सन् 1882 ईस्वी
[ इस वर्ष तीर्थराम जी की आयु साढ़े अठारह वर्ष के लग भग थी ]
(63) चोरी और दूसरों की हमददीं (सहानुभूति) 11 फरवरी 1882
संबोधन पूर्वोक्त,
बोर्डिंग में अभी तक जाने का अवसर नहीं मिला। शायद आज जाना हो जाय। परसों रात को गुमटी बाज़ार वाले मकान से मेरा नुक्सान हो गया है। एक लिहाफ़ तथा तोशक [ तूला, शयन सामग्री अर्थात् विस्तरा ], एक थाली, गड़वी और कौल [ कटोरा ] चोर ताला [जन्दरा] तोड़ कर ले गये हैं। जो कपड़ों का जोड़ा धोना देने के लिये विस्तरे में रक्खा हुआ था वह भी ले गये हैं। पुस्तकें सब बच रही हैं। लाला ज्वाला प्रसाद* और झंडूमल† कहते हैं "कि हम
* लाला ज्वाला प्रसाद जी उस काल उसी कालेज में पढ़ते थे और घर पर तीर्थराम जी से गणित पढ़ा करते थे। केवल एक कक्षा उनसे पीछे थे। आजकल यह साहिब फीरोजपुर में वकील हैं।
† लाला झंडूमल उसी मिशन कालेज में हलवाई (मिठान बनाने वाला) था। इस पुरुष ने तीर्थराम जी की उनके अध्ययन काल में तन मन धन से सहायता की। तीर्थराम जी के भविष्य के पत्रों से स्पष्ट प्रतीत होता है कि यदि किसी ने अपना स्वार्थ छोड़कर तथा बिना शारीरिक संबन्ध के होने पर भी केवल सहानुभूति तथा धर्म से और पितृवत् प्रेम से तीर्थराम जी की (उनकी अत्यन्त निर्धनता, दीन और तंग अवस्था में) सर्व प्रकार से सहायता की, तो वह यह झंडूमल हलवाई था। इसने उनको अपना मकान रहने के लिये मुफ्त दिया। बड़े प्रेम और सहानुभव से अपने घर पर बनको कई मास तक लगातार भोजन बिना किसी प्रकार का दाम इत्यादि लिये खिलाया। जब उसका अपना
नये वस्त्र [ कपड़े ] सिलवा देंगे और कि गुसाईं जी! ज़रा भ्रम न करो, आप की सब ज़रूरतें हम पूरी कर देंगे। महाराज जी! आप ने भूख न करना। मुझ पर प्रसन्न रहना।
आज सायंकाल बोर्डिंग को चले गये हैं।
(63) बी. ए. की वार्षिक परीक्षा। 24 मार्च 1882
संबोधन पूर्वोक्त,
आज मैं एक विषय (गणित) की परीक्षा दे आया हूं। एक पर्चा अति कठिन आया था। पर मैं आशा करता हूं कि आप ने मेरे लिये ख्याल किया होगा। अब कल दूसरे प्रकार के गणित की परीक्षा है। मुझे उसका अत्यन्त भय है। आप ने अवश्य प्रार्थना करनी। परसों ओरल (मौखिक या वाचक) परीक्षा है जिसका मुझे सव से अधिक भय है, क्योंकि यदि कोई उस (वाचक) परीक्षा में उत्तीर्ण न हो, तो सारी परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं होता। कदाचित् कल तो आप यहां स्वयं ही आजावें।
आप का दास तीर्थराम
मकान टूट गया, अथवा न रहा, तो तीर्थराम जी को और पुरुषों से मकान बिना किराया के दिलाया और सर्व प्रकार के दुःख तथा क्लेशों के दूर करने में जहां तक बन सका इस पुरुष ने तीर्थराम जी की अत्यन्त सहायता की। संक्षेप से यह कि जिस चित्त, प्रेम और हित के साथ इसने तीर्थराम जी की सहायता की, वह लेखनी की सीमा से बाहर है, और अति प्रशंसनीय है।
* इन दिनों में भगत धन्नाराम जी अपनी वाणी की सिद्धि में बड़े प्रसिद्ध थे, जो कुछ शाप तथा वर किसी को देते थे वह शीघ्र पूरा हो जाया करता था। तीर्थराम जी को उनकी संकल्प सिद्धि से भी पूरी २
(64) बी. ए. श्रेणी में पुनः प्रविष्ट होना। 2 मई 1882
संबोधन पूर्वोक्त,
आज मैं कालेज में प्रविष्ट हो गया हूं .............. कई वार हमारे कालेज का जो हलवाई (झंडूमल से अभिप्राय है) है उस ने मुझको पहिले भी कई वार बड़ी प्रीति से कहा था कि मैं रोटी उसके घर खा लिया करूं और आज पुनः उसने हाथ जोड़ कर कहा था। मैं ने आज उसको कह दिया कि "अच्छा खा लिया करूंगा"। दो तीन दिन खा कर देखूंगा, यदि उचित समझा, तो फिर भी खाता रहूंगा, नहीं तो छोड़ दूंगा।
(65) 6 मई 1882
संबोधन पूर्वोक्त,
आप का कृपा पत्र इस सप्ताह कोई नहीं मिला।
खबर थी, इसलिये तीर्थराम जी अपने विषय में नित्य शुद्ध तथा उत्तम. संकल्प की उनसे प्रार्थना करते हैं और उनकी वृत्ति को अपने हित की ओर प्रार्थना द्वारा आकर्षित करते रहते हैं।
† इस पत्र से प्रतीत होता है कि तीर्थराम जी इस वर्ष बी.ए.की परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हुए, जिससे पुनः बी.ए. में प्रविष्ट हो गये। सुना जाता है कि यद्यपि संकलित नम्बरों के विचार से तीर्थराम जी अपने प्रान्त के विश्वविद्यालय में प्रथम थे। पर दैवयोग से अंग्रेजी विषय में नियत नम्बरों से उनके कुछ नम्बर कम आये इस वर्ष किसी न किसी निमित्त से अनेक विद्यार्थी अंग्रेजी भाषा में रह गए थे जैसाकि उन के पत्रों से स्पष्ट होरहा है, और विशेष करके योग्य और निपुण विद्यार्थी तो रह गये, परन्तु निकृष्ट अथवा अयोग्य विद्यार्थी जिनके विषय में अध्यापकों को भी कोई आशा नहीं थी उत्तीर्ण हो गये।
मैं परसों का उस पुरुष (झंडूमल) के घर रोटी (भोजन) खाया करता हूं। बड़ी प्रीति का भोजन होता है। जब आप आयेंगे तब आप ने यदि वहां मेरा रोटी (भोजन) खाना उचित न समझा तो मैं छोड़ दूंगा। मैं अनुमान करता हूं कि आप का मेरे विषय में पेशा ही संकल्प था, इस लिये इस प्रकार का प्रबन्ध हो गया।
(66) बी, ए में एक अति अयोग्य विद्यार्थी का अंग्रेजी भाषा की परीक्षा में प्रथम निकलना। 15 मई 1882
संबोधन पूर्वोक्त,
मैं आप को एक अद्भुत बात लिखता हूं कि पहिले इतना तो आप को किंचित् विदित ही है कि इस वर्ष बी.ए. की परीक्षा में बहुत से योग्य और निपुण विद्यार्थी अंग्रेजी में रह गये हैं। अब जौन सा विद्यार्थी अंग्रेज़ी की परीक्षा में प्रथम रहा है वह इतना अयोग्य (नालायक़) था कि अंग्रेज़ी का प्रोफेसर भी उसे परीक्षा में कदापि भेजना नहीं चाहता था। सब लोग आश्चर्य हैं कि यह प्रथम क्योंकर रह गया?
