श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

सन् 1887 ईस्वी

भाग 17-18 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 17-18 · अध्याय 9 / 15

सन् 1887 ईस्वी

अब गुसाईं तीर्थ राम जी की आयु लगभग साढ़े तेईस (23 1/2) वर्ष के थी।

(204) धन की तंगी और संबंधियों का क्रोध। 6 जनवरी 1887

संबोधन पूर्वोक्त, मैं कल आप की सेवा में अठाईस (28) रुपये भेजूंगा। आधे चाचा जी (पिता जी) को दे देने। उन को लिख चुका हूं। इस मास मेरे पास केवल तीन रुपये बचे हैं। और सारे मास का खर्च अभी सिर पर है। न आटा ही है,

――― *पं० रामधन उन दिनों जम्मू रियासत में सैटलमैंट आफिसर थे।

और न अन्य कुछ घी के अतिरिक्त। इस बार ऋण (उधार) की एक कौड़ी भी नहीं वापस दी। और किसी विद्यार्थी को भी किंचित् सहायता नहीं दी। तिसपर भी सब रुष्ट हैं। और उलाहा पर उलाहा (उपालम्भ) दे रहे हैं। इस समय मेरे पास कोई भोजन बनोने वाला मनुष्य (रसोइया) नहीं है। तंग हूं।

आप का दास, तीर्थराम।

(205) स्वरूप में स्थित होने से आनन्द। 22 फरवरी 1887

संबोधन पूर्वोक्त, जब अवकाश मिलता है, वेदान्त के ग्रन्थ अंग्रेज़ी में देखता हूं। और छुट्टी के दिन चित्त एकाग्र करने का भी अधिक समय मिलता है। आनन्द केवल अपने स्वरूप में स्थित होने में है। और अधिकार (इख्तियार) भी समस्त जगत् पर अपना ही है। व्यर्थ हम अपने आप को औरों के अधीन मान लेते हैं। आप दास पर दया रक्खा करें।

आप का दास, तीर्थ राम।

(206) श्लेष्म से शरीर तंग, पर पारमार्थिक ग्रन्थों से आनन्द। 11 मार्च 1887

संबोधन पूर्वोक्त, आप की कृपा से अत्यन्त आनन्द रहता है। श्लेष्म (जुकाम) ने शरीर को कुछ तंग कर रक्खा है। परन्तु पारमार्थिक ग्रन्थ देखने और अन्य काम से चित्त प्रसन्न रहता है। आप दया रक्खा करें।

आप का दास, तीर्थ राम।

(207) चित्त की स्थिरता। 13 मार्च 1887

संबोधन पूर्वोक्त, आप का कृपा पत्र आज मिला। अत्यन्त आनन्द हुआ। जिस समय आप ने कल लिखा था, मैं भी उस समय ठीक उसी अवस्था में था जिस में आप थे। और आप की ओर लिखने के लिये यह कार्ड उठाया था। परन्तु केवल सिरनामा लिख कर छोड़ रक्खा था। आप की दया से अब अत्यन्त आनन्द है। बड़े अच्छे भाग्य होने से चित्त स्थिर होना सीखता है।

आप का दास, तीर्थराम।

(208) बी० ए० परीक्षा का खराब परिणाम। 17 अप्रेल 1887

संबोधन पूर्वोक्त, मेरे पैर का छाला [unclear] अब बहुत पीड़ा देता था। आज बी. ए. की परीक्षा का परिणाम निकला है, ऐसा बुरा परिणाम कभी

――― नोटः—भगत धन्ना राम जी का उन दिनों यह अभ्यास था कि जिस किसी से कोई काम कराना हो वह मनुष्य चाहे कितनी ही दूरी पर क्यों न हो, अपने आध्यात्मिक चक्षु से वह उस मनुष्य से काम करा लिया करते थे। इस बार तीर्थराम जी से उन्हों ने वही विषय लिखवाना चाहा जो आप स्वयं लिख कर तीर्थराम जी को भेज रहे थे। और इस पत्र में तीर्थराम जी ने स्वयं माना भी है कि उन के भीतर भी वही विषय लिखने को फुड़का है। यह दो चित्तों की अभेदता व मिलाप का प्रत्यक्ष प्रमाण है और दूर से स्वतः स्पष्ट हो रहा है कि दो मनुष्य हज़ारों मीलों की दूरी पर रहते हुए भी अपने चित्तों की अभेदता से बिना बाह्य तार वर्की के भी बातें कर सकते हैं।

नहीं निकला। सारे पंजाब में चौथा भाग भी विद्यार्थी उत्तीर्ण नहीं हुए। सब विषयों में बहुत फ़ेल (अनुत्तीर्ण) हुए हैं। मेरे शिष्यों में से एक तीसरा नम्बर रहा है और एक पांचवां रहा है। गणित शास्त्र में भी सारे कालेजों के बहुत विद्यार्थी फ़ेल हुए हैं। मेरे वेतन में वृद्धि इस वर्ष नहीं होगी। इतना तो परिश्रम किया और परिणाम यह निकला। चित्त अब बहुत उचाट (उपराम) हो रहा है। आप कब आयेंगे?

आप का दास, तीर्थराम।

(209) विशेष वेदान्त चर्चा। 18 अप्रेल 1887

संबोधन पूर्वोक्त, मैं आपकी कृपा से अपना समय व्यर्थ कामों में खर्च नहीं करता। और विशेष करके वेदान्त चर्चा ही होती है। भविष्य में आप की आज्ञानुसार अन्य प्रकार की बात चीत नितान्त त्यागने का यत्न करूंगा। आप दया रक्खा करें। चित्त आज कल उदास है।

आप का दास, तीर्थराम।

(210) एफ़० ए० परीक्षा का अच्छा परिणाम। 28 अप्रेल 1887

संबोधन पूर्वोक्त, कल ऐफ. ए. की परीक्षा का परिणाम निकला है। समस्त कालेजों के विद्यार्थी आधे के लग भग उत्तीर्ण हुए हैं, मिशन कालेज अच्छा रहा है। आप की कृपा से गणित शास्त्र में भी अच्छा रहा है। केवल पांच विद्यार्थी गणित शास्त्र में फेल हुए। वह भी साठ (60) में से। छात्र वेतन भी चार मिशन कालेज में आये हैं।

आप का दास, तीर्थराम।

(211) वेद पाठ के श्रवण का फल। 23 जून 1887

संबोधन पूर्वोक्त, आप का कृपा पत्र आज मिला, अत्यन्त आनन्द हुआ। वेदों का केवल पाठ मात्र सुनने से मेरे चित्त को समाधि की दशा प्राप्त हो जाया करती है। और अत्यन्त आनन्द की अवस्था आच्छादित हो जाती है। यह अत्यन्त उत्तम कार्य है। ऐसे (वेदपाठी)† पुरुष की सहायता करनी उचित है।

आपका दास, तीर्थराम।

(212) हरिचरण की पौड़ियों में निवास। 1 अगस्त 1887

संबोधन पूर्वोक्त, हम इस नवीन मकान में आगये हैं। यह हरिचरण की पौड़ियों (सोपान) में है। हरिचरणों में (तीर्थ) श्री गंगा जी का निवास है, और तीर्थ (राम) को भी हरिचरणों ही में रहना उचित है। यहां जब का आया हूं, हरिचरणों में ही ध्यान है। और अपने स्वरूप के श्री गंगा जल में आप की दया से स्नान कर रहा हूं।

आप का दास, तीर्थराम।

――― † दक्षिण देश का एक पंडित था जो केवल वेदपाठ ही करना जानता था और अर्थ से कोई बोध नहीं रखता था, और अत्यन्त मधुर स्वर से वह वेदपाठ करता था। उसकी प्रार्थना पर उसका पाठ रखवाया गया। और जो प्रभाव इस पाठ से गुसाईं जी के चित्त पर पड़ा, वह उन्हों ने वर्णन किया है। ऐसे पुरुष की सहायता के लिये गुसाईं जी अपने गुरु के पास लिखते हैं।

* लाहौर नगर में बदोंवाली बाजार के समीप एक गली है जिसका नाम हरिचरण की पौड़िया है।

(213) वेदान्त विचार और भजन। 5 अगस्त 1887

संबोधन पूर्वोक्त, आप के दो कृपा पत्र मिले, अत्यन्त आनन्द हुआ। मैं छुट्टियों के अन्त में गणित शास्त्र की कोई पुस्तक लिखूंगा। आज कल तो वेदान्त विचार, भजन और एकान्त सेवन ही को कुल समय देता हूं। इस में वह आनन्द है कि छोड़ने को जी (चित्त) नहीं चाहता। आप की अत्यन्त दया है। लड़के वाले (बालक) सब भेज दिये हुए हैं। मैं अकेला हूं। थोड़े दिनों को शायद आप के चरणों में उपस्थित होऊं।

