श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

❋ लाला फतेहचंद के नाम दो पत्र।

भाग 17-18 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 17-18 · अध्याय 11 / 15

❋ लाला फतेहचंद के नाम दो पत्र।

(1) क लाहौर 28 अप्रिल 1900

भगवन्, मार्च के रिसाला अलिफ (मासिक पत्र) के पिछले दस पृष्ठ एक बार पुनः एकाग्र (अथवा सावधान) चित्त से पढ़ियेगा। मास मई के रसाला अलिफ में आप के प्रश्नों के

* जब गोस्वामी तीर्थराम जी 1899 में अमरनाथ की यात्रा करने गये थे तो मार्ग में श्रीनगर कुछ दिन ठहरे थे। कुछ दिन लाला फतेहचंद जी के घर पर ठहरे, और कुछ दिन राय साहिब संगूमल जी के घर में, जो उन दिनों वहां के पोस्ट मास्टर थे। ला॰ फतेहचन्द जी उन दिनों धर्म के कई एक नियमों को व्यर्थ और मिथ्या मानते थे बल्कि उनका चित्त धर्म विषय में सहस्रों संशयों से भरा पड़ा था। और लोगों में अमी और संशयात्मा भी प्रसिद्ध थे। जहां कहीं श्रीनगर में वह किसी महात्मा के आगमन की सूचना पाते, वह झट अपने संशय मिटाने के लिये उनके निकट चले जाते। संतोप कहीं भी उन्हें मिलता भान न होता था, पर हां कहीं कहीं मिल भी जाता था। गोस्वामी जी के दर्शन से इन का चित्त अत्यन्त प्रसन्न हुआ था, और जैसा कि सुना गया कि गोस्वामी जी के प्रसन्नता भरे मुखचंद के दर्शन मात्रसे इन के कई भ्रम दूर होगये। और फिर प्रश्नों के करने पर कई सिद्धान्त हल हो गये। इस थोड़ी सी संगति से इनके चित्त में बड़ा प्रभाव पड़ा और गोस्वामी जी के साथ इन का बड़ा प्रेम हो गया, और इसी प्रेम से विवश होकर पत्रों द्वारा अपने संशय अब दूर कराने लगे। और उसी सिलसिले में ये दो पत्र उनके एक पत्र के उत्तर में हैं। इन ला॰ फतेहचन्द जी को नारायण से मिलने का भी समागम हुआ, नारायण ने इन्हें सादा और सरल चित्त पाया।

उत्तर विस्तार पूर्वक आजायेंगे। अप्रिल वाला रिसाला भी बहुत संशय निवृत्त कर देगा।

यह संशय जो इस समय बड़े गूढ़ और विषम दिखाई देते हैं एक काल अवश्य आयेगा कि नितान्त साफ हो जायेंगे। प्रत्येक प्रकार से यहां परमानन्द है। आप का तीर्थराम गोस्वामी।

(2) ख लाहौर 16 जून 1900

भगवन्, कोई शंका नहीं है जिस को राम दूर न करसके। प्यारे! शंका की नाम मात्र भी वेदान्त में स्थिति नहीं। वास्तव में केवल यही है कि "हमा अोस्त" (सर्वं खल्विदं ब्रह्म)। यदि आप के संशय अभी निवृत्त होने शेष हैं, तो उस का कारण यही है कि अभी तक पूरा समय किसी सच्चे महात्मा की संगति में नहीं अर्पण किया। सत्संग की कमी है। सत्य (Truth) को इस बात की परवाह नहीं कि उस के अनुयायी अधिक हों। यदि हज़ारों वर्षों तक गुरुत्वाकर्षण का नियम (Law of Gravitation) लोगों को विदित नहीं हुआ तो क्या उस नियम की न्यूनता थी? कदापि नहीं।

रिसाला अलिफ की बारह जिल्दें (प्रतियां) प्रति वर्ष की लोगों को पहुंच जाया करेंगी। इस के विलम्ब हो जाने का कोई डर नहीं। यह भी भले के लिये हुआ है जैसा कि समय पर हमें विदित हो जायगा। अलिफको प्रशंसा (credit) कीर्ति की आवश्यकता नहीं है, और निन्दा (censure) का भय नहीं है। वह तो अपने आनन्द से तरंगायत होता है। उस

के लिये तो ब्रह्म से अतिरिक्त जगत् वगत् है ही नहीं। प्यारे! अनलहक़ (अहंब्रह्मास्मि) की गर्ज़ तो एक बार प्रत्येक स्त्री पुरुष से यह रिसाला सुनवा ही देगा। निहंग निःशंक राम के दर्शन देने की देर है। राम