आप का दास तीर्थराम,
(67) तीर्थराम जी के विषय में युनीवर्स्टी में कहा सुनी। 16 मई 1882
संबोधन पूर्वोक्त,
मैं ने एक रीति से अपना सारा वृतान्त लिख कर साहिब
को दिखा दिया था। वह परचों के पुनः देखे जाने की सम्मति नहीं देते। इस को (अर्थात् मुझे) रियायत मिल जानी चाहिये (अर्थात मेरा पत्र किया जाना चाहिए), किन्तु उस की कोई बात मानी नहीं गयी। आज विश्वविद्यालय ने यह विज्ञापन दिया है कि जिन्हों ने बी.ए, एम.ए, पास किया हो और आयु उनकी 21 वर्ष से अधिक न हो और गणित अथवा विज्ञान शास्त्र (साइन्स) में विलायत का एम.ए. उत्तीर्ण करना चाहते हों, वे प्रार्थना पत्र भेजें। जिस का सब से अधिक अधिकार होगा, उस को उपर्युक्त (काफ़ी) छात्र वेतन देकर विलायत भेजा जायगा। और जब वह विलायत से उत्तीर्ण होकर आवे, उस को बड़ी ऊंची पदवी दी जायगी। अब यदि मैं इस बार उत्तीर्ण हो जाता, तो मुझको यह छात्रवेतन अवश्य मिलजाना था। प्रथम मेरी आयु के विचार से, द्वितीय मेरे गणित-शास्त्र में नम्बरों के कारण से, तृतीय मेरे आचरण (सदाचार) के संबन्ध से। पर अब क्या हो सकता है। आप दया रक्खा करें।
आपका दास तीर्थराम,
(68) निर्धनता के कारण पाठ्य पुस्तकों का बेचना। 8 जून, 1882
संबोधन पूर्वोक्त,
सरदार† नारायण सिंह ने मुझे कल मिला था और न
† सरदार नारायण सिंह जी रामनगर के निवासी हैं। इन दिनों में यह गुसांईं तीर्थ राम जी से एक कक्षा पीछे थे और उसी मिशन कालेज में पढ़ते थे। इसी कालेज से उन्हों ने बी, ए, पास किया।
आज, न कालेज में, न मकान पर। पंडित द्वारका दास जिस ने पुस्तकें खरीदने को मुझ से कहा था मुझे इन तीन दिनों में नहीं मिला, यद्यपि मैंने सुना है कि यहां आया हुआ है। मेरा विचार है कि कल तीन चार रुपये की पुस्तकों के नाम एक पत्र पर लिखकर विज्ञापन की रीति से कालेज की एक भित्ति (दीवार) पर लगा दूं जिस से वह पुस्तकें बिक जायें। हमारा गणित शास्त्र का प्रोफेसर बीमार पड़ा हुआ था, दस बारह दिन के पश्चात् आज कालेज में आया था। हमारी श्रेणी का एक चतुर (योग्य) विद्यार्थी थोड़े दिनों के ताप के बाद कल सायंकाल को कालवश हो गया। अन्य सब प्रकार से कुशल है।
आपका दास तीर्थराम,
(69) मकान दिलाने में झंडूमल की प्रशंसनीय सहायता। 8 जून 1882
संबोधन पूर्वोक्त,
जहां मैं रोटी खाया करता हूं, उस घर के साथ एक और घर लाला गणपतराय बैरिस्टर का है। यह घर लाला साहिब का नितान्त खाली पड़ा हुआ है। उन का विचार है कि इस घर को नये सिरे से बनवाया जाये। झंडूमल हलवाई ने (जिस के घर में रोटी खाया करता हूं) बैरिस्टर
और गवर्न-मैण्ट कालेज से एम, ए, पास किया था। तदपश्चात् थोड़े काल तक वकालत की वृत्ति ग्रहण की। फिर उसे ना पसन्द करके खालसा हाई स्कूल अमृतसर की हैडमास्टरी (मुख्य अध्यापकता) स्वीकार की, आज कल इसी पदवी पर वे काम कर रहे हैं। (1612)
साहिब के भाई को मेरे लिये कहा था कि वह अपने उस मकान (घर) में मुझे (अर्थात तीर्थराम को) इन ग्रीष्म ऋतु के दिनों के लिये मुफ्त रहने दें, और उन्हों ने स्वीकार कर लिया था। पर मैं ने अभीतक वह मकान (घर) भीतर से नहीं देखा। बाहर से कोई बड़ा सुन्दर नहीं प्रतीत पड़ता और न बहुत बड़ा ही है। मेरे इस मकान से बहुत समीप है। गली (कूंज) में है, परन्तु वहां आस पास कोई बड़ा शब्द (शोर) होता नहीं दिखाई देता।
