श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

स्वर्ग का साम्राज्य।

भाग 20 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 20 · अध्याय 1 / 9

स्वर्ग का साम्राज्य।

19 दिसम्बर 1902 को हरमेटिक ब्रादरहुड हाल, सैन फ्रांसिस्को में दिया हुआ व्याख्यान।

स्वर्ग का साम्राज्य तुम्हारे अन्दर है। वह तुम्हें कैसे प्राप्त करना है ? एक बड़ी सुन्दर कहानी है, जिससे प्रगट होता है कि हमारे अन्दर का यह स्वर्ग का साम्राज्य कैसे प्राप्त किया जासकता है। वयान किया गया है कि एक समय एक दैत्य वेदों को लेकर समुद्र की तह में चला गया। "वेद" शब्द के दो अर्थ हैं। मूल अर्थ है ज्ञान, स्वर्ग का साम्राज्य। दूसरा अर्थ है, हिन्दुओं का अत्यन्त पवित्र धर्मग्रन्थ।

इस राक्षस का, जो वेदों को समुद्र की तह में लेजाने वाला कहा जाता है, नाम शंखासुर था, जिस का अर्थ, शब्द व्युत्पत्ति के अनुसार, शँख का दैत्य अथवा शंख में "रहने वाला कीड़ा" है।

वेदों के उद्धार के लिये, ज्ञान के कोपों को लौटा लाने के लिये, ईश्वर ने मछली का अवतार लिया, दैत्य से युद्ध किया, उसका वध किया, और वेदों को संसार में लौटा लाये।

बच्चे इस कथा को पढ़ते हैं और अक्षरशः ज्यों की त्यों मानते हैं। साधारण लोग इसे पढ़ते हैं और अक्षरशः ग्रहण करते हैं। किन्तु कथा का एक गम्भीर, छिपा हुआ (गुह्य) अर्थ है। कथा एक सामान्य सत्य को समझाने के लिये है।

शँख में रहने वाले कीड़े से वेदों को लौटा लाने के लिये ईश्वर ने मत्स्यावतार लिया। ईश्वर ने मछली का अवतार और समुद्र की तह में दैत्य या कीड़े से युद्ध किया, और उसका वध किया। इसका क्या मतलब था ? मछली एक समुद्रीय जन्तु है और शंख में भी समुद्र के एक प्राणी का वास होता है। ईश्वर ने, सर्व स्वरूप ने, मछली के रूप में समुद्र के कीड़े से संग्राम किया। कीड़ा शंख से निकाल बाहर किया गया और समुद्र की लहरों ने शंख को वहा कर किनारे लगा दिया। लोगों ने उसे उठा लिया। शंख बजाया गया और उससे ॐ की गूँजने वाली ध्वनि निकली। यह वेद है। इस माने में वेद, शंख, समुद्र की तह से लाया गया था।

आख्यायिका कहने वाले का अभीष्ट इस पवित्र मंत्र ॐ के महत्त्व पर विशेष ज़ोर देना था। यह प्रकट करना अभिप्राय है कि यह पवित्र अक्षर ॐ सम्पूर्ण, जगत के ज्ञान की

इति थी है। वह सकल वेद है, अपनी अल्पतम परिधि में घन या संक्षिप्त रूप से शँख में रक्खा हुआ स्वर्ग का साम्राज्य है। यह कहानी का प्रयोजन था।

हिन्दू सब पुण्य और महत्व के अवसरों पर शँख बजाते हैं, अर्थात्, वे मृत्यु, जन्म, समर, या पूजा के समयों पर ॐ उच्चारते हैं। सुखी है वह जो ॐ में रहता, चलता-फिरता और अपनी हस्ती रखता है।

अपने भीतर इन निधियों को पाने के लिये या स्वर्ग के साम्राज्य का ताला खुल जाने के लिये, इस ताली को काम में लाना होगा।

