चरित्र सम्बन्धी आध्यात्मिक नियम।
17 दिसम्बर 1902 को हरमेटिक ब्रादरहुड हाल, सैन फ्रांसिस्को में दिया हुआ व्याख्यान।
जिस मनुष्य ने अपने को एक बार जान लिया है उसके लिये फिर ऐसी कौन सी बस्तु संसार में रह जाती है जिसकी इच्छा की जाय? साम्राज्य के खज़ानों में भी कुछ नहीं, सारे विश्व-ब्रह्माण्ड की कोई भी बस्तु उसका ध्यान नहीं खींच सकती। दुनिया की कोई भी सुन्दरता और मनोहरता उसका ध्यान नहीं आकर्षित कर सकती, ज्ञान के समस्त भाण्डारों की कोई भी बस्तु उसे नहीं लुभा सकती। अरे! कैसा सुख, कितना परमप्रमोद, कैसा पूर्ण आनन्द है, और कितना अवर्णनीय है! वह भाषातीत और अनिर्वचनीय है। वह अनन्त हर्ष, वह परम आनन्द, वह असीम सुख तुम हो, वह तुम्हारा असली अपना आप (स्वरूप) है, वह है तुम्हारी आत्मा।
यह जानते ही तुम समस्त ज़रूरतों तथा आवश्यकताओं से ऊपर जा खड़े होते हो। इसे पाते ही अखिल विश्व तुम्हारा हो जाता है।
दुनिया के प्रपंचों, छायाओं, अगियाबैतालों (will o' the wisps) के लिये इस अनन्त सुख, इस परम आनन्द को छोड़ कर, ओह! लोग भयंकर भूल करते हैं, अरे! बड़ी गलती करते हैं। यह सम्पूर्ण सुख तुम्हारा है, तुम वही हो। उसकी तलाश क्यों नहीं करते? अपने जन्म-स्वत्व पर क़ब्ज़ा करो।
ईसा (Esaw) की तरह लोग अपने जन्मजात स्वत्व (birth right) को पेट (भोजन) के लिये बेंच देते हैं।
जूदास इस्कैरियट (Judas Iscariot) ने चाँदी के तीस टुकड़ों (रुपयों) के लिये ईसा मसीह को बेंच दिया था। अपने असली आत्म स्वरूप ईसा को, प्रभुओं के प्रभु को, इस दुनिया के मायावी सुखों के लिये न बेंचो, अक्लमन्द बनो, अधिकतर बुद्धिमान बनो।
सच्चा सुख तुम्हारे भीतर है, दैवी अमृत का महोदधि तुम्हारे भीतर है। उसे अपने भीतर ढूँढो, उसे मालूम करो, उसे मालूम करो, वह यहीं है, तुम्हारा "स्वरूप"। वह शरीर, मन, बुद्धि नहीं है। वह न अभिलाषायें है और न अभिलाषी, और न इच्छित पदार्थ ही। तुम इन सब से ऊपर हो। वे सब तो आविर्भाव मात्र हैं। तुम हँसते हुए फूल के रूप में, चमकते हुए तारागणों के वेष में प्रकट होते हो। दुनिया में है ही क्या जो तुम्हें किसी भी वस्तु का अभिलाषी बना सकता है?