आप का दास, तीर्थराम।

(214) वेदान्त शास्त्र ही परम सत्य है। 8 अगस्त 1887

संबोधन पूर्वोक्त, आप का कृपा-पत्र मिला, अत्यन्त आनन्द हुआ। वास्तव में किंचित् मात्र अभ्यास (अथवा मनन) करने से ठीक शास्त्रों के अनुसार फल प्राप्त होते हैं। संसार में यदि कोई वस्तु (अर्थात् शास्त्र) सत्य है तो वेदान्त शास्त्र है। बड़ी कृपा आप ने की है। धन्य है।

आप का दास, तीर्थराम।

(215) मनुष्य देह कब सफल है। 7 अगस्त 1887

संबोधन पूर्वोक्त, यदि व्यवहार काल में चलते फिरते और सब काम करते हमारी वृत्ति ब्रह्माकार रहे और चित्त इस उच्च अवस्था से

कभी नीचे न उतरे, तो धन्य है हमारा जीवन, नहीं तो मनुष्य देह निष्फल खो दिया।

आप का दास, तीर्थराम।

(216) वेदान्त के मनन से आनन्द। 11 अगस्त 1887

संबोधन पूर्वोक्त, आप का कृपा पत्र कल मिला। अत्यन्त आनन्द हुआ। वेदान्त शास्त्र के विषय के अंग्रेज़ी में बहुत से ग्रन्थ पढ़ता हूं। परन्तु पढ़ने में वह आनन्द नहीं आता जो उन को एकान्त में बैठ कर विचारने और अपने भीतर धारण करने में आता है। जो कुछ इस प्रकार से आप की दया से प्राप्त होता है वह बहुधा जिज्ञासुओं को अंग्रेज़ी में उपदेश भी कर देता हूं। जी (चित्त) चाहता है कि इसी आनन्द में छुट्टियां व्यतीत करूं। ..........

आप का दास, तीर्थराम।

(217) मौसा जी से स्वर्ण की घड़ी का उपहार। 3 सितम्बर 1887

संबोधन पूर्वोक्त, आप का केवल एक कार्ड हांसी मिला था। और दूसरा फिर लाहौर आनकर। आप ने दास पर दया रखनी। शायद पुस्तक तो मैं लिख डालूं और लिखूंगा अवश्य, पर आजकल तो वेदान्त विचार और एकान्त सेवन पर दिल लगा हुआ है। हांसी के लोग आस्तिक थे। और कोई कोई वेदान्त को भी भले प्रकार समझते थे। भिवानी के लोग अधिक सत्संगी

थे। हिसार के लोग बहुधा आर्यसमाजी थे, पर प्रसन्न चित्त! मुझ से सब प्रीति करते थे। मासड़ (मौला) जी ने मुझे एक स्वर्ण की घड़ी उपहार में दी है। आप के विषय सत्संगियों से बहुत कुछ कहा गया।

आप का दास, तीर्थराम।

(218) वेदान्त अभ्यास से धारणा का बढ़ना और संकल्प सिद्धि की विधि। 8 सितम्बर 1887

संबोधन पूर्वोक्त, आप का कृपा पत्र मिला, अत्यन्त आनन्द हुआ। मैं कोई पांच छः दिन तक चरणों में उपस्थित हूंगा। मैंने लाहौर में रहकर वीस से अधिक पुस्तकें अंग्रेज़ी में वेदान्त की देखीं और विचार पूर्वक पढ़ी हैं। इन पुस्तकों में उपनिषदों और अन्य प्रामाणिक ग्रन्थों के पृथक २ भाग दिये हुए थे। ग्रन्थों के सत्संग से धारणा बहुत बढ़ती है और वास्तविक आनन्द धारणा ही में है। स्फुरणा और संकल्प के रोकने से संकल्प सिद्धि होती है, जैसे बीज पृथिवी में दबने से उगता है। आप का इस विषय में बहुत अनुभव है। माया और संसार से चित्त हट जाने (उपराम होने) से संसार सेवक बन जाता है, जैसे छाया की ओर पीठ करके सूर्य के सन्मुख जाने से छाया पीछे आती है। आप दास पर कृपा दृष्टि रक्खा करें।

आप का दास, तीर्थराम।

(219) निर्भय पद की प्राप्ति। 11 सितम्बर 1887

संबोधन पूर्वोक्त, आप की दया से आज कल तो निर्भय पद प्राप्त है, अर्थात् नितान्त निर्भयता। और सर्वदशा में आनन्द की अवस्था। आप की दया हुई तो मुराली वाला इत्यादि सब जगह यह दशा रहेगी।

आप का दास, तीर्थराम।

[220] आज कल का अभ्यास। 18 अक्टूबर 1887

संबोधन पूर्वोक्त, आज कल इस पर अभ्यास है। 'तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथ अमृतस्यैप सेतु' (मुंडकोपनिपद्) एक मात्र आत्मा को जानो, इससे अतिरिक्त और कोई वार्ता कदापि मत करो। सुनो यही अमृत का सेतु (पुल) है।

⊛ (221) अपने पिता को पत्र। 25 अक्टूबर 1887

मेरे परम पूज्य पिता जी महाराज, आप की कृपा मुझ पर नित्य रहे। चरण वन्दना। आप

――― * यह पत्र (221) गुसाईं जी ने अपने पिता जी को भेजा था। पर पिता जी ने इस के ऊपर निम्न लिखित शब्द लिख कर भगत् धन्नाराम जी के पास भेज दियाः-"भगत जी! आप की संगत से आज सारे कुटुंब को तिरस्कार मिला है। हम ने आप को बुद्धिमान् समझ कर इस को आप के सुपुर्द किया था, पर यह परिणाम निकला"। इस लिये यह पत्र भी भगत जी से ही मिला था और अब उन के पत्रों के साथ ही दिया गया है।

का कृपा पत्र मिला, अत्यन्त हर्ष प्राप्त हुआ। आप के पुत्र तीर्थराम का शरीर तो अब बिक गया। बिक गया राम के आगे। उस का अपना नहीं रहा। आज दीपमाला (दीवाली) को अपना शरीर हार दिया और महाराज को जीत लिया। आप को धन्यवाद हो। अब जिस वस्तु की आवश्यकता हो मेरे मालिक (स्वामी) से मांगो तत्काल वह स्वयं दे देंगे। या मुझ से भिजवा देंगे। पर एक बार निश्चय के साथ आप उन से मांगो तो सही। उन्नीस बीस (19,20) दिन के मेरे सारे काम बड़ी निपुणता से अब वह आप करने लग पड़े हैं, आप के क्यों न करेंगे। घबराना ठीक नहीं। जैसी आज्ञा होगी वैसा वर्ताव में आता जायगा। महाराज ही हम गुसाइयों का धन हैं। अपने निज के सच्चे और अमूल्य धन को त्याग कर संसार की झूठी कौड़ियों के पीछे पड़ना हम को उचित नहीं। और कौड़ियों के न मिलने पर शोक करना तो बहुत ही बुरा है। अपने वास्तविक धन और सम्पति का आनन्द एक बार ले तो देखो।

आप का दास, तीर्थराम।

[222] जब अपना आप हो गये तो पत्र किस को? 8 नवम्बर 1887

संबोधन पूर्वोक्त, महाराज जी!.........यद्यपि मैं ने इतने दिन पत्र नहीं लिखा, परन्तु आप के स्वरूप में स्थित रहने के अतिरिक्त

और कोई काम भी नहीं किया। जब अपना आप होगये, तो पत्र किस को लिखें?

