भारत की ओर से अमेरिका वासियों से बिनती (अपील)।
28 जनवरी 1803 को गोल्डन गेट हाल, सेनफ्रांसिस्को में दिया हुआ स्वामी राम का व्याख्यान
आज की वक्तता का विषय अमेरिकावासियों से एक बिनती है। न जाने क्यों बहुत थोड़े अमेरिका वासी आये हैं। अच्छा, कुछ परवाह नहीं, जो आये हैं, वे ही, राम की दृष्टि में केवल अमेरिका के नहीं, बालिक यूरोप और अखिल विश्व के प्रतिनिधि हैं। आज जो शब्द कहे जायँगे वे यदि इस लघु श्रोतृवर्ग के हृदय को स्पर्श करेंगे, यदि ये शब्द तुम में से किसी एक व्यक्ति के भी मर्म को भेद सकेंगे, यदि आप लोगों में से, संख्यार्थ पाँच या छः या सात भी इस काम को उठा लेंगे, अथवा इस अरण्यरोदन को सुनलेंगे, तो राम इन शब्दों को सफल समझेगा।
राम आपके अन्तरात्मा से बिनती करता है, आप के भीतर की अनन्तता से बिनती करता है, और राम का दृढ़ विश्वास है कि एक व्यक्ति के भीतर की अनन्तता भी अद्भुत और विस्मय जनक कार्य कर सकती है। कृपया वास्तविक आत्मा या अनन्तता के सामने साम्प्रदायिकता (दलबन्दी) का कोई पर्दा न डाल दीजियेगा। दया करके कम से कम एक घंटे के लिप सब पर्दे, और रंग, जाति पांति तथा मत मतान्तर के सब भेद, जिनके कारण लोग किसी अपरिचित (बिदेशी) की बातें राज़ी से नहीं सुनने पाते, दूर कर दीजियेगा और मिटा दीजिये।
भारत का पूर्व कार्य (भूतकाल का)।
भारतीय बुद्धिमता के श्रेष्ठ रत्नों की चर्चा राम प्रायः दो महीनों से तुम से कर रहा है, भारतीय धर्म ग्रन्थों का पुष्टिकर अमृत, बलकारी दुग्ध, तुम्हें पहुँचा रहा है। राम आज तुम से, उस खान के सम्बन्ध में जिससे ऐसे रत्न निकले थे, उस गौ के विषय में जिसने यह दूध दिया था, कुछ कहना चाहता है। राम आज तुम से, उस देश के सम्बन्ध में जिसने पहले इस सत्य का प्रचार किया था, उस भूमि के विषय में जो संसार के सब धर्मों की जननी है, कुछ कहना चाहता है। हां, भारत ने, चाहे प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से, संसार को सब धर्मों का दान दिया। राम तुमसे उस भूमि के सम्बन्ध में कुछ कहना चाहता है, जो आपको अब भी यूरोप और अमेरिका में नित्य उपजने वाले आप के सब नवीन धर्म और सम्प्रदाय दे रही है। तुम्हारा सब नवविचार (नवीन मत, New Thought), थियोसोफी (Theosophy) स्पिरिचुअलिज़्म (अध्यात्मवाद बा प्रेत-वाद Spiritualism) इसाई विज्ञान (Christian Science), मानसिक रोगशमन (mental Healing) वे सब जिनका तुम्हें आज गर्व है, ये सभी बिना अपवाद के, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर मूल में भारत से उत्पन्न हुए हैं। राम तुम से उस भूमि के सम्बन्ध में कह रहा है जिसने भूत या वर्तमान काल में संसार को उसके सकल दर्शन-शास्त्र दिये हैं। अफलातू सुकरात, पिथागोरस, प्लोटिनस, (Plato, Socrates, Pythogoras, Plotinus) सरीखे आपके यूनानी तत्त्व-वेत्ता ये सब अपनी ज्ञान राशि (inspiration दैवज्ञान) के लिए भारत के ऋणी हैं। दर्शन शास्त्र के इतिहास से यह स्पष्ट होता है। शोपेनहावर, श्लेगल, शैलिंग,
एमकुज़िन इत्यादि (Schopenhauer, Schlegal, Schelling, M Cousin, etc.) ये लोग स्वीकार करते हैं कि वे अपने ज्ञान के लिए भारत के, वेदान्त, सांख्य, बौध धर्म, उपनिषदों, या गीता के ऋणी हैं। तुम्हारा आधुनिक अद्वैतवाद, वह चाहे अमेरिका या इंग्लैंड या जर्मनी कहीं का भी हो, भारतवर्ष से अपना प्रकाश प्राप्त करता है। राम तुमसे शंकर और कृष्ण की भूमि का ज़िक्र कर रहा है; जिस भूमिने उन उच्च विचारों और उदात्त कल्पनाओं का प्रवर्तन किया जिनसे तुम्हारे बन्दनीय इमर्सन, वाल्ट व्हिटमैन, सर एडविन आर्नल्ड और मैक्समूलर (Emerson, Walt Whitman, Sir Edwin Arnold, and Maxmuller) उत्तेजित वा प्रबोधित और उत्साह से परिपूर्ण हुए, जो न केवल काव्य और दर्शनशास्त्र की ही भूमि है, जो न केवल श्रेष्ठ विचार और उदात्त कल्पनाओं की ही भूमि है, वरन् जो उतने ही दर्जे पर शौर्य और शारीरिक बल की भी भूमि है। शारीरिक शक्ति और तेज की भूमि — ये शब्द सुनकर आप चकित होंगे। आज कल भी, कौन लोग अंग्रेज़ी सरकार के सब से बड़े सहायक और रक्षक हैं ! ये पूर्वीय भारत के सिख, गोरखे, मरहटे और राजपूत हैं। उन सब अवसरों पर जब अंग्रेजों का बड़े भयंकर शत्रु से सामना होता है, तब भारत के ही सिपाही युद्ध के वेग को सम्हालते हैं। राम उस भारत की तुम से चर्चा कर रहा है जो किसी समय सब देशों से अधिक धनाढ्य था। भारत से पल कर, राष्ट्र के वाद राष्ट्र समृद्ध हुए। अति कमनीय भारत की ही खोज में कोलम्बस को अमेरिका का पता लगा। शुरू में अमेरिका का नाम भारत था। राम तुम से उस भूमि की चर्चा कर रहा है जो एक समय संसार
में सर्वोपरि थी। वह संसार में रमणीक वनों और शस्यपूर्ण (fertile) खेतों से आच्छादित महान् हिमालय से सम्पन्न, अत्यन्त उन्नत और उत्कृष्ट देश था। किन्तु राम का इतना ही मतलब नहीं है। वह (भारत) न केवल शरीर से ही बालिक बुद्धि, सदाचार, और अध्यात्म विद्या में भी संसार का शिरोमणि था। आज वह भूमि संसार का पाद है। ऐ अमेरिका वासियो ! तुम आज संसार के शिर हो, और भारत की स्थिति इसके बिलकुल प्रतिकूल है, भारत तुम्हारा चरण है। राम तुमसे एक बिनती करता है। ऐ शिर ! शिर !! यदि तू बलवान और स्वस्थ होना चाहता है, तो तुझे पैरों की खबर लेनी चाहिए। यदि पैर, घातिग्रस्त या चुटैल (चोट खाय) हों, तो शिर भी पीड़ित होगा। यदि पैरों में दर्द है, यदि पैर पीड़ित हैं, तो क्या शिर को उससे हानि न पहुँचेगी? ऐ शिर! तेरे प्रतिकूलस्थों (antepodes) की ओर से राम तुझसे विनती करता है। जिस माता ने अपने तत्वज्ञान और काव्य से, अपने उच्च विचारों और धर्म से समग्र संसार को पाला था, विश्व का वह माता, संसार की वही प्राचीन पालनहारी, आज बीमार है। तुम्हारी माता आज रोगिनी (sick) है। सब से बड़ा वंश (scion), आर्य परिवार की सब से बड़ी बहन, जो पूर्वीय भारत है, वह आज रोगग्रस्त है। क्या तुम उसकी खबर न लोगे? वह कामधेनु बीमार है। वह मरी नहीं है। वह रोगग्रस्ता है। तुम उसकी सहायता कर सकते हो। तुम उसे चंगा करने में सहायक बन सकते हो। भारत संसार को दृग्ध, पुष्टिकर भोजन, बलकारी औषधि, ईश्वर-प्रेरित वा दैवज्ञान (inspiring knowledge) देता रहा है। वही भारत आज गौ की तरह, सेवा शुश्रूषा की अपेक्षा कर रहा है। यह गौ भोजन के लिए हाय हाय कर रही है, क्षुधा
पीड़ित है, भूख और प्यास से मर रही है। तुम्हें उसको घास और चारा खिलाना है। संसार भर उससे दूध और बलकारी भोजन लेता रहा है, उसे सस्ती घास दो, उसे ऐसी कोई चीज़ दो कि वह जीती रहे। हे गोमांस-भक्षक इंग्लैंड, मांसाहारी यूरोपीय देश कहेंगे हम इस गौ को खिलाना नहीं चाहते, हम उसे मारकर खाना चाहते हैं। बहुत अच्छा, तुम्हारे जो मन भाव तुम करो। किन्तु एक बात याद रक्खो, वह यह कि यदि तुम उसे मार कर खाना भी चाहते हो, तो भी तुम्हें उसकी तन्दुरुस्ती का खयाल रखना चाहिए। रोगी गौ का मांस तुम्हारे स्वास्थ्य को बरबाद करदेगा, तुम्हारे लिए हानिकारक होगा। अरे इंग्लैंड और यूरोपीय राष्ट्र! यदि तुम उसे जीता ही रखना चाहते हो, तो तुम्हें उसके स्वास्थ्य की चिन्ता करनी होगी।
अमेरिका से आशा।
अमेरिका वासियों के सामने, इस युग के शूरवीर अमेरिका वासियों के सामने, स्वार्थ त्यागी अमेरिकनों से, महानुभाव अमेरिकनों से, जो सत्य के नाम में (निरीक्षणार्थ) चीड़-फाड़ के लिए अपने शरीर दे देते हैं, राम भारत की ओर से विनती करता है। अभी उसी दिन एक महानुभाव अमेरिकन ने सत्य का पक्ष पुष्ट करने के अभिप्राय से चीड़-फाड़ के लिये अपना जीवन अर्पण किया। पदार्थ विज्ञान पर अपना बलिदान करने वाले अमेरिका वासियो! राम तुम अमेरिकनों से विनती करता है। कहो, अमेरीकावासियों, क्या तुम न सुनेंगे? कहो, अमेरिका के समाचार पत्रों,! क्या तुम सवाल न पूरा करोगे? राम के शरीर को जाने दो, राम को कुचल डालो, उसके टुकड़े टुकड़े कर दो, उसे खण्डों में काट डालो, इस शरीर को तुम्हारा
जो जी चाहे कर डालो किन्तु भारत के पक्ष को अपनालो, सत्य के पक्ष को अपना लो। अमेरिकनों को, कि जिन्हों ने गुलामी को मिटा दिया; अमेरिकनों को, कि जो आज इस देश में जाति-भेद को तोड़ रहे हैं; ऐसे धन्य अमेरिकनों को, ध्यान देने के लिए भारत पुकार रहा है।
मान लीजिये कि भारत बहुत ही खराब है, मान लीजिये कि भारत ने संसार को कुछ भी नहीं दिया था, मान लीजिये कि हिन्दू दुनिया में अत्यन्त निकृष्ट लोग हैं, तब तो तुम्हारे ध्यान पर और भी अधिक [अस्पष्ट], यह तो प्रबलतम कारण है कि तुम उसकी सेवा शुश्रूषा वा सहायता का ख्याल करो।
यदि कोई मनुष्य बीमार है तो वह केवल अपने ही को हानि नहीं पहुँचाता, बल्कि उस रोगको सारे संसार में फैलाता है। यदि एक व्यक्ति सर्दी (श्लेष्मा) से व्यथित है, दूसरे उसके संसर्ग से रोगी हो जाते हैं। भारत सर्दी से व्यथित हो रहा है। आप कह सकते हैं कि किसी गर्म और आतपव्याप्त (Sunny) देश को सर्दी कैसे दबा सकती है? वे जाड़ की सर्दी से नहीं पीड़ित हैं किन्तु वे ठिठुरन (तेज हीनता), दरिद्रता, और गरीबी की सर्दी से दुःखी हैं। अब आप जानते हैं कि यदि एक मनुष्य सर्दी से परेशान है, तो उसके पड़ोसियों को भी उसकी सर्दी व्यापेगी। यदि एक मनुष्य हैज़े (विसूचिका cholera) से हैरान है, तो उसका रोग दूसरों को जा दबावेगा। यदि एक मनुष्य चेचक से पीड़ित है तो दूसरों को छूत लगेगी। रोगी को उठा कर खड़ा करने में सहायता देना हरेक का और सबका कर्त्तव्य है, यदि उसके ही हित के लिये नहीं, तो सारे संसार के लिए अवश्य। यदि तुम उन्हें रोग या बीमारी से भुगतने देते हो, तो सारे संसार में तुम दुर्बलता फैलने
देते हो। (अत एव) समग्र संसार के हितार्थ राम तुमसे भारत का पक्ष लेने को कहता है। सत्य और न्याय के नाम में राम तुमसे दिलो-जान से भारत का पक्ष ग्रहण करने की प्रार्थना करता है।
आप पूछेंगे, भारत पर क्या मुसीबत है? रोग राजनैतिक, सामाजिक और धार्मिक है।
भारत की राजनैतिक अवस्था।
उस अन्धकार ग्रस्त भूमि की दारुण राजनैतिक दुर्दशा के वर्णन में राम अधिक समय न लगावेगा। जिस देश में लाखों मनुष्य दुर्भिक्ष से मर रहे हैं, जहां क्षुधा और भोजनाभाव नून्न, अपरिपक्व लड़कों और लड़कियों का सञ्चय करते रहते हैं (अर्थात् जहां क्षुधा और भोजनाभाव के कारण छोटे छोटे बच्चे तथा नवयुवक आये दिन मृत्यु को प्राप्त होते रहते हैं), जहां गरीबी और महामारी होनहार युवकों को कली की अवस्था में ही नष्ट कर देती है; जहां नन्हा, कोमल बच्चा सूखे, लटके हुए ओठों से रोता है क्योंकि दुर्भिक्ष पीड़िता माता दूध के अभाव से उसे पाल नहीं सकती; जिस देश में मुश्किल से एक भी ऐसा आदमी है जो दोनों (आय और व्यय के) सिरों को मिला सकता है, अर्थात् अपनी आय पर निर्वाह कर सकता है; जहां किसी तरह पेट पालता हुआ मनुष्य खूब सम्पन्न समझा जाता है; जहां राजा और राजकुमार भी प्रायः दुःखद आर्थिक संकटों में फँसे पाये जाते हैं; जो देश अपनी शिकायतों और पीड़ाओं की चिन्ता न करता हुआ, भक्त, वफादार, और धीर है; ऐसी भयंकर गरीबी के देश में, दयालु सरकार, दीनता जनक (राज्य-) करों के अतिरिक्त, हाँफते हुए मजूरों की खुलसी हुई खाल और जमे हुए खून से करोड़ों रुपया
खसोट और निचोड़ लेना अनिवार्य आवश्यकता समझती है, केवल एक नाम और रूप की महिमा-वृद्धि और अभ्युदय के लिए, कपड़ों के एक जोड़े (समूह) का उत्सव मनाने के लिए, मांस के एक पिंड को देवता बनाने के लिए, कि जिसे वे इंग्लैंड का महाराजाधिराज अभिषिक्त करने में अति प्रमोद (गर्व) करते हैं। इस भयंकर और महान् तमाशे तथा दिखावे के साथ २ मूर्खतापूर्ण फजूलखर्ची के हज़ारों छोटे-मोटे ढँग देश का शोषण कर रहे हैं, और उसके जीवन-रक्त तथा रस को चूस रहे हैं। अच्छी आमदनी के सब ऊँचे ओहदे एक मात्र अंग्रेज़ों के अधिकार में हैं। समाकुल (teeming) तीस कोटि मनुष्यों का एक भी प्रति-निधि पार्लामेंट (इंग्लैंड की पंचायती महासभा) में नहीं है। समस्त देशी उद्योगों को अंग्रेज़ों ने पस्त कर दिया है। भारतीय पैदावार की मलाई खा खा कर जाह्नबुल (इंग्लैंड) मोटा हो रहा है। गरीब हिन्दू के हिस्से में सूखा भूसा और मैला पानी पड़ता है, और बहुधा तो वह भी नहीं मिलता है। समस्त देशी कला-कौशल, उद्योग-धंधे और शिल्प-कर्म नीरस होगए हैं। एक मात्र स्वाधीनता, जिसे लोग भोग सकते हैं, बल्कि एक मात्र मायात्मक (illusory) स्वाधीनता जो उनकी तन्दुरुस्ती, दौलत और सदाचार को नष्ट और भोग करती है (वह है भूठी आज़ादी की राक्षसी भावना), जो उन तेज़ अंग्रेज़ी शराबों और बिनाशकारी अंग्रेज़ी मदिराओं से अर्जा ली गई है, जिनका प्रचार स्वभाव से ही नशे से परहेज़ करने वाले भारतवासियों में खूब बढ़ाया जाता है। इन शराबों का प्रचलन अंग्रेज़ों ने किया है। इस से तुम्हें भारत की राज-नैतिक दुरावस्था की कल्पना हो सकती है। यह गति तुम्हें उनकी बाहरी हालत बताती है।
जिन आन्तरिक मुसीबतों से वे (भारतवासी) कष्ट पा रहे हैं, अब उनसे राम तुम्हारा परिचय करावेगा। अब उनके पतन के भीतरी, असली, तथा उनकी कठिनाइयों और निराशा के भीतरी या मुख्य, कारण के सम्बन्ध में तुम्हें कुछ बताया जायगा। इस विषय पर बहुत कुछ कहा जा सकता है, किन्तु सारा मामला विस्तार के साथ सुनने के लिए काफी समय लोगों के पास नहीं है, इस लिए हरेक चीज़ राम को छिलके में बीजवत् अर्थात् अत्यन्त संक्षिप्त रूप से कहनी होगी।
भारत के पतन की, गिराव की, व्याख्या वेदान्त दर्शन यों करता है। कि यह अपने कर्मों की बात है। कर्म का अर्थ है कोई ऐसी चीज़ जो अपनी करनियों से संघटित हुई हो। कर्म का शाब्दिक अर्थ है काम, हमारी अपनी करनी। यह जो वे आज काट रहे हैं वही है जो उन्हों ने उस दिन अपने लिए बोया था। हिन्दुओं ने भारत के आदिम निवासियों (aborigines) से जैसा बर्ताव किया था, वैसा ही बर्ताव अब वे विजयी राष्ट्रों से पा रहे हैं। जिस तरह हर बीमार, अपनी बीमारी का ज़िम्मेदार है, अज्ञानता से, अति भोजन करके, या तन्दुरुस्ती के कानूनों को तोड़ कर, अपने को बीमार करता है, उसी तरह भारतवासी अज्ञानता के कारण अपने ही कृत्यों के कारण बीमार हैं, रोगी हैं।
किन्तु बीमारी किसी तरह से आई हो, रोगी को जाकर ऐंठा-ऐंठी वैद्य का काम नहीं है, वैद्य का काम है रोगी का दिल बढ़ाना, उसे चंगा करना। रोगी को फटकार कर तुम रोग को और भी खराब कर देते हो, रोगी की बीमारी बढ़ा देते हो। उनके कुकर्मों और अपराधों के लिए उन पर दोष लगाने का यह समय नहीं है।
हमारा और तुम्हारा कर्त्तव्य उन्हें मुसीबत से निकाल लेना है।
भारतीय जाति-भेद की जड़।
अर्थ शास्त्र हमें श्रम-विभाग (division of labour) की बावत बतलाता है। सारे रोज़गार के फलने-फूलने के लिए किसी कारखाने या पुतलीघर में काम का विभाग हो जाना चाहिए। तुम्हारी अपनी देह में ही श्रम का विभाग है। आँख केवल देखती है, सुनती नहीं। कान केवल सुनते हैं, वे नेत्रों का काम नहीं करते। हाथ पैरों का काम नहीं करते। पैरों और हाथों को अपना अपना विशेष काम करना पड़ता है। यदि हम आँखों से सुनना और नाक से चलना चाहें, या यदि हम हाथों से सूँघना और कानों से भोजन करना चाहें, तो क्या यह वांछनीय है? नहीं। यह तो हमें जीव-कण (protoplasm) की उन्नति की प्रारम्भिक दशाओं में लौटा ले जायगा; यह तो हमें मोनीरन्स (Moncrons) बना देगा, जिनके पेट ही पेट होता है, और अकेला पेट ही आँख, कान, नाक और पैर सबका काम देता है। यह हम नहीं चाहते। श्रम का विभाग क़ानूनी (दैवी-विधानानुसार) है, आवश्यक है। और भारत में इस श्रम विभाग के सिद्धान्त पर ही एक समय जाति-प्रथा व्यवस्थित और स्थापित हुई थी। श्रम-विभाग के सिवाय और कुछ नहीं था। एक मनुष्य ने पुरोहित का काम कर लिया था, दूसरे ने सैनिक का, क्योंकि यह दूसरा व्यक्ति अधिक लड़ाका और पशु-वृत्तियों अर्थात् रजोगुण से पूर्ण था। केवल अस्त्र धारण करने और लड़ने तथा कुचलने के योग्य
† एक प्रकार के कणज जीव (protozoon) वा प्रथम जीव का नाम है
होने के कारण, वह उपदेशक का मृदुल काम न ले सका। यह श्रम का विभाग था। कुछ दूसरे लोग थे जो कम मेहनत वाले रोज़गार (जैसे दुकानदारी) के अधिक उपयुक्त थे। इनमें धर्माचार्य के काम की उतनी क़ाबलियत नहीं थी जितनी दुकानदारी की। वे लोग भी थे, विशेष कर आदिम निवासी (aborigines), जो नाम मात्र को भी उत्कृष्ट (उन्नत) नहीं थे, जिन्हें कुछ भी शिक्षा नहीं मिली थी, जिन्हों ने अपने बचपन और लड़कपन का समय बेकार खोने में, आलस्य में अपने दिन गँवाने में, बिताया था। ये लोग धर्मप्रचारक का काम नहीं कर सकते थे, वे सिपाही का काम नहीं कर सकते थे, क्योंकि वे क़वायद नहीं जानते थे, युद्ध के लिए आवश्यक नियमबद्धता उनमें नहीं थी। वे दुकानदारी का भी काम करने में असमर्थ थे। दुकानदारी में भी कुछ विद्या और कुछ चतुरता की आवश्यकता होती है। ये लोग साधारण मजूर, आढ़तदार या सड़क पर कंकड़ तोड़ने वाले मजूर का काम उठा लेने को राज़ी थे। इस तरह भारत में काम चलाने के लिए चार विभाग किए गये। धर्माचार्य की जाति ब्राह्मण कहलायी, सैनिकों का काम करनेवाले लोग क्षत्री कहलाये, जिन लोगों ने दुकानदारी या व्यापारी का काम किया वे वैश्य कहलाये, और जिस वर्ग ने हाथ से मेहनत (manual labour) का कार्य लिया वह शूद्र कहलाया। जिस आदमीको जो काम पसन्द हो उसे करने की कोई मनाही या उसके करनेसे रोकने के लिए कोई कठोर कानून नहीं था। और क्या यह श्रम विभाग सर्वत्र प्रचलित नहीं है? और क्या यह श्रम विभाग अमेरिका में भी प्रचालित नहीं है? अमेरिका में ये वर्ग वर्तमान हैं वे इंग्लैंड में भी मौजूद हैं, वे और सब कहीं जगह भी मौजूद हैं। क्या अमेरिका की अपनी जाति नहीं है? क्या
अमेरिकावासियों के अपने ऊपरी दस (Upper ten) और अपने मामूली लोग नहीं हैं? सर्वत्र यह विभाग, स्वाभाविक विभाग है। किन्तु, तो फिर भारत की जाति प्रथा में क्या दोष है?
भारतमें हिन्दू कानून पर मनुस्मृति नाम का एक ग्रन्थ लिखा गया था। उन दिनों में यह पुस्तक सब श्रेणियों की सहायता के लिए थी। प्रत्येक वर्ग के लिए काम चलाने के बिभिन्न नियम, उपाय, उपदेश और आदेश इस में दिये गये थे। ब्राह्मणों की सहायतार्थ इसमें सुखकर नियम और तरीके दिये गये थे, और क्षत्रियों को अपना काम करने की विधि इससे मालूम होती थी, और इस तरह उस समय की सब श्रेणियों का काम निकालने के लिए यह पुस्तक रची गई थी। धीरे धीरे यह पोथी गलत पढ़ी गयी, और इस की व्याख्या गलत की गई और किसी न किसी तरह हरेक चीज़ उलट पुलट होगई, हरेक बस्तु स्थान भ्रष्ट हो गई। यह सम्पूर्ण श्रेणीक्रम और श्रम-विभाग की यह पद्धति जड़ हड्डियों का ढाँचा, सुरक्षित मृत शरीर या पत्थर के समान अचेतन कर दी गई। लोगों ने इसे ठोस बना दिया, उन्हों ने इसे घन बना दिया, और क़ौम की जान जाती रही। हरेक बस्तु बनावटी और यंत्रवत होगई। लोगों की सेवा करने के बदले मनुस्मृति निरंकुश ज़ालिम बन गई।
भारतीय जाति-प्रथा की अधोगति।
साधारणतः किसी विश्व विद्यालयमें चार दर्जे होते हैं, नवागन वा प्रथम (Freshman)*द्वितीय (Sophomore)
* अमरीकन कालेज में चार दर्जे होते हैं पहिले दर्जे को प्रथम [Freshman or first year], दूसरे दर्जे को सोफोमोर (Sophomore or second year), तीसरे दर्जे को जूनियर [Junior or third year] और चौथे को सीनियर [Senior or fourth year] कहते हैं।
अधम और ऊँचा दर्जा। ये दर्जे बहुत ठीक हैं, किन्तु अध्यापक यह नहीं चाहते कि ये दर्जे ज्यों के त्यों बने रहें, सब से नीचे दर्जे के विद्यार्थी तरक्की न करें और उससे आगे के ऊँचे दर्जे में न चढ़ें, और उस दर्जे के विद्यार्थी उन्नति करके तृतीय-वर्षकी कक्षामें न जांय और तृतीय-वर्षकी कक्षाके छात्र चतुर्थ-वर्ष की कक्षा में न चढ़ाये जांय। दर्जों का होना ठीक और उत्तम है, यह विभाग बहुत ठीक था। किन्तु भारत में जो भूल, विकट भूल की गई, जो विकट भूल भारत की आज की अधोगति की ज़िम्मेदार है, वह है इस विभाग को जड़ स्तब्ध बनाना, इस विभाग को घन बनाना। इस तरह भारत की वर्तमान जाति-भेद-प्रथा का, भारत के कलंक वा क्षय के कारण का उद्भव हुआ।
मनुस्मृति के अस्थायी नियम और उपनियमों ने, जिन में उस समय के मामलों को बर्ता गया था, और जिनका सम्बन्ध अपने समय के अस्थायी मामलों से था, उन्हों ने धीरे धीरे श्रुति या उपनिषदों अथवा वेदान्त में प्रचारित अविनाशी सत्य के सार सम्मान और प्रतिष्ठाको हर लिया और अपना लिया। यह अनुभव करने के बदले कि "सब नियम और क़ानून हमारे लिए हैं," लोगों ने नियमों और क़ानूनों के लिये जीना शुरू किया। भूतपूर्व मृतकों के प्रमाण की सत्ता बढ़ा दी गई और सजीव आत्मदेव अन्तर्यामी भगवान् की आज्ञाओं से उसे कहीं ऊँचा स्थान दे दिया। मनुष्य व्यवहार रूप से केवल मांस और रुधिर, ब्राह्मण या क्षत्री, बना दिया गया, और असली "आत्मा" की, नित्य "सत्यस्वरूप" की, सब तरह पर पूरी २ उपेक्षा की गई। जातीय नियमों का भय और रीति-रस्म का भयंकर आतंक किसी व्यक्ति को एक क्षण के लिए भी दूसरी जातियों के लोगों से अपनी
एकता बोध करने की अनुमति नहीं देता। ब्राह्मणपन और क्षत्रीपन का विचार हर घड़ी इतना प्रबल बना रहता है कि आदमीपन का विचार हृदय में घुसने ही नहीं पाता।
मनु के समय से पृथिवी का रूप अनेक बार बदल चुका, नदियों ने अपने पेटे बदल दिये, जङ्गल काट कर जला दिये गये, वनस्पतियां और लता-गुल्म आदि और के और हो गये, क्षत्री या वीरों की जाति एक प्रकार से भारत से बिल- कुल बह गई, देश की भाषा का देश में कहीं चिन्ह भी नहीं रह गया, और आज-कल के हिन्दू के लिए वह वैसी ही बेजान और विदेश चीज़ है जैसी लैटिन और ग्रीक ; पर तो भी भारत के आत्मघाती आज तक जातीय रूढ़ियों (Conventionalities) के, अपने सम कालीनों (Contemporaries) के लिये मनु के बनाये हुए नियमों और रीतियों के, अधम गुलाम बने हुए हैं। स्वाधीन विचार वा चिन्तन अधर्म वरन् महा पाप समझा जाता है। मृतक भाषा से जो कुछ मिले, वही पवित्र है। यदि आप की युक्ति (तर्क) मृत पुरुषों की कहावतों और कल्पनाओं तथा तरंगों की महिमा, गुलाम की तरह, नहीं बढ़ाती, तो तुम नरक के योग्य हो, हरेक आदिम तुम्हारे ठीक विरुद्ध हो जायगा। तुम्हें नई शराब को पुरानी बोतलों में रखना चाहिए। सब काम अच्छ हैं, सब श्रम पवित्र हैं, किन्तु जाति-भाव की विपरीतता से सम्मान और अपमान अब बाहरी व्यापारों में जुड़ गये हैं। जो लोग अपनी लड़कपन की उम्र शिक्षा पाने में नहीं लगाते, उन्हें जवानी में कठिन शारीरिक श्रम करके अपने पिछले आलस्य का बदला चुकाना पड़ता है। अपनी पिछली सुस्ती की कीमत उन्हें पड़ी चोटी (वा ललाट) का पसीना बहाकर देनी पड़ती है। उनके श्रम को नीच कहने या शूद्र-कर्म को तुच्छ समझने का हमें और