यह बैरिस्टर साहिब का भाई (लाला दुनीचंद) उन के काम का मुख़तार है। एफ.ए. में मेरा सहपाठी था। बी. ए. की शिक्षा (अभ्यास) गवर्णमैण्ट कालेज में पाता रहा। इस वर्ष पास (उत्तीर्ण) नहीं हुआ था, और फिर किसी कालेज में अवतक प्रविष्ट नहीं हुआ।
झंडूमल को मैं ने नहीं कहा था कि वह मेरे लिये लाला* दुनीचंद को कहे, परन्तु उस ने स्वयं ऐसा कहा था जिस से मुझे इन दो मास का किराया न देना पड़े। जब आप लिखेंगे तब मैं उस मकान में जाने का कोई विचार करूंगा। अभी कोई विचार नहीं।
आपका दास तीर्थराम,
(70) निर्धन अवस्था के होते हुए भी संतोप वा तृप्ति। 11 जून 1882
संबोधन पूर्वोक्त,
आज एक मनुष्य ने हमारे प्रिन्सिपल साहिब को मेरे
* यह लाला दुनीचंद नहीं है जो आज कल लाहौर में अपने भाई की तरह बैरिस्टर हैं।
लिये त्रेपन (53) रुपये दिये हैं। साहिब ने मुझ को बुलाया था और कहने लगे कि यह ले लो। मैं ने कहा कि किस ने दिये हैं, वह कहने लगे कि हम नाम नहीं बतायेंगे। (मैं अनुमान करता हूं कि शायद वह अपनी गांठ से ही दे रहे हों)। फिर मैं ने कहा कि आधे इनमें से आप कालेज के कामों में खर्च करदें और आधे मुझे दे दें। यह भी न माना फिर मैं ने कहा कि अच्छा! मिस्टर गिल्वर्टसन साहिब जो हमें गणित पढ़ाते हैं और मेरी आधी फीस देते हैं, उन को व्यर्थ कष्ट में नहीं देना चाहता, उनके बदले वह आधी फीस परीक्षा तक मुझ से ले लो। वह कहने लगे कि इस बात का निर्णय गिल्वर्टसन साहिब से करना होगा। सो मैं ने रुपये लाकर लाला अयोध्या प्रसाद को दे दिये हैं। चाचा जी के रुपये अभी मुझ को नहीं मिले। आप अब अवश्य ही यहां आजायें।
आपका दास तीर्थराम,
(71) तीर्थराम जी का जनानी जुत्ती पहन कर कालेज में जाना 5 जुलाई 1882
संबोधन पूर्वोक्त,
कल रात को जब मैं दूध पीने गया, तो मेरी जुत्ती का एक पग (पैर) शायद किसी की ठोकर से बदर रौ (गट्टर) में जा पड़ा। जब दूध पीकर जोड़ा पहनने लगा तो एक पग (पैर) तो पहन लिया, दूसरा इधर उधर देखा, कहीं न मिला। हलवाई दीपक लेकर सारी बदर रौ (गट्टर, मोरी) तिलाश कर आया, न मिला। दो वालकों को पैसा देना करके कहा कि ढूंढो, उन को भी न मिला।
पानी बड़े ज़ोर से (गट्टर में) चल रहा था, शायद कहीं का कहीं चला गया होगा। मेरे मकान में एक पुरानी ज़नानी (जूती) पड़ी हुई थी। प्रातः काल को एक अपनी जुत्ती का पग (पैर) और एक उस पुरानी ज़नानी जुत्ती का पग पहन कर कालेज में गया। यह मेरी जुत्ती अब अत्यन्त पुरानी हो गयी थी। सो आज मैंने सवा नौ आने (॥∙।) की एक नई जुत्ती ख़रीद कर पहनी है। मेरा आप की ओर बड़ा ध्यान रहता है। आप ने मुझ पर सदा खुश रहना।
आपका दास तीर्थराम,
(72) तीर्थराम जी का घर पर पढ़ाने का विचार। 6 अक्तूवर 1882
संबोधन पूर्वोक्त,
आप का कृपा पत्र मिला, बड़ा हर्ष हुआ। आज हमारा कालेज खुला, पर किसी प्रोफ़ेसर के आगे वह कथन करने का अवसर नहीं मिला। अलबत† बहादुर चंद मिला था, वह कहता था कि हीरामंडी में राजा ध्यान सिंह की हवेली (गृह) के समीप एक बाबू लधाराम एग्ज़ैक्टिव इन्जिनियर हैं उन के लड़के को यदि दो घंटे पढ़ाओ, तो पन्द्रह रुपये मासिक मिला करेंगे। परन्तु वह कहता था कि कल रविवार में तुमको उन के पास लेजाऊंगा। मैं ने स्वीकार कर लिया था। अब आगे देखिये, क्योंकि आप का मेरी ओर ध्यान (ख्याल) है, मैं आशा करता हूं, कि अवश्य कोई न कोई अच्छा अवसर मिल जायगा।
आप का दास तीर्थराम,
† बहादुर चंद जी उन दिनों में एम. ए. में पढ़ते थे, जब तीर्थराम जी बी. ए. में थे। आजकल यह महाशय वकील (प्लीडर) हैं॥
(73) झंडूमल जी की अमुल्य सहायता 6 अक्तूवर 1882
संबोधन पूर्वोक्त,
मैं कल यहां पहुंच गया था। जिस मकान में मैं पहिले रहता था वह वर्षा के कारण गिर पड़ा था। परन्तु मेरा असबाव (वस्त्रादि) झंडूमल ने बचा लिया था। अभी तक कोई और मकान नहीं मिला। कल रात को झंडूमल के घर पर सो रहा था। और रोटी भी उसी के घर खाता हूं। बैठने के लिये लाला अयोध्या दास के मकान में आ जाता हूं।
आप का दास तीर्थराम,
(74) बाज़ार के तन्दूर से रोटी खाना। 12 अक्तूवर 1882
संबोधन पूर्वोक्त,
आप का कृपा पत्र कोई नहीं मिला। अब झंडूमल की घर-वाली (अर्धांगी) कहीं गयी हुई है, इस लिये मैं रोटी तन्दूर (कंदु, उखा, आपाकः) से खाया करता हूं। अभीतक कोई विद्यार्थी पढ़ने वाला नहीं मिला। जब कालेज खुलेगा, किसी प्रोफ़ेसर को कहूंगा। शायद वह कोई इंतफ़ाक़ बना दें। आप सब हाल लिखें।
आप का दास तीर्थराम,
(75) विद्यार्थियों को पढ़ाने के काम से तीर्थराम जी को प्रोफ़ेसरों का रोकना। 18 अक्तूवर 1882
संबोधन पूर्वोक्त,
मैं ने प्रोफ़ेसरों को कहा था, सब के सब कहने लगे, अब परीक्षा काल समीप आया है। अब अपना काल व्यर्थ
न खो और जिस तरह हो सके ऐसा काम मत कर। तेरा समय अब दस पंद्रह रुपये से अधिक प्रियतम है। इत्यादि।
अस्तु, महाराज जी! मैं प्रत्येक दशा में प्रसन्न हूं और आप ने मुझ पर सर्वप्रकार से आनंदित रहना। जैसा होगा निर्वाह करलूंगा॥.
अब मैं अति शोक की बातें लिखता हूं कि दो छुट्टियों में मेरे दो मित्र मर गये हैं। एक तो खलीलुर्रहमान्; उस ने इस वार बी.ए. पास किया था, दूसरा लाला शिव राम† जिस से आप भी परिचित थे और जो मेरा अत्यन्त कृपालु था। उन के वंश में अब कोई पुरुष नहीं रहा, सब विधवा होगयी हैं। परमेश्वर अपनी दया करें। आपने पत्र शीघ्र २ लिखना।
आप का दास तीर्थराम,
(76) कालेज के पंडित वेदान्ती 23 अक्तूवर 1882
संबोधन पूर्वोक्त,
मैं ने पत्र तो पहिले लिखना था। पर देर इस लिये हो गयी है कि मैं ने कहा कि कोई ठीक परिणाम निकल ले, तो पत्र लिखूं। अब बात यह है कि अभी कोई पढ़ाने का अवसर बनता दिखाई नहीं देता। आप मुझ पर सदा प्रसन्न रहना। मैं प्रत्येक अवस्था में खुश हूं। आगे जैसा होगा, वैसा विदित करूंगा।
हमारे कालेज के पंडित साहिब पहले दर्जे के (अति निपुण) वेदान्ती हैं। उन को मैं ने अपना निश्चय बताया था, इस लिये मुझ पर अति प्रसन्न हैं।
आप का दास तीर्थराम,
† यह लाला शिवराम वही हैं जो मिशन कालेज बोर्डिंग हौस के सुप्रिटैंडैण्ट थे और जिन का वर्णन पहिले भी हो चुका है।
(77) तीर्थराम जी का एक सहपाठी को पढ़ाना 31 दिसम्वर 1882
संबोधन पूर्वोक्त,
मेरा बड़ा ही जी (चित्त) आप के दर्शन करने को चाहता है। तदनुसार मैं ने कल संकल्प किया था कि एक रात के लिये गुजरांवाले हो ही आऊं। साथ इस के अब हमारी श्रेणी के एक† विद्यार्थी ने मुझ से गणित पढ़ना आरम्भ किया है, पर वेतन के विषय में न मैं ने कोई बात कही है न उस ने ही। पर वह मनुष्य बड़ा ही अच्छा है। उपकार को जानने वाला है। आप ने शीघ्र मुझे अपना हाल लिखना। आप ने मुझ पर दया रखनी।
आप का दास तीर्थराम :o: