परमार्थ निष्ठा और मानासिक शक्तियां
अथवा
अध्यात्मविद्या और प्रेत-विद्या सम्बन्धीय शक्तियां।
15 दिसम्बर 1902 को हरमेटिक ब्रादरहुड हाल सैन फ्रांसिस्को में दिया हुआ व्याख्यान।
नं 509 वान, नैस, ऐवेन्यू, सैन फ्रांसिस्को, कैलीफोरनियां में प्रश्नोत्तर के रूप में दी हुई स्वामी राम की व्याख्यान माला का पहिला व्याख्यान।
प्रश्न—प्रेत विद्या की शक्ति को बढ़ाना और मृत जनों (वा प्रेतों) से बात चीत (वा व्यवहार) करना क्या ठीक है? और यदि ठीक है तो इस के लिये क्या कोई निश्चित उपाय हैं कि जिनका अनुसरण किया जाय?
उत्तर—इस प्रश्न का पूरी तरह उत्तर देने के लिये हमें ऐसे विषयों में वेदान्त की दृष्टि के अनुसार प्रवेश करना होगा।
वेदान्त के अनुसार दो मार्ग हैं, प्रवृत्ति-मार्ग और निवृत्ति-मार्ग अथवा कर्म-मार्ग और ज्ञान या संन्यास-मार्ग। ईसाई मत जिसे "कर्मों से मुक्ति" ( Salvation by Acts ) कहता है, कर्म-मार्ग उस के अनुरूप है। और ज्ञान मार्ग उस के अनुरूप है जिसे ईसाईमत ब्रह्म-विद्या "विश्वास से मुक्ति" (Salvation by Faith) कहता है। दोनों में क्या अन्तर है?
हिन्दुओं की व्याख्या के अनुसार, कर्म-मार्ग का लक्ष्य स्वार्थपूर्ण व्यक्तिगत शक्ति का संचय, संसार में साम्राज्य की वृद्धि है। अपने अधिकारों और सम्पत्ति को बढ़ाना,
फैलाना और विस्तीर्ण करना, यह है कर्म-मार्ग का उद्देश्य। उन्नति की एक विशेष (खास) अवस्था में यह हरेक के लिये स्वाभाविक ही है। प्रत्येक व्यक्ति अपने व्यक्तिगत राज्य को फैलाना और बढ़ाना चाहता है। किन्तु सच्ची अमरता या सच्चे जीवन को पहुंचाने वाला यह मार्ग नहीं है। इस पथ के प्रयोग वा अनुभव प्राप्त करने पड़ेंगे, किन्तु ऐसा समय अवश्य आवेगा जब हम इस रास्ते से लौटेंगे और इस ग्रहणशील, कामनाशील, आशाशील अज्ञान को छोड़ कर वैराग्य का मार्ग अंगीकार करेंगे। हमारे परमसुख के लिये यह रास्ता ज़रूरी है।
कर्म-मार्ग तीन प्रकार का है। यह कर्म-मार्ग कोरी दुनियादारी है। उप-विभागों (छोटे २ वर्गों) को छोड़ कर अब तीन तरह के संसार हैं।
प्रथम—प्रत्यक्ष संसार, स्थूल, भौतिक संसार।
द्वितीय—मानसिक संसार, आध्यात्मिक या सूक्ष्म संसार।
तृतीय—अविज्ञात संसार, जिस का शब्दार्थ अज्ञातों का संसार है।
ये तीन मुख्य संसार हैं, और एक हद तक वे एक दूसरे से स्वतंत्र हैं।
जिस समय हम स्वप्न-भूमि में, या सूक्ष्म अथवा मान- सिक आदि दूसरे संसारों में होते हैं, तब यह स्थूल, भौतिक संसार मानो अलग रहता है। और तीसरे संसार, अविज्ञात संसार का भी यही हाल होता है। गहरी निद्रा-अवस्था के उदाहरण से इस तीसरे संसार की कुछ कल्पना की जा सकती है। उस "दशा" में तुम ऐसी-दुनिया-अज्ञातों के संसार-में
होते हो जो मेरा और तेरा के किसी प्रकार के संसर्ग से शून्य है।
ईसाइयों का बैकुंठ और नरक, मुसलमानों का बिहिश्त, हिन्दुओं का स्वर्ग, सभी दूसरी दुनिया. मानसिक संसार की दुनिया, पारलौकिक जगत की चीज़ें हैं। दूसरे संसार के अनेक उपविभाग हैं, दूसरे संसार के किन्हीं उपविभागों में हम प्रेतों को स्थान देते हैं। इस समय इन ब्योरों में प्रवेश करने की ज़रूरत नहीं है। कर्म-मार्ग कोरी दुनियादारी है। हमारी निजी (व्यक्तिगत) शक्ति के विस्तार के सब विचार दुनियादारी हैं।
एक बड़ा वैज्ञानिक भाफ या बिजली विषयक अनोखे आविष्कार करता है। और इस कृति से वह अपनी व्यक्तिगत शक्ति बढ़ाता है, तथा (प्रकृति के) तत्वों पर हमारी प्रभुता भी उसने बढ़ादी। हम उसके कृतज्ञ हैं, हम उसका मान करते हैं, हम उसका आदर और सम्मान करते हैं, किन्तु मुक्ति के लिये हम उसके पास नहीं जाते। हम उसकी ओर जाते हैं और उसके आविष्कारों की यथा योग्य क़द्र करते हैं, किन्तु पूर्ण आनन्द के लिये, 'सर्व' रूप के लिये हम उसके पास नहीं जाते। उस विषय का उसे कुछ भी 'ज्ञान' नहीं है।
इसी तरह यदि कोई बड़ा प्रत्यक्षमूलक वा मनोविज्ञानी दार्शनिक है, जिसने मन की क्रियाओं का हमारा ज्ञान बढ़ाया है; हम उसके पास जाते हैं, हमें मन, बुद्धि, मनोभाव और भावनाओं के व्यापार बताने के कारण हम उसके आभारी होते हैं। किन्तु मन की असली शान्ति के लिये 'मिल' या 'स्पेंसर' सरीखे तत्व-वेत्ता की भी कोई शरण नहीं लेता। हरेक अपने २ मार्ग में बहुत अच्छा है, किन्तु जिस एक वस्तु की हमें ज़रूरत है वह हमें नहीं देता।
भारत में ऐसे अनेक लोग हैं जिनका प्रेत-विद्या अर्थात् प्रेतों से मिलाप कराने वाली विद्या में सरोकार है, जो लोग प्रेतों से सम्बन्ध रखते हैं। जिसे दूसरा संसार कहा जाता है उससे उन्हें बहुत कुछ जानकारी है। यहां के भौतिक पदार्थों की नहीं किन्तु अन्य दूसरे संसार की जानकारी है, परन्तु दुनियादारी तो दुनियादारी ही है, वह चाहे इस संसार की हो या दूसरे संसार की, चाहे इस प्रथम (स्थूल) संसार की हो या दूसर अथवा मानसिक संसार की। असलीयत या पर- मार्थ तत्व इन सब जगतों का आधार है और इनके ऊपर बर्तता है। तत्व की इस असलीयत का ज्ञान ही एक मात्र आवश्यक वस्तु है। हम इन (लौकिक वेत्ता) लोगों का वैसा ही स्वागत करते हैं जैसा हम एक वैज्ञानिक या शास्त्रज्ञ का स्वागत करेंगे, किन्तु असली शान्ति और सुख के लिये हम इनके सामने घुटने नहीं टेकते, इनसे हमें वह (शान्ति) नहीं मिल सकती।
कभी कभी ऐसा होता है कि एक वैज्ञानिक या प्रत्यक्ष पदार्थों का दार्शनिक दैवीज्ञान पा लेता है, प्रेत-विद्या का वेत्ता भी यथार्थ ज्ञान से सम्पन्न हो सकता है, किन्तु उसकी मानसिक वा प्रेत-विद्या जानने वाली शक्ति का, वा मृतों से वार्तालाप करने की उसकी सामर्थ्य का उसके दैवीज्ञान से उतना ही सम्बन्ध है जितना गणित विद्या के ज्ञान का सम्बन्ध राम के वेदान्त से है। राम गणित विद्या का उपाध्याय (professor) था, किन्तु उस गणित विद्या का इस वेदान्त से कोई वास्ता नहीं है, जिसका कि वह प्रचार कर रहा है। हमें दोनों को मिला न देना चाहिये।
भारतवर्ष में एक भला आदमी जो राम का बड़ा मित्र
था, इसी (प्रेतविद्या वादी) अर्थ में आत्मवादी था। एक स्थान पर उसे ले गये, उसकी आँखों पर पट्टी बाँध दी गई, और गणित विद्या की एक पोथी उसके सामने रख दी गई। यह पुस्तक उसने कभी नहीं देखी थी। उसी हालत में वह उसे पढ़ने लगा। गणित विद्या के अपने विशेष चिन्ह होते हैं, और इस पुस्तक में ऐसे नाम थे जिन्हें वह नहीं जानता था। उसने एक ताव कागज़ सादा माँगा और गणित की पोथी के पन्नों में जो कुछ था उसे कागज़ पर लिखता गया। वह चिन्हों के विशेष नाम तो नहीं बतला सका, पर सब की नक़ल कर डाली। उस में यह शक्ति थी। वह आप के विचारों को जान सकता था, और आप अपने हाथ से, उस से अलग में, जो कुछ लिख सकते थे उस सबकी वह तुरन्त नक़ल कर सकता था। अच्छा, यह एक प्रकार से आत्मवादी तो था किन्तु पवित्र पुरुष नहीं था, नाम मात्र को भी नहीं। दुनियादार, केवल दुनियादार वह था, और पवित्र या सुखी मनुष्य नहीं था।
इस आत्मवाद (प्रेतविद्या) को प्रायः विज्ञान की पदवी दी जाती है, और विज्ञान की हैसियत से हम उसका आदर कर सकते हैं, किन्तु इसको उससे न मिला देना चाहिये कि जो असली हर्षपूर्ण आनन्द का दाता है, जो तुम्हें सब प्रलोभनों की पहुँच से परे कर देता है।
हम भारत के एक ऐसे मनुष्य को जानते हैं जो देखने में 6 महीने तक मुर्दा रहा। जीवन के आधार रूप प्राणों को रोक देने की इस क्रिया को खेचरी मुद्रा कहा जाता है और हठ योग के ग्रन्थों में यह पूरे विवरण सहित दी हुई है। वह अपने को उस दशा में ले आया था। उस में जीवन का कोई
चिन्ह नहीं था, उसकी नाड़ियों में रक्त नहीं बहता था। 6 महीने के बाद वह फिर जी उठा। यह एक ऐसा आदमी था जो एक महान् आश्चर्य रूप, दूसरा ईसा, समझा जा सकता था। ज़ाहिरा छे मास तक, केवल तीन दिन नहीं, मुर्दा रहने के बाद वह जी उठा। सुखी या स्वतंत्र होने से वह दूर था। उस ने जो पाप किये उनका वर्णन करने की राम को कोई ज़रूरत नहीं। जिस राजा के दरबार में वह ये काम करता था उसने अपने राज्य से उसे निकाल दिया।
एक और दूसरा आदमी था जो पानी पर चलता था। एक सच्चे साधु ने हँस कर उससे पूछा कि यह शक्ति पाने में तुम्हें कितना समय लगा। उसने जवाब दिया, सत्रह वर्ष मुझे लगे। साधु ने उत्तर दिया, "सत्रह वर्ष में तुम ने एक ऐसी शक्ति पाई है जिसका मूल्य दो पैसे है। हम एक मल्लाह को दो पैसे देते हैं और वह हमें नदी के पार उतार देता है।"
सब व्यक्तिगत शक्ति परिच्छिन्न है। वह तुम्हें उतना ही बाँधती है जितना कि कोई भी मिल्कीयत या सम्पत्ति बाँधती है। जंजीरें ही हैं, चाहे लोहे की हों या सोने की, वे समान रूप से तुम्हें गुलाम बनाती हैं।
यदि ये शक्तियां मनुष्य को अति पावित्र बनाती हैं, तो कुत्तों को अति पवित्र समझना होगा। कुत्ते सूँघ कर जान लेते हैं कि बारहसिंगा कहाँ है। कुत्तों में ऐसी घ्राण-शक्ति होती है कि वैसी मनुष्य में नहीं होती, इस लिये वे अवश्य पवित्र होंगे।
एक फकीर था जो किसी भी मनुष्य को बादशाह बना सकता था। यह शक्ति उसे कैसे मिली थी? उसने उत्तर दिया कि मैं ने उपवास किये और तदुपरान्त गौओं की जूठन
खाई। एक विशेष विधि से वह रहा और फल-स्वरूप यह विशेष शक्ति पाई। एक भाई ने उस से कहा, "बादशाह के अधिकार भोगने को तुम हरेक व्यक्ति को देते हो, किन्तु तुम्हें केवल गौ की जूठन ही मिलती है"। भारतवासी इन शक्तियों को रखने वाले मनुष्यों का ऐसा आदर और मान करते हैं। अर्थात् सभी भारतीय जानते हैं कि केवल वही आत्म- ज्ञान है जो हमें सब ज़रूरतों से परे कर देता है।
एक भारतीय भूपति के सामने एक हठ योगी गया और लम्बी समाधि ले ली। जीवन का कोई चिह उसमें नहीं रहा। वर्षा और तूफान से उसकी रक्षा करने के खयाल से लोगों ने उसके ऊपर एक झोंपड़ा बना दिया। एक रात को बड़ा बेढब तूफान आया और ईंटें योगी के सिर पर गिर पड़ीं। वह फिर जीवित हुआ और पहली बात उसके मुख से यही निकली, "मेरा इनाम एक घोड़ा, ऐ राजा! एक घोड़ा, एक घोड़ा, ऐ महाराज!" इस तरह भारतवासी जानते हैं कि ऐसे लोग जब तक समाधि की अवस्था में हैं, तब तक अच्छी हालत में हैं, वे सुखी हैं, किन्तु जब भौतिक धरातल पर होते हैं, तब उतने ही दुखी रहते हैं जितना कि कोई भी दूसरा प्राणी।
मुख से कटार, तलवार, या बड़ा चाकू निगल लेना, त्वचा में सूजा छेद लेना, और ऐसी दूसरी बहुतेरी बातें भारत में बहुत साधारण हैं। फिर, तीन या चार घंटे तक मन को समाधि अवस्था में रखना वैसी समाधि अवस्था नहीं है जिसकी प्राप्ति के लिये देवी ज्ञान अनिवार्य हो। भारत में हज़ारों मनुष्य इसका अभ्यास करते हैं, किन्तु अधिकांश मामलों में यह अभ्यास केवल स्वर्ग से प्रोमीथियस
(promethens) की अग्नि की चोरी के तुल्य है। यह हमारी आँखों के सामने उतने समय के लिये पर्दा डाल लेना है, न कि सदा के लिये।
एक सरोवर या झील ले लो। उसके ऊपर हरी चादर या काई है। इस हरे ओहार (चादर) को हटाते ही नीचे का सुन्दर, मनोरम जल वहाँ चमकने लगेगा। तुम्हारा हाथ अलग हटते ही बिल्लौर सा निर्मल जो जल निकला था उसे फिर हरी चादर ढक लेगी। झिल्ली की सील को साफ कर डालना, युक्तिसंगत, साध्य, और व्यावहारिक है। हरी चादर को हटा कर कुछ मिनटों के लिये इसे साफ कर लेने से हम ध्याना- वस्था में प्राप्त हो सकते हैं, किन्तु इस तरह रोग सदा के लिये नहीं चंगा होता। बारंबार थोड़ी थोड़ी हरी चादर या काई निकालो और दूर फेंक दो। इस तरह बाकी चादर पतली होती जायगी और अन्त में सारी झील साफ हो जायगी। यही उद्देश्य वेदान्त ने अपने सामने रखा है।
पुनः, यह एक सर्प है जो तुम्हें काटता है। यह सांप सर्दी से ठिठुर सकता है, वह कुंडली मार कर गेंद बन जाता है और हथियाया जा सकता है। उसे घर ले आओ और आग के सामने रख दो। गर्मी पाकर वह अपने को फैलाता है और फिर काटता है। उसकी द्वेष-बुद्धि लौट आती है, और विष तो उस में है ही। सर्प का विष नहीं दूर हुआ। कुछ लोगों के ध्यान करने की क्रिया का यह दूसरा उदाहरण है। अधिकांश लोगों के मामले में समाधि की अवस्था केवल मनरूपी सांप का कुंडली मार लेना है। कामनायें इस सांप के ज़हरीले दांत हैं जो कुछ काल के लिये ज़ाहिरा उखड़ जाते हैं। वह चुद्र चित्त सोता है, या, दूसरे शब्दों में,
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समाधि की अवस्था में प्राप्त हो जाता है। सांप अमलन मुर्दा है, सर्दी खा गया है, किन्तु असल में मरा नहीं है। सांप को दूसरी तरह पर हथिया सकते हैं। कोई बाजा लेकर हम तब तक मंत्र फूंक सकते हैं जब तक वह मोहित न हो जाय। तब अपनी प्रवीणता से हम सांप को पकड़ सकते हैं, और उसके दांत तथा विष-थैलियाँ उखाड़ सकते हैं। अब तो सांप विष की थैलियों और दांतों से हीन है, उसका विष निकाल लिया गया, मन को काबू में लाने का यह वेदान्ती ढंग है।
प्रेत-वाहक (वा प्रेतवादी) आम तौर पर अपने मनों को उस अवस्था में ले आते हैं जिसकी तुलना सर्दी खाय सांप से की जा सकती है और तब आनन्द की अवस्था में भी होते हैं, किन्तु इस कर्ममय जीवन में उनके नातेदार, मित्र, भाई, बहन, और शत्रु सबके सब आते हैं और कामनाओं तथा मनोविकारों के सर्प को गर्मा देते हैं, वे इस सांप को जगा देते हैं, और मनोविकारों तथा कामनाओं के सर्प के जाग जाने पर अन्तर्गत चित्त फिर दुष्टता करने लगता है। सांप के विषदन्त उखाड़ नहीं लिये गये थे, और वे उतने ही ज़हरीले होते हैं जितने पहले। चरित्र का निर्माण नहीं होता, सच्ची रूहानियत (परमार्थ निष्ठा) नहीं प्राप्त होती।
इन लोगों में से अधिकांश तो अपनी इन रुपया कमाने की शक्तियों की सौदागरी करना चाहते हैं। मन की एकाग्रता बहुत ठीक है, किन्तु सांप को विष-हीन बनाओ, सर्प के विषदन्त उखाड़ डालो, सब प्रलोभनों से ऊपर उठो, अपना चरित्र बनाओ। इन बातों पर ध्यान देना है, और (ये) याद रहनी चाहियें। सब कमज़ोरियां दूर हो जाने पर, तुम
फिर विषदन्त हीन बेदाँतों के सर्प होते हो और तब भी तुम ठिठुर सकते हो। किन्तु उसी हालत में रहने की अब कोई ज़रूरत नहीं, तुम्हारे डंकों में अब ज़हर नहीं है। अब तुम चरित्रवान् हो और कर्ममय जीवन में अब तुम्हें हानी दांति नहीं पहुँच सकती, तुम उससे परे हो।
एक मनुष्य शराब पीते पीते उन्मत्त हो जाता है, और उस दशा में अपना घर साढ़े सात हज़ार रुपये को बेच डालता है, उसी मतवाली दशा में साढ़े सात हज़ार रुपये पर अपना घर बेचने का विक्रय-पत्र (document) भी लिख देता है। उसकी स्त्री उसे शीघ्र ही सिरका या कोई खट्टी चीज़ पिलाती है और वह होश में आ जाता है। तब उसे अपनी करतूत और अपना बड़ा भारी घर कौड़ियों के मोल बेच डालने की बेवकूफी पर रंज होता है। घर मोल लेने वाले पर वह मुकद्दमा चलाने का निश्चय करता है और अपनी मदहोशी के आधार पर, जिस के कारण कि वह अपने कामों का ज़िम्मेदार नहीं था, जीत जाने की आशा करता है। उस समय वह सचेत नहीं था। यही हालत कुछ लोगों की है। वे एक तरह के नशे की हालत में हैं, और ऐसी हालत में वे ईश्वर के हाथ अपने को बेच डालते हैं; अपना सब धन दे देते हैं; अपनी सब मिल्कीयत त्याग देते हैं; पिता, माता, बहन, भाई, मित्र, सब कुछ दे डालते हैं, सर्वस्व ईश्वरार्पण कर देते हैं। ईश्वर के लिये उन्हों ने सर्वस्व खो दिया है। बहुत खूब, वे उस समय योग (एकाग्रता) की अवस्था में हैं। और थोड़ी ही देर के बाद सांसारिक ज़रूरतें उन्हें सताने लगती हैं और छोटी छोटी चिन्तायें डसने लगती हैं, अपने अस्तित्व का बोध
कराती हैं। उन्हें सिरका दिया जाता है और सारा नशा हिरन हो जाता है, और तब वे हरेक चीज़ परमेश्वर से लौटा लेते हैं। यह देह मेरी देह हो जाती है, घर मेरा घर हो जाता है, और वे मांगते ही रहते हैं, यहां तक कि वे उसे भी ले लेना चाहते हैं जो उनके पड़ोसी का है, ईश्वर से हरेक वस्तु लौटा लेना चाहते हैं। यह सब जैसा कुछ है बहुत ठीक है, किन्तु सच्ची शान्ति और सुख तुम्हें केवल तभी हो सकता है जब तुम पूर्णता की उस अवस्था में पहुँच जाते हो, जब तुम हरेक वस्तु सदा के लिये ब्रह्मार्पण कर देते हो और जब तुम अपने चरित्रका निर्माण कर डालते हो, जो तुम्हें सब क्लेशों के लिये अभेद्य बना देता है। अब दुनिया की कोई चिन्ता, कोई डर, कोई आशा नहीं रही। तुम इन सब झगड़ों से ऊपर उठ जाते हो।
वेदान्त के अनुसार, यदि एक क्षण के लिये भी तुम परब्रह्म से युक्त हो जाओ, तो तुम्हें कुछ शक्तियां मिल सकती हैं। क्या तुम सारी दुनिया अपनी नहीं करना चाहते? त्याग की इन ऊँचाइयों पर यदि विधि पूर्वक पहुँचने में तुम सफल हो जाते हो तो सब कुछ तुम्हारा है।
यदि राजा के किसी पदाधिकारी को हम तलाश करते हैं, तो अकेले उसी को हम अपना मित्र बनाते हैं, उसके द्वारा बादशाह और दूसरे अधिकारियों को अपना मित्र बनाने में हम समर्थ हो सकते हैं या नहीं भी होसकते। पहले बादशाह को तलाश करो और तब दूसरे मातहत (उसके अधीन पुरुष) अपनी ही इच्छा से तुम को तलाश करेंगे और तुम्हारे मित्र हो जाँयगे।
भारत में कुछ लोग विशेष शक्तियां पाना चाहते हैं और
उनको पाने में सफल होते हैं। दूसरे लोग हैं जो उनसे घृणा करते हैं। वे त्याग के मार्ग पर चलना चाहते हैं, वे एक आवश्यक वस्तु को जानना चाहते हैं। त्याग के बिना इस संसार में कोई भी शक्ति नहीं है, किन्तु विशेष शक्तियों के पाने में त्याग अधूरा होता है। त्यागको पूर्ण होने दो, तो राज्य भी पूर्ण होता है, सारी दुनिया तुम्हारी हो जाती है। वे लोग जो त्याग के मार्ग पर चलते हैं खुद बादशाह को ढूँड लेते हैं। अपने ही अन्दर बादशाह का साक्षात्कार हो जाने पर सब कर्मचारी तुम्हारे सेवक हो जाते हैं। यह स्वाभाविक मार्ग है। ये शक्तियां तुम्हें ढूँढ़ने को विवश होंगी। तुम्हें शक्तियों को न ढूँढ़ना चाहिये।
प्रेतविद्या की शक्ति को बढ़ाना क्या उचित है? इस शक्ति ही के लिये इसका बढ़ाना दुनियादारी है। वेदान्त कहता है तुम मृतों से वार्तालाप कर सकते हो, निस्सन्देह यह संभव है, किन्तु जीतों से व्यवहार करना क्या उतना ही अच्छा, बल्कि ज़्यादा अच्छा नहीं है? यह ज्ञातव्य है कि मरे हुए हमारे पास आते हैं, या हमारा अपना आप ही उन रूपों को ग्रहण कर लेता है। वेदान्त का सिद्धान्त है कि यदि स्थूल भौतिक जगत की दृष्टि से तुम सूक्ष्म जगत (प्रेत-दुन्या) पर दृष्टि डालते हो, तो तुम कह सकते हो कि प्रेत तुम्हारे पास आते हैं, किन्तु तत्व दृष्टि से ये नाम मात्र स्थूल भौतिक जगत के लोगों का भी यह बयान करना गलत है कि, "अमुक व्यक्ति मुझसे मिलने आया था"। तत्व की दृष्टि से वे गलत हैं, क्योंकि वह केवल तुम्हारा अपना आप ही है जो तुम्हारे सामने, तुम्हारे ऊपर, तुम्हारे नीचे खड़ा होता है, और अन्य कोई नहीं। इन सब वाह्य
विविध रूपों में स्वयं तुम ही आविर्भूत होते हो। वेदान्त के अनुसार वन्धु. मित्र तुम हो। वस्तुतः यह कहना सत्य नहीं है कि प्रेत आते हैं, दूसरे रूपों और दूसरा छायाओं में वे खुद हम ही होते हैं।
मानसिक (वा प्रेत-विद्या की) शक्ति प्राप्त करने के निमित्त कोई नियत उपाय अनुसरण करने के लिये हैं? हाँ हैं। यदि कोई इंजीनियर बनना चाहता है तो उसे तत्सम्बन्धी शिक्षा-विशेष प्राप्त करनी होती है, यदि कोई वैद्य होने की इच्छा रखता है तो उसे वैद्यक महाविद्यालय में जाना होता है। इसी तरह इन प्रेत सम्बन्धीय चमत्कारों को देखने के लिये हमें विशेष शिक्षा पानी होगी, किन्तु इस समय उसके बताने की ज़रूरत नहीं है। राम छाया-मूर्तियों या भूत-प्रेतों के पीछे दौड़ने या परेशान होने की सिफारिश न करेगा। जहां कोई पवित्र पुरुष रहता है, वहां जाने की उनकी हिम्मत नहीं पड़ती।
राम एक बार हिमालय की एक गुफा में रहा था जो प्रेतों का निवास-स्थान होने के कारण विख्यात थी। आस-पास के ग्रामों में बसनेवाले लोगों का कहना था कि अनेक साधु एक रात उस गुफा में रह कर मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं। कुछ दर्शकों के डरकर मूर्छित हो जाने की बात भी कही जाती थी। जब राम ने उस गुफा में रहने की इच्छा प्रकट की तो हरेक व्यक्ति आश्चर्य में डूब गया। राम कई महीने उस गुफा में रहा और एक भी प्रेत या भूत नहीं आया। मालूम पड़ता है कि वे सब भाग गये थे। गुफा के भीतर सांप और बिच्छू थे, और उसके बाहर चीते थे। वे पास पड़ोस से गये नहीं, किन्तु राम के शरीर को कभी कोई हानि नहीं पहुँचाई
वेदान्त सिद्ध करता है कि स्वतंत्र या जीवनमुक्त लोग मृत्यु के बाद प्रेतयोनि कदापि नहीं पाते, अपनी ही कल्पनाओं के गुलामों को केवल भूतों या प्रेतों का जामा धारण करना पड़ता है। उन छायात्मक आकारों में केवल आसक्त प्राणी को बंधना पड़ता है।
वार्तालाप करने वालों में शिरोमणि डाक्टर जाह्नसन ने, जिससे कोई तर्क में पार नहीं पासकता था, क्योंकि "यदि उसकी पिस्तौल का निशाना चूक जाता तो वह उसके रुख से तुम्हें ज़मीन पर लिटा देता," बाद-विवाद में प्रतिपक्षी को बिना चुप किये कभी न हटनेवाले जाह्नसन ने, स्वप्न में बर्क से अपने को परास्त होते देखा। जाह्नसन के जैसे चरित्र के मनुष्य के लिये यह स्वप्न बड़ा ही खराब स्वप्न था। वह उठ बैठा और बेचैन होगया, वह फिर न सो सका। किन्तु मन अपनी प्रकृति—दैवी प्रकृति—के अनुसार अधिक काल तक खिन्न नहीं रह सकता था। उसे अपने को क़ाबू में लाना बड़ा, किसी न किसी तरह उसे क़ाबू में लाना पड़ा, किसी न किसी तरह उसे अपने को तसल्ली देना पड़ी। उसने विचार किया और इस नतीजे पर पहुँचा कि बर्क की युक्तियां भी मेरे ही मन की उपज थीं, असली बर्क उनके सम्बन्ध में कुछ भी नहीं जानता था। इस तरह उसने खुद ही अपने सामने बर्क के रूप में उपस्थित होकर अपने को नीचा दिखाया था। इसी प्रकार से तुम्हीं स्वयं अपने सामने भूतों, प्रेतों, शत्रुओं, मित्रों, राक्षसों, भीलों, नदियों, पहाड़ों के रूप में प्रकट होते हो। स्वप्नों में तुम नदियां और पहाड़ देखते हो। यदि वे तुमसे बाहिर हों तो बिछौने को नदी के जल में भरपूर हो जाना चाहिये और
पतंग को कमरे के साथ ही तुम्हें दिखाई पड़ने वाले पहाड़ के बोझ से दब कर चकनाचूर हो जाना चाहिये। भारी २ पर्वत और बढ़ते हुए नद सब तुम्हारे भीतर हैं। तुम अपने आप के दो टूक कर लेते हो, एक ओर तो बाहरी व्यापार (कर्म) और दूसरी ओर क्षुद्र विचार करनेवाला गुमाश्ता (कर्ता)। वास्तव में कर्ता भी तुम्ही हो और कर्म भी तुम्ही। तुम ही आत्मा हो और तुम ही नाममात्र अनात्मा हो। तुम ही सुन्दर गुलाब हो और प्रेमी बुलबुल भी तुम हो। तुम फूल हो और भौंरा भी तुम हो। हरेक चीज़ तुम हो। भूत और प्रेत, देवता और देवदूत, पापी और महात्मा, सब तुम्ही हो। इसे जानो, समझो, अनुभव करो, और तुम मुक्त हो। यह है संन्यास (त्याग) का मार्ग। अपना केन्द्र अपने से बाहर मत बनाओ, ऐसा करने से तुम गिर पड़ोगे। अपना पूर्ण विश्वास अपने में रक्खो, अपने केन्द्र में बने रहो, फिर तुम्हें कोई भी चीज़ न हिला सकेगी।
ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
श्री: