सन् 1883 ईस्वी।
( इस वर्ष तीर्थराम जी की आयु साढ़े उन्नीस वर्ष के लगभग थी )
(78) सहपाठी से ज़रूरतों की पूर्ति का विश्वास। 3 जनवरी 1883
संबोधन पूर्वोक्त,
आपका कृपा पत्र मिला, अत्यन्त हर्ष प्राप्त हुआ। सरदार सुन्दर सिंह की परीक्षा थोड़े दिनों तक समाप्त हो
† सुना जाता है कि यह विद्यार्थी जो तीर्थराम जी का सहपाठी था, और उन दिनों उन से पढ़ा करता था, लाला ज्वाला प्रसाद अगरवाल वैद्य था। आज कल यह लाला साहिब फीरोजपुर में वकील हैं॥
जायगी। जिस सहपाठी को मैं गणित पढ़ाया करता हूं, वह मेरे पढ़ाने से अति प्रसन्न है। और कम से कम वह इतना अवश्य दे दिया करेगा कि जिससे मेरी सारी जरूरतें (अर्थात् दूध किराया इत्यादि) पूरी हो जायेंगी, और चाहे कितनी पुस्तकें अपनी पढ़ाई के संबन्ध में खरीद लूं।
साथ इसके सरदार सुन्दर सिंह मुझे कहता है कि मैं उनके मकान (घर) में चल रहूं। अस्तु, जब आप यहां आवेंगे, तो जैसा आप कहेंगे,, किया जायेगा। मैं ने आप का वर्णन (जिक्र) इस अपने सहपाठी से किया था। आपके दर्शनों की जिज्ञासा रखता है।
आप का दास तीर्थराम
(79) अपने अध्यापकों के सन्मान की चिन्ता। 20 जनवरी 1883
संबोधन पूर्वोक्त,
कल प्रातः हमारे दाखले *(परीक्षा का प्रवेश-शुल्क) लिये जाने हैं। मैं ने तीस रुपये लाला अयोध्यादास से अब लिये हैं। यदि आप मेरे विषय में कहीं कुछ कहें तो यह ध्यान रखना कि मेरे अध्यापकों की और कोई बुरा संकेत न हो जाय बल्कि उनकी अत्यन्त कीर्ति वर्णन हो। मैं उन जैसा संसार में किसी अन्य को योग्य नहीं समझता।
आपका दास तीर्थराम
* बी-ए, की पुनः परीक्षा के दाखले (प्रवेश-शुल्क) से यहां अभिप्राय है।
(80) गणित-शास्त्र के प्रोफ़ैसर की सहायता और तीर्थराम जी की धन से उदारता का उदाहरण। 23 जनवरी 1883
संबोधन पूर्वोक्त,
आज आप का कृपा पत्र कालेज जाते जाते मिला, अति हर्ष हुआ। जब मैं कालेज पहुंचा, तो चपरासी मुझे बुलाकर प्रोफ़ैसर *गिल्वर्टसन साहिब (गणित शास्त्र का प्रोफ़ैसर) के पास ले गया। उन्हों ने मुझे एक बहुत तहों (पोटलियों) में बन्द दर बन्द कागज़ की पुड़ी दी। और कहा "जाओ"। उस समय घंटा बज गया और मैं उस पुड़ी को जेब में डाल कर पढ़ने में प्रवृत्त हो गया। परन्तु आज मेरे पास एक पैसा भी खर्चने को न था, तीन घंटे के पीछे मैं ने अलग जाकर उस पुड़ी को खोला, उसमें तीस रुपये थे। मैं तत्काल (तत्क्षण) प्रोफ़ैसर साहिब के पास गया और कहा "मुझे इतने रुपये की आवश्यकता नहीं है। आप वीस रुपये वापस ले लें।" किन्तु उन्हों ने न माना। अब आप यह पत्र देखते ही तत्क्षण यदि यहां आकर इन में से वीस रुपये ले जायँ, तो अति