आप का दास, तीर्थराम।

(223) स्वरूप में स्थिति और संन्यासावस्था का आच्छादन होना। 8 दिसम्बर 1887

संबोधन पूर्वोक्त, आप का कृपा पत्र मिला, अत्यन्त आनन्द हुआ। आप की अत्यन्त दया है। बहुत आनन्द है।

मैं तो आप कुछ नहीं करता। उचित समय पर सब काम अपने आप हो रहे हैं। किसी दिन मस्ती और संसार की ओर से बेहोशी (असावधानता) अथवा जड़ता स्वतः आजायें, तो मेरा क्या अपराध? बिना किये काम हो रहे हैं। सूर्य और शेष नाग तो हमारे दास हैं। हमारा काम तो शेषनाग की शय्या पर आराम (शयन) करना है। सूर्य को हम प्रकाशित करते हैं, और आज्ञाधीन बन कर वह चक्कर लगाता है। स्वरूप तो सब का एक ही है, पर स्वरूप में स्थिति की न्यूनता है। और तुर्यावस्था तथा समाधिकाल की कहां महिमा नहीं आई? श्रीरामचन्द्र जी तथा श्रीकृष्णचन्द्र परमात्मा आप ऐसे महात्माओं के चरणों पर सिर (मस्तिक) रखते रहे हैं। और याज्ञवल्क्य तथा अष्टावक्र जी की पदवी राजा जनक से बढ़कर है।

राजा जनक और कृष्ण परमात्मा तो बी. ए. श्रेणि के हैं, और याज्ञवल्क्य तथा अष्टावक्र एम. ए. श्रेणि के। मान

(सत्कार) यद्यपि बी. ए. और एम. ए. का एक समान होता है, पर सच्चाई का छुपाना ठीक नहीं। जो बड़ा है उसी को बड़ा कहना ही उचित है।

दास के विषय में अभी कुछ काल तक कोई चिन्ता तथा भय नहीं करना चाहिये। मलाई वाला दध और वह भी मिसरी से मिला हुआ तो एक ओर से पीने को मिलता है, और बाजरा वा ज्वार की रोटी दूसरी ओर से। मैं यह नहीं कहता कि बाजरा तथा ज्वार की रोटी बुरी है (क्योंकि वह भी तो मैं हूं) पर मेरे उदर के अनुसार नहीं। मेरे उदर में तो दूध मिसरी (सिताखंड) ही पचते हैं।

जब राजाधिराज के काम बिना हाथ पांव हिलाये हो रहे हैं, तो वह कर्मचारियों (मज़दूरों) के साथ मिल कर कर्म क्यों करे (टोकड़ी क्यों ढोये)?।

वटलोही (वट्टोही-देगची) में गरम जलाने वाले पानी में उबलने से बचने के लिये वटलोही से बाहर जा पड़ना ही उचित है, वटलोही के साथ लगे रहना उचित नहीं।

श्री शंकराचार्य जी ने गीता भाष्य में अत्यन्त स्पष्ट रीति से सिद्ध कर दिखाया है कि अन्त में कर्म का नितान्त त्याग हो जाना चाहिये, यद्यपि आप उन दिनों वह बहुत कर्म करते ही थे। दास के लिये भी ऐसे दिन आने में अभी देर है।

(1) काश आनां कि पेवे-मन जुस्तन्द। रूयत ऐ दिलस्तां वदींदे। (2) ई खिर्कः कि मन दारम, दर रहने-शराब औला। व एं दफतरे-वे मानी गर्के-मये-नाब औला॥

――― * (1) ईश्वर करे जिन्हों ने मेरे पाप (अपराध) देखे हैं, ऐ प्यारे! वह तेरा मुख देखे। (2) यह कुर्ता जो मैं रखता हूं निजानन्द रूपी मदिरा के बदले

अन्त के पद का तात्पर्य यह है कि:—"यह ग्रन्थ, पुस्तकें दफ़्तर इत्यादि नितान्त व्यर्थ, निरर्थक और निष्फल हैं, यदि उनके पढ़ने से यह परिणाम नहीं निकलता कि हम उनको शुद्ध मस्ती की मदिरा (आसव) में पेसा डाल दें कि वहां नितान्त गल सड़ कर लीण हो जायँ। और उनका नाम तथा चिन्ह मात्र शेष न रहे, वल्कि मदिरा रूप हो जायँ। मदिरा से अभिप्राय श्रद्धानुभव की मस्ती या नशा है। यह वस्त्र (अर्थात् गृहस्थ) शव का कफन (शव वस्त्र) है, यदि अन्त में इन को वस्त्र कर (छोड़ कर) अनुभव रूपी मदिरा के रंग में हम रत्ते (रंगे) नहीं जाते। इति अलम विशेष आनन्द।"

आप का दास, तीर्थराम।

(224) निजानन्द के कारण पढ़ा नहीं जाता। 6 दिसम्बर 1887

संबोधन पूर्वोक्त,

आप की कृपा से सदा ही मस्ती (निजानन्द) की अवस्था अच्छादित रहती है। आज कल इस आनन्द के कारण पढ़ा भी नहीं जाता।

आप का दास, तीर्थराम।

[पादटिप्पणी:] गिरवी (आधीकृत) है, और यह निरर्थक पुस्तकें उस आनन्द रूपी वास्तविक मदिरा में डूबी हुई है॥

† इस पत्र से अभिप्राय यह है कि गृहस्थ रूपी नरक का त्यागना ही उचित है, गृहस्थाश्रम में फंसे रहना उचित नहीं।

(225) गुसाईं जी की वैराग्य और त्याग की उमंगे।

हरिचरण (की पौड़ी) लवपुर (लाहौर) 13 दिसम्बर 1887

संबोधन पूर्वोक्त, ..........................................

आप की दया से आनन्दस्वरूप के साथ संग बढ़ता जा रहा है। वाह धन्य हो! इत्यलम, विशेष आनन्द।

पहिला कार्ड लिख रहा था कि आप के तीन कार्ड और मिले। बहुत ही आनन्द हुआ। आप ने जो लिखा है, नितान्त ठीक और उचित लिखा है। जो आप की इच्छा है, वही होगा। करने कराने वाले सब आप हैं। वैराग्य की तरंगें जो यहां आती हैं आप की भेजी हुई हैं, और आप ही रोकते हो? अद्भुत लीला है। वाह क्या खूब खेल (मनोहर क्रीड़ा) है। बलहार!

सब के लिये संन्यास ठीक नहीं, और संन्यास का संसार में न होना भी उचित नहीं। प्रत्येक रंग (भांति) का पदार्थ संसार में बनाया हुआ है। किसी को हंसाना, किसी को रुलाना, और आप अलग खड़े होकर लीला देखना, यह हमारा काम है, जिस प्रकार कि आतशवाज़ अनार के मसालह (द्रव्य) को गरम २ आग से जलाता है और उस विचारे मसालह से शूं २ रूपी हाय २ का शोर (शब्द) कराता है, पर आप सदा प्रसन्न रहता है, साक्षीरूप बन कर।

कुछ फल पक कर भी वृक्ष के साथ लगे रहते हैं, पर कुछ फल पक कर गिर पड़ते हैं। इति विशेष आनन्द।

आप का दास, तीर्थराम।

(226) कुछ प्रश्नों का उत्तर। 16 दिसम्बर 1887

संबोधन पूर्वोक्त,

आप का कृपा पत्र मिला, अत्यन्त आनन्द हुआ। आज कल कई पुष्प, जो मुझे मिलते हैं, आप के दर्शनों की इच्छा करते हैं। परसों मुझे उधर हो गया था, पर वह उधर भी अपना अनुभव होने के कारण अत्यन्त आनन्द दायक हुआ। श्लेष्म (जुकाम) भी अत्यन्त तीव्र वेग से हुआ था। पर बहुत शीघ्र अपने आप ही हार कर दूर हो गया।

आज कल के काव्यों में से कुछ पद्य निम्न लिखित हैं इस प्रश्न के उत्तर में कि "आप की कैसी प्रकृति है, प्रसन्न हो?"

"बचेः पुरसी हाल मन जानम कि जानम जान आरामस्त। वतन खुद गोयद्त मकबूज़े-रहो बदलो हिरमानस्त॥"

भावार्थः—मेरे प्यारे अपना आप! तुम मुझे मेरी प्रकृति के विषय क्या पूछते हो, क्या तुम को पता नहीं कि मेरा आत्मा तो आनन्द की खानि है, पर शरीर विचारा सर्वदा बदलता रहता है और प्रति क्षण मृत्यु के समीप जा रहा है, और कदापि सुखी नहीं रह सकता।

[पादटिप्पणी:] "ऐ मेरे प्यारे! मेरी शारीरिक दशा को क्या पूछता है? मेरी आत्मा तो आनन्द की खान है और मेरा शरीर तो तुझे स्वयं बतलाता है कि वह दुर्भाग्य के विकारों के पन्जे में असित है।"

आत्मा के विषय में तुम्हारा प्रश्न नहीं बन सकता क्योंकि वह नित्य ही आनन्दघन है। और ऐसे ही किसी शरीर के विषय में भी तुम्हारा पूछना योग्य नहीं होसकता क्योंकि यह तो सदा ही महा दुःखी है। तो फिर दशा किस की पूछते हो?