ज़रा ॐ का उच्चारण करो, जाप करो, और जब जपो तब अपना सारा चित्त उसमें लगा दो, अपनी सब शक्तियां उसमें भर दो, अपना पूरा अन्तःकरण उसमें रख दो, उसका अनुभव करने में अपने पूरे बल का प्रयोग करो। इस "ॐ" अक्षर का अर्थ है 'मैं वह हूँ,' 'मैं और वह एक हैं,' ॐ, 'वही मैं हूँ'। ॐ, ॐ। यदि संभव हो तो ॐ जपते समय अपने चित्त के सामने अपनी सब कमज़ोरियों और अपने सब प्रलोभनों को तलब करते रहो। उन्हें अपने पैरों से कुचल दो, उन्हे चूर करके बाहर निकालो, उनसे ऊपर उठो और विजयी होकर आओ।
भारत में पुराणों में एक सुन्दर कथा है। उसमें कृष्ण के
यमुना में फांदने का ज़िक्र है, जिससे पास खड़े हुए उनके पिता, माता, मित्र और कुटुम्बी आश्चर्य से अवाक् (गूंगे) रह गये। उनकी मौजूदगी ही में वे धारा में कूद पड़े। उन्हों (माता, पिता, आदि) ने समझा कि वह गया, वह अब कभी न बाहर निकलेगा। कथा कहती है कि वे (कृष्ण), नदी की तह पर पहुँचे, जहां एक हज़ार फना नाग था। कृष्ण अपनी बांसुरी बजाने लगे, वे ॐ मंत्र गाने लगे, वे नाग के फनों को ठोकराने लगे, वे एक एक करके नाग के सिरों को मर्दने लगे। किन्तु ज्योंही उन्हों ने एक एक करके नाग के अनेक फन चूर्ण किये, त्योंही दूसरे फन निकल आये और इस तरह उन्हें बड़ी कठिनता पड़ी। कृष्ण नाग के फनदार सिरों पर कूदते और नाचते रहे, वे अपनी बांसुरी में मंत्र गाते रहे, वे अपना मंत्र जपते (उच्चारण करते) और फिर भी कूदते तथा नाग के सिरों को रौंदते रहे। आध घंटे में नाग मर गया। मुरली के मनोहर स्वर और कृष्ण के चरणों द्वारा नाग के मर्दन से कोई प्रयोजन नहीं, नाग मर गया। नदी का जल रक्तमय हो गया और नाग का रुधिर नदी के जल में मिल गया। नाग की सब नागिनियां कृष्ण की पूजा करने को आईं, कृष्ण की मधुर उपस्थिति का अमृत वे पान करना चाहती थीं। कृष्ण नदी से बाहर निकले, आश्चर्य-चकित सम्बन्धी और मित्र अपने आपे में आये, अपने प्यारे कृष्ण को पाकर, अपने प्रेमपात्र को फिर अपने बीच में देख कर वे ऐसे प्रसन्न हुए कि उनके उल्लास की सीमा न रही। इस कहानी के दोहरे अर्थ हैं। यह, मानो, उनके लिये एक शिक्षा-प्रद पाठ है जो अपनी आत्मा में सत्यता का ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं।
कथा में भील या नदी चित्त की स्थानापन्न है, अथवा,
मन भील है, और जो कोई कृष्ण बनना चाहता है (कृष्ण शब्द देवता, ईश्वर का स्थानीय अथवा अर्थवाचक है), जो कोई खोये हुए स्वर्ग को फिर पाना चाहता है, उसे अपने आप ही में गम्भीर-गोता लगाने के लिये अपने चित्त की भील में गहरा उतरना पड़ेगा। उसे अपने ही स्वरूप में गहरी डुबकी लगानी होगी, तल पर पहुँच कर उसे विषधर नाग का, राग और इच्छा के ज़हरीले सांप का, दुनियादार मन रूपी विषधर भुजंग का मुक़ाबला करना होगा। उसे उसका मर्दन करना होगा, उसके फनों को विनाश करना होगा, उसके अनेक सिरों को ठोकराना होगा, उसे उसको मुग्ध और नष्ट करना होगा। उसे मन की भील को साफ करना चाहिये, उसे इस प्रकार अपना मन निर्मल करना चाहिये। विधि वही है जिसका कृष्ण ने अनुसरण किया था। उसे अपनी बांसुरी लेकर उसमें ॐ मंत्र बजाना होगा। उसे उस (बांसुरी) के द्वारा उस दिव्य, उस कल्याणकारी गीत को गाना होगा।
यह बाँसुरी क्या चीज़ है? तुम्हारे लिये यह केवल एक चिह्न है। बाँसुरी की ओर देखो। भारतीय कवि उसे बड़ा महत्त्व देते हैं। वह कौन सा महान् काम मुरली ने किया था जो उसे इतना ऊँचा पद मिला? किस महान् कर्म के बल से उस (बांसुरी) ने इतना ऊँचा आसन पाया? जो कृष्ण पूजनीय थे, अति शक्तिशाली सम्राटों के प्रेम-भाजन थे, विशाल भारत में सहस्रों सुन्दरियाँ जिनकी उपासना करती थीं, जो कृष्ण प्रिय थे, शक्तिशाली थे, प्रेम की मूर्ति थे. बड़े बड़े महाराज और सम्राट जिन (कृष्ण) की दयादृष्टि के भिखारी रहते थे, वही कृष्ण इस बाँसुरी को क्यों चूमते थे? ऐसे गौरव के स्थान पर उस बाँसुरी को किसने पहुँचाया?
बाँसुरी का उत्तर था "मुझ में एक गुण है, एक अच्छी बात मुझ में है। मैंने अपने को सब पदार्थों से खाली कर लिया है।
बाँसुरी सिर से पैर तक खाली है। "मैंने अपने को अनात्मा से खाली कर दिया"। इसी तरह मुरली को अधरों में लगाने का अर्थ मन को शुद्ध करना, मन को परमात्मा में लगाना है, हरेक वस्तु को परमात्मा के, यार के चरणों में भेंट करना है। अपने सच्चे दिल से त्याग करो। देह पर कोई दावा न रक्खो, सारी स्वार्थपरता, सब स्वार्थ पूर्ण सम्बन्ध, मेरा और तेरा के सब विचार त्याग दो। इससे ऊपर उठो। ईश्वर का आराधन करना, "उसका" इस तरह पर आराधन करना जिस तरह पर कोई दुनियादार आशिक़ (प्रेमी) भी अपनी प्रिया से नहीं करता; सच्चे आत्मा के अनुभव के लिये उसी तरह भूखे और प्यासे होना जिस तरह पर दुनियादार आदमी उस वस्तु के लिये विकल और लालायित होता है जो उसे बहुत दिनों से नहीं नसीब हुई है, परमेश्वर के लिये भूखे और प्यासे होना; सत्य की उत्कंठा करना, अपने परम स्वरूप का आनन्द लेने के लिये उत्सुक होना, चित्त को ऐसी अवस्था में लाना ही बाँसुरी को अधरों में लगाना है। मन की इस दशा में, चित्त की इस शान्ति में ऐसे शुद्ध अन्तःकरण से ॐ मंत्र का उच्चारण करो, पवित्र ॐ अक्षर का गान आरम्भ करो। यही है बाँसुरी में संगीत की सांस डालना। अपने सम्पूर्ण जीवन को बाँसुरी बना डालो। अपने समग्र शरीर को बाँसुरी बना दो। उसे स्वार्थपरता से खाली कर दो और उसे ईश्वर के श्वास से भर दो।
ॐ का उच्चारण करो (जप करो) और जपते समय अपने मन की भील के भीतर वह अन्वेषण शुरू करो। अनेक जीभों वाले विषैले सांप को ढूँढ़ निकालो। अगणित ज़रूरतें,
सांसारिक प्रवृत्तियाँ, और स्वार्थ पूर्ण वृत्तियाँ इस ज़हरीले सांप के शिर, जिह्वा और विषदन्त हैं। ॐ अक्षर जपते हुए उन्हें एक एक करके धूल में मिलाओ, अपने पैरों से उन्हें कुचलो, एक एक को छाँट लो, उन्हें जीत लो और नाश कर डालो।
आचरण निर्माण करो (वा चरित्र ठीक करो), निश्चयों को दृढ़ करो, प्रबल प्रतिज्ञायें और गम्भीर संकल्प करो, इस लिये कि जब तुम भील या नदी से बाहर आओ, तब तुम जल को विषाक्त (विपलिप्त) न पाओ, इस लिये कि जो कोई उस पानी को पिये, उसे ज़हर न चढ़े। उस (जल) को पूरी तरह से साफ करके (चित्त रूपी) भील से बाहर आओ। लोगों का चाहे तुम से मत भेद हो, वे चाहे तुम्हें सब तरह की मुसीबतों में डालें, वे भले ही तुम्हें बदनाम करें, किन्तु उनकी रीभ और खीभ, उनकी धमकियों और मधुर वचनों के होते हुए भी तुम्हारे चित्त की भील से दिव्य अत्यन्त निर्मल, ताज़े जल के सिवाय और कुछ नहीं बहना चाहिये। तुमसे अमृत बहना चाहिये; जिससे तुम्हारे लिये वैसा ही असम्भव हो जाय जैसा ताज़े चश्मे के लिये उन्हें विषलिप्त करना कि जो उससे पानी पीते हैं। हृदय को विमल करो, ॐ अक्षर का गान करो, दुर्बलता के सब स्थानों को चुन कर जड़ से उखाड़ दो। सुन्दर चरित्र का निर्माण करके विजयी होकर निकलो। मनोरागों का सर्प नष्ट हो जाने पर इच्छित पदार्थों को तुम उसी तरह अपनी उपासना करते पाओगे जिस तरह पर नाग की नागिनों ने नदी-तल में श्री कृष्ण की पूजा की, जब वे भुजंग का नाश कर चुके थे।
अपने व्यवहार के लिये एक परिलेख (diagram) बनाओ और उस परिलेख में साधारण पापों तथा त्रुटियों की
तालिका को रक्खो। यह नक्शा खिच जाने पर आप सप्ताह का कोई दिन ले लें, उस दिन शायद आप को लोभ या शोक से पीड़ा पहुंची हो, तब आप सांझे लोभ या शोक शीर्षक खाने में उस तारीख की रेखा पर (X) चिन्ह बनादों, और इसी तरह पर आगे भी कर लो। यह निजी रोज़नामचा रख कर आप अपनी त्रुटियों को अपने सामने ला सकते हैं, और अपनी दुर्बलताओं के अभिमुख हो सकते हैं।
राम यह सिफारिश नहीं करता कि ये चिन्ह परिलेख में बने रहें। आज तुमसे कोई दोष बन पड़ता है, तो आप अपने प्रति सच्चे रहो और आज ही नक्षत्राकार चिन्ह बना दो। दूसरे दिन सवेरे या जिस समय तुम्हे सुभीता हो, दरवाजा बन्द कर लो, और बिलकुल अकेले बैठ कर अपने सामने नकशा खोल कर रक्खो; और उसमें तुम्हें दिखाई पड़ेगा कि तुम लोभ या शोक से अथवा किसी और दुर्गुण से दब गये; तब अपने को उपदेश देना शुरू करो।
इस देश में हमने दूसरों के अनेक उपदेश सुने। अपने समय के चाहे सब महान वक्ता आ जांय, ईसा अथवा परमेश्वर भी स्वयं चाहे आकर व्याख्यान वा उपदेश दें, किंतु दूसरे के उपदेशों से तब तक कोई लाभ नहीं हो सकता जब तक तुम अपने आप को उपदेश करने को उद्यत नहीं होते। वह ही अपने को उत्थापन (वा उन्नत) कर सकता है जो अपने को उपदेश देता है तुम जानते हो कि तुमने शोक को आत्म समर्पण किया, अर्थात् शोक के अधीन हुए। इस भावना की परीक्षा करो और इसके लक्षण तथा पूर्व लक्षणों को स्थिर करो। शोक के वश में तुम क्यों आ गये थे! कारण निश्चय करो और तब दवा ठीक करो। उस समय तुम किसी उपदेशात्मक पुस्तक का पाठ करो, भगव-
द्गीता या इंजील कह लीजिये, या इमर्सन की रचनायें, अथवा कोई भी ऐसी पुस्तकें पढ़ो जो शोक के तल से तुम्हें ऊपर उठाने वाली हों, और उनकी सहायता से तथा अपने उपदेशों, विचारों, एवं ध्यानों की सहायता से इस भावना को सदा के लिये अपने से निकाल बाहर करने का यत्न करो। यदि उस समय तुम्हें पूर्ण निश्चय हो जाय कि तुमने विजय पाई है और फिर कभी तुम न हारोगे, चाहे जो कुछ तुम पर घटे; जब तुम्हें विश्वास हो जाय कि तुम ने उसे अपने पैरों से कुचल दिया है, और कि तुम्हारी जीत हो गई है; तब नक्षत्राकार चिन्ह मिटा दो। तब तुम मुक्त हो गतकाल के लिये अपने को धिक्कारना क्यों? निर्जीव भूतकाल (अतीत) को अपना मुर्दा आप दफन करने दो।
एक एक करके इन दोषों को ले लो, हरेक का कारण और औषधि दरियाफ्त करो, हरेक के लक्षण और पूर्वलक्षण ठीक करो, अपने को उपदेश दो। किन्तु इस श्रेणी में इस प्रकार लक्षण और पूर्वलक्षण ठीक करने से पहले तुम में से हरेक को अपने को उपदेश देना चाहिये। हरेक को अपना काम आप ही करना होगा। बैठ जाओ और जिस से तुम्हें पीड़ा पहुंच रही है उस का ध्यान करो, और ध्यान करते समय ॐ का उच्चारण या गायन करो। जब ओठ उच्चारण करते हों, जव बाणी यह पवित्र अक्षर गुनगुनाती हो, जब तुम अपने संकल्पों पर दृढ़ होते हो, तब अनन्त स्वर्गीय कल्याणों का लाभ तुम्हें होता है! तुम भीतर से प्रबल होते हो। ये हैं तुम्हारे मनों की भील में उपद्रव करनेवाले नाग के कुछ फनदार सिर। उन्हें एक एक करके कुचल डालो। सब त्रुटियों का एक सामान्य कारण है, इन. सब दोषों का
एक सामान्य आधार है। और वह है अज्ञान—सब प्रकारों का अज्ञान, विशेषतः शुद्ध आत्मा का अज्ञान, सच्ची आत्मा का अज्ञान।
लोग अपने को शरीर से अभिन्न मानते हैं, उसके इर्द-गिर्द सब प्रकार के सामान जमा करते हैं, और बाहर से सुखों को प्राप्त करना चाहते हैं। वे शरीर से अनन्य होगये हैं, और शोकाकुल या दुःखित होने के योग्य हैं।
शरीर से ऊपर उठो। मालूम और अनुभव करो कि तुम अनन्त, परम आत्मा हो, और राग या लोभ से तुम कैसे प्रभावित हो सकते हो?
प्रकृति के साधारण नियमों का अज्ञान सत्यात्मा के सामान्य अज्ञान का एक विभाग है, जो लोगों को रोगी और दुर्बल बनाय रखता है। यह एक प्रकृति का पवित्र नियम है, जिसको बेकार नहीं किया जासकता। कानून यह है कि:—
"किसी प्रकार का भी दोष करो, कोई भी शरारत करो, अपने चित्तमें किसी तरहके भी अन्याय का पोषण करो, ये बुरे कर्म करो, ये पाप चाहे तुम ऐसे स्थानमें भी क्यों न करो जहाँ तुम्हें निश्चय है कि तुम्हें कोई भी पकड़े या देखेगा नहीं, जहां कोई भी तुमसे जवाब तलब न करेगा; बुराई के ये बीज जहाँ तुम्हारा जी चाहे बोवो, वह स्थान चाहे किले की तरह सुरक्षित ही क्यों न हो; पर अत्यन्त कठोर, निर्दय, अमोघ और अपरिहार्य कानून के अनुसार हवा बोने पर तुम्हें बवंडर अवश्य काटना पड़ेगा, तुम्हें चक्रवात या वातभ्रम (whirlwind) काटना ही पड़ेगा, तुम्हें पीड़ा और क्लेश भोगना पड़ेगा। पाप का पुरस्कार मृत्यु है।"
लोग इसे एक भौतिक वा आचार सम्बन्धी कानून मानते हैं और कहते हैं कि इस में गणितशास्त्र के नियमों
की सी शक्ति नहीं है। वे कहते हैं कि इसमें गणितशास्त्रीय निश्चयात्मकता नहीं है। ऐसा समझने वाले भ्रान्त हैं। अत्यन्त निर्जन गुफाओं में कोई पाप करो और तत्क्षण तुम्हें देख कर चकित होना पड़ेगा कि तुम्हारे पैरों तले की घास तक खड़ी होकर तुम्हारे विरुद्ध गवाही दे रही है। समय पर तुम देखोगे कि दीवारों और वृक्षों तक की जुबानें हैं और वे बोलते हैं। तुम ईश्वर को, प्रकृति को धोखा नहीं दे सकते। यह एक सत्य है, यह एक क़ानून है। हम केवल हृदय के अन्दर पाप करते हैं। और बाहरी दुनिया में हम अपने को व्याकुलकारी और पीड़ादायक परिस्थितियों से घिरा हुआ, कठिनाइयों में या सब तरह की दिक्कतों में पाते हैं। हम ऐसी हालत पाते हैं; और अपनी मुसीबतों के असली कारण का जिन्हें ज्ञान नहीं है वे परिस्थिति को दोष देते हैं, वे अपने आस-पास स्थितों (गिर्द निवाह) से लड़ाई ठान लेते हैं, वे नातेदारों, मित्रों, और अपने संगियों पर क़ानूनी मुकद्मे चलाते हैं। यह एक दैवी क़ानून है जिस की घोषणा सब कोनों और सब बाज़ारों में की जानी चाहिये "ईश्वर की आँखों में धूल झोंकने का यत्न करने से तुम को स्वयं अंधा होना पड़ेगा"।
नियम (दैवी विधान) है कि तुम्हें पवित्र होना चाहिये। अपवित्रता को आश्रय देने से तुम्हें नतीजे भोगना पड़ेंगे। इन अध्यात्मिक कानूनों को हम एक एक करके लेंगे और गणित शास्त्रीय निश्चयात्मकता के साथ उन्हें सिद्ध करेंगे। एक बार जब कोई मनुष्य इन अध्यात्मिक नियमों को समझ जाता है, तब फिर उसके लिये इन स्वार्थपूर्ण कामनाओं की ओर झुकना असम्भव होजाता है। इन अभिलाषाओं को वशीभूत कर लेने के बाद मन को जितनी देर तक चाहो
एकाग्र किया जासकता है।
अपने मन को जीतने के लिये क्या उपवास करना आवश्यक है?
उपवास के सम्बन्ध में राम का कहना है कि न तो भूखे मरो और न अधिक खाओ। दोनो अतियों (extremes) को बचाना होगा। कभी कभी स्वभावतः उपवास होता है, हमें अपने अन्दर भोजन न करने की स्वाभाविक इच्छा जान पड़ती है। हृदय की ऐसी स्वाभाविक वृत्तियों को मानना चाहिये। किन्तु कभी कभी आन्तरिक आत्मा तुमसे आहार ग्रहण करने को कहता है। इन सहज वृत्तियों का अनुसरण करो।
बतौर सहायता के उपवास करना चाहिये। किन्तु हमें उसके दास न बन जाना चाहिये। लोग प्रायः व्रत करते हैं, क्योंकि वे उसके लिये लाचार किये जाते हैं। तब वे उपवास की इस गुलामी के दास होजाते हैं। राम गुलामी का अनुमोदन नहीं करता। उपवास के सम्बन्ध में (भारत का रिवाज पूछो तो) भारत में भी कुछ लोग उपवास करते हैं, और वहां ऐसी विशेष तिथियां हैं जिन में खास तौर पर विशेष प्रकार का भोजन बंधी हुई मात्रा में ग्रहण किया जाता है। पूर्णमासी और प्रतिपदा। (Full moon day, new moon day) ये तिथियां हैं।
पूर्णमासी के दिन भारत में लोग ऐसा भोजन करते हैं जिससे पेट भारी न हो, और उस दिन वे खास तौर पर मन को एकाग्र करते हैं, क्योंकि वह दिन विशेषतया ध्यान के अनुकूल समझा जाता है। यदि तुम इसे प्रमाणित करने की कोशिश करो, तो तुम्हें सत्यासत्य का पता चले। ऐसा भोजन ग्रहण किया जाता है जो मनकी स्थिरता में विघ्न
नहीं डालता। प्रतिपदा का दिन और प्रतिपदा की रात दोनों मन की एकाग्रता के सहायक और एक प्रकार के विशिष्टगुण से विशेषतया सहज स्वभाव सम्पन्न हैं। सच्चे उपवास का अर्थ अपने को सब स्वार्थपूर्ण अभिप्रायों, अभिलाषाओं से मुक्त कर लेना, उन्हें पुष्ट न करना, अपने आपको उनसे पूरी तरह निर्मल कर देना है।
ॐ ! ॐ !! ॐ !!!