आपको क्या अधिकार है ? क्या उस श्रेणी का श्रम भी ठीक उतना ही आवश्यक नहीं है जितना कि धर्मगुरू या सैनिक या वैश्य (व्यापारी) का काम ? आज कल मामला यहाँ तक बिगड़ गया है कि नीच जाति के लोग उस सड़क पर नहीं चलने पाते जिस पर उच्च जाति के लोग, ब्राह्मण, क्षत्री, या वैश्य चलते हैं। जिन आदरणीय ग्रामों या नगरों में उच्च जातीय लोग बसते हैं, उनसे बाहर हीन झोंपड़ों में शूद्रों को रहना पड़ता है। यदि किसी ऊँचे जाति के आदमी पर किसी छोटी जाति के आदमी की छाया पड़ जाती है, तो उस उच्च जातीय व्यक्ति को अपने को निर्मल करने के लिए नहाना धोना पड़ता है। नीच जाति के आदमी द्वारा कोई चीज़ यदि छू ली जाती है, तो वह चीज़ गन्दी, छूत, हो जाती है, वह चीज़ किसी उच्च जाति के मनुष्य के काम की नहीं रह जाती। इन नीची जातियों के लोगों को अत्यन्त नीच और कठिन श्रम करने के इनाम में जो छिलके और टुकड़े उच्च जाति के लोगों से मिलते हैं उन्हीं पर छोटी जाति के लोगों को निर्वाह करना पड़ता है। राम को आप क्षमा कीजियेगा, यदि आप के सामने तथ्य रखने के लिए राम को लाचार होकर उन शब्दों का सहारा लेना पड़ता है जिन्हें सुनने का आपको अभ्यास नहीं है। इन नीच जाति के आदमियों को, इन बिचारे शूद्रों या पारहियों को सड़कों पर झाड़ू देनी पड़ती है, गंदी नालियों को अपने हाथों से रगड़ना और खूब साफ करना पड़ता है, इतना ही नहीं बल्कि पेशाब के हौदों (शौच कूप) को उन्हें साफ करना पड़ता है, और इस श्रम के इनाम में उन्हें बासी टुकड़े और छिलके दिये जाते हैं। वे अमीर नहीं हो सकते, वे अत्यन्त गरीव हैं। वे अमीर नहीं हो सकते हैं। उनकी दशा का ध्यान आने पर
राम के दिल में शूल उठती है। नीच जाति के लड़के उन पाठशालाओं में नहीं प्रवेश कर सकते जिन में उच्च जातीय लड़के शिक्षा पाते हैं, क्योंकि उनके वहां बैठने से उच्च जातीय लड़के छूत (नापाक) हो जाँयगे। ये पददलित लोग कैसे कोई शिक्षा पा सकते हैं, जबकि ये किसी तरह आधे पेट खाकर जीते हैं, और नित्य मर रहे हैं। भारत सब प्रकार की महामारियों और रोगों का प्रिय अड्डा है। और अस्वस्थ हिस्सों में रहने वाले ये गरीब शूद्र सब तरह के रोगों और स्पर्शजन्य बीमारियों के अत्यन्त सत्कारी यजमान (मीज़वान) होते हैं। वे उदारता पूर्वक हैज़ों, महामारियों और दुर्भिक्षों को भर पेट अपने शरीर खिलाने के लिए निमंत्रित करते हैं। गरीब, नीच, सदा समाज के पैर, बुनियाद या सहारा होते हैं। जो घमंडी समाज नीची जातियों की बाढ़ को रोकता और दबाता है, जो समाज दीन-हीन अज्ञानी पापियों को शिक्षा नहीं देता और उनसे बुरा बर्ताव करता है, वह समाज अपने ही पैर काटता है, वह समाज टूटफूट कर गिर जायगा।
ये नीच जाति के लोग अधिकांश में भारत के आदिम निवासी (aboriginal inhabitants) थे। आर्यों ने, जिन्हें आप आज हिन्दू कहते हैं, भारत के मूल निवासियों को जीता और उन्हें इस अत्यन्त नीच, अधम अधोगति में डाल दिया। उन्होंने उनकी यह दुर्दशा करदी। उन्होंने एक महा पाप किया, और आज जो वे काट रहे हैं, वही उन्हों ने बोया था। भारत के मूल निवासियों के प्रति व्यवहार के रूप में हिन्दुओं या आर्यों ने वही बोया था जो आज मुसलमानों और भारत के वर्तमान शासक अंग्रेज़ों के हाथों से वे पा रहे हैं। यह "कर्म" या "प्रतिफल" का क़ानून (दैवी नियम) है।
राम तुमसे एक हिन्दू, या भारतवासी, अथवा किसी क़ौम या वर्ग के व्यक्ति की हैसियत से नहीं कुछ कह रहा है। राम की स्थिति सत्य पर, पूर्ण सत्य पर और शुद्ध सत्य पर है। राम का शरीर भारत की सर्वोच्च जाति का है, और राम संसार की अति नीच पददलित जाति की ओर से आपसे विनती कर रहा है। सत्य और न्याय के नाम में, "असली आत्मा" के नाम में, जो भारत के पारहियों का भी आत्मा है, साम्प्रदायिकता और परस्पर भेद के सब पर्दे और घूंघट हटा दीजिये और भारत के पीड़ित लोगों का पक्ष लीजिये।
यह जाति-भेद या विभाग समग्र राष्ट्र के पतन का साधन किस तरह हो रहा है ? मूल में तो श्रम का विभाग और प्रेम की एकता इसका अभिप्राय था। किन्तु भारतीय जाति में ये सब (चीज़ें) उलट-पुलट गई हैं, गाड़ी घोड़े के आगे जोत दी गई है। इन दिनों वहां प्रेम और एकता का विभाग तथा प्राचीन कर्मों और भेदों का संरक्षण है। किन्तु होना चाहिए था इसके विपरीत। एक परिवार के आदमी को जो कपड़े अनेक बर्षों पूर्व ठीक (fit) होते थे, वही उसे आज भी पहनने पड़ते हैं, ऐसी हालत में जब कि नसें और हड्डियां बच्चे के कपड़ों से बढ़ चुकी हैं। इस प्रकार, चीन देश की महिलाओं के पैरों की तरह, हिन्दुओं की बुद्धि तंग सांचों और संकोचने वाले तथा निचोड़ने वाले जूतों और सलूकों में अटकी तथा दबी रक्खी जाती है। एक हिन्दू की कट्टर शिक्षा दो दीवालों के बीच में दौड़ने के तुल्य है।
एक आदमी दो रोगों से बीमार था। उसकी आंखें आई थीं और पेट दुखता था। उसने वैद्य को अपनी तकलीफें सुनाईं। वैद्य ने उसे दो दवाइयां दीं, एक पेट के लिए और एक नेत्रों के लिए। किन्तु इस रोगी ने दोनों को मिला दिया।
पेट के लिए जो औषधि थी उसमें काली मिर्चें, निमक और कुछ और ऐसी ही गर्म चीजें, उसके पेट को दुरुस्त करने के लिए पड़ी हुई थीं, और नेत्रों के लिए जो दवा थी उसमें सुरमा और जस्ता और ऐसी ही कुछ चीजें पड़ी हुई थीं। हम जानते हैं कि यदि सुरमा खाया जाय तो ज़हरीला होता है, और दूसरी चीज़ें, मिर्च और निमक आदि, खाई तो जा सकती हैं पर आंखों में नहीं लगाई जा सकतीं। इस आदमी ने दोनों चीज़ें एक दूसरी से बदल लीं, और जो वस्तु नयनों में लगाने को थी वह उसने खा ली, और खाने वाली औषधि आंखों में लगा ली। इस तरह आंखों की आफत और पेट की पीड़ा बढ़ गई। यही भारत में हुआ है। काम में विभाग होना चाहिए था, किन्तु चित्त में एकता और संगति। पर बदनसीबी और नासमझी से प्रेम और चित्त में विभाग है और बाहरी कर्तव्यों को सुरक्षित रखने की चेष्टा की जाती है।
रीति और रिवाज (Custom and Conventionality) के दैत्य ने जाति की सम्पूर्ण जान (प्राण) और मौलिकता को मानों कंकड़ और पत्थर बना दिया है। कट्टरता के अर्थ अब विलगता (exclusivism) निराशावाद (Pessimism) और मूकसिद्धांत पालकता (dumb conservatism) हो गई है। अमली ज़िन्दगी में, ऊंच जाति के आदमी ने "असली आत्मा" की, भीतरी "स्वर्ग" की, महिमा और प्रताप को भूल कर आत्मा को, वेदान्त को, अपने पैरों तेल कुचल डाला है, और मूर्खता पूर्वक अपनी दुनयवी दशा, शान और व्यक्तिगत सफलताओं पर गर्व करना शुरू किया है। इसके बाद उसे अपनी प्रतिष्ठा या गौरव बनाय रखने की चिन्ता हुई, तथा और भी व्यक्तिगत सम्मानों एवं स्वार्थ पूर्ण अभिवृद्धि की लालसा और फिक्र हुई। "मोहरों की लूटें और कोयलों पर
छाप" (penny wise, pound-foolish policy) की यह नीति अन्त में उच्च जाति के मनुष्य की अवनति और पतन का तथा साथ ही साथ नीच जाति के जन समूह के विनाश का कारण हुई, जिससे वह (ऊंची जातिका मनुष्य) फूल उठा और उसके दर्प तथा अज्ञान की और वृद्धि हो गई।
इसे हम कैसे दूर करें ? आज क्या हमें इन हिन्दुओं और आर्यों को कुचलना शुरू करना चाहिए, क्योंकि इन्हों ने शूद्रों के साथ ऐसी निठुरता की थी ? क्या इससे बात बन जायगी ? नहीं, नहीं। किसी गवैये को सब से बड़ा दण्ड आप यही दे सकते हैं कि उसकी गलती बता दें और भूल सुधार दें। किसी पापी या बदमाश को सब से कठिन सज़ा आप यही दे सकते हैं कि उस शिक्षा दें, उसकी मूढ़ता को नाश कर दें। यदि आप उसकी पाप वृत्ति को मार डालना चाहते हैं, तो उस पापी को मार डालने की आपको ज़रूरत नहीं है। पापी तो उस में अज्ञान है। उसे सिखाइये-पढ़ाइये, उस की अविद्या दूर कीजिये। मामला इस तरह आप दुरुस्त कर सकते हैं। दोष निवारण का, अज्ञानरूपी रोग के कीटों के विनाश का यह ठीक उपाय है।
आर्य और हिन्दू काफी दुःख भोग चुके हैं। मूल-निवा- सियों (aborigines) पर की हुई निठुरता का बदला लेने और नाराज़ होने के लिए यूरोप या अमेरिका से आपके जाने की ज़रूरत नहीं है। वे अपने किये की क़ीमत खूब चुका चुके हैं। सदियों से वे बिदेशी जुए के नीचे हैं, गुलामी में पड़े हुए हैं। अफगानिस्तान के लोगों ने देश पर चढ़ाई की और उन्हें विजय किया। यूनान के लोग आये और उन पर उन्हों ने हुकूमत की। ईरान के लोगों ने उनपर प्रभुता जमाई। दुनिया के सब हिस्सों से लोग आये और उन्हें धमकाया।
वे अपने कसूरों के मँहगे दाम दे चुके हैं। अब यह समय है कि आप जाकर उन्हें ढाढ़स दें, अब समय है कि आप जाकर उनका दिल बढ़ावें, अब समय है कि आप जाकर उनका वेदान्त-विरुद्ध अज्ञान दूर करें जिसके कारण वे जाति-भेद की प्रथा से चिपटे हुए हैं।
जाति-भेद की इस कल्पना के कारण कैसे बुरे और शोच- नीय ढँग से उनकी शक्तियां क्षीण होती हैं और उद्योग नष्ट होता है। दलबन्दी की भावना से सब व्यापार—आचार सम्बन्धी, आध्यात्मिक, राजनैतिक, सामाजिक—अष्ट और बरबाद हो गये हैं। भारत की यह जाति-भेद-प्रथा विरोध और जातिगत विद्वेष पैदा करती है। कल्पना कीजिये कि एक आदमी दर्शन-शास्त्र पढ़ता है या इतिहास अथवा कोई विज्ञान-शास्त्र का अध्ययन करता है। यदि उसका चित्त उद्विग्न है तो वह अपना अध्ययन क़ायम रखने में असमर्थ होगा। हमारे शिक्षा प्राप्त करने के लिये यह आवश्यक है कि हमारा चित्त निश्चिन्त हो। वह कौन सी वस्तु है जो लोगों को विचलित कर देती है ? क्योंकर वे व्यग्र और डांवा- डोल होते हैं। भेद-बुद्धिसे। जब तुम सजातीय (हमखयाल) लोगों के साथ होते हो, तब कोई भेद नहीं होता, तब तुम्हारे समीप कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं होता ; तब तुम सफलता पूर्बक पढ़ सकते हो ; किन्तु जब बिरोधी तत्वों, विपरीत मात्राओं से, तुम घिरे हुए हो, तब तुम कुछ नहीं कर सकते, तब तुम पढ़ नहीं सकते। ज़रा खयाल कीजिये। यदि मेरे कुटु- म्बी, मेरे भाई बहनें और दूसरे सम्बन्धी मेरे आस-पास हैं, तो मैं पढ़नेमें लगा रह सकता हूँ, मेरे काममें विघ्न न होगा। जब कोई पेसा तत्व आजाता है, पेसा तत्व जो विजातीय समझा जाता है, पेसा तत्व जो गैर माना जाता है, जो मेरे चित्त में
क्षोभ उत्पन्न करता है, तभी मैं खिन्न होता हूँ। भारत की यह जातिय प्रथा, आस-पास के पदार्थों को विजातिय बना देने के कारण, बुद्धि की शक्तियों को हानि पहुँचाती है, और लोगों को यह विश्वास कराके "कि हमारे आस-पास के सी पुरुष सभी गैर, विदेशी, और भिन्न हैं", तथा प्रति द्वेषिता, ईर्ष्या और फूट की भावना पैदा करके, चित्त में अशान्ति उत्पन्न करती है। चार तो बड़ी जातियां हैं, और ये चारों सैकड़ों उपजातियों में विभक्त हैं और लक्षण या कुललक्षण ये हैं कि ये संख्या अनन्त होती जा रही है। इसके साथ ही मुसल- मानी एक दल या जाति है, इसाइयत दूसरा बढ़ता हुआ दल या जाति है। थियासोफी (Theosophy), आर्यसमाज और हज़ारों दूसरी नई (बरसाती मच्छरो के समान बढ़ती हुई सभायें, जिनके चटकीले नाम और उपाधियां हैं, नव प्रवर्तित जातियां हैं। एक मुसलमान के आ जाने पर हिन्दु विद्यार्थी की स्थिरता भङ्ग होजाती है, यदि घटनास्थल पर एक ईसाई पहुँच गया, तो हिन्दु विचलित हो जाता है और यदि, मान लीजिये कोई भिन्न जाति का हिन्दू आ गया तो उसकी मौजूदगी भी कट्टर हिन्दु विद्यार्थी के चित्त को अपने छाया से छा लती है।
क्या तुम यह नहीं देखते कि ये जाति-प्रथा और यह भेद, जिसकी भारत में अति हो गई है, उनकी बुद्धिकी शक्तियों की यथोचित उन्नति नहीं होने देता ? इसके मारे वे अपनी शिक्षा पूरी पूरी नहीं कर पाते। इस तरह भारत में हमारे शिक्षा के काम के अभ्युदय के लिप हमें लोगों को ऐसी दशामें लाने का प्रयत्न करना चाहिए, जिसमें उनके चित शान्त रह सकें। और उनके चित्त तभी निश्चिन्त हो सकते हैं जब यह अस्वाभाविक (unnatural) भेद मिट जाय
और जब जाति-भेद की भावना दूर कर दी जाय।