* इस पत्र से ऐसा प्रतीत होता है कि इस समय प्रोफ़ैसर गिल्वर्टसन साहिब ने केवल बी. ए. की परीक्षा के प्रवेश-शुल्क के लिये तीस रुपये दिये हैं। परन्तु तीर्थराम जी दूसरों से रुपया उधार लेकर परीक्षा का प्रवेश-शुल्क दे चुके थे और केवल दो मास की कालेज फीस ही देना अब शेप रहती थी, इस लिये वह उस कालेज फीस से अधिक रुपये प्रोफ़ैसर साहिब को वापस करने की प्रार्थना पुनः २ करते हैं। और उनके न मानने पर फिर गुरू जी की भेंट कर देते हैं, परन्तु अपने पास जरूरत से अधिक एक पैसा भी नहीं रखते हैं।
कृपा हो। यदि आप उचित समझें तो इन वीस में से थोड़े से मेरी नें चे (माता जी) को भेज दें। डाक में इस कारण से नहीं भेजता कि यदि आप आयेंगे, तो मिल भी तो जायेंगे। अपने पास दस (10) रुपये इस लिये रखता हूं कि भविष्य में दो मास की फ़ीस भी देनी है। अपने अन्य खर्च के लिये लाला ज्वालाप्रसाद से ले लिया करूंगा।
आप का दास तीर्थराम
(81) तीर्थराम जी को भंडूमल का अधिक ध्यान! 7 फरवरी 1883
संबोधन पूर्वोक्त,
आज हमारे *प्रोफ़ैसर साहिब ने मुझे वह पुस्तक ले दी है, जो मैं ने उन्हें कही थीं। साथ इसके उन्हों ने मुझे एक मनुष्य (लाला चंदूलाल साहिब) से पढ़ने के लिये वह पुस्तक भी ले दी है जो भारतवर्ष में गणितशास्त्र के सूर्य ने लिखी है। इस पुस्तक की प्रस्तावना इंग्लैंड के एक गणित-शास्त्र के निपुण वेत्ता ने लिखी है। उस प्रस्तावना में हमारे देश के पुराने ज्ञान तथा विज्ञान शास्त्र की इतनी उपमा की है कि जिसका कोई अन्त नहीं। आप मुझे लिखते रहा करें।
यदि आप को कष्ट न हो, तो †भंडूमल के लिये एक थाल बनवा छोड़ना। आपका दास तीर्थराम
*प्रोफ़ैसर से तात्पर्य गणित शास्त्र के प्रोफ़ैसर गिल्वर्टसन साहिब से है। † यह पुस्तक "मैक्सिमा ऐंड मिनिमा" (Maxima and Minima) थी जो गणित शास्त्र के प्रसिद्ध सूर्य प्रोफ़ैसर रामचन्द्र ने लिखी थी। ‡ भंडूमल वही मिशन कालेज का हलवाई है जिसका वर्णन अनेक बार पूर्व हो चुका है।
(82) अपने ग्राम का नाम बदलना। 12 फरवरी 1883
संबोधन पूर्वोक्त,
हम कल सायंकाल से बोर्डिंग में आगये हुए हैं। प्रातः भोजन बोर्डिंग में खाया करूंगा और सायंकाल को भंडूमल के घर। मेरा प्रातः भोजन बोर्डिंगा में खाना भी भंडूमल ने अति कठिनता से स्वीकार किया है। आप ने मुझ पर दया रखनी। अब से लेकर अपने ग्राम को मैं मुराली वाला के वदले मुरारी वाला कहा करूंगा। मुरारी के अर्थ परमेश्वर के हैं।
आपका दास तीर्थराम
(83) भंडूमल मल से पुनः सहायता। 18 फरवरी 1883
संबोधन पूर्वोक्त,
भंडूमल ने मुझे दो कुर्ते और एक पाजामा बनवा दिया है, और लाला ज्वाला प्रसाद के कपड़े [वस्त्र] में सब वर्ते सकता हूं। और सर्व प्रकार से कुशल है, आप मुझ पर दया रक्खें।
