(3) मथुरा निवासी लाला नन्दकिशोर को पत्र।
ॐ प्रतापनगर रियासत टेहरी गढ़वाल अप्रैल 1902
प्यारे, प्रातः और सायं काल एकान्त में बैठ कर परमेश्वर का इस प्रकार ध्यान करो कि चित्त में समा जाये, या यों कि चित्त उस में लीन हो जाय।
ऐसे प्रकाश के रूप का ध्यान करो कि जो सूर्य के प्रकाश से भी अधिक तेज़ और चन्द्रमा की ज्योति से भी अधिक शीतल हो और सर्व व्यापक हो।
ऐसे प्रकाशमय ध्यान में कुछ काल लीन हो जाओ। फिर चित्त में यह भाव भर लाओ कि यह नाम रूप (शरीर इत्यादि) मेरा नहीं, प्रकाश स्वरूप परमात्मा का है। और वह प्रकाश स्वरूप आत्मा मेरा है। तात्पर्य यह कि इस शरीर और नाम को वेच दो और उस ज्योति स्वरूप आत्मा को खरीद लो। शरीर और शारीरिक आवश्यकतायें परमात्मा के अर्पण कर दो। वह जाने उसका काम। परमात्मा को तुम अपना कर लो, भूलेने न पाये। अपना विश्राम, अपना सुख और स्वास्थ्य परमात्मा में रक्खो।
तुम हमारे हो हम तुम्हारे हैं।
साथ इस के चलते फिरते बैठे खड़े अपने मन में ॐ (यह मंत्र) जपते रहा करो। यदि हो सके तो लाहौर, अनरकली मंडी, आनन्द प्रेस, से रिसाला अलफ की जितनी जिल्दें (प्रतियें) प्राप्त हो सकती हों मंगा लो, और उन्हें पढ़ा करो। इस प्रकार से सब रोग दूर हो जायेंगे। राम।