यूरोप अमेरिका के लोग तब तक किसी बात को नहीं स्वीकार करना चाहते जब तक उनकी बुद्धि को वह नहीं जँचती (अपील करती)। संसार के तर्कों से चाहे इस मंत्र का गुण हम न सिद्ध कर सकें; फिर भी, ठीक तरह पर उच्चारण होने पर, यह मंत्र जो प्रबल प्रभाव मनुष्य के चरित्र पर डालता है, या दुनिया की सब निधियों को हमारे अधीन कर देने में भीतर के भेदों के खोलने का जो गुण इस में है, उससे इनकार नहीं किया जा सकता। यह प्रकट करना भी कथा कहने वाले का एक प्रयोजन था कि हिन्दुओं के पवित्र धर्म ग्रन्थों का सम्पूर्ण ज्ञान उस समय प्राप्त किया गया था जब उनके लेखक इस अक्षर को जपते जपते अत्यानन्द में डूब गये थे। यह मंत्र सम्पूर्ण ज्ञान का बीज है। विभिन्न पहलुओं से इस मंत्र की महत्ता आप के सामने रक्खी जायगी। इस मंत्र का महत्व इस लिये दिखलाना ज़रूरी है कि लोग पूरे हृदय से इसे अपनावें।

सब से पहले, ॐ मंत्र किसी विशेष भाषा का नहीं है। ऐसा समझ कर कि यह संस्कृत शब्द है और अन्य किसी

भाषा का नहीं, इसे अस्वीकार न करो। यह परमेश्वर का नाम है। यह अक्षर तुम्हें अन्दर से प्राप्त है, कोई इसकी तुम्हें शिक्षा नहीं देता। यह जन्म के साथ तुम्हें मिलता है। बच्चे की चीख की, ऊँ, ओं, आँ की ध्वनि से, जो ॐ का एक विकृत रूप है, अनोखी समानता है। ॐ शब्द हरेक बच्चे के पास अन्दर से आता है। ॐ लिखने का ठीक ढंग अ उ म् है। संस्कृत व्याकरण के नियमों के अनुसार, अ और उ, की, संधि होकर साथ मिलने पर, ओ बन जाता है। गूंगा भी अ, उ, और म् की आवाज़ निकाल सकता है। इस तरह, ॐ अपने पूर्ण रूप में, और खंडशः भी हरेक के द्वारा और स्वयं उसके द्वारा दुनिया में लाया जाता है। यह अत्यन्त स्वाभाविक शब्द है जो हर किसी को स्फुरे सकता है। जब लड़के गलियों में बड़े खुश होते हैं तब उनका छलकता हुआ हर्ष ओ की लम्बी, धूमधामी ध्वनि में स्वभावतः प्रकट होता है, जो केवल संक्षिप्त ॐ है।

यह ध्वनि सब भाषाओं में होती है। संस्कृत, फार्सी, अंग्रेज़ी, जापानी, सब में न्यूनाधिक पूर्ण रूप में यह है। जब लोग अपने आपे से बाहर होजाते हैं, उन अवसरों पर इस ओ ध्वनि का व्यवहार किया जाता है। जब वे हुलसते हैं, जब वे आनन्द से भर जाते हैं, तब यह ध्वनि स्वभावतः उनसे निकलती है। जब लोग बीमार पड़ते हैं, या मुसीबत में होते हैं, जब उन्हें मर्मभेदी पीड़ा होती है, तब उनके ओठों से कौन सी ध्वनि निकलती है ? ओह, ओह या उम् जो ॐ का केवल अपभ्रष्ट रूप है। हिब्रू, अर्बी, अंग्रेज़ी प्रार्थनाओं का अन्त आमीन से होता है, जिसका ॐ से अत्यन्त अनोखा साद्दृश्य है। ग्रीक (यूनानी) वर्णमाला में अन्तिम अक्षर ओमेगा है जिससे ॐ की ध्वनि को प्रमुख स्थान

प्राप्त होता है।

यह ध्वनि हरेक व्यक्ति को क्यों मिलती है, बीमारी में हरेक के ओठों से यह ध्वनि क्यों निकलती है, वह यूरोपीय अमेरिकन, हिन्दू, ईरानी, जापानी, या किसी भी फ़िरके का क्यों न हो ? हिन्दू उत्तर देता है। यह ध्वनि सुन्दर वृक्ष के तुल्य है, जो रोगी मनुष्य को, जिसे प्रचण्ड सूर्य झुलसा रहा है, शीतल छाया देता है। इस लिये स्वभावतः यह रोगी मनुष्य फैले हुए वृक्ष की शीतल छाया ढूँढ़ता है। यही बात है कि हरेक व्यक्ति, क्लेश व्यथा या बीमारी की हालत में स्वभावतः इस अक्षर ॐ, इस स्वाभाविक धर्म का आश्रय लेता है, यह (ध्वनि) उसे कुछ चैन देती है। हम देखते हैं कि सब दशाओं में यह स्वभावतः आराम पहुँचाती है। रोगियों को यह ध्वनि उच्चारण करने से आराम मिलता है। यदि दुःखी और मांदे को भी यह ध्वनि आराम पहुँचा सकती है, तो क्या यह शान्ति और एकता की देने वाली न होगी, यदि आप इसे ठीक तरह से उच्चारें ? हम इसे प्रणव कहते हैं और इसे उस वस्तु का वाचक समझते हैं जो जीवन में व्याप्त है, अथवा जो प्राण या श्वासमें संचार करती है। प्रत्येक प्राणी इस ध्वनि को निकालता है, यह उसके श्वास के साथ मिलकर निकलती है। यदि तुम इतनी ज़ोर से साँस (नासिका के द्वारा श्वास) लो कि उसकी आवाज़ सुनाई पड़े, तो तुम देखोगे कि उस आवाज़ का यदि कोई परिस्फुट शब्द स्थान ले सकता है तो वह है सोहम्, सोहम्। यह ध्वनि सबकी साँस में है। इस में हम सोहम् पाते हैं।

