श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

सन् 1885 ईस्वी।

भाग 17-18 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 17-18 · अध्याय 8 / 15

सन् 1885 ईस्वी।

इस वर्ष गुसाईं तीर्थराम जी की आयु साढ़े इक्कीस वर्ष के लगभग थी और इसी वर्ष के आरम्भ में गुसाईं जी ने गणित शास्त्र में एफ. ए. पास किया।

(144) मिस्टर गिल्वर्टसन का एक उत्तम घड़ी उपहार में देना।

3 जनवरी 1885 संबोधन पूर्वोक्त,

आज मुझे गिल्वर्टसन साहिब (मिशिन कालेज वाले) ने बुला कर एक उत्तम घड़ी उपहार में दी है सहित ज़ंजीरी के। यह सब आप की कृपा का फल है और यह सर्वस्व आप की ही है। चाहे आप यह घड़ी अपने पास रक्खें चाहे मेरी टाइम पीस आप ले लें।

आप का दास, तीर्थराम

(145) संसार किसी का नहीं।

4 जनवरी 1885 संबोधन पूर्वोक्त,

आप का कृपापत्र मिला, बड़ी खुशी हुई।

जहां पे बरादर, न मानद बकस। दिल अन्दर जहां आफरीं बन्दो बस॥

भावार्थः-अरे भाई! संसार किसी का नहीं होगा, इस लिये चित्त ईश्वर में लगा, और बस।

••••••••••••••••••मैं ने सुना है कि *लाला साहिब का विचार है कि अंग्रेज़ी और फ़ारसी के दोनों दफ्तर बहुत शीघ्र ऊपर ले आयें, और मुझे कहें धुर ऊपर (सब से ऊपर की छत पर) बरसातियों (परछत्तियों) में रहो। जैसा आप आज्ञा पत्र भेजेंगे, वैसा करूंगा। आप कहें तो बरसातियों में जा रहूं, नहीं तो नगर (बस्ती) में चला जाऊं। मुझे बरसाती में रहने में किंचित भी क्लेश नहीं बल्कि प्रसन्न हूं। केवल परीक्षा तक ही रहना है। उत्तर सोच विचार कर देना। यह भी संभव है कि और कोई स्थान रहने को दे दें।

आप का दास तीर्थराम

(146) राय राम शरण दास के घर भोजन का प्रबन्ध।

21 फरवरी 1885 संबोधन पूर्वोक्त,

आप का कृपा पत्र मिला, अत्यन्त हर्ष हुआ। अब आज से लेकर काला (नौकर) के आने तक मेरा भोजन लाला (राम शरण) जी के घर से आ जाया करेगा। आज आया था। उन्हों ने अपने आप ऐसा प्रबन्ध किया है। यह आप ————————————— * लाला साहिब से अभिप्राय लाला रामशरण दास रईस लाहौर (अर्थात् अपने शिष्य) से है, या उनके पिता राय मेलाराम साहिब बहादुर से है।

का संकल्प पूरा हुआ है। मेरा अपना विचार तो थोड़ा बहुत था। आप के आने की सूचना पढ़ कर खुशी हुई। शीघ्र पधारिये।

आप का दास, तीर्थराम,

(147) गुरु जी से अभेदता।

18 अप्रैल 1885 संबोधन पूर्वोक्त,

आप ने जो एफ. ए. की परीक्षा दी हुई है, उस का परिणाम अभी नहीं निकला। जब आप के उत्तीर्ण होने की सूचना आयेगी, मुझे बड़ी खुशी होगी। यह सब आप ही का काम है। मुझे कोई शीघ्रता नहीं, जिस दिन यह सूचना निकालने की आप की इच्छा हो, उसी दिन सही।

आप का दास, तीर्थराम,

(148) एम ए उत्तीर्ण होने के पीछे (श्रेणि) क्लास खोल कर पढ़ाने का संकल्प।

8 मई 1885 संबोधन पूर्वोक्त,

लाला साहिब और सेठ साहिब अभी नहीं आये। मैं ने अभी तक कोई विचार नहीं किया। कोई दिन परमेश्वर के रंग देख कर क्लास (श्रेणि) खोलूंगा। शायद कल कुछ भेंट कर सकूंगा। आप दया रक्खा करें।

आप का दास, तीर्थराम,

(149) गणित शास्त्र की क्लास खोलने का विज्ञापन।

10 मई 1885 संबोधन पूर्वोक्त,

कल आशा है यहां से कुछ रुपये हाथ लगेंगे। तत्क्षण भेंट की जावेगी, लाला साहिब व सेठ साहिब अभी नहीं आये। कई सम्मतियों के पश्चात् आज गवर्नमेंट कालेज के प्रिन्सिपल साहिब ने मेरी ओर से यह विज्ञापन (नोटिस) छपवाना भेजा है कि एफ. ए. श्रेणि के विद्यार्थी दस रुपया मासिक और बी-ए श्रेणि के विद्यार्थी पन्द्रह रुपया मासिक फीस देकर मुझ से (अर्थात् तीर्थराम से) आकर गणित पढ़ें। जब विद्यार्थियों की संख्या दस से अधिक हो जायगी, तब काम आरम्भ किया जायगा। आप दास पर दया रक्खा करें।

आप का दास तीर्थराम

(150) उदासी का नाम तक नहीं।

12 मई 1885 संबोधन पूर्वोक्त,

कल आप की सेवा में भेंट की गयी थी, आप का कृपा पत्र भी कल मिला, बड़ी खुशी हुई। आप की दया से मुझे बड़ा आनन्द रहता है। उदासी का नाम तक भी कभी नहीं आता और पढ़ने लिखने का काम भी बहुत रहता है। आप का यहां पधारना मुझ पर अति कृपा करना है। लाला साहिब और सेठ साहिब अभी नहीं आये। कल विज्ञापन (नोटिस) छप कर आ गये थे। आज नगर के द्वारों और

कालेजों में लगाये जायेंगे। और कल पंजाब प्रान्त के अन्य नगरों में जहां जहां भी कालेज हैं भेज जायेंगे। एफ. ए. श्रेणि के दस रुपये और बी-ए श्रेणि के पन्द्रह रुपये फीस मेरे प्रोफ़ेसरों ने नियत की है। आप ने दास पर कृपा-दृष्टि रखनी और कभी रुष्ट न होना।

आप का दास तीर्थराम

(151) एक प्रोफ़ेसर को गणित शास्त्र पढ़ाना।

21 मई 1885 संबोधन पूर्वोक्त,

आप का एक कृपा पत्र आज मिला, अत्यन्त आनन्द हुआ। आप की दया से मुझे कोई किसी प्रकार की चिन्ता किंचित मात्र भी नहीं है। इस वीर (गुरु) वार को एक साधारण (पब्लिक) व्याख्यान गणित-शास्त्र के लाभों पर देना चाहता हूं। और शुक्रवार को एक प्रोफ़ेसर साहिब को गणित पढ़ाना आरम्भ किया है। और भविष्य सोमवार को अपनी क्लास की पढ़ाई आरम्भ करने का विचार है। काम सब परिश्रम मांगता है, आप निश्चिन्त पधारिये। बड़ी कृपा होगी।

हमारे ग्राम का सुन्दरदास कल सायंकाल का मेरे पास आया हुआ है। अभी तक वह मेरा किसी प्रकार से प्रतिबन्धक (विघ्न कारिक) नहीं हुआ। आगे, उस को साथ रखने या न रखने के विषय जैसी आप आज्ञा देंगे किया जायगा। बरकत राम के समान यह भी अलग बैठ कर अपना कार्य करता रहता है।

