श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

(4) गुसाईं जी के दो पत्र अपने भतीजे

भाग 17-18 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 17-18 · अध्याय 13 / 15

(4) गुसाईं जी के दो पत्र अपने भतीजे

गुसाईं ब्रजलाल को।

(क) पुष्करराज (ज़िला अजमेर) फरवरी 1905

प्यारे आत्मदेव, ॐ आनन्द, आनन्द, आनन्द, जय! जय!! जय!!!

राम आज कल एकान्त सेवन कर रहा है। जब आप के देश की ओर आना होगा आप को सूचना दी जायगी।

(नोट) गुसाईं ब्रज लाल गोस्वामी तीर्थ राम जी के भतीजे थे। जब स्वामी राम गृहस्थाश्रम म थे, उन दिनों ब्रजलाल जी उन के पास रहते थे और वहीं की पाठ शाला में विद्या भी पाते थे। स्वामी जी की सफारश से इन को जम्मू रियासत में नौकरी मिलगई थी। पहिले यह हल्का पटवारियां में प्रविष्ट हुए, तत्पश्चात् तुरन्त कानूंगो की पदवी मिल गई और आज कल रियासत जम्मू जिला उत्तमपुर श्री रामवन तहसील में मुनसिरम के पद से सुशोभित हैं, और शायद नायब तहसीलदार शीघ्र होने वाले हैं, या सम्भव है कि अभी हो गये हैं। जब स्वामी राम गृहस्थाश्रम को त्यागने लगे, अर्थात् जब जंगलों में पधारने

प्यारे ! आप ने बहुत उन्नति की है, आप की लेखनी सिद्ध कर रही है। शाबाश शाबाश। पंडित रामधन जी इत्यादि सब को आनन्द।

जो खुदा को देखना हो तो मैं देखता हूं तुमको। मैं तो देखता हूं तुम को, जो खुदा को देखना हो।

आप का अपना, राम।

( 5 ) ख मौंट एवेरिस्ट के सन्मुख हिमालय 28 जून 1805

प्यारे व्रजलाल,

ॐ आनन्द, ॐ आनन्द, ॐ आनन्द,

तुम्हारा पत्र आया। प्यारे ! संसार में दो प्रकार के मनुष्य हैं, एक तो वह हैं जो नित्य अपना चित्त तंग रखते हैं, संतोष नहीं, धन्यवाद (कृतज्ञता) नहीं, अपने इदं गिर्दं के पदार्थों से अविरोध नहीं। बड़ी से बड़ी पदवी भी मिल जाये तो भी चित्त अशांत ही रखते हैं। इस बात का ध्यान नहीं कि मेरा पेट भरने को भोजन जब मुझे प्राप्त है तो मैं शान्ति से सत्संग और भजन को कुछ काल दूं, बल्कि यह भूत सिर पर सवार रखते हैं कि अन्य लोग अधिक रोटियां (भोजन) क्यों ले गये ? मैं पीछे क्यों रह गया ? इस प्रकार की अनुकृति करने वाले मनुष्य संसार में बहुत से हैं। यह लोग

कहें तो उस से किंचित् काल पहिले गुसाईं व्रजलाल को जम्मू नौकरी के लिये भेजा था। और केवल 5 वर्ष के भीतर 1 इतनी उन्नति पा जाने पर राम ने इन को शावास दी है।

आध्यात्मिक ज्ञान में बालक हैं। ऐसे लोग तुच्छ बुद्धि वाले हैं। ऐसे पुरुष उन्नति नहीं कर सकते। दूसरी भांति के लोग संसार में वह हैं कि जो प्राप्त कर्तव्यों को दत्तचित्त से पूरा करते हैं, और काम को ईश्वर कर्म या अपना कर्म समझ कर करते हैं। वेतन या दक्षिणा (फल) के ध्यान से नहीं करते बल्कि काम में स्वयं आनन्द लेते हैं। चाहे काम कैसा ही हो उस काम में प्रवीण (या प्रवीर) होना अथवा उस को अति उत्तम करके दर्शाना उन का लक्ष्य होता है। सफारश (गुणवर्णन पत्र) लगाना इन शुद्ध चित्त (सुभग) पुरुषों का काम नहीं होता। ऐसे लोगों की संख्या भारत वर्ष में आज कल कम है। परन्तु वृद्धि (या उन्नति) परमेश्वर ऐसे ही पुरुषों को देता है। पहिली प्रकार के लोग मुंह देखते (तकते) ही रह जाते हैं। इसी महकमा बंदोबस्त में काम करते करते पंडित रामधन जी वर्तमान पदवी (मोहतिम बंदोबस्त) पर पहुंचे। इसी महकमा बंदोबस्त में काम करते २ पंडित परशुराम जी पटवारी पन से बढ़ते २ आज एक्स्ट्रा असिस्टैंट कमिश्नर बन गये। बोलो इन लोगों की किस ने सफारश (प्रशंसा) की थी ? काम को दत्त चित्त से करो। भड़काने वालों की बातें मत सुनो। सत्संग और भजन को ध्यान दो।