आप का दास तीर्थ राम,
(84) बी, ए, की आज़माइशी परीक्षा (Trial Examination) का परिणाम। 11 मार्च 1883
संबोधन पूर्वोक्त,
आज हमारे रोल नम्बर आ गये हैं। मेरा नम्बर 87 है
हमारी (आज़माइशी प्रमाण) परीक्षा का परिणाम भी निकला है। मुझे परमेश्वर ने सर्वोपरि उत्तम रक्खा है। जितने नम्बर प्रथम दर्जे (वर्ग) में रहने के लिये चाहियें उस से मेरे 60 अधिक हैं। अंग्रेज़ी में भी बड़ा ही अच्छा रहा हूं। और एक गणित शास्त्र के पर्चे में 150 में से 148 नंबर मिले हैं। पर मैं जानता हूं यह सब आप की ही कृपा-दृष्टि का फल है। आप ने मुझ पर दया दृष्टि रखनी।
आप का दास तीर्थराम,
(85) बी, ए, की पुनः वार्षिक परीक्षा। 21 मार्च 1883
संबोधन पूर्वोक्त,
मेरा प्रतिक्षण आप के चरणों में ध्यान रहा है, आप अभी तक नहीं आये। बड़ा शोक लगा हुआ है। परसों [गुरुवार] और अतरसों (शुक्रवार) हमारी गणित की परीक्षा है। अंग्रेज़ी की परीक्षा हो चुकी है। महाराज जी! यदि मेरी 60 (साठ) रुपये छात्र वृत्ति लग जाये, तो पहिले तीन मास की छात्रवृत्ति (वज़ीफा) सारी आप ने रख लेनी, और जो उपहार मिले वह भी आप ही का। और वैसे तो आप जानते ही हैं कि मैं स्वयं सारा ही आप का हूं। यदि मैं गणित-शास्त्र के चारों पर्चे ही सारे के सारे कर आऊं, तब मुझे तसल्ली होगी। यदि आप की दया हो, तो यह बात (परिणाम) किंचित् भी कठिन नहीं।
आप का दास तीर्थराम,
(86) बी, ए, की वार्षिक परीक्षा के परिणाम संबन्धी एक सहपाठी का प्रेम पत्र। 17 अप्रैल 1883
बाबू तीर्थराम साहिब, दाम अनायतहु [अर्थात् नित्य कृपालु रहें],
धन्यवाद (मुबारकबाद) देता हूं, आप पंजाब भर में प्रथम रहे हैं। आप के नंबर 310 हैं, और प्रथम खंड (डिवीज़न या वर्ग) में रहे हों और आप को वैसे ही दो छात्र वृत्ति (वज़ीफे) भी मिलेंगी। द्वितीय लछमण दास, तृतीय गुलाम सरवर और चतुर्थ टोपन राम रहे हैं। सारे विद्यार्थी हमारे कालेज से 21 के लगभग उत्तीर्ण हुए हैं। और समस्त विद्यार्थी सारे पंजाब भर में 50 (पचास) के लगभग उत्तीर्ण हुए हैं। यह सेवक आप को अवश्य तार द्वारा सूचना देता, परन्तु इस दास का अपना चित्त बहुत व्याकुल है, इसलिये क्षमा रक्खें।
(लिखने वाले का नाम पत्र में दर्ज नहीं)
(87) गुरु जी की ज़रूरत और कष्ट का ख्याल। 26 मई 1883
संबोधन पूर्वोक्त,
आप का पांच रुपये का मनीआर्डर पहुंचा, पर जब मुझे यहां से रुपये मिल सकते थे, आप ने व्यर्थ क्यों कष्ट उठाया? क्या आप की ज़रूरतें मेरी ज़रूरतें नहीं हैं? यदि आप आज्ञा दें, तो आप को मैं लाला सोहनलाल से या मौसा से या किसी अन्य स्थान से जितने रुपये अवश्यक