आप का दास, तीर्थराम

(152) केवल एक विद्यार्थी का पढ़ने आना।

6 जून 1885 संबोधन पूर्वोक्त,

अब केवल एक ही विद्यार्थी पढ़ने आता है। मैं पढ़ाता अति ही उत्तम हूं। पर कोई अवसर ही ऐसा बन गया है। किसी के तो पिता माता आज्ञा नहीं देते। कोई धूप के कारण रुक जाता है। किसी को कोई और विघ्न पड़ जाता है। अच्छा (अस्तु), परमेश्वर सब कुछ ठीक ही करेगा। आप ने कोई चिन्ता न करनी।

आप का दास तीर्थराम

24 जून 1885 संबोधन पूर्वोक्त,

(1) खुदा खुद खानसामानस्त अस्बाबे-तवक्कल रा। (2) दरे-फ़ैज़स्त मिनशाँ अज़ कुर्शीयश ना उमेद ईज़ा। मखालेदानः अज़ हर कुफ़ुल में रोयद कलीद ईज़ा॥

भावार्थः-(1) ईश्वर पर भरोसा करने वाले (अथवा विश्वास रखने वाले) पशुओं के लिये परमेश्वर आप रसोइया (भंडारी) बना रहता है।

(2) ईश्वर-कृपा का द्वार खुला हुआ है। कठिनाईयों के दूर करने से यहां त्यक्ताशा (आशा हीन) होकर मत बैठ। बीज (दाना) के समान प्रत्येक रहस्य की ग्रन्थि यहां उत्पन्न भयी है।

आप की दया से चित्त बड़ा आनन्द में है। आप इसी प्रकार कृपा-दृष्टि रक्खा करें।

(1) भीखा भूखा कोई नहिं, सब की गठड़ी लाल । गृह खोल नहीं जान दे, इत विधि भये कंगाल ॥

सात गांठ कौपीन में, साध न माने शंक । राम अमल माता फिरे, गिने इन्द्र को रंक ॥

(2) खिश्त ज़ेरे-सरो घर तारक हफ़्त अख़्तर पा । पाये रिफ़अत निगरो-मन्ज़िले-साहिब जाही ॥

भावार्थः—(1) कोई प्राणी भी नंगा भूखा नहीं है, सब के भीतर घड़े जितना बड़ा रत्न (लाल) धरा पड़ा है, केवल उस की ग्रन्थि खोलना नहीं जानते, इस लिये कंगाल बने हुए हैं ।

निर्धन पुरुष को कंगाल (दीन या कृपण) नहीं कहते, क्योंकि मस्त साधु के पास एक कौड़ी नहीं होती बल्कि उस की कौपीन भी फटी पुरानी सात आठ गांठों वाली होती है, तथापि वह देवताओं के मालिक इन्द्र को भी कुछ नहीं गिनता । इस लिये जो अपने आत्मा से विमुख और मूढ़ हैं, वही दीन वा कृपण हैं, निर्धन पुरुष नहीं ।

(2) ईंट तो जिस का सिरहाना हो और पांव सातों आकाशों के ऊपर, ऐसे ब्रह्मवित् मस्त की पदवी तुम अनुभव करो ।

मैं हरगिज़ नहीं सेवन करा करता । खर्च इत्यादि का निर्वाह होता जायगा । आप ने किसी को न लिखना ।

आप का दास, तीर्थराम

(154) गुरु जी के लिये निज-खर्च का कम करना । 18 जून 1895

संबोधन पूर्वोक्त, आप के दो पत्र मिले, अत्यन्त खुशी हुई आप ने मेरे देर से पत्र आने का कुछ अनुमान न करना । इन दिनों गर्मी धूप बहुत रही है । और प्रकृति ज़रा ठिकाने नहीं रही । इस लिये पत्र में विलम्ब होता रहा । आप ने क्षमा करना । मैं ने अपना निज का खर्च बहुत कम कर दिया है । पर चित्त पहिले से भी अधिक प्रसन्न है और सर्वप्रकार से आनन्द है । आप ने अपना खर्च पहिले से भी निःशंक अधिक कर देना, कुछ चिन्ता नहीं । आप ने कोई चिन्ता न करना, मेरी चाहे कैसी ही दशा क्यों न हो, आप को किंचित् तंगी नहीं दी जायगी । मैं कल चरणों तक कुछ भेंट कर सकूंगा । पंडित* गोपीनाथ को मैं मिला था, वह क्या कर सकता है । लाहौर में रहने से आशा है कि कोई न कोई सूरत [उपाय] निकल आवे । ढूंड (तालाश) में हूं । इस सप्ताह में किसी दिन विलायत वाले † वज़ीफे (छात्र-वेतन) का निर्णय होना है । इस लिये यहां लाहौर में इन दिनों स्थित रहना उचित है । और अभी चरणों में उपस्थित नहीं हो सकता ।

आप का दास तीर्थराम,

* पंडित गोपीनाथ जी वही हैं जो कई वर्ष तक लाहौर सनातन धर्म सभा के प्रसिद्ध मंत्री रहे । और आज कल महाराज दरभंगा के पास नौकर (कर्मचारि) हैं ।

† यह छात्रवेतन वही है जो एम. ए. की परीक्षा में प्रथम उत्तीर्ण

होने वाले पुरुषों को मिलना है । गत वर्ष के पहिले पत्रों में जो शिष्य-वृत्ति का वर्णन था वह बी-ए की परीक्षा में प्रथम उत्तीर्ण होने वालों के संबन्ध में था ।

(155) गुरु जी की दृष्टि पर सारे संसार का उद्धार । 14 जून 1895

संबोधन पूर्वोक्त, महाराज जी ! परसों सोमवार कोई दस बजे के लगभग विलायत वाले वज़ीफे (छात्र-वेतन) का निर्णय होना है । आप ने दास के अपराध क्षमा करके अवश्य दया-दृष्टि करनी । आप की कृपा-दृष्टि पर सब कुछ सारा संसार निर्भर है ।

आनांकि खाक रा ब नज़र कीमिया कुनन्द । आया बुवद कि गोशाए चश्मे-चमा कुनन्द ॥

(भावार्थः—जो महाशय कि अपनी एक दृष्टि-मात्र से भस्म को सुवर्ण बना देते हैं, आशा है कि वह एक बार कृपा-दृष्टि हमारी ओर भी करेंगे ।)

मेरा मन अब आप की दया से अच्छी अवस्था में है । आप का दास तीर्थराम

(156) अपने बन्धु जनो की आजीविका का ख्याल । 18 जून 1895

संबोधन पूर्वोक्त, आज कोई निर्णय नहीं हुआ । आज हम से केवल यह पूछा गया है कि हम ने मिडिल और ऐन्ट्रैन्स (मध्यमा और

प्रवेश) परीक्षा किस २ वर्ष में दी थी; आशा है कि इस सप्ताह में अवश्य निर्णय हो जायगा । यदि मैं (विलायत) गया तो पीछे सब के लिये ठीक २ पूर्ण रीति से पक्का (दृढ़) प्रबन्ध किये विना कदापि नहीं जाऊंगा । आप दया रक्खा करें । मैं अपनी ओर से शीघ्र अर्ज़ करने (अर्थात् कुछ भेंट भेजने) का यत्न करूंगा । आप ने दया-दृष्टि रखनी आप का दास तीर्थराम,

(157) विलायत जाने से रह जाना । 22 जून 1895

संबोधन पूर्वोक्त, विलायत का छात्र-वेतन किसी और विद्यार्थी को मिल गया है । बरेली-कालेज का समाचार देखिये क्या होता है । आप का दास तीर्थराम,

