सन् 1884 ईस्वी ।
( इस वर्ष गुसाईं जी की आयु लगभग साढ़े बीस वर्ष के थी और ऐम. ए. में पढ़ते थे । )
(100) गौन की चिन्ता । 10 जनवरी 1884
संबोधन पूर्वोक्त, आप के दो पत्र मिले, एक सात जनवरी का लिखा हुआ, दूसरा आठ का । आप खर्च की कुछ परवाह न करें, कोई डर नहीं । परमेश्वर दया करेगा । आप मुझे शीघ्र लिखें कि मैं वह चोगा ( गौन ) इत्यादि बनवाऊं या किसी से उधार मांगने का यत्न करूं । मैं ने एक दो से अब तक मांगा है, उन्हों ने इन्कार किया है । इस वर्ष से पहिले एक मनुष्य ( दर्ज़ी ) यूनीवर्सिटी से ठेका ले लिया करता था और उस से बने बनाये चोगे ( गौन ) मिल सकते थे । इस बार उसने ठेका नहीं लिया । आप बनवाने में बीस रुपये के लगभग खर्च होते हैं । यदि विश्वविद्यालय के वार्षिक उत्सव के निकटस्थ समय पर बनवाया जायगा तो खर्च अधिक पड़ेगा । क्योंकि उस प्रकार का गौन ( चोगा ) बनाने वाले कारीगर लाहौर में एक या दो से अधिक नहीं । और उन दिनों उन को काम बहुत विशेष होगा और मज़दूरी बहुत
मांगेंगे । इस बार मुझ से भी खर्च बहुत अधिक हुआ है, परन्तु भविष्य में आप देखेंगे कि मेरा खर्च दूध इत्यादि पर बहुत कम हुआ करेगा । अपनी भगनी* (बहन अवथा बहिन) ( तीर्थों ) के विषय में मुझे कल ही मालूम होगया था । ( उसकी मृत्यु से ) जो मुझे शोक हुआ है उसका न लिखना अच्छा है । मैं बड़ा ही रोया हूं । मेरी उसके साथ अत्यन्त प्रीति थी । आप का दास तीर्थराम
(101) एक प्रोफ़ैसर साहिब का अपना गौन देने के लिये तैयार होना । 14 जनवरी 1884
संबोधन पूर्वोक्त, आज +लछमण दास मिला है, चोगा ( गौन ) किसी विद्यार्थी से हाथ नहीं लगा । क्योंकि बहुतों ने तो बनवाया ही नहीं हुआ, और जिन्हों ने बनवाया हुआ है उन से औरों ने पहिले ही से मांग रक्खा हुआ है । यदि हो सके तो आप ────── * तीर्थराम जी की एक ही भगनी थी जिसका नाम तीर्थों था, जिस के साथ उनको अत्यन्त प्रेम था और जिसकी मृत्यु पर उन्हें अत्यन्त दुःख हुआ था ।
+ लाला लछमणदास चाहिल कुहना के रहने वाले हैं । गुसाईं तीर्थराम जी के साथ इनकी बड़ी प्रीति थी । उनके एक बड़े भ्राता लाला सोहन लाल हैं जो कई वर्षों से लाहौर रहते हैं । उन्हों ने तीर्थराम जी को समय २ पर धन से सहायता दी, और अपने पुत्र लाला बालमुकन्द को विद्यार्थी उन ( तीर्थराम जी ) के सुपुर्द कर रक्खा था । आज कल यह लाला बालमुकन्द जी बंगाल प्रान्त में असिस्टैंट इन्जीनियर के पद पर नियुक्त हैं ।
हाकिमराय से चाहिल संदेशा भेजकर उसका गौन गुजरांवाले से मंगवा लेना, और वहां से जब यहां पधारो तो साथ लेते आना । नहीं तो मेरे प्रोफ़ैसर साहिब ने फ़रमाया था कि "तुम ने गौन तो मेरा ले लेना, परन्तु यह गौन विलायत का है और उसमें तथा यहां के गौन इत्यादि में थोड़ा सा भेद ( फ़र्क़ ) है । वह फ़र्क़ दुरुस्त कराने पर तुम्हारे चार पांच रुपये खर्च होंगे क्योंकि एक हुड ( फ़ना ) तुमको नया बनवाना पड़ेगा" । आप का दास तीर्थराम
(102) गवर्नमेंट कालेज के प्रिन्सिपल साहिब की सहानुभूति व कृपा । 5 फरवरी 1884
संबोधन पूर्वोक्त, आज मैं गवर्नमेंट कालेज के बड़े साहिब जी को मिलने गया था, उन्हों ने मुझे एक पुस्तक उपहार की रीति से दी है, और वह कहते हैं कि "तुम्हारे उधर ( विलायत ) भेजने के लिये यदि हमें आकाश और पाताल भी एक करने पड़ जायें तो किंचित् संकोच ( भंजक ) नहीं" इत्यादि । अब मैं कल परसों यह पूछूंगा कि वह छात्रवेतन किस मिति(तारीख) से मिलेगा । पूछ कर सूचना दूंगा । .......... ────── † लाला हाकिम राय भी लाला लछमण दास के सम्बन्धी हैं । ‡ यह ग्राम जिला गुजरांवाले में है । * मिस्टर बैल प्रिन्सिपल गवर्नमेंट कालेज से यहां अभिप्राय है । † यह छात्र वेतन विलायत का वह है जिसका वर्णन 4 अगस्त 1883 के पत्र में हुआ है ।
मैं रात के समय उस बेल के साथ भी ( जो मेरे मकान में लगा हुआ है ) व्यायाम किया करता हूं । आप का दास तीर्थराम
(103) गुरु जी से सीखा हुआ उपदेश अब गुरु जी की ओर । 7 फरवरी 1884
संबोधन पूर्वोक्त, आप अपने वास्तव स्वरूप की ओर ध्यान करने का यत्न करें । संबन्धियों की किंचित् मात्र चिन्ता न करें । सत्संग, उत्तम पुस्तक, एकान्त सेवन के द्वारा अपने स्वरूप में निष्ठा होती है । और अपने स्वरूप में निष्ठा होने से सारा संसार दास बन जाता है । आप अपने सेवक को कभी न भुलायें, सर्वदा कृपादृष्टि रक्खा करें । आप का दास तीर्थराम
(104) तीर्थराम जी का समय क्रम । 8 फरवरी 1884
संबोधन पूर्वोक्त, आप का एक कृपापत्र इस समय और मिला । अत्यन्त हर्ष हुआ । मैं आजकल कोई पांच बजे प्रातःकाल उठता हूं और सात बजे तक पढ़ता रहता हूं । फिर शौच इत्यादि जाकर स्नान करता हूं, और व्यायाम करता हूं, तदुपश्चात् ────── ‡ पंजाब के लोग घरों की आमनी सामनी दीवारों में एक लकड़ी स्तंभ के आकार की गाड रखते हैं जो वस्तुओं के लटकाने का काम देती है । उसे लोग खूंटा कहते हैं ।
