श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

निजानन्द सकल विभूतियों का तमस्सक है।

भाग 19 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 19 · अध्याय 7 / 7

निजानन्द सकल विभूतियों का तमस्सक है।

( श्रीमान् स्वामी नारायण के शरीर व श्रीमान् स्वामी राम की लेखनी से लिखित इस लेख को स्वामी राम ने गंगा में गंगा हो जाने से कुछ घंटे पहले लिखा था )

आज सत उपदेश के एक पर्चे को मानो हवा उड़ा लाई। उठाया तो उस में एक लेख इस शीर्षक के साथ था:— "राम बादशाह के नाम खत"। वाह ! —

ऐ कवूतरी परी व कूए व बाम आन् परी। नामए बर गर्दनत बनदम गर आँजा बगुज़री ॥ बेहद हँसी आई। अब आते हैं उन आक्षेपों के उत्तर— ( 1 ) क्या भगवे कपड़ों से साधु होता है ? कहीं-कहीं रंगे कपड़ों में रंगा दिल भी पाया जाता है, मत- वाला योगी भी दिखाई देता है, राम का दीवाना मस्ताना भी झलक (दर्शन) दिखा जाता है। किंतु सब जानते हैं कि आत्मा का प्रकाश फ़क़ीरी लिबास में असीर (क़ैद) नहीं। यह सच्ची स्वतंत्रता किसी तरह के मार्ग, संप्रदाय, ढंग और फ़ैशन की अभ्यस्त नहीं है। जहाँ जाते हुए पाँव थर्रा जाँय और शिर चकरा जाँय, वहाँ भी यह बिजली चमक जाती है, यह वत्ती झलक जाती है। यह सूर्य ऊँचे हिमालय के पवित्र हिमानी (बर्फ़स्तान) की स्वच्छ-निर्मल नीली झीलों में झाँकता हुआ पाया, और गहरी खाई के गंदले पानी में भी गौरव से प्रकाशमान दृष्टि गोचर हुआ। क़ैदख़ाने में वह आ जाता है और लोहे की कड़ी ज़ंजीरें पड़ी रह जाती हैं, बरन् इस से भी अधिक जकड़े हुए हाथ पैर रूप और नाम

की बेड़ियां भी धरी रह जाती हैं। अँधेरी कोठरी में बंद क़ैदी (ईश्वर के हाथ में हाथ डाल कर सातों लोकों) में स्वच्छंद विचरता है। या आठवें अर्श (आकाश वा लोक) पर इस अकेले की नीली घोड़ी के सुम की टाप सुनाई देती है। नीचे बाज़ार में लोग चल रहे हों, ऊपर छत पर घर वाले काम काज में लग रहे हों, एक कोने में बैठा कोई पढ़ रहा हो, ए लो ! पढ़ते-पढ़ते वह अक्षर पढ़ा गया जो लिखने ही में नहीं आ सकता। वह किताबें-अक्ल की मेज़ पर जो धरी थी यों ही धरी रही। खिलवत दर अंजुमन हो गई, मंगल ही में जंगल का मज़ा आ गया। सैर को निकले। सौभाग्य से कोई साथी साथ न हुआ। चाँदनी खिल रही थी, या उषा (twilight) की लाली फैल रही थी। वायु सरसराने लगी। सड़क पर चलते एकाएक यह कौन आ सम्मिलित हुआ ? वही जो एकमेवाद्वितीयम् है। उधर उषा की लालिमा भाई, इधर निराली मदिरा रग और रेशा में समाई।

आँ मै कि ज़ दिल ख़ज़द या रूह दर आमेज़द। मख़मूर कुनद जोशश मर चश्म खुदा बीं रा॥ अर्थ—वह मध जो दिल से उठती है या आत्मामय हुई होती है, वह ईश्वर द्रष्टा (आत्मानुभवी) के चित्त में उस के जोश को बढ़ा कर उसे अधिक मस्त करती है।

रेलगाड़ी में बैठे थे। पहियों के खटखट का लगातार खटराग जारी था। कमरे में बात करनेवाला कोई न था। खिड़की का पर्दा जो गिराया तो यकायक दिलोजान में दुलहा (प्यारा) उतर आया। रेल में बैठे के शरीर और संसार नहीं मालूम कहाँ का टिकट ले गए। आत्मिक-त्याग, (संसार और स्वर्ग का विराग) छा गया। सच्ची फ़क़ीरी

ने बहार दिखाई। कहे गिरिधर कवि राए चढ़ी जिन खुद की मस्ती। तिन ज्ञान गंग में दीनी बहाय फ़क़ीरी गृहस्ती। ( 2 ) क्या अग्नि के रंगवाले (भगवे) कपड़ों से साधु हो जाता है ?

साधु वह है जिस के भीतर ज्ञान की अग्नि ऐसे भड़क रही हो कि देह का अभिमान या साधु होने का अभिमान रेल तार इत्यादि नए ढंगों से द्वेष या पुराने ढंग से प्रीति, बिलकुल जल जाय। सारे संसार को उस के ज्ञान-प्रकाश की रश्मियों से उजाला पड़ा हो और आगे चलने का मार्ग दिखाई पड़ा आप। यदि यह नहीं, तो गीला ईंधन है जो धुआँ ही धुआँ कर रहा है, जिस से सब लोगों का नाक में दम हो रहा है। जब तक सूखेगा नहीं, न आप प्रकाशित होगा, न किसी को प्रकाशित करेगा। दिल नहीं रंगा, तो कपड़े रँगने से अपना या पराया दुःख कहां दूर हो सकता है ? लोग कहते हैं ज्ञानाग्नि (आत्म-प्रकाश) की अग्नि भड़काने के लिये ईंधन को पहले धूप में सुखा लो, अर्थात् कर्म-उपा- सना के द्वारा अधिकारी बना लो। राम कहता है, जो लकड़ी कट चुकी (जो मनुष्य साधु हो चुका), उसके लिये इस आग के पास पड़े रहना ही बहुत जल्दी सुखा कर अधिकारी बना देगा। हाँ, जो अभी छोटे पौधे हैं, उनको उगने तो दो। उगेंगे नहीं तो लकड़ी ईंधन के लिये कहाँ से आएगी ? बकरे की ऊन उतारने से ही ऊनी कपड़े बनते हैं, पर उन बढ़ने तो दो। आएगी ही नहीं, तो पशम कहाँ से लाओगे ? इस प्रकार जिन लोगों के खयालात (अंतःकरण) अभी कच्चे पौधों के तद्वत् हैं, वह आशा के बच्चे न तो कटने के योग्य हैं, न जलने के। जिन पर ऊन आई ही नहीं, उतारेंगे