(158) धन की अत्यन्त न्यूनता (तंगी) 21 जून 1895

संबोधन पूर्वोक्त, आप का एक कृपा-पत्र कल मिला, अत्यन्त आनन्द हुआ । मैं तो आप को पहिले ही लिख चुका हूं कि आप कृपा पूर्वक यहां पधारिये और यहां आने का कृपया परिश्रम उठावें, क्योंकि मेरा वहां (आप के पास) आना किंचित् कठिन है । इस के कई कारण हैं, जिन में से एक यह भी है कि अब मेरे लिये किराये के वास्ते रुपया अथवा दो रुपया उपार्जन करना कुछ सुगम बात नहीं है ।

आप का दास, तीर्थराम,

(159) सनातन धर्म सभा की विद्या संबन्धीय समिति का सभासद होना । 4 जुलाई 1895

संबोधन पूर्वोक्त, ……… मुझे उन्हों ने (सनातन धर्म सभा के सभासदों ने) सनातन धर्म सभा की विद्या संबन्धीय समिति का सभासद बना लिया है । वहां की प्रवेश (एन्ट्रैन्स) परीक्षा भी मैं ने ली है । मैं आशा करता हूं कि इस सप्ताह में कुछ भेंट करूंगा ।

आप का दास, तीर्थराम ।

(160) सनातन धर्म सभा की सब-कमेटी (उप-समिति) का मन्त्री होना । 5 जुलाई 1895

संबोधन पूर्वोक्त, लाला* हंसराज जी को भी मैं जाकर मिला था । सनातन धर्म सभा की समिति का मैं मंत्री बनाया गया हूं जिस के सभासद निम्न लिखित पंडित हैं ।

(1) पं० ईश्वरी प्रसाद जी, (2) पं० भानुदत्त जी, (3) पं० गणपति जी, (4) पं० दुर्गादत्त जी, (5) पं० शिवदत्त जी, (6) लाला अयोध्या दास जी बी० ए०, (7) और मैं ॥…… …… वह चित्र-विद्या (इल्मे-ड्रायिंग) बिना फीस

* लाला हंसराज प्रिन्सिपल डी, ए, वी, कालेज लाहौर से यहां अभिप्राय है ।

सीखने की मुझे आज्ञा मिल गयी है । आप दास पर कृपा दृष्टि रक्खा करें । आप का दास, तीर्थराम ।

(161) पं० दीनदयाल जी से भेंट (मुलाक़ात) 8 जुलाई 1895

संबोधन पूर्वोक्त, आज बॅल साहिब को भी मिला था और वह कहते हैं कि एक प्रार्थना पत्र इस विषय का आप डायरेक्टर साहिब को भेज दो कि "विद्या विभाग (महकमा तालीम) में मैं सेवा करनी चाहता हूं । और जब आवश्यकता पड़े मुझ से काम लिया जावे ।" साथ इस के सुना है कि अमृतसर कालेज का गणित-शास्त्र का प्रोफ़ेसर अधिक वृद्ध होने के कारण नौकरी छोड़ने लगा है । परन्तु निश्चित (पक्का) पता नहीं !

आज पं० दीनदयाल जी (जो कल के यहां आये हुए हैं) किसी ने सभा में मेरी भेंट (मुलाक़ात) करादी थी, वह अत्यन्त प्रसन्न हुए थे । मित्रों के समान कंठ से लगे थे और कहते थे कि मैं इनको (अर्थात् मुझको) पहिले ही जानता हूं । आप का दास, तीर्थराम ।

(162) पेशावर हाई स्कूल की हैडमास्टरी (मुख्य-अध्यापकता) का ख्याल । 15 जुलाई 1895

संबोधन पूर्वोक्त, पेशावर में एक हाई-स्कूल की हैडमास्टरी मिल सकती है । पर वेतन थोड़ा है । कोई पचास, साठ रुपये है । जैसे आप

आज्ञा करेंगे वैसा किया जायगा । यदि आप की इच्छा हो तो यत्न किया जाये । पत्र से शीघ्र सूचना दें । डायरेक्टर साहिब के पास भी प्रार्थना-पत्र (अर्ज़ी) भेज दिया हुआ है । आप का दास तीर्थराम ।

(163) गुसाईं जी का कार्य-क्रम । 16 जुलाई 1895

उपमा पूर्वोक्त, मेरे बड़े प्रोफ़ैसर साहिब का कुछ काम करने वाला है । मेरे दूसरे प्रोफ़ैसर साहिब भी इस सोमवार को मेरे स्थान पर पधारेंगे, और कुछ काम (एफ़० ए० और बी-ए. के पर्चे देखने का) दे जायेंगे । अपनी पुस्तकें भी जितना हो सके देखता हूं । सनातन धर्म स्कूल के सम्बन्ध में भी कुछ न कुछ कार्य रहता है: अर्थात् उनकी लिखित परीक्षा लेना, उन को विज्ञान-शास्त्र (साइन्स) और गणित-शास्त्र का कुछ बताना, इत्यादि । भजन भी करता हूं । आप के चरणों का ध्यान रहता है ।

पं० दीनदयाल जी के पांच व्याख्यान सुने । विश्वास पर, बड़ा आनन्द हुआ । अब उन्हों ने इस वीरवार (गुरुवार) से उपासना पर व्याख्यान देने आरम्भ करने हैं । आप की दया से बड़ा आनन्द रहता है । आप का दास, तीर्थराम ।

(164) प्रत्येक दशा में आनन्द । 17 जुलाई 1895

संबोधन पूर्वोक्त, जिस पत्र में पेशावर की हैडमास्टरी के विषय में लिखा है उस के सम्बन्ध में यह प्रार्थना है कि मैं ने बॅल साहिब से उस

का ज़िक्र (चर्चा) किया था । वह कहने लगे कि वहां कदापि न जाओ । क्योंकि प्रथम तो पेशावर का कोलैक्टर उस स्कूल के अत्यन्त विरुद्ध है, द्वितीय डायरेक्टर और इन्स्पैक्टर साहिब दोनों उस के विरुद्ध हैं । तृतीय वहां मैं तुमको कोई सहायता नहीं दे सकूंगा । चतुर्थ तुम्हारे काम का मान (क़दर) नितान्त नहीं होगा, क्योंकि स्कूल सरकारी नहीं है । थोड़ा काल धैर्य धरो, परमेश्वर कोई बड़ा अच्छा अवसर निकाल देगा ।" उस स्कूल से मुझे सत्तर (70) रुपये मासिक मिल सकते थे । पर बॅल साहिब ने बहुत रोका है । इस लिये वहां जाना उचित नहीं । मुझ से पूछिये तो मैं प्रत्येक दशा में बड़ा आनन्द हूं । अभी कुछ दिनों तक मेरे वहां (आप के चरण कमलों में) उपस्थित होने में कुछ प्रतिबन्ध (रुकावटें) हैं । पंद्रहवें या सोलहवें दिन तक उपस्थित हो सकूंगा । अभी न तो किराया पास है और न प्रोफ़ैसरों के नाना प्रकारों के कामों से अवकाश । आगे जैसे आप आज्ञा दें, वैसा कर देता हूं । चित्त तो मेरा भी चाहता है कि आप के दर्शन करूं, परन्तु हाल (अवस्था) यह है । आप का दास, तीर्थराम ।

(165) अमृतसर कॉलेज की प्रोफ़ैसरी निमित्त यत्न । 20 जुलाई 1895

संबोधन पूर्वोक्त, आप के दो कृपा पत्र आज मिले, अत्यन्त आनन्द हुआ । बॅल साहिब ने कहा है कि "तुम अमृतसर वाली जगह (पदवी) के विषय सारा वृतान्त पूछ कर विस्तार पूर्वक