पंडित जी की ओर जाता हूं । मार्ग में पढ़ता रहता हूं । वहां एक घंटे के पश्चात् भोजन पाकर उनके साथ गाड़ी में कालेज जाता हूं । कालेज से घर आती वार रास्ते में दूध पीता हूं । घर कुछ मिनट ठैहर कर नदी ( रावी दरिया ) को जाता हूं । वहां जाकर नदी तट पर कोई आध घंटे के लगभग टहलता रहता हूं । वहां से वापस आती वार सारे नगर के इर्द गिर्द ( चारों ओर ) बाग में फिरता हूं । वहां से घर आकर कोठे ( छत ) पर टहलता रहता हूं । इतने में अन्धेरा ( अन्धकार ) हो जाता है, (परन्तु स्मरण रहे कि मैं चलते फिरते पढ़ता बराबर रहता हूं) । अन्धेरा पड़ने पर व्यायाम करता हूं । और लैम्प ( दीपक ) जलाकर सात बजे तक पढ़ता हूं, फिर भोजन पाने जाता हूं और *प्रेम की ओर भी जाता हूं । वहां से आकर कोई दस बारह मिनट अपने मकान के बेल के साथ व्यायाम करता हूं । फिर कोई साढ़े दस बजे तक पढ़ता हूं । और लेट जाता हूं । मेरे अनुभव में यह आया है कि यदि हमारा उदर ठीक अरोग्यावस्था में हो, तो हमें अत्यन्त हर्ष, प्रसन्नता, एकाग्रता, ईश्वरस्मरण और अन्तःकरण की शुद्धि प्राप्त होते हैं । बुद्धि और स्मृति का बल अति तीव्र होजाता है । प्रथम तो मैं खाता ही बहुत कम हूं, द्वितीय जो खाता हूं पचा लेता हूं । परसों मुझे प्रेमनाथ का पिता बाबू चंद्रनाथ मित्र के घर ले गया था । पर आज मैं अकेला बाबू चंद्रनाथ मित्र ( जो पंजाव विश्वविद्यालय के सब-रजिस्ट्रार हैं ) की ओर दफ़्तर में गया था, बड़े सम्मान से मिले । कहते हैं कि वह छात्रवेतन इस वर्ष में दिया जाना है और 250) (दो सौ पचास रुपये) ────── * प्रेम से तात्पर्य प्रेमनाथ है ।
का मासिक है । वहां ( विलायत ) जाकर चतुर विद्यार्थी और भी वृत्ति ले सकते हैं । अप्रेल मास में प्रार्थना पत्र दृष्टिगोचर किये जायेंगे । इस बात को आप ने अभी और किसी मनुष्य से भी प्रकट न करना । वहां वार्तालाप में उन्हों ने कहा था कि गुजरांवाले के प्रान्त में पहिले एक ब्राह्मण महात्मा पुरुष थे जो जम्मू की ओर भी जाया करते थे, उनकी यह बात प्रसिद्ध थी कि वह कई प्रकार की सच्ची २ भविष्य वाणी कहा करते थे । क्या अब भी कोई ऐसे ( महात्मा ) हैं । मैं ने फिर आप का वर्णन बड़े अच्छे प्रकार से किया । और कहा कि जब वह ( अर्थात् आप ) लाहौर में पधारेंगे, मैं दर्शन कराऊंगा, इत्यादि । आज कल राय भेला राम का पुत्र जो एफ. ए. में पढ़ता है मुझे कई संदेशे भेज चुका है कि मैं उसे पढ़ाना स्वीकार करूं । पर मैं ने अभी कोई उत्तर नहीं दिया । समय कहां से लाऊं ? कठिन यह है कि जिन को पढ़ाने लगता हूं वह फिर छोड़ते बिल्कुल नहीं । कोई न कोई उपाय से मुझे रख लेते हैं । प्रेम से और मैत्री से बांध लेते हैं । आप का दास तीर्थराम
(105) संसार की निःसारता । 18 फरवरी 1884
संबोधन पूर्वोक्त, संसार की कोई वस्तु विश्वास और आश्रय करने के योग्य ────── † सुना जाता है कि ब्राह्मण महात्मा सभ्यादास थे जो लगातार 14 वर्ष तक एक चुबारे में रहे थे, फिर अपनी वाणी की सिद्धि में प्रसिद्ध होगये थे । उन से लोग बहुत भय खाते थे । * रायभेला राम के सुपुत्र राय बहादर लाला रामशरण दास से यहां अभिप्राय है ।
नहीं । अत्यन्त कृपा परमेश्वर की उन लोगों पर है जो अपना आश्रय और विश्वास ( निश्चय ) केवल एक परमात्मा में रखते हैं । और चित्त से सच्चे साधु हैं । ऐसे महापुरुषों के चरणों में परमेश्वर की सारी सृष्टि सेवा करती है ( अर्थात् आज्ञाधीन रहती ) है । आप का दास तीर्थराम
(106) विलायत जाने निमित्त छात्र-वेतन का विज्ञापन । 20 फरवरी 1884
संबोधन पूर्वोक्त, आप का एक कृपा पत्र आया । बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ । आज यहां भारी धूप निकली थी । विश्वविद्यालय वालों ने आज ही से उस छात्र-वृत्ति ( वज़ीफे ) के विषय में यह विज्ञापन दे दिया है कि जो विद्यार्थी वह छात्र-वृत्ति लेना चाहते हैं, वह आज से लेकर मई मास से पहिले २ अपने २ प्रार्थना पत्र भेजें । आप ने कृपा-दृष्टि रखनी । आप स्वयं भी पत्र लिखने का अभ्यास करें । धैर्य और प्रीति से वह काम करना, पर शीघ्र से । आप ने किसी प्रकार की चिन्ता न करना । आप का दास रामतीर्थ,
(107) व्यायाम और व्रतों से रोग दूर करना । 25 फरवरी 1884
संबोधन पूर्वोक्त, महाराज जी ! अब आप की प्रकृति कैसी है ? आप से जितना हो सके व्यायाम का प्रयत्न करें, और एक दो वार
व्रत रक्खें तो मैं निश्चय करता हूं कि आप को निःसन्देह अरोग्यता प्राप्त हो जायगी । मेरे अनुभव में आया है कि खाने पीने वाली औपधियों का अधिक सेवन करना भी हमें तंग करता है । परमेश्वर आप को शीघ्र कुशल करे, आप ने अपना हाल अत्यन्त शीघ्र अपने हाथ ( हस्त ) से लिखना । आप के चरणों की ओर ध्यान है । इन दिनों लाहौर में करनल अलकाट और मिसिज़ विसेंट आये हुये हैं । आप का दास तीर्थराम,
(108) साधुसेवा और पुस्तकों से लाभ । 27 फरवरी 1884
संबोधन पूर्वोक्त, करनल अलकाट और अनी विसेंट आज चले गये, वे पक्के सनातन धर्मी हैं और वेदान्त में बड़ा विश्वास रखते हैं । आज आप की कृपा से मुझे डाक्टर का सार्टीफिकेट बड़ा अच्छा मुफ्त मिल गया है । अब आप की ओर से कसर ( न्यूनता ) है । आप पुस्तकें निःशंक होकर खरीदें । जो कुछ साधु सेवा और पुस्तक इत्यादि पर लगे, वही लाभ है । आप की कुशलता पढ़ कर बड़ी खुशी हुई । आप का दास तीर्थराम,
(109) काम का रहस्य । 4 मार्च 1884
संबोधन पूर्वोक्त, आज मैं देर के बाद विनय पत्र भेजने लगा हूं । इन दिनों मुझे अत्यन्त काम रहा है । बल्कि आज मैं सोया भी पांच घंटे से कम हूं । प्रोफ़ैसरों का काम भी करने वाला है । सर्टीफिकेट अत्यन्त उत्तम मिले हैं । आप सर्व प्रकार से प्रसन्न
रहा करें । किसी प्रकार की चिन्ता न करें । यदि हम किसी काम को करना चाहें, तो मेरे विचार में हम को चाहिये कि अपने मन को किंचित् न डोलने दें ( उस को अडोल, अचल, और निष्किय रक्खें, ) परन्तु उस काम के करने के लिये अपनी इन्द्रियों को किंचित् स्थिर ( निष्किय ) न होने दें । उनको हिलाते और चलाते रहें और कर्म में अत्यन्त लगात रहें । इस प्रकार से हमको अवश्य और अत्यन्त शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त होती है । कृष्ण जी ने भी यही कहा है । आप का दास तीर्थराम