क्या ? वह मूँड़ मुँडवाएंगे क्या ? ऐसे लोगों के लिये कर्म- मार्ग प्राचीन काल से नियत चला आता है, कि वह आशाओं के खट्टे-मिट्ठे फल कुछ दिन ज़रा चखें और कर्म की भूल भुलैयाँ में ठोकरें और टक्करें खा खा कर ज्ञान और त्याग के सीधे मार्ग को अपने आप बोयँ (लवें)।

ज़रा अब और कीजिए, पौधा उसी आकार में बढ़ेगा जिस प्रकार का बीज होगा। कृष्ण ने देखा कि अर्जुन के भीतर बीज तो है बदला लेने का, और ऊपर से उस समय बातें बना रहा है दयालु ब्रह्मचारी की सी। बीज तो बोया काँटेदार कीकर का, और पकाया चाहता है आम। विवश उसे दयालु की ओर से हटाकर युद्ध-विग्रह पर प्रस्तुत किया। प्यारे! खा तो लिया जमालगोटा (जब्बोलोटा) और अब जंगल (शौचा- लय) जाने में लज्जा मानते वा कष्ट अनुभव करते हो। कर्मकाँड के विषय में भी यही दशा वर्तमान-काल के भारतवर्ष की है, अर्थात् इच्छाएँ हृदय-नेत्र पर बांये बैठे हैं वीसवीं शताब्दीवाली, और बातें लगाते हैं बीसवीं शताब्दी ईसा से पूर्व वाली। कर्मकांड के विषय में जैसी चाह (इच्छा) होगी, वैसा ही 'चाहिए' (कर्तव्य) शिर पर चढ़ा रहेगा। यदि राजसूय, अश्वमेध, दर्शपौर्णमास, अग्निष्टोम आदि यज्ञों वाली चाह अब हृदय में नहीं, तो इन यज्ञों का "करना चाहिए" भी आज हम पर अधिकृत नहीं होगा। आज चाह है योरप, अमरीका, जापान, आस्ट्रेलिया आदि के मुकाबले में ज्यों त्यों करके जान बचाने की, अतः आज "चाहिए" भारतवर्ष को इस प्रकार की शिक्षा पाना और कला-कौशल को व्यवहार में लाना कि जिससे नित्य वर्द्धमान अभावों (बे सरो सामानी) के पाप से तो बच सकें। कर्मकांड समय और देश के साथ सदैव पहिले बदलता

चला आया और भविष्य में बदलता रहेगा। पर आत्मा (तत्व वस्तु) परिवर्तन-रहित है, और उसका ज्ञान सदैव एक रस रहेगा। जो लोग अपने स्वधर्म को (अर्थात् अपने से संबंध रखनेवाले कर्मकाँड को), अपनी वर्तमान ड्यूटी (कर्तव्य) को निष्काम होकर (फल की आशा त्यागकर) पूर्ण साहस से, परिश्रम और ध्यान से निवाहते हैं, वह ही एक आत्मज्ञान के प्रकाश से प्रकाशमान होते हैं।

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर। असक्तो ह्याचरन् कर्म परमाप्नोति पुरुषः॥ 16॥

अर्थः—इस लिये लगातार संग रहित होकर तू करने योग्य कर्म को कर, क्योंकि निरासक्त होकर कर्म करता हुआ पुरुष परम गति को प्राप्त होता है। ( भगवद्गीता 3 श्लोक 16 )

आत्मज्ञान विष्णु है, जो साहस और पुरुषार्थ के गरुड़ पर बैठता और सवारी करता है। यह आत्मज्ञान अपने गरुड़ (साहस) पर सवार हो जब भारतवर्ष की वायु पर लहराता था, तो इस सच्चे पति की प्रेम भरी दृष्टि का शिकार होने के लिये लक्ष्मी चारों ओर नाचती थी, बरन् वन-पर्वत में लोटती फिरती थी। पृथिवी ने छिपे छिपाए कोष और रत्नादि चरणों में ला उपस्थित किए, अनमोल हीरे उगल दिए, चरणों पर न्योछावर किए। प्रस्फुटित वसंत (शागिफ़तः बहार) ने पैर के तलवों का चुंबन किया।—

दौलत गुलामे-मन शुदो इक़बाल चाकरम।

अर्थः—विभूति मेरी दासी और वैभव मेरा चाकर हो गया जहां शमशाद के वृक्ष होंगे, कुमरी आ बैठेगी; गुल व लाला होंगे, बुलबुल आ चहचहाएगी। तुम भारत में विद्या और शिल्प की खुराक खिलाकर साहस के गरुड़ को तो

पालो, वही व्यावहारिक ज्ञान रूपी विष्णु फिर यहाँ विद्यमान पाओगे। अरे ज्ञानस्वरूप ! आनंद रूप ! यदि भारतवर्ष के 52 (बावन) लाख साधु-संतों में एक हज़ार भी ऐसे हों जिनके हृदयों में आपकी ज्ञान-गंगा की एक तनिक-सी नहर लहरें मार रही है, तो भारतवर्ष तो क्या, सारा संसार कृतार्थ हो जायगा।

एह जग रूढ़दा जांदा, संतां नूँ ख़बर करो। संत न होंदे जगत में, जल मरदा संसार॥

जिन लोगों को अर्थ-शास्त्र (Political Economy) के नाम से ब्रह्मनिष्ठ महात्माओं की विद्यमानता अखरती है, वह अपना ही बुरा चाहते हैं।—

