हमानं मन हमानं मन हमां। हर कुजा चशमत फ़ितद जुज़ मन भदाँ॥ राम।

(261)❋ 1 दिसम्बर 1889

बिगड़े तां जे होय कुछ बिगड़न वाली शय। अकाल अछेद्य अशोप्य को कौन शख्स का भय॥

सन् 1900 ईस्वी (इस समय गुसाईं तीर्थराम जी की आयु लगभग 26॥ वर्ष के थी)।

(262)❋ 4 जनवरी 1900

ॐ नारायण, ॐ आनन्द, ॐ आनन्द, ॐ आनन्द, राम।

(263) आनन्द प्रेस का खुलना और मासिक पत्र अलिफ का प्रकाशित होना। 8 जनवरी 1900

नारायण, आनन्द, आनन्द, भगवन्, वेतन अभी नहीं मिला। जब मिलेगा, कुछ में

(नोट, नं॰ 261 और 262 में भी केवल यह दो पांक्तियें ही थी)।

की जायगी। *लोग यहां रात को उपनिपदें पढ़ने आया करते थे। उन्हों ने एक प्रेस (छापाखाना) खोला है, केवल इस नीयत (निश्चय) से कि जो कुछ यहां से पढ़ें, वह छपवादें। साथ इस के यह रिसाला (मासिक पत्र) वल्कि रसूल (अलफ नाम का) प्रकाशित किया गया है। आप की सेवा में तीन कापियां भेजी जाती हैं। एक आप के लिये, दो जिस २ को आप उचित समझें दे दें। विज्ञापन भी साथ भेजे गये हैं, सत्संगियों में बटवा देने। यह आप का अपना काम है। आनन्द, आनन्द।

बस कर जी हुन बस कर जी। काई बात असां नाल हस कर जी॥

सन् 1906 ईस्वी। (264) सितम्बर 1906 (इस समय स्वामी राम तीर्थ जी की आयु लगभग 32॥ वर्ष के थी) पूर्ण सिंह जी के हाथ से भेजा हुआ पत्र भे भेद ते भर्म दी माढ़ियां ते। हल वा सुहागण फेर दित्ता॥

*नारायण और बाबू हरलाल डिस्ट्रेक्ट नाजर लाहौर दोनों गुसाईं तीर्थ राम जी के पास रात्रि को उपनिषदें पढ़ने जाया करते थे। थोड़े ही मास पढ़ने के पश्चात् गुसाईं जी की आज्ञा पर आनन्द प्रेस खोला गया और उस में एक मासिक पत्र अलिफ नाम का प्रकाशित किया गया जिस समस्त कार्य का प्रबन्धकर्त्ता नारायण जी नियत हुए। इस पत्र के केवल 3 नम्बर निकाले जाने के पीछे गुसाईं जी वानप्रस्थाश्रम में प्रविष्ट हो गये। तदपश्चात् इसी वर्ष के अन्त में सन्यासाश्रम धारण हुआ। †गृहस्थाश्रम छोड़ने के पश्चात् अर्थात सन् 1900 के पीछे

फज़े कज़े ते ग़ज़े दे बेलड़े नूं। अग्ग ला के शेर नूं घेर लित्ता॥

बिना राम दे नाम भी होर्दा सी। सुरंग कढ पलीतड़ा गेर दित्ता॥

अज नूरदा शुक्रदा हढ़ आया। दशों दिशा आनन्द खलेर दित्ता॥

भावार्थः - द्वैत दृष्टि अथवा भाव को हम ने ज्ञानरूपी दल से नितान्त मिटा दिया है। सर्व प्रकार के भ्रूणों की नौका को ज्ञानाग्नि से जला दिया है, और उस नौका के अन्दर जो सिंह (अभिमान इत्यादि) था, उसे वश में कर लिया है। और जो कुछ भी ब्रह्म भाव से अतिरिक्त दृष्टि में आता था उसे ज्ञान की ज्वाला से नितान्त नाश कर दिया है। अब आनन्द और प्रकाश की धारा उमड़ २ कर अन्दर से बह रही है, और चारों ओर आनन्द विखड़ रहा है।

अज मुकाम (स्थान) :-हजूर का दिल (आप का हृदय)

भल्ला २ जानियां मौजां लुट्टियां जानियां। खुशी रहना कार है, सोग सोगयां द्वार है॥

स्वामी जी का पत्र व्यवहार पूर्व आश्रम संबन्धी पुरुषों से नितान्त बन्द रहा था इसलिये भगत जी को इसे छे वर्ष के भीतर २ कोई पत्र नहीं भेजा गया। सन् 1906 अगस्त मास में स्वामी जी के प्रिय भक्त सरदार पूर्ण सिंह जी लाहौर से जंगलों में केवल दर्शनार्थ आये थे और भगत धन्नाराम जी से मुखाग्र संदेशा भी लाये थे जिस के उत्तर में स्वामी जी ने पत्र लिख कर उसी सरदार पूर्णसिंह जी) के हाथ से भेज दिया। यह पत्र स्वामी जी के शरीर त्याग से केवल एक दो मास ही पहिले भेजा गया था।

भाग २