(110) बहुत काम में बड़ा आनन्द । 6 मार्च 1884
संबोधन पूर्वोक्त, मुझे काम बहुत बड़ा रहता है, परन्तु काम से बहुत अधिक आनन्द रहता है । यह सब आप के चरणों की कृपा है । लाला रामशरण दास ने एक घंटा के 20) वीस रुपये ) मासिक कर दिये हैं, किन्तु समय अधिक खर्च होता है, क्योंकि मुझे स्वयं पढ़ाने में आनन्द आता है । आप का दास तीर्थराम
(111) ऐम० ए० में तीर्थराम जी के वस्त्र । 8 मार्च 1884
संबोधन पूर्वोक्त, ......... .... पिछले दिनों मुझे कपड़ों ( वस्त्र ) की बड़ी तंगी रही । धोबी ने मास भर तक कपड़े नहीं दिये थे, इस ────── * यहां राये बहादुर लाला मेला राम साहिब के सुपुत्र राय बहादुर लाला रामशरण दास से अभिप्राय है ।
लिये मैं ने पड़ोसी दर्ज़ी से एक चोगा, एक कुरता, और एक पाजामा मोल ले लिया था । दाम दो रुपये से दो पैसे कम लगे थे । आप अपनी कुशलता के विषय में लिखें । आप के चरणों की ओर ध्यान रहता है । आप का दास तीर्थराम
(112) तीर्थराम जी का केवल दूध पर निर्वाह । 11 मार्च 1884
संबोधन पूर्वोक्त, महाराज जी ! मैं इन दिनों वास्तव में केवल दूध पर निर्वाह करता हूं । और मेरा दमाग़ ( मस्तिष्क ) बहुत अच्छी प्रकार से काम करता है । बदन (शरीर) में बल किसी से कम नहीं । मन भी शुद्ध रहता है । यदि आप भी इसी प्रकार केवल दूधादि पर निर्वाह करने का स्वभाव डालें तो मुझे बड़ी खुशी हो । खर्च की कुछ चिन्ता न करें । दूध पीना व्यर्थ खर्च नहीं है । दूध अधिक वर्तने से खर्च कदापि अधिक नहीं होता, और यदि अधिक हो भी तो भी कुछ चिन्ता नहीं है । आप का दास तीर्थराम
(113) सत्संग और कुसंग के फल । 18 मार्च 1884
संबोधन पूर्वोक्त, ...........सत्संग, उत्तम ग्रन्थ, और भजन कीर्तन ( अथवा उपासना ) यह तीन चीज़ें तीन लोक का राजा बना देती हैं । और हमारा कुसंग परमेश्वर को हमसे कुपित (रुष्ट) करवा देता है । जिसके कारण हम पर नाना प्रकार के कष्ट
आते हैं । एकान्त सेवन और थोड़ा खाने से परमात्मा आप आकर हमारा संग अंगीकार करते हैं । आप का दास तीर्थराम,
(114) निर्धन और धनी पुरुषों में तुलना । 11 अप्रैल 1884
संबोधन पूर्वोक्त, मैं ने इन दिनों एक नया पद्य ( शेर ) पढ़ा है:— "तही दस्तों का रुतवा पहले-दौलत से ज़्यादा है । सुराही सर झुकाती है जब पैमाना आता है ॥" अर्थः—खाली हाथ ( अर्थात् निर्धन ) पुरुषों की पदवी धनाढ्य पुरुषों से अधिक है, अर्थात् निर्धन पुरुष धनी पुरुषों से अच्छे हैं; जैसे जब खाली पात्र ( भरी हुई ) सुराही ( घटिका ) के सन्मुख आता है, तो सुराही ( उस पात्र को भरने के लिये ) अपना सिर नीचे झुकाती है, मानो उस खाली पात्र के आगे प्रणाम करती है और उस को अपने से अच्छा समझती है । आप का दास तीर्थराम,
(115) मिशन कालेज में अपने प्रोफ़ेसर के स्थान पर काम करना । 28 अप्रैल 1884
संबोधन पूर्वोक्त, जुलाई के मास में मिशन कालेज के ( गणित शास्त्र के ) बड़े प्रोफ़ेसर ने अपने घर विलायत छुट्टी पर जाना है । उन्हों ने मुझे अपने स्थान पर अपने पीछे काम करने के लिये कहा है और लिखा है । और मैंने स्वीकार कर लिया
है । वेतन के विषय अभी कुछ बातें नहीं हुई । साथ इस के उन के कहने पर मैंने प्रार्थना पत्र आज विश्वविद्यालय के दफ़्तर में दिया है । आगे जो परमात्मा की और आप की इच्छा । आप कृपा दृष्टि रक्खा करें* । आप का दास, तीर्थराम,
(116) बुरे पड़ोसियों से परहेज़ ( निवृत्ति ) 30 अप्रैल 1884
संबोधन पूर्वोक्त, आप का पुत्र केवल एक ही आज तक मिला है । लाला रामशरण दास ने मुझे बहुत कहा है कि मैं उस की कोठी पर चल रहूं । चुनांचिः ( तदनुसार ) उन्हों ने मुझे आज चार पांच कमरे एकान्त और सुरक्षित ( महफूज़ ) दिखलाये भी हैं कि उन में से चाहे कौन सा मैं पसन्द कर लूं । पर मैंने उत्तर दिया था कि महाराज जी आप जान कर जैसे आज्ञा देंगे, वैसे मैं करूंगा । आप लाला साहिब घर पर सोया करते हैं, पर कोठी में उन के बहुत से नौकर रक्षा के लिये रहते हैं । उन का स्वभाव निरा साधुओं वाला है । कोठी भाटी दरवाज़े के समीप है । जिस मकान में अब मैं रहता हूं उस के सन्मुख तीन मकानों में वेश्या रहती हैं, इस लिये बारियां ( खिड़कियां ) सदा बन्द रखनी पड़ती हैं । आप शीघ्र पधार कर निर्णय कर जावें तो अच्छा हो । आप का दास तीर्थराम, ────── * इस समय गुसाईं जी एम, ए श्रेणि में पढ़ते थे परन्तु अपने भूतपूर्व प्रोफ़ेसर के कहने पर अपना अध्ययन काल छोड़ कर उन के बदले मिशन कालेज में पढ़ाते रहे । तिस पर भी वह एम, ए की परीक्षा में सारे पंजाब भर में गणित शास्त्र में प्रथम निकले ।
(117) अंग्रेज़ शिष्य का वी. ए. पास होना। 3 मई 1884 संबोधन पूर्वोक्त, आज मैं आप का बड़ा इन्तज़ार (प्रतीक्षा) करता रहा हूं। आप नितान्त नहीं आये। महाराज जी ! आप दास पर सर्व प्रकार से प्रसन्न रहा करें, किसी तरह से भी रुष्ट न होना। मैं नितान्त आप का आज्ञाधीन हूं। मेरा अंग्रेज़ शिष्य वी. ए. पास होगया है। आप का दास तीर्थराम,
(118) निष्काम कर्म। 10 मई 1884 संबोधन पूर्वोक्त, आप का कृपा पत्र मिला। इस संसार में कोई वस्तु हमारी नहीं है। यदि हम सुख चाहते हैं, तो हमें चाहिये कि संसार के काम काज करते समय इस शरीर इत्यादि को केवल परमात्मा का समझ कर विचरें और इस में राग द्वेष न करें। आप का दास तीर्थराम,
(119) सत्वगुणी आहार। 28 मई 1884 संबोधन पूर्वोक्त, यहां सर्व प्रकार से कुशल है। आप अपना हाल (स्वास्थ्य) शीघ्र लिखते रहा करें। थोड़े और सत्वगुण आहार से चित्त बड़ा प्रसन्न रहता है। गरम और बहुत देर में पचने वाली वस्तुओं से प्रकृति सदा तंग रहती है। आप का दास तीर्थराम,
(120) कुसंग के परिणाम। 26 मई 1884 संबोधन पूर्वोक्त, कुसंग जिसे "कोहे-संग" अर्थात् पापाग्नि का पर्वत कहना ठीक है हमारी उन्नति की ओर उड़ने वाले पंखों (वायुओं) पर पड़ कर हमें शववत् (मुर्दा सा) बना देता है। और हमें मानो आकाश में से अपने भार के कारण अपने साथ नीचे ही नीचे लिये जाता है। यदि आप भगवद्गीता के अर्थों का एक भोग शनैः २ विचार संयुक्त इन दिनों में पायें, तो मुझे अत्यन्त ही खुशी होगी। आप ने दास पर कृपा दृष्टि रखनी। किसी प्रकार से भी रुष्ट न होना। आप का दास तीर्थराम,
(121) नंगे और लम्बे आँचल (पल्ले) वालों से सुख असम्भव।
2 जून 1884 संबोधन पूर्वोक्त, मैं पत्र अपने नियमानुसार (अथवा यथापूर्वक) निरन्तर भेजता रहा हूं। शायद आप को देर से मिलता होगा। या मेरा नौकर डाक में डालना भूल जाता होगा। वास्तव में जगत् की कोई वस्तु भी स्थायी नहीं। जो मनुष्य इन वस्तुओं पर आश्रय करता है (वह अपने आनन्द का आधार परमात्मा पर नहीं रखता), वह अवश्य हानि उठाता है। संसार के धनाढ्य पुरुष खाली और लम्बे आँचल वाले पुरुषों के सदृश हैं। अर्थात् यह लोग हैं तो नितान्त नग्न और कृपण, पर अपने आप को बड़े लम्बे आँचल वाला अर्थात् वस्त्रों वाला अनुमान
करते हैं। ऐसे नग्न व लम्बे आँचल (पल्ले) वालों से क्या सुख मिल सकता है (अर्थात् कुछ भी नहीं)। आप ने दास पर सदा कृपा-दृष्टि रखनी और उसे अपना आज्ञाकारी सेवक निश्चय करना। कोई चिन्ता न करना। आप ने सर्व प्रकार से आनन्द रहना। किसी प्रकार से भी रुष्ट न होना। मैं आप का टहलिया (किंकर, अनुचर) हूं। आप का दास, तीर्थराम
(122) कीड़ियों की मनोहर बात चीत। 5 जून 1884 संबोधन पूर्वोक्त, महाराज जी ! परमेश्वर बड़ा ही चँगा (अच्छा) है, मुझे बड़ा ही प्यारा लगता है। आप उस के साथ सुलह (मैत्री) रखा करें। आप के साथ जो कभी २ किञ्चित् कठोरता वर्तता है यह उस (ईश्वर) के विलास हैं। वह आप के साथ हंसना खेलना चाहता है। हमें चाहिये कि हंसने वालों से रुष्ट न होजायें। किसी अन्य पत्र में मैं आप की सेवा में उसकी कई बातें लिखूंगा (या वर्णन करूंगा)। वास्तव में वह (ईश्वर) बड़ा ही मोतियों वाला है। यह पत्र मैं मेज़ पर रखकर लिख रहा हूं। यहां प्रातः थोड़ी सी चीनी (खाँड वा शक्कर) गिरी थी। उस खाँड के पास मेज़ पर चार पाँच कीड़ियां एकत्र हो रही हैं, और वह सब मेरी लेखनी की ओर और अक्षरों की ओर तक रही (देख रही) हैं, और परस्पर बड़ी बातें कर रही हैं। जितनी वातचीत मैं ने उनसे सुनी है वह विनय पूर्वक लिखता हूं। (परन्तु पहिले मैं इतनी विनय करना चाहता हूं कि चाहे मेरे अक्षर बहुत ही बुरे और निषिद्ध तथा कुरूप हैं, पर उन
कीड़ियों की दृष्टि में तो चीन देश के नक्शोनगार-सुंदर तथा आकर्षणीय चित्रों—से कम नहीं)। जो कीड़ी सब से पहिले बोली, वह बड़ी अनजान और निर्दोष बच्ची थी। अभी बहुत छोटी बच्चा थी। पहिली कीड़ी कहती है:—"देख, बैहन ! इस लेखनी की चित्रकारी। पत्र (काग़ज़) पर क्या गोल २ घेरे (चित्र या वृत्त) डाल रही है। इसकी डाली हुई लिकीरों (अर्थात् अक्षरों) को सब लोग बड़ी प्रीति से अपने नेत्रों के पास रखते हैं (अर्थात् पढ़ते हैं), और जिस काग़ज़ (पत्र) पर यह (लेखनी) चिन्ह करदे (अर्थात् लिख दे), उस काग़ज़ को लोग हाथों में लिये फिरते हैं। काग़ज़ पर मानो मोती डाल रही है, क्या रंगामेज़ियां (चित्रकारियां) हैं। अमुक २ (वाज़े 2) अक्षर तो विशेप करके हमारी और हमारी मौसी के पुत्रों (कीड़ों) के रूपों के समान दिखाई देते हैं। क्या ही सुंदर हैं।
कलम गोयद कि मन शाहे-जहानं। कलमकश रा बदौलत मे रसानम॥
अर्थः—लेखनी कहती है कि मैं जगत् की अधिष्ठात्री (या जगत् की विधाता) हूं और लेखक को कुबेर भंडारी बना देती हूं। इस लेखनी में प्राण नहीं हैं, परन्तु हमारे जैसे प्राणियों को बीसियों वार उत्पन्न कर सकती है।" इतना कहकर पहिली कीड़ी चुप हो गयी। अब दूसरी बोली, यह कीड़ी पहिली की अपेक्षा से कुछ बड़ी थी और अधिक दीर्घ दृष्टि रखती थी। दूसरी कीड़ी बोली:—"मेरी भोली बैहन ! तू देखती नहीं है कि लेखनी नितान्त निर्जीव वस्तु है; वह तो नितान्त कुछ
काम नहीं कर सकती। दो अंगुली उसे चला रही हैं। जितनी प्रशंसा तू ने लेखनी की की है वह सब अंगुलियों के योग्य है।" अब एक इन दोनों से बड़ी और स्यानी कीड़ी बोली:—"तुम दोनों अभी अनजान हो। अंगुलियां तो पतली रस्सियों के सदृश हैं, वह क्या कर सकती हैं। वह मोटी बाँह (भुजा) इन सब से काम ले रही है"। अब इन कीड़ियों की माता बोली:—"यह सब लेखनी, अंगुलियां, कुहनी (वंक), भुजा इत्यादि इस बड़े मोटे धड़ के आश्रय से काम कर रहे हैं। यह सब प्रशंसा उस धड़ के योग्य है।" इतना कह कर कीड़ियां सब चुप हो गयीं। तो मैं ने उन को यह कहाः- कि "ऐ मेरे दूसरे स्वरूपों ! यह धड़ भी जड़ रूप है। इस को भी एक और वस्तु का आश्रय है, अर्थात् प्राण का। इस लिये यह सब प्रशंसा उस प्राण के ही योग्यं है।" मैं ने इतना कहा तो मेरे चित्त में (हृदय में) आप की ओर से यह आवाज़ आई। और वह आप के वचन भी मैं ने उन कीड़ियों को सुनाये। उन का सार मैं लिखता हूं। "मनुष्य के प्राण से परे भी एक वस्तु है, अर्थात् परमात्मा। उस वस्तु के आश्रय सर्व भूत चेष्टा करते हैं। संसार में जो कुछ होता है, उसी की इच्छा से होता है। पुतलियां विना तार वाले (पुतलीगर) के नहीं नाच सकतीं। वांसरी (मुरली) विना बजाने वाले के नहीं बज सकता। इसी प्रकार संसार के लोग विना उस (ईश्वर) की आज्ञा के कोई काम नहीं कर सकते। जैसे तलवार का काम यद्यपि मारना है, तथापि वह विना चलाने वाले के नहीं चल सकती, इसी प्रकार से चाहे कुछ मनुष्यों का स्वभाव कितना
अत्यन्त बुरा क्यों न हो, पर जब तक उन्हें परमेश्वर न उकसाय (प्रेरणा करे), वह हमें कष्ट नहीं पहुँचा सकते। जैसे महाराजा के साथ संधि (सुलह) करने से सब राज्याधिकारी (अमला) हमारा मित्र बन जाता है, इसी प्रकार परमात्मा को प्रसन्न रखने से सारी सृष्टि हमारी अपनी हो जाती है"। महाराज जी ! आप का कृपा पत्र मिला था, अत्यन्त हर्ष का कारण हुआ। महाराज जी ! यदि आप यहां रहना चाहें, तो बड़े हर्प की बात है। और यदि यहां आप एक पुरुष रखना चाहें, तो आप (अपनी सेवा के लिये) निःसन्देह रख लें। जहां इतना खर्च हो रहा है, वहां एक अन्य पुरुष का खर्च भी परमात्मा बड़ी अच्छी तरह से दे देंगे। मेरी ओर से कोई फ़र्क़ (कमी या रोक) नहीं। जिस प्रकार से जी (चित्त) चाहे, आप करें। मुझे किसी पर किञ्चित क्रोध नहीं है। मैं बड़ा खुश हूं। बहुधा क्रोध में आकर मनुष्यों के मुख से कई बातें निकल जाती हैं, हमें, सब क्षमा कर देनी चाहियें, आप भी क्षमा करदें। आप उन से मेल (सुलह) करलें। भोजन चाहे आप उन का खायें, चाहे न खायें, पर सुलह (संधि) अवश्य करलें, और सब अपराध क्षमा करदें। साधुवों का क्षमा भूषण होता है। आप इन दिनों कुछ अचाह (इच्छा रहित) हुए थे, इस लिये आप के पिता जी आप के पास आये थे। यह पत्र स्वतः इतना लम्बा हो गया। क्षमा करना। परमेश्वर आप को बड़ी खुशी देगा। आप का विनित दास तीर्थराम,
(123) गीता पढ़ने का लाभ। 6 जून 1884 संबोधन पूर्वोक्त, आप का कृपा पत्र मिला, आप के चित्त की अवस्था पढ़ कर अत्यन्त खुशी हुई। थोड़े दिन हुए मैं ने भी गीता का एक भोग पाया था। अत्यन्त ही उत्तम ग्रन्थ है। इस को समझ कर पढ़ने से परमेश्वर पर इतना विश्वास हो जाता है जितना संसारी लोगों का अपने शरीर पर होता है। …… मैं आशा करता हूं कि मैं इस शनिवार आप के चरणों में उपस्थित हूंगा। पहिले इस कारण से नहीं आ सकता कि प्रथम तो कोई छुट्टी (अनध्याय) नहीं है, द्वितीय शिष्यवृत्ति (छात्र वेतन) अभी नहीं मिली। और विना रुपयों के यदि वहां जाया जाये तो सब को निराशा होती है, और न वह खुश होते हैं, और न हम को ही अधिक खुश करते हैं। तृतीय मैं आशा करता हूं कि तब तक उस बड़े वज़ीफे (शिष्यवृत्ति) के विषय में निर्णय हो जायगा। और इस विषय के निर्णय हुए विना जाने से यह डर है कि शायद वहां मेरी हाज़री (उपस्थित) की आवश्यकता हो और मैं उस दिन लाहौर में न मिलूं। यह सब समागम दैवयोग से चले हैं, मेरा इनमें कुछ दखल (हाथ) नहीं है। पर यदि आप आज्ञा देंगे, तो मैं इन सब कारणों के होते हुए भी आप की सेवा में उपस्थित हो सकता हूं। आगे जैसी आप की इच्छा। महाराज जी ! आप दास पर सर्व प्रकार से खुश रहा करें। जो आप की सम्मति (राये) है, मेरी सम्मति उसके
विरुद्ध कदापि नहीं हो सकती। दास को आप ही के चरणों का आश्रय है। आप का दास, तीर्थराम,
(124) दूसरों के आगे गुरु की महिमा। 8 जून 1884 संबोधन पूर्वोक्त, महाराज जी ! आप का कृपा पत्र आये देर हो गयी है। आज लाला राम शरण दास से आप की बहुत बातें कही गयीं। वह अत्यन्त प्रसन्न हुआ। और दर्शनों का अभिलाषी हुआ। महाराज जी ! आप की अति कृपा है। अत्यन्त हर्ष और आनन्द रहता है। आशा है कि शीघ्र दर्शन करूंगा॥
आज़ू दारम कि खाके-आँ क़दम। तूतियाये-चश्म साज़म दम बदम॥
अर्थः—मेरी यह याचना (अथवा अभिलाषा) है कि आप के चरणों की रज को मैं नित्य अपने नेत्रों का सुरमा बनाऊं। आप का दास, तीर्थराम,
(125) विलायत के छात्रवेतन का न मिलना 10 जून 1884 संबोधन पूर्वोक्त, परमेश्वर की इच्छा नहीं थी कि इस वर्ष मैं विलायत जाऊं। सविस्तर हाल मुख से वर्णन करने योग्य है। आप का दास तीर्थराम,
(126) गुरु के पद की उपमा। 12 जून 1884 संबोधन पूर्वोक्त, मैं शायद बुद्धवार सेवा में उपस्थित हूंगा। आप का पद्य (शेर) बहुत अच्छा है। लंग भग इसी विषय के कुछ पद्य मैं नीचे लिखता हूं।
1—बगिर्दे-खुद हमें गर्दम् चो गर्दूं। व्रूं अज़ खुद खरामीदन नदारम॥
2—हर दम अज़ नाखन खराशम सीनाए-अफ़कार रा। ता ज़-दिल बेरूं कुनम गैरे-ख्याले-यार रा॥
3—दिल के आईने में है तस्वीरे-यार। जब ज़रा गर्दन झुकाई, देख ली॥
अर्थः-1—अपने चारों ओर आकाश के समान मैं घूमता हूं, अपने से बाहर मैं नहीं टहलता (फिरता)।
2-मैं सदा शोक परायण (चिन्तामय) हृदय को नखों से छीलता रहता हूं (अर्थात् शोकों को हृदय से बाहर करता रहता हूं) जिस से अपने स्वरूप (अथवा प्यारे) के विचार से अतिरिक्त अन्य विचारों को हृदय से बाहर निकाल दूं।
3—अन्तःकरण के दर्पण में अपने प्रियतम की मूर्ति है। जब भी किञ्चित् सिर झुकाया, तब उसे देख लिया। आप का दास, तीर्थराम,
(127) अभ्यासी और शुद्धचित्त मनुष्यों के मिलाप का कारण। 26 जून 1884 संबोधन पूर्वोक्त, अभ्यासी और शुद्ध अन्तःकरणी पुरुषों का मिलाप (सम्मेलन) बड़े ही उत्तम कर्मों का फल है। आप का दास तीर्थराम,