संगे ज़नी बर आइना बर खुद हमे ज़नी।

अर्थ—दर्पण पर पत्थर मारना मानो अपने आप पर पत्थर मारना है। जो साधु अपने रँग में रँगा हुआ ब्रह्मानंद के मद में मतवाला मस्ताना हो रहा है, वह तो शाहों का भी शाह है, ईश्वर का भी ईश्वर है, किसको मजाल है कि उस रंगीले सजीले आत्मतत्व के सम्राट के आगे चूँ भी कर जाय। नव- चन्द्रमा (वा द्वितीयका चाँद) उसी के चरणों में प्रणाम करता हुआ संसार में उत्सव (ईद) लाता है। सूर्य उसी की प्रकाश देनेवाली दृष्टि से दीप्तमान होकर चमकता फिरता है। समुद्र का तूफ़ान उसी का एक क्षुद्र उफान (उबाल वा जोश) है। किसकी शक्ति है उस तेज की आँधी की ओर आँख भरके ताक जाय। महाराजा रंजीतसिंह की एक आँख नहीं थी, पर कहते हैं, साधु ने वर दिया कि किसी में यह साहस न पड़ेगा कि तेरे मुखड़े की ओर आँख उठा सके, क्या मजाल (बल),

कि वह दोषान्वेषण करे। जब राजा रंजीतसिंह के मस्तक के दोष-गुण कोई नहीं देख सकता, तो महात्मा साधु, सच्चे बादशाह, की ओर दोष दर्शक (छिद्रान्वेषी) दृष्टि देखते समय क्या अंधी न हो जायगी ?—

सहर खुरशेद लज़ां बर दरे-कूए तो मी आयद। दिले-आईना रा नाज़म कि बर रूए-तो मी आयद॥

अर्थः—कि तू ऐसा सुंदर है कि प्रातः काल सूर्य तेरी गली में काँपता हुआ आता है। पर शीशे के दिल पर मुझे गर्व है कि वह तेरे सामने होता है। सच्चे साधु, फ़क़ीर (ज्ञानी-महात्मा) के विरुद्ध यदि किसी की जिह्वा बोलने लगेगी तो गूंग हो जायगी, हाथ चलने लगेगा तो सूख जायगा, मस्तिष्क सोचने लगेगा तो जनून आ जायगा। कोई शंका-संदेह वाली बात तो राम कहता ही नहीं, आँखों देखी सचाई बर्णन करता है। सच्चे साधु की अवज्ञा हो और राम से ? हर, हर, हर ! स्वप्न में भी संभव नहीं। क्या कर्मकांड के बंदी और क्या सचमुच स्वतंत्र साधु, सबको प्रणाम, राम-राम, सलाम। साधु फ़क़ीर को यह सम्मति देना कि वह अद्वैत का अमृत पिलाने के स्थान में रेल तार जहाज़ बंदूक आदि बनाने की चिंता में डूब मरें, यह सम्मति और परामर्श राम के हृदय और जिह्वा से तो न निकला, न निकलता है, न निकलेगा। हाँ ! जब साधु लोग अपने स्वरूप को भूल अपनी सच्ची राजगद्दी से नीचे उतर आते हैं, तो उनको कुत्ते भी फाड़ खाने को दौड़ेंगे। इस दशा में अपनी अवज्ञा वह स्वयं कराते हैं, अपमान और दुःख को एक तरह लालच देकर बुलाते हैं। इंद्र जब "स्वप्न में शूकर बन" गया, तो शेष देवता अपने राजा की यह गति (दशा) देखकर लज्जित हुए और उसको

जगाने की चिंता में पड़े, अतः इंद्र को दुस्स्वप्न में खुजली, भूख, मार-पीट आदि तरह-तरह की पीड़ा और शोक का (शिकार) होना पड़ा। सूर्य-ग्रहण के अवसर पर सूर्य के स्पेक्ट्रम (spectrum) में काली धारियाँ देखी जाँय, तो सफ़ेद दिखाई देती हैं। जानते हो, ये धारियाँ क्या बताती हैं ? उनसे यह पता लगता है कि सूर्य में कौन-कौन सी धातु आदि तत्व हैं। सूर्य की संपत्ति का खोज मिलता है। ग्रहण के भीतर जो संपत्ति प्रकाशित जान पड़ती थी, उस पर जब छाया उतरा तो वह ग्रहण के अंधेरे में काली कलंक दृष्टिगोचर होने लगी। यही दशा प्रत्येक "मैं" "मेरी" (अर्थात् अधिकार- कब्ज़ों) की है। अज्ञान रूपी ग्रहण का अंधेरा, जो स्वतः बुरे से बुरा कलंक है, लगा रहे तो यह छोटे-छोटे कलंक अर्थात् हमारे दावे और कब्ज़े (चाहे धन-दौलत के संबंध के हों, चाहे विद्या-बुद्धि के, और चाहे संन्यास आदि आश्रम के) प्रकाशमान और प्यारे से लगते हैं, किंतु वह बड़ा दोष (अज्ञान) जब उड़ा, दावे, अधिकार मीठे नहीं लग सकते।

काली धारियों का दृष्टांत तो चाहे मिथ्या भी हो जाय, किंतु यह बात तो सदैव बनी ही रहेगी और स्थिर है कि हार्दिक संबंध और अधिकार, भीतरी दावे और कब्ज़े अंधेरी रात के जुगुनू हैं। शास्त्र और ज्ञानियों की बात तो दूर रही, साधारण अनुभव के प्रकाश में भी इनका कलंक होना सिद्ध होता है।

ध्यान—नीचे के लेख को पढ़ते समय यह ध्यान रहे कि दावे, कब्ज़े, अधिकार और आसक्ति आदि का वास्तविक संबंध हृदय से है, शरीर से नहीं। बाह्य दरिद्रता और वस्तु

है, और हृदय की फ़क़ीरी और वस्तु। कपड़े रँगना और बात

दावे और स्याही—जहाँ दावे (पकड़ जकड़) है, वहीं कलमष-हृदयता है, सत्यानाश है, निराशा व हताश है, अकर्मण्यता है, ख़राबी है, बरबादी है, हृदय की दशा परि- वर्तन शील है, और बाहर के सामान भी परिवर्तित हो रहे हैं। इतना तो सब कोई जानता है। अब रही यह बात कि क्या बाहर के परिवर्तन और भीतरी परिवर्तन परस्पर कुछ संबंध भी रखते हैं कि नहीं। यदि रखते हैं तो क्या ? इतना भी हर कोई मान लेगा कि बाह्य ऋतु, मकान, संग आहार के बदलने से मन (भीतर) में परिवर्तन हो जाता है, और बुरी या भली खबर से हृदय प्रसन्न या शोकातुर हो जाता है। पर एक बात और भी है जिसका पूरे तौर व्याव- हारिक विश्वास आना ही अंतर्दृष्टि का खुलना है। जिसकी बे खबरी से "नानक दुःखिया सब संसार" हो रहा है। वह बात क्या है—

अटल आध्यात्मिक नियम। "जब तक हृदय से पकड़-जकड़ है, बाहर रगड़-झगड़ है। दिल से छोड़ी आस, मुरादें आई पास।"

गुज़रातम अज़ सरे-मतलब तमाम शुद मतलब। अर्थः—मतलब से परे हटना ही मतलब का पा लेना है। माँगा करेंगे हम भी कुत्ता-ए-हिज्रे-यार की। आखिर तो दुशमनी है असर को दुआ के साथ। मतलब=मातलब, अर्थात् इच्छा पूर्ति की इच्छा मत कर। यह व्यावहारिक नियम, विज्ञानवाले अनुमान, निश्चय, अनुभव, परीक्षा, अन्वयी-व्यतिरेक-न्याय से निःसन्देह सिद्ध होता है। कलंक औरों के शिर मढ़ने की, उत्तरदायिता

औरों के शिर ठोंकने की आदित (प्रकृति) को छोड़ कर यदि हम बिना रू-रिआयत के अपने जीवन के दुःख-सुख-भरे अनुभवों के जड़-मूल पर ध्यान करें, तो विदित होगा कि हृदय का संसार की किसी वस्तु में उलझना (अर्थात् उसे व्यवहार में सत् या सच्ची मानना), उस की आवश्यकता में पड़ना, मलिनता में अड़ना, या किसी प्रकार की भी नाम-रूप में चित्तासक्ति का परिणाम निरंतर आवर्तनदर्दी (पीड़ा, कष्ट, भ्रांति) और हृदय-भंगता होती है। और हाँ, जब भली बुरी दशा और परिस्थिति, इर्दगिर्द के हालात और असबाब निर्मल दर्पण की भाँति तत्व-दृष्टि को नहीं रोकते !

दुनिया के सब बखेड़े। झगड़े फ़साद भेड़े॥ दिल में नहीं रड़कते। न निगाह को बदल सकते॥ गोया गुलाल हैं ये। सुर्मा मिसाल हैं ये॥

जब भीतरी तेज (कान्ति) अभिलाषाओं के आवरण को उड़ाता है, जब सूर्य चाँद में अपना ही तेज दिखाई देता है। जब इस बात पर निश्चयात्मा होता है कि भूत भविष्य और वर्तमान के तत्व-वेत्ताओं और ब्रह्मनिष्ठों में मेरा ही आत्मिक तेज जगमगाता है, जब हृदय इस बात को सत्य पाता है कि "मुझ बहरे-खुशी की लहरों पर दुन्या की कश्ती रहती है, अज़ सैले-सरूर घड़कती है छाती और कश्ती बहती है"।

जब नाम रूप की परिच्छिन्न अवस्था से स्वतंत्र हो, वर्णनातीत आत्मानंद में चित्त लीन हो जाता है, जब वह असली (परमानंद की) मदिरा रंग लाती है।

कि आँ मेशवद बे दस्ता लब अज़ कामे-जान्हा रेख़ता। अर्थः—कि जिन कामों व कामनाओं की पूर्ति में अनेक जानें (प्राण) न्योछावर होती हैं, उन की ओर से भी जब वह जड़ मूक हो जाता है।

जब बाह्य और लौकिक पदार्थों को निश्चिन्ता और लापरवाही की तरंग तृप्तिके सागर में बहा ले जाती और कहक़हा मारती है।

ईं दफ्तरे-बेमानी ग़र्क़-ए-मए नाब औला।

अर्थः—उत्तम प्रेम मध में यह व्यर्थ दफ्तर नाम रूप का ग़र्क़ (लीन) है। अर्थात् जब शिव-समाधि आती है, तब संसार के धन- ऐश्वर्य, विजय और प्रताप, भूत प्रेत गहनों की तरह नाम- रूप की शमशान भूमि में शिव-रूप महात्मा के इधर-उधर जमघट मचाते नाचना आरंभ कर देते हैं, जमघट करते हैं, धमाचौकड़ी मचाते हैं।

क्या संशय-विपर्यः की गुंजायश है ?

अरे हथकड़ी के कंगन पहने हुए अपराधी ! यदि इस समय भी तू एक क्षण-भर के लिये तत्व-चिन्तन में शरीर और संसार को सचमुच भूल जाय, अपारिच्छिन्न स्वरूप में जाग पड़ें, तो दंड की आज्ञा देनेवाले जज का दिमाग़ रुकजाय, बयान लिखनेवाले मिसलख़्वाँ का क़लम रुक जाय, पकड़नेवाले कोतवाल का हाथ रुक जाय, जिरह करनेवाले वकील की जिह्वा रुक जाय। कौन मस्तिष्क है, जो तेरे बिना सोच सकता है ? कौन जिह्वा है, जो तेरी सहायता बिना बोल सकती है ? कौन हाथ है, जो तेरी शक्ति बिना चल सकता है ? मेरी जान ! सब अपराधों का अपराध (सब पापों की जड़) अपने शुद्ध स्वरूप को व्यावहारिक रूप से या ज्ञान रूप से भूलना ही था। वस्तुतः अपराध यदि है, तो केवल इतना ही है, शेष सब अपराध और जुर्म उसी के विविध भेस (वेष) हैं।

क्यों हो अपराधी कर्मचारियों की खुशामद में पड़े ? यह कचहरी वह नहीं है जो तुझे कैद कर सके। लिखा है कि भृगुजी ने विष्णु के वाम अंग में (अर्थात् लक्ष्मी को) बड़े ज़ोर से लात मार दी। विष्णु ने उठकर भृगु के चरणों को प्रेम के आँसुओं से धोया, सिर के केशों से पोंछा और आँख, शिर और हृदय में स्थान दिया, और उस चोट के चिह्न को प्रमाणपत्र (सार्टिफ़िकेट) जानकर सदैव के लिये वक्षस्थल में स्वीकार किया। वाह ! जो ब्रह्मनिष्ठ लात मारता है सांसारिक संपत्ति को, उसके चरण ईश्वर के भी शिर पर क्यों न होंगे। और जो भी कोई सांसारिक संपत्ति से लिपट कर गहरी निद्रा में लेटता है, वह भिखारी से भी लातें खायगा, सारे संसार का सम्राट और विधाता ही क्यों न हो। बस, यही नियम है, यही वेदांत की व्यावहारिक शिक्षा का निष्कर्ष है। इसमें संन्यासी साधुओं का ठेका नहीं। इस प्रकाश की तो सब को आवश्य- कता है। क्या हिंदू, क्या मुसलमान, क्या ईसाई, क्या मूसाई, सिख, पार्सी, स्त्री-पुरुष, छोटा-बड़ा, ऊँच-नीच, सब कोई इस परम ज्योति से लाभान्वित होने का अधिकारी है। इस सूर्य के प्रताप बिना किसी का जाड़ा नहीं उतरेगा, इस धूप बिना किसी का पाला नहीं दूर होगा। इसमें खाली मानने की तो बात ही नहीं, ठीक-ठीक जानने का सुझामिला है। इसमें तर्क वितर्क की गुंजायश ही नहीं। 'हाथ कंगन को आरसी क्या है'? इतनी विद्या की व्यावहारिक जानकारी न होने से सब का नाक में दम होता है। (Ignorance of Law is no excuse) "नियम की अज्ञानता उपयुक्त बहाना निश्चित नहीं हो सकता"। अतः त्याग, वैराग्य (आत्मज्ञान) को ले लो, शेष सब कुछ स्वयं आ जायगा। इसी लिये वेद कहता है—"आत्मानं वा

विजानीयात् अन्यां वाचा विमुंचथ॥" Know this Atman, give up all other vain words and hear no other.

आत्मा को पूरा-पूरा जान लो, अन्य किसी वस्तु की परवाह मत करो।

इल्म राश्नो आकल राश्नो कालो-कील। जुम्ला रा अंदाख़्तम दर आबे-नील॥ इस्म राश्नो जिस्म रा दर बाख़्तम। ता कमाल-मारफ़त दरयाफ़्तम॥

अर्थः—जब विद्या और बुद्धि, चूँ और चरा (क्यों कैसे) इन सब को मैंने नील नदी में फेंक दिया। और जब मैंने नाम और रूप को हार दिया, तब मुझ को ज्ञान की पराकाष्ठा (पूर्ण अवस्था) प्राप्त हुई।

अर्थः—कालिज में एम० ए० पास करके कुछ नवयुवक तो कालिज में प्रोफ़ेसर बन जाते हैं, जो कुछ पढ़ा उसी को पढ़ाते रहना उनका व्यापार हो जाता है। और कॉलिज से एम० ए० पास करके कुछ नवयुवक वकील या मैजिस्ट्रेट आदि बन जाते हैं। अब वह कॉलिज के विषय (गणित आदि) दोबारा देखने का कदाचित् अवसर कभी भी न पाएँ।

एम० ए० पास करना सब नवयुवकों के लिये आवश्यक था, किंतु प्रोफ़ेसर बनना आवश्यक नहीं। इसी प्रकार आत्मा को पूरा-पूरा जानलेना और किसी वस्तु की मन से परवाह न करना, तो प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है, किंतु रात दिन अध्यात्म विचार और समाधि में लीन रहना, निजानंद में तरंगे मारना, हिलोरे लेना, यह सौभाग्य प्रत्येक के भाग में नहीं। यह प्रोफ़ेसरी काम है सच्चे संन्यासी साधु लोगोंका।

वह लोग जो अपने पूर्व स्वभाव वा अध्यासानुसार अध्यात्मविद्या रूपी एम० ए० पास करके इसी विद्या की शिक्षा देना, शिक्षा पाना और शिक्षा को व्यवसाय नहीं बना सकते, उनके लिये वेदों की आज्ञा है—

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥ 1॥ ( ईशावास्योपनिषद )

कर्म करते हुए ही जीये सौ साल गर। मर्दे आरिफ़का हो आलूदा पर॥

अर्थ—"यदि काम-काज में लगे हुए भी तुम जीवन के सौ वर्ष व्यतीत करदो, तो इस प्रतिज्ञा के साथ (तत्व ज्ञान और साधुहृदय होने पर) तुम दोष से बिनिर्मुक्त हो, किंतु किसी और उपाय से नहीं।"

किसी बड़े जागीरदार का पुत्र यद्यपि विवश नहीं किया जाता, परंतु फिर भी वह प्रायः टेनिस, क्रिकेट, फुटबाल या शतरंज गंजीफा आदि खेलों में प्रवृत्त पाया जाता है, और इस खेलकूद के काम काज में लगने से वह अपने जन्मजात स्वत्व (अमीरी पद, धनिकता) से गिरकर मज़दूरों के झुंड में नहीं गिना जाता, इसी तरह जिन्होंने अपने सच्चे जन्मजात स्वत्व (ईश्वरीय स्वराज्य) को ले लिया है, वह यदि कार्यतः रेल, तार, मैशीन आदि काम काज के खेल में हिट (चोट पर) मारते हैं, और आकाश तक गेंद को उछालते हैं, तो उनकी राजकुमारता कौन अस्वीकार कर सकता है ? और खेल में बाज़ी जीतना भी ईश्वर को जानने वाले का ही भाग है, क्योंकि वह निश्चिंत है। और जिसका चिंताओं के भर से प्राण निकल रहा हो वह लट्टू संसार के खेल को क्या ख़ाक खेलेगा ? कर्म का निष्काम होना ज्ञानी

से अपने आप कर्तृत्व में आता है। और जहां स्वाभाविक कर्म निष्काम है, सफलता वहां दासी है। और यही ज्ञानी जो निष्काम कर्ममें अति उत्सुक हैं,यही हैं जिनको संन्यास का वह गाढ़ा रंग चढ़ता है कि भीतर से फूट कर बाहर निकल आता है। बाहर रंगे कपड़ों से भीतर नहीं जाता। जो लड़के खूब खेलते हैं, नींद भी उन्हीं की गाढ़ी होती है। इस छोटे से संसारमें निश्चिन्तता से खेलनेवाले निश्चिन्तता से सोएँगे, नैष्कर्म्य होएँगे।

महात्मा देवसेन ( Deussen ) की राय तो है यों "कि अध्यात्मविद्या पहले इसके कि ब्राह्मण लोगों में उतरे, जो कर्मकांड में अतिशय प्रवृत रहते थे, राजा लोगों के भीतर प्रकट हुई और बाद में ब्राह्मणों ने इसे संभाला।" इस बात को मुख्यतः वेद के कई अवतरण देकर और विविध युक्तियों से वह अपनी ओर से प्रमाण के स्तंभ तक ले जाते अर्थात् पूर्ण सिद्ध कर देते हैं। अब यद्यपि राम उनसे सहमत नहीं है और उनके अवतरणों को पर्याप्त नहीं मानता और उनकी युक्तियों को सदोष ठानता है, तौ भी इस बात से किसी को अस्वीकृति नहीं हो सकती कि राजा अजातशत्रु, प्रवाहन, जैबली,अश्वपति, कैकेय, प्रत्रवन, जनक, कृष्ण, राम, शिखध्वज, अलर्क आदि सैकड़ों राजे-महाराजे इस कोटि के विरक्त और साधुस्वभाव हुए हैं कि कोई संन्यासी उनकी क्या बराबरी करेगा? अशोक, रणजीतसिंह, बाबर, क्रामवील, पलिज़बेथ, वाशिंगटन, बरन् महान् चार्लस, जिसे नासमझ लोग नास्तिक कहते हैं, इत्यादि के भीतरी जीवन पर जब ध्यान से दृष्टि डाली जाती है, तो उनकी आंतरिक विरक्ति, साधुता, भीतर के त्याग-भाव को देखकर बुद्ध और ईसा स्मरण आते हैं।

इतिहास-विद्या की जो पुस्तक इस नियम को प्रकट नहीं करती कि जो जातियों के उत्थान और पतन, वंशोंके उदय और नाश, राजाओं की निष्कर्मता और तेजस्विताएं सच्चा कारण है,वह पुस्तक केवल काँटों की वाड़ है जिसके भीतर खेती नहीं, या सज-धज कर आई हुई बरात है जिसमें दुलहा नहीं है।

बात थी जो असल में वह नक़ल में पाई नहीं। इसलिये तसवीरे-जानाँ हमने खिंचवाई नहीं॥ एक से जब दो हुए तो लुत्फ़-यकताई नहीं। इसलिये तसवीरे-जानाँ हमने खिंचवाई नहीं॥ हम हैं मुश्ताक़-सुखन और इसमें गोयाई नहीं। इसलिये तसवीरे-जानाँ हमने खिंचवाई नहीं॥

लोग कहते हैं, यद्यपि शेष विद्याओं और कलाओं में भारतवर्ष कभी सब देशों से आगे रह चुका है, किंतु भारत- वर्ष में पाश्चात्य लोगों की भाँति सत्य-सत्य इतिहास-लेखन की शक्ति नहीं थी। होगा, परंतु यह जो जन्म मरण की तिथि, युद्ध का वाह्य चित्र, राज्यों का परिवर्तन, वंश-वृत्त, राजवंशों के उत्थान और पतन का समय, देश की मुख्य-मुख्य घटनाएँ, विद्रोह और विप्लव आदि का सविस्तर विवरण, इस से दफ्तर के दफ्तर काले कर दिए गए हैं, क्या ये इतिहास की ठीक २ विद्या में सम्मिलित हो सकते हैं? इतिहास की विद्या में तो नहीं, किंतु इतिहास की हड्डियों में निस्संदेह प्रविष्ट हैं। पाश्चात्य लोगों के लिपिबद्ध किए हुए इस प्रकार की घटनाएँ और वृत्तांत इतिहासकी सूखी हड्डियाँ कहला सकते हैं, और वह भी प्रायः विशृंखल और असंबद्ध।

सर आर्थर हेलिप्स (sir Arthur Helps) एक जगह लिखता है "इतिहास मेरे सामने मत पढ़ो, मैं जानता हूं कि सिवाय मिथ्या और झूठ होने के यह और कुछ नहीं होगा।"

"हेनरी थोरो" (Henry Thoroe) का कथन है"मैथा- लोजी (झूठी कहानियों की विद्या) में अधिक सचाई पाई जाती है, इतिहास की अपेक्षा।" शोपेनहार ( Schopenhauer ) का कथन है—"समय समय के इतिहास के लिये दैनिक वा साप्ताहिक पत्र मिनट बरन् प्रायः सेकंड की सुई का काम देते हैं, जिस घड़ी के मिनट ही ठीक नहीं, घंटे कहाँ ठीक होंगे।" इमर्सन ( Emerson ) का कहना है कि "वीर का हाल वह लिखे,जो उसी कोटि का वीर हो।" घायल की गति घायल जाने। और स्थान पर लिखा है "मिल्टन को वह समझे जो स्वयं मिल्टन हो।"