संसार क्या है? इस के उत्तर में दृष्टान्त बजे थे चार मुस्तक़बिल जमां के। अर्कीमाः के पिसर हर सू दवां थे॥ अजब मल मल सुरावों में नहाये। जर्वीं पर रोज़ के तारे लगाये॥ व फिर सब ने की उक्का पर सवारी। ससी के सींग से की तीर वारी॥ अरे ओ आसमां! यह नील दे जा। हमारी कुमक को आता है हव्वा॥

भावार्थः-भविष्य काल के चार बजे थे। बंध्या (वांझ) स्त्री के वालक सर्व ओर दौड़ रहे थे। मृगतृष्णा के जलमें विचित्र रीति से मल २ कर स्नान किया था। भाल (माथ) पर दिन के समय के तारे लगाये, और फिर हुमा पक्षी (जो कदापि आकाश से पृथिवी पर उतरता नहीं है) की पीठ पर हमने सवारी की। और शशी के सींग से तीर चलाये। फिर आकाश को कहा कि ऐ आकाश! नीला रंग दे जा, नहीं तो तेरे मारने के लिये हमारी सहायता को हव्वा आता है। तात्पर्य यह कि जैसे यह सब पूर्वोक्त कथन असंभव, मिथ्या और कहने मात्र है, ऐसे ही यह संसार मिथ्या और कहने मात्र है।

लेखक, सेवक राम।

(227) गुरु जी से संपूर्ण अभेदता 25 दिसम्बर 1887

संबोधन पूर्वोक्त,

रात को आठ बजेन चाल हैं। व्यायाम कर चुका हूं। भीनर नितान्त शुद्ध है। और अत्यन्त आनन्द की अवस्था है। इस समय अत्यन्त प्रेम के साथ आप का स्मरण हुआ। आप धन्य हैं, जिन की कृपा से इस प्रकार आनन्द के समुद्र में स्नान होते हैं। आप पर बलिहार। संपूर्ण एकता (अभेदता) की दशा है। आप से इस समय एक बाल मात्र भी किसी बात में किंचित् भेद नहीं

मन तो शुदम, तो मन शुद, मन तन शुदम तो जां शुदी। ता कस न गोयद बाद अजीं, मन दीगरम तो दीगरी॥

भावार्थः-मैं तू हुआ तू मैं हुआ, मैं देह हुआ तू प्राण हुआ। अब कोई यह न कह सके! मैं और हूं तू और है॥

लेखक, आप स्वयं।

(इस समय गुसाईं जी की आयु साढ़े चौवीस (24॥) वर्ष के लगभग थी।)

(228) भ्रम से रोकने का यत्न।

हरिचरण (की पौड़ियां) लवपुर (लाहौर) 1 जनवरी 1888

संबोधन पूर्वोक्त, आप कृपा करके यहां शीघ्र पधारिये। यहां आने पर किसी प्रकार का विरोध नहीं रहेगा। मेरा और आप का

प्रत्येक बातचीत में अविरोध (एक मत) है। लोगों से कुछ सुन या ऊपर की किसी कार्वाई से कोई परिणाम कदापि न निकाल लेना, जब तक कि सन्मुख बात चीत करने से आप यह न देख लोगे कि सेवक नितान्त आप से एकमत और एकचित है।

लेखक, राम।

(229) दोनों लोकों का क्षेत्र हमारे वाग़ का कोणा है। 25 जनवरी 1888

संबोधन पूर्वोक्त, कृपा पत्र मिला आनन्द हुआ।

(1) हासले हर दो जहां खोशाप अज़ खरिमने-मास्त। साहते-कौनो-मकान गोशाप अज़ गुल्वुने-मास्त॥

(भावार्थः - दोनों लोकों की आमदनी (आयः) हमारे खिलवाड़े (धान्यकोष्ठ) का एक गुच्छा (सिट्टा) है, और दोनों लोकों का क्षेत्र (मैदान) हमारे वाग़ का एक कोणा है, अर्थात् हमारे स्वरूप के साक्षात्कार की अपेक्षा से यह सब कुछ भी नहीं)।

मेरा थोड़े दिनों का एक दोहा है। हे मृग तेरी सुगन्ध सों भयो यह वन भरपूर। कस्तूरी तो निकट है क्यों धावत है दूर॥

लेखक, राम।

(230) अद्वैत अमृत-वर्षिणि सभा की स्थापना। 5 फरवरी 1888

संबोधन पूर्वोक्त, कल भेंट की जावेगी। यहां अद्वैत अमृतवर्षिणि सभा

स्थापन की है जिस में विशेष करके साधु महात्मा ही प्रविष्ट हैं। इसके एकत्र होने का स्थान मेरा ही घर है, और प्रत्येक वृहस्पतिवार (गुरुवार) को संमेलन होता है (अर्थात् सभा लगती है), जिस में उपदेश इत्यादि भी होते हैं। पर केवल वेदान्त पर।

लेखक राम।

(231) एकान्त सेवन और अन्तर्मुख होने का फल। 15 फरवरी 1888

संबोधन पूर्वोक्त, इस में कुछ संदेह नहीं कि जो आनन्द एकान्त सेवन और अंतर्मुख होने में है, और कहीं नहीं। और क्रोड़ों (कोटिशः) अश्वमेध यज्ञ किये हुए हों तो नित्य स्वरूप में निष्ठा रहती है।

लेखक, राम।

(232) बाहर होली और भीतर समाधि। 8 मार्च 1888

संबोधन पूर्वोक्त, मिडिल परीक्षा का परिणाम कल निकल गया। मेरे मकान (स्थान) के समीप इस समय बड़ा रौला (शोर) होली के कारण पड़ा हुआ है। पर आप की कृपा से चित्त के भीतर (अथवा हृदय स्थान) में किसी प्रकार का शोर (शब्द) नहीं। आनन्द है। जिस प्रकार शिव जी के चारों ओर भूत प्रेत रौला और वावेला (शब्द और शोर) मचाते रहते हैं, पर वह आनन्द की समाधि में निर्विघ्न मग्न रहते

हैं, इसी प्रकार संसार के जीव अज्ञान की कालिमा और गुलाल मुखों पर मल अपने निज स्वरूप को छुपा कर नित्य शोर मचाते रहते हैं। तथापि शिव स्वरूप (अपने आप) में किसी क़दर निवास होने के कारण धीर समुद्र में रहने का सुख है।

अब आपके सेवक को एफ.ए के गणित-शास्त्र की वार्षिक परीक्षा का भी परीक्षक बनाया गया है। फ़ारसी और संस्कृत भाषा के विद्यार्थियों के लिये।

लेखक, राम।

(233) मिज़ाज पुरसी (प्रकृति संबन्धी प्रश्न) का उत्तर। 18 मार्च 1888

संबोधन पूर्वोक्त, आप के दो कृपा पत्र मिले। अत्यन्त आनन्द का कारण हुए। एक राजा ने एक महात्मा से पूछा कि आप की प्रकृति कैसी है? उन्हों ने उत्तर दिया कि:—"जिस की इच्छा बिना एक पर्ण (पत्ता) न हिल सके, जिसकी आज्ञा सूर्य और चन्द्र मानें। जल और वायु जिसकी आज्ञा को एक क्षणमात्र के लिये न तोड़ सकें, जहां चाहे हर्ष भेज और जहां चाहे शोक भेज दे, और ऐ राजन्! जिसकी आज्ञा के बिना तेरे मुख के दाँत नहीं हिल सकते, और जिसकी इच्छानुसार राजाधिराजों की नाड़ियों में रुधिर चक्कर लगाता है, ऐसे सामर्थ्यवान (सर्व शक्तिवान्) के आनन्द का क्या ठिकाना (अन्त। है। हे राजन्! तू आप ही अनुमान कर ले।"

राजा बोलाः—धन्य हो आप, ऐसा ही है। जिसका

अल्पत्व भाव उठ गया है, और जिस की जीव-बुद्धि नष्ट हो गयी है, और ब्रह्ममय हो गया है, वह प्रजापति स्वरूप (ब्रह्मा) हुआ समस्त जगत् के सारे काम कर रहा है। और उसकी सारी इच्छायें नित्य पूरी हो रही हैं। और आनन्द का समुद्र है।

"अहो अहं! यस्य मे नास्ति किञ्चन्। अथवा यस्य सर्वं यद्दृष्टं मनसि गोचरं॥"

भगवान् शंकर कहते हैं:—वाह कैसा सुन्दर और आश्चर्य है मेरा अपना आप! कि जिस मेरे अपने आप का जितना यह जगत् है (जो कुछ दृष्टि श्रवण और चिन्तन में आ सकता है), यह सब कुछ जिस मेरे अपने आप का है (परन्तु ऐसा होते हुए भी मेरे अपने आप का कुछ नहीं है), ऐसा जो मैं हूं उसके तई मेरा बहुत २ नमस्कार और प्रणाम है"।

आज कल काम बहुत अधिक रहा। परीक्षाओं के निकट होने के कारण से। कालेज की परीक्षाओं के लिये भी प्रश्नपत्र बनाने थे। साथ इस के विद्यार्थियों के संकट भी निवारण करने हैं। किन्तु चित्त एकान्त में रहा।

लेखक राम

(234) लोगों का परिचय कम करना। 6 अप्रैल 1888

संबोधन पूर्वोक्त, आप का कृपा पत्र मिला, अत्यन्त आनन्द हुआ। परीक्षा पत्र (पर्चे) बहुत हैं। परन्तु देखे अभी थोड़े हैं। विशेषतः सत्संग के कारण पर्चे (परीक्षापत्र) कम देखे जाते हैं। पर लोगों का परिचय मैं प्रति दिन कम कर रहा हूं। आप से

मिलने को जी (चित्त) चाहता है, वेसाखी (मेला) को एकत्र (अकेट्ठ) कहीं जायँ, तो अति उत्तम हो।

लेखक राम

(235) सब वेद वेदांग हमारे भीतर हैं। 17 अप्रैल 1888

संबोधन पूर्वोक्त, *कद्रास की यात्रा ने जो उपदेश दिया, वह अत्यन्त ठीक है। जो सुख एकान्त सेवन और निजधाम में है, वह कहीं भी नहीं।

"हे मृग तेरी सुगंध सों भयो यह वन भरपूर। कस्तूरी तो निकट है क्यों धावत है दूर॥"

अपना ही आनन्द जगत् के पदार्थों में आनन्द भावना कर दिखलाता है। सब वेद वेदांग हमारे भीतर ही हैं।

लेखक राम

(236) मिशन कालेज के बी-ए वर्ग की वार्षिक परीच्षा का परिणाम। 24 अप्रैल 1888

संबोधन पूर्वोक्त, आज बी-ए की परीक्षा का परिणाम निकला है। मिशन कालेज के विद्यार्थी सब कालेजों से अधिक पास (उत्तीर्ण) हुए हैं। और मेरा एक विद्यार्थी पंजाब में तीसरा नम्बर रहा

[पादटिप्पणी:] * कदासराज एक तीर्थ का नाम है जो पिंडदादनखाँ नगर और ख्योरा की निमक की खान के समीप है। यहां प्रति वर्ष वेसाखी के दिन मेला लगता है और इस मेले में साधु महात्मा बहुत दूर २ से आकर एकत्र होते हैं।

है। और जो विद्यार्थी प्रथम रहा, वह एक वर्ष और आठ मास मेरे पास हमारे कालेज में पढ़ता रहा, पीछे किसी साहिब से लड़ कर आर्या-कालेज में जा प्रविष्ट हुआ था। और जो विद्यार्थी द्वितीय रहा, वह भी मेरा परिचित (मित्र) गवर्नमेंट कालेज में पढ़ने वाला था। यह सब आप की कृपा है। दया रक्खा करें। गणित शास्त्र में इस बार तैंस (23) में से केवल तीन फेल (अनुत्तीर्ण) हुए हैं।

लेखक, राम

(237) एकान्त सेवन में अधिक आनन्द। 26 अप्रैल 1888

संबोधन पूर्वोक्त, पिछले दो तीन दिन प्रकृति किंचित तंग (दुःखित) रही है। ऋतु कठिन (प्रतिकूल) है। आज कुछ कुशलता प्रतीत होती है। सर्व साधारण के संमलन (मेल मुलाकात) की अपेक्षा से एकान्त सेवन में अधिक आनन्द और सुख है।

लेखक, राम।

(238) तीक्ष्ण वस्तुओं का त्याग और ऐफ़-ए की परीक्षा का परिणाम। 28 अप्रैल 1888

संबोधन पूर्वोक्त, मुझे अब पहिले से कम श्लेष्म (रेशा) है। तीक्ष्ण वस्तुओं का सेवन आज कल नितान्त त्याग देना चाहिये। सर्व विकार इन से उत्पन्न होते हैं। इन से तृषा लगती है और अधिक जल तब बहुत हानिकारक होता है। ऐफ-ए की वार्षिक परीक्षा का परिणाम निकला है। मिशन कालेज का विद्यार्थी पंजाव में प्रथम रहा है, और यहां के विद्यार्थी भी

अन्य सब कालेजों की अपेक्षा से अधिक पास (उत्तीर्ण) हुए हैं।

लेखकराम

(239) चित्त अचल। 25 मई 1888

उपमा पूर्वोक्त, आप का कृपा पत्र (मिला), आनन्द हुआ। आप की दया से चित्त दिन प्रति दिन अचल होता जाता है। इस में किंचित् विशेप नहीं होता। मेरे शारीरिक व्यवहार से चित्त वृत्ति का अनुमान करना (अन्दाज़ा लगाना) ठीक नहीं। पिछले दिनों काम किंचित् विशेष रहा।

(240) खरबूज़ा खाने का फल। 31 मई 1888

संबोधन पूर्वोक्त, आप की दया से बहुत आनन्द है। खरबूज़ा खाना मस्तिष्क (दिमाग़) को थोड़े काल के लिये अति लाभदायक प्रतीत होता है, परन्तु अन्त में अत्यन्त हानिकारक सिद्ध होता है। प्रकृति को तंग (दुःखित) रखता है और उदर को विगाड़ता है॥

लेखक, राम।

(241) गणित शास्त्र पर गुसाईं तीर्थराम जी का लेख*। 1 जून 1888

संबोधन पूर्वोक्त, जो पुस्तक मैं ने बनाई है, उस की एक प्रति भी मेरे पास

[पादटिप्पणी:] * यह पुस्तक (नामः—How to excel in Mathematics) पहिले

नहीं है। लाहौर के अनारकली बाज़ार में लाला रामकृष्ण एंड संस अंग्रेज़ी पुस्तक बेचने वाले की दुकान पर बिकती है।"...........पुस्तक का मूल्य चार आना है। पुस्तक पर सहित विज्ञापन की छपाई के एक सौ पच्चीस (125) रु० खर्च आये हैं। एक सौ प्रति पुस्तक की मैं ने मुफ़्त बांटी है। भारत वर्ष के अंग्रेज़ी गणितशास्त्री जनों ने अत्यन्त उत्तम समालोचनाएं इसकी प्रशंसा में दी हैं॥

लेखक, राम।

(242) घट में घट जाना।

हरिद्वार, 14 अगस्त 1888

संबोधन पूर्वोक्त, आज ठाकुरदास को लाहौर भेज दिया है। इतने दिनों में यहां के देखने योग्य (मुख्य 2) स्थान देखे हैं। सन्तों के दर्शन किये हैं। अब आज (तृप्त होकर) अपने घर के द्वार बन्द करके अपने घट में घट जाने को जी (चित्त) चाहता है। महाराजा जम्मू की हवेली में ठहरा हुआ हूं। मेरे रहने का स्थान (कमरा) हरिद्वार में सब से उत्तम है॥

लेखक, राम।

[पादटिप्पणी:] अंग्रेज़ी विभाग चौथा (Vol IV. English Complet works of Rama) में छपवाई गई थी, अब अलग पुस्तकाकार प्रकाशित की गई है।

† यह ठाकुरदास गुजरांवाले का विद्यार्थी था। मिशन कालेज लाहौर में गुसाईं तीर्थराम जी के पास पढ़ता था। निर्धन होनेके कारण गुसाईं जी ने इस की फ़ीस भी कालेज कमेटी से आधी मुआफ करवा दी थी। इसका छोटा भाई इसका हम जमाअत (सहपाठी) था, उसकी फीस

(243) घर आने की प्रार्थना पर उत्तर।

ऋषीकेश समीपस्थ तपोवन, 23 अगस्त 1888

संबोधन पूर्वोक्त, एक कृपा पत्र मिला, जिस में घर आने के लिये प्रेरणा थी। इस पत्र को लेकर मैं ने तत्काल परमधाम को भेज दिया, अर्थात् श्री गंगा जी में प्रवाह दिया। यदि कोई कुटुम्ब (गृहस्थ) संबन्धी शोक के विषय में पूछो तो आप की अत्यन्त कृपा है।

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्त मध्यानि भारत। अव्यक्त निधनान्येव तत्र का परिदेवना॥

अर्थः—इन पदार्थों के आदि और अन्त का पता नहीं। केवल मध्य २ पता है, ऐसी अवस्था में शोक किस काम का? रहा लोगों के गिले उलाहने (उपालम्भ), उन के विषय में यह प्रार्थना हैः—

कफ़न बांधे हुए सिर पर तिरे कूचे में आ बैठे। हज़ारों ताने अब हम पर लगा ले जिस का जी चाहे॥

भावार्थः—ऐ प्यारे! तेरे द्वार पर शव बख़ सिर पर ओढ़े हुए हम बैठे हैं (तेरे निमित्त मरने के लिये उद्यत हैं)। अब हमें कोई चिन्ता नहीं, जिस का चित्त चाहे, अनन्त उपालम्भ लगाये।

[पादटिप्पणी:] भी आधी मुआफ करवा रक्खी थी। इस लिये यह दोनों प्रतिदिन गुसाईं जी के पास आ या जाया करते थे। इस बार गुसाईं जी ठाकुरदास को हरिद्वार अपने साथ ले गये। इन का घर गुजरांवाले में भगत घन्नाराम जी के घर के पास है। आज कल यह प्यारे गुजरांवाले खालसा स्कूल में हेडमास्टर हैं।