मुझे सूचना दो । फिर मैं तुम्हारे लिये यत्न करूंगा । विशेष करके यह पता लगाओ कि वह (प्रोफ़ैसर) कब जायेंगे । मैं अब अपने गणित-शास्त्र के एक प्रोफ़ैसर से सम्मति लूंगा कि मैं अमृतसर जाकर उस कॉलेज के प्रिन्सिपल से मिल आऊँ या क्या करूं । आज मैं शलेष्म (रेशा, ज़ुकाम) के कारण बहुत तंग (दुःखी) रहा, आशा है कि कल आराम रहेगा । पंडित दीनदयाल जी के व्याख्यान हो रहे हैं । आप का दास तीर्थराम ।

(166) प्रिन्सिपल की डायरेक्टर के पास पहिले से ही सफ़ारश । 21 जुलाई 1895

संबोधन पूर्वोक्त, कल एक प्रोफ़ैसर साहिब से विदित हुआ कि अमृतसर कॉलेज वाले गणित-शास्त्र के प्रोफ़ैसर ने पेन्शन का विनती पत्र (अर्ज़ी) भेज दिया हुआ है । पर कमेटी ने (क्योंकि वह कॉलेज म्योनिस्पल कमेटी का है) वह विनती पत्र डायरेक्टर साहिब की ओर भेजा है, और उसके पत्र (अर्ज़ी) पर यह प्रार्थना साथ लिख दी है कि इस प्रोफ़ैसर को एक वर्ष और इस कॉलेज में रक्खा जाये । आज मैं बॅल साहिब से मिला था, वह कहते थे कि "तेरे विषय में मैं ने पहिले ही डायरेक्टर साहिब को लिख भेजा है कि तुझे उस कॉलेज में ले लें । अब जो परमात्मा की इच्छा होगी, हो जायगा । आप दया रक्खा करें । आप की दया से आनन्द है । आप का दास, तीर्थराम ।

(167) पंडित दीनदयाल जी से मेल जोल 22 जुलाई 1895

संबोधन पूर्वोक्त, कल पंडित दीनदयाल जी से मैं उन के स्थान पर जाकर मिला था । बड़े खुश हुए थे । आप का भी कुछ हाल (वृत्तान्त) सुनाया था, और अपने विचार भी प्रकट किये थे । आज गवर्नमैंट कॉलेज के प्रोफ़ैसर लगभग सारे कॉलेज के गणित शास्त्र की परीक्षा के पर्चे मुझे नम्बर लगाने और शुद्ध करने के लिये दे गये हैं । आप दया रक्खें ॥ आप का दास, तीर्थराम ।

(168) धनाढ्य पुरुषों के घर में कमरों का घड़ी २ बदलना । 25 अगस्त 1895

संबोधन पूर्वोक्त, मैं आज कुशलता से यहां पहुंच गया हूं । वादामी वाला के स्टेशन पर हाकिम सिंह और एक अन्य मनुष्य मुझे लेने के लिये आये हुए थे । असबाब उन्हों ने उठा लिया । और हम कोठी को चले आये । मेरे कमरे में एक अंग्रेज़ पेंज़िनियर (जिस को आज से लाला साहिब ने नौकर रक्खा है) रहता है । मेरा अन्य असबाब तो उन्हों ने बड़ी ड्योढ़ी (विशाल कमरे) में जहां डाक्टर साहिब रहते हैं मेरे पीछे (अनुपस्थिति काल में) रखवा दिया हुआ है । पर मेरी पुस्तकें वैसे ही अलमारियों में बन्द थीं । वह पुस्तकें भी मैं बड़ी ड्योढ़ी (खुले कमरे) में ले आया हूं । एक और

डाक्टर साहिब रहते हैं, दूसरी ओर में रहता हूं। यह भी अच्छा मकान है। दुःख कोई नहीं। लाला साहिब पढ़ा करेंगे। आप कृपापत्र भेजते रहना। आप का दास तीर्थराम।

(169) गुसाईं जी के साथ बड़े लाला साहिब का वर्ताव ( सलूक ) 2 सितम्बर 1895

संबोधन पूर्वोक्त, अभी यहां मेरे भोजन का कोई अच्छा प्रबन्ध नहीं है, क्योंकि बड़े * लाला जी ने उस मेरे भोजन पकाने वाले को मेरे पीछे रोक दिया है कि वह भविष्य में मेरा भोजन न बनाये। पर आशा है कि लाला राम शरण दास शीघ्र प्रबन्ध कर देगा। लाला राम शरणदास यहां कपास का कारख़ाना खोलने लगा है जिस से अनेक बेकार ( कार्य रहित ) पुरुषों को रोज़गार ( कार्य ) मिलेगा। आप का दास तीर्थराम।

(170) वैकुंठपुरी भी दोष रहित नहीं। = सितम्बर 1895

संबोधन पूर्वोक्त, आप का एक कृपा-पत्र आज मिला, अत्यन्त हर्ष हुआ। मैं तो आशा करता हूं कि यहां रहने से आप को तंगी नहीं होगी। और मेरा यह भी निश्चय है कि किसी न किसी दोष से रहित तो यह लोक क्या नहिं बैकुंठपुरी का भी

* बड़े लाला जी से अभिप्राय यहां राय रामशरण दास जी के स्वर्गवासी पिता राय बहादुर लाला मेला राम जी है।

कोई मकान ( स्थान ) नहीं है। जहां आप होंगे, वहां तंगी भला कहां ! यह मकान मेरी समझ में तो बहुत उत्तम है। .......... ..........॥ आप का दास तीर्थराम।

(171) गुरु-इच्छा विरुद्ध कोई बात न करना। 4 अक्तूवर 1895

संबोधन पूर्वोक्त, मैं आशा करता हूं कि कल अर्ज़ ( भेंट ) कर सकूंगा। महाराज ! आप दया रक्खा करें। मैं अपनी इच्छा से तो कोई बात भी नहीं करता, यदि अपनी कुल ( अथवा जाति ) के वृद्ध पुरुषों के सम्मान के विचार से अथवा किसी और प्रेरणा के प्रभाव से मुझ से कोई अपराध हो गया हो तो आप कृपापूर्वक क्षमा करें। और सब प्रकार से आप ही के सेवक अधिक हो रहे हैं। दास की तो प्रतिकूल ( उलट ) काम करने की मजाल ( साहस ) नहीं। आप यहां कब पधारेंगे। आप का दास तीर्थराम।

(172) गुसाईं तीर्थराम जी के पास आने वाले सब खुदा बन गये। सियालकोट। 18 अक्तूवर 1895

संबोधन पूर्वोक्त, आप का कोई पत्र नहीं आया। आप दया रक्खा करें। आप की दया से यहां आने वाले सब खुदा ( ईश्वर ) बन गये हैं। पर भजन भी किया करेंगे। आप का दास तीर्थराम।

(173) गुसाईं तीर्थराम जी के व्याख्यानों में प्रारम्भ से ही प्रभाव। सियालकोट 21 अक्तूवर 1895