वली रा वली मे शिनासद।

अर्थात् वली, (तत्व वेता) को तत्व वेता ही ठीक पहचान सकता है, अन्य नहीं।

जो वर्णन उपस्थित किए जाते हैं,यदि ठीक हों तो वे प्रायः ऐसे ऊपरी तलपर के होते हैं जैसे कोई घड़ी की डायल, केस और सुइयों का तो हाल लिख दे किंतु उसकी भीतर की बना- वट (कला) का कुछ पता न दे। इतने वर्णन से किसी की बिगड़ी घड़ी नहीं संवरती। केवल इतनी विद्या व्यावहारिक रीति पर कुछ लाभ न देगी, बरन् मस्तिष्क पर बोझ की भाँति" पड़कर "नीम हकीम खतरए-जाँ,नीम मुल्ला खतरए- ईमाँ" वाली दशा लायगी। इतिहास-लेखक महाशय! यदि बतलाते हो, तो वह बात बतलाओ जो मेरे काम भी आए। अजनबी नाम और सन् याद करने से मेरा कुछ नहीं सुधरता, निष्प्राण हड्डियाँ कोई पाठ नहीं पढ़ातीं, ईश्वर ज्ञान से रहित इतिहास की विद्या अंधकार को नहीं हटाती। मनुष्य का लिखा झूठा उपन्यास पढ़ने को बैठें, तो छोड़ने को जी

नहीं चाहता। क्या ईश्वर का नाटक (संसार) एक साधारण उपन्यास के समान भी आनंद नहीं रखता? निस्संदेह रखता है और उस आनंद और मनोरंजकता को दिखाना सच्चा इतिहास लिखने वाले का काम है।

ऐसे इतिहास का लेखक वह हो सकता है जो संसार के रचयिता को सचमुच पहचानता हो, प्रकृति के नियम (दैवी-विधान) को पूर्ण रूप से जानता हो। प्रकृति के आध्यात्मिक नियम को कौन जान सकता है? जो अपने ही नित्य-प्रति के जीवन के ज्वारभाटे (उतार चढ़ावों) पर ध्यान करता-करता उस नियम को जान जाय जिससे दुःख और सुख, सुकर्म और अकर्म आदि संबंधित हैं। संसार के रचयिता को कौन पहचान सकता है? जो अपने ही सच्चे स्वरूप को सचमुच पहचान जाय।

मन अर्फ़ा नफ्सहू फ़क़द अर्फ़ा रब्बहू। अर्थः - जिसने अपने स्वरूप को पहचाना, उसी ने ईश्वर को पहचाना है।

जिसे अपनी भी खबर नहीं, वह अन्य संसारवालों, अन्य पदवालों और अन्य देश और जातिवालोंकी खबर क्या ख़ाक देगा? किसी किताब में आनंद और मनोरंजकता कब होती है? जब उसमें हम अपने मन की सुनें और अपने ही किसी गुप्त अनुभव का पता पाएँ। और विश्व का इतिहास यदि सच्चा-सच्चा लिखा जाय, तो क्या है? तुम्हारे ही किसी न किसी समय के अनुभवों की लड़ी है।

अपने कर्नामे किसको प्यारे नहीं लगते? विश्वके इति- हास में घटित भूलें भी आनंद से रहित नहीं। आज जवाब- दही से पिंडा छुड़ाकर तुम उनसे पाठ पढ़ सकते हो। यह न

कहना कि वाशिंगटन, महान चार्लस (charles the great) कैसर, रूमा, मिकाडू आदि के अनुभव भला मेरे साथ क्या संबंध रख सकते हैं? छिपकर रोनेवाली भारतवर्ष की स्त्री की आंख से टपकता हुआ आंसू का मोती, जो किसी ने भी गिरते नहीं देखा, उसी नियम का द्योतक है जिसका कि उल्का तारा ( meteor ) है,जो आकाश में टूटकर नीचे गिरता हुआ सव को दृष्टिगोचर होता है। राजाओं के किलाओं में और अंधी बुढ़िया की झोंपड़ी में मन की इच्छाएँ तो एक जैसी हैं, और भीतर दुःख-सुख भी एक जैसे, और सफलता का नियम भी एक ही है। इस एक नियम को जान लिया, तो तुम मानो संसार के इतिहास को जान गए। इस (Law,नियम) को व्यावहारिक रीति से सब धर्मों ने जाना, किंतु ज्ञान की नींव केवल वेदांत ने स्थिर की।

ज्ञान के भंडार में कोई नबीन समाचार इसके लिये नहीं। छांदोग्य उपनिषद में पूर्व महापुरुषों ने इस ज्ञान को पाकर यों कहा—"आज से कोई हमको ऐसी बात नहीं बता सकता जो हम पहले से न जानते हों। ऐसी खबर कोई नहीं ला सकता, जो हमको पहले से मालूम न हो, ऐसी वस्तु कोई नहीं दिखला सकता जो हम ने न देखी हो।" क्योंकि इस ज्ञान के पाने से सब अनदेखा देखा गया, सब बेसुना सुना गया,सब न जाना जाना गया।

ऐसे ज्ञानी के समान दूसरा है ही नहीं, तो उसके आगे ठहर कौन सके? स्यापा तो उनके लिये है जो इस ज्ञान से अपरिचित हैं और इसी कारण पारे की तरह चँचल हैं। ऐसे लोग केवल व्याकरण के सहारे या बुद्धि के सहारे वेदांत पढ़कर इस पाप-सागर और शोकसमुद्र को पार नहीं कर सकते। "शोक को आत्मविद् तैर जाता है"। यह वेद की

बतलाई हुई कसौटी उनको शुद्ध स्वर्ण नहीं सिद्ध करती। अतः पूर्ण शुद्धता के लिये और पूर्ण रीति से मैल तथा मिला- वट उतारने के लिये धन्धों की अग्नि में पड़ना और कर्म के तेज़ाव में से गुज़रना अनुचित नहीं है:—

क़द्रे-आफ़ियत कसे दानद कि ब मुसीबते-गिरफ़तार आयद। अर्थः—आराम (सुख) की क़दर वही जान सकता है जो मुसीबत (दुःख) में पड़ चुका हो।

जिस से वेद निकले हैं, उसी से संसार का प्रकाश है। अतः वेद (श्रुति) की शिक्षा तो कुछ और हो, और जीवन के कठोर अनुभव कुछ और पाठ पढ़ावें, यह कभी संभव नहीं। दोनों एक दूसरे के सहायक हैं। जो कुछ विद्या और बुद्धि के रूप में श्रुति (वेदांत) का उपदेश है,वही व्यावहारिक रूप से जीवन की पाठशाला में पाठ मिलता है।

क्या तुम्हारा विश्वास वेदांत-तत्व पर इतना ही कच्चा है कि जीवन की घटनाओं से उसको हानि पहुंचाने की आशंका हो गई? जरा सँभल कर देखो, कोई शक्ति वेदांत की बिरोधिनी नहीं है, कोई धर्म वेदांत का शत्रु नहीं है, कोई तत्वज्ञान या विज्ञान इसका शत्रु नहीं है, सब सेवक हैं, सेवक। हां कुछ तो समझदार सेवक हैं, और कुछ ना समझ।

यदि सर्व-साधारण को पहले की भाँति वह वैकुंठ और स्वर्ग के प्रलोभन आज खींचते ही नहीं, और न स्वर्गलोक की प्राप्ति के उपयुक्त कर्म, बरन् जीते जी भूख से बचने की कामना अधिक अधिकार किए हुए है, अथवा संसार के सुख अधिक चित्त को खींच रहे हैं, अथवा और सब प्रकार से भी उनके संकल्प और आवश्यकताएँ बदल रही हैं, तो कहिए क्या यह नाम-रूप के क्षेत्र की व्यक्त वस्तुएँ एकरस भी रह

सकती थीं? इनको स्थिर और सदैव स्थिर रखने में प्रयत्न करना तो अस्तित्वहीन को व्यक्त करने में मन लगाना है, मिथ्या नाम-रूप को आत्मा की उपमा देने का परिश्रम है।

कोशिशे-बेफ़ायदा अस्त व सुरमा बर अंधे-कोर। अर्थ—व्यर्थ परिश्रम है और अंधे के नेत्र पर सुरमा लगाना है।

हिन्दू-शास्त्र की सच्ची शिक्षा कर्मकांड के रूप को अविनाशी बनाने में नहीं है, बरन् अविनाशी आत्मा को प्रत्येक रूप में और प्रत्येक कर्म में, प्रत्येक ऋतु और युग में अनुभव में लाना है। इस लिए आज रेलों, तारों, जहाज़ों, कलों से द्वेष छोड़ो। यदि रात है, तो रात के साथ मत लड़ो, बरन् उसी रात में दीपक जला दो.अमावस्या को दीपावली की रात्रि कर दो, संसार दीप्तिमान करदो। जब दिन आया, तो रात भी आएगी। और यह तो कहो, रात किस बात में दिन से बुरी है? दिन में यदि एक प्रकार की उत्तमता है, तो रात में दूसरे प्रकार का सुख है। पर इससे लाभ उठानेवाला चाहिए। कलियुग यदि बुरा है, तो केवल उसके लिये, कि जो उसको ब्रह्म देखने का द्वार नहीं बनाता।

यह आत्मा को परिच्छिन्न बनाना या नाम-रूप के बंधन में लाना नहीं है, वरन् नाम रूपी परिच्छिन्नता को उड़ाना है। स्वप्न में भयानक सिंह आदि का सामना हो, तो जाग्रति आ जाती है। स्वप्न ही का सिंह स्वप्न की समस्त वस्तुओं को खा जाता है, लोहे को लोहा काटता है। पेट-पालू जब एक बेर भी अपना शरीर समस्त भारतवर्ष देखेगा, तो छोटे से शरीर की समाधि में उसका जी न लगेगा, वृत्त विस्तृत हो जायगा और धीरे-धीरे समधरातल रेखा, विस्तीर्ण चक्र बन जायगी; भूमिका चढ़ जायगी।

अच्छा जी! कुछ भी कहो, राम तो हर रंग में रमता

राम है। हर देह में प्राण है। हर प्राण की जान है। सब में सब कुछ है; पर इस समय लेखनी बनकर लिख रहा है, सूरज बनकर चमक रहा है, गोली गंगी (जिसको लोग श्रीगंगाजी कहते हैं) बनकर गा रहा है, पर्वत बनकर हरे दोशाले ओढ़े कुंभकर्ण की तरह पैर पसारे सुषुप्ति में लेट रहा है। परंतु अपना एक रूप उसे अधिक भा रहा है। मैं पवन हूँ, मुझ बिन प्रत्येक वस्तु निश्चेष्ट, गतिहीन व निर्जीव है।

"Everything is helpless beside me, I the only motive power, not a leaf can fall without my power.

मेरी सत्ता पाए बिना पत्ता नहीं हिल सकता। मुझ बिन सब कुछ दीमक की तरह सो जाता है, जली हुई रस्सी की तरह ढह जाता है। काम बिगड़ने लगा? मैं किसको लांछन दूँ, मेरे सिवाय और कुछ हो भी?

अए मौत! बेशक उड़ा दे इस एक जिस्म (शरीर) को। मेरे और शरीर ही मुझे कुछ कम नहीं। केवल चाँद की किरणें चाँदी की तारें पहन कर चैन से काट सकता हूँ, पहाड़ी नदी नालों के भेस में गीत गाता फिरूंगा, सागर-तरंगों के पहरावेमें लहराता फिरूंगा। मैं ही मन्द वेगी पवन हूँ और प्रभात काल की मस्त चाल वायु (समीर) हूँ, मेरी यह छैलानी मूर्ति सदैव विचरती रहती है। इस रूप में पहाड़ों से उतरा,मुर झाते बूढ़ों को ताज़ा किया, पुष्पों को हँसाया, बुलबुल को रुलाया, दरवाज़ों को खट खटाया, सोतों को जगाया। किसीका आँसू पोंछा, किसी का घूँघट उड़ाया। इसको छेड़, उसको छेड़, तुझको छेड़, वह गया, वहे गया, न कुछ साथ रखा, न किसी के हाथ आया।

ॐ ! ॐ !! ॐ !!!