हे भगवन् ! आप ही की आज्ञा पालन कर रहा हूं। अपने घर ( निज धाम ) को जा रहा हूं। आप के वास्तविक स्वरूप से मिल रहा हूं। पंजाब जो पाँच नदियों ( रक्त, वीर्य, मूत्र, स्वेद, राल, ) से मिल कर बना हुआ हमारा शरीर है, इस के अध्यास को त्याग कर ही अपने वास्तविक धाम ( हरिद्वार ) की प्राप्ति होती है।

इस समय रात के दस बज चुके हैं। न मनुष्य है, न मनुष्यत्व का चिन्ह है, अन्दर से अनाहद (अनाहत) की घंघोर है और बाहर से श्रीगंगा जी ने अनाहत की गर्ज लगा रक्खी है। भीतर से शांति है और बाहर से आनन्द है। यार (अपने स्वरूप) से मिलने वाली अन्धेरी रात ने जगत् के नाम रूप पर कालिमा फेर रक्खी है अर्थात् जगत् को बाहर और भीतर दोनों ओर से शून्य कर दिया हुआ है। इस अन्धेरी रात्रि में क्या भीतर क्या बाहर? सन्मुख उलटते हुए अमृत के दरया (नदियें) बह रहे हैं। ऐसे समय पर जगत् (संसार) का स्मरण कराना? हाय शोक!

"ऐ स्कन्दर ! न रही तेरी भी आलमगीरी। कितने दिन आप जीया जिस लिये दारा मारा॥

भावार्थः—ऐ बादशाह स्कन्दर! तेरी भी विश्वजित् अन्त में न रही, यह बता कितने दिन आप जीया जिस दुर्लभंगर जीवन निमित्त तू ने अपना भ्राता दारा मारा।

चिः निस्वत खाक रा व आलिमे-पाक।

भावार्थः—पर आप जैसे शुद्धात्मा महापुरुष की उस विषयगामी तथा देहाभ्यासी सकन्दर से भला क्या तुलना।

घर वालों को कह दो कि मिलना अब केन्द्र पर ही उचित

है, जहां पर मिलने से फिर जुदाई (पृथकत्व) न हो।

स्फुरत्स्फारज्योत्स्ना धवलिततले क्वापि पुलिने सुखासीनाः शान्त ध्वनिषु रजनीषुद्धसरितः (भर्तृहरि वैराग्य शतक)

[भावार्थः—जहां पर उज्ज्वल और विस्तारित चान्दनी के सदृश जल है, ऐसे गंगा तट पर आराम से (सुख पूर्वक) बैठा रहूं। जब सारे शब्द (अथवा ध्वनियें) बंद हों, तब रात्रि में शिव शिव शिव (प्रणवरूप) हृदय वेदक ध्वनि द्वारा सांसारिक दुःख और शोक से मुक्त होकर आनन्दाश्रुओं से नेत्रों का होना सफल करूं। ऐसे मेरे दिन कब आयेंगे?]

राजा लोग, राज पाट का त्याग करके, ऐसे आनन्द की इच्छा करते थे। देवतागण स्वर्ग, वैकुण्ठ का ध्यान छोड़कर इस गंगा तीर की कामना रखते थे। तो मेरी ही भला प्रारब्ध क्या फूट गयी जो इस प्राप्त भेद आनन्द को छोड़ कर भूठे पदार्थों के पीछे दौड़ूं?

लोग तीर्थों पर आया करते हैं। तीर्थ कभी लोगों के पास चल कर नहीं जाते। घर वालों को कह दो कि तीर्थ में रमण करने वाला जो तीर्थराम परमात्मा है, उसके चरणों में चलें, तब तीर्थराम गुसाईं का मिलाप हो सकता है। नहीं तो नहीं। जब तक हमारे घर में सत्संग रूपी गंगा न बहेगी, मेरा वहां चित्त नहीं लगेगा। एक पल भर नहीं ठैहर सकूंगा।

मरे हुओं को मिलने के लिये लोग उन को संदेशा भेज कर अपने पास नहीं बुला सकते। अलबत्त आप मर कर उन से मिल सकते हैं। हम तो मर चुके। जीते जी ही मर चुके। घर वाले हम को बुलाने का यत्न न करें। हम जैसे हो जायेंगे, तो तब मेल बहुत सुगमता से हो सकता है।

मुराली वाला यदि मुरारी वाला होकर तीर्थ बन जाये, तो तीर्थों को रमणीक बनाने वाला तीर्थराम वहां आ सकता है। सत्वगुण की गंगा जहां न हो, हमारा वहां होना कठिन है।

जब सब ही ने अन्त में सूखे फूल (हड्डियां) बन कर गंगा में आना है, तो क्यों नहीं अपने हरे फूल की न्याई शरीर को ध्यान गंगा में आनन्द पूर्वक प्रवाह देते? अथवा अपनी अस्थियों को ईंधन बनाकर, मज्जा रूपी घृत डाल कर, प्राण रूपी वायु से ज्ञानाग्नि में स्वाहा कर देते? और इस प्रकार नरमेध का पुण्य लेते?॥

यहां आठ पहर में केवल रात्रि को सन्तो के दर्शन के लिये कभी बाहर निकलना होता है। नहीं तो कोई आना जाना नहीं। और आठ दिन में केवल आदित्यवार को ब्राह्मणों और सन्यासियों की सभा में व्याख्यान देने के लिये जाना पड़ता है। और कहीं नहीं॥

पाँच छे दिन हुए कोई सौ के लगभग महात्माओं का भोजन कराया था। अत्यन्त आनन्द हुआ। यहां सत्वगुण का प्रभाव था। इन दिनों वालमुकुन्द और ठाकुरदास दोनों को रवाना करदिया हुआ है।

आप का अपना आप, तीर्थराम।

नोटः—गुसाईं तीर्थराम जी तीव्र वैराग्य वश हुए इस बार हरिद्वार, हृषीकेश और तपोवन एकान्त अभ्यास के लिये आये थे। उन के पिता जी ने कुछ पत्र इन को लिखे होंगे। जब उन के एक पत्र का भी उत्तर उन को न मिला, तो उन्हों ने भगत धन्नाराम जी को पत्र लिखने के लिये प्रार्थना की। जिस पर भगत जी ने अपनी ओर से बहुत युक्ति सहित विस्तार पूर्वक गुसाईं जी को वापस घर में शीघ्र आने के लिये लिखा जिस का यह पत्र उत्तर है। पर इस उत्तर के पश्चात् फिर

(242) क्या हम अकेले हैं। ब्रह्मपुरि, तपोवन लक्ष्मण झूला के समीप, 30 अगस्त 1888

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

अर्थः—पूर्ण वह (लोक) है, पूर्ण यह (लोक) है, पूर्ण से पूर्ण निकाल लिया जाय, पूर्ण का पूर्ण लिया जाय तो पूर्ण ही बाकी रह जाता है।

क्या हम अकेले हैं।

(1) तनहास्तम तनहास्तम दर बैहरो बर यक्तास्तम। जुज़ मन नबाशद हेच शै मन जास्तम मन मास्तम॥

भावार्थः—(1) मैं अकेला हूं, मैं अकेला हूं, पृथिवी और समुद्र में भी अद्वितीय हूं। मेरे से अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु नहीं है। मैं ही भूमि हूं, मैं ही जल हूं।

कोई विद्यार्थी साथ नहीं, नौकर पास नहीं, ग्राम बहुत दूर है। मनुष्य का नाम काफूर (कपूर वत् उड़ा हुआ) है। अरण्य है, सुनसान् है; तारों भरी रात, आधी इधर, आधी उधर, पर क्या हम अकेले हैं?

अकेली हमारी बला! अभी वर्षा लौपड़ी स्नान कराकर गयी है। हवा बांदी (दासी) चारों ओर दौड़ रही है। वह

गुसाईं जी की लेखनी ने भगत जी को पुनः उस पदवी तथा उपमा से नहीं संबोधन किया जो आज तक वह सन् 1889 से करते आये थे। और जल्वा कोह सार नामी उर्दू पुस्तक में राम ने स्वयं अपनी लेखनी से इस उत्तर को और विस्तार देकर दिया है, वहां इसे पुनः देखो

किसी प्यारे ने वृक्षों में से आवाज़ दी "हाज़र जनाब" (अर्थात् सेवक उपस्थित है)। (प्रतीत होता है सिंह-नाद है अथवा हस्ती की गर्ज)। सैकड़ों नौकर हमारे आधियों में दबे बैठे हैं, बिलों में शयन कर रहे हैं।

हम अकेले क्यों?