संबोधन पूर्वोक्त, पंडित साहिब के नौकर करमचन्द ने मुझे दस रुपये रखने को दिये थे। और मेरी बड़ी भूल हुई कि मैं ने रख लिये। वह रुपये मेरे सन्दूक में से किसी ने चुरा लिये हैं। और मैं ने उधार लेकर उसे भर दिये ( दे दिये ) हैं। अच्छा, कुछ शोक नहीं, परमात्मा ने अच्छा किया, उपदेश मिल गया। आप का कृपा-पत्र मिला, बड़ा आनन्द हुआ। कल उन्हों ने ( सनातनधर्म सभा के लोगों ने ) मेरे व्याख्यान का विज्ञापन नहीं दिया था, पर आप की कृपा से मेरे बोलते २ सनातन धर्म मंदिर का मैदान ( स्थल ) मनुष्यों से नितान्त भर गया था। डिप्टी साहिब और बड़े २ राज्याधिकारी ( ओहदेदार ) भी थे। देश पर भी बोला था। पर लोगों के नेत्र अश्रुओं से भरे दिखाई देते थे। और तालियां भी बहुत बजी थीं। आप का दास शायद इस शुक्रवार रात की गाड़ी से लाहौर जायगा। आप ने दया रखनी। आप का दास तीर्थराम।

(174) घर पर पं० गणेश दत्त शास्त्री गोस्वामी का आगमन। सियालकोट 2 नवम्बर 1895

संबोधन पूर्वोक्त कल अमृतसर से उत्तर आया है कि वहां मेरी अर्ज़ी

( विनति पत्र ) पहुंचने से पहिले और पुरुष रक्खा गया है। आज पंडित गणेश दत्त शास्त्री गोस्वामी संस्कृत प्रोफ़ैसर मिशिन कालेज लाहौर के यहां आये हुए हैं। मेरे स्थान पर उतरे हैं। सभा में व्याख्यान देंगे। आप कृपा रक्खा करें। आप का दास तीर्थराम।

(175) तीर्थराम जी का मिशिन कालेज में प्रोफ़ैसर नियत होना। सियाल कोट 21 दिसम्बर 1895

संबोधन पूर्वोक्त आप के दो कृपा-पत्र मिले, बड़ी खुशी हुई" ······। लाहौर से आप की कृपा और दया के कारण पत्र आया है कि मिशिन कालेज की विद्या संबन्धीय समिति ने मुझे गणित शास्त्र के प्रोफ़ैसर की पदवी देना परस्पर निर्णय कर लिया है। और प्रिन्सिपल साहिब ने मुझ से पूछ भेजा है कि वह मुझे को स्वीकार है या नहीं। अप्रैल के अन्त से वहां काम करना है। पहिले वर्ष वेतन 100) ( एक सौ ) रुपया, तत्पश्चात् अधिक। इस कृतज्ञता ( शुक्राने ) में परमात्मा का भजन अधिक करना। और मेरी मंद मति में यह उचित है कि इस का वर्णन अभी सर्व साधारण से न किया जाये। इस पदवी को स्वीकार करने का पत्र मैं आज लाहौर लिखने लगा हूं। महाराज जी ! यदि कोई अपराध हो तो क्षमा करना, मैं पत्र तो नित्य भेजता रहा हूं। आप का दास, तीर्थराम।

(176) आठ दिन केवल दूध पर निर्वाह करते हुए भी पूरे तीस मील का चक्कर लगाना। सियालकोट 23 दिसम्बर 1885

संबोधन पूर्वोक्त,

मैं शायद कल सोमवार ही यहां से रात की गाड़ी में चला आऊं। मुझे आठ दिन अन्न (रोटी) खाये हो गये हैं। केवल दूध पीता हूं। किन्तु पूरे तीस मील का चक्कर सैर (भ्रमण) की रीति से लगा आया हूं और किंचित् मात्र (थकान) प्रतीत तक नहीं हुआ। आशा है कि * चोगा (गौन) यहां से भी मिल जायगा। †

आप का दास तीर्थराम।

* चोगा से तात्पर्य वह गौन है जिसको पहन कर उत्तीर्ण विद्यार्थी बी. ए. या एम. ए. की पदवी कोन्वोकेशन हाल में जाकर लेते हैं॥ † अक्तूबर के पत्रों से लेकर अन्त तक यह सिद्ध होता है कि गुसाईं जी अक्तूबर मास से लेकर मिशन हाईस्कूल सियालकोट में अध्यापक नियत हो गये हुए हैं, पर उस विषय स्पष्ट कोई पत्र नहीं मिला है।

(इस वर्ष गुसाईं तीर्थराम जी की आयु साढ़े बाईस वर्ष के लगभग थी और इसी वर्ष मिशन कालेज के प्रोफ़ेसर के स्थान पर वह नियत हुए।)

(177) अपयश दिलाने वाले का संग-त्याग। सियालकोट 15 जनवरी 1886

संबोधन पूर्वोक्त,

(ल) का आचरण ठीक नहीं (या निन्दनीय) है, इस लिये उस को अपने पास से निकाल देने का विचार करता हूं। वह अपयश कराने वाला पुरुष है!

आपका दास, तीर्थराम।

(178) अपने पास अच्छे विद्यार्थी रखने की प्रतिज्ञा। सियालकोट 18 जनवरी 1886

संबोधन पूर्वोक्त,

आप का कृपापत्र मिला, अत्यन्त आनन्द हुआ। (ल) अब अपने घर रहता है। पढ़ने आया करेगा। मैं अपने पास अन्य विद्यार्थी जो अच्छे हों रक्खा करूंगा। आप कृपा करके यहां पधारिये।

आप का दास, तीर्थराम।

(179) गुजरात (पंजाव) में रहना। सियालकोट 5 फरवरी 1886

संबोधन पूर्वोक्त,

गुजरात भी एक रात गया था, भगत (*हरभज राय) जी नहीं मिले। अलबत्ता गुजरात और वज़ीराबाद के पंद्रैंस क्लास (प्रवेश श्रेणि) में पढ़ने वाले विद्यार्थियों ने बहुत लाभ उठाया, और अत्यन्त प्रसन्न हुए। अन्य भी कई महापुरुषों से मेल हुआ। ..................

आप का दास तीर्थराम।

(180) गुसाईं जी का चार घंटे तक व्याख्यान। सियालकोट 10 फरवरी 1886

संबोधन पूर्वोक्त,

आज मैं गड़तल गया था। वह ग्राम †मुराली वाले से कुछ बड़ा है, और केवल क्षत्रिय लोगों की वसती है। घर सब पक्के हैं। वहां की सभा में लाहौर की साधारण सभा से भी अधिक रौनक़ (शोभा) पाई। दो बजे से कुछ पीछे से लेकर छे बजे के लगभग तक मेरा व्याख्यान होता रहा। लोग जम्बू की अपेक्षा से अधिक प्रसन्न हुए। आप कृपा रक्खा करें। कुछ बरातों के लोग भी आये हुए थे।

आप का दास तीर्थराम

* भगत हरभज राय टंडन क्षत्रिा गुजरांत के वासी हैं। आजकल स्टैम्प बेचते हैं, पर चित्त से बड़े शान्त, शुद्ध और धार्मिक हैं। तीर्थराम जी के साथ यह कटासराज हरिद्वार और अमरनाथ यात्रा में भी गये थे। † गढ़दल सियालकोट जिला में एक कस्बा (बस्ती) है। ‡ गुसाईं तीर्थराम जी की जन्मभूमि है।

(181) निजानन्द। सियालकोट 14 फरवरी 1886

संबोधन पूर्वोक्त,

आप की कृपा से पूर्ण आनन्द (निजानन्द) रहता है। कल यहां सत्संग था। पूरे दो घंटे तो निर्विकल्प शान्तात्मा होकर चुपचाप समाधि में सब बैठे रहे। फिर दो घंटे मैं कुछ कहता रहा। आप कृपादृष्टि रक्खा करें। सब आप ही का प्रकाश है।

आप का दास तीर्थराम।

(182) बोर्डिंग का अध्यक्ष (मोहात्मिम) होना सियालकोट 15 मार्च 1886

संबोधन पूर्वोक्त,

अभी कुछ मिला नहीं, आशा है कि शीघ्र कुछ भेंट करूंगा। हमारे स्कूल के बोर्डिंग हौस का अध्यक्ष (सुपरिटेंडेंट) पहिले एक मुसलमान अध्यापक था। पिछले दिनों उसने यहां एक अत्यन्त अनुचित चेष्टा की [अर्थात् हिन्दू जिस प्राणी की क़सम (शपथ) खाते हैं, उस (गाय) का मांस बोर्डिंग में मंगवाया]। यह बात प्रसिद्ध होगयी, सो उस को निकाल दिया गया है। अब बोर्डिंग का मुख्याधिकारी (सुपरिटेंडेंट) मेरे से अतिरिक्त और कोई हिन्दू अध्यापक नहीं बन सकता। इस लिये मुझे उसका कार्य संभालना पड़ा है। आज वहां (बोर्डिंग) में चले जाना होगा। जो जगह मैं ने वहां ली है वह इस स्थान से बहुत अच्छी है। और आप को वहां बहुत सुख होगा। एकान्त भी है। आप कब पधारेंगे।

आप का दास तीर्थराम।

(183) जगत् के सब पदार्थ खोये जाने वाले हैं। सियालकोट 17 मार्च 1886

संबोधन पूर्वोक्त,

आप के दो कार्ड मिले। आप की धोती बोर्डिंग हौस में कहीं नहीं मिली। पता नहीं कहां खोई गयी। इतना मैं कह सकता हूं कि जिस किसी ने उस धोती को खोया है, जान बूझकर अथवा बुरे चित्त से उसने यह काम नहीं किया। अच्छा, परमेश्वर और दे देगा। जगत् की सब वस्तु एक दिन खोई जानी हैं। आप दया रक्खा करें।

आप का दास तीर्थराम।

(184) गुसाईं जी की अत्यन्त नम्रशीलता। इज़्ज़ो-इंकिसारी। सियालकोट 22 मार्च 1886

संबोधन पूर्वोक्त,

आप का क्रोध भरा पत्र मिला, चित्त को अत्यन्त खेद हुआ। महाराज जी! मेरे अपराधों को क्षमा करें। मैं बड़ा मूर्ख हूं। आज कल मेरी शारीरिक प्रकृति में कुछ विकार है। कब्ज़ की शिकायत है, अर्थात् मलावरोध रहना है। और सिर भी ठीक अवस्था में नहीं। कदाचित कोई उग्र शारीरिक पीड़ा न आ घेरे। उधर आप रुष्ट होगये हैं। मैं तंगी की दशा में हूं! यदि मुझ से कोई अपराध हो जाता है तो मैं निश्चय दिलाता हूं कि उनका कारण केवल मेरी शारीरिक दशा का

ठीक न होना है। आप कृपापूर्वक क्षमा करें। यद्यपि बाहर से पत्र भेजने में मैं कभी चूक जाऊं, तथापि चित्त से तो मैं सर्वदा आप के चरणों में हूं।

हवा ख़ाहे तो अम जानां व मेदानम कि मेदानी। कि हम ननविश्तः मे ख़्वानी व हम नादीदः मेदानी॥

भावार्थः - ऐ प्राणाधार! मैं तेरा प्रेमाकांक्षी हूं और जानता हूं कि तुझे यह पता है (कि मैं तेरा प्रेमाकांक्षी हूं), और बिना पत्र लिखे तू मेरे हृदय को पढ़ लेता है और बिना मुख देखे तू मेरे अन्तःकरण को जान लेता है।

आज मैं ने थोड़ी सी सरना [unclear] खाई है। शायद इस से कुछ आराम आजाये। अब मैं पेरटेंस के पर्चे (प्रवेशपरीक्षा के प्रश्न पत्र) देखने आरम्भ करने लगा हूं। आप ने कृपा दृष्टि से सब कार्य भले प्रकार से शीघ्र संपूर्ण करा देना। जैसी आप आज्ञा देंगे वैसा वैसाखी मेले को जाने के विषय में किया जायगा।

जो अपराध इस दीन सेवक से हुआ है, उस से कृपया बहुत शीघ्र सूचना दें जिस से भविष्य में सावधानता रक्खी जाये। इस अपराधों के अवगुणों को चित्त में न रखना। न पता, इस जगत् में कितने दिन और रहना है जिस से इस शोक को लेकर शरीर न त्यागूं।

आप का दास, तीर्थराम,

(185) शारीरिक आरोग्यता की आवश्यकता सियालकोट, 30 मार्च 1886

संबोधन पूर्वोक्त,

आप का कृपा पत्र मिला, बड़ा आनन्द हुआ। शारीरिक आरोग्यता निःसन्देह आवश्यक वस्तु है। इस के ठीक होने

से मन भी ठीक रहता है। यहां एक उत्सव हुआ था जिस में बाहर से सन्त, ब्राह्मण भी बुलाये गये थे। पर व्याख्याता मैं ही था। चार घंटे मेरा व्याख्यान होता रहा। आप की दया से लोग बड़े प्रसन्न हुए। नगर के धनाढ्य लोग भी सब उपस्थित थे।

आप का दास, तीर्थराम।

(186) तपोवन के दर्शन का संकल्प। सियालकोट, 13 अप्रेल 1886

संबोधन पूर्वोक्त,

आप की दया से पर्चे आज समाप्त हो गये। अब यदि आप की आज्ञा हो तो तपोवन के दर्शन के संकल्प से मैं यहां से चला आऊं। वहां से वापस आकर लाहौर चले आयेंगे। लाहौर से अनुज्ञा आ गयी है। प्रथम मई मास तक वहां चले जाना है।

आप का दास, तीर्थराम।

(187) बी-ए॰ के सब विद्यार्थियों का गणित लेना। लाहौर, 3 मई 1886

संबोधन पूर्वोक्त,

आप का कोई कृपा पत्र नहीं आया। आप दया रक्खा करें, ऐंट्रेंस (प्रवेश-परीक्षा) का परिणाम अभी नहीं निकला।

* तीन मई के पत्र में प्रतीत हो रहा है कि गुसाईं जी अब लाहौर मिशन कालेज में गणित शास्त्र के प्रोफ़ेसर की पदवी पर नियत होगये हैं

बी-ए श्रेणि के जितने विद्यार्थी हमारे कालेज में प्रविष्ट हुए हैं सब ने गणित लिया है।

आप का दास, तीर्थराम।

(188) साढ़े तीन सौ रुपये का तत्काल खपा देना (उड़ा देना) 27 मई 1886

संबोधन पूर्वोक्त,

आप का कृपा पत्र मिला, बड़ा आनन्द हुआ। .......... विश्व विद्यालय से साढ़े तीन सौ रुपये (350)। मिले थे। ऋण देने वालों को भेज दिये हैं। मासिक भाड़ा, मास भर के लिये आटा, घर के लिये वर्तन, चारपाइयां और अलमारी ख़रीद लिये हैं। दूध का हिसाव चुका दिया है। अब केवल एक रुपया देना रहा है। इन रुपयों से पूर्वोक्त कार्यों से अतिरिक्त अन्य कोई कार्य नहीं होसका। आप ने रुष्ट न होना आप को जिस बात की आवश्यकता हो, वह अब भी भले प्रकार से पूर्ण होसकती है। पुस्तकें भी कुछ ली हैं। आप की बड़ी कृपा हुई है। आप ने दया रखनी।

आप का दास, तीर्थराम।

(189) चाचा जी (अर्थात् पिता जी) का क्रोध। 1 जून 1886

संबोधन पूर्वोक्त,

चाचा जी (पिता जी) मुझ पर अत्यन्त क्रुद्ध हैं, और विशेष करके इस बात पर कि मैं घर वालों को अपने साथ

(लाहौर) ले आया हूं। शायद दो तीन दिन तक यहां आयें। पर कुछ पक्का पता नहीं, आप ने दया रखनी।

आप का दास, तीर्थराम।

(190) गुसाईं तीर्थराम जी का तीव्र त्याग। 5 जून 1886

संबोधन पूर्वोक्त,

आप का एक कृपा पत्र आज मिला था। मैं तो नितान्त ही आप का हूं। किसी वस्तु को अपना नहीं समझा हुआ। सांसारिक द्रव्य को एकत्र करना आनन्द का कारण नहीं समझा हुआ। न भूषण बनाने का और न पदार्थों के उपार्जन करने का विचार है। आप की कृपा से वृक्ष की छाया घर के बदले, भस्म वस्त्रों के बदले, भूमि शय्या के बदले, और भिक्षान्न खाने के लिये यदि मिल जाये तो भी बड़ा आनन्द माना हुआ है। किस धन के लिये मैं आप को क्रुध करदूं? यदि भिक्षुओं के सदृश रहने के लिये मुझे आज्ञा दें तो मैं सब कुछ छोड़ कर साधुओं के समान रहने को तय्यार हूं। कालेज में काम भी करता रहूंगा, जो कुछ वहां से मिले जिस प्रकार आप का चित्त चाहे वर्त लिया करना। हमारे घर भी जो उचित समझें दे दिया करना। यह दीन सेवक तो केवल काम करने और परमात्मा को चित्त में धारण रखने से वह सुख पाता है कि जिस को वाह्य विषय सुख और आडम्बर अथवा ठाठ बाठ की किंचित् भी आवश्यकता नहीं। मुझे तो ईश्वर निमित्त काम करने से जो सुख होता है, वही वेतन पर्याप्त (काफ़ी) है। मेरा वेतन जाने और आप जानें। मेरा आत्मा तो इन पदार्थों से न घटता है, न बढ़ता है। सदा

आनन्द रूप है। यह सब आप की कृपा का फल है। जब आप पधारेंगे विस्तार पूर्वक कथन करूंगा। कल से चाचा जी (पिता जी) यहां पधारे हुए हैं, सो मैं कल शनिवार को आप के चरण कमल स्पर्श नहीं कर सकूंगा। जो आप का मनशा (विचार) हो मुझे स्पष्ट लिख दिया करो।

आप का दास, तीर्थराम।

(191) शरीर से बाहर स्थिति। 11 जून 1886

संबोधन पूर्वोक्त,

आप के दो कृपा पत्र मिले, बड़ा आनन्द हुआ। चाचा जी (पिता जी) क्रुद्ध नहीं हुए। और होते क्योंकर? मैं तो शरीर से बाहर स्थिति रखता था। परन्तु पचास रुपये जो मेरे पास बचे थे, वह उन की सेवा में भेंट किये गये। अब मैं उधार लेकर काम चला रहा हूं। और आनन्द हूं......

जगद्गुरु स्वामी शंकराचार्य जी † मुझे अपने साथ एक दिन के लिये जम्मू लेजाना चाहते हैं। उन को जम्मू के राजा ने बुलाभेजा है। उन का प्रस्थान कल शुक्र

† जगद्गुरु श्रीस्वामी शंकराचार्य जी से अभिप्राय द्वारका मठ (शारदापीठ। के परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीस्वामी राज राजेश्वर तीर्थ जी हैं जो उन दिनों देशाटन करते [unclear] लाहौर में पधारे थे और जिन के सिंहासन के हृदे गिर्दे दिन में भी दो दीपक मशाला जलते थे। इन ही से गुसाईं जी को संन्यास धारण करने की आज्ञा इन शब्दों से मिली थी कि "जब तुम पूरे उन्मत्त (मस्त) हो जाओ तो स्वयं विद्वत्संन्यास ले लेना"। जिस आज्ञानुसार गुसाईं जी ने इस अवस्था को प्राप्त होते ही टेहरी के समीप गंगा तट पर संन्यासाश्रम ले लिया और उन को अपना परम गुरु मान कर अपने नाम के पीछे तीर्थ संज्ञा लगाई। जिस से रामतीर्थ नाम प्रसिद्ध हुआ॥

वार सायंकाल को यहां से होगा। परसों शनिवार को वहां रेल के रास्ते से पहुंच जायेंगे। उन के साथ राजा हरवंश सिंह जी का वज़ीर (सचिव), पं० दीनदयाल जी और लाहौर के कुछ धनाढ्य पुरुष होंगे। मुझे भी ले जाना चाहते हैं, केवल महाराजा जम्मू से मेल कराने के लिये। मैं ने अभी कोई पक्का संकल्प नहीं किया। जैसे आप की अन्दर (भीतर) से आज्ञा होगी, वैसा किया जायगा। मैं आप का एक दीन सेवक हूं। यदि आप को परिश्रम न हो तो आप ने भी गुजरांवाले रेलवे स्टेशन पर पधारना। यदि मैं (उन के साथ) हुआ, तो आप ने भी जम्मू चले चलना।

आप का दास, तीर्थराम।

(192) जगद्गुरु शंकराचार्यजी की आज्ञानुसार गुसाईं जी का जम्मू जाना। लाहौर, 13 जून 1886

संबोधन पूर्वोक्त,

महाराज जी! मैं कल स्वामी जी के साथ जम्मू नहीं गया। क्योंकि आज छुट्टी नहीं थी। पर आज वहां पहुंच जाने का वचन (इक़रार) है, कल आदित्यवार की रात्रि को यहां वापस आ जाना होगा। रात की गाड़ी में आना जाना होगा। सियालकोट भी शायद कुछ घंटे ठहरूं। महाराज जी मैं चाहे क्या करूं, मेरा चित्त आप ही के चरणों में है। जगत्गुरु जी के साथ पं० भानुदत्त, पं० गणपति, पं० दीनदयाल, अमृतसर के पांच बड़े प्रसिद्ध पंडित और लाहौर के कुछ धनाढ्य पुरुष गए हुए हैं। आप ने इस दीन और सदा

अपराधी सेवक के अवगुणों को क्षमा करना और कृपा दृष्टि रखनी।

आप का दास, तीर्थराम।

(193) हरदिल अज़ीज़ी [सब से प्रेम] 16 जून 1886

संबोधन पूर्वोक्त,

मैं कल आदित्यवार प्रातःकाल की गाड़ी से जम्मू गया था। और कल रात की गाड़ी से लाहौर आगया था। जो आज सोमवार प्रातःकाल लाहौर पहुंची। स्टेशन से सीधा कालेज पढ़ाने चला गया था। सियालकोट के लोग रात को स्टेशन पर मिलने के लिये आ गये थे। पचास से अधिक मनुष्य थे। सब बड़े प्रेम से मिले, जम्मू में भी मिलाप हुआ। वहां लोगों का वृहत समूह (मिलने के लिये आया हुआ) था। महात्मा निरञ्जन दास भी मिले, अमृतसर के पंडित गिरधारी लाल शाखी और पं० मोहन लाल जी बड़े प्रेमी हैं। आप शीघ्र पधारें।

आप का दास तीर्थराम।

(194) मिशन कालेज में व्याख्यान। 20 जून 1886

संबोधन पूर्वोक्त,

मेरा आज मिशन कालेज में व्याख्यान* हुआ था। लोग

* यह व्याख्यान अंग्रेजी में था जिस का विषय "गणित शास्त्र, उस की आवश्यकता और उस में उन्नति पाने का उपाय" (Mathematics; Its importance and the way to excel in it) था यह तत्पश्चात् पुस्ताकार छप गया था और अब भी श्री रामतीर्थ पब्लिकेशन लीग लखनऊ से पुस्ताकार में संक्षिप्त जीवनी सहित॥) को मिलता है।

बड़े ख़ुश हुए थे। और मिशन कालेज के प्रिन्सिपल साहिब ने उसके छपवा देने की प्रेरणा (फ़रमायश) की थी। मैं शायद कल जम्मू जाऊं पर निश्चय से नहीं कह सकता। परसों छुट्टी है॥

आप का दास, तीर्थराम।

(195) गुरुजी के लिये बोटी बोटी भी काटी जाय तो आनन्द है। 4 जुलाई 1886

संबोधन पूर्वोक्त,

मैं आज तक कुछ भेंट नहीं करसका, क्षमा कीजियेगा। जब देर (विलम्ब) का कारण मालूम होगा, तो आप चित्त में कोई आशंका (अथवा भ्रम) नहीं रखेंगे। आप दीन सेवक पर रुष्ट मत हुआ करें। इस दास की यदि बोटी २ (मांस का खंड 2) काटने की भी आज्ञा दी जाये, तो पूर्ण आनन्द माना जाता है और बड़ी कृपा समझी जाती है।

आप का दास, तीर्थराम।

(196) व्याख्यान पर पंडित जनों का विस्मित होना। 20 जुलाई 1886

संबोधन पूर्वोक्त,

यहां कल मेरा एक व्याख्यान हुआ था। पं० दीनदयाल, पं० गोपीनाथ और सर्व श्रोतागण आप की कृपा से नितान्त विस्मित हो गये। आप की दया से सारे बड़ी कृपा करते हैं। आप दास पर कृपा दृष्टि रक्खा करें।

आप का दास, तीर्थराम।

(197) मान में बोर्डिंग में प्रीति भोजन। 26 जुलाई 1886

संबोधन पूर्वोक्त,

आज विशेष प्रकार से इस सेवक को कालेज के आश्रमस्थों ने अपना प्रेम, भक्ति और उत्साह दर्शाने के लिये भोजनार्थ निमंत्रित किया था। उन्हें उपदेश भी हुआ था। बड़े प्रसन्न हुए थे। उन्हों ने बड़ी प्रीति और अनुराग (भक्ति) प्रकट किये। यह सब आप की कृपा है।

आप का दास, तीर्थराम।

(198) मथुरा में गमन। मथुरा 3 अगस्त 1886

संबोधन पूर्वोक्त,

पंडित (दीनदयाल) साहिब के साथ मैं कल यहां (मथुरा) पहुंच गया। भिवानी से यहां तक छब्बीस (26) घंटे में आये। नगर अति सुन्दर है। और विशेष करके मंदिर तो अति अद्भुत और रमणीय हैं। दो तीन दिन तक वृन्दावन जावेंगे। वहां का पता इदानीं काल में नारायण स्वामी जी का आश्रम है। भ्रमण करने को यहां अच्छा अवसर मिलता है। वर्षा इधर बहुत है। दूध का वही मुल्य है जो लाहौर में।

आप का दास, तीर्थराम।

(199) ब्रज की यात्रा। वृन्दावन 6 अगस्त 1886

संबोधन पूर्वोक्त,

आप का कृपा पत्र मिला, अत्यन्त आनन्द हुआ। आज

हम व्रज की यात्रा को चले हैं। तीन चार दिन लगेंगे। गोवर्धन बरसाना, नन्दग्राम, गोकुल, बल्दाऊ यह स्थान देखेंगे। आशा है कि मास सितम्बर में आप के चरण कमलों में उपस्थित हो जाऊंगा। आप ने तो पत्र पूर्व पते पर ही लिखना। तीन महात्माओं के दर्शन हुए। पताः—श्री वृंदावन धाम, केशी घाट, नारायण स्वामी जी के द्वारा तीर्थराम को मिले। पंडित (दीनदयाल) जी की ओर से जय श्री कृष्णचंद्र महाराज की।

आप का दीन सेवक, तीर्थराम।

(200) व्रज यात्रा से वापसी। वृंदावन धाम 16 अगस्त 1886

संबोधन पूर्वोक्त, हम सब कल व्रज की यात्रा से वापस आये। अब कोई दो सप्ताह से थोड़े दिन यहां रहने की आशा है। बहुत भ्रमण किया और चक्कर लगाया। यह भूमि प्रत्येक प्रकार से परिक्रमा के योग्य है। आप दया रक्खा करें। पंडित जी का नमस्कार।

आप का दास, तीर्थराम।

(201) वृन्दावन से वापसी। मथुरा 25 अगस्त 1886

संबोधन पूर्वोक्त, अब हम वृंदावन से चलकर मथुरा आये हैं। दो तीन दिन यहां रह कर दिल्ली जायेंगे। वृंदावन में व्याख्यान हुए, यहां भी होंगे। दिल्ली (देहली) से शायद मैं भी पंडित जी

के साथ शिमले जाऊं, पर पक्के निश्चय से कुछ नहीं कह सकता। सर्व प्रकार से दो सप्ताह तक लाहौर पहुंच जाने की आशा है।

आप का दास, तीर्थराम।

(202) मथुरा में व्याख्यान। 30 अगस्त 1886

संबोधन पूर्वोक्त, आप का एक कृपा पत्र मिला, अत्यन्त आनन्द हुआ। मेरा अपना चित्त भी अति शीघ्र आप के चरणों में उपस्थित होने को चाहता है। परन्तु अब शिमले में जन्माष्टमी के दिन वार्षिक उत्सव है। पंडित जी ने मेरे वहां आने की भी शिमला निवासियों को सूचना भेज दी हुई है। और उन्हों ने वहां विज्ञापन इत्यादि में मेरा नाम भी छपवा रक्खा है। और आज पंडित जी मुझे वहां लेजाना चाहते हैं। येनकेन रीति से वहां (शिमला) से नौ दस (9,10) दिन तक लाहौर पहुंच जाने की पूरी आशा है। चित्त आप के चरणों में रहता है। कल मेरा यहां अंग्रेज़ी भाषा में व्याख्यान हुआ था। आज पंडित जी का है। नगर के सारे धनाढ्य और सभ्य पुरुष भी सुनने आये थे। आप दया रक्खा करें। पंडित जी की ओर से जय श्री कृष्ण चन्द्र जी की। शिमले का पता यह है। "नगर शिमला, पास बाबू नानक चंद साहिब प्रैज़ीडेण्ट (सभापति) सनातन धर्म सभा के पहुंचकर गुसाईं तीर्थराम को मिले"।

आप का दास, तीर्थ राम।

(203) अतिथियों की अधिकता और उधार लेकर काम चलाना। 8 नवम्बर 1886

संबोधन पूर्वोक्त, यहां पं० रामधन* और एक अन्य पुरुष आये हुए थे। आज प्रातःकाल की गाड़ी से चले गये हैं। किसी कार्य निमित्त आये थे। आप कब पधारेंगे?

यहां बहुत अतिथि आते हैं। मुराली वाला (जन्म भूमि) के दो और मनुष्य इस समय आये हैं। कम से कम तीन रुपये प्रति दिन खर्च हो जाते हैं। ऋण (उधार) उठा रहा हूं।

आप का दास, तीर्थ राम।