(128) तीर्थराम जी की अत्यन्त प्रवृत्ति। 3 जुलाई 1884 संबोधन पूर्वोक्त, मैं कल बड़ा ही काम में प्रवृत्त रहा हूं, अतएव रात के दो बजे सोया हूं। और आज प्रातः पांच बजे फिर काम के लिये उठ खड़ा हुआ हूं। इस लिये पत्र कल नहीं लिख सका। क्षमा करियेगा। मिशिन कालेज के विद्यार्थी बड़े ही खुश होते हैं। यह सब आप की दया है। आप का दास, तीर्थराम,
(129) एकान्त का आनन्द। 21 अगस्त 1884 संबोधन पूर्वोक्त, यहां मैं एकान्त में हूं। और जो मुझे एकान्तता में आनन्द है, उस का वर्णन करना अत्यन्त कठिन है। यदि आप जितना भी हो सके कोठे (छत) पर रहने का स्वभाव डालें, तो आप को पूर्ण आनन्द होगा, और मुझे भी इस से बड़ी खुशी होगी। एक स्वभाव को बदल कर दूसरा स्वभाव डालना
कठिन तो है, पर आप यदि यह स्वभाव कोठे (छत) पर रहने का डाल लेंगे, तो आप बड़े ही खुश रहा करेंगे। कोठे पर रह कर तत्व विचार के पुस्तक, वासिष्ठ आदिक, पढ़ने से लाभ होगा। नीचे यह पुस्तक विचारे ही नहीं जा सकते।
(130) ईश्वर भक्त के सम्बन्ध में कविता। 20 सितम्बर 1884 संबोधन पूर्वोक्त, और कोई बात लिखने के योग्य नहीं। निम्न पद्य ही लिख देता हूं।
(1) आशिकां दर बेनवाई खुसरविहां मे कुनंद। शाही-ए-कोनीन दारद चे सरो सामने-इश्क़॥
(2) बदिल्ले फ़क्र, शाही में कुनम अज़ खूविये-ताले। न जम दारद न कैये ईं ताला-ए-गरदूं स्वारे-मन॥
(3) हुवाव आसा किया है कार इस्तराना तमाम अपना। रक्खा महरूम में क़तरह से इस दर्या में जाम अपना॥
अर्थः-(1) ईश्वर भक्त निर्धन तथा अन्य सामग्री रहित अवस्था में भी बादशाहियों करते हैं [अर्थात् आनन्द भोगते हैं]। द्रव्य इत्यादि से रहित प्रीति दोनो लोकों [लोक परलोक] का अधिपति बनाती है॥
(2) प्रारब्ध की उत्तमता से मैं कंथा में भी राज्य करता [आनन्द भोगता] हूं। ऐसी आकाश पर स्वारी करने वाली मेरी प्रारब्ध न बादशाह जमशेद रखता है और न कैकाऊस [अर्थात् ईरान देश के बादशाह की भी ऐसी उत्तम प्रारब्ध नहीं]।
(3) बुदबुदा के सदृश हम ने अपना काम तमाम कर दिया है (अर्थात् निजानन्द के समुद्र में हम ने अपने तुच्छ अहंकार रूपी बुदबुदे को फोड़ दिया है), और इस आनन्द समुद्र में अपने शरीर रूपी प्याले (पात्र) को अहंकार रूपी बिन्दु (अर्थात् बुदबुदा) से रहित कर दिया है। आप का दास तीर्थराम
(131) चित्त अभ्यास करने से वश में आता है। 27 सितम्बर 1884 संबोधन पूर्वोक्त, ……………परमात्मा बड़ा ही कारसाज़ (काम सिद्ध करने वाला) और सब पर अत्यन्त कृपालु है। हमारे चित्त की सब दुर्वृत्तियां (अथवा कुरीतियां) हैं कि परमात्मा पर विश्वास न लाकर हमें दुःखी पड़ा करती हैं। यह चित्त अभ्यास करने से वश में आता है। अच्छे, उत्तम पुस्तक वासिष्ठ आदिक ऐसे समय पर विचारने चाहियें। और सर्वोपरि अत्यावश्यक यह बात है कि आहार अल्प कर देना चाहिये, अथवा व्रत रख लेना चाहिये। यह अतु बड़ी सत्वगुणी है। यदि आप योगवासिष्ठ पढ़ें, तो मुझे बड़ी खुशी हो। तुलसीदास जी लिखते हैं:—"जब दाँत न थे तब दूध दियो। अब दाँत भये क्या अन्न न दे है। भंइमल की गागर (जल के वर्तन) का बहुत ध्यान रखना। आप दास पर सदा प्रसन्न रहें। आप का दास तीर्थराम
(132) कबीर जी का वाक्य। 30 सितम्बर 1884 संबोधन पूर्वोक्त, आप का एक कृपा पत्र मिला, बड़ी खुशी हुई। कबीर जी का यह वाक्य (वचन) क्या ही अच्छी अवस्था को प्रकट करता हैः—
मन ऐसो निर्मल भयो जैसे गंगा नीर। पाछे २ हर फिरें कहत कबीर कबीर॥ आप का दास, तीर्थराम
(133) जीवन से बेज़ारी (व्याकुलता) 7 अक्तूबर 1884 संबोधन पूर्वोक्त, थोड़ी देर हुई आप का पत्र मिला। पत्र पढ़ने से कुछ ताप सा चढ़ गया है। न अब पढ़ा लिखा जाता है और न बैठा ही जाता है। चित्त (प्रकृति) जीवन से और संसार से व्याकुलता होगया है। मैं अपनी ओर से अन्तःहृदय से यत्न करता हूं कि कोई काम आप की इच्छा के विरुद्ध न हो जाये। फिर भी काल की गति कुछ न कुछ करा देती है, या किसी ऐसे मनुष्य ने जो मेरे और आप के संबन्ध से ईर्ष्या रखता होगा आप को कुछ सिखा दिया होगा। पंचतंत्र और अनवार सहेली में एक कथा है, वह सुनने योग्य है। चित्त अत्यन्त व्याकुल है। आप का दास, तीर्थराम
(134) धन संबन्धी कठिनाइयां। 13 नवम्बर 1884 संबोधन पूर्वोक्त, चाचा जी (अर्थात् पिता जी) का पत्र आया था। वह लिखते हैं कि पच्चीस (25) रुपये तुम को छोटे वज़ीफे (शिष्य-वृत्ति) के मिलने हैं, वह रख छोड़ने और पांच २ रुपये और जोड़कर (संग्रह करके) दस रुपये परीक्षा-प्रवेश फीस (दाख़ला) देने के समय तक (अर्थात् डेढ़ या पौने दो मास तक) बना लेने। इस प्रकार से पैंतीस (35) रुपये हुए। और पन्द्रह (15) रुपये हम से लेकर 50 (पचास) रुपये पूरे करके परीक्षा प्रवेश-फीस दे देनी। अब विनय यह है कि यह पच्चीस जो चाचा जी छोटे वज़ीफे (छात्र-वेतन) के लिखते हैं, इन में से सवा बारह (12॥) रुपये तो एक मास की फीस के काटे जाने हैं, और छे रुपये (6) के लगभग उन दिनों के काटे जाने हैं जब मैं ताप के कारण कालेज में अनुपस्थित रहा। और गरम कपड़े (वस्त्र) भी मैं ने बनवाने हैं, और कुछ खाना पीना भी है। और फीस काटकर थोड़े से रुपये जो मिला करेंगे उन में से पांच २ रुपये जोड़ना (संग्रह करना) भी कठिन है। कल मैं गरम कपड़े ले आया हूं, डवलज़ीन का पाजामा, एक कुर्ती, और एक कशमीरे का कोट लिये हैं, सब पर पौने आठ (7॥॥) रुपये लगे हैं। पर अब मैं चाचा जी (पिता जी) को इस विषय में कुछ विशेष लिखूंगा नहीं। केवल अपनी दशा जतला दूंगा [वर्णन कर दूंगा]। आशा है कि मासड़ (मौसा) जी सहायता कर देंगे। जो परमात्मा अब तब सहायता करता रहा है अब भी कर देगा। आप का दास तीर्थराम,