संस्कृत व्याकरण दुनिया की किसी भी दूसरी व्याकरण से अधिक उन्नत है। उसने सब ध्वनियों और शब्दों का पूर्ण विश्लेषण किया है। म् अक्षर व्यंजन है। किन्तु यह

व्यंजन अनुनासिक है और सिद्ध किया गया है कि म् एक ऐसा व्यंजन है जिसकी सीमा स्वर से सटी हुई है। ओ और अ सब व्याकरणों के अनुसार स्वर हैं। स और ह् व्यंजन हैं। व्यंजनों को निकाल दो और हमें ओ, अ, म्, या ॐ मिलता है।

अब आप देखते हैं कि स्वर स्वतंत्र ध्वनियाँ हैं और व्यंजन परतंत्र ध्वनियां हैं, वे अकेले या अपने सहारे पर नहीं टिक सकते। उदाहरण के लिये, यह व्यंजन क् है। तुम उसे क कहते हो, संस्कृत में वह क् है। मूल ध्वनि में तुम्हें इ या अ सरीखा एक स्वर मिलाना चाहिये और तब वह उच्चारण के योग्य बनता है।

व्यंजन इस दुनिया में नाम और रूप को स्पष्ट करते हैं। इस दुनिया के सब नाम और रूप व्यंजनों की तरह पराश्रित हैं। उनके पीछे यदि परम सत्यता न हो तो क्या उनमें से एक भी अपने आप ठहर सकता है ? सब दृश्य नाम और रूपमय हैं। जिनका उच्चारण आधारभूत सत् या सत्यता, अथवा स्वर के बिना नहीं हो सकता। आप उस सत्य को चाहे परमेश्वर कहें, चाहे न जानने के योग्य तत्व या जो कुछ कहना पसन्द करें कहें। आधारभूत सत्यता, पूर्ण सत, पूर्ण ज्ञान और पूर्ण आनन्द सिद्ध है जिनके सूचक यथाक्रम अ, उ और म् हैं, इस प्रकार सोहम् में स और ह् व्यंजन दृश्य व्यापारों के नाम, रूप और आकृति, के स्पष्ट करने का काम देते हैं, और अन्तर्वर्ती ॐ मूलस्थ सत्यता को दर्शाने वा स्पष्ट करने का काम देता है।

यदि हमारे पास अनेक आकृतियों के खाँड के खिलौने हैं, कुछ कुत्ते की शक्ल के, कुछ बैल की शक्ल के, कुछ बाघ रूप के, कुछ मनुष्य की शक्ल के, तो वे एक दूसरे से भेद

तो अवश्य रखते हैं, किन्तु सारा भेद केवल आकृतियों और रूपों तथा नामों में है। एक ही के पदार्थ के बने होने के कारण वे सब के सब वही, शक्कर (खाँड) हैं।

समुद्र में जाओ। वहां तुम जहाँ तहाँ तरंगे देखोगे, जहाँ तहाँ हिलकोरे देखोगे, जिनके डील-डौल और शक्ल में भेद होगा, किन्तु उनके अधिष्ठान की असलियत को देखो, वह एक ही समुद्र है। सब एक ही हैं, वे सब पानी हैं, भेद तो केवल आकार और रूप में है।