हों लेकर भेज दूं। आप ने यह कष्ट क्यों उठाया? पर इस में अपराध मेरा है, कि इस से पहिले मैं इस विषय में आप को लिखना भूल गया। अब आप आयेंगे कब! मनीआर्डर के बाद आप का एक और पत्र आया..........हमें छुट्टियां तो हैं पर काम भी बहुत है, इस लिये अगर आप ही आजायें तो अच्छा होगा। नहीं तो जैसा मुझे आज्ञा करो मैं वैसा करने को उद्यत हूं।
आप का दास तीर्थराम,
(88) भंडूमल की अत्यन्त प्रेरणा। 26 जून 1883
संबोधन पूर्वोक्त,
कल जिस समय आपको रेल पर छोड़कर आया, तो उस समय भंडूमल मिला। और उसने आपके विषय में पूछा। उसका यह विचार (संकल्प) था कि उसने जो अपना मकान (घर) खरीदा हुआ है, वह आपके दृष्टिगोचर करके आप से स्वीकार कराये और उसमें मुझ को रक्खे। यह मकान केवल परसों खाली हुआ था। भंडूमल अत्यन्त दर्जे की प्रेरणा करता है कि मैं उसके मकान में विना किराया देने के रहूं। आगे जैसी आप आज्ञा देंगे वैसा ही करूंगा। यह मकान भंडूमल की अपनी गली में है, परन्तु पुराना है, और अधिक हवादार भी नहीं। दो छत्ता है, आप ने उत्तर से शीघ्र कृपा करनी।
आपका दास तीर्थराम,
(89) गुरु जी के लिये परमेश्वर से प्रार्थना। 6 जुलाई 1883
संबोधन पूर्वोक्त,
मैं ने अभी परमेश्वर से प्रार्थना की थी कि आप को भीतर तथा बाहर से सर्व प्रकार से परमानन्द रहे, कभी भी कोई कल्पना और विशेप दुःख न दे।
महाराज जी! आप मुझे याद रक्खा करें।
आपका दास तीर्थराम
(90) जीविका की अन्वेषणा (तलाश) 7 जुलाई 1883
संबोधन पूर्वोक्त,
आज मैं ने कुछ २ समाचार सुना है कि वैदिक कालेज लाहौर का गणित-शास्त्र का प्रोफ़ैसर (मुख्य अध्यापक) छुट्टी लेना चाहता है। यदि आप परमात्मा से कहकर मुझे उसके स्थान पर अभी नियत करादें, तो यह मेरे और आप के लिये अति हर्ष का कारण हो। शायद सारी छात्र-वृत्ति से पिछले मास का कट कटा कर केवल चार रुपये आठ आने (4॥) मुझे मिलें। आप ने किसी प्रकार से कदापि तंग न रहना। जिसको मैं पढ़ाया करता हूं, वह मुझ से अत्यन्त प्रसन्न है।
आप का दास तीर्थराम
(91) प्राकृतिक दृश्य का मूर्ति बांधना। 18 जुलाई 1883
संबोधन पूर्वोक्त,
यहां कल बड़ी वर्षा हुई थी। आज मैं कालेज से पढ़कर
सैर करता हुआ घेरे (घर पर) आ रहा हूं। इस वक्त बड़ा सुहाना समय है। जिधर देखता हूं या जल दृष्टि में आता है या वनस्पति (सब्जी)। ठंडी २ पवन हृदय को बड़ी प्रिय लगती है। आकाश में बादल कभी सूर्य को छुपा लेते हैं, कभी प्रकट कर देते हैं। नाले नालियों (जलवाहों तथा प्रणालों) से पानी बड़े वेग से बह रहा है। गोलबाग के वृक्ष फलों से भरे पड़े हैं। टहिनियां (शाखायँ) झुक कर पृथिवी से आ लगी हैं। यही प्रतीत होता है कि अनार, आड़ू, आम, इत्यादि अभी गिरे कि गिरे। कबूतर, काक (कव्वे) और चीलें बड़ी प्रसन्नता से वायु की सैर कर रहे हैं। वृक्षों पर पक्षी बड़े आनन्द से गायन कर रहे हैं। तरह २ (नानाप्रकार) के पुष्प खिले हुए ऐसे प्रतीत होते हैं कि मानो मेरा आगमन देखने के लिये आँखें खोलि मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। पृथिवी पर हरियाबल (हरित) क्या है मानो मखमल का तल (फर्श) बिछा है (या मानो मखमल से भूमि आच्छादित है)। सर्व और सपेदा (लम्बे २ वृक्ष) अभी स्नान करके सूर्य की ओर ध्यान करके एक टांग से (इकटंगे) खड़े हैं, मानो संध्या उपासना में मग्न हैं। आकाश की नीलता और सफेदी (शुक्लता) ने अद्भुत बहार बनाई है (अथवा अद्भुत समय बांधा है)। मेंडक वर्षा की खुशियां मना रहे हैं। प्रत्येक दिशा से जंकारे [ह्लाद] बज रहे हैं, मानो पृथिवी और आकाश का विवाह होने वाला है, जिस की सन्तान कार्तिक और मार्गशीर्ष [मंगसर] के सतोगुणी मास होगी। इस समय मुझे आप याद आते हैं। क्योंकि मैं आप को यह सब वस्तुएं दिखा नहीं सकता, इसलिये लिख देता हूं।
अब मैं डेरे [घर पर] आ पहुंचा हूं। आप का पत्र मिला है, अत्यन्त हर्ष प्राप्त हुआ है। अब मैं अपने अध्ययन
का काम आरम्भ करने लगा हूं क्योंकि परसों बुद्धवार हमारी *परीक्षा है। यह पत्र चलते २ रास्ते में पैंसिल से लिखा गया था, और घर पर आकर इस कार्ड पर उसकी नक़ल करता हूं।
(92) अपने विद्यार्थी के पास हो जाने पर खुशी। 11 जुलाई 1883
संबोधन पूर्वोक्त,
भाई †सुन्दर सिंह जो मुझ से पढ़ा करता था और जिस ने इस वार चीफ कालेज से मिडिल क्लास की परीक्षा दी थी और जो फेल (अनुत्तीर्ण) होगया था, उस के पर्चे पुनः देखे जाने से वह पास (उत्तीर्ण) हो गया। हर्ष की बात है॥ आप का दास तीर्थ राम,
(93) मिस्टर बैल प्रिन्सिपल गवर्नमैंट कालेज के अकस्मात् दर्शन (मिलाप) 17 जुलाई 1883
संबोधन पूर्वोक्त, आज मैं नदी (दर्या रावी) की सैर को गया था। किश्तियों (नौकाः) के पुल पर फिर रहा था, कि मिस्टर
* यहां परीक्षा से तात्पर्य गुसाईं जी की एम.ए. की मासिक परीक्षा से है क्योंकि बी.ए श्रेणी को उत्तीर्ण करने के पश्चात् वह गवर्नमैंट कालेज लाहौर की ऐम, ए श्रेणी में प्रविष्ट हो गये थे। यद्यपि इस विषय का पत्र उनकी लेखनी का नहीं मिला। † भाई सुन्दर सिंह मजीठा के जमींदार व रईस हैं जो उन दिनों गुसाईं तीर्थ राम जी से घर पर पढ़ा करते थे।
बैल गवर्नमैंट कालेज के प्रिन्सिपल (बड़े साहिब) वहां आ निकले। भले प्रकार से मिले। कई प्रकार की बातें हुईं, मेरी ऐनक (उपनेत्र) के विषय में, और इस विषय में कि मैं छाता क्यों नहीं लगाता, क्योंकि उस समय बादल आया हुआ था, और छोटी २ बूंदें पड़ रही थीं, इत्यादि २।