(135) तीर्थराम जी के पास एक पैसे का भी न होना।
16 नवम्बर 1884 संबोधन पूर्वोक्त,
आपका कृपा पत्र कल मिला, अत्यन्त आनन्द हुआ। आप के चित्त की दशा पढ़ कर हृदय बड़ा प्रसन्न हुआ। आप को परमेश्वर सदा ऐसा ही खुश रक्खे। मेरे इस बार पत्र देर से लिखने का कारण यह है कि मेरे कार्ड पूरे (समाप्त) हो गये थे और न मेरे पास कोई पैसा था, न काले (नौकर) के पास। शिष्य-वृत्ति की प्रतिदिन बाट तकता था, पर मिलती नहीं थी। कल दस बजे रात के लाला (रामशरण) साहिब के दफ्तर से ठाकुर को कह कर यह कार्ड नकलवाया था। उत्तर आप को भेजता हूं। कपड़े मैं ने सिले सिलाये लिये हैं। एक पुरुष को साथ ले गया था। कपड़े बहुत अच्छे हैं।
आप का दास तीर्थराम।
(136) धनाढ्य पुरुषों का वर्ताव।
18 नवम्बर 1884, संबोधन पूर्वोक्त,
आजकल यहां कोई उत्सव होने के कारण इस मकान में कोई बड़े पुरुष आने वाले हैं। उन के लिये मेरे वाला कमरा और बीच (मध्य) का कमरा नियत किये गये हैं। और मुझे उस कमरे में आना पड़ा है जिस में लाला हरिकृष्ण (प्रसिद्ध नाम डाक्टर साहिब) रहते थे। आज उस में असबाब ले आया हूं। आज मुरारी वाला का एक युवक यहां
तार की पाठशाला में प्रविष्ट होने को आया है। युवक (लड़का) भला मानस और मेरे कहने पर चलने वाला है। यदि आप आज्ञा दें तो उसे मैं अपने मकान में रहने दूं। नहीं तो निकाल दूं। आप ने उत्तर से शीघ्र कृपा करना। यहां नीचे के लगभग सब कमरों में कपास डाली गयी है। और प्रतिदिन कपास के छकड़े के छकड़े आते जाते हैं। उनका विचार है कि जिन कमरों में दफ्तर लगते हैं, वहां भी कपास भर दें, और दफ्तर ऊपर की छत में (अर्थात् जहां मैं रहता हूं) लगाया करें। अब देखिये मेरे रहने का क्या प्रबन्ध होता है।
आप का दास तीर्थराम,
(137) मासड़ (मौसा) जी की अमूल्य सहायता और गुसाईं जी का संकट हरण।
21 नवम्बर 1884 संबोधन पूर्वोक्त,
मासड़ जी का पत्र आया था, वह लिखते हैं कि परीक्षा-प्रवेश-फीस के लिये हमारे से अतिरिक्त और किसी से रुपये न लेने। परमात्मा की प्रशंसा कोई किस वाणी से करे। चित्त तो आप के दर्शनों को करता है, पर अभी कोई ऐसा प्रसंग दिखाई नहीं देता।
आप का दास तीर्थराम,
(138) उधार लेकर कार्ड लिखना।
7 दिसम्बर 1884 संबोधन पूर्वोक्त,
इस बार पत्र लिखने में देर का कारण यह है कि पास
कोई पैसा नहीं था। पहिले कार्ड खर्च हो चुके थे। शिष्य-वृत्ति के मिलने की आशा पर किसी से उधार नहीं लिया था। सो छात्र-वेतन तो अभी तक मिला नहीं। आज अन्त में निराश होकर उधार ले कर कार्ड लाया हूं॥
आप का दास तीर्थराम,
(139) धन की तंगी के दिन।
8 दिसम्बर 1884 संबोधन पूर्वोक्त,
मेरे विचार में पुस्तक खरीदने में हमें रुपये का ख्याल कभी नहीं करना चाहिये। उस लाभ की अपेक्षा से जो हमें पढ़ने से प्राप्त होता है, पुस्तक का मूल्य चाहे कितना ही अधिक क्यों न हो, कुछ भी नहीं होता। एक वह भी दिन थे जब छोटी २ पुस्तकों के लिखाने पर लोग बीसियों रुपये खर्च कर देते थे। अब से दो सप्ताह तक हमें बड़े दिनों की छुट्टियां (अनध्याय) होंगी। आप का लिखना अब पहिले से उत्तम है। चारीक लिखने का यत्न करें।••••••••छात्रवेतन (वज़ीफा) अभी नहीं मिला। आज कल पहिले की अपेक्षा से धन की तंगी (खैंच) के दिन हैं। कारण आप जानते ही हैं।
आप का दास तीर्थराम,
(140) वद्धकोष्ठ (कब्ज़) का परिणाम।
16 दिसम्बर 1884 संबोधन पूर्वोक्त,
आज आप का क्रोध से भरा कृपा पत्र मिला। न मालूम, मेरे दिन कैसे आ गये हैं। मैं अपनी ओर से तो अत्यन्त यत्न (एहतियात) के साथ प्रत्येक काम करता हूं, पर फिर भी आप किसी न किसी बात पर क्रुद्ध हो ही जाते हैं। बहुधा
मैं तीसरे दिन पत्र भेजा करता हूं, पर कई बार चौथे दिन भी भेजा जाता है। इस बार काम की विशेषता के कारण चौथे दिन भेजा गया। कोई असाधारण (अपूर्व) बात नहीं थी, परन्तु आप रुष्ट हो गये। पहिले भी कई बार मेरा विनय पत्र देर के पीछे गया, पर तब आप ने क्षमा कर दिया, और कुछ अनुमान न किया। अच्छा, महाराज जी! आप का रुष्ट होना भी ठीक उचित बल्कि मेरे हाल (अवस्था) पर अनुग्रह है।
जवाबे-तल्ख में जेबद, लबे-लाले-शक्कर खारा।
भावार्थ - मधुर २ (मिठास भरे) ओठों पर कटु शब्द भी युक्त हो जाते हैं।
आप के मुखारविन्द से कटु वचन भी मुझे अमृत समान हैं, मुझे आप के क्रोध से भी कई प्रकार के लाभ मिलते हैं, कई उपदेश मिलते हैं। मैं सर्व अवस्था में आप का आज्ञाधीन [अनुचर] हूं।
"सरे-तस्लीम खम है जो मिज़ाजे-यार में आए"
भावार्थः-आप के चरणों में मेरा सिर झुका पड़ा है, आप की जो इच्छा हो, करें।
1-राज़ी हैं हम उसी में जो कुछ दिलरुबा करे। ख्वाह वह जफ़ा-ओ-जौर करे या वफ़ा करे॥ 2-आ रा कि विजाये तुस्त हरदम करमे। उज़रश चिनेह अरकुनद व उमरे सितमे॥
भावार्थः-1-जो हमारा प्रियतम प्राणेश हमारे साथ करे, चाहे वह सत्कार करे चाहे तिरस्कार, हम उसी में प्रसन्न वा सन्तुष्ट हैं।
2-जिस की कि तेरे ऊपर नित्य कृपा रही है, यदि वह
सारी आयु में कोई उपद्रव तथा अपराध भी करे, तू उसे क्षमा कर दे।
महाराज जी! आप इतने रुष्ट हुए, और मैं जानता हूं कि मेरे चित्त में राई का दाना भर भी किसी प्रकार का बुरा विचार (ख्याल) नहीं था, इस लिये मैं अब अपने चित्त को व्यर्थ चिन्ता में नहीं लगाता (चिन्ता करने से मुझ से एक अक्षर नहीं पढ़ा जाता)। और पूर्ववत् आप के चरणों में चित्त को अधिक खुश रखता हूं। मैं जानता हूं कि मेरे चित्त की निर्मलता आप पर प्रकट हुए बिना नहीं रहेगी और आप मुझ पर पहिले से भी अधिक प्रसन्न रहेंगे।
अदावत से तिरी प्यारे! ज़रर होवे तो मैं जानूं। मुझे तुम ज़हर दे देखो, असर होवे तो मैं जानूं॥
(भावार्थः-हे भगवन्! आप यदि शत्रुवत् मेरे साथ बर्तें तो भी मुझे कोई हानि नहीं होगी, और यदि मुझे आप विष भी दे दें तो भी मुझे कुछ बुरा असर नहीं होगा; आप चाहे बर्त के देख लें, यदि मेरे पर निश्चय न हो)
जिस कारण से आप मुझ पर रुष्ट हुए हैं उसी से आप का चित्त इन दिनों पढ़ने में भी भले प्रकार नहीं लगता। मैं अपने अनुभव की सहायता से प्रतिज्ञा के साथ कह सकता हूं कि वास्तव कारण इन दोनों बातों (रुष्ट होना, और पढ़ने में चित्त न लगना) का आप के उदर में रोग होने से अतिरिक्त और कुछ कदापि नहीं है। जब उदर में रोग हो या शौच बद्ध हो कर आवे, तो चित्त अशान्त रहता है, पढ़ा जाता नहीं। और व्यर्थ संकल्प वा चिन्ता और मिथ्या (निर्मूल) अनुमान वा विचार मनुष्य की मति को भ्रष्ट कर देते हैं। जब शौच सुगमता से ठीक आवे और
उदर नितान्त अरोगी हो, तब किसी प्रकार के शोक अथवा चिन्ता का आना ऐसा है, जैसा कड़कती दुपहर (प्रचंड मध्यान काल) में अर्ध रात्रि का पड़ जाना। मासड़ (मौसा) जी मेरे लिये एक औषध (नुसखा) बना कर लाये थे, उस का मैं ने सेवन किया था। बड़ा ही लाभ प्राप्त हुआ। उस औषधि विधि (नुसखा) की अंग्रेज़ी और देशी वैद्यों ने अति प्रशंसा की है। यूनानी वैद्यों की सम्मति का मुझे पता नहीं। मैं भी उसे बनवाना चाहता हूं। यदि आप उस का सेवन करें तो बड़ी अच्छी बात हो। इस से उदर, मस्तिष्क और नेत्रों को अत्यन्त लाभ प्राप्त होता है। यद्यपि आप इसे जानते होंगे, तथापि मैं पुनः लिख देता हूं। "हरड़ (हरीतकी) बहेड़ा, आमला (आमलक), सोंठ, सौंफ, सरना", इन सब का एक समान लेकर, कूट छान कर इन सब के बराबर सेंधिया लून मिला दो। प्रत्येक मात्रा नौ माशा से एक तोला तक हानी चाहिये।
आप का दास तीर्थराम,
(141) प्रसन्न चित्त के सामने संसार के सारे पदार्थ व्यर्थ हैं।
17 दिसम्बर 1884 संबोधन पूर्वोक्त,
इस समय आप का एक प्रसन्नता भरा पत्र मिला, अत्यन्त हर्ष हुआ। धन्य है परमात्मा का कि जिस ने आप का पहिली आनन्दमयी अवस्था पुनः दिखाई। यह बड़े हर्ष का स्थान है। मेरा मन भी आप के चरणों की दया से आनन्द में है। ऐसी अवस्था के आगे संसार के सब पदार्थ तुच्छ हैं। ख्वाजा हाफिज़ लिखते हैं कि:-
दमे या रम बसर बुर्दन जहां यक्सर नमे अर्ज़द। बमय बिफ़रोश दलक-मा कज़ीन बेहतर नमे अर्ज़द॥
भावार्थः-अरे प्यारे! तेरे प्रेम के शोक में एक श्वास भी लिया हुआ सारे जगत् के मूल्य के तुल्य नहीं (अर्थात् संसार उस श्वास के आगे तुच्छ है)। हमारा वाह्य सर्वस्व इस प्रेममद्य के बदले बेच दे, क्योंकि इस से बढ़ कर इस का मूल्य नहीं।
आप का दास तीर्थराम,
(142) अधिक आहार का परिणाम।
18 दिसम्बर 1884 संबोधन पूर्वोक्त,
भजन करने से निःसन्देह पूर्णानन्द प्राप्त होता है। और परमात्मा पर सच्चा विश्वास होने से किसी वस्तु की कमी नहीं रहती। पर जब परिमाण (अन्दाज़) से अधिक खाया जाये, तो यह विश्वास परमात्मा पर नहीं रहता और वृत्ति विषयों और शोक तथा चिन्ता में आसक्त हो जाती है। दूध का सेवन बड़ा अच्छा है। खर्च की कुछ बात नहीं। शेख सादी लिखता है कि:-
अन्दरूं अज़ तुआम खाली दार, ता दर आं नूरे-मार्फ़त बीनी। तही अज़ हिकमती व इल्लते-आं, कि पुरी अज़ तुआम ता बीनी॥
भावार्थः-उदर को भोजन से खाली रख, जिस से तू उस में ईश्वर का प्रकाश अनुभव कर सके, क्योंकि भरे हुए पेट वाला अपनी वृत्ति को ईश्वर ध्यान में ठीक नियुक्त नहीं
कर सकता। तुझे यह ज्ञान तथा बोध नहीं है इसी लिये तू ने उदर को भोजन से नाक तक भरा हुआ है।
आप का दास तीर्थराम,
(143) चूर्ण कलां
21 दिसम्बर 1884 संबोधन पूर्वोक्त,
एक पत्र मैं ने आज प्रातः भेजा था, संभावना है मिला होगा। *हांसी से मैं एक पीपा घी का लाया हूं। और परीक्षा-प्रवेश-फीस के लिये रुपये की जब मुझे आवश्यकता पड़ेगी, वह तत्क्षण भेंट देंगे। मैं अपने साथ नहीं लाया। इसके कई कारण थे। प्रथम तो वह मुझे यह रुपया औरों से गुप्त हो (छुपा) कर देना चाहते थे। द्वितीय मुझे यहां लाकर भी तो किसी के पास जाकर रखना ही पड़ता था, इत्यादि। केवल आती बार रेल का टिकट उन्हों ने ले दिया था। बड़ी प्रीति और सत्कार से मिले थे, और अन्य कई भले पुरुषों का मिलाप हुआ। आप को मौसा जी (मासड़ जी) बड़े सन्मान से स्मरण करते थे। और कहते थे कि वैसे तो आप की कृपा से यहां बहुत कुछ है, पर केवल आप की कृपादृष्टि चाहिये। साधारण आरोग्यता के लिये उस चूर्ण (हड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, सौंफ, सरना, सेंधियालून) की, जिस का नाम उन्हों ने चूर्ण कलां बताया है, बहुत प्रशंसा की है।
रेवन्द (चीनी) की गोलियों के बनाने की यह विधि है:-'एक द्राम या चार माशे रेवन्द चीनी लेकर उसे बहुत पीस लो, और पानी के साथ उसकी 30 तीस गोलियां ————————————— * हांसी नगर का नाम है, यहां गुसाईं तीर्थराम जी के मौसा (मासड़) पंडित रघुनाथ सहल जी असिस्टैंट सर्जन की पदवी पर थे।
दना लो"। प्रत्येक मात्रा एक या दो गोली से सात गोली तक। यदि हो सके तो उस चूर्ण (सफ़ूफ) में पांच बूंदें पेपर-मिंट तेल की भी डाल लो। थोड़ा सा मैग्नेशिया मिलाने से गोली अच्छी तरह से बन जायगी। आप ने दास पर कृपा-दृष्टि रखनी।
आप का दास तीर्थराम