राम यह नहीं कहता कि आप अमेरिकावाले जाति से बिलकुल मुक्त हैं। आप मुक्त नहीं हैं। यदि आप इसाई हैं और आप एक हिन्दू या बौद्ध को नहीं देख सकते, तो यह क्या है ? यही जाति है। यदि आप अमेरिकावासी हैं और आप एक स्पेनवासी या अंग्रेज़ को नहीं देख सकते, तो आप राजनैतिक जाति से पीड़ित हैं यदि आप गोरे आदमी हैं और एक हबशी के साथ एक ही कमरे में आप काम नहीं कर सकते, तो सामाजिक जाति का भूत आप पर सवार है। आप जाति से बिलकुल मुक्त नहीं हैं, यदि आप को अपने पड़ोसी या प्रतिद्वंद्वी से ईष्या है। ईष्या क्यों होती है ? जाति, केवल जाति ही मत्सर का कारण है। यदि आप अपने साथी की प्रशंसा अपने सामने होते नहीं सह सकते, तो आप जाति-पीड़ित हैं। अमेरिका में बहुत करके सर्वशक्तिमान रुपया जातिका निर्णय करता है। अमेरिका में अनेक सामा- जिक दोष हैं। अमेरिका को अपनी आँख का टेंटर (तिनका) निकालने की ज़रूरत है। अमेरिका को सुधार की ज़रूरत है। अमेरिका की सामाजिक पद्धति कदापि सर्वांग-सुन्दर नहीं है। अमेरिका को वेदान्त की भावना की अत्यन्त ज़रूरत है। किन्तु भारत की दशा कई गुणा अति खराब है। अमेरिका की जाति चल, कोमल, लचीली (pliable) है, जैसी हरेक जीवित वस्तु दुनिया में होनी चाहिए। किन्तु भारतीय समाज बिगड़ी घड़ी के तुल्य है, जकड़ी है, हड़ीवत हड़ीली है, अमेरिका के शहरों के निरस अजायबघरों में रक्खे हुए मोम के पुतलों की भाँति अचल-मुख और अडोल-वस्त्र है। वंशपरम्परा-क्रम और अनुकूलता (कालानुवर्तन) या शिक्षा के सिद्धान्तों (principles of heredity and adaptation or
education) पर जीवन विकसित होता है। (जीवन के) निम्नतर वर्गोंमें वंशपरम्परा-क्रम का नियम (principle of heredity) सर्वप्रधान है। मनुष्य अपनी शारीरिक शक्तियों और अंगों के लिये परम्परा-क्रम के सिद्धान्त का ऋणी है, किन्तु मनुष्य उन्नति करके अपनी अत्यन्त विशुद्ध, पूर्ण विकसित और पूर्णावस्था को प्राप्त हो जाता है, विशेषतः कालानुवर्तन (adaptation) और शिक्षा के द्वारा। मुर्गी के बच्चे जब अंडों से निकलते हैं, तब उनमें उनके माता-पिता की सारी समझ पाई जाती है। कुछ पक्षी पैदा होते ही अपने पुरखों की तरह मक्खियों को चोंच से पकड़ने लगते हैं। वे अपनी प्रायः सब शक्तियां अपने माता-पिता से प्राप्त करते हैं, और यथार्थ में उनकी वृद्धि तथा उन्नति का अन्त भी उसी में हो जाता है। इसके विपरीत मनुष्य का उत्कर्ष होता है, मुख्यतः कालानुवर्तन (अनुकूलता) और शिक्षा के द्वारा। सुन्दर नन्हा शिशु उतना ही नासमझ और अनाड़ी होता है जितना कि दुधमुंहा पिल्ला, बल्कि पिल्ला या कुत्ते का बच्चा कुछ बातों में नन्हे आदमी की अपेक्षा अधिक चतुर होता है। किन्तु मनुष्य और पशु में बड़ा भेद यह है कि पिल्ले या कुत्ते के बच्चे को अपनी पूर्णता के लिए जिन चीज़ों की ज़रूरत है वे सब उसे वंशपरम्परा के कानून के अनुसार प्राप्त हो जाती हैं, और मानव-शिशु शिक्षा और अनुकूलता (adaptation:-आवश्यकतानुसार परिवर्तन) के द्वारा सारे संसार पर हुकूमत कर लेता या कर सकता है। हिन्दुओं ने भारी भूल यह की है कि शिक्षा और कालानुवर्तन के कानून के गुण से मनुष्य को बञ्चित कर दिया है, और वंशपरम्परा-क्रम द्वारा प्राप्त शक्तियों को विकसित और उन्नत करने से उसे इस प्रकार वाध्य किया है कि
हिन्दू समाज पर वंशपरम्परा-क्रम का सिद्धान्त इस दर्जे तक काम करता है, कि नर-नारी पशुओं और वृक्षों की श्रेणी में आ गये हैं। कार्यतः वे आत्मा की अनन्त शक्तियों में नहीं विश्वास करते। वे नहीं विश्वास करते कि शूद्र शिक्षा के द्वारा ब्राह्मणत्व को प्राप्त कराया जासकता है। वे शूद्र के लड़के को शूद्र और वैश्य के पुत्र को वैश्य ही बनाये रक्खेंगे, क्योंकि, उनके कथनानुसार, अंजीर का पेड़ अंजीर ही के बीज पैदा करता है, और कुत्ता केवल कुत्ते को जन सकता है। यह उनकी बहस है और इसे वे, नित्यप्रति के तथ्यों के दाँतों बीच (अर्थात् इतने २ प्रत्यक्ष वा स्पष्ट प्रमाणों वा उदाहरणों के सामने), जो साफ साफ और सरलता से उन्हें भूठा सिद्ध करते हैं, पुष्ट करते रहते हैं। पूर्वकाल के उत्कृष्ट विचारवानों या महामान्य ऋषियों और विचक्षण तत्वज्ञानियों तथा सिद्धों के पुत्र—निस्सन्देह सब ब्राह्मण पेसे ही हैं—क्या अधिकांश पागल नहीं तो शिक्षा और उत्कर्ष के अभाव से खल वा मूढ़ नहीं होगये हैं ? और अपेक्षाकृत असभ्य तथा क्रूर व अनुन्नत लोगों की सन्तति, जैसे कि अंग्रेज़ और अधिकांश दूसरे यूरोपीय हैं, क्या, शिक्षा के प्रभाव और कठोर स्वच्छन्द श्रम से, शारीरिक मानसिक और राजनैतिक शक्तियों के शिखर पर नहीं पहुँच गई हैं ? ईश्वर किसी व्यक्ति, रोब या जाति का आदर नहीं करता। जो श्रम करता है वह विजय व श्री से विभूषित होता है। जो अपने को शिक्षित करता है और ज्ञान लाभ करता है, वही मैदान जीतता और गौरव पाता है।
राम यह नहीं कहता है कि तुम जाति-भेद से बिलकुल मुक्त हो। किन्तु भारतीय तुम से अधिक जाति भेद से पीड़ित हैं। बहुतेरे भारत वासियों की अपेक्षा तुम अपने को
अधिक सरलता से चंगा कर सकते हो। तुम कुछ बातों में हिन्दुस्तानियों से राम के अधिक नगीची हो। राम चाहता है कि स्वाधीनता के इस भाव को तुम अपने में अधिक बलवान करो, इसे धौंकते रहो, इसे बढ़ाओ और विस्तृत करो, इसे अधिकाधिक तरक्की दो और भारतवासियों में स्वाधीनता की यह भावना जगा दो, और उन्हें अपने इस सुख और सौभाग्य का साक्षी बना दो। इस प्रकार से दोष की जड़ (मूल) में हम प्रहार कर सकते हैं। द्वैत के द्वारा, इस भेद के द्वारा, जो वेदान्त का वैरी है, जो वेदान्त का प्रतिकूल ध्रुव (pole) है, लोग शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक आत्मघात करते हैं।
इस रोग के सम्बन्ध कुछ शब्द और हैं। ब्राह्मण वर्ग, उच्च वर्ग, शारीरिक श्रम करना अपनी मर्यादा के विरुद्ध समझता है। उच्च श्रेणी के लोग ऐसे किसी काम में अपना हाथ न लगने देंगे जिसे रीति-रिवाज या व्यवहार ने उन की मान-मर्यादा के अनुकूल नहीं ठहराया है। मिसाल के लिए, एक ब्राह्मण, क्षत्री या वैश्य-तीन ऊँची जातियां-चमार, नाऊ, मल्लाह, लोहार, रंगरेज, दर्जी, बढ़ई, जोलाहा, कुम्हार, रंगसाज़ या मामूली मजूर का काम, मेहतर के काम का तो ज़िक्र ही बेकार है, कदापि, कदापि न करेगा। यह लोग मर जाना पसन्द करेंगे, पर ऐसा काम न छुएंगे। वे चमड़े या खाल का व्योपार कभी न करेंगे। अब यदि ऊँची जातियां जिनके पास कुछ पूँजी है, इन व्यापारों को नहीं कर सकतीं और केवल नीचतम वर्ण के लिए, जिस के पास कुछ भी रुपया नहीं, है, इन व्यापारों को पूरी तरह से छोड़ देना है, तो बताइये, भारत के उद्योग-धन्धों और कलाकौशलों की उन्नति कैसे होगी ? उपयोगी कारीगरियों में वे कोई
तरक्की कैसे कर सकते हैं ? अमेरिका आज अपने उद्योग- धंधों की बदौलत धनी है। इंग्लैंड और अन्य यूरोपीय राष्ट्र अपने उद्योग-धंधों की बदौलत आज धनवान हैं। (अमेरिका और यूरोपीय देशों में) पूँजी वाले लोग इन उद्योग-धंधों को करते हैं। उस क़ौम के लिए क्या आशा हो सकती है जिस के तीन-चौथाई से अधिक लोग उद्योग-धंधों को तुच्छ समझते और श्रेष्ठ कर्म से घृणा करते हैं, और गत व्यवसायों तथा रीति-रस्म के ठूंठ में लता की तरह लिपटे रहने को धर्म कहते हैं।
गुलाम की तरह भूत पूर्व (अतीत) काल में चिपटे रहने, और केवल मुदों की आँखों से देखने का स्वाभाविक नतीजा यह है कि हिन्दुस्तान में और भी अनेक दोषों का, जिन के बयान की इस समय ज़रूरत नहीं है, दौर-दौरा है। गये गुज़रे ज़माने की दुःखद रीतियों का ऐसा ठोस बोझ जब तक उनके सिर पर लदा है, तब तक उन से क्या आशा की जा सकती है ? अपने पूर्वजों की एड़ियों के बल्कि केवल उनके नामों के भार के नीचे दबे रहने के स्थान में, उनके कंधों पर खड़े होने में, ऐ अमेरिका वासियों ! उन (भारतवासियों) की सहायता करो। आज तो उन (भारत वासियों) का श्रेष्ठ उत्तराधिकार ही उनका भोक्ता और प्रभु है। इसके बदले में उन्हें उस का भोक्ता और स्वामी बनने में सहायता पहुँचाओ। ऐसा करो कि उनका उत्तराधिकार उनकी वस्तु बने, न कि वे अपने उत्तराधिकार की वस्तु बने रहें। उनकी सामाजिक रीतियों और घरू-ढँगों में निस्सन्देह कुछ प्रशंसा के योग्य पहलू और आशाजनक लक्षण भी हैं, किन्तु उन ढँगों और रीतियों का अन्धा धुंध पालन उन्हें निस्सार और निर्जीव बना देता है।
भारत में पन्द्रह करोड़ स्त्रियों में से (यह संख्या अमेरिका की समग्र आबादी से दूनी है) कठिनता से सैकड़ा पीछे एक स्त्री अपना नाम लिख सकती है। ऐसी दशा भावी सन्तति में अति निकृष्ट अन्ध विश्वास और दीनता (कायरता) के संचार करने में क्यों प्रवृत्त न होगी ?
उपनिषदों और महाप्रतापी (तेजस्वी) वेदान्त की शिक्षाओं का स्थान एक प्रकार के रसोई-धर्म ने, अर्थात् भोजन और भोजन करने के तरीकों निमित अनुचित ध्यान ने, ले लिया है। कुछ सर्व श्रेष्ठ कट्टर विद्वानों (पण्डितों) की विद्या का क्षेत्र पुरानी संस्कृत (जो अब कहीं नहीं बोली जाती) के व्याकरण सम्बन्धी नियमों की यांत्रिक पारदर्शिता (mechani- cal mastery) से आगे नहीं बढ़ता। रटना और पुराने ग्रन्थों के मन्त्रों का उदाहरण देना आपको यहां समस्त मौलिक चिन्तकों (original thinkers) और स्वच्छन्द तार्किकों से श्रेष्ठ बना देता है। अपने संगियों की अशील रसिकता (वा मज़ाक) को तृप्त करने के लिए यदि आप वैदिक मन्त्रों को तोड़ और मरोड़ सकते हैं, तो आप बहुत बड़े विद्यानिधान हैं। अनेक युवकों की मानसिक शक्तियां "हाथ-पैर धोने के समय मनुष्य को कितनी बार कुल्ला करना चाहिय" इस प्रकार के जटिल प्रश्नों पर शास्त्रार्थ और तर्क-वितर्क करने में नष्ट और निछावर हुआ करती हैं।
तंग साम्प्रदायिक घेरों के अन्दर खूब घिरे रहने और ग्रन्थ- प्रमाण पर अत्यन्त भरोसा रखने ने उन्हें ज्ञानशून्य पक्षपातकी ऐसी गहराई में डुबो दिया है कि बिलकुल तुच्छ वस्तुयें और निरर्थक चिह्न बड़े गहरे भावों के केन्द्र हो गये हैं। भारत के लोकप्रिय धर्म में गौ के लिये पराकाष्ठा का सम्मान आज अत्यन्त भारी और परम गम्भीर बात है। हिन्दू धर्म के कुछ
दल एक दूसरे से इतनी दूर छिटके हुए हैं जैसे ध्रुव, किन्तु गौ के लिए अतिशय आदर सब सम्प्रदायों में एकसा है। गौ की देह की पवित्रता सामान्य रूप से हिन्दू की अत्यन्त प्रिय और निकटतम भावना और दुलारी सनक है। इस विषय को स्पर्श करके आप तुरन्त हिन्दू की गम्भीरतम चित्तवृत्ति और महाभयंकर रोष को उत्तेजित कर सकते हैं। यह मार्मिक प्रश्न नित्य अगणित (असंख्य) झगड़ों और बखेड़ों का कारण हुआ करता है। सन 1857 का महा विप्लव (mutiny) गौ के नाम में किया गया था। कहा जाता है कि हिन्दू के इस प्रिय अन्धविश्वास से लाभ उठा कर मुसलमानों की पहली भारत-विजय हुई थी। मुहम्मद गोरी ने पहली वार जब भारत पर चढ़ाई की थी तब वीर हिन्दू राजपूतों ने उसे मार भगाया था। किन्तु उसने पलट कर फिर भारत पर चढ़ाई की। इस बार उसे हिन्दू हृदय की तरंगों तथा व्यसनों का बहुत अधिक ज्ञान था। कहा जाता है कि उसने अपनी सेना के चारों ओर गौओं की क़तारों का घेरा बनाया था। कैसा विचित्र आश्रय (आलम्ब) था? हिन्दू आक्रमण नहीं कर सके। पवित्र गौ पर वे कैसे हथियार उठा सकते थे? पवित्र मृदुल गौओं को देख कर दयालु हिन्दू हिचक गया, उन पर उसने वार न किया, किन्तु देश खो दिया। और परिणाम यह हुआ कि कई सदियों तक और आज भी निर्दयी विजेताओं के द्वारा उसने हज़ारों, नहीं, नहीं, लाखों और करोड़ों गौओं का वध और भक्षण होने की पीड़ा भोगी और भोग रहा है। यह कहानी चाहे झूठी हो, किन्तु ऐसी विलक्षण घटना आज भी सम्भव है। प्राचीन धर्म के नाम में ऐसा घोर अज्ञान फैला हुआ है*।.........