हीरा ले लो, जो इतना चमकीला, इतना जगमगा, इतना तेजस्वी है, इतना कड़ा है कि लोहे को सरलता से काट सकता है। इसके बाद कोयला ले लो, जो इतना मुलायम होता है कि सहज ही कागज़ पर निशान बना देता है, अति कुरूप, महा मैला, बिलकुल निकम्मा होता है। रसायनज्ञ हमें बतलाते हैं दोनों में असलियत में कोई भेद नहीं है। दोनों वही निखालिस कार्बन हैं, दोनों में कुछ भी भेद नहीं है। फिर बाह्य भेद का कारण क्या है ? भेद आकार और प्रकार में है। कार्बन (carbon) के ज़र्रों की हालत और शक्ल एक स दूसरे में भिन्न है। भेद केवल रूप में है।

इसी तरह हिन्दू शास्त्र के अनुसार, इस संसार के सब पृथक विभाग नाम और रूप के कारण से हैं। यदि तुम गहरी तह में जाओ, यदि तुम सब नामों और रूपों के अधिष्ठान स्वरूप तत्व की छानबिन करो, तो तुम देखोगे कि सब का आधार एक ही नित्य निर्विकार, अव्यय तत्व है, वह तत्व अपना आधार आप ही है। उस तत्व की तुलना स्वर—ध्वनियों से की जा सकती है, और नाम तथा रूप की तुलना व्यंजन—ध्वनियों से करना ठीक होगा। इस प्रकार सोहम् के स और ह्, जो नाम और रूप का काम देते हैं,

जो पराश्रित हैं, छोड़ दिये जाने पर केवल असलियत रह जाती है और एकाक्षर अउम्—ॐ की हमें प्राप्ति होती है। इस प्रकार से ॐ वह असलियत है जो तुम्हारी सांस में संचार करती है। वह विश्व की सम्पूर्ण श्वास में मौजूद है। सम्पूर्ण भेद, सब विभागों, सम्पूर्ण पृथकता के पीछे जो शक्ति है उस का वह अत्यन्त नैसर्गिक नाम है, सार-तत्व का अत्यन्त स्वाभाविक नाम है।

अध्यापक मैक्समूलर ने और उनके साथ दूसरे तत्वज्ञानियों ने सिद्ध किया है कि सम्पूर्ण विचार और भाषा का वैसा ही नाता है जैसा एक ही सिक्के के मुखभाग का पृष्ठ भाग के साथ। एक दूसरे के बिना नहीं टिक सकता। क्या तुम इस पदार्थ को, मेज़ को, बिना इसका विचार किये देख सकते हो ? क्या तुम किसी भी वस्तु को तदनुसार विचार किये बिना धारण कर सकते हो ? "धारण" शब्द ही मानसिक विचार का सूचक है।

फिर, विचार और भाषा एक ही हैं। बिना भाषा के तुम सोच ही नहीं सकते। शिशु कोई भाषा नहीं जानता और उसका कोई विचार भी नहीं होता। बच्चे को सोचना शुरू करने दो। जब तक उसके भाषा न होगी तब तक वह नहीं विचार कर सकता। माता बच्चे के कानों में नाम फूकती है, नामों के अर्थ लड़के के हृदय में फूके जा रहे हैं। माता के शब्दों के साथ अर्थ का वही सम्बन्ध है जो सवार का घोड़े से। अर्थ रूपी सवार शब्दों के घोड़े पर चढ़कर बच्चे के अन्तःकरण में पहुँचता है।

बिना भाषा के हम विचार नहीं कर सकते। विचार और भाषा एक हैं, और यह हम पहलेही देख चुके हैं कि दुनिया और विचार भी एक ही हैं। इस लिये भाषा और विचार

एक प्रकार से अनन्य होने से, और विचार तथा संसार भी अनन्य होने से, शब्द और संसार एक दूसरे के कुटुम्बी हैं। विचार के बिना इस संसार का कोई भी पदार्थ नहीं देखा जाता। किसी पदार्थ को देखने का यत्न करो और अपने चित्त में उसकी धारणा को न प्रवेश करने दो, यह असम्भव होगा। वास्तव में, काले नखते को देखने व मालूम करने का अर्थ है काले नखने का विचार (ख्याल) करना।

इस लोक के सभी पदार्थ तदनुरूप कल्पना के जवाब (प्रतिरूप) हैं। बिना ख्याल के इस दुनिया में कुछ भी नहीं देखा जाता, और बिना भाषा के कोई ख्याल नहीं हो सकता। दुनिया का भाषा से वही रिश्ता है जो एक सिक्के के मुख भाग से पृष्ठभाग का है। इससे तुम्हें इस वचन का "प्रारम्भ में शब्द था, शब्द ईश्वर के साथ था और शब्द ईश्वर था," वास्तविक तत्व या असली महत्व मालूम होता है। (In the beginning there was word, the word was with God and the word was God.)

सब, हम एक ही शब्द या ध्वनि चाहते हैं जो समग्र संसार को प्रदर्शित करे। हम कोई शब्द चाहते हैं, जो शक्ति, सत्व, बल, नियामक तत्व, विश्व को धारण करने वाली वस्तु का प्रदर्शक बन सके।

सब भाषाओं में हमें कुछ ध्वनियाँ मिलती हैं, जो कंठ से निकलती हैं, दूसरी जो ओठों से निकलती हैं, कुछ और तालु के पास से मुख से निकलती हैं। किसी भी भाषा में ऐसी एक भी ध्वनि नहीं है जो वाचिक इन्द्रियों के किसी पैले भाग से निकलती हो जो कंठ के नीचे हो। कंठ वाचिक इन्द्रियों की सीमा, वल्कि एक सीमा है, और ओठ दूसरी सीमा हैं। ओठों के बाहर से कोई ध्वनि नहीं निकलती।

यहाँ हमारे पास अ, उ, म्, है। अ कंठस्थानीय ध्वनि है। वाचिक इन्द्रियों के एक घेरे से यह आती है।

उ ध्वनियों की परिधि के ठीक बीच से, वाचिक स्थानों के मध्यस्थ तालु के निकट से निकलता है।

म् ध्वनि वाचिक इन्द्रियों या भागों के अन्त या सिरे के ओष्ठ और नासिका से निकलती है। इस तरह 'अ' ध्वनि की परिधि के प्रारम्भ का प्रदर्शक है। 'उ' मध्यका प्रदर्शक है, और म् अन्त का प्रदर्शक है। यह सारे क्षेत्र को छाये है। ॐ, ॐ, अत्यन्त स्वाभाविक नाम है। यह सम्पूर्ण भाषा और फलतः सम्पूर्ण संसार को प्रदर्शित करता है। यहाँ पर एक सवाल पैदा होता है। और बहुत सी ध्वनियाँ हैं जो अ की तरह कंठ से निकलती हैं। इसी तरह उ और म् की भी सवर्गीय वा सजातीय अनेक ध्वनियाँ हैं। तो फिर अपनी इच्छा से चुना हुआ दूसरा कोई कंठ्य ( guttural ) वर्ण उ के वर्ग की किसी दूसरी ध्वनि से और किसी दूसरी सजातीय ओष्ठध्वनि से मिलाया जाकर ऐसा कोई शब्द क्यों नहीं बना सकता जो सकल भाषाओं को प्रदर्शित करे?

इसी तरह उन सब ध्वनियों में जिनका स्थान वही है जो उ का, केवल उ ही ऐसी ध्वनि है जो उन सब का स्वामी, सरदार, सम्राट कही जा सकती है। वह एक स्वर, एक ध्वनि है, जिसे हरेक बच्चा निकालता है। एक गूँगे के पास भी वह होती है। दूसरों ने उसकी शिक्षा नहीं दी थी, वह स्वतः प्राप्त, और फलतः अपनी श्रेणी की सर्वोत्तम प्रदर्शक है। म् सब ओष्ठ्य वर्णों का सर्वोत्तम प्रदर्शक है। इस में एक और विशेषतः है। यह अनुनासिक है और नासिका का, जो श्वास का स्थान है, सारा क्षेत्र ढक लेता है। इस तरह

हम देखते हैं कि यदि कोई पूर्ण नाम हो सकता है तो वह ॐ है। यह सब भाषाओं का प्रतिनिधि वा प्रदर्शक है। यह सम्पूर्ण विचार का प्रतिनिधि है। यह अखिल विश्व का प्रतिनिधि है।

सम्पूर्ण वेदान्त, बल्कि हिन्दुओं का सम्पूर्ण दर्शनशास्त्र केवल इस अक्षर ॐ का विवरण है। ॐ समग्र विश्व को ढके है। सारे संसार में एक भी कोई नियम, एक भी कोई शक्ति, सारे जगत में एक भी कोई पदार्थ ऐसा नहीं है। एक एक करके तुम देखोगे कि भूतों के सब लोक, सब जगत, अस्तित्व की सब अवस्थायें इस अक्षर अउम्, ॐ से ढकी हुई हैं।

ध्वनियाँ दो तरह की हैं, स्पष्ट (लिखने में आ सकने वाली) और अस्पष्ट (लिखी न जा सकने वाली)। हम उन्हें ध्वन्यात्मक और वर्णात्मक कहते हैं। ये संस्कृत के नाम अर्थों से भरे हुए हैं। वर्णात्मक के शाब्दिक अर्थ हैं "वे ध्वनियाँ जो लिखी जासकती हैं"। ध्वन्यात्मक के अर्थ हैं वे "ध्वनियाँ जो लिखी नहीं जा सकतीं हैं।" सब साधारण भाषा वर्णात्मक है। वेदना (भावना) की भाषा ध्वन्यात्मक है। वह शब्दों में लिखी या अक्षरों से प्रगट नहीं की जा सकती।

एक मनुष्य हँसता है। क्या किसी लिखित भाषा में आप उसे प्रगट कर सकते हैं? क्या आप उसे कागज पर अंकित कर सकते हैं? एक मनुष्य रोता है। आप उसे कागज पर नहीं स्फुट कर सकते। ये ध्वन्यात्मक हैं। हम देखते हैं कि ध्वन्यात्मक ध्वनियाँ, या स्वाभाविक ध्वन्यात्मक भाषा एक उद्देश्य विशेष रखती है जो वर्णात्मक से नहीं सिद्ध होता। मान लो कि आप कुछ लोग विदेश जाते हैं, या एक विदेशी आपके देश में आता है, वह आप की भाषा बोल या समझ

नहीं सकता। उसे किसी वस्तु की ज़रूरत पड़ती है, कदाचित् वह कोई वस्तु मोल लेना चाहता है। आप उसकी बात नहीं समझते। शायद वह मनुष्य भूखा है, कुछ खाना चाहता है। उसकी भाषा न समझने के कारण तुम उसकी ज़रूरतों पर ध्यान नहीं देते। मनुष्य चीखना और रोना शुरू करता है। तब तुम उसे समझते हो, तब तुम उसे देखते हो। वेदना की यह भाषा सर्वत्र समझी जाती है। किन्तु वर्णात्मक या बनावटी भाषा केवल वही समझते हैं जो उसे सीखते हैं। स्वाभाविक भाषा सब कहीं समझी जाती है।

तुम हँसना शुरू करते हो, सब समझ लेते हैं कि कोई हास्यजनक या मनोरंजक बात तुम्हारी दृष्टि में पड़ी है अथवा तुम्हारे मन में है। यहाँ एक मनुष्य है जो कोई बाजा बजाता है, सारंगी कह लीजिये। तुम सुर, ताल जान जाते हो। संगीत की भाषा ध्वन्यात्मक है, और सभी कोई उसे समझता है।

"मर्चेंट आफ वेनिस (वेनिस के व्यापारी)" में लिखा है।

"Therefore the poet. Did feign that Orpheus drew trees, stones and floods. Since naught so stockish, hard and full of rage. But music for the time doth change his nature."

"इस लिये' कवि ने।

वर्णनू वर्णाया कि ओर्फियूस ने वृक्षों, पत्थरों और नदों को खींचा क्योंकि ऐसा जड़, कठोर और कोप से पूर्ण कोई भी नहीं है, जिसकी प्रकृति संगीत उस समय के लिये न बदल दे"।

संगीत की भाषा उसी प्रकार की नहीं है जैसी हमारे

ख्याल की भाषा। उसका एक खास उपयोग है, उसमें मोहिनी शक्ति है। विज्ञान चाहे सिद्ध कर सके या नहीं कि संगीत आप पर इतना मनोहर प्रभाव क्यों डालता है, किन्तु वह तथ्य तो वर्तमान ही है। यदि विज्ञान इसे नहीं सिद्ध कर सकता तो उसका दोष है। इसी तरह ॐ ॐ में मनमोहनी शक्ति, पूर्णता, एक ऐसा गुण है जो तुरन्त ही उच्चारण करने वाले के मनको वश में कर लेता है, जो चटपट समस्त भावना और समस्त विचार को एकता की दशा में ले सकता है, आत्मा को शान्ति और विश्राम प्रदान करता है और मनको ऐसी दशा में पहुँचा देता है जिसमें उसकी परमेश्वर से अनन्यता हो जाती है। विज्ञान चाहे इसे समझा न सके, किन्तु यह एक तथ्य है जो प्रयोग (अनुभव) से सिद्ध किया जा सकता है। विज्ञान को धिक्कार है यदि वह पवित्र अक्षर ॐ की अमोघता सम्बन्धी सत्य का विरोध करता है।

ॐ ! ॐ !! ॐ !!!