सन् 1800 से 1805 तक महकमा बंदोबस्त में यदि "चित्त और मस्तिष्क को खराब किया है" तो अपराध किस का है ? महकमा बंदोबस्त का तो अपराध नहीं। यह उत्तम (कल्याणकारी) महकमा है, इस में घूमने चलने फिरने का अवसर मिलता है, जो शरीर को कुशलता में रखेगा। मस्तिष्क को अशुष्क (नूतन और शान्त) बनायेगा। इस महकमा में रहकर तुम सरकारी काम से अतिरिक्त समय के पढ़ने, लिखने, शास्त्रों के अभ्यास और विचार में खर्च

करो। या खेती और वनस्पति शास्त्र अथवा भूगर्भ (Geology) और गणित शास्त्र इत्यादि की पुस्तकें मंगाकर पढ़ते रहो। कृषिकर्म-विद्या, वनस्पति और भूगर्भ शास्त्र में जो उन्नति तुम महकमा बंदोबस्त में कर सकते हो, वह कालेजों में कदापि नहीं कर सकते। कोई पुस्तक एक बार पढ़ने से समझने में न आये तो पुनः पढ़ने से ठीक (साफ) हो जायगी, यदि तब भी न आये, तो तीसरी बार पढ़ो, स्वतः सब तात्पर्य स्पष्ट हो जायगा। तुम विद्या प्राप्त करने की ओर ध्यान दो, कालेज की डिग्रियों (पदवियों) को चूल्हे (खुशी) में डालो। यह डिग्रियां हाथी के दिखाने के दांत हैं, खाने के नहीं। विद्या प्राप्त की हुई कहीं व्यर्थ नहीं जाती। विद्या को विद्यार्थ पढ़ो, सांसारिक पदवियों (डिग्रियों) के लिये नहीं। जीवन में यह बाहर की डिग्रियां वास्तव में किसी काम की नहीं होतीं।

जो लोग अपनी विद्या-शक्ति बढ़ाते चले जाते हैं, उनकी उन्नति स्वतः होजाती है, और जो लोग उन्नति के पीछे दौड़ते रहते हैं, न तो उनकी शक्ति (योग्यता) ही बढ़ती है, और न उनकी उन्नति ही होती है। जिन्हों ने यहां कुछ नहीं किया वह जापान और अमेरिका में भी कुछ नहीं करेंगे। जो निपुण हैं वह यहीं घर बैठे जापान और अमेरिका वालों से आगे बढ़ सकते हैं। चलते फिरते बैठे खड़े पल २ से तुम काम ले सकते हो।

महकमा बंदोबस्त में रहते २, भूगर्भशास्त्र (Geology) कृषिकर्म विद्या (agriculture) रसायन शास्त्र (chemistry) और वनस्पति विद्या (Botany) यदि तुम पढ़ लो, तो तुम्हारा जापान या अमेरिका में जाना लाभकारी हो सकता है, नहीं

तो कदापि नहीं। पूर्वोक्त विषयों पर मैक्मिलन की विज्ञान-शास्त्र की पुस्तकें मंगा लो। प्रत्येक का ॥- या ॥। दाम है। लगभग प्रत्येक अंग्रेजी पुस्तक बिक्री के पास से मिल सकती है। या पूर्ण को सूतर मंडी लाहौर के पते से लिख दो। पूर्ण जी कहीं से लेकर भेज देंगे। बाकी आप मंगा लेना।

Your own self तुम्हारा अपना आप, राम।

( 6 ) वानस्थाश्रम, रियासत टेहरी गढ़वाल, 12 जुलाई 1806

प्यारे भगवन्,

ॐ ॐ ॐ, आनन्द, जय।

आप का 18 जून का पोस्ट कार्ड इन पर्वतों में आज मिला। इस का उत्तर तो पहिले ही भेजा जा चुका है। यह स्थान टेहरी से दो दिन का रास्ता है। उत्तरकाशी, टेहरी, केदारनाथ के समीपस्थ त्रियुगीनारायण और श्रीनगर यहां से लगभग एक समान दूरि पर पड़ते हैं। यह स्थान केन्द्र में है। ...........................

परमानन्द की तरंगों पर तरंगे उमड़ रही हैं। खुशी के फव्वारे (निर्झर) छुट रहे हैं। सब को ओम् आनन्द, आनन्द, परमानन्द। ....................

राम