पर हां हम अकेले हैं। खादमवादम (नौकर चाकर) कोई अन्य नहीं हैं, हम ही हैं; यह वृक्ष नहीं है, हम ही हैं; पवन नहीं, हम ही हैं; गंगा कहां? हम हैं; यह चाँद नहीं, हम हैं; परमात्मा नहीं, हम हैं; प्रियवर कौन? हम हैं; मिलाप क्या? हम हैं। अरे "अकेले" का शब्द भी हम से दौड़ गया।

(2) ई नारह-ओ-ई नारह ज़नो नीज़ ई सहरा। अशजारो कोहस्तानो शवो रोज़ो नगारा॥ ई मारो मायूक़ वसालो देमे-हिजरां। वाद अन्जमो गंगा जलो अवरो महे-तावां॥ कागज़ कलमत चशमत व मज़मून व तो खुद जां। ई जुमलगी रामस्त मरा दां मरा दां॥

(2) यह गर्ज, यह गर्जनेवाला, और यह अरण्य. वृक्ष, पर्वत, रात, दिन, भ्रमरका (जुल्फ, बाल) और प्यारा, मिलाप और विरह का समय, वायु, तारे, गंगाजल, वादल और चमकता हुआ चाँद, कागज़, लेखनी और मेरे नेत्र, विषय और ऐ प्यारे! तू स्वयं, यह सब के सब राम है, ऐसा मुझको समझ, ऐसा मुझको समझ।

हमारा पता पूछो तो यह है।

निशानम बेनिशां मे दाँ। मकानम दर कुलव मे खां॥ जहां दर दीदआम पिन्हाँ। मरा जोयन्द गुस्ताखां॥

भावार्थः—मेरा निशान बेनिशान समझ। मेरा स्थान अपने हृदय में देख। जगत् मेरी दृष्टि में छुपा है। मुझ को नशंग पुरुष (विरक्त जन) ढूँढते हैं।

क्या हम बेकार (निष्क्रिय) हैं।

मन का मानसोवर अमृत से लबालब (भरपूर) हो रहा है, और आनन्द की नदी हृदय में से बह रही है। प्रत्येक रोम कृत-कृत्य है। विष्णु के भीतर सत्वगुण इतना भरपूर हुआ कि समा न सका। उस सत्वगुण के स्रोवर (धारा) से चरणों द्वारा गंगा-जल बन कर सत्वगुण वह निकला। ठीक उसी प्रकार से इस समय

नारा (जल या सत्वगुण) में शयन करने वाला=नारायण तीर्थ (जल रूप-सत्वगुणी) में रमण करनेवाला या तीर्थों को रमणीय (शोभावाला) बनानेवाला =तीर्थराम नारायण

सत्वगुण या आनन्द से भरपूर हो रहा है। उस का ब्रह्मानंद समेटे से समिटता नहीं। परमानन्द की सरिता या स्रोत बन कर यह तीर्थराम साक्षात् विष्णु, पूर्णानन्द की धारा जगत् को कृतार्थ करने के लिये भेज रहा है। प्रसन्नता और विश्रामता की विभातवायु संसार को भेज रहा है। कौन कहता है वह बेकार (निष्कर्मी) बैठा है? मैं सच कहता हूं इस तीर्थराम के दर्शनों से कल्याण होता है, वह गंगा है, वह तुर्या राम है, वह राम है।

धन्य भूमि धन्य काल देश वह। धन्य माता, धन्य कुल, धन्य समधी। धन्य धन्य लोचन करहें दरस जो। राम तिहारो सर्वत्र समधी॥

मेरी।

बाँकी अदायें देखो! चँद का सा मुखड़ा पेखो (टेक) वायु में, बहते जल में, बादल में मेरी लटकें। तारों में, नाज़नीं में, मोरों में मेरी मटकें॥ (टेक) चलना ठुमक ठुमक कर, बालक का रूप धर कर। घूँघट अवर उलट कर, हंसना यह बिजली बन कर। शबनम गुल और सूर्य, चाकर हैं तेरे पद के। यह आन बान सज धज, ऐ राम! तेरे सदके॥ (टेक)

जगत् सारा वार डारूं, राम तेरे नाम पर। इन्द्र ब्रह्मा वार डारूं, राम! तेरे धाम पर॥

मैं कैसा सुंदर हूं! मेरी सोहनी (सुन्दर) सूरत, मेरी मोहनी मूर्त, मेरी झलक, मेरी डलक, मेरा सौंदर्य, मेरी शोभा (कांति), इस को मेरी चक्षु से अतिरिक्त किसी की आँख देखने की ताव (शक्ति) साहस नहीं ला सकती।

आज कल लक्ष्मण झूले से परे गंगा तट पर पर्वतों में निवास है। गंगा क्या है विराट भगवान् का हृदय। परमात्मा के हृदय या छाती पर परमात्मा का आत्मा बनकर विश्राम करता हूं।

लेखक, राम

(245) मेरा अटल राज, बड़े बड़े प्रताप हरिद्वार 16 सितम्बर 1888

ॐ सिध्यते हृदय ग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वे संशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥

अर्थः—उस परम स्वरूप के दर्शन से हृदय की सब ग्रन्थियां खुल जाती हैं, सारे संशय दूर हो जाते हैं और सब कर्म नष्ट हो जाते हैं।

बाहर जिस ओर ध्यान करता हूं, प्रत्येक परमाणु से इस भंकारे की गूंज (गर्ज) उठती है। तत्वमसि (तू ही है, तू ही है)। अन्दर की ओर मुख करता हूं (अर्थात् ध्यान देता हूं) तो यह ढोल कुछ और सुनने नहीं देता। अहं ब्रह्मास्मि, अहं ब्रह्मास्मि। (मैं कहां हूं, क्या हूं), मेरे महलों में कौन, कब, क्या, इत्यादि चू चरा (क्यों, कब) को पहुंच नहीं। मन को बन्दरों ने छीन लिया, बुद्धि गंगा में बह गयी। चित्त को चीलें (पक्षी) चाब गयी। अहंकार मछलियों की भेंट हुआ। पापों को हवा उड़ा ले गयी। सारा संसार जीत लिया है। मेरा अटल राज, बड़े बड़े प्रताप।

नास्ति ब्रह्म सदानन्दमिति मे दुर्मतिः स्थिता। क गता सा न जानामि यदाह तद्बपुः स्थितः॥

अर्थः—"मैं ब्रह्म नहीं हूं, ऐसी मेरी गधे (गर्दभ) की बुद्धि थी। मैं नहीं जानता कि वह बुद्धि अब कहां छुप गयी, किधर उड़ गयी, कहीं दृष्टि में नहीं आती।

चश्मे लैला हूं दिले-कैस व दस्ते-फरहाद। बोसा देना हो तो दे ले, है लबे-जाम मेरा॥

(अर्थः—लैला की चक्षु हूं। मजनु का दिल और फरहाद का हाथ हूं। मेरा ओष्ठ समीप है यदि चूमना हो तो चूम ले।

लेखक, राम

(246) दुन्या नहीं, पार्वती है। लाहौर 28 सितम्बर 1888

आ मेरे भंगिया! तू आ भंग पी जा। आ मेरे भंगिया! निशंग भंग पी जा॥ भर २ देनीयां में भंग के प्याले। निशंग भंग पी जा, निहंग भंग पी जा॥

प्रकृति (दुन्या) नहीं पार्वती है, भंग सर्वकाल घोट रही है। शिव की आँख खुली, प्याला झट हाज़र (तय्यार) हुआ। बल्किः इस को भंग या मदिरा (शराब) कहना भी ठीक नहीं। यह तो शराब का नशा है, यह तो भंग की मस्ती है। आप को मेरी क़सम (शपथ), सच कहो इस मस्ती और आनन्द के बिना जगत् तीन काल में कभी कुछ और भी हुआ है? कदापि नहीं।

मैं यह नशा, यह मस्ती, शिव, भला क्या सोचूं क्या समझूं? राम क्या सोचे समझे?

(1) सोचना अविज्ञात वस्तु के लिये होता है, उसे सब विज्ञात है।

(2) सोचना अदृष्ट वस्तु के लिये होता है, उस के लिये सब दृष्ट है।

(3) सोचना किसी इष्ट प्राप्ति के निमित्त होता है, उस की समस्त इच्छायें सदा प्राप्त हैं। जिस को संसार में सोच समझ और बुद्धि कहते हैं, यही महान् मूर्खता है।

जित देखूं तित भरया जाम। पी पी मस्ती आठों याम॥

नित्य त्रिप्त सुख सागर नाम। गिरे बने हम तो आराम॥ देखा सुना खपाना काम। तीन लोक में है विश्राम॥ क्या सोचे क्या समझे राम। तीन काल जिस को निज धाम॥

महा वाक्य।

(1) घुंड कढ़ के क्यों चन्न मुँह उत्ते, ओहले रहों खलो? ,, फकीरा! आपे अल्लाह हो।

(2) तेरे घट विच राम वसेंदा. क्यों पया भरना हैं तो? ,,

(3) राम रहीम सब वंदे तेरे, तैनूं किसदा भौ? ,,

(4) तू मौला नहीं वंदा चंदा, भूठ दी छुड दे खो। ,,

(5) छुड मौहरा सुन राम दोहाई, अपना आप न कोह ,, राम

(247) राम का नाच। 1 अक्तूबर 1888 अज़ लामकां लेखक श्री *धन्नाराम,। (स्थानातीत से) मा रा नकुनेद याद-हरगिज़। मा खुद हस्तेम याद बे मा॥

भावार्थः—मुझ को आप याद कदापि नहीं करते, अथवा न करें, हम स्वयं अपने अहंकार से रहित हुए याद स्वरूप हो गये हैं।

रो के जो हल्तमास की, दिल से न भूल्यो कभी। हुई मिटा, अहद बना, उसने भुला दिया कि यूं॥

* यह पत्र गुसाईं तीर्थराम जी ने अपने गुरु जी से ऐसा अभेद होकर लिखा है। कि अपने स्थान पर गुरु का नाम लेखक के रूप में लिख मारा है।

(भावार्थः—मैं ने प्रार्थना की कि मुझे चित्त से कदापि न न भूलिये। पर उत्तर में उस ने अपना द्वैत भाव मिटा दिया, और इस प्रकार से मुझे और परिच्छिन्न अपने आप दोनों को नितान्त भुला दिया)।

आज तो नाचने को चित्त चाहता है। नाचूं मैं नट राज रे, नाचूं मैं महाराज (टेक)

(1) सूरज नाचूं, तारे नाचूं, नाचूं घन महताब रे। (2) ज़र्रह नाचूं, समुद्र नाचूं, नाचूं मेघरा काज रे॥ (3) तन तेरे में †मन हो नाचूं, नाचूं नाड़ी नाड़ रे। (4) वादर नाचूं, वायु नाचूं, नाचूं नदी अरु नाव रे॥ (5) गीत राग सब होवत हरदम, नाचूं पूरा साज़ रे। (6) घर लागो रंग, रंग घर लागो, नाचूं पापा दाज रे॥ (7) मधुशा लव, बदमस्ती वाला, नाचूं पी पी आज रे। (8) राम ही नाचत, राम ही वाचत, नाचूं हो निरलाज रे॥

(248) व्याधि रूपी भांडों का मुजरा (नाच) लाहौर 6 नवम्बर 1888

ॐ श्री

सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म, आनन्दामृत, शान्ति निकेतन मंगल मय शिव रूपं, शुद्धमपाप विद्धं॥

हमारे शरीर रूपी महल में कुशलता रूपी कंचनी को अपना राग रंग सुनाते और तमाशा दिखाते बहुत काल हो गया था। अब ज्वर, उदर पीड़ा, श्वास रोग और खांसी रूपी भांडों के मुजरे (नाच) की बारी थी। सो उन्हों ने एक पूरा सप्ताह अपनी शोर गुलवाली (हू हा कार रूपी) नकलों

† मन के स्थान पर कहीं दम भी लिखा है।

से धूम मचाये रक्खी। कालेज का जाना बंद रहा, आज भाई गुरुदास और (ब) भी यह तमाशा देख कर मुरारी वाला को पधारे हैं।............

(249) वास्तविक आनन्द अधिकतर है। ॐ श्री 8 नवम्बर 1888

संबोधन पूर्वोक्त,

शरीर में श्लेष्म अभी है। मिशिन कालेज की नौकरी में शायद कोई हल चल शीघ्र पड़ जाये। वास्तविक (भीतरी) आनन्द दिन प्रति दिन अधिकतर है।

मरे न टरे न जरे हरे तम, परमानन्द सो पायो। मंगल मोद भरयो घट भीतर, गुरु श्रुति 'ब्रह्म त्वमेव' बतायो। लय मुझ में सब गयो रह बाकी, वासुदेव सोहं कर आकी। टूटी ग्रन्थी अविद्या नाशी, ठाकुर सत्य राम अविनाशी। राम।

(250) सूर्य में न रात है न दिन। ॐ, ॐ ॐ 8 दिसम्बर 1888

संबोधन पूर्वोक्त, आनन्द, आनन्द, आनन्द, बहुत आनन्द है।

रात और दिन केवल पृथिवी ही के लिये हैं, सूर्य में न रात है न दिन है। वहां तो प्रकाश ही प्रकाश है। सुख, दुःख तृष्णा, और सन्तोष सांसारिक लोगों के लिये हैं, आप तो

परमानन्द घन हो। प्रकाश ही प्रकाश हो।

रामः—अहनिश का सूर्य में नाश। अहं प्रकाश, प्रकाश, प्रकाश॥ अग्नि को ठंडक लगे, जल को लगे प्यास। आनन्द घन मम राम से क्या आशा को आश॥ इकाई ज़ात में मेरी असंखों रंग हैं पैदा। मज़े करता हूं में क्या क्या, अहाहाहा! अहाहाहा!! राम।

(251) बिना कौड़ी राम बादशाह। 11 दिसम्बर 1888

संबोधन पूर्वोक्त,

कृपा पत्र मिला। जिस में लिखा था कि "पता नहीं आप क्या ख्याल करते रहते हैं"। निश्चय जानो कि जिस तरह आप के गुज़रां वाले शरीर को पता नहीं कि तीर्थराम क्या ख्याल करता रहता है, ठीक उसी तरह आप के लाहौर वाले शरीर को भी कुछ पता नहीं कि राम क्या ख्याल करता रहता है। राम में कोई ख्याल दृष्टि में नहीं आता, कोई ख्याल हो तो दिखाई दे। निःशंक स्वरूप और निर्मल चिदाकाश में ख्याल रूपी धूल कहां?

रामः—चिदाकाश निर्मल घन मांहि। फुरना धूल कदाचित् नांहि॥

पत्र लिखने में विलम्ब का एक यह कारण है कि कोई कार्ड लिफाफा पास नहीं था। कोई पैसा इत्यादि भी पहले न था। आज एक पुस्तक में से तीन टिकट मिल गये,

और आप का उत्तर मांगता हुआ कार्ड सन्मुख पाया। पत्र लिखा गया है।

यही हाल खाने पीने के सम्बन्धी पदार्थों (आटा घृत इत्यादि) के विषय में रहता है। आज लैम्प में तेल नहीं है, इस लिये आज रात घर नहीं ठहरेंगे। नगर के चारों ओर सैर की जायगी। दोनों हाथों में लड्डू हैं।

पूर्वोक्त वृत्तान्त से यह न अनुमान कर लेना कि हाय! हाय!! राम बड़ा धनहीन और दुःखी रहता है, कदापि नहीं। इस बाह्य निर्धनता और तंगी के कारण से ही आत्यन्तिक (परले सिरे की) धनाढ्यता और बादशाही कर रहा है। यह पाठ पक गया है कि जब किसी अर्थ को सिद्ध करने के साधन उद्यत न हों तो उसकी आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती। (और वास्तव में जब साधन पास न हों तो आवश्यकता का प्रतीत होना केवल भूटी भूख है)। पहिले तो बड़ी चिन्ता के साथ आवश्यकताओं को पूरा करने का यत्न हुआ करता था। पर अब आवश्यकतायें बेचारी स्वयं पूरी होकर सन्मुख आजायें, तो उन पर दृष्टि पड़ जाती है, नहीं तो उन के भाग्य में राम का ध्यान कहां? प्रारब्ध कर्म और काल रूपी सेवकों को सौ बार आवश्यकता हो, तो आन कर राम बादशाह के चरण चूमें। नहीं तो उस शाहनशाह को क्या परवाह है इस बात की कि अमुक सेवक मुजरा कर गया है कि नहीं।

रामः—सौ वार गर्ज़ होवे तो धो २ पीयें कदम। क्यों चखों-मिहरो-माह पै मायल हुआ है तू॥ खंजर की क्या मजाल कि इक ज़खम कर सके। तेरा ही है ख्याल कि घायल हुआ है तू॥ राम।

(252) ॐ 25 दिसम्बर 1888

संबोधन पूर्वोक्त, छुट्टियों में अभी तक तो कहीं शरीर के जाने का विचार नहीं, कुछ पता भी नहीं।

तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके। तदन्तरस्य सर्वस्य, तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः॥

भावार्थः - हम चल हैं, हम चल हैं नाहीं, हम नेड़े, हम दूर। अन्दर सब के चानन हम ही, बाहर हैं हम नूर॥ राम।