*इस स्थल पर स्वामी जी ने यजुर्वेद, शतपथ ब्राह्मण, बृहदारण्य-
अरे, वेदान्तकी वह बेखिचक निर्भयता (शौर्य) कहाँ है, जिसका कृष्ण ने एक बार प्रचार किया था, जो, गौओं, चीटियों और अंजीर के वृक्षों के शरीरों पर हमारी पवित्र भावनाओं को नष्ट करने के बदले, हमें न केवल उस तुच्छ शरीर की, जिसे हम "मेरा अपना" कहते हैं, कातर (दीन) सेवा से ही मुक्त करता है, बल्कि जो हमें उस सम्पूर्ण निर्बल कारी अविद्या से भी बचाता है जिसके कारण हम पिता, चाचाओं, बाबा, शिक्षकों और सब नातेदारों के शरीरों को अनुचित महत्व प्रदान करते हैं। आवश्यकता है उस आनन्दमय वेदान्त की, जो अविनाशी तत्व व सत्यात्मा का, इस सीमा तक अनुभव कराता है कि यदि सकल सूर्य विनष्ट कर दिये जाँय और कोटियों संसारों का प्रलय कर दिया जाय, तो भी ज्ञाता विचलित नहीं होता।
वे प्रबल बुद्धिवाले हैं, वे प्रबल शरीर वाले हैं, अध्यात्म में भी वे प्रबल हैं। जल गणित वा जल स्थिति विद्या (Hydrostatics) में आप ने "परिणामभूत दबाव" (रिज़लटैंट प्रैशर- resultant pressure) और "समग्र दबाव" (टोटल प्रैशर- total pressure) के बारे में पढ़ा होगा। किसी शरीर पर कुल दबाव चाहे बहुत, अत्यन्त अधिक व आश्चर्यजनक हो, किन्तु परिणामभूत दबाव शून्य हो सकता है, अर्थात् लब्ध दबाव कुछ भी नहीं हो सकता है। भारत में विपुल कोटि मनुष्यों की महान शक्तियां साथ मिलकर काम नहीं करतीं, परस्पर सहयोग नहीं करतीं, एक शक्ति दूसरी को
कोपनिषद, छटा अध्याय के चतुर्थ ब्राह्मणान्तरगत गो-मेध की आज्ञा का उदाहरण दिया है, जिस के गलत समझे जाने की संभावना देख कर उसे जान बूझ कर यहां नहीं दिया गया। (सम्पादक)
व्यर्थ कर देती है, एक शक्ति दूसरी शक्ति के भार को बराबर कर देती है, और फलतः परिणामभूत राष्ट्रीय शक्ति कुछ भी नहीं है। बाहरी रीतियों और रूपों में प्रीति के मूढ़ विश्वासमूलक केन्द्र बना लेने से, रस्मों और वाह्य शरीरों में भावनाओं की अन्धी नाभी (केन्द्र) बना लेने से, और देखने मात्र रूपों वा आकारों की सत्यता तथा परिस्थितियों की कठोरता में मूढ़ अचल विश्वास जमाने से, जाति-विद्वेष, साम्प्रदायिकता, दलबन्दी की वृत्ति और जाति के भाव इस दर्जे पर पहुँच गये हैं कि लोग अपनी मर्ज़ियों को एक साथ नहीं जुटा सकते, और वह चमत्कारपूर्ण फलोपधायकता शक्ति (Dynamic force) नहीं पैदा कर सकते कि जो वाह्य भेदों के होते हुए भी, भीतर की एकता और अभिन्नता के व्यावहारिक अनुभव से सदा एक राष्ट्र को मिलती है। और जन-समूह में व्यवहृत (अमली) वेदान्त के इस अभाव ने भारत को भीतर के भेदों से परस्पर फूटभरा घर बना दिया है। अनेक दलों में बड़ी टूटा-फूटी है।
भारत का यह कलंक (वा विनाश-हेतु) है, और राम यह नहीं छिपाना चाहता कि अंग्रेज़ी सरकार इस भेद-भाव को बढ़ाती है। शासकों की यह "आपस में लड़ाकर जीतने" की नीति (The "Divide and Conquer" policy) हिन्दू और मुसलमानों के बीच के भेद की खाँई (gulf) को चौड़ा करती है, और इसी तरह हिन्दुओं के विभिन्न सम्प्रदायों के बीच में भी। यदि भारत की किसी तरह की भी-राजनैतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक, अथवा किसी प्रकार की भी—रक्षा करनी है तो उसी प्रकार के उत्कर्ष के द्वारा हो सकती है कि जो भेद और फूट को दूर करे, जो जाति-भेद की खोपड़ी पर ठोकर लगाय, और जो ईर्ष्या और
सुस्ती को मार्मिक चोट मारे। यदि हम चाहत हैं कि भारत उठ खड़ा हो, फिर जिये, दूसरे राष्ट्रों के मुक़ाबले में बाजी मार सके, और इंग्लैंड, अमेरिका तथा समग्र संसार के लिए कल्याण का हेतु बने, तो इन दोषों को भारत से निर्मूल करना होगा। यदि कोई आदमी बीमार है तो केवल वही दवा देकर हम उसे चंगा कर सकते हैं जो उसकी आन्तरिक प्रकृति को सहायता पहुँचावे और बल दे। भीतरी प्रकृति ही हमें निरोग करती है, दवाइयां तो बाहरी सहायता मात्र हैं। वे प्रकृति को सहायता पहुँचाती हैं और प्रकृति स्वयं चंगा करती है। इसी तरह, यदि भारत को फिर स्वस्थ करना है, तो तुम्हें कोई ऐसी वस्तु उसे देनी होगी जो उसके आन्तरिक जीवन-तत्व को बलवान बना दे, जो उसकी भीतरी प्रकृति को अनुप्राणित और शक्तिमान् कर दे।
भारतका रोग और कठिनाइयां आप को बता दी गई। अब हम उन विभिन्न औषधियों का विचार करेंगे जो रोग-निवारण के लिए बताई गई हैं।
संसार समझता है, बहुत से धर्म-मतों का विश्वास है, और आचारोपदेशक (moralists) प्रत्यक्ष पुष्ट करते हैं, कि उपदेश और नियम इन दोषों को दूर कर देंगे। कदापि नहीं! कदापि नहीं!! कदापि नहीं!!! शास्त्रोपदेश, विहित कर्म वा अवश्यमेव पालनीय सिद्धान्त, आचरण के कृत्रिम नियम और अस्वाभाविक सदाचार कभी दोषों को दूर न करेंगे। याद रक्खो कि, "तू यह न कर" और "तू वह कर" से कभी कोई सुधार न होगा। यदि ये नियम और नेक सलाहें दोषों को सुधार सकतीं, तो प्रतिज्ञात (promised, इक़रार किया हुआ) "ईश्वर का साम्राज्य" बहुत पहले स्थापित हो गया होता, संसार स्वर्ग बन गया होता, और आज का सा
संसार न रह जाता। इन से दोष न दूर होंगे। तुम्हारी सज़ा, तुम्हारे जेलखाने और कारागार सुधार न कर सकेंगे। आज चाहे कल संसार को अनुभव करना पड़ेगा, कि जेलखानों और कारागारों के गुण और सामर्थ्य में विश्वास करना भयंकर भूल है। धमकियों और दण्ड ने पाप को कभी नहीं रोका। दोषों को अमोघ रीति पर दूर करने के लिए आप को विद्या, ज्ञान, उत्कर्ष, सजीव विद्या का सञ्चार करना होगा। इस बात की ज़रूरत है। लोग कहते हैं "सूक्ष्म युक्तियों या अति सूक्ष्मताओं से हमें परेशान न करो", अब हमें केवल युक्तियां वा कल्पनायें नहीं चाहिएं। ऐ लोगों! तुम पर शासन कौन करता है? संसार का नियन्ता कौन है? कल्पना, विचार, केवल भावना वा विचार। आप का भीतरी प्रकाश, आपका भीतरी ज्ञान ही, और कुछ नहीं, आप को मार्ग दिखाता है। जेलखाने और कारागार रखने के बदले आपको अपराधियों को शिक्षा देनी होगी, उन्हें संसार का शासन करने वाले दैवी—विधानों वा दिव्य नियमों का ज्ञान और परिचय कराना होगा। कहा गया है, "ज्ञान ही नेकी है" (Knowledge is virtue), यह बिलकुल सत्य है। यह एक बच्चा है। आग को छू कर बच्चा अपनी अंगुली जला लेता है। क्यों? क्योंकि लड़का यह नहीं जानता कि आग जला देती है। आग जलाती है, इस सत्य से बच्चे को परिचित कर दो, फिर वह कभी अग्नि को न छुएगा। लोगों का आध्यात्मिक नियमों से परिचय करा दो, मानव जाति को प्रकाश में लाओ। यह दवा है। यह तरीका धीमा, घोंघे का सा सुस्त, भले ही हो, किन्तु है यह निश्चित। यह अति मन्द, आलस्य शील भले ही हो, किन्तु, है यह एक मात्र औषधि, एक मात्र अमोघ चिकित्सा। दूसरा कोई और
उपाय नहीं है। इस तरह, इसाई-आचार की नीति से, दण्डों और नियमों या विधानों से भारत कदापि नहीं उठाया जा सकता। केवल "सत्य" के "जीते-जागते" ज्ञान की ज़रूरत है।
अमेरिकनों और अंग्रेज़ों के घर बड़े सुन्दर हैं। और इसमें सन्देह नहीं कि भारतवासियों के घर बड़े ही दीन हैं, किन्तु भारत में अच्छे, सुन्दर, भड़कीले महल बनाने से, और भारतवासियों को यूरोपियों के से केवल गरम-घरों के पौधे बनाने से, कोई उन्नति न होगी। बहुतेरे मामलों में मकानों के राज-भवन और प्रसादवत् होने पर भी, उनके रहनेवाले सुखी नहीं होते। कीड़े, मकोड़े साँप, प्रायः सुन्दर कक्षों में रहते हैं। चाहे यह नियम न हो, किन्तु काफी गवाहियों से यह ज़ाहिर होता है कि बाहरी चमक-दमक और महिमा से सुख नहीं मिल जाता है। यह एक तथ्य है। यदि संसार इतना अनुभव नहीं करता, तो संसार का दोष है। दौलत से दोष न दूर होंगे। राम वेदान्त की उड़ाता है, ऐसी बातें कहता है, जिनसे प्रत्येक व्यक्ति का लालसा-रञ्जन नहीं होता, जो हरेक की आशाओं के अनुकूल नहीं होतीं, किन्तु यह तथ्य है कि धन-दौलत से कोई सुख न मिलेगा। यदि यूरोप, अमेरिका दौलत के पीछे पड़े हुए हैं और उसे सुखका साधन समझ रहे हैं, तो यूरोप और अमेरिका भयंकर भूल कर रहे हैं। राम की सिफारिश यह नहीं है कि हिन्दुस्तानी यूरोप और अमेरिका की भूलों की नकल करके आगे बढ़ें। भौतिक समृद्धि उसे कभी नहीं मिली, जिसने भौतिक समृद्धि के ही लिए उसका पीछा किया। कौन राष्ट्र या व्यक्ति ऐसा है जो सारे विश्व की द्रव्य को बटोरना नहीं चाहता, किन्तु ऐसे बहुत कम हैं जिनकी यह कामना पूरी
होती है। विभूति वा वैभव सदा श्रम और प्रेम या निस्स्वार्थ प्रेम की रेखा के पीछे पीछे चलता है। वही राष्ट्र उन्नति करते हैं जिनके पास जान-बूझ कर या बेजाने सफलता की यह महा-चाबी—व्यावहारिक वेदान्त की भावना—अधिकांश में होती हैं। अज्ञानी मूर्ख पेड़ों को पालते तो नहीं, किन्तु उनके फल खाने को उत्सुक रहते हैं। झूठे राजनीतिज्ञ शक्ति के मुख्य तार, अर्थात् स्वाधीनता और प्रेम की भावना को बिना बनाये ही राष्ट्र का उत्थान करने का विचार करते हैं। प्रत्येक राष्ट्र का अनजाने, और भारत का समझा-बूझा, जीवन-तत्व व्यावहारिक वेदान्त, स्वाधीनता, न्याय और प्रेम की वृत्ति है। भारतका यह आन्तरिक स्वभाव प्रबल किया जाना चाहिए। हरेक देशका घरू, सामाजिक, राजनैतिक या धार्मिक उद्धार अमल में लाये गए वेदान्त में है।
भारत की एक खास विशेषता है। यद्यपि हिन्दू यथार्थ में अति-धार्मिक नहीं हैं, तथापि धर्म के प्रति उनका आदर और उत्साह इतना अधिक है कि बिना धर्म का लाभ लिए, किसी भी चीज़ को, वह सामाजिक, धार्मिक या किसी प्रकार की भी हो, तुम उनमें लोकप्रिय और व्यापक नहीं बना सकते। भारतीय राष्ट्रीय महासभा या दूसरी कोई संस्था या संगठन, जिसका लक्ष्य सामाजिक या राजनैतिक सुधार है, जनता को स्पर्श और उनकी अन्तरात्मा को प्रभावित नहीं कर सकता, धर्म के मार्ग से न आने के कारण। यह दशा होने से, भारत में सब प्रकार के सुधारों का प्रवर्तन करने के लिए वेदान्त से बढ़कर प्रभावशाली कोई और तरीका हो ही नहीं सकता जो राजनैतिक, सामाजिक, पारिवारिक, घरेलू, बुद्धि-विषयक और, सदाचारिक वा नैतिक स्वाधीनता तथा प्रेमका आलिंगन करती है, जो
अद्भुत रूप से स्वाधीनता और शान्ति, उद्योग और स्थिरता, वीरता और प्रेम की एकता करता है; और यह वेदान्त सब कुछ करता है धर्म के नाम में, धर्म-ग्रन्थों (श्रुति, उपनिषद) के नाममें—हिन्दू-हृदय का जिससे अधिक नगीची कोई और नहीं है—वेदों के नाम में, जिससे अधिक मान्य हिन्दू के लिए और कोई नहीं है, जिसके लिए बड़ी तत्परता से हिन्दू अपनी जान दे सकता है। पुनः स्वाधीनता और प्रेम की इस भावनाको हिन्दुओं की इंजील रूप उपनिषदों से, वचनों को तोड़-मरोड़ कर नहीं निकालना पड़ेगा, यह उनमें बहुत साफ तौर पर पाई जाती है। वेदान्त जनसाधारण के मर्म को स्पर्श करता है, क्योंकि यह उनकी इंजील की शिक्षा है, और शिक्षित हिन्दू के हृदय को वह प्रभावित करता है, क्योंकि अखिल विश्व में नाम लेने के योग्य ऐसा कोई तत्वज्ञान नहीं है जो वेदान्तिक अद्वैतवाद का समर्थन न करता हो, और न कोई ऐसा (पदार्थ) विज्ञान है जो वेदान्त या "सत्य" के पक्ष को पुष्ट और अग्रसर न करता हो।
आश्चर्य की बात है, जिन भारतवासियों के धर्म-ग्रन्थों में वेदान्त के सदा हरे-भरे चश्मे मौजूद हैं, वे भारतीय टंटालुस (Lantalus)* की तरह पीड़ा पा रहे हैं, वे इन
टंटालस एक बादशाह का नाम है। इसको यह दण्ड मिला था कि पानी में इसे जकडा गया इसके सिर पर एक अति मधुर और स्वादिष्ट फल इतनी दूरी पर लटका दिया था जिस से वह उसे पकड तो नहीं सकता था और न अपनी तृप्ति कर सकता था बल्कि उसे देख २ कर केवल तरसता रहता था।
टंटालस चातक पक्षी को भी कहते हैं कि जो वर्षा में जल बिंदु के लिये व्याकुल रहता है, पर अगणित बिन्दुओं के होते हुए भी अत्यन्त कठिनता से एक बिन्दु कभी पाता है, या तरसता २ मर जात.