फिर मुझे अपनी गाड़ी में बिठा लिया और गाड़ी शहर (वस्ती) की ओर लाये। रास्ते में मेरी पढ़ाई के विषय बात हुई। और मुझे लगभग सौ पद (शेर) अंग्रेज़ी भाषा के कंठस्थ थे. मैं ने वह सुनाये। और गणित शास्त्र के संबन्ध में कहा कि मैं इस की प्रत्येक शाखा की कम से कम चार या पांच पुस्तकें अवश्य पढ़ा करता हूं। और जो अंग्रेज़ी साहित्य की पुस्तकें आज कल मैं देखता हूं, वह मैं ने बताईं। बड़े प्रसन्न हुए। फिर उन्हों ने मेरे पिता माता के विषय में पूछा कि वह धनाढ्य हैं या नहीं। मैं ने उत्तर दिया, नहीं। फिर उन्हों ने पूछा कि मेरा विचार एम, ए की परीक्षा के पश्चात् क्या करने का है! मैं ने उत्तर दिया कि मेरा अपना कुछ संकल्प (विचार) नहीं, जो ईश्वरेच्छा होगी उसी के अनुसार मैं अपना संकल्प कर लूंगा। और ऐसे यदि मेरी कोई इच्छा है तो यह है कि वह काम करूं जिस से मैं अपने जीवन का श्वास २ परमात्मा की सेवा में अर्पण कर सकूं। और परमात्मा की सेवा लोगों की सेवा करने में होती है, और लोगों की सेवा मैं सब से अच्छी तरह गणित पढ़ाने से कर सकता हूं। इत्यादि।
उन्हों ने भी बहुत सी बातें मेरे अनुसार कीं, और यह भी कहा कि हम तुम्हारे लाभ में जितना भी हो सकेगा यत्न करेंगे। (अब यह साहिब पंजाब विश्वविद्यालय के कायमुकाम रजिस्ट्रार भी होगये हैं)।
इतने में उन की कोठी जो कालेज के ठीक समीप है आ गयी। पर वह मुझे उस जगह लाये जहां विद्यार्थी व्यायाम किया करते हैं, और उन्होंने मुझे व्यायाम करते हुए विद्यार्थी दिखाये। फिर उन्हों ने पूछा कि "तुम किस प्रकार का व्यायाम किया करते हो। मैं ने चारपाई वाली वर्ज़िश (व्यायाम) कथन करी। उन्हों ने एक चारपाई (खाट) मँगवाई। मैं ने एक सौ साठ वार (160) उसे ऊपर उठाया और नीचे रक्खा। फिर उन्हों ने और विद्यार्थियों से कहा कि चारपाई से व्यायाम करें, उन में से कोई भी वीस से अधिक वार न कर सका। इसी प्रकार अन्य विद्यार्थियों का दूसरी विधि का व्यायाम देखने के पश्चात् वह सब को सलाम (अर्थात् नमस्कार) करके अपनी कोठी की ओर चल दिये। और मैं ने किंचित् आगे बढ़ कर कहा कि जी! मैं आपकी कृपा का अत्यन्त अनुगृहीत (अभारी) हूं। फिर मुझ को नमस्कर (सलाम) करके अपनी कोठी में प्रवेश हो गये।
अब महाराज जी! यह सब आप की कृपा का फल है। जब मैं आऊंगा, पंडित जियालाल जी से मासिक वेतन ले आऊंगा॥…………
आप का दास तीर्थराम,
(94) एक दरिद्री (गरीव) विद्यार्थी से सहानुभूति। 27 जुलाई 1883
संबोधन पूर्वोक्त,
आप का कृपा पत्र कोई नहीं आया, क्या कारण है? हमें आज कालेज से छुट्टियां हो गयी हैं। मिशन कालेज भी
मैं आज गया था। वहां के साहिब अत्यन्त सत्कार से मिले। वहां भी आज छुट्टियां हो गयी हैं। आज मैं कायस्थ बोर्डिंग हौस में गया था। वहां एक अति दरिद्र विद्यार्थी को देख कर (जिस ने छुट्टियों में लाहौर रहना है) मेरे चित्त में विचार उठा कि जब मैं †मिंटगुमरी जाऊं, इस विद्यार्थी को अपने पीछे अपने मकान (स्थान) में छोड़ जाऊं, और जब एक मास के पीछे मिंटगुमरी से वापस आऊं, तब उस को कहूं कि बोर्डिंग में चला जाय। जिस से उसको बोर्डिंग की आधी फीस मासिक न देनी पड़े और मेरा मकान (स्थान) खाली न पड़ा रहे। आगे आप जैसी आज्ञा देंगे वैसा किया जायगा। यदि आप का उत्तर शनिवार से पहिले न आया तो उस समय जैसा मुझे विचार आयेगा मैं समझूंगा कि यही आप की आज्ञा है। और तदनुसार चलूंगा। क्योंकि शनिवार को मैं ने लाला जियालाल के साथ जाना है। वहां से मैं शीघ्र आ जाने का यत्न करूंगा।
आप का दास तीर्थराम
(95) अनाहत शब्द का श्रवण। मिंटगुमरी 4 अगस्त 1883
संबोधन पूर्वोक्त मेरा ध्यान नित्य आप के चरण कमलों में रहता है। आप दया रक्खा करें।……………यहां अनाहत (अनहद) शब्द बहुत सुनाई देता है और स्थान सतोगुणी है। जब छुट्टियों से पहिले मैं मिशन कालेज के प्रोफ़ैसरों से मिलने
† एक नगर का नाम है, इस में गुसाईं जी के मौसा पं० रघुनाथमल जी कर्मचारी थे।
गया था, तब उन्हों ने मुझ से कहा था कि अगले वर्ष एक विद्यार्थी को विलायत का छात्र-वेतन देना है। यदि तुम जाना चाहो, तो तुम्हारा सब से बढ़कर अधिकार है। परन्तु महाराज जी! मैं आप का आज्ञाकारी हूं।
आप का सेवक तीर्थराम
(96) मिंटगुमरी में भैंस का अभाव। मिंटगुमरी 15 अगस्त 1883
संबोधन पूर्वोक्त,
आप का एक पत्र परसों मिला था, अत्यन्त हर्ष का कारण हुआ। यहां की एक अद्भुत बात मैं आपको लिखता हूं कि यहां किसी मनुष्य के पास कोई भी भैंस नहीं है। केवल गौवों का दूध ही वर्ता जाता है। जी! आप मुझ पर सर्व प्रकार से खुश रहा करें। मैं आप का दास हूं। यहां मन अन्तर्मुख बड़ा रहता है।
आप का दास तीर्थराम
(97) योगवासिष्ठ का अभ्यास। मिंटगुमरी 18 अगस्त 1883
संबोधन पूर्वोक्त,
आपका कृपा पत्र आये देर होगयी है, और मुझे भी पत्र लिखने में देर होगयी है। क्षमा करें। मैं योगवासिष्ठ बहुधा पढ़ा करता हूं।
आप का दास तीर्थराम
(98) दादाभाई नौरोजी का आगमन । लाहौर 25 दिसम्बर 1883
संबोधन पूर्वोक्त, आप का कृपा पत्र कोई नहीं मिला, चाचा जी (पिताजी) का हाल आप ने नहीं लिखा । आज यहां दादा भाई नौरोजी ( जो भारतवर्ष का मनुष्य पार्लीमेंट का मैम्बर है ) तीन बजे की गाड़ी में आया है । इतने ठाटबाट ( आडम्बर ) के साथ उसका स्वागत किया गया है कि जिसका कुछ अन्त नहीं । कांग्रेस वालों ने मानो उसको ब्रह्मा और विष्णु की पदवी दे दी है । कई सुनैहरी द्वार बनाये गये हैं । उस की गाड़ी नगर में अभी तक फिरा रहे हैं । लाखों मनुष्य साथ जा रहे हैं । उसके चारों ओर ( इर्द गिर्द ) दीपमाला है । और बड़े ज़ोर के जकारे ( उच्चह्नाद ) बज रहे हैं । साधारण लोगों के चित्तों में अत्यन्त जोश आ रहा है । इतना जोश कि जिसका कुछ अन्त नहीं । पर मेरे चित्त पर इन सब बातों से किंचित् मात्र प्रभाव ( असर ) नहीं हुआ । यह बड़े शुकर (धन्यवाद) की बात है । आपका दास तीर्थराम
(99) गुरु जी का क्रोध और तीर्थराम जी की क्षमा याचना । 30 दिसम्बर 1883
संबोधन पूर्वोक्त, गर कुशी वर जुर्म बख्शी, दस्तो सर वर आस्तानं । बन्दः रा फ़रमां चेः वाशद, हर चेः फ़रमाई बर आनं ॥
अर्थः— चाहे आप मारें चाहे क्षमा करें, मेरा सिर और हाथ दोनों आप की देहली ( दहलीज़ ) पर हैं । दास का आदेश क्या हो सकता है, जैसी आप आज्ञा दें वैसा चताआश्रो में लाऊं । महाराज जी ! आप का पत्र मुझे मिला, अत्यन्त खुशी हुई, परन्तु पत्र पढ़कर चित्त अति शोकातुर हुआ, क्योंकि आप दास पर रुष्ट ( ख़फ़ा ) हैं । आप अब क्षमा करियेगा, क्योंकि मेरे जैसे अनुभवहीन ( नातजरबेकार ) से भूल चूक बहुधा हो जाती है । "मनुष्य गिर2 कर सवार होता है," और कई वार बड़े स्याने ( बुद्धिमान ) भी चूक जाते हैं । "तारू डूबते आये हैं" । आप अब यहां कब पधारेंगे ? जब तक आप का कुशल-पत्र या आप स्वयं यहां न आयेंगे, मुझे वही चिन्ता रहेगी । मुझे प्रतीत होता है कि इन दिनों आप को तंगी होगा, इसलिये यदि आप आज्ञा दें तो मैं यहां से कुछ अर्जकरूं [अर्थात् सेवा में कुछ भेजूं] । आप दास पर किसी प्रकार से रुष्ट न होवें । इस वर्ष मैं ने ऐसी एक भी पुस्तक नहीं ख़रीदी जो मेरी वार्षिक परीक्षा में उपयोगी न हो । पहिले यह स्वभाव मुझे था, पर अब आपकी दया से दूर हो गया है । खर्च मुझ से निःसन्देह अधिक होजाता है, और मैं प्रयत्न करता हूं कि कम हो । खर्च दूध इत्यादि में होता है । मैं जब कांग्रेस का उत्सव देखने गया था, तो इस उद्देश्य से गया था कि वहां जो बंगाल, मद्रास, बम्बई, मध्य प्रान्त, दक्षिण इत्यादि के अति उत्तम प्रकार के वक्ता (Lecturers) आये हुए हैं उनके व्याख्यान की विधि आदि देखूं । नौरोजी ────── * गुरु जी की मैट में जब कुछ रुपये भेजना हो तो उसे "अर्जकरूं" का संकेत गुसाईं जी ने बना रक्खा था, उसी संकेत को यहां गुसाईं जी ने बरता है ।
के आने के दिन मैं ने इस बात का धन्यवाद किया था कि लोगों को जोशख़रोश [ उत्साह ] में देख कर मुझे जोश नहीं आया; सो अब भी मैं आप के चरणों को धन्यवाद देता हूं कि इन सब बोलने वालों [ वक्ताओं ] को सुन कर मुझे जोश न आया । आप का दास तीर्थराम