चश्मों का जल नहीं पीते। ठीक इसी तरह बहुत समय तक जैसे रोमन कैथोलिक सम्प्रदाय के ईसाई इंजील, जो उन की संसार में अत्यन्त प्रिय वस्तु थी, उस के भयंकर अज्ञान से कष्ट पाते रहे। भारत में कुछ लोग ऐसे हैं, यद्यपि अधिक नहीं, जिन्हें वेदान्त का पूर्ण ज्ञान है। किन्तु उन का ज्ञान काल्पनिक वा अव्यावहारिक है। वे उस विद्यार्थी के समान हैं जिस को जरब (गुणन) और तक़सीम (विभाग) के नियम ज़बानी याद हैं, किन्तु जिसने गुणा या विभाग के एक भी सवाल को लगानेमें उन नियमों का प्रयोग नहीं किया है। अधिकांश पण्डित, रसायन विद्या के फर्ज़ी विद्यार्थी की तरह, कि जो एक भी प्रयोग नहीं करता, वेदान्त को पढ़ते हैं। अधिकांश सन्यासी, स्वामी या प्रभु होने के बदले, स्वयं जाति और रूप के दासों और गुलामों से बढ़ कर नहीं हैं। निस्सन्देह वेदान्त के अध्यापक बहु संख्या में भारत में आप को मिलेंगे, किन्तु उन में से अधिकांश विश्वविद्यालयके जल वेग गणित-विद्या के उस अध्यापक के समान हैं, कि जो गुब्बारों के चढ़ने, जहाज़ों के खेने, तैरने के सिद्धान्तों के सम्बन्ध में शिक्षा तो देता है, पर आप कभी उथला उतारा मंझा कर भी (थोड़े से पानी वाली नदी के भी) पार नहीं गया है। तुम लोग अमेरिका वाले चाहे जल-शक्ति के अध्यापक नहीं हो, किन्तु तुम उस असली मल्लाह के तुल्य हो, जो जल-शक्ति का तात्विक ज्ञान रखने का मान या गुमान तो नहीं करता किन्तु अनजाने उन सिद्धान्तों को अध्यापक से कहीं अधिक अमल में लाता है। इस तरह अमेरिका वालो! अपनी अमली उद्योग-शक्तियों को वेदान्त की आध्यात्मिक शक्ति से मिला कर और इस पूर्ण शिक्षा को भारत में ले जाकर, तुम भारत के पक्ष की और
अतः सारे संसार की सहायता कर सकते हो। आज तो यह दशा है कि भारत के स्वामी और पण्डित अपनी जाति की काहिल नींद को बढ़ाने के लिए लोरियां गा रहे हैं।
यह कहा जाता है कि कारीगरी के महाविद्यालयों (Industrial colleges) और संस्थाओं (Institutions) की स्थापना दोषों को सुधार देगी। क्या सच मुच? नहीं ऐसी संस्थाओं से कुछ काल के लिए भले ही चैन मिल जाय, किन्तु असली कठिनाई, मुख्य क्लेश और भारी दर्द भारत में केवल कारीगरी के महाविद्यालयों से नहीं दूर किया जा सकता। इन दिनों भारत में मज़ूर अपनी मेहनत के लिए क्या पाते हैं? मिसाल के लिए, कुम्हार को ले लीजिए, वह बीस बरतन प्लेट (Plates भोजन-पात्र) बनाता है। उनके बनाने में उसे बहुत समय तक मेहनत करना पड़ती है, और उसे बीस बरतनों के लिए एक टका मिलता है। बीस बरतनों के लिए एक टका! बीस बरतनों के लिये एक टका!! कुछ दूसरे काम करने वालों को सारे दिन की मेहनत के पांच टके मिलते हैं। कुछ ऊँची जाति के लोग हैं, जो महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पढ़ते हैं, उपाधियां पाते और कीर्ति के साथ; एम० ए० (साहित्य के स्वामी) बन कर, निकलते हैं। उनकी माहवारी तनखाह कितनी होती है? आम तौर पर साठ रुपए, अर्थात् बीस डालर से अधिक नहीं, जो दो-तिहाई डालर अर्थात् करीव करीब छासठ टके रोज़ाना रही। किन्तु साधारण एम० ए० को इतना भी नहीं मिलता। साधारण एम० ए० (विद्यापति या साहित्य स्वामी) को प्रायः 45 पैंतालीस ही टके एक दिन में मिलते हैं। भारत की यह दशा है। अमेरिका में तुम्हारा मामूली मज़ूर क्या पाता है? दो डालर (छः रुपए) प्रति दिन। अच्छा, यह
क्या बात है कि हिन्दुस्थानियों को इतना कम दिया जाता है? उनके कपड़े-लत्ते बड़े दरिद्र होते हैं, भोजन बहुत ही दीन होता है, उनके घर बड़े ही हीन होते हैं, उनके आराम का मान (Standard) बहुत ही क्षुद्र होता है। ऐसा क्यों है? देश में पूँजी की कमी के कारण। क्या आप नहीं देखते? पूँजी तो मुल्क से बाहर खींचॉ जा रही है। इस देश में अमेरिकन-भारतीयों (American Indians) के लिए कार्लिस्ल इंस्टीट्यूट (Carlisle Institute) और नीग्रो जाति (Negroes) के लिए टस्केगी इंस्टीट्यूट (Tusekegee Institute) सरीखे कारीगरी के महाविद्यालय यदि हम हिन्दुस्थान में क़ायम करें, तो कुछ हित अवश्य होगा। लोग मेहनत और काम करना सीखेंगे। किन्तु हमारा यह परिश्रम किस की महिमा, किस की बड़ती, किस के लाभ के लिए होगा? कृपया बताइये? मुख्यतः इंग्लैंड के पूँजीपतियों की महिमा बढ़ाने के लिए। भारत के सब बड़े बड़े कारखाने अंग्रेज़ सौदागरों के हाथों में हैं। भारतीय व्यापारी नाम मात्र के पूँजीपति हैं। यूरोप और अमेरिका के पूँजीपति उन्हें अपने फंदे में फँसा लेते हैं। कारीगरी के महाविद्यालयों और शिक्षा के होते हुए भी हिन्दुस्थानियों के हाथ क्या लगेगा? क्या लोगों का लाभ होगा? वे तो तब भी दुःख भोगते रहेंगे। उनका आहाराभाव (Starvation) और अकाल इस तरह न दूर होगा। चिरस्थायी दवा औद्योगिक महाविद्यालयों (Industrial Colleges) से नहीं मिलेगी। तो फिर हमें क्या चाहिए? हमें बहुतेरी चीज़ों की ज़रूरत है। किन्तु वर्तमान समय में उच्च जातियों को, और नीच जातियोंको भी, शिक्षा देनी पहली ज़रूरत है। उन्हें सिखाओ, स्वाधीनता की भावना उनमें उतार दो और खींचत कर दो और
सत्य की निस्स्वार्थ शक्ति से उन्हें भर दो। यही आवश्यकता है। यह पूर्ण शिक्षा कला-कौशल की शिक्षा को भी लपेटा लेगी, किन्तु केवल उद्योग-धंधों से काम न चलेगा। उद्योग-धंधे तो दूसरे दर्जे की चीज़ हैं, किसी उच्चतर वस्तु की बड़ी ही सख्त ज़रूरत है।
इस समय भी भारत में वांछनीय ढंगों पर शक्तियां काम कर रही हैं। उनके काम का हमें विचार करना चाहिए। ईसाई धर्म-प्रचारक अमेरिका से जाते हैं और जी तोड़ काम वहां करते और जाति-भेद को तोड़ने की चेष्टा करते हैं, यह उनका दावा है। वे लोगों को शिक्षा देने का यत्न करते हैं, वे पारहियों, नीचतम जाति को सहायता पहुँचाने की कोशिश करते हैं। किन्तु आओ हम लोग जांच करें कि उनके दावे कहां तक सही हैं। सब से नीची जाति के हितार्थ कुछ करने के लिए भारत उनका कृतज्ञ है। वे एक हद तक महा नीच जाति के लोगों को शिक्षा दे रहे हैं, जिन को किसी दूसरी परिस्थिति में लिखना और पढ़ना सिखाना असाध्य था। अवश्य यह महान कार्य है। मिशन-धर्म-प्रचारक-दल के महाविद्यालय और विद्यालय ऊँची जाति के लोगों को भी उच्चतर शिक्षा दे रहे हैं। भारतवासियों को शिक्षा देने के काम के लिए अब तक बहुत कुछ कर चुकने के लिए हम अमेरिका की धर्मप्रचारिणी संस्थाओं (American Missions) को धन्यवाद देते हैं, किन्तु इस मामले के बुरे पहलू की तरफसे हमें बेपरवाह नहीं होना चाहिए। भारतमें जानेवाले ये इसाई-धर्म-प्रचारक कमसे कम तीन सौ रुपया (हिन्दुस्थानी डालर) महीना तनख्वाह लेते हैं। वे नवाबों की तरह पूरे शाही ठाट बाट से रहते हैं, वे लोगों पर हुकूमत करते हैं, हिन्दू परिवारों में झगड़ा और फसाद वर्पा करते हैं, और भारत की
वर्तमान अनेक जातियों में एक जाति और बढ़ा रहे हैं। जो हिन्दुस्थानी इसाई धर्म ग्रहण कर लेते हैं, वे साधारणतः दूसरे हिन्दुओं के लिए बड़े ही कटु हो जाते हैं, न वे हिन्दुओं में मिलते-जुलते हैं, और न हिन्दू उनमें मिलते-जुलते हैं। आपस के बर्ताव में बड़ा तनाव पड़ता जाता है, भेदकी खाई बहुत चौड़ी होती जाती है, और दिन बदिन बैरभाव बढ़ता ही जाता है। बेटियां माता पिताओं से, और स्त्रियां पतियों से अलग होती जाती हैं। अशिक्षित हिन्दू जनता द्वारा मान्य धर्मादेशों (Dogmas) के स्थान में इसाई धर्मके आदेशों को रखना चाहते हैं, जो और भी रही हैं। इसाई दानशीलता कड़ुई छिद्रान्वेषण (Smarting Criticism) छोटे बच्चों को फुसला कर मा-बाप से छुटा देने और उनकी कोमल गर्दनों को इसाई अन्ध-विश्वासों के जुए के नीचे रखने के काम का रूप धारण करती है। ऐसी दशा में तुम्हारी सद्भाव युक्त ईसायत हिन्दू-हृदय में, जो एक बूंद सहानुभूति, हमदर्दी या प्रेम की भी, इस कड़ुई छिद्रान्वेषण और दलवन्दी की वृत्तिकी लूट-खसोट से शायद बची होती है, उसे भी सुखा देने और निकाल बाहर करने की प्रवृत्ति रखती है। यह है बुरा पहलू (dark side)। इस प्रकार हम देखते हैं कि इस तरह मामले न सुधरेंगे। यद्यपि अति उत्तम अभिप्रायों से करोड़ों रुपया खर्च करने के लिए हम अमेरिका-वासियों के कृतज्ञ हैं, तथापि राम आप का ध्यान इस तथ्य की ओर खींचना चाहता है कि प्रस्तावित दवा (Proposed remedy) ठीक नहीं है, वह केवल रोग को बढ़ाती है।
अंग्रेज़ी सरकार के हम अनेक कारणों से कृतज्ञ हैं। अंग्रेज़ी सरकार ने भारत में मूल जाति-भेद को तोड़ने के लिए बहुत कुछ किया है। अंग्रेज़ी सरकार ने भारत में शिक्षा
को उत्तेजन दिया, अंग्रेज़ी सरकार ने वहां विश्वविद्यालय और महा विद्यालय स्थापित किये। अंग्रेज़ी हुकूमत की ही बदौलत हिन्दू अपने प्राचीन धर्म ग्रन्थों को विधिपूर्वक पढ़ने में समर्थ हुए। यह अच्छा पहलू (bright side) है। अब अन्धकार वाला पहलू (dark side) लीजिए। ब्रिटिश सरकार ने भारत का सब कुछ हर लिया है। अंग्रेज़ी सरकार ने ऊपरी (वाह्य) अभ्युदय (Smattering) हिन्दुस्तानियों को दिया है, किन्तु उसने भारत को हर प्रकार से निर्धन बना दिया है, और उसे ऐसी बुरी दशा में पहुँचा दिया है कि यदि सरकार के ढँग बहुत जल्दी रोके या बदले न गये, तो ग़रीबी हिन्दुओं को खा जायगी और भूतल से वे लोप हो जाँयगे। भारतीय राजा-महाराजा और भारतीय रईस अपने मूल्यवान रत्न और शक्ति खोकर अब केवल गलीचों पर के बने हुए शूरवीरों के चित्रों के समान हो गये हैं, और खोखली भनभनाती हुई उपाधियां तथा लम्बे-चौड़े पोले नाम उनकी सम्पत्ति रह गये हैं। अब भारत को दी जानेवाली शिक्षा के बारे में सुनिये। इन दिनों अंग्रेज़ी सरकार को जन समूह का उत्कर्ष भी खलने लगा है। जब राम भारत में था तब जनता में उच्चतर शिक्षा मात्र (higher education) का प्रचार रोकने का प्रबन्ध किया जा रहा था। अच्छा, इन विश्वविद्यालयों में क्या पढ़ाया जाता है? मुर्दा भाषा, काल्पनिक तत्वज्ञान, गणित विद्या, पिछला इतिहास, उपयोग में न लाई हुई (unapplied) रसायन विद्या, तथा ऐसेही और विषय। किसी भी विश्वविद्यालय या महाविद्यालय में अंग्रेज़ी को छोड़कर कोई जीती-जागती उपयोगी भाषा नहीं पढ़ाई जाती। लोगों को अंग्रेज़ी इस लिए पढ़ाई जाती है कि उन्हें अंग्रेज़ अफ़सरों की ग़ुलामी में काम करना पड़ता है। अंग्रेज़ लोग
देशवासियों की भाषा पढ़ने का कष्ट नहीं उठाना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि लोग उनकी भाषा पढ़ें ताकि उनकी सेवा कर सकें। गणितविद्या पढ़ाई जाती है और इन विश्वविद्यालयों में गणित-विद्या का मान (पैमाना, अन्दाज़ा, standard) अमेरिका से कहीं बढ़ा-चढ़ा है। उन्हें आध्यात्मिक शास्त्र, काल्पनिक (अनुमानशील) शास्त्र और अन्य संक्षिप्त विज्ञान पढ़ाये जाते हैं, किन्तु इन कहने मात्र कला-महाविद्यालय में किसी उपयोगी कला का कोई व्यावहारिक विज्ञान नहीं पढ़ाया जाता। उपयोग में लाई हुई रसायन-विद्या नहीं पढ़ाई जाती, बीनने और खानों सम्बन्धी विद्या की शिक्षा विश्वविद्यालयों में नहीं दी जाती। रंगसाज़ी, कुम्हारी, मिकैनिकल इंजीनियरी (Mechanical Engineering-यंत्र संबन्धी विद्या) नहीं सिखाई जाती। इन उपयोगी हुनरों से भी लोग वंचित रखे जाते हैं, शस्त्र-विद्या की तो बात ही क्या कहना। अपने घरों में किसी तरह के शस्त्रास्त्र लोग नहीं रखने पाते। कोई अपने घर में बड़ा चाकू भी नहीं रख सकता। बड़ा चाकू रखनेवाले को जेल दी जाती है। किसी तरह शस्त्रास्त्र या युद्ध विद्या की इजाज़त नहीं है। इस से तुम उस शिक्षा की असारता जान सकते हो जो कुछ धनिक हिन्दुओं या मुसलमानों को, जो भारतीय महा-विद्यालयों की शिक्षा की बहुत बड़ी फीस देने की शक्ति रखते हैं, दी जाती है।
भारत में कुछ नवस्थापित श्रेष्ठ दल हैं जो सुधार का अति सुन्दर काम कर रहे हैं, किन्तु वीरजनों की पूजा और प्रमाण के सामने झुकाने की वृत्ति, जो नस नस में समा गई है, लोगों को उस प्रत्येक वस्तु के विपरीत कर देती हैं जो उन के नेताओं के नाम से उन के पास नहीं पहुँचाई जातीं। हरेक दल या आन्दोलन नामों या व्यक्तियों की छाप अपने
इर्द-गिर्द बाँध लेता है। अपने मरे हुए नेताओं की करतूतों और कहावतों को आगे बढ़ने के लिए चलने का आरम्भक विन्दु बनाने के बदले वे उन्हें सीमान्त रेखायें या न लंघने वाली बाड़ (fence) और झाड़ियां मान लेते हैं। इस तरह पर भारत में सुधार की देशी-संस्थायें जड़वत् स्थिर होने लग जाती हैं।
भारत का रोग आप को बता चुकने के बाद, और इस रोग को दूर करने के उपायों की सूचना देने के पीछे, राम आपसे भारत के लिए चिन्ता करने की, उसका हित चिन्तन करने की, प्रार्थना करता है। पहली आवश्यक चीज़ यही है। यदि भारत के लिए आप का दिल दुःखता है और दिलोजान से आप उसकी पीड़ा दूर करने के काम में लग जाँय, तो सब कुछ हो सकता है। "इच्छा होने ही से उपाय निकल आता है" (where there's a will there's a way)। भारत के लिए कुछ करने का संकल्प कीजिए। क्या मानवजाति की भलाई के विचार से आप भारत के लिए कुछ करने को तैयार हैं? क्या आप भारतको दिलोजान से प्यार करेंगे? एक पददलित जाति के कल्याण के लिये अपना जीवन होम देने को क्या आप राज़ी हैं? क्या उसके काम के लिए आप अपना समय और जीवन लगा देने को राज़ी हैं? तीस कोटि मनुष्य दुनिया की सारी आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा हैं। तीस कोटि मनुष्य! हम उन्हें सिखा सकते हैं, शिक्षा दे सकते हैं, उनकी उद्योग-शक्तियों को अच्छे काम के लायक़ बना सकते हैं। यदि ये तीस कोटि मनुष्य आप के साथ काम करने लग जाँय, यदि वे आपही की तरह विचार करने लगें, यदि उन्हीं बातों में वे अपने दिमागों को भी लगा दें जिनमें आप लगाते हैं, तो क्या आपको उनसे सहायता और मदद
न मिलेगी? यदि तुच्छ लोभों (रोषों) और परेशानियों में बरबाद होने से हिन्दुस्तानियों के दिमाग और शक्तियां बचाई जाँय, और उच्च विचारों तथा श्रेष्ठ भावनाओं में वे लगा दी जाँय, तो भारत की बड़ी भारी आबादी अमेरिका से अधिक फ्रांकलिन (Franklins) और एडिसन (Edisons) पैदा करेगी। इस तरह भारतकी शक्तियों को उपयोग में लाकर क्या संसार के विभूति की वृद्धि न होगी? संसार को समृद्ध करने के लिए, अपने साथी मनुष्यों की सहायता के लिए, अपनी निजी भलाई के लिए, भारत की चिन्ता कीजिप और भारतवासियों को अपनी ही श्रेणी में ले आने की कोशिश कीजिप। यही करना है।
भारत को उठाने के उपाय।
अच्छा, यह कैसे हो सकता है? राम को दो उपाय सुभाने हैं। अवश्य ही, एक तो बात यह है कि अमेरिकावासी, यथार्थ में उत्सुक अमेरिकावासी, सत्य के लिप अपना बलिदान करने वाले अमेरिकावासी, हिन्दुस्तान भेजे जाँय। अमेरिका का कूड़ा हमें न भेजो। अमेरिका में जिन लोगों को कोई काम नहीं मिल सकता, उन्हें हिन्दुस्तान पर न उड़ाओ। समाज का सत, अमेरिका की मलाई, भारतवर्ष को भेजो; इसी की वहाँ आवश्यकता है। हमें वहाँ उन लोगों की ज़रूरत है जो पारहियों, नीचतम जाति, के बीच में जाकर काम करें, जिस श्रम के लिए उन्हें कोई धन्यवाद न मिलेगा, ये शूद्र आप को इनाम न देंगे, वे आप के काम के लिप धन्यबाद भी न देंगे, क्योंकि ये लोग बड़े गरीब हैं, अपढ़ हैं, जाहिल हैं। आप उनके लिप जो कुछ करेंगे उसके पुरस्कारमें वे आपको वस्त्र और भोजन भी न देंगे। क्यों! कारण यह है कि उनके पास खुद ही खाना और कपड़ा नहीं है। वहां उन
पुरुषों की ज़रूरत है जो इन लोगों के बीच में जाकर काम करेंगे, जो अपने को भूखा मारकर इन गरीब आदमियों की सहायता करेंगे। क्या अमेरिका के आदमी इस काम को न उठावेंगे? श्रेष्ठ अमेरिका से, स्वार्थ त्यागी (अपने को बलिदान करने वाले) अमेरिका, से ऐसे महा पुरुष मिलने चाहिएं? एक अच्छी देही बुद्धि लोगों की, एक दल, जो लोग इस काम को करेंगे, उस के पाने की आशा राम रखता है। राम उस ढँग के धर्मप्रचारक (missionaries) नहीं चाहता है, जो भारत को जाते हैं, जो अमीरी-बंगलों में रहते हैं और लोगों पर प्रभुता जमाते हैं, जो जोड़ी गाड़ी में सैर करते हैं और अत्यधिक लौकिक प्रतिष्ठा में पगले बने फिरते हैं। इन लोगों के द्वारा भारत का उद्धार या उत्थान नहीं हो सकता। हमें सच्चे काम करनेवालों की, सत्य के लिये बलिदान होने वालों की, उन त्यागियों की ज़रूरत है, जो पारहियों के साथ ज़मीन पर लौटने को राज़ी और तय्यार हों और जो उनके साथ चीथड़े पहन कर संतुष्ट रहें, जो उनके साथ भूखे रहें, जो उनके साथ अधकच्ची रोटी का खुरखुरा और कड़ा छिलका खाने में राज़ी रहें। हम उस तरह के लोग चाहते हैं जो अपनी इन्द्रियों के भागों को छोड़ सकते हैं और स्वार्थपूर्ण सुखों को छोड़ना पसन्द करते हैं। आप कहेंगे, "यह कठिन कर्त्तव्य है" और "यह काम करना बहुत मुश्किल है।" नहीं, इसे कठिन, धन्यवाद रहित, काम न समझो। इस का काफी इनाम है। निजी अनुभव बतलाता है कि दूसरे मनुष्य को उठाने की यदि हम चेष्टा करते हैं, तो वह आदमी चाहे उठे या न उठे, किन्तु हम अवश्य उठ जाते हैं। "क्रिया और प्रतिक्रिया समान और विरोधी होती हैं", (Action and reaction are equal and opposite)। दूसरों को फायदा
पहुँचाने के विचार से कोई काम उठाने की लोगों की धारणा निरर्थक है, यह मूर्खता भरी भूल है। अमेरिकावासियों! राम के व्याख्यानों से तुम्हारा लाभ चाहे हुआ हो या न हुआ हो, किन्तु उनसे राम का लाभ अवश्य हुआ है, और यही काफी इनाम है। हरेक व्यक्ति का तजुर्बा यही ज़ाहिर करता है। इस पत्र को, इनाम पर बिना दृष्टि रखे, करो। तुम्हारा काम खुद ही अपना पुरस्कार होगा। निस्स्वार्थ काम ईश्वर को ऋणी बनाता है, और ईश्वर ब्याज सहित ऋण चुकाने को बाध्य है। अमेरिकनों! हिन्दुस्थान को जाओ और आत्म-ज्ञान (Self knowledge), आत्म-निर्भरता (Self-Reliance), और आत्म-सम्मान (Self-Respect) या वेदान्त का खूब प्रचार करो। उस दिन तुमने "सफलता की कुंजी" पर राम का व्याख्यान सुना था, और यह साबित किया गया था कि सफलता का एक मात्र रहस्य व्यावहारिक वेदान्त है, दुनिया की दूसरी कोई वस्तु नहीं है। केवल वही सफलता का रहस्य है। उस वेदान्त को प्राप्त करो, उसे स्वयं अनुभव करो, उस पर अमल करो और वहाँ जाओ। तुम अपने ओठ चाहे न खोलना, तुम्हारा चरित्र ही, तुम्हारा व्यापार (कर्म) तुम्हारा बर्ताव, उन्हें शिक्षा देगा।
भारत जाने वालों के ध्यान पर जो अत्यन्त महत्वपूर्ण कर्तव्य अंकित करने के योग्य है, वह है भारतवासियों में साहसिक भाव (adventurous spirit) का जाग्रत करना। वे बेचारे विस्तृत विश्व में नहीं निवास करते, वे अपनी ही रची हुई दीन, चुद्र निजी दुनियाओं (जीव सृष्टि) में वास करते हैं। प्रतिबंधक जाति-प्रथा (Hampering caste system) हिन्दू को भारत से बाहिर पग रखने को मना करती है। दूसरे देशों को जाना और जहाज़ पर सवार होना
कठोर धर्माचार से असंगत है। इन दिनों जिन धनी हिन्दुओं में धर्म की कट्टरता छोड़ देने के लिए काफी साहस और नास्तिकता (अधर्माचार) होती है और विदेशों को, विशेष कर इंग्लैंड को, शिक्षा पाने के लिए जाते हैं, वे हज़ारों भारतीय रुपए दूर देशों में खर्च करते हैं और आम तौर पर पूरे पँखदार (सर्वापूर्ण Full fledged) बारिस्टर या कानूनाचार्य (lawyers) बनकर आते हैं, और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष (परोक्ष वा अपरोक्ष) भाव से मुक़द्मेबाज़ी बढ़ाते हैं, और अपने मुवक्किल, गरीब किसानों से भिटका हुआ रुपया, कुछ नाशकारी अंग्रेज़ी शराबों और मद्यों के अलावा, सहज में टूट जाने वाले काँच के पदार्थ (Brittle glassware), लोहे की चीज़ें (cutlery) चित्रपट (tapestry) या इंग्लैंड के बने हुए चित्र खरीदने में खर्च करते हैं। जिन गरीब भुक्खड़ मज़ूरों की तनुकसिज़ाजी और मुक़द्मेबाज़ी उनकी गरीबी और भूख की वृद्धि के अनुसार ही बढ़ती जा रही है। उनसे हरण किए हुए धन का यह कैसा भयंकर दुरुपयोग है।
भारतीय गरीब जातियों में जापानियों की साहसिक मनोवृत्ति के प्रचार करने की बहुत ही बेढब ज़रूरत है। जापानी लड़के केबल जहाज़-भाड़ा लेकर अमेरिका चले आते हैं। वे अमेरिकन भद्र पुरुषों के घरों में काम करते हैं और विभिन्न प्रकार की पाठशालाओं में पढ़ने का भी प्रबन्ध कर लेते हैं। इस तरह अमेरिका में कुछ साल बिता कर वे अपनी जेबें खचा खच रुपए से भर कर और दिमाग विद्या से भर कर जापान को लौटते हैं।
अन्ध विश्वास और (जन्म) भूमि से चिपटे रहने को त्याग देने की शिक्षा भारतवासियों को देना उचित है; जाति के कारण उन्हों ने अपने को (जन्म) भूमि का दास बना
लिया है। अपने पूर्व पुरुषों की भूमि को छोड़ना वे किसी अंश में धर्म लंघन समझते हैं, और इस तरह अपने को भूमि का गुलाम बनाते हैं। समय की गति के साथ २ बढ़ने वाला बनाने के लिये हमें उन्हें स्वदेश छोड़ कर विदेश जा कर बसने की शिक्षा देनी चाहिए। लोग यूरोप से निकल पड़े, यहाँ अमेरिका आये, और अमेरिका को उन्हों ने इतने ऊँचे पर पहुँचाया कि यूरोप बहुत पीछे पड़ गया। यदि हिन्दुस्तानी देश त्याग करके अमेरिका आवें, दूसरे देशों को जाँय, तो भारत को कम लोगों को खिलाना पड़े, और फलतः वहाँ पीछे रह जाने वाले लोग मज़े में हो जाँय और देशांतरगामी भी अच्छे रहें। हमारे शरीर-तंत्र के स्वास्थ्य के लिए रक्त को घूमते रहना चाहिए। इसी तरह दुनिया या किसी देश के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए लोगों को प्रातः घूमते, विचरते और एक-दूसरे से मिलते-जुलते रहना चाहिए, अन्यथा जड़ता या मृत्यु की प्राप्ति होगी। यदि हम इंग्लैंड और अमेरिका से जाँय और हिन्दुओं को शिक्षा देने का यत्न करें, तो लाख चेष्टा पर भी हम वास्तविक स्वाधीनता के भाव को उन में नहीं जगा सकते, क्योंकि आम तौर पर लोगों के आस-पास के पदार्थ, सादृश्य निकटवर्ती वस्तुएँ, जड़ बनाने वाली हैं, सब ओर से सम्मतियां वा सूचनायें इन लोगों को दुर्बलता के मोह में फँसा रखती हैं। यह मोह-जाल दूर होने के लिए उन्हें स्वदेश को छोड़ना चाहिए। और जब वे अमेरिका तथा दूसरे देशों को जाँयगे, तब, चाहे वे कोई विद्या या रोज़गार भी वहां न सीखें, केवल विदेशी सभ्य लोगों से मिलने-जुलने से ही वे अनजाने, मर्ज़ी से या बेमर्ज़ी से स्वतंत्रता की वृत्ति प्राप्त करेंगे, उनकी दृष्टि की दौड़ बढ़ जायगी, उन का क्षेत्र विस्तृत हो जायगा, उन के विचार
फैल जाँयगे। यह आप ही शिक्षा है। "दूसरे देशों को देखना खुद ही शिक्षा है"।
भारतवर्ष में एक हिन्दू या मुसलमान, या कोई भी साधारण देशवासी, एक अंग्रेज़ या अमेरिकन के पास जाने की हिम्मत नहीं कर सकता। वह गोरे आदमी से डरता है, बीस या तीस फुट की सम्मान पूर्ण दूरी पर खड़ा होता है। वह पतलूनों और हैटों को देख कर काँपता और थर्राता है। एक रेलगाड़ी में यदि कोई यूरोपीय बैठा होता है, तो शायद ही कभी कोई देशवासी उसके साथ बैठने पाता है। रेल के स्टेशनों पर हिन्दुस्थानियों का अंग्रेज़ों से ठोकरें खाना और निकाला जाना राम ने देखा है। यदि कोई यूरोपीय किसी देशवासी को अपने घर की तरफ आते देखता है, तो वह अपने नौकर से उसे जाकर भगा देनेको (हाते से ठोकरें लगाकर निकाल देने को) कहता है। इस तरह भारतवासियों पर विदेशियों से दुर्बलता, दुर्बलता, दुर्बलता का जादू किया जा रहा है। और फिर अपने सजातियों द्वारा, अपने ही स्वदेशियों द्वारा उनपर ईर्ष्या, क्लेश और मत भेदों के जादू का चक्र चलाया जाता है। "वह कोई अन्य वस्तु है, मैं कोई दूसरी वस्तु हूँ, वह मेरा प्रतिद्वंदी है, अभुक मेरा शत्रु है"। फिर सब सरकारी दफ्तरोंमें, अच्छी नौकरियोंके देने में कुल या जाति-भेद के विचारके द्वारा, सरकार दलबन्दी के भाव को बढ़ाती है, और इस तरह पर काम चलाती है कि हर मनुष्य अपने भाई का शत्रु हो जाय, और उसे अपना घोर बैरी समझे। भारत की वर्तमान राजनैतिक और सामाजिक दशा लोगों में स्वतंत्रता का भाव पूर्ण खचित न होने देगी। शिक्षा क्या वस्तु है? शिक्षा का लक्ष्य स्वाधीनता के सिवाय और कुछ नहीं है। यदि शिक्षा मुझे
स्वाधीनता और स्वतंत्रता (मोक्ष) को नहीं देती, तो उस पर धिक्कार है; हटाओ उसे, मुझे उसकी ज़रूरत नहीं। यदि शिक्षा मुझे बन्धन में रखती है, तो वह मेरे किस काम की। इस तरह, उनमें सच्ची शिक्षा, या स्वाधीनता उत्पन्न करने के लिए, अपना आस-पास बदलने में उनकी सहायता करो। यह कैसे किया जाय? यह काम करने का एक ढँग तो वहाँ जाना और उन्हें सिखाना है।
अपरिहार्य आवश्यकता और तात्कालिक उद्धार।
एक और तात्कालिक उपाय है। ऐ अमेरिकनो! क्या तुम सत्य और न्याय के नाम में, धर्म और तत्वज्ञान के नाम में, विज्ञान और हुनर के नाम में, इतना काफी रुपया नहीं जमा कर सकते कि जिससे तुम भारतीय विश्व विद्यालयों के कुछ उपाधि प्राप्त युवकों को अमेरिका बुलाओ, और यहाँ उन्हें आपकी औद्योगिक, यात्रिक तथा अन्य उपयोगी कोठियों में, अपने साहित्य महाविद्यालयों में, अपने अस्त्र-शस्त्रागारों और अन्य स्थानों में शिक्षा दिलाओ, उन्हें कपड़ा बीनना और खानों का काम तथा दूसरे हितकर हुनर सिखाओ और पढ़ाओ? भारत को उठाने का यह बहुत ही सीधा रास्ता है। यहाँ रुपया जमा करके भारतवासियों को इस देश में बुलाओ। वे भारतवासी, जो अमेरिका में शिक्षा पावें, भारत को लौट कर औद्योगिक विश्व विद्यालय (Industrial Universities) चला सकते हैं। वे गरीब आदमियों के रंग-ढंग जानते हैं। वे गरीब हिन्दुस्थानियों की भाषा, आदतें
और रीतिशां जानते हैं, और तुम्हारे अमेरिकनों की अपेक्षा वे अध्यापक की हैसियत से भारतवासियों में अच्छा काम कर सकते हैं। अमेरिकन अध्यापक केवल ऊँची जातियों को पढ़ा सकते हैं, वे केवल अमीर लोगों को पढ़ा सकते हैं जो अंग्रेज़ी जानते हैं। गरीब लोग अंग्रेज़ी नहीं जानते। गरीबों की शिक्षा के लिए हमें उन लोगों की ज़रूरत है जो उनकी भाषा और उनके तरीके जानते हैं। भारतवासियों को उठाने का यह ठीक ढँग और अत्यन्त अमोघ साधन है।
अमेरिका के स्वतंत्र तट पर जब भारतवासी क़दम रखेंगे और भद्र महिलाओं और पुरुषों को सरगर्मी से अपने से हाथ मिलाने और अपने बराबर वालों के समान स्वागत करने को तैयार पायेंगे, तब उनका डर भाग जायगा, फिर श्वेतांग पुरुष उनके लिए महा भय की सामग्री नहीं रहेगा, उनमें आत्म-विश्वास लौट आयगा, माया का पर्दा फट जायगा और स्वाधीनता की मनोवृत्ति प्रत्यक्ष प्राप्त हो जायगी। अमेरिका में शिक्षा पाये हुए भारतीय विद्यानिधियों (graduates) को कार्य और स्वाधीनता के प्रचारक होकर अपनी मातृभूमि को लौटने दो। विज्ञान और कला की शिक्षा भारत में उनके द्वारा प्रचारित होने दो। अपने देश में व्यावहारिक वेदान्त फैलाने में भारत के बसने वालों की सहायता होने दो। इस तरह से जब घाव पूर जायगा, तब पपड़ी आपही आप गिर जायगी। जब लोग ठीक तरह की शिक्षा पावेंगे तब दूसरी कठिनायां आप ही दूर हो जाँयगी। यदि कुछ भारतीय उपाधि-प्राप्तों को तुम यहां बुला सको और, मान लो, उन्हें दो या साल तक शिक्षा दे सको और पढ़ा सको, तो वे भारत लौटने पर तुरन्त काम शुरू कर सकते हैं, रोज़गार चला सकते हैं, अपने लिए और महा गरीब जातियों
(लोगों) के लिए भी उपयोगी काम कर सकते हैं।
अमेरिका का एक ही धनी इस श्रेष्ठ काम को कर सकता है, खड़ा होकर कह सकता है कि भारतीय विश्वविद्यालयों के उपाधिप्राप्तों को अमेरिका में शिक्षा दिलाने के काम में मैं, मान लीजिये, तीस लाख रुपया लगाऊँगा। यदि तुम में से एक आदमी इस कर्त्तव्य को अभी उठा ले, इस काम को ले ले, और तीन लाख रुपए जमा करदे, तो गरीब भारतवासियों को अमेरिका में शिक्षा दिलाने के लिए हम अच्छी छात्र-वृत्तियां स्थापित कर सकते हैं। राम अमेरिकन समाचारपत्रों से विनती करता है, राम हरेक और सब अमेरिका वासियों से विनती करता है। यदि तुम में से कोई आगे बढ़ कर इस भार को उठा सकता है तो समग्र संसार का हित करोगे। मान लो कि जो लोग यहां मौजूद हैं, उनमें एक भी इतना धनी नहीं है, तो क्या अपने अमीर मित्रों, अपने अमीर पड़ोसियों के सामने तुम इस विषय को नहीं रख सकते? क्या तुम अपने अमीर मित्रों से एक बार राम से मुलाकात करने को नहीं कह सकते? यदि तुम हज़ारों नहीं दे सकते, तो क्या अपनी विधवा का यत्किंचित धन भी नहीं दे सकते? कम से कम इतना तुम कर सकते हो। राम तुम से कुछ अपने लिप खाने को नहीं चाहता, राम तुम से अपने लिए कोई कपड़े नहीं माँगता। नष्ट हो जाँय ये ओठ यदि ये निज के स्वार्थ के लिए कुछ माँगे। यह काम तुम्हारा भी उतना ही है जितना राम का। राम ठीक उतना ही अमेरिकन है जितना भारतीय। विस्तृत विश्व मेरा घर है और भलाई करना मेरा धर्म (The wide world is my home & to do good is my religion)। ऐसा राम के हृदय का उतना ही नगीची और प्यारा है जितना कृष्ण। राम के लिए बुद्ध भी वैसा ही अपना
है जैसा शंकर। राम इस या उस सम्प्रदाय का नहीं है। राम तुम्हारा है, सत्य तुम्हारा है। सत्य के नाम में, न्याय के नाम में, मनुष्यता और अमेरिकन स्वाधीनता के नाम में, तुम से आगे बढ़ने को, भारत की वेदना को अनुभव करने को कहा जाता है। तुम क्या करने को हो? कुछ लोग क़लम से सेवा कर सकते हैं, कुछ वाणी से सहायता पहुँचा सकते हैं, अपने दोस्तों से इस बारे में बात-चीत कर सकते हैं, और इस विषय पर व्याख्यान दे सकते हैं। कुछ शारीरिक श्रम से सहायता कर सकते हैं, कुछ अपनी थैली से मदद कर सकते हैं। अब कहो, अमेरिकनों कहो, किस तरह पर तुम इस पत्र को ग्रहण करने को उद्यत हो? किस तरह तुम सहायता करोगे? धनिकों को धन देना चाहिए, शूरवीरों को शिक्षकों की हैसियत से आगे बढ़ना और हिन्दुस्थान जाकर लोगों में, नीच जातीय पारहियों में भी, काम करना चाहिए। वाणी के (gifted talkers) वरपुत्रों को इस मामले पर अपने धनी मित्रों से बातचीत करनी चाहिए। समाचार पत्रों को लेखनी से इस पत्र को ग्रहण करना चाहिए। जो सहायता करने को प्रस्तुत हैं और सत्य की सच्ची लगन जिनमें है, जो अपने आत्मा को प्यार करते हैं, उन सब से राम के पास आने और अपने नाम तथा पंत लिखा देने की प्रार्थना की जाती है, अपने ही हाथ से वे लिख दें कि किस तरह पर वे सहायता करने को राज़ी हैं। यदि वे कोई रकम जमा करना चाहते हैं, तो अमेरिकन संरक्षकों के हाथ में रुपया दे दिया जायगा। तुम्हारे अपने अमेरिकावासी उस रुपए को रक्खेंगे यदि तुम आकर दूसरे तरीकों से सेवा करने के लिए अपने को अर्पण करना चाहते हो, तो ऐसा कर डालो जिससे हम विधिपूर्वक काम शुरू करने का निश्चित प्रबन्ध कर लें।
तुम क्या करने को राज़ी हो? भारतवासियों की ओर से अमेरिकनों से यह राम की विनती है। निष्काम-भाव से राम यह विनती करता है। राम का इससे कोई व्यक्तिगत सरोकार नहीं है। राम कहीं भी हो स्वाधीन है। राम किसी तरह से भी बन्धा हुआ नहीं है, सब लोक राम के हैं। राम सब कहीं रह सकता है। किन्तु देखो, भारत तुम्हारे अपने पैर हैं, और तुम सिर हो। चरणों की उपेक्षा न करो। यदि पैर ज़खमी और पीड़ित हैं, तो तुम लड़खड़ा कर गिर पड़ोगे। भारत वासियों के रूप में ईश्वर तुम्हारे पास भूखा आया है, उसे खिलाओ। हिन्दुओं के रूप में ईश्वर तुम्हारे पास नंगा आया है, उसे कपड़े पहनाओ। उन लोगों के रूपमें ईश्वर तुम्हारे पास व्याथित और ज़रूरत का मारा आया है, उसकी खबर लो। ये लोग इसी लिए अन्धकार और यातना में पड़े हुप हैं कि तुम दान और प्रेम के श्रेष्ठ गुणोंसे अपने को धन्य कर सका। वे इसी लिए गिरे हुप हैं कि तुम्हारा उद्धार हो। अपने ग्रहों को धन्यबाद दो कि तुम्हें अपनी उदात्त वृत्तियों (उच्च भावों) और श्रेष्ठ प्रयत्नों के अनुशीलन का अवसर प्राप्त हुआ है। अवसर से लाभ उठाओ, और प्रसन्नता पूर्वक, हँसी-खुशी, उन्हें सहायता पहुँचाओ।
अमेरिका चीनियों, जापानियों, सुर्ख हिन्दुस्थानियों (Red Indians) और निगरो लोगों को शिक्षा दे रहा है। पशुओं के प्रति भी निष्ठुर व्यवहार रोकने में वह कोई कसर नहीं उठा रखता है, ऐ अमेरिका! ये हिन्दू तेरे अपने ही मांस और रक्त हैं, आर्य जाति के हैं, बड़े ही छुतछ्रु हैं, स्नेही हैं, वफादार हैं, इनकी उपेक्षा न कर।
130 स्वामी रामतीर्य
पुनः:— जिन्हें इस विषय में कुछ अधिक जानना हो, वे पत्र-व्यावहार करें।
राम स्वामी से, भारफत डी, अलबर्ट हिलर, एम, डी, 10।11 सटर स्ट्रीट सैन फ्रांसिस्को, कैली फोर्निया, यू. एस. ए.
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नोट—यह व्याख्यान प्रथम २ अमेरिका में प्रकाशित हुआ था, तत्पश्चात् सन् 1903 के अन्त में भारतवर्ष के प्रसिद्ध पत्र इंडियन मिरर (Indian Mirror, Calcutta), में प्रकाशित हुआ। फिर यह अप्रिल 1905 में सक्खर (सिन्ध) के यन्त्रालय एडवर्ड प्रेस में पुस्तकाकार में छपा। भारतवर्ष की राजनैतिक दशा में तब से अबतक बहुत ही परिवर्तन हो गया है, इस लिये स्वामी जी के कुछ कथन आज कल बिलकुल ठीक नहीं बैठते हैं, परन्तु मूलव्याख्यान कायम रखने के लिए उसे जैसे का तैसा दे दिया गया है।
सम्पादक